भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

खण्ड ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४०९ प्रकार जाननेवाला जो साधक 'उद्गीथ' शब्दके इन तीनों अक्षरोंकी उद्गीथ—ओंकारवाच्य परमात्माके रूपमें उपासना करता है, उसके लिये वाणी अपना सारा रहस्य प्रकट कर देती है, अर्थात् उसके सामने समस्त वेदोंका तात्पर्य अपने-आप प्रकट हो जाता है । तथा वह सब प्रकारकी भोग सामग्रीसे एव उसे भोगनेकी शक्तिसे भी सम्पन्न हो जाता है ॥ ६-७ ॥ अब कामनाओंकी उत्तम सिद्धिका निश्चित साधन बताया जाता है । इसके लिये उपासनाके जो सात अङ्ग आगे बताये जानेवाले हैं, उन्हें ध्यानमें रखना चाहिये । उनमेंसे पहला अङ्ग यह है कि जिस सामके द्वारा साधक अपने इष्टदेवकी स्तुति करना चाहता हो, उसे सदा याद रक्खे । दूसरी बात यह है कि वह साम—गाये जानेवाला मन्त्र जिस ऋचामे प्रतिष्ठित हो, उस ऋचाको भी ध्यानमें रक्खे । तीसरी बात यह है कि जिस ऋषिके द्वारा उस मन्त्रका साक्षात्कार किया गया हो, उस ऋषिको स्मरण रक्खे । चौथी बात यह है कि उस सामगानके द्वारा जिस देवताकी स्तुति करना उपासकको अभीष्ट हो, उस देवताका भलीभाँति स्मरण रक्खे । पाँचवीं बात यह है कि जिस छन्दवाले मन्त्रसे वह स्तुति करना चाहता हो, उस छन्दको स्मरण रक्खे और छठी बात यह है कि सामवेदके जिस स्तोत्र-समूहसे स्तुति की जानेवाली हो, उस स्तुति-समूहको भी ध्यानमें रक्खे । सातवीं बात यह है कि जिस ओर मुख करके स्तुति करनेका विचार हो, उस दिशाका भी ध्यान रक्खे। अन्तमें प्रमादरहित अर्थात् सावधान होकर अपनी अभिलाषाको याद रखते हुए परमात्माके समीप जाकर अर्थात् ध्यानके द्वारा उनमें स्थित होकर स्तुति करनी चाहिये। क्योंकि इस प्रकार स्तुति करनेवाला उपासक जिस कामनासे स्तुति करता है, उसकी वह कामना शीघ्र ही पूर्णतया सफल हो जाती है ॥ ८-१२ ॥ चतुर्थ खण्ड ओंकारके आश्रयसे अमृतत्वकी प्राप्ति 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, यों समझकर उसकी उपासना करनी चाहिये, क्योंकि यज्ञमें उद्गाता नामक ऋत्विज् 'ॐ' इस अक्षरका ही उच्चस्वरसे गान करता है । उस ओंकारकी व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥ यह प्रसिद्ध है कि मृत्युसे डरते हुए देवताओंने ऋक्, यजुः और सामरूप तीनों वेदोंमें प्रवेश किया—उनका आश्रय लिया । उन्होंने गायत्री आदि भिन्न-भिन्न छन्दोंके मन्त्रोंसे अपनेको ढक लिया—उन्हें अपना कवच बनाया। उन्होंने जो भिन्न भिन्न छन्दोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा अपनेको आच्छादित कर लिया, इसीसे वे 'छन्द' कहलाये । जो आच्छादन करे, वही छन्द—यह 'छन्दस्' शब्दकी व्युत्पत्ति है ॥ २ ॥ जिस प्रकार मछली पकड़नेवाला धीवर जलके भीतर भी मछलीको देख लेता है, उसी प्रकार देवताओंको मृत्युने उन ऋक्, साम एव यजुर्वेदके मन्त्रोंकी ओटमें भी देख लिया— वहाँ भी उसने इनका पिण्ड नहीं छोड़ा । वे देवतालोग भी इस बातको जान गये, अतः ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंसे ऊपर उठकर वे स्वरमें अर्थात् ओंकारमें ही प्रविष्ट हो गये ॥ ३ ॥ जब कोई ऋक्‌का—ऋग्वेदके मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब वह निःसन्देह 'ॐ' इस प्रकार ही उच्चस्वरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार सामको और वैसे ही यजुर्वेदको जाननेवाला भी 'ॐ' का ही गान करता है । इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जो यह ओंकाररूप अक्षर अर्थात् उसका वाच्यभूत परमात्मा है, वही ऊपर बताया हुआ स्वर है, वही अमृत—मृत्युसे छुड़ानेवाला एव भयरहित स्थान है । उसका आश्रय लेकर देवतालोग अमर और निर्भय हो गये । जो ओंकारको इस रूपमें जानकर उसके अर्थभूत अविनाशी परमेश्वरकी स्तुति एव उपासना करता है तथा एकमात्र इसी अमृतरूप, सर्वथा भयरहित एव अविनाशी परमात्माके स्वरूपभूत इस स्वरमें प्रविष्ट हो जाता है—उसकी शरणमें चला जाता है, वह उसमें प्रवेश करके उसी अमृतको प्राप्त कर लेता है, जिस अमृतको पूर्वोक्त प्रकारसे देवताओंने प्राप्त किया था ॥ ४-५ ॥ पञ्चम खण्ड सूर्य एवं प्राणके रूपमें ओंकारकी उपासना अब ओंकारकी उपासनाका अन्य प्रकार बताया जाता है। निश्चय ही जो उद्गीथ—गाने योग्य परमात्मा है, वही प्रणव— ओंकार है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—यों समझना चाहिये, क्योंकि नाम और नामीमें कोई भेद नहीं होता । उ० अ० ५२—५३—

४१० छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १

४१० * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय १ वह आकाशमें विचरनेवाला सूर्य ही उद्गीथ है और यही प्रणव भी है। अर्थात् सूर्यमें ही परमात्मा और उनके वाचक 'ॐ' की भावना करनी चाहिये, क्योंकि यह 'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। यहाँ 'स्वरन् एति' (उच्चारण करता हुआ गमन करता है)—इस प्रकार 'सूर्य' शब्दकी व्युत्पत्ति की गयी है ॥ १ ॥ एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे इस प्रकार कहा—'बेटा ! मैने इसी सूर्यको लक्ष्य करके ओंकारका भली- भाँति गान किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। तू सूर्यकी किरणोंका सब ओरसे आवर्तन कर—उन सबके रूपमें ओंकारका बार-बार चिन्तन कर; निःसन्देह तेरे बहुत-से पुत्र हो जायेंगे।' इस प्रकार यह आधिदैविक—देवतासम्बन्धी उपासना है ॥ २ ॥ अब पुनः आध्यात्मिक (शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली) उपासनाका प्रकार बताया जाता है। जो यह श्वासके रूपमें चलनेवाला मुख्य प्राण है, उसीके रूपमें उद्गीथकी—गानेयोग्य परमात्माकी उपासना करनी चाहिये, क्योंकि वह 'ॐ' इस प्रकार उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है। प्राण सूर्यरूप है, इसीलिये 'स्वरन् एति' इसी प्रकार यहाँ भी व्युत्पत्ति की गयी है। अर्थात् हमारे प्राणके द्वारा निरन्तर ओंकारकी ध्वनि हो रही है—ऐसी भावना करते हुए उसमें ओंकाररूप परमात्माका ध्यान करना चाहिये ॥ ३ ॥ एक बार कौषीतकि ऋषिने अपने पुत्रसे यह बात कही कि "बेटा ! मैने इस प्राणको ही लक्ष्य करके—इसीमें परमात्माकी भावना करते हुए ओंकारका भलीभाँति गान— आवर्तन किया था, इसलिये मेरे तू एक पुत्र है। 'निश्चय ही मेरे बहुत से पुत्र होंगे' इस सङ्कल्पसे तू अनेक रूपोंमें प्रतिष्ठित प्राणरूप परमात्माका भलीभाँति गान कर— उपासना कर"*॥ ४ ॥ अब कहते हैं कि निश्चय ही सामका जो उद्गीथ नामक भाग है, वही प्रणव है, क्योंकि प्रणव उसका सार है। और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। अर्थात् दोनोंमें कोई भेद नहीं है। इस रहस्यको जाननेवाला निःसन्देह होताके आसनसे ही उद्गाताद्वारा किये गये दोषयुक्त उद्गानको प्रणवके उच्चारणसे पीछे सुधार लेता है, क्योंकि भगवान्‌के नामोच्चारणसे यज्ञकी सारी त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। यह इस ज्ञानकी महिमा है ॥ ५ ॥ षष्ठ खण्ड विविध रूपोंमें उद्गीथोपासना यह पृथिवी ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह अग्निरूप साम इस पृथिवीरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है—भलीभाँति स्थित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है, वे दोनों मिलकर 'साम' हैं। इसी प्रकार अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह यह वायुरूप साम इस अन्तरिक्षरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। अन्तरिक्ष ही मानो 'सा' है और वायु 'अम' है, वे दोनों मिलकर साम हैं। पुनः द्युलोक—स्वर्गलोक ही ऋक् और सूर्य ही साम है। वह यह सूर्यरूप साम इस स्वर्गरूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। द्युलोक ही मानो 'सा' है और सूर्य मानो 'अम' है, वे दोनों मिलकर साम हैं। समस्त नक्षत्रमण्डल ही ऋक् है और चन्द्रमा साम है। वही यह चन्द्रमारूप साम इस नक्षत्र- रूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। नक्षत्रमण्डल ही मानो 'सा' है और चन्द्रमा 'अम' है, दोनों मिलकर साम हैं ॥१-४ ॥ अब दूसरी बात कहते हैं। जो यह प्रत्यक्ष दीखनेवाली सूर्यकी श्वेत आभा है, वही ऋक् है, तथा जो उसके भीतर छिपा हुआ नीलापन और अतिशय श्यामता है, वह साम है। वह श्याम आभारूप साम इस श्वेत आभारूप ऋक्‌में प्रतिष्ठित है, इसीलिये ऋक्‌में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। इसके सिवा यह जो सूर्यकी श्वेत प्रभा—उज्ज्वल प्रकाश है, वही 'सा' है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम प्रभा है, वह 'अम' है। वे दोनों मिलकर साम हैं। तथा सूर्यमें जो यह उसका अन्तर्यामी स्वर्णसदृश प्रकाशस्वरूप पुरुष दिखायी देता है—जिसकी दाढी सुवर्णकी भाँति प्रकाशमय है तथा केश भी सोनेकी ही भाँति चमचमाते हैं और जो नखके अग्रभागसे लेकर चोटीतक सब का सब स्वर्णमय प्रकाशयुक्त है, वह परमपुरुष परमेश्वर ही है। उस सुवर्णसदृश प्रकाशयुक्त पुरुषके दोनों नेत्र ऐसे हैं, जैसे कोई लाल कमल हो। उसका 'उत'

