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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

११२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

११२कठोपनिषद्[ अध्याय २

| एव प्रतिशरीरं पश्यंस्तानेव शरीरभेदानुवर्तिनोऽनुविधावति। शरीरभेदमेव पृथक्पुनः पुनः प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ १४ ॥ | वाला मनुष्य उन्हीं—शरीरभेदका अनुसरण करनेवालोंकी ओर ही जाता है, अर्थात् बारम्बार भिन्न-भिन्न शरीरभेदको ही प्राप्त होता है॥ १४॥ |


| यस्य पुनर्विद्यावतो विध्वस्तोपाधिकृतभेददर्शनस्य विशुद्धविज्ञानघनैकरसमद्वयमात्मानं पश्यतो विजानतो मुनेर्मननशीलस्य आत्मस्वरूपं कथं सम्भवतीत्युच्यते— | जो विद्यावान् है, जिसकी उपाधिकृत भेददृष्टि नष्ट हो गयी है और जो एकमात्र विशुद्धविज्ञानघनैकरस अद्वितीय आत्माको ही देखनेवाला है उस विज्ञानी मुनि—मननशीलका आत्मा कैसा होता है ? यह बतलाया जाता है— |

अभेददर्शनकी कर्तव्यता

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥

जिस प्रकार शुद्ध जलमें डाला हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है उसी प्रकार, हे गौतम ! विज्ञानी मुनिका आत्मा भी हो जाता है ॥१५॥

| यथोदकं शुद्धे प्रसन्ने शुद्धं प्रसन्नमासिक्तं प्रक्षिप्तमेकरसमेव नान्यथा तादृगेव भवत्यात्माप्येवमेव भवत्येकत्वं विजानतो मुनेर्मननशीलस्य हे गौतम । | जिस प्रकार शुद्ध—स्वच्छ जलमें आसिक्त—प्रक्षिप्त ( डाला हुआ ) शुद्ध—स्वच्छ जल उसके साथ मिलकर एकरस हो जाता है—उससे विपरीत अवस्थामें नहीं रहता उसी प्रकार हे गौतम ! एकत्वको जाननेवाले मुनि—मननशील पुरुषका आत्मा भी वैसा |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३


| तस्मात्कुतार्किकभेददृष्टिं नास्तिक- <br> कुदृष्टिं चोज्झित्वा मातृपितृसहस्रे- <br> भ्योऽपि हितैषिणा वेदेनोपदिष्टम् <br> आत्मैकत्वदर्शनं शान्तदर्पैः <br> आदरणीयमित्यर्थः ॥ १५ ॥ | ही हो जाता है। अतः तात्पर्य यह है कि सभीको कुतार्किककी भेददृष्टि और नास्तिककी कुदृष्टिका परित्याग कर सहस्रों माता-पिताओंसे भी अधिक हितैषी वेदके उपदेश किये हुए आत्मैकत्वदर्शनका ही अभिमानरहित होकर आदर करना चाहिये ॥ १५॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशंकरभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ १॥ (४)

११४ कठोपनिषद् [ अध्याय २

११४ कठोपनिषद् [ अध्याय २

द्वितीया वल्ली

प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान

पुनरपि प्रकारान्तरेण ब्रह्मतत्त्वनिर्धारणार्थोऽयमारम्भो दुर्विज्ञेयत्वाद्व्रह्मणः।ब्रह्म अत्यन्त दुर्विज्ञेय है; अतः ब्रह्मतत्त्वका प्रकारान्तरसे फिर भी निश्चय करनेके लिये यह आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—

पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥१॥

उस नित्यविज्ञानस्वरूप अजन्मा [ आत्मा ] का पुर ग्यारह दरवाजोंवाला है । उस [ आत्मा ] का ध्यान करनेपर मनुष्य शोक नहीं करता, और वह [ इस शरीरके रहते हुए ही कर्मबन्धनसे ] मुक्त हुआ ही मुक्त हो जाता है । निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ १ ॥

शरीरस्य ब्रह्मपुरत्वम्<br><br>पुरं पुरमिव पुरम् । द्वारपालाधिष्ठात्राद्यनेकपुरोपकरणसम्पत्तिदर्शनाच्छरीरं पुरम् । पुरं च सोपकरणं स्वात्मनासंहतस्वतन्त्रस्वाम्यर्थं दृष्टम् ; तथेदं पुरसामान्यादनेकोपकरणसंहतं[यह शरीररूप] पुर पुरके समान होनेसे पुर कहलाता है । द्वारपाल और अधिष्ठाता (हाकिम) आदि अनेकों पुरसम्बन्धी सामग्री दिखायी देनेके कारण शरीर पुर है । और जिस प्रकार सम्पूर्ण सामग्रीके सहित प्रत्येक पुर अपनेसे असंहत (बिना मिले हुए) स्वतन्त्र स्वामीके [उपभोगके] लिये देखा जाता है उसी प्रकार पुरसे सदृशता होनेके कारण यह अनेक सामग्री-

