भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनेका वृत्तांत

( ११० )

अनुरागसागर

आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥ लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥ आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥ सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥ करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥ बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥ जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥

कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर

आना पुरुष वचन

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥ जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥ दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥ लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥ तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥ वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥ ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥

कबीर वचन

चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥ धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥ तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥ पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥ यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥ पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥ धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥

मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

अनुरागसागर

( १११ )

धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥ धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥ बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥ निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥ बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥

धर्मराज वचन

बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥ धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥ अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥ निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥

कबीर वचन

धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥ चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥ मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥ आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥ पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥ तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥ चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥ हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥ मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥ तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥

छन्द

आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥ करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥

( ११२ )

अनुरागसागर

मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥ सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥ सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥ पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥

धर्मदास वचन

धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥ मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥ धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥ मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥ अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥ काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥ सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥ धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥ तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥ शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥ दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥ तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥ अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥ ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥ यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥

१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।

कबीरसाहबका चौका करके धर्मदासजीको परवाना देना आरती विधि

अनुरागसागर

( ११३ )

छन्द

चतुर्भुज बंकेज सहतेज, और चौथे तुम अहौ ॥ चार गुरुकडिहार जगके वचन यह निश्चय गहौ ॥ यही चार अंश संसारमें, जीव काज प्रगटाइया ॥ स्वसंवेदसोइनसंग दियो, जेहि सुनि काल भगाइया ॥७४॥

सोरठा-चरोंमें धर्मदास, जम्बुदीपके गुरु साहि ॥ व्यालिस वंश विलास तैं जीव तेहि शरणगहि ॥७८॥

आरतीविधिवर्णन

कबीर साहबका चौका करके धर्मदासको परवाना देना धर्मदास वचन

धर्मदास पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन्ह सुभागा ॥ हे प्रभु ! नहि रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण वरनिन जाई ॥ महिमा अमित अहै तुम स्वामी । केहि विधि बरनों अंतरयामी ॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहिं तुम लीन उबारी ॥ अब चौका भेद कहो मुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुखभामी ॥ जो तुम कहो करौ मैं सोई । तामहैं फेर न परि हैं कोई ॥

कबीर वचन चौकाका साज

धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भागि चले यमराजा ॥ सात हाथको बस्तर लाओ । श्वेत चँदोबा छत्र तनाओ ॥ घर आंगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ ॥ तापर आँटा चौक पुराओ । सवासेर तंदुल ले आओ ॥ स्वेत सिंहासन तहाँ बिछाई । नाना सुगंध धरु तहाँ लगाई ॥ स्वेत मिठाई स्वेतै पाना । पुंगीफल स्वेतहि परमाना ॥ लौंग इलायची कपुर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥

कबीरसाहबका धर्मदासको उपदेश देना

कोई OCR पाठ नहीं।

नारायणदासजीका कबीरसाहबकी अवज्ञा करना

कोई OCR पाठ नहीं।

कोई OCR पाठ नहीं।

कोई OCR पाठ नहीं।

कोई OCR पाठ नहीं।

कोई OCR पाठ नहीं।

द्वादश पन्थका वर्णन

कोई OCR पाठ नहीं।

अनमङ्ग वृत्तका पन्थ ४

कोई OCR पाठ नहीं।

अखिलभङ्ग दूतका पंथ ८

कोई OCR पाठ नहीं।

कोई OCR पाठ नहीं।

धर्मदास साहबको आत्म अंशका दर्शन होना

कोई OCR पाठ नहीं।

चूड़ामणिकी उत्पत्तिकी कथा

कोई OCR पाठ नहीं।

ब्यालीस वंशके राज्यकी स्थापना

कोई OCR पाठ नहीं।

चूड़ामणिको कबीरसाहबका उपदेश देना

कोई OCR पाठ नहीं।

वंश का माहात्म्य

कोई OCR पाठ नहीं।

भविष्य कथा प्रारम्भ

कोई OCR पाठ नहीं।