  • जो बात इन्हीं ऋषिने दूसरे मन्त्रमें सूर्यके सम्बन्धमें कही थी, वही यहाँ प्राणके सम्बन्धमें कही गयी है। इससे भी प्राण और सूर्यकी एकता प्रतिपादित होती है। प्रश्नोपनिषद्‌में प्राण और सूर्यकी एकताका भलीभाँति निरूपण हुआ है।

खण्ड ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४११. (सबसे ऊपर उठा हुआ) यह नाम है। वह यह परमेश्वर समस्त पापोंसे ऊपर उठा हुआ है। जो कोई उपासक इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही सब पापोंसे ऊपर उठ जाता है ॥ ५-७ ॥ ऋग्वेद और सामवेद उस परमात्माके ही गुणगान हैं, इसलिये वह उद्गीथ है, तथा इसीलिये जो उद्गाता है, वह वास्तवमें उसीका गान करनेवाला है। जो स्वर्गलोकसे भी ऊपरके लोक हैं, उनका भी तथा देवताओंके भोगोंका भी शासन वह परमात्मा ही करता है। यह आधिदैविक उपासना समाप्त हुई ॥ ८ ॥ सप्तम खण्ड शरीरकी दृष्टिसे उद्गीथोपासना अब वही बात शरीरकी दृष्टिसे समझायी जाती है। वाक्- इन्द्रिय ही ऋक् है, प्राण साम है। वही यह प्राणरूप साम वाणीरूप ऋक्में प्रतिष्ठित—भलीभाँति स्थित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। वाणी ही ‘सा’ है, प्राण ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम हैं। इसी प्रकार नेत्र ही ऋक् है और उसके भीतरकी काली पुतली साम है। वही यह आँखकी पुतलीरूप साम इस नेत्ररूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्मे प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। नेत्र ही ‘सा’ है और पुतली ‘अम’ है, वे दोनों मिलकर साम हैं। पुन श्रोत्र ही ऋक् है, मन साम है। वही यह मनरूप साम श्रोत्ररूप ऋक्मे प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। श्रोत्र ही ‘सा’ है, मन ‘अम’ है, दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह जो नेत्रोंकी श्वेत आभा है, वही ऋक् है, तथा जो नील एव अतिशय श्याम आभा है, वह साम है। वही यह श्याम आभारूप साम इस श्वेत आभारूप ऋक्में प्रतिष्ठित है। इसीलिये ऋक्में प्रतिष्ठित सामका गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्रकी श्वेत आभा है, वही ‘सा’ है; और जो नील और अतिशय श्याम आभा है, वह ‘अम’ है, उन दोनोंका सम्मिलित रूप साम है। तथा यह जो नेत्रके भीतर पुरुष दिखायी देता है, वही ऋक् है, वही साम है, वही यजुर्वेद है, वही उक्थ—स्तोत्र समूह है और वही ब्रह्म है। इस पुरुषका वही रूप है, जो छठे खण्डमें वर्णित आदित्यमण्डलमें स्थित पुरुषका रूप है। जो उसके गुणगान हैं, वे ही इसके गुणगान हैं और जो उसका नाम (उत्) है, वही इसका भी नाम है। पृथिवीसे नीचे जो भी लोक हैं, उनका यही पुरुष शासन करता है तथा मनुष्योंके भोग भी उसीके अधीन हैं। इसलिये जो लोग वीणापर गाते हैं, वे इन्हीं परमेश्वरका गुणगान करते हैं, इसीसे वे धनलाभ करते हैं—अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करते हैं। तथा इस रहस्यको इस रूपमें जाननेवाला जो उपासक साम-गान करता है, वह नेत्रस्थित तथा आदित्यमण्डलवर्ती दोनों ही पुरुषोंका गुणगान करता है, वह उन परमेश्वरसे ही अभीष्ट लाभ करता है। जो भी उस सूर्यलोकसे ऊपरके लोक हैं, उन सबको तथा देवताओंके भोगोंको भी वह प्राप्त कर लेता है। तथा सूर्यलोक अथवा मनुष्यलोकसे नीचेके जो भी लोक हैं, उनको तथा मनुष्योंके भोगोंको भी वह इन परमपुरुषसे ही प्राप्त कर लेता है। इसलिये निस्सन्देह इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे यों कहे—'मैं तेरे लिये कौन-सी अभीष्ट वस्तुका गानके द्वारा आवाहन करूँ?' क्योंकि जो इस रहस्यको इस प्रकार जानकर सामका गान करता है, वही वाञ्छित भोगोंका गानद्वारा आवाहन करनेमें समर्थ होता है ॥ १-९ ॥ अष्टम खण्ड उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और दाल्भ्यका संवाद प्रसिद्ध है, तीन ऋषि उद्गीथका तत्त्व जाननेमें कुशल थे— एक तो शालावान्के पुत्र शिलक, दूसरे चिकितायनके पुत्र दाल्भ्य* और तीसरे जीवळके पुत्र प्रवाहण। एक बार वे तीनों आपसमें इस प्रकार कहने लगे—‘निश्चय ही हमलोग उद्गीथविद्यामें कुशल हैं, इसलिये यदि सबकी सम्मति हो तो हम उद्गीथके विषयमें बातचीत करें।' 'बहुत ठीक है, ऐसा ही हो' यों कहकर वे सब एक स्थानपर सुखसे बैठ गये। तब प्रसिद्ध राजर्षि जीवळके पुत्र प्रवाहण ऋषि श्रेष्ठ दोनोंसे;

  • दाल्भ्यका अर्थ है दल्भकी सन्तान। यहाँ उनके पिताका नाम चिकितायन दिया गया है। ऐसी दशामें सम्भव है ये दल्भ- गोत्रमें उत्पन्न रहे हों, इसीलिये दाल्भ्य कहलाये हों। अथवा सम्भव है, ये द्वयामुष्यायण रहे हों। 'द्वयामुष्यायण' उन्हें कहते हैं, जो किसी दूसरेके गोद आये हों और जिन्होंने अपने जन्म देनेवाले पिताका उत्तराधिकार भी न छोड़ा हो। इस प्रकार वे दो पिताओंके पुत्र होते हैं। दो पिताओंके पुत्रकी ही हिंदू धर्म-शास्त्रोंमें 'द्वयामुष्यायण' संज्ञा है।