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
शरीरं स्वात्मनासंहतराजस्थानीयस्वाम्यर्थं भवितुमर्हति ।सम्पन्न शरीर भी अपनेसे पृथक् राजस्थानीय अपने स्वामी [आत्मा] के लिये होना चाहिये ।
तच्चेदं शरीराख्यं पुरमेकादशद्वारमेकादश द्वाराण्यस्य सप्त शीर्षण्यानि नाभ्या सहावार्श्वि त्रीणि शिरस्येकं तैरेकादशद्वारं पुरम् ।यह शरीर नामक पुर ग्यारह दरवाज़ोंवाला है । [दो आँख, दो कान, दो नासारन्ध्र और एक मुख इस प्रकार] सात मस्तकसम्वन्धी, नाभिके सहित [शिश्न और गुदा मिलाकर] तीन निम्नदेशीय तथा [ब्रह्मरन्ध्ररूप] एक शिरमें रहनेवाला—इस प्रकार इन सभी द्वारोंसे [युक्त होनेके कारण] यह पुर एकादश द्वारवाला है ।
कस्याजस्य जन्मादिविक्रियारहितस्यात्मनो राजस्थानीयस्य पुरधर्मविलक्षणस्य । अवक्रचेतसः अवक्रमकुटिलमादित्यप्रकाशवन्नित्यमेवावस्थितमेकरूपं चेतो विज्ञानमस्येत्यवक्रचेतास्तस्यावक्रचेतसो राजस्थानीयस्य ब्रह्मणः ।वह पुर किसका है ? [इसपर कहते हैं—] अजका, अर्थात् पुरके धर्मोंसे विलक्षण जन्मादि विकाररहित राजस्थानीय आत्माका । इसके सिवा जो अवक्रचित्त है—जिसका चित्त—विज्ञान अवक्र—अकुटिल अर्थात् सूर्यके समान नित्यस्थित और एकरूप है उस अवक्रचेता राजस्थानीय ब्रह्मका [यह पुर है] ।
(स्वात्मानुभवेन शोकादिनिवृत्तिः)<br>यस्येदं पुरं तं परमेश्वरं पुरस्वामिनमनुष्ठाय ध्यात्वा—ध्यानं हि तस्यानुष्ठानं सम्यग्विज्ञानपूर्वकम्—तं सर्वैषणाविनिर्मुक्तः सन्समं सर्वभूतस्थंजिसका यह पुर है उस पुरस्वामी परमेश्वरका अनुष्ठान—ध्यान करके, क्योंकि सम्यग्विज्ञानपूर्वक ध्यान ही उसका अनुष्ठान है; अतः सम्पूर्ण एषणाओंसे मुक्त होकर उस सम—सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित ब्रह्मका ध्यान

११६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

११६कठोपनिषद्[ अध्याय २

| ध्यात्वा न शोचति । तद्विज्ञानात् अभयप्राप्तेः शोकावसराभावात् कुतो भयेक्षा । इहैवाविद्याकृत-कामकर्मबन्धनैर्विमुक्तो भवति । विमुक्तश्च सन्विमुच्यते पुनः शरीरं न गृह्णातीत्यर्थः ॥ १ ॥ | कर पुरुष शोक नहीं करता । ब्रह्मके विज्ञानसे अभय-प्राप्ति होती है; अतः शोकका अवसर न रहनेके कारण भयदर्शन भी कहाँ हो सकता है ? अतः वह इस लोकमें ही अविद्याकृत काम और कर्मके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है । इस प्रकार वह मुक्त (जीवन्मुक्त) हुआ ही मुक्त (विदेहमुक्त) होता है; अर्थात् पुनः शरीर ग्रहण नहीं करता ॥१॥ |


| स तु नैकशरीरपुरवर्त्येवात्मा किं तर्हि सर्वपुरवर्ती । कथम्— | परन्तु वह आत्मा तो केवल एक ही शरीररूप पुरमें रहनेवाला नहीं है, बल्कि सभी पुरोंमें रहता है । किस प्रकार रहता है ? [सो कहते हैं—] |

हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसद् ऋतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥

वह गमन करनेवाला है, आकाशमें चलनेवाला सूर्य<sup>रूप</sup> है, अन्तरिक्षमें विचरनेवाला सर्वव्यापक वायु है, वेदी (पृथिवी) में स्थित होता (अग्नि) है, कलशमें स्थित सोम है। इसी प्रकार वह मनुष्योंमें गमन करनेवाला, देवताओंमें जानेवाला, सत्य या यज्ञमें गमन करनेवाला, आकाशमें जानेवाला, जल पृथिवी यज्ञ और पर्वतोंसे उत्पन्न होनेवाला तथा सत्यस्वरूप और महान् है ॥ २ ॥

