कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ११] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१३
दशम खण्ड
उपस्तिका आख्यान
एक बार ओले गिरनेसे कुरुदेशकी खेती चौपट हो गयी
थी। उन दिनों चक्र मुनिके पुत्र उपस्ति ऋषि अपनी धर्मपत्नी
आटिकीके साथ (जिसने अभी युवावस्था में प्रवेश नहीं किया
था) बड़ी दीन अवस्थामें-पराश्रित होकर किसी हाथीवालोंके
गाँवमें रहते थे। एक दिन अन्नके लिये भीख माँगते हुए
उपस्तिने अत्यन्त निकृष्ट कोटिके उड़द खाते हुए एक महावतसे
याचना की। उन प्रसिद्ध मुनिसे हाथीवान् इस प्रकार बोला कि
'जितने और जो उड़द मेरे इस पात्रमें रक्खे हैं, उनके सिवा
ओर उड़द मेरे पास नहीं हैं।' ऋषिने कहा-'इन्हींमेंसे
मुझे दे दे।' महावतने अपने पात्रमें बचे हुए सारे उड़द
उन्हें दे दिये। महावत बोला- 'उड़द खाकर जल भी पी
लीजिये।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'नहीं, ऐसा करनेपर
मेरेद्वारा तुम्हारा जूठा जल पिया जायगा।' 'क्या ये उड़द भी
जूठे नहीं हैं?' महावतके यों पूछनेपर उन प्रसिद्ध ऋषिने
उत्तर दिया-'अवश्य ही इन उड़दोंको न खानेपर मैं जीवित
न रहता। पर पीनेका जल तो मुझे यथेष्ट मिल जाता
है' ॥ १-४ ॥
उपस्ति ऋषि खानेसे बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके
लिये ले आये। उसने पहले ही अच्छी भिक्षा पा ली थी,
इसलिये उसने उन उड़दोंको अपने पतिसे लेकर रख दिया।
दूसरे दिन प्रातः काल शय्यात्याग करते समय उपस्तिने कहा-
'हाय, यदि हमें थोड़ा-सा भी अन्न मिल जाता तो हम कुछ
धन कमा लाते। अमुक राजा यज्ञ करनेवाला है। वह मुझे
ऋत्विजोंके सभी प्रकारके कार्योंके लिये वरण कर लेगा।'
ऋषिसे उनकी पत्नीने कहा- 'स्वामिन् ! लीजिये, कल जो
उड़द आप मुझे दे गये थे, वे ही मेरे पास बचे हुए हैं।' बस,
उन्हें खाकर उपस्ति उस विशाल यज्ञमें चले गये ॥ ५-७ ॥
उस यज्ञमें पहुँचकर जहाँ उद्गातालोग स्तुति करते हैं,
उस स्थानपर स्तुति करनेके लिये उद्यत उद्गाता आदि ऋत्विजों-
के समीप वे बैठ गये। फिर उन्होंने स्तुति करनेवाले प्रस्तोता
ऋत्विक्से कहा- 'प्रस्तोता ! जिस देवताका प्रस्तावसे सम्बन्ध
है, अर्थात् जिनकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना
जाने यदि तुम स्तुति करोगे तो याद रखना, तुम्हारा मस्तक
गिर जायगा।' इसी प्रकार उन्होंने उद्गातासे कहा-'उद्गाता !
जिस देवताका उद्गीथसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिसका तुम उद्गीथ-
द्वारा गान करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम उद्गान
करोगे तो निश्चय समझो, तुम्हारा मस्तक गिर पड़ेगा।'
तदनन्तर उन्होंने प्रतिहर्तासे कहा- 'प्रतिहर्ता ! जिस देवताका
प्रतिहारसे सम्बन्ध है, उसे न जानते हुए यदि तुम प्रतिहार-
क्रिया करोगे तो समझ लो कि तुम्हारा सिर तुम्हारी गर्दनपर
नहीं रहेगा।' इसपर वे सब ऋत्विक् अपने-अपने कार्यसे उपरत
होकर चुपचाप बैठ गये ॥ ८-११ ॥
एकादश खण्ड
प्रस्ताव आदि कर्मोंसे सम्बद्ध देवताओंका वर्णन
तब इन उपस्ति ऋषिसे यज्ञ करानेवाले राजाने कहा-
'मैं श्रीमान्का ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ।'
इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'मैं चक्रका पुत्र उपस्ति नामका
ऋषि हूँ।' राजाने कहा- 'सच मानिये, मैंने इन समस्त
ऋत्विज् सम्बन्धी कर्मोंके लिये श्रीमान्की सब जगह खोज की
थी। श्रीमान्के न मिलनेपर ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंको चुना
है। परन्तु अब मेरे सम्पूर्ण ऋत्विज्-सम्बन्धी कर्मोंपर श्रीमान्
ही रहें।' ऋषिने 'बहुत अच्छा' कहकर राजाके प्रस्तावका
अनुमोदन किया और फिर कहा- 'तब मेरी आज्ञा पाकर ये
पहलेवाले ऋत्विज् ही स्तुति आरम्भ करें। परन्तु एक बात
है-जितना धन आप इन लोगोंको दें, उतना ही मुझे भी
दें।' राजाने 'यही होगा' कहकर अपनी स्वीकृति दे दी ॥१-३॥
तदनन्तर प्रस्तोता उन प्रसिद्ध ऋषिके पास आकर बोला-
“श्रीमान्ने मुझे यह कहा था कि 'प्रस्तोता ! जिस देवताकी
तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति-
पाठ करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' सो वह
देवता कौन है-मैं यह जानना चाहता हूँ।" इसपर ऋषि
बोले-“वह देवता प्राण है। निःसन्देह ये समस्त प्राणी प्रलय-
के समय प्राणमे ही प्राणरूप होकर विलीन हो जाते हैं और
पुनः सृष्टिकालमें प्राणसे ही प्रकट होते हैं। वही यह प्राण
प्रस्ताव अर्थात् स्तुतिमें अनुगत देवता है, उसको बिना जाने
यदि तुम स्तुति आरम्भ कर देते तो मेरे यह कहनेपर कि
'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय,' वैसा अवश्य हो
जाता” ॥ ४५ ॥
तदनन्तर उद्गाता उपस्तिके पास आकर बोला-
“श्रीमान्ने मुझसे यह कहा था कि 'उद्गाता ! जो उद्गीथसे
४१४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
४१४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय १
सम्बन्ध रखनेवाला देवता है, उसे न जानकर यदि तुम उद्गान
करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' अतः वह
देवता कौन है—यह मैं आपसे जानना चाहता हूँ।” इसपर
उन प्रसिद्ध ऋषि उपस्तिने कहा—“वह देवता सूर्य है।
निश्चय ही ये समस्त प्राणी आकाशमें स्थित सूर्यका यशोगान
किया करते हैं। वही यह सूर्य उद्गीथसे सम्बन्ध रखनेवाला
देवता है। उसे बिना जाने यदि तुमने उद्गान किया होता तो
मेरे यह कहनेपर कि 'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय' वैसा
अवश्य हो जाता” ॥ ६-७ ॥
इसके बाद प्रतिहर्त्ता उपस्तिके पास आकर यों कहने लगा—
“श्रीमान्ने मुझसे यह कहा था कि 'प्रतिहर्ता ! जो प्रतिहारसे
सम्बन्ध रखनेवाला देवता है, उसे बिना जाने यदि तुम प्रतिहार-
की क्रिया करोगे तो तुम्हारा सिर अलग होकर गिर पड़ेगा।'
अतः वह देवता कौन है, यह मैं आपसे जानना चाहता हूँ।”
ऋषिने प्रतिहर्ताके प्रश्नका उत्तर इस प्रकार दिया—“जिस
देवताकी बात तुमने पूछी है, वह अन्न है। निःसन्देह ये समस्त
प्राणी अन्नको ही खाकर जीवन धारण करते हैं। वही यह
अन्न प्रतिहारसे सम्बन्ध रखनेवाला देवता है। उसे बिना
जाने यदि तुम प्रतिहारकी क्रिया करते तो मेरे यह कहनेपर कि
'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय' वैसा अवश्य हो
जाता” ॥ ८-९ ॥
द्वादश खण्ड
शौव उद्गीथका वर्णन
अब यहाँसे कुत्ते (का रूप धारण करनेवाले ऋषियों)
द्वारा प्रत्यक्ष किये हुए उद्गीथका वर्णन किया जाता है। यह
बात इस रूपमें प्रसिद्ध है कि दल्भ ऋषिके पुत्र बक अथवा
मित्राके पुत्र ग्लाव ऋषि स्वाध्याय करनेके लिये गाँवसे बाहर किसी
निर्जन स्थानमें गये। उक्त ऋषिपर अनुग्रह करनेके लिये वहाँ
श्वेत रंगका एक अलौकिक कुत्ता (कुत्तेके रूपमें ऋषि)
प्रकट हुआ। तत्पश्चात् दूसरे भी कई कुत्ते उस पहले प्रकट
हुए कुत्तेके पास आकर उससे बोले—'श्रीमान् उद्गीथका
गान करके हमारे लिये अन्न प्रस्तुत करें, क्योंकि हमलोग
निश्चित ही भूखे हैं।' उनसे वह श्वेत रंगका कुत्ता बोला—
'कल प्रातः इसी स्थानमें तुमलोग मेरे पास आना।' उनकी इस
बातको सुनकर दल्भपुत्र बक अथवा मित्रापुत्र ग्लाव ऋषि
कौतूहलसे भर गये और यह देखनेके लिये कि वह कुत्ता किस
प्रकार अन्न जुटाता है, वहीं उसके द्वारा निर्दिष्ट समयकी
प्रतीक्षा करने लगे ॥ १-३ ॥
निर्दिष्ट समयपर वे अलौकिक कुत्ते वहाँ एकत्रित हुए
और जिस प्रकार यज्ञकर्ममें उद्गाता बहिष्पवमान नामक स्तोत्र-
द्वारा स्तुति आरम्भ करनेसे पूर्व एक दूसरेसे मिलकर चलते
हैं, ठीक उसी प्रकार वे भी एक दूसरेसे जुड़कर परिभ्रमण
करने लगे, फिर उन्होंने एक जगह आरामसे बैठकर
हिंकार आरम्भ किया। अर्थात् 'हिं' स्तोभ* का प्रयोग
करते हुए साम-गान आरम्भ किया। गान इस आशयका था—
'हे सबकी रक्षा करनेवाले परमात्मन् ! हम भोजन और
जलपानके इच्छुक हैं। परमात्मन् ! आप प्रकाशस्वरूप देव
हैं, अभीष्ट वस्तुकी वर्षा करनेवाले वरुण हैं, समस्त प्रजाका
पालन करनेवाले प्रजापति हैं और सबको उत्पन्न करनेवाले
सविता हैं। अत हमारे लिये यहाँ अन्न ला दीजिये। हे अन्नके
स्वामी ! यहाँ अन्न लाइये, परमेश्वर ! यहाँ अन्न प्रस्तुत
कीजिये' ॥ ४-५ ॥
त्रयोदश खण्ड
तेरह प्रकारके स्तोभोंका वर्णन
इस प्रकरणमें बताये जानेवाले तेरह प्रकारके स्तोभोंमें
निश्चय ही 'हाउ' शब्द मनुष्यलोकका वाचक है, 'हाइ'
वायुलोक है, 'अथ' चन्द्रलोक है, 'इह' आत्मा है और
'ईं' अग्निरूप है। इनके अतिरिक्त 'ऊ' सूर्यरूप है, 'ए'
आवाहनका बोधक है, 'औहोयि' विश्वेदेवा हैं, 'हिं' प्रजापति-
स्वरूप है, 'स्वर' प्राणरूप है, 'या' अन्नरूप है तथा 'वाक्'
विराट्रूप है। तेरहवाँ और अन्तिम स्तोभ 'हुं' है, वह सबमें
व्याप्त रहनेवाला वर्णनातीत निर्विशेष ब्रह्म है ॥ १-३ ॥
जो सामके रहस्यको जान लेता है, उसके लिये वाणी स्वयं
अपना रहस्य प्रकट कर देती है। वह भोग-सामग्रीसे तथा
उसे भोगनेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है ॥ ४ ॥
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥
- साम-गान करते समय उसके स्वर और लयकी पूर्तिके लिये जो 'हा ३ उ' आदि तेरह प्रकारके शब्द उपयोगमें लाये जाते
हैं, उन्हें 'स्तोम' कहते हैं। इनका अर्थ अगले खण्डमें बताया गया है। 'हिं' प्रजापतिरूप है और प्रजापति ही अन्नका स्वामी है, इसलिये
उनकी प्रार्थनामें 'हिं'का प्रयोग किया गया है।
द्वितीय अध्याय
ॐ
द्वितीय अध्याय
प्रथम खण्ड
साधु-दृष्टिसे समस्त सामकी उपासना
ॐ समस्त सामकी उपासना निश्चय ही साधु है। जो ऐसा भी कहते हैं कि हमारा साम ( शुभ ) हुआ। अर्थात्