४१२ \ छान्दोग्योपनिषद् \ [ अध्याय १

४१२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय १


बोले--'पहले आप दोनो पूज्यजन बातचीत आरम्भ करें। उपदेश देते हुए आप दोनों ब्राह्मणोंके वचनोंको मैं सुनूँगा।' यों कहकर वे चुप हो गये ॥ १-२ ॥

कहा जाता है, तब वे शालावान्के पुत्र शिलक ऋषि चिकितायनके पुत्र दाल्भ्यसे बोले--'कहिये तो मै ही आपसे प्रश्न करूँ?' इसपर दाल्भ्यने कहा--'पूछो।' शिलकने पूछा--'सामका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर ही सामका आश्रय है।' 'स्वरका आश्रय कौन है?' इस प्रकार पूछे जानेपर उन्होंने कहा--'प्राण ही स्वरका आश्रय है।' फिर प्रश्न हुआ--'प्राणका आश्रय कौन है?' उत्तर मिला--'अन्न ही प्राणका आश्रय है।' शिलकने फिर प्रश्न किया--'अन्नका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने उत्तर दिया--'जल ही अन्नका आश्रय है।' शिलकने पुनः पूछा--'जलका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर्गलोक ही जलका आश्रय है।' 'उस लोकका आश्रय कौन है?' शिलक पूछते ही गये। इसपर दाल्भ्य बोले--'स्वर्गलोकसे आगे नहीं जाना चाहिये, उसके परेकी बात नहीं पूछनी चाहिये। हम स्वर्गलोकमे ही सामकी पूर्णतया स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको स्वर्गलोक कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है'* ॥ ३-५ ॥

चिकितायन-पुत्र दाल्भ्यसे शालावान्के पुत्र सुप्रसिद्ध शिलक ऋषिने कहा--'दाल्भ्य ! तुम्हारा बताया हुआ साम निःसन्देह प्रतिष्ठाहीन है अर्थात् तुमने जो सामका अन्तिम आश्रय स्वर्ग बताया, वह ठीक नहीं है। स्वर्गका भी कोई और आश्रय अवश्य होना चाहिये। यदि कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् तुम्हारे इस अधूरे उत्तरपर झुंझलाकर तुम्हें यह कह दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा, तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा--यह निश्चय समझो।' दाल्भ्यने कहा--'क्या मै सामका तत्त्व श्रीमान्से जान सकता हूँ?' शिलकने कहा--'हाँ, जानो।' तब दाल्भ्यने पूछा--'स्वर्गलोकका आधार कौन है?' 'यह मनुष्यलोक ही उसका आधार है,' शिलकने स्पष्ट उत्तर दिया। 'मनुष्यलोकका आधार कौन है?' दाल्भ्यका अगला प्रश्न था। इसपर शिलक बोले--'जो सबकी प्रतिष्ठा है, उस लोकमे आगे प्रश्न नहीं करना चाहिये। सबकी प्रतिष्ठारूप मनुष्यलोकमे ही हम सामकी भलीभाँति स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको सबकी प्रतिष्ठारूप पृथ्वी कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है।'† तब जीवला-पुत्र प्रवाहणने शिलकसे कहा--'शालावान्के पुत्र शिलक ! तुम्हारा समझा हुआ साम भी निःसन्देह अन्तवाला ही है। अत यदि ऐसी स्थितिमें कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष तुम्हे शाप दे दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर सकता है।' इसपर शिलकने कहा--'क्या मैं इस रहस्यको श्रीमान्से जान सकता हूँ ?' प्रवाहणने उत्तर दिया--'जान लो' ॥ ६-८ ॥


नवम खण्ड

उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और प्रवाहणका संवाद

शिलकने प्रवाहणसे पूछा--'इस मनुष्यलोकका आश्रय कौन है?' इसपर प्रवाहणने उत्तर दिया--'आकाश अर्थात् सर्वत्र प्रकाशित परमात्मा ही इसके आश्रय हैं। निःसदेह ये समस्त जीव आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशमें ही विलीन होते हैं; क्योंकि आकाश ही इन सबसे बड़ा है और आकाश ही सबका परम आश्रय है। वे आकाशस्वरूप परमात्मा ही बड़े से-बड़े और उद्गीथ (गानेयोग्य) हैं। वे सर्वथा असीम हैं। जो कोई उपासक इस प्रकार समझकर इस बड़े-से बड़े उद्गीथरूप परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका जीवन निःसन्देह ऊँचे-से-ऊँचा हो जाता है और वह निश्चय ही बड़े-से-बड़े लोकोंको जीत लेता है--प्राप्त कर लेता है।' एक बार शौनकके पुत्र अतिधन्वा नामक ऋषिने उदरशाण्डिल्य नामके ऋषिको इस ऊपर बताये हुए उद्गीथका रहस्य बताकर कहा था--'तेरी संतानोंमे लोग जबतक इस उद्गीथको जानते रहेंगे, तबतक इस लोकमें उनका जीवन इन सब साधारण मनुष्योंसे अवश्य ही अत्यन्त श्रेष्ठ बना रहेगा। तथा मरनेके बाद उन्हें उस लोकमे--परलोकमे उत्तम स्थान मिलेगा।' इस प्रकार समझना चाहिये। इस रहस्यको जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है, उसका जीवन इस मनुष्यलोकमें निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। तथा मरनेके बाद परलोकमें उसे सर्वोपरि स्थान मिलता है--यह निश्चित बात है ॥ १-४ ॥


* श्रुति कहती है--'स्वर्गो वै लोक सामवेद ।' † श्रुतिका वचन है--'इयं वै रथन्तरम्' (यह पृथ्वी ही रथन्तरसाम है)।