वल्ली २ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७

वल्ली २ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७


| [आत्मनः सर्व-पुरान्तर्वर्तित्वम्] हंसो हन्ति गच्छतीति । शुचिपच्छुचौदिव्यादित्यात्मना सीदति इति । वसुर्वासयति सर्वानिति । वाय्वात्मानन्तरिक्षे सीदतीत्यन्तरिक्षसत् । होताग्निः “अग्निर्वैहोता” इति श्रुतेः। वेद्यां पृथिव्यां सीदतीति वेदिषद् । “इयं वेदिः परोऽन्तः पृथिव्याः” (ऋ० सं० २।३।२०) इत्यादिमन्त्रवर्णात् । अतिथिः सोमः सन्दुरोणे कलशे सीदति इति दुरोणसत् । ब्राह्मणः अतिथिरूपेण वा दुरोणेषु गृहेषु सीदतीति ।<br><br>नृषन्नृषु मनुष्येषु सीदतीति नृषत् । वरसद् वरेषु देवेषु सीदतीति ऋतसद्धृतं सत्यं यज्ञो वा तस्मिन्सीदतीति । व्योमसद् व्योम्न्याकाशे सीदतीति व्योमसत् । अब्जा अप्सु शङ्खशुक्तिमकरादिरूपेण जायत इति । | वह गमन करता है इसलिये ‘हंस’ है, शुचि—आकाशमें सूर्यरूपसे चलता है इसलिये ‘शुचिपत्’ है, सबको व्याप्त करता है इसलिये ‘वसु’ है, वायुरूपसे आकाशमें चलता है इसलिये ‘अन्तरिक्षसत्’ है, “अग्नि ही होता है” इस श्रुतिके अनुसार ‘होता’ अग्निको कहते हैं, वेदी—पृथिवीमें गमन करता है अतः ‘वेदिषद्’ है, जैसा कि “यह वेदी पृथिवी (यज्ञभूमि) का उत्कृष्ट मध्यभाग है” इत्यादि मन्त्रवर्णसे प्रमाणित होता है। यह अतिथि—सोम होकर दुरोण—कलशमें स्थित होता है इसलिये ‘दुरोणसत्’ है। अथवा ब्राह्मण अतिथिरूपसे दुरोण—घरोंमें रहता है इसलिये वही ‘अतिथिः दुरोणसत्’ है।<br><br>वह मनुष्योंमें जाता है इसलिये ‘नृषत्’ है, वर—देवताओंमें जाता है इसलिये ‘वरसत्’ है, ऋत—सत्य अथवा यज्ञको कहते हैं उसमें गमन करता है इसलिये ‘ऋतसत्’ है, व्योम—आकाशमें चलता है इसलिये ‘व्योमसत्’ है। अप्—जलमें शंख, सीपी और मकर आदि रूपोंसे उत्पन्न होता है इसलिये |

२१८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

२१८कठोपनिषद्[ अध्याय २

| गोजा गवि पृथिव्यां व्रीहियवादि-रूपेण जायत इति । ऋतजा यज्ञाङ्गरूपेण जायत इति । अद्रिजाः पर्वतेभ्यो नद्यादिरूपेण जायत इति ।<br><br>सर्वात्मापि सन्नृतमवितथस्वभाव एव । बृहन्महान्सर्वकारणत्वात् । यदाप्यादित्य एव मन्त्रेणोच्यते तदाप्यात्मस्वरूपत्वमादित्यस्येत्यङ्गीकृतत्वाद् ब्राह्मणव्याख्यानेऽप्यविरोधः । सर्वव्याप्येक एवात्मा जगतो नात्मभेद इति मन्त्रार्थः ॥२॥ | ‘अब्जा’ है । गो—पृथिवीमें व्रीहि—यवादिरूपसे उत्पन्न होता है इसलिये ‘गोजा’ है । ऋत—यज्ञाङ्गरूपसे उत्पन्न होता है इसलिये ‘ऋतजा’ है । नदी आदिरूपसे अद्रि—पर्वतोंसे उत्पन्न होता है इसलिये ‘अद्रिजा’ है ।<br><br>इस प्रकार सर्वात्मा होकर भी वह ऋत—अवितथस्वभाव ही है तथा सबका कारण होनेसे बृहत्—महान् है । [असौ वा आदित्यो हंसः········इत्यादि ब्राह्मणमन्त्रके अनुसार] यदि इस मन्त्रसे आदित्यका ही वर्णन किया गया हो तो भी ‘आदित्य [इस चराचरके] आत्मस्वरूप हैं’<sup></sup>, ऐसा अङ्गीकृत होनेके कारण इसका उस ब्राह्मणग्रन्थकी व्याख्यासे भी अविरोध ही है । अतः इस मन्त्रका तात्पर्य यही है कि जगत्‌का एक ही सर्वव्यापक आत्मा है, आत्माओंमें भेद नहीं है ॥ २ ॥ | | आत्मनः स्वरूपाधिगमे लिङ्गमुच्यते— | अब आत्माका स्वरूपज्ञान करानेमें लिङ्ग बतलाते हैं— |


१. सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ( ऋ० सं० १ । ८ । ७) ।

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ ९

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११ ९


ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥

जो प्राणको ऊपरकी ओर ले जाता है और अपानको नीचेकी ओर ढकेलता है, हृदयके मध्यमें रहनेवाले उस वामन—भजनीयकी सब देव उपासना करते हैं ॥ ३ ॥

| [आत्मनः प्राणापानयोः अधिष्ठातृत्वम्]<br><br>ऊर्ध्वं हृदयात्प्राणं प्राणवृत्तिं वायुमुन्नयत्यूर्ध्वं गमयति। तथापानं प्रत्यगधोऽस्यति क्षिपति य इति वाक्यशेषः। तं मध्ये हृदयपुण्डरीकाकाश आसीनं बुद्धावभिव्यक्तविज्ञानप्रकाशं वामनं संभजनीयं सर्वे विश्वे देवाश्चक्षुरादयः प्राणा रूपादिविज्ञानं बलिमुपहरन्तो विश इव राजानमुपासते तादर्थ्येनानुपरतव्यापारा भवन्ति इत्यर्थः । यदर्था यत्प्रयुक्ताश्च सर्वे वायुकरणव्यापाराः सोऽन्यः सिद्ध इति वाक्यार्थः ॥ ३ ॥ | जो हृदयदेशसे प्राण—प्राणवृत्तिरूप वायुको ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर ले जाता है तथा अपानको प्रत्यक्—नीचेकी ओर ढकेलता है। इस वाक्यमें 'यः (जो)' यह पद शेष रह गया है, हृदयकमलाकाशके भीतर रहनेवाले उस वामन अर्थात् भजनीयकी, जिसका विज्ञानरूप प्रकाश बुद्धिमें अभिव्यक्त होता है, चक्षु आदि सभी देव—इन्द्रियाँ और प्राण रूप-रसादि विज्ञानरूप कर देते हुए इस प्रकार उपासना करते हैं जैसे वैश्यलोग राजाकी अर्थात् वे चक्षु आदि उसके ही लिये अपना व्यापार बन्द नहीं करते। अतः जिसके लिये और जिसकी प्रेरणासे प्राण और इन्द्रियोंके समस्त व्यापार होते हैं वह उनसे अन्य है—ऐसा सिद्ध हुआ। यही इस वाक्यका अर्थ है ॥ ३ ॥ |

कठो० ५—

१२० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२०कठोपनिषद्[ अध्याय २

देहस्थ आत्मा ही जीवन है

अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥

इस शरीरस्थ देहीके भ्रष्ट हो जानेपर—इस देहसे मुक्त हो जानेपर भला इस शरीरमें क्या रह जाता है ? [ अर्थात् कुछ भी नहीं रहता ] यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ ४ ॥

किं चतथा
अस्य शरीरस्थस्यात्मनो विस्रंसमानस्यावस्रंसमानस्य भ्रंशमानस्य देहिनो देहवतः; विस्रंसनशब्दार्थमाह—देहाद्विमुच्यमानस्येति किमत्र परिशिष्यते प्राणादिकलापे न किञ्चन परिशिष्यतेऽत्र देहे पुरस्वामिनिविद्रवण इव पुरवासिनां यस्यात्मनोऽपगमे क्षणमात्रात्कार्यकरणकलापरूपं सर्वमिदं हतबलं विध्वस्तं भवति विनष्टं भवति सोऽन्यः सिद्धः॥४॥इस शरीरस्थ देही—देहवान् आत्माके विस्रंसमान—अवस्रंसमान अर्थात् भ्रष्ट हो जानेपर इस प्राणादि समुदायमेंसे भला क्या रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं रहता। 'देहाद्विमुच्यमानस्य' ऐसा कहकर विस्रंसन शब्दका अर्थ बतलाया गया है। नगरके स्वामीके चले जानेपर जैसे पुरवासियोंकी दुर्दशा होती है उसी प्रकार इस शरीरमें, जिस आत्माके चले जानेपर, एक क्षणमें ही यह भूत और इन्द्रियोंका समुदायरूप सबका सब बलहीन–विध्वस्त अर्थात् नष्ट हो जाता है वह इससे भिन्न ही सिद्ध होता है ॥ ४ ॥

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१


स्यान्मतं प्राणापानाद्यपगमात् एवेदं विध्वस्तं भवति न तु तद्व्यतिरिक्तात्मापगमात्प्राणादिभिरेव हि मर्त्यो जीवतीति नैतदस्ति—यदि कोई ऐसा माने कि यह शरीर, प्राण और अपान आदिके चले जानेसे ही नष्ट हो जाता है, उनसे भिन्न किसी आत्माके जानेसे नहीं, क्योंकि प्राणादिके कारण ही मनुष्य जीवित रहता है—तो ऐसी बात नहीं है, [क्योंकि—]

