भारतकोश
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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

१२० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२०कठोपनिषद्[ अध्याय २

देहस्थ आत्मा ही जीवन है

अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥

इस शरीरस्थ देहीके भ्रष्ट हो जानेपर—इस देहसे मुक्त हो जानेपर भला इस शरीरमें क्या रह जाता है ? [ अर्थात् कुछ भी नहीं रहता ] यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ ४ ॥

किं चतथा
अस्य शरीरस्थस्यात्मनो विस्रंसमानस्यावस्रंसमानस्य भ्रंशमानस्य देहिनो देहवतः; विस्रंसनशब्दार्थमाह—देहाद्विमुच्यमानस्येति किमत्र परिशिष्यते प्राणादिकलापे न किञ्चन परिशिष्यतेऽत्र देहे पुरस्वामिनिविद्रवण इव पुरवासिनां यस्यात्मनोऽपगमे क्षणमात्रात्कार्यकरणकलापरूपं सर्वमिदं हतबलं विध्वस्तं भवति विनष्टं भवति सोऽन्यः सिद्धः॥४॥इस शरीरस्थ देही—देहवान् आत्माके विस्रंसमान—अवस्रंसमान अर्थात् भ्रष्ट हो जानेपर इस प्राणादि समुदायमेंसे भला क्या रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं रहता। 'देहाद्विमुच्यमानस्य' ऐसा कहकर विस्रंसन शब्दका अर्थ बतलाया गया है। नगरके स्वामीके चले जानेपर जैसे पुरवासियोंकी दुर्दशा होती है उसी प्रकार इस शरीरमें, जिस आत्माके चले जानेपर, एक क्षणमें ही यह भूत और इन्द्रियोंका समुदायरूप सबका सब बलहीन–विध्वस्त अर्थात् नष्ट हो जाता है वह इससे भिन्न ही सिद्ध होता है ॥ ४ ॥

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२१


स्यान्मतं प्राणापानाद्यपगमात् एवेदं विध्वस्तं भवति न तु तद्व्यतिरिक्तात्मापगमात्प्राणादिभिरेव हि मर्त्यो जीवतीति नैतदस्ति—यदि कोई ऐसा माने कि यह शरीर, प्राण और अपान आदिके चले जानेसे ही नष्ट हो जाता है, उनसे भिन्न किसी आत्माके जानेसे नहीं, क्योंकि प्राणादिके कारण ही मनुष्य जीवित रहता है—तो ऐसी बात नहीं है, [क्योंकि—]

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥

कोई भी मनुष्य न तो प्राणसे जीवित रहता है और न अपानसे ही। बल्कि वे तो, जिसमें ये दोनों आश्रित हैं ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ॥ ५ ॥

न प्राणेन नापानेन चक्षुरादिना वा मर्त्यो मनुष्यो देहवान्कश्चन जीवति न कोऽपि जीवति न ह्येषां परार्थानां संहत्यकारित्वाज्जीवनहेतुत्वमुपपद्यते । स्वार्थेनासंहतेन परेण केनचिदप्रयुक्तं संहतानामवस्थानं न दृष्टं गृहादीनां लोके; तथा प्राणादीनामपि संहतत्वाद्भवितुमर्हति ।कोई भी मर्त्य—मनुष्य अर्थात् देहधारी न तो प्राणसे जीवित रहता है और न अपान अथवा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ही, क्योंकि परस्पर मिलकर प्रवृत्त होनेवाले तथा किसी दूसरेके शेषभूत ये इन्द्रिय आदि जीवनके हेतु नहीं हो सकते। लोकमें किसी स्वतन्त्र और बिना मिले हुए अन्य [चेतन पदार्थ] की प्रेरणाके बिना गृह आदि संहत पदार्थोंकी स्थिति नहीं देखी गयी; उसी तरह संघातरूप होनेसे प्राणादिकी स्थिति भी स्वतन्त्र नहीं हो सकती।