साधु होता है, उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है, जब शुभ होता है तो 'अहा ! बड़ा अच्छा हुआ' ऐसा कहते
वह असाम कहलाता है। इसी विषयमे कहते हैं—[ जब कहा हैं, और ऐसा भी कहते हैं—'हमारा असाम हुआ' अर्थात्
जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास साम- जब अशुभ होता है तो 'अरे ! बुरा हुआ !' ऐसा कहते हैं।
द्वारा गया तो [ ऐसा कहकर ] लोग यही कहते हैं कि वह इसे इस प्रकार जाननेवाला जो पुरुष 'साम साधु है' ऐसी
इसके पास साधुभावसे गया और [ जब यों कहा जाय कि ] उपासना करता है, उसके समीप साधु धर्म शीघ्र ही आ
वह इसके पास असामद्वारा गया तो [इससे] लोग यही कहते जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं ॥ १-४॥
हैं कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ। इसके अनन्तर
द्वितीय खण्ड
पञ्चविध सामोपासना
लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है
पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, और पृथ्वी निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष
आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है—इस प्रकार लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है, उसके प्रति ऊर्ध्व
ऊपरके लोकोंमें सामदृष्टि करे । अब अधोगत लोकोंमें और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ॥ १-३ ॥
सामोपासनाका निरूपण किया जाता है—द्युलोक हिंकार है,
तृतीय खण्ड
वृष्टिमें सामोपासना
वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। पूर्ववायु जल ग्रहण करता है यह निधन है। जो इसे ( इस उपासनाको )
हिंकार है, मेघ उत्पन्न होता है यह प्रस्ताव है, बरसता है यह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी
उपासना करता है उसके लिये वर्षा होती है और वह स्वयं भी
उद्गीथ है, चमकता और गर्जन करता है यह प्रतिहार है, वर्षा करा लेता है ॥ १-२ ॥
चतुर्थ खण्ड
जलमें सामोपासना
सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । प्रतिहार है और समुद्र निधन है। जो इसे इस प्रकार
मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है यह हिंकार है, वह जो जाननेवाला पुरुष सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी
बरसता है यह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती उपासना करता है वह जलमें नहीं मरता और जलवान्
हैं वह उद्गीथ है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती है वह होता है ॥ १-२ ॥
पञ्चम खण्ड
ऋतुओंमें सामोपासना
ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। वसन्त पुरुष ऋतुओमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे
हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरत् प्रतिहार ऋतुएँ अपने अनुरूप भोग देती हैं और वह ऋतुमान्
है और हेमन्त निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला (ऋतुसम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न) होता है ॥ १-२ ॥
४१६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय २
४१६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय २
षष्ठ खण्ड
पशुओंमें सामोपासना
पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । बकरे वाला पुरुष पशुओंमे पाँच प्रकारके सामकी उपासना
हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव है, गौएँ उद्गीथ है, अश्व प्रतिहार करता है उसे पशु प्राप्त होते ह और वह पशुमान्
हैं और पुरुष निधन है। जो इसे इस प्रकार जानने- होता है ॥ १-२ ॥
सप्तम खण्ड
प्राणोंमें सामोपासना
प्राणोंमें पाँच प्रकारकेपरोवरीय गुणविशिष्ट सामकी उपासना वाला पुरुष प्राणोंमे पाँच प्रकारके उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी
करे। उनमें प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता
श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ निश्चय ही है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत लेता है। यह
परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) हैं। जो इसे इस प्रकार जानने- पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥ १-२ ॥
अष्टम खण्ड
वाणीमें सप्तविध सामोपासना
अब सप्तविध सामकी उपासना [ प्रारम्भ की जाती ] 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव है और जो कुछ 'नि' ऐसा
है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें शब्दरूप है वह निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला
जो कुछ 'हुं' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' पुरुष वाणीमें सात प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे
ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप वाणी, जो कुछ वाणीका दोह (सार) है उसे देती है तथा
है वह आदि है, जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न और उसका भोक्ता होता है ॥१-३॥
है, जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ
नवम खण्ड
आदित्य-दृष्टिसे सप्तविध सामोपासना
अब निश्चय ही इस आदित्यकी दृष्टिसे सप्तविध सामकी अनुगत पक्षिगण है। क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन
उपासना करनी चाहिये । आदित्य सर्वदा सम है, इसलिये करनेवाले हैं, इसलिये वे अन्तरिक्षमे अपनेको निराधाररूपसे
वह साम है। मेरे प्रति, मेरे प्रति ऐसा होनेके कारण वह सब ओर ले जाते हैं। तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका
सबके प्रति सम है, इसलिये साम है। उस आदित्यमें ये रूप होता है वह उद्गीथ है। इसके उस रूपके देवता लोग
सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने । जो उस आदित्यके अनुगत हैं। इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें
उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी है।
उसके पशु अनुगत हैं, इसीसे वे हिंकार करते हैं। अत वे ही तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नके पूर्व
इस आदित्यरूप सामके हिंकार भाजन हैं। तथा सूर्यके पहले- होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ
पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्रस्ताव है। उसके हैं। इसीसे वे ऊपरकी ओर आकृष्ट किये जानेपर नीचे नहीं
उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं अत वे प्रस्तुति (प्रत्यक्षस्तुति) गिरते, क्योंकि वे इस सामकी प्रतिहारभक्तिके पात्र हैं। तथा
और प्रशांस (परोक्षस्तुति) की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तसे पूर्व होता
इस सामकी प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं। तत्पश्चात् है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु है।
आदित्यका जो रूप सङ्गववेलामें (सूर्योदयके तीन मुहूर्त इसीसे वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग
पश्चात् कालमे) रहता है वह आदि है। उसके उस रूपके जाते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं।
खण्ड १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१७
तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन
है । उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं; इसीसे [ श्राद्ध-
कालमें ] उन्हें [ पितृ पितामह आदि रूपसे दर्भपर ] स्थापित
करते हैं, क्योंकि वे पितृगण निश्चय ही इस सामकी निधन-
भक्तिके पात्र है। इसी प्रकार इस आदित्यरूप सात प्रकारके
सामकी उपासना करते है ॥ १-८ ॥
दशम खण्ड
मृत्युसे अतीत सप्तविध सामोपासना
अब निश्चय ही [ यह बतलाया जाता है कि ] अपने
समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना
करे । 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी
तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है। 'आदि' यह दो
अक्षरोंवाला नाम है, और 'प्रतिहार' यह चार अक्षरोंवाला
नाम है। इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे
समान हो जाते हैं। 'उद्गीथ' यह तीन अक्षरोंका और
'उपद्रव' यह चार अक्षरोंका नाम है। ये दोनो तीन-तीन
अक्षरोंमें तो समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है। अतः
[ 'अक्षर' होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेसे तो वह
[ एक ] भी उनके समान ही है। 'निधन' यह नाम तीन
अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस
अक्षर हैं। इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोक प्राप्त
करता है, क्योंकि इस लोकसे आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है।
बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं
शोकरहित लोकको जीत लेता है। [ वह पुरुष ] आदित्यलोक-
की जय प्राप्त करता है तथा उसे आदित्यविजयसे भी उत्कृष्ट
जय प्राप्त होती है। जो इस उपासनाको इस प्रकार जाननेवाला
होकर आत्मसमित और मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी
उपासना करता है—सामकी उपासना करता है ॥ १-६ ॥
एकादश खण्ड
गायत्र-सामोपासना
मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र
प्रतिहार है और प्राण निधन है। यह गायत्रसञ्ज्ञक साम
प्राणोंमें प्रतिष्ठित है । वह, जो इस प्रकार गायत्रसञ्ज्ञक
सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है,
पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवनलाभ करता
है, प्रजा और पशुओंद्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके
द्वारा भी महान् होता है। वह महान् मनस्वी होवे—यही
उसका व्रत है ॥ १-२ ॥
द्वादश खण्ड
रथन्तर-सामोपासना
अभिमन्थन करता है यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है
यह प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है यह उद्गीथ है, अङ्गार होते हैं
यह प्रतिहार है तथा शान्त होने लगता है यह निधन है और
सर्वथा शान्त हो जाता है यह भी निधन है। यह रथन्तरसाम
अग्निमें प्रतिष्ठित है। वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तर-
सामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और
अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता
है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है। अग्निकी ओर मुख
करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
त्रयोदश खण्ड
वामदेव्य-सामोपासना
स्त्री-पुरुषका संकेत हिंकार है, पारस्परिक सन्तोष प्रस्ताव
है, सहशयन उद्गीथ है, अभिमुखशयन प्रतिहार है, समाप्ति
निधन है, इस प्रकार जोड़ेसे वामदेव्यसामकी उपासना की
जाती है। वह, जो पुरुष इस प्रकार मिथुनमें वामदेव्यसामको
स्थित जानता है, सदा जोड़ेसे रहता है, उसका कभी वियोग
नहीं होता, मिथुनीभावसे उसके सन्तान उत्पन्न होती है। वह
पूर्ण आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता
है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण महान् होता है। किसी भी पर-स्त्रीका कभी कहींसे भी
अपहरण न करे, कदापि व्यभिचारी न हो—यह व्रत है ॥१-२॥
४१८ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय २
४१८ * छान्दोग्योपनिषद् * [अध्याय २
चतुर्दश खण्ड
बृहत्सामोपासना
उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रस्ताव
है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, अपराह्नकालिक प्रतिहार
है और जो अस्तमित होनेवाला सूर्य है वह निधन है।
यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है। वह पुरुष, जो इस प्रकार
इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और
अन्नका भोग करनेवाला होता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त
होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और
पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी
महान् होता है। तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १-२ ॥
पञ्चदश खण्ड
वैरूप-सामोपासना
बादल एकत्रित होते हैं यह हिंकार है। मेघ उत्पन्न होता
है यह प्रस्ताव है। जल बरसता है यह उद्गीथ है। बिजली
चमकती और कड़कती है यह प्रतिहार है तथा दृष्टिका उप-
संहार होता है यह निधन है। यह वैरूपसाम मेघमें अनुस्यूत
है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैरूपसामको पर्जन्यमें
अनुस्यूत जानता है, विरूप और सुरूप पशुओंका अवरोध
करता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत
करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा
कीर्तिके कारण महान् होता है। बरसते हुए मेघकी निन्दा न
करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
षोडश खण्ड
वैराज-सामोपासना
वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरद्
ऋतु प्रतिहार है, हेमन्त निधन है—यह वैराजसाम ऋतुओं-
में अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस वैराजसामको
ऋतुओंमें अनुस्यूत जानता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके
कारण शोभित होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान्
होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। ऋतुओंकी
निन्दा न करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
सप्तदश खण्ड
शक्वरी-सामोपासना
पृथ्वी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है,
दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है—यह शक्वरीसाम
लोकोंमें अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस शक्वरी-
सामको लोकोंमें अनुस्यूत जानता है, लोकवान् होता है। वह
सम्पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता
है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके
कारण भी महान् होता है। लोकोंकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १-२ ॥
अष्टादश खण्ड
रेवती-सामोपासना
बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े
प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है—यह रेवतीसाम पशुओंमें
अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस रेवतीसामको
पशुओंमें अनुस्यूत जानता है, पशुमान् होता है। वह पूर्ण
आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है,
प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण
भी महान् होता है। पशुओंकी निन्दा न करे—यह
व्रत है ॥ १ २ ॥
खण्ड २२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१९
एकोनविंश खण्ड
यज्ञायज्ञीय-सामोपासना
लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मास उद्गीथ है, अस्थि टेढा-मेढ़ा नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल
प्रतिहार है और मज्जा निधन है । यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान्
होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। वर्ष भरतक
अनुस्यूत है । वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको मासभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा कभी भी मासभक्षण
अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है, अङ्गवान् होता है। वह अङ्गोंसे न करे—ऐसा व्रत है ॥ १-२ ॥
विंश खण्ड
राजन-सामोपासना
अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, सालोक्य, साष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो
जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन
नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजन साम व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है
देवताओंमे अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न
राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओके करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥
एकविंश खण्ड
सबमें अनुस्यूत सामकी उपासना
त्रयीविद्या हिंकार है, ये तीन लोक प्रस्ताव हैं, अग्नि, विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये
वायु और आदित्य ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है।
ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण—ये निधन हैं। यह जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ
सामोपासना सर्वमें अनुस्यूत है। वह, जो इस प्रकार सबमें बलि समर्पित करती हैं। 'मै सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना
अनुस्यूत इस सामको जानता है, सर्वरूप हो जाता है। इस करे—यह व्रत है, यह व्रत है ॥ १-४ ॥
द्वाविंश खण्ड
अग्नि-सम्बन्धी उद्गीथ
सामके 'विनर्दि' नामक गानका वरण करता हूँ, वह कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे
पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ कहे कि 'मैं इन्द्रके शरणागत हूँ वही तुझे इसका उत्तर देगा।'
है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोम निरुक्त है, वायुका और यदि कोई इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे
मृदुल और श्लक्ष्ण (सरलतासे उच्चारण किये जाने योग्य) तो उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिके शरणागत था वही तेरा मर्दन
है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पतिका क्रौञ्च करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमे उलाहना दे
(क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान) है और वरुणका अपध्वान्त तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे
(भ्रष्ट) है। इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे, केवल वरुण- दग्ध करेगा।' सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त उच्चारण
सम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे। मै देवताओंके लिये किये जाने चाहिये, अत. [उनका उच्चारण करते समय]
अमृतत्वका आगान (साधन) करूँ—इस प्रकार चिन्तन 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना
करते हुए आगान करे । पितृगणके लिये स्वधा, मनुष्योंके चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एव विवृतरूपसे
लिये आशा (उनकी इष्ट वस्तुओं), पशुओंके लिये तृण और उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन
जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका करना चाहिये कि] 'मै प्रजापतिको आत्मदान करूँ।' समस्त
आगान करूँ—इस प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए स्पर्शवर्णोंको एक-दूसरेसे तनिक भी मिलाये विना ही बोलना
प्रमादरहित होकर स्तुति करे। सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, चाहिये और उस समय 'मै मृत्युसे अपना परिहार करूँ'
समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके [ऐसा चिन्तन करना चाहिये] ॥ १-५ ॥
-आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि
: छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय २
: छान्दोग्योपनिषद् : [ अध्याय २
त्रयोविंश खण्ड
धर्मके तीन स्कन्ध, ओंकारकी सर्वरूपता
धर्मके तीन स्कन्ध हैं—यज्ञ, अध्ययन और दान—यह