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥

कोई भी मनुष्य न तो प्राणसे जीवित रहता है और न अपानसे ही। बल्कि वे तो, जिसमें ये दोनों आश्रित हैं ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ॥ ५ ॥

न प्राणेन नापानेन चक्षुरादिना वा मर्त्यो मनुष्यो देहवान्कश्चन जीवति न कोऽपि जीवति न ह्येषां परार्थानां संहत्यकारित्वाज्जीवनहेतुत्वमुपपद्यते । स्वार्थेनासंहतेन परेण केनचिदप्रयुक्तं संहतानामवस्थानं न दृष्टं गृहादीनां लोके; तथा प्राणादीनामपि संहतत्वाद्भवितुमर्हति ।कोई भी मर्त्य—मनुष्य अर्थात् देहधारी न तो प्राणसे जीवित रहता है और न अपान अथवा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ही, क्योंकि परस्पर मिलकर प्रवृत्त होनेवाले तथा किसी दूसरेके शेषभूत ये इन्द्रिय आदि जीवनके हेतु नहीं हो सकते। लोकमें किसी स्वतन्त्र और बिना मिले हुए अन्य [चेतन पदार्थ] की प्रेरणाके बिना गृह आदि संहत पदार्थोंकी स्थिति नहीं देखी गयी; उसी तरह संघातरूप होनेसे प्राणादिकी स्थिति भी स्वतन्त्र नहीं हो सकती।

| १२२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |

१२२कठोपनिषद्[ अध्याय २

| अत इतरेणैव संहतप्राणादि-विलक्षणेन तु सर्वे संहताः सन्तो जीवन्ति प्राणान्धारयन्ति । यस्मिन्संहतविलक्षण आत्मनि सति परस्मिन्नेतौ प्राणापानौ चक्षुरादिभिः संहतावुपाश्रितौ, यस्यासंहतस्यार्थे प्राणापानादिः स्वव्यापारं कुर्वन्प्रवर्तते संहतः सन्स ततोऽन्यः सिद्ध इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥ | अतः ये सब परस्पर मिलकर प्राणादि संहत पदार्थोंसे भिन्न किसी अन्यके द्वारा ही जीवित रहते—प्राण धारण करते हैं, जिस संहत पदार्थभिन्न सत्स्वरूप परमात्माके रहते हुए ही यह प्राण-अपान चक्षु आदिसे संहत होकर आश्रित हैं; तात्पर्य यह है कि जिस असंहत आत्माके लिये प्राण-अपान आदि संहत होकर अपने व्यापारोंको करते हुए बर्तते हैं वह आत्मा उनसे भिन्न सिद्ध होता है ॥ ५ ॥ |


मरणोत्तर कालमें जीवकी गति

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥

हे गौतम ! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन करूँगा, तथा [ ब्रह्मको न जाननेसे ] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है [ वह भी बतलाऊँगा ] ॥ ६ ॥


| हन्तेदानीं पुनरपि ते तुभ्यम् इदं गुह्यं गोप्यं ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं प्रवक्ष्यामि यद्विज्ञानात् सर्वसंसारोपरमो भवति, अविज्ञानाच्च यस्य मरणं प्राप्य | अहो ! अब मैं तुम्हें फिर भी इस गुह्य—गोपनीय सनातन—चिरन्तन ब्रह्मके विषयमें बतलाऊँगा, जिसके ज्ञानसे सम्पूर्ण संसारकी निवृत्ति हो जाती है तथा जिसका ज्ञान न होनेपर मरणको प्राप्त होनेके अनन्तर आत्मा जैसा हो |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३


यथात्मा भवति यथा संसरति तथा शृणु हे गौतम ॥ ६ ॥जाता है, अर्थात् वह जिस प्रकार [जन्म-मरणरूप] संसारको प्राप्त होता है, हे गौतम ! वह सुन ॥ ६ ॥

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।

स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥

अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर-भावको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥

योनिं योनिद्वारं शुक्रवीजसमन्विताः सन्तोऽन्ये केचिद् अविद्यावन्तो मूढाः प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय शरीरग्रहणार्थं देहिनो देहवन्तः; योनिं विशन्तीत्यर्थः । स्थाणुं वृक्षादिस्थावरभावम् अन्येऽत्यन्ताधमा मरणं प्राप्यानुसंयन्त्यनुगच्छन्ति । यथाकर्म यद्यस्य कर्म तद्यथाकर्म यैर्य्यादृशं कर्मेह जन्मनि कृतं तद्वशेनैत्येतत् । तथा च यथाश्रुतं यादृशं च विज्ञानमुपार्जितं तदनुरूपमेव शरीरं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः ।अन्य—कुछ अविद्यावान् मूढ देहधारी शरीर धारण करनेके लिये वीर्यरूप बीजसे संयुक्त होकर योनि—योनिद्वारको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसी योनिमें प्रविष्ट हो जाते हैं। दूसरे कोई अत्यन्त अधम पुरुष मरणको प्राप्त होकर [यथा-कर्म और यथाश्रुत] स्थाणु यानी वृक्षादि स्थावर-भावका अनुवर्तन—अनुगमन करते हैं। तात्पर्य यह कि यथाकर्म यानी जिसका जो कर्म है अथवा इस जन्ममें जिसने जैसा कर्म किया है उसके अधीन होकर तथा यथाश्रुत यानी जिसने जैसा विज्ञान उपार्जित किया है उसके अनुरूप शरीरको ही प्राप्त होते