| १२२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |

१२२कठोपनिषद्[ अध्याय २

| अत इतरेणैव संहतप्राणादि-विलक्षणेन तु सर्वे संहताः सन्तो जीवन्ति प्राणान्धारयन्ति । यस्मिन्संहतविलक्षण आत्मनि सति परस्मिन्नेतौ प्राणापानौ चक्षुरादिभिः संहतावुपाश्रितौ, यस्यासंहतस्यार्थे प्राणापानादिः स्वव्यापारं कुर्वन्प्रवर्तते संहतः सन्स ततोऽन्यः सिद्ध इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥ | अतः ये सब परस्पर मिलकर प्राणादि संहत पदार्थोंसे भिन्न किसी अन्यके द्वारा ही जीवित रहते—प्राण धारण करते हैं, जिस संहत पदार्थभिन्न सत्स्वरूप परमात्माके रहते हुए ही यह प्राण-अपान चक्षु आदिसे संहत होकर आश्रित हैं; तात्पर्य यह है कि जिस असंहत आत्माके लिये प्राण-अपान आदि संहत होकर अपने व्यापारोंको करते हुए बर्तते हैं वह आत्मा उनसे भिन्न सिद्ध होता है ॥ ५ ॥ |


मरणोत्तर कालमें जीवकी गति

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥

हे गौतम ! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन करूँगा, तथा [ ब्रह्मको न जाननेसे ] मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है [ वह भी बतलाऊँगा ] ॥ ६ ॥


| हन्तेदानीं पुनरपि ते तुभ्यम् इदं गुह्यं गोप्यं ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं प्रवक्ष्यामि यद्विज्ञानात् सर्वसंसारोपरमो भवति, अविज्ञानाच्च यस्य मरणं प्राप्य | अहो ! अब मैं तुम्हें फिर भी इस गुह्य—गोपनीय सनातन—चिरन्तन ब्रह्मके विषयमें बतलाऊँगा, जिसके ज्ञानसे सम्पूर्ण संसारकी निवृत्ति हो जाती है तथा जिसका ज्ञान न होनेपर मरणको प्राप्त होनेके अनन्तर आत्मा जैसा हो |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३


यथात्मा भवति यथा संसरति तथा शृणु हे गौतम ॥ ६ ॥जाता है, अर्थात् वह जिस प्रकार [जन्म-मरणरूप] संसारको प्राप्त होता है, हे गौतम ! वह सुन ॥ ६ ॥

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।

स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥

अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर धारण करनेके लिये किसी योनिको प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर-भावको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥

योनिं योनिद्वारं शुक्रवीजसमन्विताः सन्तोऽन्ये केचिद् अविद्यावन्तो मूढाः प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय शरीरग्रहणार्थं देहिनो देहवन्तः; योनिं विशन्तीत्यर्थः । स्थाणुं वृक्षादिस्थावरभावम् अन्येऽत्यन्ताधमा मरणं प्राप्यानुसंयन्त्यनुगच्छन्ति । यथाकर्म यद्यस्य कर्म तद्यथाकर्म यैर्य्यादृशं कर्मेह जन्मनि कृतं तद्वशेनैत्येतत् । तथा च यथाश्रुतं यादृशं च विज्ञानमुपार्जितं तदनुरूपमेव शरीरं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः ।अन्य—कुछ अविद्यावान् मूढ देहधारी शरीर धारण करनेके लिये वीर्यरूप बीजसे संयुक्त होकर योनि—योनिद्वारको प्राप्त होते हैं अर्थात् किसी योनिमें प्रविष्ट हो जाते हैं। दूसरे कोई अत्यन्त अधम पुरुष मरणको प्राप्त होकर [यथा-कर्म और यथाश्रुत] स्थाणु यानी वृक्षादि स्थावर-भावका अनुवर्तन—अनुगमन करते हैं। तात्पर्य यह कि यथाकर्म यानी जिसका जो कर्म है अथवा इस जन्ममें जिसने जैसा कर्म किया है उसके अधीन होकर तथा यथाश्रुत यानी जिसने जैसा विज्ञान उपार्जित किया है उसके अनुरूप शरीरको ही प्राप्त होते