पहला स्कन्ध है । तप ही दूसरा स्कन्ध है । आचार्यकुलमें
रहनेवाला ब्रह्मचारी, जो आचार्यकुलमें अपने शरीरको अत्यन्त
क्षीण कर देता है, तीसरा स्कन्ध है । ये सभी पुण्यलोकके
भागी होते हैं। ब्रह्ममे सम्यक् प्रकारसे स्थित [चतुर्थाश्रमी
सन्यासी] अमृतत्वको प्राप्त होता है। प्रजापतिने लोकोंके
उद्देश्यसे ध्यानरूप तप किया। उन अभितप्त लोकोंसे त्रयी
विद्याकी उत्पत्ति हुई तथा उन अभितप्त त्रयी विद्यामे 'भूः,
भुव और स्व' ये अक्षर उत्पन्न हुए। [फिर प्रजापतिने ]
उन अक्षरोंका आलोचन किया। उन आलोचित अक्षरोंसे
ओङ्कार उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार शङ्कुओ (नसों) द्वारा
सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओंकारसे सम्पूर्ण वाणी
व्याप्त है। ओंकार ही यह सब कुछ है—ओंकार ही यह सब
कुछ है ॥ १-३ ॥
चतुर्विंश खण्ड
तीनों कालका सवन
ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःसवन वसुओंका है, मध्याह्नसवन
रुद्रोंका है तथा तृतीय सवन आदित्य और विश्वेदेवोंका है। तो
फिर यजमानका लोक कहाँ है? जो यजमान उस लोकको नहीं
जानता वह किस प्रकार यज्ञानुष्ठान करेगा ? अतः उसे
जाननेवाला ही यज्ञ करेगा ॥ १-२ ॥
प्रातग्नुवाकका आरम्भ करनेसे पूर्व वह (यजमान)
गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वसुदेवता-
सम्बन्धी सामका गान करता है। [ हे अग्ने ! ] तुम इस
लोकका द्वार खोल दो, जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये
तुम्हारा दर्शन कर लें । तदनन्तर [यजमान इस मन्त्रद्वारा ]
हवन करता है—पृथिवीमे रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको
नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम [पृथिवी ] लोककी प्राप्ति
कराओ । यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त
करनेवाला हूँ। इस लोकमे यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके
अनन्तर [ पुण्यलोकको प्राप्त होऊँगा ] स्वाहा'—ऐसा कहकर
हवन करता है, और 'परिघ (अर्गला) को नष्ट करो' ऐसा
कहकर उत्थान करता है । वसुगण उसे प्रातः सवन प्रदान
करते हैं ॥ ३-६ ॥
मध्याह्नसवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान दक्षिणाग्निके
पीछे उत्तराभिमुख बैठकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान
करता है। [ हे वायो ! ] तुम अन्तरिक्षलोकका द्वार खोल
दो जिससे कि वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये हम तुम्हारा दर्शन
कर सकें । तदनन्तर [यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता
है—'अन्तरिक्षमें रहनेवाले अन्तरिक्षलोकनिवासी वायुदेवको
नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम [अन्तरिक्ष ] लोककी
प्राप्ति कराओ । यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे
प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान, 'मैं आयु समाप्त होनेपर
[ अन्तरिक्षलोक प्राप्त करूँगा ] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन
करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो' ऐसा कहकर
उत्थान करता है। रुद्रगण उसे मध्याह्नसवन प्रदान करते हैं
॥ ७-१० ॥
तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान आहवनीयाग्निके
पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी
सामका गान करता है। लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम
स्वाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। यह
आदित्यसम्बन्धी साम है, अब विश्वेदेवसम्बन्धी साम कहते
हैं—लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्यप्राप्तिके लिये
तुम्हारा दर्शन कर सकें। तत्पश्चात् [यजमान इस मन्त्रद्वारा ]
हवन करता है—स्वर्गमे रहनेवाले द्युलोकनिवासी आदित्योंको
और विश्वेदेवोंको नमस्कार है । मुझ यजमानको तुम
पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक
है, मै इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान 'आयु समाप्त
होनेपर [मै इसे प्राप्त करूँगा ] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन
करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—ऐसा कहकर
उत्थान करता है। उस (यजमान) को आदित्य और
विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता
है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा
(यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ ११-१६ ॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
ॐ
तृतीय अध्याय
प्रथम खण्ड
आदित्यकी मधुरूपमें कल्पना
ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है । द्युलोक अमृत ही जल हे । उन इन ऋक् [ -रूप मधुकरो ] ने ही
ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ इस ऋग्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश,
है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमे रहनेवाले ] तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । वह
मक्खियोंके बच्चे हैं । उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणे ( यश आदि रस ) विशेषरूपमे गया । उसने [ जाकर ]
हैं, वे ही इस ( अन्तरिक्षरूप छत्ते ) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र आदित्यके [ पूर्व ] भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका
हैं । ऋक् ही मधुकर हे, ऋग्वेद ही पुष्प है, वे मोम आदि लाल रूप है, वही यह ( रस ) है ॥ १-४ ॥
द्वितीय खण्ड
आदित्यकी दक्षिणस्थित किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणे ह, वे ही इसकी अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप
दक्षिणदिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजु श्रुतियाँ ही मधुकर ह, रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और
यजुर्वेद ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। आदित्यके [दक्षिण] भागमे आश्रय लिया। यह जो आदित्यका
उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस शुक्ल रूप है, यह वही है ॥ १-३ ॥
तृतीय खण्ड
पश्चिम ओरकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं, वे ही इसकी अभिताप किया । उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज,
पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर ह, सामवेद- इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । उस रसने
विहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके [ पश्चिम ] भागमे
जल है । उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है, यह वही है ॥१-३॥
चतुर्थ खण्ड
उत्तर दिशाकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं, वे ही इसकी पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और
उत्तर दिशाकी मधुनाडियाँ है। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई । उस रसने विशेषरूपसे
हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] गमन किया और आदित्यके [ उत्तर ] भागमे आश्रय
अमृत ही जल है। उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस लिया । यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है, यह
इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [इतिहास- वही है ॥ १-३ ॥
पञ्चम खण्ड
ऊर्ध्वरश्मियोंमें मधुनाडी-दृष्टि
तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं, वे ही इसकी ऊपरकी उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको
ओरकी मधुनाडियाँ है। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं, [ प्रणवरूप ] अभितप्त किया । उस अभितत्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय,
ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ। उस रसने विशेषरूपसे
४२२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
४२२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
गमन किया और वह आदित्यके [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृर्तोंके
हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध सा होता है यही वह अमृत हैं--वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत
(मधु) है। वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं ॥ १-४ ॥
षष्ठ खण्ड
वसुओंके जीवनाधार प्रथम अमृतकी उपासना
इनमें जो पहला अमृत है, उससे वसुगण अग्निप्रधान ही प्रधानतासे इसे देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको
होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित
पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। होता है। जितने समयमे आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है
वे देवगण इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और पश्चिम दिशामे अस्त होता है, उतनी ही देर वह
और फिर इसीसे उत्साहित होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस
अमृतको जानता है, वसुओंमेंसे ही कोई एक होकर अग्निकी वसुओके आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
सप्तम खण्ड
रुद्रोंके जीवनाधार द्वितीय अमृतकी उपासना
अब, जो दूसरा अमृत है, रुद्रगण इन्द्रप्रधान होकर इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं ही उदासीन हो जाता है और इस रूपसे ही उद्यमशील होता
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। है। जितने समयमे आदित्य पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और अस्त होता है, उससे दुगुने समयमे वह दक्षिणसे उदित होता