१२४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२४कठोपनिषद्[ अध्याय २

| “यथाप्रज्ञं हि संभवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥ ७ ॥ | हैं । “जन्म अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार हुआ करते हैं” ऐसी एक दूसरी श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥ ७ ॥ |

| यत्प्रतिज्ञातं गुह्यं ब्रह्म वक्ष्यामीति तदाह— | पहले जो यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं तुझे गुह्य ब्रह्म बतलाऊँगा’ उसे ही बतलाते हैं— |

गुह्य ब्रह्मोपदेश

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः
श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥

प्राणादिके सो जानेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थोंकी रचना करता हुआ जागता रहता है वही शुक्र (शुद्ध) है, वह ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है । उसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं; कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥८॥

| य एष सुप्तेषु प्राणादिषु जागर्ति न स्वपिति । कथम् ? कामं कामं तं तमभिप्रेतं स्त्र्याद्यर्थमविद्यया निर्मिमाणो निष्पादयञ्जागर्ति पुरुषो यस्तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं तद्ब्रह्म नान्यद्गुह्यं | जो यह प्राणादिके सो जानेपर जागता रहता है—[उनके साथ] सोता नहीं है । किस प्रकार जागता रहता है ? [इसपर कहते हैं—] अविद्याके योगसे स्त्री आदि अपने-अपने इच्छित—अभीष्ट पदार्थोंकी रचना करता हुआ अर्थात् उन्हें निष्पन्न करता हुआ जागता है वही शुक्र–शुभ्र यानी शुद्ध है । वह ब्रह्म है, उससे भिन्न और कोई |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५


ब्रह्मास्ति । तदेवामृतमविनाशि<br>उच्यते सर्वशास्त्रेषु । किं च<br>पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे<br>ब्रह्मण्याश्रिताः सर्वलोककारण-<br>त्वात्तस्य । तदु नात्येति कश्चन<br>इत्यादि पूर्ववदेव ॥ ८ ॥गुह्य ब्रह्म नहीं है । वही सब<br>शास्त्रोंमें अमृत—अविनाशी कहा<br>गया है । यही नहीं, उस ब्रह्ममें<br>ही पृथिवी आदि सम्पूर्ण लोक<br>आश्रित हैं, क्योंकि वह सभी लोकोंका<br>कारण है । उसका कोई भी<br>अतिक्रमण नहीं कर सकता<br>[ निश्चय यही वह ब्रह्म है ] इत्यादि<br>[ आगेकी व्याख्या ] पूर्ववत् समझनी<br>चाहिये ॥ ८ ॥

अनेकतार्किककुबुद्धिविचालि-<br>तान्तःकरणानां प्रमाणोपपन्नम्<br>अप्यात्मैकत्वविज्ञानमसकृदुच्य-<br>मानमप्यनृजुबुद्धीनां ब्राह्मणानां<br>चेतसि नाधीयत इति तत्प्रति-<br>पादन आदरवती पुनः पुनराह<br>श्रुतिः—अनेक तार्किकोंकी कुबुद्धिद्वारा<br>जिनका चित्त चञ्चल कर दिया<br>गया है, अतः जिनकी बुद्धि सरल<br>नहीं है उन ब्राह्मणोंके चित्तमें,<br>प्रमाणसे युक्त सिद्ध होनेपर भी,<br>आत्मैकत्व-विज्ञान बारम्बार कहे<br>जानेपर भी स्थिर नहीं होता । अतः<br>उसके प्रतिपादनमें आदर रखनेवाली<br>श्रुति पुनः पुनः कहती है—

आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥

१२६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२६कठोपनिषद्[ अध्याय २

जिस प्रकार सम्पूर्ण भुवनमें प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि प्रत्येक रूप ( रूपवान् वस्तु ) के अनुरूप हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा उनके रूपके अनुरूप हो रहा है तथा उनसे बाहर भी है ॥ ९ ॥