१२४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२४कठोपनिषद्[ अध्याय २

| “यथाप्रज्ञं हि संभवाः” इति श्रुत्यन्तरात् ॥ ७ ॥ | हैं । “जन्म अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार हुआ करते हैं” ऐसी एक दूसरी श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥ ७ ॥ |

| यत्प्रतिज्ञातं गुह्यं ब्रह्म वक्ष्यामीति तदाह— | पहले जो यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं तुझे गुह्य ब्रह्म बतलाऊँगा’ उसे ही बतलाते हैं— |

गुह्य ब्रह्मोपदेश

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः
श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥

प्राणादिके सो जानेपर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थोंकी रचना करता हुआ जागता रहता है वही शुक्र (शुद्ध) है, वह ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है । उसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं; कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥८॥

| य एष सुप्तेषु प्राणादिषु जागर्ति न स्वपिति । कथम् ? कामं कामं तं तमभिप्रेतं स्त्र्याद्यर्थमविद्यया निर्मिमाणो निष्पादयञ्जागर्ति पुरुषो यस्तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं तद्ब्रह्म नान्यद्गुह्यं | जो यह प्राणादिके सो जानेपर जागता रहता है—[उनके साथ] सोता नहीं है । किस प्रकार जागता रहता है ? [इसपर कहते हैं—] अविद्याके योगसे स्त्री आदि अपने-अपने इच्छित—अभीष्ट पदार्थोंकी रचना करता हुआ अर्थात् उन्हें निष्पन्न करता हुआ जागता है वही शुक्र–शुभ्र यानी शुद्ध है । वह ब्रह्म है, उससे भिन्न और कोई |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५


ब्रह्मास्ति । तदेवामृतमविनाशि<br>उच्यते सर्वशास्त्रेषु । किं च<br>पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे<br>ब्रह्मण्याश्रिताः सर्वलोककारण-<br>त्वात्तस्य । तदु नात्येति कश्चन<br>इत्यादि पूर्ववदेव ॥ ८ ॥गुह्य ब्रह्म नहीं है । वही सब<br>शास्त्रोंमें अमृत—अविनाशी कहा<br>गया है । यही नहीं, उस ब्रह्ममें<br>ही पृथिवी आदि सम्पूर्ण लोक<br>आश्रित हैं, क्योंकि वह सभी लोकोंका<br>कारण है । उसका कोई भी<br>अतिक्रमण नहीं कर सकता<br>[ निश्चय यही वह ब्रह्म है ] इत्यादि<br>[ आगेकी व्याख्या ] पूर्ववत् समझनी<br>चाहिये ॥ ८ ॥

अनेकतार्किककुबुद्धिविचालि-<br>तान्तःकरणानां प्रमाणोपपन्नम्<br>अप्यात्मैकत्वविज्ञानमसकृदुच्य-<br>मानमप्यनृजुबुद्धीनां ब्राह्मणानां<br>चेतसि नाधीयत इति तत्प्रति-<br>पादन आदरवती पुनः पुनराह<br>श्रुतिः—अनेक तार्किकोंकी कुबुद्धिद्वारा<br>जिनका चित्त चञ्चल कर दिया<br>गया है, अतः जिनकी बुद्धि सरल<br>नहीं है उन ब्राह्मणोंके चित्तमें,<br>प्रमाणसे युक्त सिद्ध होनेपर भी,<br>आत्मैकत्व-विज्ञान बारम्बार कहे<br>जानेपर भी स्थिर नहीं होता । अतः<br>उसके प्रतिपादनमें आदर रखनेवाली<br>श्रुति पुनः पुनः कहती है—