इसीसे उद्यमशील होते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको है और उत्तरमे अस्त हो जाता है। इतने समयपर्यन्त वह
जानता है, रुद्रोंमेंसे ही कोई एक होकर इन्द्रकी ही प्रधानतासे रुद्रोंके ही आधिपत्य एव स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
अष्टम खण्ड
आदित्योंके जीवनाधार तृतीय अमृतकी उपासना
तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदित्यगण वरुणप्रधान इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही
होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो उदासीन होता है और इसीसे उद्योगी हो जाता है। वह
खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो आदित्य जितने समयमे दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमे
जाते हैं। वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते हैं और अस्त होता है, उससे दूने समयमें पश्चिमसे उदित होता और
इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता पूर्वमें अस्त होता है। इतने समय वह आदित्योंके ही आधिपत्य
है, आदित्योंमेंसे ही कोई एक होकर वरुणकी ही प्रधानतासे और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४॥
नवम खण्ड
मरुतोंके जीवनाधार चतुर्थ अमृतकी उपासना
तथा जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोमकी प्रधानतासे अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है। वह आदित्य
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। जितने समयमें पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे है, उससे दूनी देरमें उत्तरसे उदित होता और दक्षिणमें अस्त
उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस अमृतको जानता है, होता है। इतने काल वह मरुद्गणके ही आधिपत्य और
मरुतोंमेंसे ही कोई एक होकर सोमकी प्रधानतासे ही इस स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥
खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२३
दशम खण्ड
साध्योंके जीवनाधार पञ्चम अमृतकी उपासना
तथा जो पाँचवाँ अमृत है, साध्यगण ब्रह्माकी प्रधानतासे
उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं
और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे
उद्यमशील हो जाते हैं। वह, जो इस प्रकार इस अमृतको
जानता है, साध्यगणोंमेंसे ही कोई एक होकर ब्रह्माकी ही
प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस
रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही
उत्साहित हो जाता है। वह आदित्य जितने समयमे उत्तरसे
उदित होता है और दक्षिणमे अस्त होता है, उससे दूने
समयतक ऊपरकी ओर उदित होता है और नीचेकी ओर अस्त
होता है। इतने कालतक वह साध्योंके ही आधिपत्य और
स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ १-४ ॥
एकादश खण्ड
मधुविज्ञान तथा ब्रह्मविज्ञानके अधिकारी
फिर उसके पश्चात् वह ऊर्ध्वगत होकर उदित होनेपर
फिर न तो उदित होगा और न अस्त ही होगा, बल्कि अकेला
ही मध्यमें स्थित रहेगा। उसके विषयमे यह श्लोक है। वहाँ
निश्चय ही ऐसा नहीं होता। वहाँ [ सूर्यका ] न कभी अस्त
होता है और न उदय होता है। हे देवगण ! इस सत्यके
द्वारा मैं ब्रह्मसे विरुद्ध न होऊँ । जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद्
( वेदरहस्य ) को जानता है उसके लिये न तो सूर्यका उदय
होता है और न अस्त होता है। उसके लिये सर्वदा दिन ही
रहता है। वह यह मधुज्ञान ब्रह्माने प्रजापतिसे कहा था,
प्रजापतिने मनुको सुनाया और मनुने प्रजावर्गके प्रति कहा।
तथा यह ब्रह्मविज्ञान अपने ज्येष्ठ पुत्र अरुणनन्दन उद्दालकको
उसके पिताने सुनाया था। अतः इस ब्रह्मविज्ञानका पिता
अपने ज्येष्ठ पुत्रको अथवा सुयोग्य शिष्यको उपदेश करे। किसी
दूसरेको नहीं बतलावे, यद्यपि इस आचार्यको यह समुद्र-परिवेष्टित
और धनसे परिपूर्ण सारी पृथिवी दे [ तो भी किसी दूसरेको
इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही अधिकतर
फल देनेवाला है, यही अधिकतर फल देनेवाला है ॥ १-६ ॥
द्वादश खण्ड
गायत्रीकी सर्वरूपता
गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये
स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री है
और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री ( उनका
नामोच्चारण करती ) और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा
करती है। जो वह गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी
है, क्योंकि इसीमें ये सब भूत स्थित हैं और इसीका वे कभी
अतिक्रमण नहीं करते। जो भी यह पृथिवी है वह यही है जो
कि इस पुरुषमें शरीर है, क्योंकि इसीमें ये प्राण स्थित हैं और
इसीको वे कभी नहीं छोड़ते। जो भी इस पुरुषमें शरीर है वह
यही है जो कि इस अन्तःपुरुषमें हृदय है, क्योंकि इसीमे ये
प्राण प्रतिष्ठित हैं और इसीका अतिक्रमण नहीं करते। वह
यह गायत्री चार चरणोंवाली और छः प्रकारकी है। वह यह
[ गायत्र्याख्य ब्रह्म ] मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित किया गया है।
[ ऊपर जो कुछ कहा गया है ] उतनी ही इस ( गायत्र्याख्य
ब्रह्म ) की महिमा है, तथा [ निर्विकार ] पुरुष इससे भी
उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद हैं और इसका
[ पुरुषसंज्ञक ] त्रिपाद् अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है।
जो भी वह [ त्रिपाद् अमृतरूप ] ब्रह्म है वह यही है, जो कि
यह पुरुषसे बाहर आकाश है, और जो भी यह पुरुषसे बाहर
आकाश है वह यही है, जो कि यह पुरुषके भीतर आकाश
है, तथा जो भी यह पुरुषके भीतर आकाश है वह यही है,
जो कि हृदयके अन्तर्गत आकाश है। वह यह हृदयाकाश पूर्ण
और कभी भी प्रवृत्त न होनेवाला है। जो पुरुष ऐसा जानता
है, वह पूर्ण और कहीं प्रवृत्त न होनेवाली सम्पत्ति प्राप्त
करता है ॥ १-९ ॥
४२४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
४२४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
त्रयोदश खण्ड
पञ्चप्राणोंकी उपासना
उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि ह । इसका जो
पूर्वदिग्नावर्ती सुषि (छिद्र) है वह प्राण है, वह चक्षु है, वह
आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना
करे । जो इस प्रकार जानता है [अर्थात् इस प्रकार इनकी
उपासना करता है] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता
है । तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र
है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एव यश है—इस प्रकार
उसकी उपासना करे । जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और
यशस्वी होता है। तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान
है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही यह ब्रह्मतेज एव
अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता
है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है। तथा इसका
जो उत्तरी छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है,
और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है—
इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह
कीर्तिमान् और कान्तिमान् होता है। तथा इसका जो ऊर्ध्व
छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही
यह ओज और तेज है—इस प्रकार उसकी उपासना करे ।
जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी और तेजस्वी होता है ।
वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल ह । यह जो कोई
भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है
उसके कुलमे वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके
द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त
होता है। तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर
यानी सबके ऊपर, जिनमे उत्तम कोई दूसग लोक नहीं है
ऐसे उत्तम लोकोमे प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है
जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है। उस इस (हृदयस्थित
पुरुष) का यही दर्शनोपाय हे जब कि [मनुष्य] इस शरीरमे
स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय
है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु
(बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण
करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी
उपासना करे । जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार
उपासना करता ह] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात)
होता है ॥ १-८॥
चतुर्दश खण्ड
जगत्की एवं आत्माकी ब्रह्मरूपमें उपासना
यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीमे उत्पन्न
होनेवाला, उसीमे लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला
है—इस प्रकार शान्त [राग द्वेषरहित] होकर उपासना करे,
क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें
पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर
होता है। अतः उसे [पुरुषको] निश्चय करना चाहिये [वह
ब्रह्म] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसङ्कल्प, आकाश-
शरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरम, इस सम्पूर्ण
जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रम-