खण्ड ११] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१३ दशम खण्ड उपस्तिका आख्यान एक बार ओले गिरनेसे कुरुदेशकी खेती चौपट हो गयी थी। उन दिनों चक्र मुनिके पुत्र उपस्ति ऋषि अपनी धर्मपत्नी आटिकीके साथ (जिसने अभी युवावस्था में प्रवेश नहीं किया था) बड़ी दीन अवस्थामें-पराश्रित होकर किसी हाथीवालोंके गाँवमें रहते थे। एक दिन अन्नके लिये भीख माँगते हुए उपस्तिने अत्यन्त निकृष्ट कोटिके उड़द खाते हुए एक महावतसे याचना की। उन प्रसिद्ध मुनिसे हाथीवान् इस प्रकार बोला कि 'जितने और जो उड़द मेरे इस पात्रमें रक्खे हैं, उनके सिवा ओर उड़द मेरे पास नहीं हैं।' ऋषिने कहा-'इन्हींमेंसे मुझे दे दे।' महावतने अपने पात्रमें बचे हुए सारे उड़द उन्हें दे दिये। महावत बोला- 'उड़द खाकर जल भी पी लीजिये।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'नहीं, ऐसा करनेपर मेरेद्वारा तुम्हारा जूठा जल पिया जायगा।' 'क्या ये उड़द भी जूठे नहीं हैं?' महावतके यों पूछनेपर उन प्रसिद्ध ऋषिने उत्तर दिया-'अवश्य ही इन उड़दोंको न खानेपर मैं जीवित न रहता। पर पीनेका जल तो मुझे यथेष्ट मिल जाता है' ॥ १-४ ॥ उपस्ति ऋषि खानेसे बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके लिये ले आये। उसने पहले ही अच्छी भिक्षा पा ली थी, इसलिये उसने उन उड़दोंको अपने पतिसे लेकर रख दिया। दूसरे दिन प्रातः काल शय्यात्याग करते समय उपस्तिने कहा- 'हाय, यदि हमें थोड़ा-सा भी अन्न मिल जाता तो हम कुछ धन कमा लाते। अमुक राजा यज्ञ करनेवाला है। वह मुझे ऋत्विजोंके सभी प्रकारके कार्योंके लिये वरण कर लेगा।' ऋषिसे उनकी पत्नीने कहा- 'स्वामिन् ! लीजिये, कल जो उड़द आप मुझे दे गये थे, वे ही मेरे पास बचे हुए हैं।' बस, उन्हें खाकर उपस्ति उस विशाल यज्ञमें चले गये ॥ ५-७ ॥ उस यज्ञमें पहुँचकर जहाँ उद्गातालोग स्तुति करते हैं, उस स्थानपर स्तुति करनेके लिये उद्यत उद्गाता आदि ऋत्विजों- के समीप वे बैठ गये। फिर उन्होंने स्तुति करनेवाले प्रस्तोता ऋत्विक्से कहा- 'प्रस्तोता ! जिस देवताका प्रस्तावसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिनकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति करोगे तो याद रखना, तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' इसी प्रकार उन्होंने उद्गातासे कहा-'उद्गाता ! जिस देवताका उद्गीथसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिसका तुम उद्गीथ- द्वारा गान करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम उद्गान करोगे तो निश्चय समझो, तुम्हारा मस्तक गिर पड़ेगा।' तदनन्तर उन्होंने प्रतिहर्तासे कहा- 'प्रतिहर्ता ! जिस देवताका प्रतिहारसे सम्बन्ध है, उसे न जानते हुए यदि तुम प्रतिहार- क्रिया करोगे तो समझ लो कि तुम्हारा सिर तुम्हारी गर्दनपर नहीं रहेगा।' इसपर वे सब ऋत्विक् अपने-अपने कार्यसे उपरत होकर चुपचाप बैठ गये ॥ ८-११ ॥ एकादश खण्ड प्रस्ताव आदि कर्मोंसे सम्बद्ध देवताओंका वर्णन तब इन उपस्ति ऋषिसे यज्ञ करानेवाले राजाने कहा- 'मैं श्रीमान्‌का ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'मैं चक्रका पुत्र उपस्ति नामका ऋषि हूँ।' राजाने कहा- 'सच मानिये, मैंने इन समस्त ऋत्विज् सम्बन्धी कर्मोंके लिये श्रीमान्‌की सब जगह खोज की थी। श्रीमान्‌के न मिलनेपर ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंको चुना है। परन्तु अब मेरे सम्पूर्ण ऋत्विज्-सम्बन्धी कर्मोंपर श्रीमान् ही रहें।' ऋषिने 'बहुत अच्छा' कहकर राजाके प्रस्तावका अनुमोदन किया और फिर कहा- 'तब मेरी आज्ञा पाकर ये पहलेवाले ऋत्विज् ही स्तुति आरम्भ करें। परन्तु एक बात है-जितना धन आप इन लोगोंको दें, उतना ही मुझे भी दें।' राजाने 'यही होगा' कहकर अपनी स्वीकृति दे दी ॥१-३॥ तदनन्तर प्रस्तोता उन प्रसिद्ध ऋषिके पास आकर बोला- “श्रीमान्‌ने मुझे यह कहा था कि 'प्रस्तोता ! जिस देवताकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति- पाठ करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' सो वह देवता कौन है-मैं यह जानना चाहता हूँ।" इसपर ऋषि बोले-“वह देवता प्राण है। निःसन्देह ये समस्त प्राणी प्रलय- के समय प्राणमे ही प्राणरूप होकर विलीन हो जाते हैं और पुनः सृष्टिकालमें प्राणसे ही प्रकट होते हैं। वही यह प्राण प्रस्ताव अर्थात् स्तुतिमें अनुगत देवता है, उसको बिना जाने यदि तुम स्तुति आरम्भ कर देते तो मेरे यह कहनेपर कि 'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय,' वैसा अवश्य हो जाता” ॥ ४५ ॥ तदनन्तर उद्गाता उपस्तिके पास आकर बोला- “श्रीमान्‌ने मुझसे यह कहा था कि 'उद्गाता ! जो उद्गीथसे

४१४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

४१४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय १ सम्बन्ध रखनेवाला देवता है, उसे न जानकर यदि तुम उद्गान करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' अतः वह देवता कौन है—यह मैं आपसे जानना चाहता हूँ।” इसपर उन प्रसिद्ध ऋषि उपस्तिने कहा—“वह देवता सूर्य है। निश्चय ही ये समस्त प्राणी आकाशमें स्थित सूर्यका यशोगान किया करते हैं। वही यह सूर्य उद्गीथसे सम्बन्ध रखनेवाला देवता है। उसे बिना जाने यदि तुमने उद्गान किया होता तो मेरे यह कहनेपर कि 'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय' वैसा अवश्य हो जाता” ॥ ६-७ ॥ इसके बाद प्रतिहर्त्ता उपस्तिके पास आकर यों कहने लगा— “श्रीमान्‌ने मुझसे यह कहा था कि 'प्रतिहर्ता ! जो प्रतिहारसे सम्बन्ध रखनेवाला देवता है, उसे बिना जाने यदि तुम प्रतिहार- की क्रिया करोगे तो तुम्हारा सिर अलग होकर गिर पड़ेगा।' अतः वह देवता कौन है, यह मैं आपसे जानना चाहता हूँ।” ऋषिने प्रतिहर्ताके प्रश्नका उत्तर इस प्रकार दिया—“जिस देवताकी बात तुमने पूछी है, वह अन्न है। निःसन्देह ये समस्त प्राणी अन्नको ही खाकर जीवन धारण करते हैं। वही यह अन्न प्रतिहारसे सम्बन्ध रखनेवाला देवता है। उसे बिना जाने यदि तुम प्रतिहारकी क्रिया करते तो मेरे यह कहनेपर कि 'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय' वैसा अवश्य हो जाता” ॥ ८-९ ॥ द्वादश खण्ड शौव उद्गीथका वर्णन अब यहाँसे कुत्ते (का रूप धारण करनेवाले ऋषियों) द्वारा प्रत्यक्ष किये हुए उद्गीथका वर्णन किया जाता है। यह बात इस रूपमें प्रसिद्ध है कि दल्भ ऋषिके पुत्र बक अथवा मित्राके पुत्र ग्लाव ऋषि स्वाध्याय करनेके लिये गाँवसे बाहर किसी निर्जन स्थानमें गये। उक्त ऋषिपर अनुग्रह करनेके लिये वहाँ श्वेत रंगका एक अलौकिक कुत्ता (कुत्तेके रूपमें ऋषि) प्रकट हुआ। तत्पश्चात् दूसरे भी कई कुत्ते उस पहले प्रकट हुए कुत्तेके पास आकर उससे बोले—'श्रीमान् उद्गीथका गान करके हमारे लिये अन्न प्रस्तुत करें, क्योंकि हमलोग निश्चित ही भूखे हैं।' उनसे वह श्वेत रंगका कुत्ता बोला— 'कल प्रातः इसी स्थानमें तुमलोग मेरे पास आना।' उनकी इस बातको सुनकर दल्भपुत्र बक अथवा मित्रापुत्र ग्लाव ऋषि कौतूहलसे भर गये और यह देखनेके लिये कि वह कुत्ता किस प्रकार अन्न जुटाता है, वहीं उसके द्वारा निर्दिष्ट समयकी प्रतीक्षा करने लगे ॥ १-३ ॥ निर्दिष्ट समयपर वे अलौकिक कुत्ते वहाँ एकत्रित हुए और जिस प्रकार यज्ञकर्ममें उद्गाता बहिष्पवमान नामक स्तोत्र- द्वारा स्तुति आरम्भ करनेसे पूर्व एक दूसरेसे मिलकर चलते हैं, ठीक उसी प्रकार वे भी एक दूसरेसे जुड़कर परिभ्रमण करने लगे, फिर उन्होंने एक जगह आरामसे बैठकर हिंकार आरम्भ किया। अर्थात् 'हिं' स्तोभ* का प्रयोग करते हुए साम-गान आरम्भ किया। गान इस आशयका था— 'हे सबकी रक्षा करनेवाले परमात्मन् ! हम भोजन और जलपानके इच्छुक हैं। परमात्मन् ! आप प्रकाशस्वरूप देव हैं, अभीष्ट वस्तुकी वर्षा करनेवाले वरुण हैं, समस्त प्रजाका पालन करनेवाले प्रजापति हैं और सबको उत्पन्न करनेवाले सविता हैं। अत हमारे लिये यहाँ अन्न ला दीजिये। हे अन्नके स्वामी ! यहाँ अन्न लाइये, परमेश्वर ! यहाँ अन्न प्रस्तुत कीजिये' ॥ ४-५ ॥ त्रयोदश खण्ड तेरह प्रकारके स्तोभोंका वर्णन इस प्रकरणमें बताये जानेवाले तेरह प्रकारके स्तोभोंमें निश्चय ही 'हाउ' शब्द मनुष्यलोकका वाचक है, 'हाइ' वायुलोक है, 'अथ' चन्द्रलोक है, 'इह' आत्मा है और 'ईं' अग्निरूप है। इनके अतिरिक्त 'ऊ' सूर्यरूप है, 'ए' आवाहनका बोधक है, 'औहोयि' विश्वेदेवा हैं, 'हिं' प्रजापति- स्वरूप है, 'स्वर' प्राणरूप है, 'या' अन्नरूप है तथा 'वाक्' विराट्रूप है। तेरहवाँ और अन्तिम स्तोभ 'हुं' है, वह सबमें व्याप्त रहनेवाला वर्णनातीत निर्विशेष ब्रह्म है ॥ १-३ ॥ जो सामके रहस्यको जान लेता है, उसके लिये वाणी स्वयं अपना रहस्य प्रकट कर देती है। वह भोग-सामग्रीसे तथा उसे भोगनेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है ॥ ४ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