आत्माका उपाधिप्रतिरूपत्व

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥

१२६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२६कठोपनिषद्[ अध्याय २

जिस प्रकार सम्पूर्ण भुवनमें प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि प्रत्येक रूप ( रूपवान् वस्तु ) के अनुरूप हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा उनके रूपके अनुरूप हो रहा है तथा उनसे बाहर भी है ॥ ९ ॥

| अग्निर्यथैक एव प्रकाशात्मा सन्भुवनं भवन्त्यस्मिन्भूतानीति भुवनमयं लोकस्तमिमं प्रविष्टः अनुप्रविष्टः रूपं रूपं प्रति दार्व्वादिदाह्यभेदं प्रतीत्यर्थः प्रतिरूपः तत्र तत्र प्रतिरूपवान्दाह्यभेदेन बहुविधो बभूव; एक एव तथा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वेषां भूतानाम् अभ्यन्तर आत्मातिसूक्ष्मत्वाद् दार्व्वादिष्विव सर्वदेहं प्रति प्रविष्टत्वात्प्रतिरूपो बभूव बहिश्च स्वेनाविकृतेन स्वरूपेणाकाशवत् ॥ ९ ॥ | जिस प्रकार एक ही अग्नि प्रकाशस्वरूप होकर भी भुवनमें—इसमें सब जीव होते हैं इसीसे इस लोकको भुवन कहते हैं, उसी इस लोकमें अनुप्रविष्ट हुआ रूप-रूपके प्रति अर्थात् काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न प्रत्येक दाह्य पदार्थके प्रति प्रतिरूप—उस-उस पदार्थके अनुरूप हुआ दाह्य-भेदसे अनेक प्रकारका हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा—आन्तरिक आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण काष्ठादिमें प्रविष्ट हुए अग्निके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें प्रविष्ट रहनेके कारण उनके अनुरूप हो गया है तथा आकाशके समान अपने अविकारी रूपसे उसके बाहर भी है ॥ ९ ॥ |


तथान्यो दृष्टान्तः—ऐसा ही एक दूसरा दृष्टान्त भी है—

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२७


वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥

जिस प्रकार इस लोकमें प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है ॥ १० ॥

वायुर्यथैक इत्यादि। प्राणात्मना देहेष्वनुप्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यादि समानम् ॥ १० ॥जिस प्रकार एक ही वायु प्राणरूपसे देहोंमें अनुप्रविष्ट होकर प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है [उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है] इत्यादि पूर्ववत् ही समझना चाहिये ॥ १० ॥
एकस्य सर्वात्मत्वे संसारदुःखित्वं परस्यैव तदिति प्राप्तमत इदमुच्यते—इस प्रकार एकहीकी सर्वात्मकता होनेपर संसारदुःखसे युक्त होना भी परमात्माका ही सिद्ध होता है; इसलिये ऐसा कहा जाता है—

आत्माकी असङ्गता

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षु-
र्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥

१२८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१२८कठोपनिषद्[ अध्याय २

जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका नेत्र होकर भी सूर्य नेत्रसम्बन्धी बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा संसारके दुःखसे लिप्त नहीं होता, बल्कि उनसे बाहर रहता है ॥११॥