शून्य है, हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे,
सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा
हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक
अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है जो सर्वकर्मा,
सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करने-
वाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदय-
कमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर
जानेपर में इसीको प्राप्त होऊँगा । जिसका ऐसा निश्चय है, और
जिसे इस विषयमे कोई सन्देह भी नहीं है [उसे इसी ब्रह्म-
भावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है ॥ १-४॥
पञ्चदश खण्ड
विराड्रूप कोशकी उपासना
अन्तरिक्ष जिसका उदर है, वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला
है। वह जीर्ण नहीं होता । दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश
ऊपरका छिद्र है। वह यह कोश वसुधान है। उसीमे यह
सारा विश्व स्थित है। उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली
है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी'
नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन
दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको
दिशाओके वत्सरूपसे जानता है, पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं
खण्ड १७ ] $\qquad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\qquad$ ४२५
करता । वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे $\quad$ कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं
जानता हूँ, अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ । मैं अमुक अमुक $\quad$ पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण
अमुकके सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ, अमुक अमुक $\quad$ हूँ' फिर मैने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह
अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित $\quad$ कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और
भूःकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण $\quad$ आदित्यकी शरण हूँ' तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण
हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ।* वह मैंने $\quad$ हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और
जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण $\quad$ सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है ॥ १-७ ॥
भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ तथा मैंने जो
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ षोडश खण्ड
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ पुरुषकी यज्ञरूपमें उपासना
निश्चय पुरुष ही यज्ञ है । उसके (उसकी आयुके) जो $\quad$ मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह
चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातःसवन हैं । गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली $\quad$ उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥
है; और प्रातःसवन गायत्री-छन्दसे संबद्ध है। उस इस प्रातः- $\quad$ इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं ।
सवनके वसुगण अनुगत हैं । प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस $\quad$ जगती-छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन
सबको बसाये हुए हैं। यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे $\quad$ जगती-छन्दसे सम्बन्ध रखता है। इस सवनके आदित्यगण
कोई कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राण- $\quad$ अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण
रूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एक- $\quad$ विषयजातको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयु-
रूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओके मध्यमें $\quad$ में कोई [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये,
विछिन्न (नष्ट) न होऊँ।' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग $\quad$ 'हे प्राणरूप आदित्यगण ! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके
हो जाता है ॥ १-२ ॥ $\quad$ साथ एकीभूत कर दो । यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें
इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। $\quad$ विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर
त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन $\quad$ नीरोग हो जाता है ॥ ५-६ ॥
त्रिष्टुप्-छन्दसे सम्बद्ध है । उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण $\quad$ इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा
अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणि- $\quad$ था—'[अरे रोग !] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोग-
समुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमे कोई $\quad$ द्वारा मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष
[रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, $\quad$ जीवित रहा था, जो इस प्रकार इस सवन-विद्याको जानता है वह
'हे प्राणरूप रुद्रगण ! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय $\quad$ (नीरोग होकर) एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥
सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सप्तदश खण्ड
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ आत्मयज्ञके अन्य अङ्ग
वह [पुरुष] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो $\quad$ समानताको प्राप्त होते हैं। तथा जो तप, दान, आर्जव
पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण (प्रसन्न) नहीं $\quad$ (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा
होता—वही इसकी दीक्षा है। फिर वह जो खाता है, जो $\quad$ हैं। इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई'
पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी $\quad$ वह इसका पुनर्जन्म ही है, तथा मरण ही अवभृथस्नान है।
सदृशताको प्राप्त होता है। तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण $\quad$ घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन
करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुतशस्त्रकी ही $\quad$ सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन
- इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द आया है, वहाँ अपने पुत्रके नामको उच्चारण करना चाहिये ।
उ० सं० ५४-५५-
४२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
४२६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
हो गया था, कहा—'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रोंका जप पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश,
करना चाहिये ( १ ) तू अक्षित ( अक्षय ) है, ( २ ) अच्युत जो परब्रह्ममें स्थित परम तेज देदीप्यमान है, उसका है।
( अविनाशी ) है और ( ३ ) अति सूक्ष्म प्राण है।' तथा [ अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते
इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं। [ 'आदित्यप्रत्नस्य रेतसः' हैं—] अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते
यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है। हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें
इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है—'आदित्यप्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः प्रकाशवान् सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥१-७॥
पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि' इसका अर्थ यह है—]
अष्टादश खण्ड
मन और आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना
'मन ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करे । यह अध्यात्मदृष्टि ही मनोमय ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुरूप ज्योतिसे
है । तथा 'आकाश ब्रह्म है' यह अधिदैवत दृष्टि है। इस प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता है वह
प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया। कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ।
वह यह ( मनःसञ्ज्ञक ) ब्रह्म चार पादोंवाला है। वाक् पाद चक्षु ही मनःसञ्ज्ञक ब्रह्मका चौथा पाद है। वह आदित्यरूप
है, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है। यह ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता
अध्यात्म है। अब अधिदैवत कहते है—अग्नि पाद है, वायु है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता
पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद हैं। इस प्रकार है। श्रोत्र ही मनोरूप ब्रह्मका चौथा पाद है। वह दिशारूप
अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया जाता है। ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता
वाक् ही ब्रह्मका चौथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और
होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है वह कीर्ति, यश तपता है ॥ १-६ ॥
और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है। प्राण
एकोनविंश खण्ड
आदित्यकी ब्रह्मरूपमें उपासना
आदित्य ब्रह्म है—ऐसा उपदेश है, उसीकी व्याख्या की थीं, वे नदियाँ हैं तथा जो वस्तिगत जल था, वह समुद्र है।
जाती है। पहले यह असत् ही था । वह सत् ( कार्याभिमुख ) फिर उससे जो उत्पन्न हुआ, वह यह आदित्य है। उसके
हुआ। वह अङ्कुरित हुआ । वह एक अण्डेमें परिणत हो उत्पन्न होते ही बड़े जोरोंका शब्द हुआ तथा उसीसे सम्पूर्ण
गया। वह एक वर्षपर्यन्त उसी प्रकार पड़ा रहा । फिर वह प्राणी और सारे भोग हुए हैं। इसीसे उसका उदय और
फूटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत और सुवर्णरूप हो गये । अस्त होनेपर दीर्घ-शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं तथा सम्पूर्ण
उनमे जो खण्ड रजत हुआ, वह यह पृथिवी है और जो सुवर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं। वह जो इस प्रकार
हुआ, वह द्युलोक है। उस अण्डेका जो जरायु ( स्थूल जाननेवाला होकर आदित्यकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार
गर्भवेष्टन ) था [ वही ] वे पर्वत हैं, जो उल्ब ( सूक्ष्म उपासना करता है [ वह आदित्यरूप हो जाता है, तथा ]
गर्भवेष्टन ) था, वह मेघोंके सहित कुहरा है, जो धमनियां उसके समीप शीघ्र ही सुन्दर घोष आते हैं और उसे सुख देते
हैं, सुख देते हैं ॥ १-४॥
॥ तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥
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कल्याण
यज्ञशालामें उपस्ति
रैक्व और जानश्रुति
चतुर्थ अध्याय
ॐ
चतुर्थ अध्याय
प्रथम खण्ड
राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान
जो श्रद्धापूर्वक देनेवाला एव बहुत दान करनेवाला था और जिसके यहाँ [ दान करनेके लिये ] बहुत सा अन्न पकाया जाता था ऐसा कोई जनश्रुतके कुलमें उत्पन्न हुआ उसके पुत्रका पौत्र था। उसने, इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न खायेंगे, सर्वत्र निवासस्थान ( धर्मशालाएँ ) बनवा दिये थे ॥ १ ॥
उसी समय [ एक दिन ] रात्रिमे उधरसे हंस उड़कर गये। उनमेसे एक हंसने दूसरे हंससे कहा—'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष ! देख, जानश्रुति पौत्रायणका तेज द्युलोकके समान फैला हुआ है; तू उसका स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर डाले।' उससे दूसरे [अग्रगामी] हंसने कहा—'अरे ! तू किस महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ? क्या तू इसे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतलाता है ?' [ इसपर उसने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' 'जिस प्रकार [ द्यूतक्रीडामें ] कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उससे निम्न श्रेणीके सारे पासे हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रजा जो कुछ सत्कर्म करती है वह सब उस ( रैक्व ) को प्राप्त हो जाता है। जो बात वह रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जानता है, उसके विषयमें भी मुझसे यह कह दिया गया' ॥ २–४॥
इस बातको जानश्रुति पौत्रायणने सुन लिया। [ दूसरे दिन प्रातःकाल ] उठते ही उसने सेवकसे कहा—'अरे भैया ! तू गाड़ीवाले रैक्वके समान मेरी स्तुति क्या करता है ?' [ इसपर सेवकने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' [ राजाने कहा— ] 'जिस प्रकार कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उसके निम्नवर्ती समस्त पासे हो जाते हैं, उसी प्रकार उस रैक्वको, जो कुछ भी प्रजा सत्कर्म करती है, वह सब प्राप्त हो जाता है। तथा जो कुछ ( वह रैक्व ) जानता है, उसे जो कोई जानता है, वह भी इस कथनद्वारा मैंने बतला दिया' ॥ ५-६ ॥
वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर 'मैं उसे नहीं पा सका' ऐसा कहता हुआ लौट आया । तब उससे राजाने कहा—'अरे ! जहाँ ब्राह्मणकी खोज की जाती है वहाँ उसके पास जा ।' उसने एक छकड़ेके नीचे खाज खुजलाते हुए [ रैक्वको देखा ]। वह रैक्वके पास बैठ गया और बोला—'भगवन् ! क्या आप ही गाड़ीवाले रैक्व हैं ?' रैक्वने 'अरे ! हाँ, मैं ही हूँ' ऐसा कहकर स्वीकार किया। तब वह सेवक यह समझकर कि 'मैने उसे पहचान लिया है' लौट आया ॥७-८॥
द्वितीय खण्ड
जानश्रुतिको रैक्वके पास उपदेशके लिये जाना
तब वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, एक हार और एक खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ लेकर उसके पास आया और बोला—'रैक्व ! ये छः सौ गौएँ, यह हार और यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ मैं आपके लिये लाया हूँ। आप इस धनको स्वीकार कीजिये और भगवन् ! आप मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी आप उपासना करते हैं।' उस रैक्वने कहा—'अरे शूद्र ! गौओंके सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे।' तब वह जानश्रुति पौत्रायण एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और अपनी कन्या—इतना धन लेकर फिर उसके पास आया और उससे बोला—'रैक्व ! ये एक सहस्र गौएँ, यह हार, यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ, यह पत्नी और यह ग्राम, जिसमें कि आप रहते हैं, स्वीकार कीजिये और भगवन् ! मुझे अवश्य उपदेश कीजिये।' तब उस ( राजकन्या ) के मुखको ही [ विद्याग्रहणका द्वार ] समझते हुए रैक्वने कहा—'अरे शूद्र ! तू ये ( गौएँ आदि ) लाया है [ सो ठीक है, ] तू इस विद्याग्रहणके द्वारसे ही मुझसे भाषण कराता है।' इस प्रकार जहाँ वह रैक्व रहता था, वहाँ रैक्वपर्णनामक ग्राम महावृष देशमें प्रसिद्ध है। तब उसने उससे कहा ॥ १–५ ॥
तृतीय खण्ड
वायु और प्राणकी उपासना
वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन होता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है, और जब चन्द्रमा अस्त होता है तो वायुमे ही लीन हो जाता है। जिस समय जल सूखता है वह वायुमें ही लीन,
[ अध्याय ४
[ अध्याय ४
४२८
- छान्दोग्योपनिषद् *
हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमे लीन कर लेता
है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥ १ २ ॥
अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—प्राण ही सवर्ग है ।
जिस समय यह पुरुष सोता है, प्राणको ही वागिन्द्रिय प्राप्त
हो जाती है, प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको
ही मन प्राप्त हो जाता है । प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन
कर लेता है । वे ये दो ही सवर्ग हैं—देवताओंमें वायु और
इन्द्रियोंमें प्राण ॥ ३-४ ॥
एक बार कपिगोत्रज शौनक और कक्षरसेनके पुत्र
अभिप्रतारीसे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था, एक
ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी, किंतु उन्होंने उसे भिक्षा नहीं दी ।
तब उसने कहा—'भुवनोंकेरक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार
महात्माओको ग्रस लिया है । कापेय ! अभिप्रतारिन् ! मनुष्य
अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं
देखते, तथा जिसके [ब्रह्मचारीके रूपमें आये हुए भगवान्के]
लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ।' उस वाक्यका
कपिगोत्रोत्पन्न शौनकरने मनन किया और फिर उस [ब्रह्मचारी]
के पास आकर कहा—'जो देवताओका आत्मा, प्रजाओंका
उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी
बड़ी महिमा कही गयी है, जो स्वयं दूसरेसे न खाया जानेवाला
और जो वस्तुतः अन्न नहीं है उनको भी भक्षण कर जाता
है, ब्रह्मचारिन् ! उसीकी हम उपासना करते हैं।' [ ऐसा कह-
कर उसने सेवकोको आज्ञा दी कि ] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा
दो' ॥ ५-७ ॥
तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी । वे ये [ अग्न्यादि और
वायु ] पाँच [ वागादिसे ] अन्य हैं तथा इनसे [ वागादि
और प्राण ] ये पाँच अन्य हैं । इस प्रकार ये सब दस होते
हैं । ये दस कृत ( कृतनामक पासेमे उपलक्षित द्यूत ) हैं ।
अत सम्पूर्ण दिशाओमे ये अन्न ही दस कृत हैं । यह विराट् ही
अन्नादी ( अन्न भक्षण करनेवाला ) है । उसके द्वारा यह सब
देखा जाता है । जो ऐसा जानता है उसके द्वारा यह सब
देख लिया जाता है और वह अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥८॥
चतुर्थ खण्ड
जवालापुत्र सत्यकामद्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन
जवालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जवालाको
सम्बोधित करके निवेदन किया—'पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक
[ गुरुकुलमे ] निवास करना चाहता हूँ, बता मैं किस
गोत्रवाला हूँ ?' उसने उससे कहा—'हे बेटा ! तू जिस
गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । युवावस्था में, जब कि मै
बहुत कार्य करनेवाली परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया
था । मै यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मै तो
जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अत तू
अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना ।' उसने हारिद्रुमत
गौतमके पास जाकर कहा—'मैं पूज्य श्रीमान्के यहाँ ब्रह्मचर्य-
पूर्वक वास करूँगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ।'
उससे [ गौतमने ] कहा—'सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?'
उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं
जानता । मैने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया
कि 'युवावस्था मे, जब कि मैं बहुत काम धन्धा करनेवाली
परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया था । म यह नही जानती
कि तू किस गोत्रवाला है ? म जबाला नामवाली हूँ और तू
सत्यकाम नामवाला है।' अतः गुरो ! मे सत्यकाम जाबाल
हूँ।' उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर
नहीं कर सकता । अत. सोम्य ! तू समिधा ले आ, मै तेरा
उपनयन कर दूँगा, क्योंकि तूने सत्यका त्याग नही किया ।'
तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ
अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे
जा ।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र
गायें हुए बिना में नहीं लोटूँगा ।' जबतक कि वे एक सहस्र
हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमे ही रहा ॥ १-५ ॥
पञ्चम खण्ड
सत्यकामको वृषभद्वारा ब्रह्मके एक पादका उपदेश
तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने
'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला—] 'हे सोम्य !
हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमे आचार्यकुलमें पहुँचा
दे ।' [ साँडने कहा ] '[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद
बतलाऊँ ?' तब [ सत्यकामने ] कहा—'भगवन् ! मुझे
[ अवश्य ] बतलावे ।' साँड उससे बोला—'पूर्व दिक्कला,
खण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२९
पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना
सोम्य ! यह ब्रह्मका 'प्रकाशवान्' नामक चार कलाओंवाला करता है, इस लोकमें प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान्
पाद है।' वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके लोकोंको जीत लेता है ॥ १-३ ॥
षष्ठ खण्ड
अग्निद्वारा द्वितीय पादका उपदेश
'अग्नि तुझे [ दूसरा ] पाद बतलावेगा'—ऐसा कहकर तब ] [ सत्यकामने कहा-] 'भगवन् ! मुझे [ अवश्य ]
ऋषभ मौन हो गया । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुल- बतलावें ।' तब उसने उससे कहा-'पृथ्वी कला है, अन्तरिक्ष
की ओर हाँक दिया । वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है । सोम्य ! यह
अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है।' वह, जो
पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी
ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया । 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें
'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [अग्निने कहा, अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है।१-४।
सप्तम खण्ड
हंसद्वारा तृतीय पादका उपदेश
'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि [ सत्यकाम बोला--] 'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब वह
निवृत्त हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी उससे बोला-'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है
ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह और विद्युत् कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है।' जो कोई इसे इस प्रकार जानने-
अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा । तब हंसने उसके समीप वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे
उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता
[ इसने कहा— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४॥
अष्टम खण्ड
मद्गुद्वारा चतुर्थ पादका उपदेश
'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर [ सत्यकाम बोला-] 'भगवन् ! मुझे अवश्य बतलावें ।' वह
हंस चला गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर उससे बोला-'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है
हाँक दिया। वे सायकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि और मन कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे 'आयतनवान्' नामवाला है।' वह, जो इसे इस प्रकार जानने-
पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । मद्गुने उसके पास उतरकर वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे
कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें आयतनवान् होता
[ मद्गु बोला— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४ ॥
नवम खण्ड
सत्यकामका आचार्यसे पुनः उपदेश-ग्रहण
सत्यकाम आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा- तू ब्रह्मवेत्ता-सा दिखलायी दे रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया
'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' 'सोम्य ! है ?' ऐसा [ आचार्यने पूछा ] । तब उसने उत्तर दिया,
४३० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
४३० * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ४
'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी
इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें।
मैंने श्रीमान् जैसे ऋषियोंसे सुना है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या
ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है।' तब आचार्यने उसे उसी
विद्याका उपदेश किया। उसमें कुछ भी न्यून नहीं हुआ, न्यून
नहीं हुआ [अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही ] ॥ १-३ ॥
दशम खण्ड
उपकोसलको अग्नियोंद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश
उपकोसल नामसे प्रसिद्ध कमलका पुत्र सत्यकाम जाबालके
यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्षतक
उस आचार्यके अग्नियोंकी सेवा की, किंतु आचार्यने अन्य
ब्रह्मचारियोंका तो समावर्तन संस्कार कर दिया, किंतु केवल
इसीका नहीं किया। आचार्यसे उसकी भार्या ने कहा- 'यह
ब्रह्मचारी खूब तपस्या कर चुका है, इसने अच्छी तरह अग्नियों-
की सेवा की है। देखिये, अग्नियां आपकी निन्दा न करें। अतः
इसे विद्याका उपदेश कर दीजिये।' किंतु वह उसे उपदेश
किये बिना ही बाहर चला गया। उस उपकोसलने मानसिक
खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने
कहा- 'अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन
करता ?' वह बोला-'माताजी ! इस मनुष्यमें अनेक ओर
जानेवाली बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं। मैं व्याधियोंसे परिपूर्ण
हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा' ॥ १-३ ॥
फिर अग्नियोंने एकत्रित होकर कहा- 'यह ब्रह्मचारी
तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है।
अच्छा, हम इसे उपदेश करें' ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले-
'प्राण' ब्रह्म है, 'कं' ब्रह्म है, 'खं' ब्रह्म है। वह बोला-'यह
तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; किंतु 'कं' और 'ख' को
नहीं जानता।' तब वे बोले- 'निश्चय जो 'कं' है वही 'ख'
है और जो 'ख' है वही 'कं' है।' इस प्रकार उन्होंने उसे
प्राण और उसके [आश्रयभूत] आकाशका उपदेश किया ॥४-५॥
एकादश खण्ड
अकेले गार्हपत्याग्निद्वारा शिक्षा
फिर उसे गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी- 'पृथ्वी, अग्नि, अन्न
और आदित्य-ये मेरे चार शरीर हैं। आदित्यके अन्तर्गत जो
यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष,
जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, पापकर्मोंको
नष्ट कर देता है, अभिलोकान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त
होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती
पुरुष क्षीण नहीं होते। तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी
उपासना करता है उसका हम इस लोक और परलोकमें भी
पालन करते हैं ॥ १-२ ॥
द्वादश खण्ड
अन्वाहार्यपचन नामक दूसरे अग्निद्वारा शिक्षा
फिर उसे अन्वाहार्यपचनने शिक्षा दी- 'जल, दिशा,
नक्षत्र और चन्द्रमा-ये मेरे चार शरीर हैं। चन्द्रमामें जो यह
पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष, जो
इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि)
की उपासना करता है, पापकर्मोंका नाश कर देता है, लोकवान्
होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन
व्यतीत करता है। उसके पीछे होनेवाले पुरुष क्षीण नहीं होते
तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है
हम उसका इस लोक और परलोकमें भी पालन करते
हैं ॥ १-२ ॥
त्रयोदश खण्ड
ॐ आहवनीय-अग्निद्वारा शिक्षा
तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया- 'प्राण,
आकाश, द्युलोक और विद्युत्-ये मेरे चार शरीर हैं। यह
जो विद्युत्में पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।'
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें
विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मों को नष्ट कर देता
है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उज्ज्वल
जीवन व्यतीत करता है। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी
उपासना करता है, उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते
तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते
हैं ॥ १-२॥