  • साम-गान करते समय उसके स्वर और लयकी पूर्तिके लिये जो 'हा ३ उ' आदि तेरह प्रकारके शब्द उपयोगमें लाये जाते हैं, उन्हें 'स्तोम' कहते हैं। इनका अर्थ अगले खण्डमें बताया गया है। 'हिं' प्रजापतिरूप है और प्रजापति ही अन्नका स्वामी है, इसलिये उनकी प्रार्थनामें 'हिं'का प्रयोग किया गया है।

द्वितीय अध्याय

ॐ द्वितीय अध्याय प्रथम खण्ड साधु-दृष्टिसे समस्त सामकी उपासना ॐ समस्त सामकी उपासना निश्चय ही साधु है। जो ऐसा भी कहते हैं कि हमारा साम ( शुभ ) हुआ। अर्थात् साधु होता है, उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है, जब शुभ होता है तो 'अहा ! बड़ा अच्छा हुआ' ऐसा कहते वह असाम कहलाता है। इसी विषयमे कहते हैं—[ जब कहा हैं, और ऐसा भी कहते हैं—'हमारा असाम हुआ' अर्थात् जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास साम- जब अशुभ होता है तो 'अरे ! बुरा हुआ !' ऐसा कहते हैं। द्वारा गया तो [ ऐसा कहकर ] लोग यही कहते हैं कि वह इसे इस प्रकार जाननेवाला जो पुरुष 'साम साधु है' ऐसी इसके पास साधुभावसे गया और [ जब यों कहा जाय कि ] उपासना करता है, उसके समीप साधु धर्म शीघ्र ही आ वह इसके पास असामद्वारा गया तो [इससे] लोग यही कहते जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं ॥ १-४॥ हैं कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ। इसके अनन्तर द्वितीय खण्ड पञ्चविध सामोपासना लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, और पृथ्वी निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है—इस प्रकार लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है, उसके प्रति ऊर्ध्व ऊपरके लोकोंमें सामदृष्टि करे । अब अधोगत लोकोंमें और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ॥ १-३ ॥ सामोपासनाका निरूपण किया जाता है—द्युलोक हिंकार है, तृतीय खण्ड वृष्टिमें सामोपासना वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। पूर्ववायु जल ग्रहण करता है यह निधन है। जो इसे ( इस उपासनाको ) हिंकार है, मेघ उत्पन्न होता है यह प्रस्ताव है, बरसता है यह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसके लिये वर्षा होती है और वह स्वयं भी उद्गीथ है, चमकता और गर्जन करता है यह प्रतिहार है, वर्षा करा लेता है ॥ १-२ ॥ चतुर्थ खण्ड जलमें सामोपासना सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । प्रतिहार है और समुद्र निधन है। जो इसे इस प्रकार मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है यह हिंकार है, वह जो जाननेवाला पुरुष सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी बरसता है यह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती उपासना करता है वह जलमें नहीं मरता और जलवान् हैं वह उद्गीथ है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती है वह होता है ॥ १-२ ॥ पञ्चम खण्ड ऋतुओंमें सामोपासना ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। वसन्त पुरुष ऋतुओमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरत् प्रतिहार ऋतुएँ अपने अनुरूप भोग देती हैं और वह ऋतुमान् है और हेमन्त निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला (ऋतुसम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न) होता है ॥ १-२ ॥

४१६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २

४१६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय २ षष्ठ खण्ड पशुओंमें सामोपासना पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । बकरे वाला पुरुष पशुओंमे पाँच प्रकारके सामकी उपासना हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव है, गौएँ उद्गीथ है, अश्व प्रतिहार करता है उसे पशु प्राप्त होते ह और वह पशुमान् हैं और पुरुष निधन है। जो इसे इस प्रकार जानने- होता है ॥ १-२ ॥ सप्तम खण्ड प्राणोंमें सामोपासना प्राणोंमें पाँच प्रकारकेपरोवरीय गुणविशिष्ट सामकी उपासना वाला पुरुष प्राणोंमे पाँच प्रकारके उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी करे। उनमें प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ निश्चय ही है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत लेता है। यह परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) हैं। जो इसे इस प्रकार जानने- पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥ १-२ ॥ अष्टम खण्ड वाणीमें सप्तविध सामोपासना अब सप्तविध सामकी उपासना [ प्रारम्भ की जाती ] 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव है और जो कुछ 'नि' ऐसा है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें शब्दरूप है वह निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला जो कुछ 'हुं' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' पुरुष वाणीमें सात प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप वाणी, जो कुछ वाणीका दोह (सार) है उसे देती है तथा है वह आदि है, जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न और उसका भोक्ता होता है ॥१-३॥ है, जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ नवम खण्ड आदित्य-दृष्टिसे सप्तविध सामोपासना अब निश्चय ही इस आदित्यकी दृष्टिसे सप्तविध सामकी अनुगत पक्षिगण है। क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन उपासना करनी चाहिये । आदित्य सर्वदा सम है, इसलिये करनेवाले हैं, इसलिये वे अन्तरिक्षमे अपनेको निराधाररूपसे वह साम है। मेरे प्रति, मेरे प्रति ऐसा होनेके कारण वह सब ओर ले जाते हैं। तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका सबके प्रति सम है, इसलिये साम है। उस आदित्यमें ये रूप होता है वह उद्गीथ है। इसके उस रूपके देवता लोग सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने । जो उस आदित्यके अनुगत हैं। इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी है। उसके पशु अनुगत हैं, इसीसे वे हिंकार करते हैं। अत वे ही तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नके पूर्व इस आदित्यरूप सामके हिंकार भाजन हैं। तथा सूर्यके पहले- होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्रस्ताव है। उसके हैं। इसीसे वे ऊपरकी ओर आकृष्ट किये जानेपर नीचे नहीं उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं अत वे प्रस्तुति (प्रत्यक्षस्तुति) गिरते, क्योंकि वे इस सामकी प्रतिहारभक्तिके पात्र हैं। तथा और प्रशांस (परोक्षस्तुति) की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तसे पूर्व होता इस सामकी प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं। तत्पश्चात् है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु है। आदित्यका जो रूप सङ्गववेलामें (सूर्योदयके तीन मुहूर्त इसीसे वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग पश्चात् कालमे) रहता है वह आदि है। उसके उस रूपके जाते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं।

खण्ड १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१७ तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन है । उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं; इसीसे [ श्राद्ध- कालमें ] उन्हें [ पितृ पितामह आदि रूपसे दर्भपर ] स्थापित करते हैं, क्योंकि वे पितृगण निश्चय ही इस सामकी निधन- भक्तिके पात्र है। इसी प्रकार इस आदित्यरूप सात प्रकारके सामकी उपासना करते है ॥ १-८ ॥ दशम खण्ड मृत्युसे अतीत सप्तविध सामोपासना अब निश्चय ही [ यह बतलाया जाता है कि ] अपने समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करे । 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है। 'आदि' यह दो अक्षरोंवाला नाम है, और 'प्रतिहार' यह चार अक्षरोंवाला नाम है। इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे समान हो जाते हैं। 'उद्गीथ' यह तीन अक्षरोंका और 'उपद्रव' यह चार अक्षरोंका नाम है। ये दोनो तीन-तीन अक्षरोंमें तो समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है। अतः [ 'अक्षर' होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेसे तो वह [ एक ] भी उनके समान ही है। 'निधन' यह नाम तीन अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस अक्षर हैं। इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोक प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोकसे आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है। बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं शोकरहित लोकको जीत लेता है। [ वह पुरुष ] आदित्यलोक- की जय प्राप्त करता है तथा उसे आदित्यविजयसे भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है। जो इस उपासनाको इस प्रकार जाननेवाला होकर आत्मसमित और मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करता है—सामकी उपासना करता है ॥ १-६ ॥ एकादश खण्ड गायत्र-सामोपासना मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और प्राण निधन है। यह गायत्रसञ्ज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है । वह, जो इस प्रकार गायत्रसञ्ज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है, पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवनलाभ करता है, प्रजा और पशुओंद्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। वह महान् मनस्वी होवे—यही उसका व्रत है ॥ १-२ ॥ द्वादश खण्ड रथन्तर-सामोपासना अभिमन्थन करता है यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है यह प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है यह उद्गीथ है, अङ्गार होते हैं यह प्रतिहार है तथा शान्त होने लगता है यह निधन है और सर्वथा शान्त हो जाता है यह भी निधन है। यह रथन्तरसाम अग्निमें प्रतिष्ठित है। वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तर- सामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। अग्निकी ओर मुख करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ १-२ ॥ त्रयोदश खण्ड वामदेव्य-सामोपासना स्त्री-पुरुषका संकेत हिंकार है, पारस्परिक सन्तोष प्रस्ताव है, सहशयन उद्गीथ है, अभिमुखशयन प्रतिहार है, समाप्ति निधन है, इस प्रकार जोड़ेसे वामदेव्यसामकी उपासना की जाती है। वह, जो पुरुष इस प्रकार मिथुनमें वामदेव्यसामको स्थित जानता है, सदा जोड़ेसे रहता है, उसका कभी वियोग नहीं होता, मिथुनीभावसे उसके सन्तान उत्पन्न होती है। वह पूर्ण आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। किसी भी पर-स्त्रीका कभी कहींसे भी अपहरण न करे, कदापि व्यभिचारी न हो—यह व्रत है ॥१-२॥