सूर्यो यथा चक्षुष आलोकेन उपकारं कुर्वन्मूत्रपुरीषाद्यशुचिप्रकाशनेन तद्दर्शिनः सर्वलोकस्य चक्षुरपि सन् लिप्यते चाक्षुषैरशुच्यादिदर्शननिमित्तैराध्यात्मिकैः पापदोषैर्वाह्यैश्चाशुच्यादिसंसर्गदोषैः । एकः संस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ।जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाशसे लोकका उपकार करता हुआ अर्थात् मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंको प्रकाशित करनेके कारण उन्हें देखनेवाले समस्त लोकोंका नेत्ररूप होकर भी अपवित्र पदार्थादिके देखनेसे प्राप्त हुए आध्यात्मिक पापदोष तथा अपवित्र पदार्थोंके संसर्गसे होनेवाले बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा भी लोकके दुःखसे लिप्त नहीं होता, प्रत्युत उससे बाहर रहता है ।
लोको ह्यविद्यया स्वात्मनि अध्यस्तया कामकर्मोद्भवं दुःखम् अनुभवति । न तु सा परमार्थतः स्वात्मनि । यथा रज्जुशुक्तिकोपरगगनेषु सर्परजतोदकमलानि न रज्ज्वादीनां स्वतो दोषरूपाणिलोक अपने आत्मामें आरोपित अविद्याके कारण ही कामना और कर्मजनित दुःखका अनुभव करता है । किन्तु वह [अविद्या] परमार्थतः स्वात्मामें है नहीं, जिस प्रकार कि रज्जु, शुक्ति, मरुस्थल और आकाशमें [प्रतीत होनेवाले] सर्प, रजत, जल और मलिनता—ये उन रज्जु आदिमें स्वाभाविक दोषरूप नहीं हैं

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९

| सन्ति। संसर्गिणि विपरीतबुद्ध्यध्यासनिमित्तात्तद्दोषवद्विभाव्यन्ते। न तद्दोषैस्तेषां लेपः। विपरीतबुद्ध्यध्यासबाह्या हि ते।<br><br>तथात्मनि सर्वो लोकः क्रियाकारकफलात्मकं विज्ञानं सर्पादिस्थानीयं विपरीतमध्यस्य तन्निमित्तं जन्ममरणादिदुःखमनुभवति। न त्वात्मा सर्वलोकात्मापि सन् विपरीताध्यारोपनिमित्तेन लिप्यते लोकदुःखेन। कुतः ? बाह्यः, रज्ज्वादिवदेव विपरीतबुद्ध्यध्यासबाह्यो हि स इति ॥११॥ | बल्कि उनके संसर्गमें आये हुए पुरुषमें विपरीत बुद्धिका अध्यास होनेके कारण ही वे उन-उन दोषोंसे युक्त प्रतीत होते हैं। किन्तु उन दोषोंसे उनका लेप नहीं होता, क्योंकि वे तो उस विपरीत बुद्धि-जनित अध्याससे बाहर ही हैं।<br><br>इसी प्रकार सम्पूर्ण लोक भी [रज्जु आदिमें अध्यस्त] सर्पादिके समान अपने आत्मामें क्रिया, कारक और फलरूप विपरीत ज्ञानका आरोप कर उसके निमित्तसे होनेवाले जन्म-मरण आदि दुःखका अनुभव करता है। आत्मा तो सम्पूर्ण लोकका अन्तरात्मा होकर भी विपरीत अध्यारोपसे होनेवाले लौकिक दुःखसे लिप्त नहीं होता। क्यों नहीं होता ? क्योंकि वह उससे बाहर है—अर्थात् रज्जु आदिके समान वह विपरीत बुद्धि-जनित अध्याससे बाहर ही है ॥११॥ |

आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है

किं च— तथा—

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥

१३० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१३०कठोपनिषद्[ अध्याय २

जो एक, सबको अपने अधीन रखनेवाला और सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा अपने एक रूपको ही अनेक प्रकारका कर लेता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्मदेवको जो धीर (विवेकी) पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्यसुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥ १२ ॥