| अग्निर्यथैक एव प्रकाशात्मा सन्भुवनं भवन्त्यस्मिन्भूतानीति भुवनमयं लोकस्तमिमं प्रविष्टः अनुप्रविष्टः रूपं रूपं प्रति दार्व्वादिदाह्यभेदं प्रतीत्यर्थः प्रतिरूपः तत्र तत्र प्रतिरूपवान्दाह्यभेदेन बहुविधो बभूव; एक एव तथा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वेषां भूतानाम् अभ्यन्तर आत्मातिसूक्ष्मत्वाद् दार्व्वादिष्विव सर्वदेहं प्रति प्रविष्टत्वात्प्रतिरूपो बभूव बहिश्च स्वेनाविकृतेन स्वरूपेणाकाशवत् ॥ ९ ॥ | जिस प्रकार एक ही अग्नि प्रकाशस्वरूप होकर भी भुवनमें—इसमें सब जीव होते हैं इसीसे इस लोकको भुवन कहते हैं, उसी इस लोकमें अनुप्रविष्ट हुआ रूप-रूपके प्रति अर्थात् काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न प्रत्येक दाह्य पदार्थके प्रति प्रतिरूप—उस-उस पदार्थके अनुरूप हुआ दाह्य-भेदसे अनेक प्रकारका हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा—आन्तरिक आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण काष्ठादिमें प्रविष्ट हुए अग्निके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें प्रविष्ट रहनेके कारण उनके अनुरूप हो गया है तथा आकाशके समान अपने अविकारी रूपसे उसके बाहर भी है ॥ ९ ॥ |


तथान्यो दृष्टान्तः—ऐसा ही एक दूसरा दृष्टान्त भी है—

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७


वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥

जिस प्रकार इस लोकमें प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है ॥ १० ॥

वायुर्यथैक इत्यादि। प्राणात्मना देहेष्वनुप्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यादि समानम् ॥ १० ॥जिस प्रकार एक ही वायु प्राणरूपसे देहोंमें अनुप्रविष्ट होकर प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है [उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है] इत्यादि पूर्ववत् ही समझना चाहिये ॥ १० ॥
एकस्य सर्वात्मत्वे संसारदुःखित्वं परस्यैव तदिति प्राप्तमत इदमुच्यते—इस प्रकार एकहीकी सर्वात्मकता होनेपर संसारदुःखसे युक्त होना भी परमात्माका ही सिद्ध होता है; इसलिये ऐसा कहा जाता है—

आत्माकी असङ्गता

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु-
र्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥

१२८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२८कठोपनिषद्[ अध्याय २

जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका नेत्र होकर भी सूर्य नेत्रसम्बन्धी बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा संसारके दुःखसे लिप्त नहीं होता, बल्कि उनसे बाहर रहता है ॥११॥

सूर्यो यथा चक्षुष आलोकेन उपकारं कुर्वन्मूत्रपुरीषाद्यशुचिप्रकाशनेन तद्दर्शिनः सर्वलोकस्य चक्षुरपि सन् लिप्यते चाक्षुषैरशुच्यादिदर्शननिमित्तैराध्यात्मिकैः पापदोषैर्वाह्यैश्चाशुच्यादिसंसर्गदोषैः । एकः संस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ।जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाशसे लोकका उपकार करता हुआ अर्थात् मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंको प्रकाशित करनेके कारण उन्हें देखनेवाले समस्त लोकोंका नेत्ररूप होकर भी अपवित्र पदार्थादिके देखनेसे प्राप्त हुए आध्यात्मिक पापदोष तथा अपवित्र पदार्थोंके संसर्गसे होनेवाले बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा भी लोकके दुःखसे लिप्त नहीं होता, प्रत्युत उससे बाहर रहता है ।
लोको ह्यविद्यया स्वात्मनि अध्यस्तया कामकर्मोद्भवं दुःखम् अनुभवति । न तु सा परमार्थतः स्वात्मनि । यथा रज्जुशुक्तिकोपरगगनेषु सर्परजतोदकमलानि न रज्ज्वादीनां स्वतो दोषरूपाणिलोक अपने आत्मामें आरोपित अविद्याके कारण ही कामना और कर्मजनित दुःखका अनुभव करता है । किन्तु वह [अविद्या] परमार्थतः स्वात्मामें है नहीं, जिस प्रकार कि रज्जु, शुक्ति, मरुस्थल और आकाशमें [प्रतीत होनेवाले] सर्प, रजत, जल और मलिनता—ये उन रज्जु आदिमें स्वाभाविक दोषरूप नहीं हैं