४१८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय २

४१८ * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय २ चतुर्दश खण्ड बृहत्सामोपासना उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रस्ताव है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, अपराह्नकालिक प्रतिहार है और जो अस्तमित होनेवाला सूर्य है वह निधन है। यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और अन्नका भोग करनेवाला होता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥ पञ्चदश खण्ड वैरूप-सामोपासना बादल एकत्रित होते हैं यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता है यह प्रस्ताव है। जल बरसता है यह उद्गीथ है। बिजली चमकती और कड़कती है यह प्रतिहार है तथा दृष्टिका उप- संहार होता है यह निधन है। यह वैरूपसाम मेघमें अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूपसामको पर्जन्यमें अनुस्यूत जानता है, विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥ षोडश खण्ड वैराज-सामोपासना वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद् ऋतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन है—यह वैराजसाम ऋतुओं- में अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैराजसामको ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण शोभित होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥ सप्तदश खण्ड शक्वरी-सामोपासना पृथ्वी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शक्वरीसाम लोकोंमें अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शक्वरी- सामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है। वह सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥ अष्टादश खण्ड रेवती-सामोपासना बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। पशुओंकी निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १ २ ॥

खण्ड २२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१९ एकोनविंश खण्ड यज्ञायज्ञीय-सामोपासना लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मास उद्गीथ है, अस्थि टेढा-मेढ़ा नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल प्रतिहार है और मज्जा निधन है । यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। वर्ष भरतक अनुस्यूत है । वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको मासभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा कभी भी मासभक्षण अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है, अङ्गवान् होता है। वह अङ्गोंसे न करे—ऐसा व्रत है ॥ १-२ ॥ विंश खण्ड राजन-सामोपासना अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, सालोक्य, साष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजन साम व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है देवताओंमे अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओके करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥ एकविंश खण्ड सबमें अनुस्यूत सामकी उपासना त्रयीविद्या हिंकार है, ये तीन लोक प्रस्ताव हैं, अग्नि, विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये वायु और आदित्य ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है। ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण—ये निधन हैं। यह जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ सामोपासना सर्वमें अनुस्यूत है। वह, जो इस प्रकार सबमें बलि समर्पित करती हैं। 'मै सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना अनुस्यूत इस सामको जानता है, सर्वरूप हो जाता है। इस करे—यह व्रत है, यह व्रत है ॥ १-४ ॥ द्वाविंश खण्ड अग्नि-सम्बन्धी उद्गीथ सामके 'विनर्दि' नामक गानका वरण करता हूँ, वह कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ कहे कि 'मैं इन्द्रके शरणागत हूँ वही तुझे इसका उत्तर देगा।' है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोम निरुक्त है, वायुका और यदि कोई इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे मृदुल और श्लक्ष्ण (सरलतासे उच्चारण किये जाने योग्य) तो उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिके शरणागत था वही तेरा मर्दन है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पतिका क्रौञ्च करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमे उलाहना दे (क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान) है और वरुणका अपध्वान्त तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे (भ्रष्ट) है। इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे, केवल वरुण- दग्ध करेगा।' सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त उच्चारण सम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे। मै देवताओंके लिये किये जाने चाहिये, अत. [उनका उच्चारण करते समय] अमृतत्वका आगान (साधन) करूँ—इस प्रकार चिन्तन 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना करते हुए आगान करे । पितृगणके लिये स्वधा, मनुष्योंके चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एव विवृतरूपसे लिये आशा (उनकी इष्ट वस्तुओं), पशुओंके लिये तृण और उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका करना चाहिये कि] 'मै प्रजापतिको आत्मदान करूँ।' समस्त आगान करूँ—इस प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए स्पर्शवर्णोंको एक-दूसरेसे तनिक भी मिलाये विना ही बोलना प्रमादरहित होकर स्तुति करे। सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, चाहिये और उस समय 'मै मृत्युसे अपना परिहार करूँ' समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके [ऐसा चिन्तन करना चाहिये] ॥ १-५ ॥ -आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि

: छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय २

: छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय २

त्रयोविंश खण्ड धर्मके तीन स्कन्ध, ओंकारकी सर्वरूपता

धर्मके तीन स्कन्ध हैं—यज्ञ, अध्ययन और दान—यह पहला स्कन्ध है । तप ही दूसरा स्कन्ध है । आचार्यकुलमें रहनेवाला ब्रह्मचारी, जो आचार्यकुलमें अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण कर देता है, तीसरा स्कन्ध है । ये सभी पुण्यलोकके भागी होते हैं। ब्रह्ममे सम्यक् प्रकारसे स्थित [चतुर्थाश्रमी सन्यासी] अमृतत्वको प्राप्त होता है। प्रजापतिने लोकोंके उद्देश्यसे ध्यानरूप तप किया। उन अभितप्त लोकोंसे त्रयी विद्याकी उत्पत्ति हुई तथा उन अभितप्त त्रयी विद्यामे 'भूः, भुव और स्व' ये अक्षर उत्पन्न हुए। [फिर प्रजापतिने ] उन अक्षरोंका आलोचन किया। उन आलोचित अक्षरोंसे ओङ्कार उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार शङ्कुओ (नसों) द्वारा सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकारसे सम्पूर्ण वाणी व्याप्त है। ओंकार ही यह सब कुछ है—ओंकार ही यह सब कुछ है ॥ १-३ ॥

चतुर्विंश खण्ड तीनों कालका सवन

ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःसवन वसुओंका है, मध्याह्नसवन रुद्रोंका है तथा तृतीय सवन आदित्य और विश्वेदेवोंका है। तो फिर यजमानका लोक कहाँ है? जो यजमान उस लोकको नहीं जानता वह किस प्रकार यज्ञानुष्ठान करेगा ? अतः उसे जाननेवाला ही यज्ञ करेगा ॥ १-२ ॥

प्रातग्नुवाकका आरम्भ करनेसे पूर्व वह (यजमान) गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वसुदेवता- सम्बन्धी सामका गान करता है। [ हे अग्ने ! ] तुम इस लोकका द्वार खोल दो, जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर लें । तदनन्तर [यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—पृथिवीमे रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम [पृथिवी ] लोककी प्राप्ति कराओ । यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। इस लोकमे यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके अनन्तर [ पुण्यलोकको प्राप्त होऊँगा ] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है, और 'परिघ (अर्गला) को नष्ट करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है । वसुगण उसे प्रातः सवन प्रदान करते हैं ॥ ३-६ ॥

मध्याह्नसवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान दक्षिणाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है। [ हे वायो ! ] तुम अन्तरिक्षलोकका द्वार खोल दो जिससे कि वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये हम तुम्हारा दर्शन कर सकें । तदनन्तर [यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—'अन्तरिक्षमें रहनेवाले अन्तरिक्षलोकनिवासी वायुदेवको नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम [अन्तरिक्ष ] लोककी प्राप्ति कराओ । यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान, 'मैं आयु समाप्त होनेपर [ अन्तरिक्षलोक प्राप्त करूँगा ] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। रुद्रगण उसे मध्याह्नसवन प्रदान करते हैं ॥ ७-१० ॥

तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान आहवनीयाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है। लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम स्वाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। यह आदित्यसम्बन्धी साम है, अब विश्वेदेवसम्बन्धी साम कहते हैं—लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। तत्पश्चात् [यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—स्वर्गमे रहनेवाले द्युलोकनिवासी आदित्योंको और विश्वेदेवोंको नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मै इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान 'आयु समाप्त होनेपर [मै इसे प्राप्त करूँगा ] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—ऐसा कहकर उत्थान करता है। उस (यजमान) को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा (यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ ११-१६ ॥

॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

तृतीय अध्याय

ॐ तृतीय अध्याय प्रथम खण्ड आदित्यकी मधुरूपमें कल्पना ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है । द्युलोक अमृत ही जल हे । उन इन ऋक् [ -रूप मधुकरो ] ने ही ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ इस ऋग्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश, है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमे रहनेवाले ] तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । वह मक्खियोंके बच्चे हैं । उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणे ( यश आदि रस ) विशेषरूपमे गया । उसने [ जाकर ] हैं, वे ही इस ( अन्तरिक्षरूप छत्ते ) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र आदित्यके [ पूर्व ] भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका हैं । ऋक् ही मधुकर हे, ऋग्वेद ही पुष्प है, वे मोम आदि लाल रूप है, वही यह ( रस ) है ॥ १-४ ॥ द्वितीय खण्ड आदित्यकी दक्षिणस्थित किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणे ह, वे ही इसकी अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप दक्षिणदिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजु श्रुतियाँ ही मधुकर ह, रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और यजुर्वेद ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। आदित्यके [दक्षिण] भागमे आश्रय लिया। यह जो आदित्यका उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस शुक्ल रूप है, यह वही है ॥ १-३ ॥ तृतीय खण्ड पश्चिम ओरकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं, वे ही इसकी अभिताप किया । उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज, पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर ह, सामवेद- इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके [ पश्चिम ] भागमे जल है । उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है, यह वही है ॥१-३॥ चतुर्थ खण्ड उत्तर दिशाकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं, वे ही इसकी पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और उत्तर दिशाकी मधुनाडियाँ है। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई । उस रसने विशेषरूपसे हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] गमन किया और आदित्यके [ उत्तर ] भागमे आश्रय अमृत ही जल है। उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस लिया । यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है, यह इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [इतिहास- वही है ॥ १-३ ॥ पञ्चम खण्ड ऊर्ध्वरश्मियोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं, वे ही इसकी ऊपरकी उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको ओरकी मधुनाडियाँ है। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं, [ प्रणवरूप ] अभितप्त किया । उस अभितत्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ। उस रसने विशेषरूपसे

४२२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

४२२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३ गमन किया और वह आदित्यके [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृर्तोंके हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध सा होता है यही वह अमृत हैं--वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत (मधु) है। वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं ॥ १-४ ॥ षष्ठ खण्ड वसुओंके जीवनाधार प्रथम अमृतकी उपासना इनमें जो पहला अमृत है, उससे वसुगण अग्निप्रधान ही प्रधानतासे इसे देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। होता है। जितने समयमे आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है वे देवगण इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और पश्चिम दिशामे अस्त होता है, उतनी ही देर वह और फिर इसीसे उत्साहित होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, वसुओंमेंसे ही कोई एक होकर अग्निकी वसुओके आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥ सप्तम खण्ड रुद्रोंके जीवनाधार द्वितीय अमृतकी उपासना अब, जो दूसरा अमृत है, रुद्रगण इन्द्रप्रधान होकर इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं ही उदासीन हो जाता है और इस रूपसे ही उद्यमशील होता और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। है। जितने समयमे आदित्य पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और अस्त होता है, उससे दुगुने समयमे वह दक्षिणसे उदित होता इसीसे उद्यमशील होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको है और उत्तरमे अस्त हो जाता है। इतने समयपर्यन्त वह जानता है, रुद्रोंमेंसे ही कोई एक होकर इन्द्रकी ही प्रधानतासे रुद्रोंके ही आधिपत्य एव स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥ अष्टम खण्ड आदित्योंके जीवनाधार तृतीय अमृतकी उपासना तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदित्यगण वरुणप्रधान इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो उदासीन होता है और इसीसे उद्योगी हो जाता है। वह खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो आदित्य जितने समयमे दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमे जाते हैं। वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते हैं और अस्त होता है, उससे दूने समयमें पश्चिमसे उदित होता और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता पूर्वमें अस्त होता है। इतने समय वह आदित्योंके ही आधिपत्य है, आदित्योंमेंसे ही कोई एक होकर वरुणकी ही प्रधानतासे और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥ नवम खण्ड मरुतोंके जीवनाधार चतुर्थ अमृतकी उपासना तथा जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोमकी प्रधानतासे अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है। वह आदित्य और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। जितने समयमें पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे है, उससे दूनी देरमें उत्तरसे उदित होता और दक्षिणमें अस्त उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता है, होता है। इतने काल वह मरुद्गणके ही आधिपत्य और मरुतोंमेंसे ही कोई एक होकर सोमकी प्रधानतासे ही इस स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥

खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२३

दशम खण्ड साध्योंके जीवनाधार पञ्चम अमृतकी उपासना तथा जो पाँचवाँ अमृत है, साध्यगण ब्रह्माकी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, साध्यगणोंमेंसे ही कोई एक होकर ब्रह्माकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित हो जाता है। वह आदित्य जितने समयमे उत्तरसे उदित होता है और दक्षिणमे अस्त होता है, उससे दूने समयतक ऊपरकी ओर उदित होता है और नीचेकी ओर अस्त होता है। इतने कालतक वह साध्योंके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥

एकादश खण्ड मधुविज्ञान तथा ब्रह्मविज्ञानके अधिकारी फिर उसके पश्चात् वह ऊर्ध्वगत होकर उदित होनेपर फिर न तो उदित होगा और न अस्त ही होगा, बल्कि अकेला ही मध्यमें स्थित रहेगा। उसके विषयमे यह श्लोक है। वहाँ निश्चय ही ऐसा नहीं होता। वहाँ [ सूर्यका ] न कभी अस्त होता है और न उदय होता है। हे देवगण ! इस सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे विरुद्ध न होऊँ । जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद् ( वेदरहस्य ) को जानता है उसके लिये न तो सूर्यका उदय होता है और न अस्त होता है। उसके लिये सर्वदा दिन ही रहता है। वह यह मधुज्ञान ब्रह्माने प्रजापतिसे कहा था, प्रजापतिने मनुको सुनाया और मनुने प्रजावर्गके प्रति कहा। तथा यह ब्रह्मविज्ञान अपने ज्येष्ठ पुत्र अरुणनन्दन उद्दालकको उसके पिताने सुनाया था। अतः इस ब्रह्मविज्ञानका पिता अपने ज्येष्ठ पुत्रको अथवा सुयोग्य शिष्यको उपदेश करे। किसी दूसरेको नहीं बतलावे, यद्यपि इस आचार्यको यह समुद्र-परिवेष्टित और धनसे परिपूर्ण सारी पृथिवी दे [ तो भी किसी दूसरेको इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही अधिकतर फल देनेवाला है, यही अधिकतर फल देनेवाला है ॥ १-६ ॥

द्वादश खण्ड गायत्रीकी सर्वरूपता गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री है और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री ( उनका नामोच्चारण करती ) और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा करती है। जो वह गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी है, क्योंकि इसीमें ये सब भूत स्थित हैं और इसीका वे कभी अतिक्रमण नहीं करते। जो भी यह पृथिवी है वह यही है जो कि इस पुरुषमें शरीर है, क्योंकि इसीमें ये प्राण स्थित हैं और इसीको वे कभी नहीं छोड़ते। जो भी इस पुरुषमें शरीर है वह यही है जो कि इस अन्तःपुरुषमें हृदय है, क्योंकि इसीमे ये प्राण प्रतिष्ठित हैं और इसीका अतिक्रमण नहीं करते। वह यह गायत्री चार चरणोंवाली और छः प्रकारकी है। वह यह [ गायत्र्याख्य ब्रह्म ] मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है। [ ऊपर जो कुछ कहा गया है ] उतनी ही इस ( गायत्र्याख्य ब्रह्म ) की महिमा है, तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका [ पुरुषसंज्ञक ] त्रिपाद् अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है। जो भी वह [ त्रिपाद् अमृतरूप ] ब्रह्म है वह यही है, जो कि यह पुरुषसे बाहर आकाश है, और जो भी यह पुरुषसे बाहर आकाश है वह यही है, जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश है, तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है वह यही है, जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण और कभी भी प्रवृत्त न होनेवाला है। जो पुरुष ऐसा जानता है, वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ १-९ ॥