| स हि परमेश्वरः सर्वगतः स्वतन्त्र एको न तत्समोऽभ्यधिको वान्योऽस्ति। वशी सर्वं ह्यस्य जगद्वशे वर्तते। कुतः? सर्वभूतान्तरात्मा। यत एकमेव सदैकरसमात्मानं विशुद्धविज्ञानरूपं नामरूपाद्यशुद्धोपाधिभेदवशेन बहुधानेकप्रकारं यः करोति स्वात्मसत्तामात्रेणाचिन्त्यशक्तित्वात्। तमात्मस्थं स्वशरीरहृदयाकाशे बुद्धौ चैतन्याकारेणाभिव्यक्तमित्येतत्। | वह स्वतन्त्र और सर्वगत परमेश्वर एक है। उसके समान अथवा उससे बड़ा और कोई नहीं है। वह वशी है, क्योंकि सारा जगत् उसके अधीन है। उसके अधीन क्यों है? [इसपर कहते हैं—] क्योंकि वह सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा है। इस प्रकार जो अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेके कारण अपने एक—नित्य एकरस विशुद्धविज्ञानस्वरूप आत्माको नाम-रूप आदि अशुद्ध उपाधिभेदके कारण अपनी सत्तामात्रसे बहुधा—अनेक प्रकारका कर लेता है, उस आत्मस्थ अर्थात् अपने शरीरस्थ हृदयाकाश यानी बुद्धिमें चैतन्यस्वरूपसे अभिव्यक्त हुए [आत्माको जो लोग देखते हैं उन्हींको नित्य सुख प्राप्त होता है]। | | न हि शरीरस्याधारत्वमात्मनः आकाशवदमूर्तत्वात्; आदर्शस्थं | आकाशके समान अमूर्तिमान् होनेसे आत्माका आधार शरीर नहीं है [अर्थात् आत्मा निराधार है]। |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३१


मुखमिति यद्वत् । तमेतम् ईश्वरमात्मानं ये निवृत्तबाह्यवृत्तयोऽनुपश्यन्ति आचार्यागमोपदेशमनु साक्षादनुभवन्ति धीरा विवेकिनस्तेषां परमेश्वरभूतानां शाश्वतं नित्यं सुखम् आत्मानन्दलक्षणं भवति; नेतरेषां बाह्यासक्तबुद्धीनामविवेकिनां स्वात्मभूतमप्यविद्याव्यवधानात् ॥ १२॥जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बित मुखका आधार दर्पण नहीं है । जिनकी बाह्य वृत्तियाँ निवृत्त हो गयी हैं ऐसे जो धीर—विवेकी पुरुष उस ईश्वर—आत्माको देखते हैं—आचार्य और शास्त्रका उपदेश पानेके अनन्तर उसका साक्षात् अनुभव करते हैं उन परमात्मस्वरूपताको प्राप्त हुए पुरुषोंको ही आत्मानन्दरूप शाश्वत—नित्यसुख प्राप्त होता है। किन्तु दूसरे जो बाह्य पदार्थोंमें आसक्तचित्त अविवेकी पुरुष हैं उन्हें यह सुख स्वात्मभूत होनेपर भी अविद्यारूप व्यवधानके कारण प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १२॥
किं चइसके सिवा

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनाना-

मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-

स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१३॥

जो अनित्य पदार्थोंमें नित्यस्वरूप तथा ब्रह्मा आदि चेतनोंमें चेतन है और जो अकेला ही अनेकोंकी कामनाएँ पूर्ण करता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्माको जो विवेकी पुरुष देखते हैं उन्हींको नित्य-शान्ति प्राप्त होती है, औरोंको नहीं ॥ १३ ॥