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९

| सन्ति। संसर्गिणि विपरीतबुद्ध्यध्यासनिमित्तात्तद्दोषवद्विभाव्यन्ते। न तद्दोषैस्तेषां लेपः। विपरीतबुद्ध्यध्यासबाह्या हि ते।<br><br>तथात्मनि सर्वो लोकः क्रियाकारकफलात्मकं विज्ञानं सर्पादिस्थानीयं विपरीतमध्यस्य तन्निमित्तं जन्ममरणादिदुःखमनुभवति। न त्वात्मा सर्वलोकात्मापि सन् विपरीताध्यारोपनिमित्तेन लिप्यते लोकदुःखेन। कुतः ? बाह्यः, रज्ज्वादिवदेव विपरीतबुद्ध्यध्यासबाह्यो हि स इति ॥११॥ | बल्कि उनके संसर्गमें आये हुए पुरुषमें विपरीत बुद्धिका अध्यास होनेके कारण ही वे उन-उन दोषोंसे युक्त प्रतीत होते हैं। किन्तु उन दोषोंसे उनका लेप नहीं होता, क्योंकि वे तो उस विपरीत बुद्धि-जनित अध्याससे बाहर ही हैं।<br><br>इसी प्रकार सम्पूर्ण लोक भी [रज्जु आदिमें अध्यस्त] सर्पादिके समान अपने आत्मामें क्रिया, कारक और फलरूप विपरीत ज्ञानका आरोप कर उसके निमित्तसे होनेवाले जन्म-मरण आदि दुःखका अनुभव करता है। आत्मा तो सम्पूर्ण लोकका अन्तरात्मा होकर भी विपरीत अध्यारोपसे होनेवाले लौकिक दुःखसे लिप्त नहीं होता। क्यों नहीं होता ? क्योंकि वह उससे बाहर है—अर्थात् रज्जु आदिके समान वह विपरीत बुद्धि-जनित अध्याससे बाहर ही है ॥११॥ |

आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है

किं च— तथा—

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥

१३० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१३०कठोपनिषद्[ अध्याय २

जो एक, सबको अपने अधीन रखनेवाला और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा अपने एक रूपको ही अनेक प्रकारका कर लेता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्मदेवको जो धीर (विवेकी) पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्यसुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥ १२ ॥

| स हि परमेश्वरः सर्वगतः स्वतन्त्र एको न तत्समोऽभ्यधिको वान्योऽस्ति। वशी सर्वं ह्यस्य जगद्वशे वर्तते। कुतः? सर्वभूतान्तरात्मा। यत एकमेव सदैकरसमात्मानं विशुद्धविज्ञानरूपं नामरूपाद्यशुद्धोपाधिभेदवशेन बहुधानेकप्रकारं यः करोति स्वात्मसत्तामात्रेणाचिन्त्यशक्तित्वात्। तमात्मस्थं स्वशरीरहृदयाकाशे बुद्धौ चैतन्याकारेणाभिव्यक्तमित्येतत्। | वह स्वतन्त्र और सर्वगत परमेश्वर एक है। उसके समान अथवा उससे बड़ा और कोई नहीं है। वह वशी है, क्योंकि सारा जगत् उसके अधीन है। उसके अधीन क्यों है? [इसपर कहते हैं—] क्योंकि वह सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा है। इस प्रकार जो अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेके कारण अपने एक—नित्य एकरस विशुद्धविज्ञानस्वरूप आत्माको नाम-रूप आदि अशुद्ध उपाधिभेदके कारण अपनी सत्तामात्रसे बहुधा—अनेक प्रकारका कर लेता है, उस आत्मस्थ अर्थात् अपने शरीरस्थ हृदयाकाश यानी बुद्धिमें चैतन्यस्वरूपसे अभिव्यक्त हुए [आत्माको जो लोग देखते हैं उन्हींको नित्य सुख प्राप्त होता है]। | | न हि शरीरस्याधारत्वमात्मनः आकाशवदमूर्तत्वात्; आदर्शस्थं | आकाशके समान अमूर्तिमान् होनेसे आत्माका आधार शरीर नहीं है [अर्थात् आत्मा निराधार है]। |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३१


मुखमिति यद्वत् । तमेतम् ईश्वरमात्मानं ये निवृत्तबाह्यवृत्तयोऽनुपश्यन्ति आचार्यागमोपदेशमनु साक्षादनुभवन्ति धीरा विवेकिनस्तेषां परमेश्वरभूतानां शाश्वतं नित्यं सुखम् आत्मानन्दलक्षणं भवति; नेतरेषां बाह्यासक्तबुद्धीनामविवेकिनां स्वात्मभूतमप्यविद्याव्यवधानात् ॥ १२॥जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुखका आधार दर्पण नहीं है । जिनकी बाह्य वृत्तियाँ निवृत्त हो गयी हैं ऐसे जो धीर—विवेकी पुरुष उस ईश्वर—आत्माको देखते हैं—आचार्य और शास्त्रका उपदेश पानेके अनन्तर उसका साक्षात् अनुभव करते हैं उन परमात्मस्वरूपताको प्राप्त हुए पुरुषोंको ही आत्मानन्दरूप शाश्वत—नित्यसुख प्राप्त होता है। किन्तु दूसरे जो बाह्य पदार्थोंमें आसक्तचित्त अविवेकी पुरुष हैं उन्हें यह सुख स्वात्मभूत होनेपर भी अविद्यारूप व्यवधानके कारण प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १२॥
किं चइसके सिवा

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनाना-

मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-

स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१३॥

जो अनित्य पदार्थोंमें नित्यस्वरूप तथा ब्रह्मा आदि चेतनोंमें चेतन है और जो अकेला ही अनेकोंकी कामनाएँ पूर्ण करता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्माको जो विवेकी पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्य-शान्ति प्राप्त होती है, औरोंको नहीं ॥ १३ ॥