४२४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

४२४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३

त्रयोदश खण्ड पञ्चप्राणोंकी उपासना

उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि ह । इसका जो पूर्वदिग्नावर्ती सुषि (छिद्र) है वह प्राण है, वह चक्षु है, वह आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है [अर्थात् इस प्रकार इनकी उपासना करता है] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है । तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एव यश है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और यशस्वी होता है। तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही यह ब्रह्मतेज एव अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है। तथा इसका जो उत्तरी छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है, और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है— इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह कीर्तिमान् और कान्तिमान् होता है। तथा इसका जो ऊर्ध्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही यह ओज और तेज है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी और तेजस्वी होता है । वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल ह । यह जो कोई भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है उसके कुलमे वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त होता है। तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सबके ऊपर, जिनमे उत्तम कोई दूसग लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोमे प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है। उस इस (हृदयस्थित पुरुष) का यही दर्शनोपाय हे जब कि [मनुष्य] इस शरीरमे स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु (बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी उपासना करे । जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार उपासना करता ह] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात) होता है ॥ १-८॥

चतुर्दश खण्ड जगत्की एवं आत्माकी ब्रह्मरूपमें उपासना

यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीमे उत्पन्न होनेवाला, उसीमे लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है—इस प्रकार शान्त [राग द्वेषरहित] होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर होता है। अतः उसे [पुरुषको] निश्चय करना चाहिये [वह ब्रह्म] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसङ्कल्प, आकाश- शरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरम, इस सम्पूर्ण जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रम- शून्य है, हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करने- वाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदय- कमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर जानेपर में इसीको प्राप्त होऊँगा । जिसका ऐसा निश्चय है, और जिसे इस विषयमे कोई सन्देह भी नहीं है [उसे इसी ब्रह्म- भावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है ॥ १-४॥

पञ्चदश खण्ड विराड्रूप कोशकी उपासना

अन्तरिक्ष जिसका उदर है, वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला है। वह जीर्ण नहीं होता । दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश ऊपरका छिद्र है। वह यह कोश वसुधान है। उसीमे यह सारा विश्व स्थित है। उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको दिशाओके वत्सरूपसे जानता है, पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं

खण्ड १७ ] $\qquad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\qquad$ ४२५ करता । वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे $\quad$ कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं जानता हूँ, अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ । मैं अमुक अमुक $\quad$ पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण अमुकके सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ, अमुक अमुक $\quad$ हूँ' फिर मैने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित $\quad$ कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और भूःकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण $\quad$ आदित्यकी शरण हूँ' तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ।* वह मैंने $\quad$ हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण $\quad$ सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है ॥ १-७ ॥ भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ तथा मैंने जो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ षोडश खण्ड $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ पुरुषकी यज्ञरूपमें उपासना निश्चय पुरुष ही यज्ञ है । उसके (उसकी आयुके) जो $\quad$ मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातःसवन हैं । गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली $\quad$ उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥ है; और प्रातःसवन गायत्री-छन्दसे संबद्ध है। उस इस प्रातः- $\quad$ इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं । सवनके वसुगण अनुगत हैं । प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस $\quad$ जगती-छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन सबको बसाये हुए हैं। यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे $\quad$ जगती-छन्दसे सम्बन्ध रखता है। इस सवनके आदित्यगण कोई कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राण- $\quad$ अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण रूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एक- $\quad$ विषयजातको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयु- रूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओके मध्यमें $\quad$ में कोई [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, विछिन्न (नष्ट) न होऊँ।' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग $\quad$ 'हे प्राणरूप आदित्यगण ! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके हो जाता है ॥ १-२ ॥ $\quad$ साथ एकीभूत कर दो । यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। $\quad$ विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन $\quad$ नीरोग हो जाता है ॥ ५-६ ॥ त्रिष्टुप्-छन्दसे सम्बद्ध है । उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण $\quad$ इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणि- $\quad$ था—'[अरे रोग !] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोग- समुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमे कोई $\quad$ द्वारा मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, $\quad$ जीवित रहा था, जो इस प्रकार इस सवन-विद्याको जानता है वह 'हे प्राणरूप रुद्रगण ! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय $\quad$ (नीरोग होकर) एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥ सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सप्तदश खण्ड $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ आत्मयज्ञके अन्य अङ्ग वह [पुरुष] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो $\quad$ समानताको प्राप्त होते हैं। तथा जो तप, दान, आर्जव पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण (प्रसन्न) नहीं $\quad$ (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा होता—वही इसकी दीक्षा है। फिर वह जो खाता है, जो $\quad$ हैं। इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई' पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी $\quad$ वह इसका पुनर्जन्म ही है, तथा मरण ही अवभृथस्नान है। सदृशताको प्राप्त होता है। तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण $\quad$ घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुतशस्त्रकी ही $\quad$ सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन

  • इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द आया है, वहाँ अपने पुत्रके नामको उच्चारण करना चाहिये । उ० सं० ५४-५५-

४२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

४२६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३ हो गया था, कहा—'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रोंका जप पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश, करना चाहिये ( १ ) तू अक्षित ( अक्षय ) है, ( २ ) अच्युत जो परब्रह्ममें स्थित परम तेज देदीप्यमान है, उसका है। ( अविनाशी ) है और ( ३ ) अति सूक्ष्म प्राण है।' तथा [ अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं। [ 'आदित्यप्रत्नस्य रेतसः' हैं—] अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है। हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है—'आदित्यप्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः प्रकाशवान् सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥१-७॥ पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि' इसका अर्थ यह है—] अष्टादश खण्ड मन और आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना 'मन ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करे । यह अध्यात्मदृष्टि ही मनोमय ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुरूप ज्योतिसे है । तथा 'आकाश ब्रह्म है' यह अधिदैवत दृष्टि है। इस प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता है वह प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया। कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है । वह यह ( मनःसञ्ज्ञक ) ब्रह्म चार पादोंवाला है। वाक् पाद चक्षु ही मनःसञ्ज्ञक ब्रह्मका चौथा पाद है। वह आदित्यरूप है, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है। यह ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता अध्यात्म है। अब अधिदैवत कहते है—अग्नि पाद है, वायु है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद हैं। इस प्रकार है। श्रोत्र ही मनोरूप ब्रह्मका चौथा पाद है। वह दिशारूप अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया जाता है। ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता वाक् ही ब्रह्मका चौथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है वह कीर्ति, यश तपता है ॥ १-६ ॥ और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है। प्राण एकोनविंश खण्ड आदित्यकी ब्रह्मरूपमें उपासना आदित्य ब्रह्म है—ऐसा उपदेश है, उसीकी व्याख्या की थीं, वे नदियाँ हैं तथा जो वस्तिगत जल था, वह समुद्र है। जाती है। पहले यह असत् ही था । वह सत् ( कार्याभिमुख ) फिर उससे जो उत्पन्न हुआ, वह यह आदित्य है। उसके हुआ। वह अङ्कुरित हुआ । वह एक अण्डेमें परिणत हो उत्पन्न होते ही बड़े जोरोंका शब्द हुआ तथा उसीसे सम्पूर्ण गया। वह एक वर्षपर्यन्त उसी प्रकार पड़ा रहा । फिर वह प्राणी और सारे भोग हुए हैं। इसीसे उसका उदय और फूटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत और सुवर्णरूप हो गये । अस्त होनेपर दीर्घ-शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं तथा सम्पूर्ण उनमे जो खण्ड रजत हुआ, वह यह पृथिवी है और जो सुवर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं। वह जो इस प्रकार हुआ, वह द्युलोक है। उस अण्डेका जो जरायु ( स्थूल जाननेवाला होकर आदित्यकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार गर्भवेष्टन ) था [ वही ] वे पर्वत हैं, जो उल्ब ( सूक्ष्म उपासना करता है [ वह आदित्यरूप हो जाता है, तथा ] गर्भवेष्टन ) था, वह मेघोंके सहित कुहरा है, जो धमनियां उसके समीप शीघ्र ही सुन्दर घोष आते हैं और उसे सुख देते हैं, सुख देते हैं ॥ १-४॥ ॥ तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥

The provided image is completely blank and does not contain any text.

कल्याण यज्ञशालामें उपस्ति रैक्व और जानश्रुति