१३२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१३२कठोपनिषद्[ अध्याय २

| नित्योऽविनाश्यनित्यानां विनाशिनाम् । चेतनश्चेतनानां चेतयितॄणां ब्रह्मादीनां प्राणिनाम् अग्निनिमित्तमिव दाहकत्वम् अनग्नीनामुदकादीनामात्मचैतन्यनिमित्तमेव चेतयितृत्वमन्येषाम् । किं च स सर्वज्ञः सर्वेश्वरः कामिनां संसारिणां कर्मानुरूपं कामान्कर्मफलानि स्वानुग्रहनिमित्तांश्च कामान्य एको बहूनाम् अनेकेषामनायासेन विदधाति प्रयच्छतीत्येतत् । तमात्मस्थं ये अनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः उपरतिः शाश्वती नित्या स्वात्मभूतैव स्यान्नेतरेषामनेवंविधानाम् ॥ १३ ॥ | जो अनित्यों--नाशवानोंमें नित्य—अविनाशी है, चेतन अर्थात् ब्रह्मा आदि अन्य चेतयिता प्राणियोंका भी चेतन है। जिस प्रकार जल आदि दाहशक्तिशून्य पदार्थोंका दाहकत्व अग्निके निमित्तसे होता है वैसे ही अन्य प्राणियोंका चेतनत्व आत्मचैतन्यके निमित्तसे ही है। इसके सिवा वह सर्वज्ञ तथा सर्वेश्वर भी है, क्योंकि वह अकेला ही बिना किसी प्रयासके अनेक सकाम और संसारी पुरुषोंके कर्मानुरूप भोग यानी कर्मफल तथा अपने अनुग्रहरूप निमित्तसे हुए भोग विधान करता अर्थात् देता है। जो धीर (बुद्धिमान्) पुरुष अपने आत्मामें स्थित उस आत्मदेवको देखते हैं उन्हींको शाश्वती—नित्य यानी स्वात्मभूता शान्ति—उपरति प्राप्त होती है—अन्य जो ऐसे नहीं हैं उन्हें नहीं होती ॥ १३ ॥ |


तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।

कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४ ॥

उसी इस [ आत्मविज्ञान ] को ही विवेकी पुरुष अनिर्वाच्य परम सुख मानते हैं । उसे मैं कैसे जान सकूँगा ? क्या वह प्रकाशित ( हमारी बुद्धिका विषय ) होता है, अथवा नहीं ? ॥ १४ ॥

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३


| यत्तदात्मविज्ञानं सुखम् अनिर्देश्यं निर्देष्टुमशक्यं परमं प्रकृष्टं प्राकृतपुरुषवाङ्मनसयोरगोचरम् अपि सन्निवृत्तैषणा ये ब्राह्मणास्ते यत्तदेतत्प्रत्यक्षमेवेति मन्यन्ते । कथं नु केन प्रकारेण तत् सुखमहं विजानीयाम् । इदम् इत्यात्मबुद्धिविषयमापादयेयं यथा निवृत्तैषणा यतयः । किमु तद्भाति दीप्यते प्रकाशात्मकं तद्यतोऽस्मद्बुद्धिगोचरत्वेन विभाति विस्पष्टं दृश्यते किं वा नेति ॥ १४ ॥ | यह जो आत्मविज्ञानरूप सुख है वह अनिर्देश्य—कथन करनेके अयोग्य, परम अर्थात् प्रकृष्ट और साधारण पुरुषोंके वाणी और मनका अविषय भी है; तो भी जो सब प्रकारकी एषणाओंसे रहित ब्राह्मणलोग हैं वे उसे प्रत्यक्ष ही मानते हैं। उस आत्मसुखको मैं कैसे जान सकूँगा ? अर्थात् निष्काम यतियोंके समान 'वह यही है' इस प्रकार उसे कैसे अपनी बुद्धिका विषय बनाऊँगा ? वह प्रकाशस्वरूप है, सो क्या वह भासता है—हमारी बुद्धिका विषय होकर स्पष्ट दिखलायी देता है, या नहीं ? ॥ १४ ॥ | | अत्रोत्तरमिदं भाति च विभाति चेति । कथम् ? | इसका उत्तर यही है कि वह भासता है और विशेषरूपसे भासता है । किस प्रकार ? [सो कहते हैं—] |


सर्वप्रकाशकका अप्रकाश्यत्व

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥

१३४ कठोपनिषद् [ अध्याय २

१३४ कठोपनिषद् [ अध्याय २


वहाँ (उस आत्मलोकमें) सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारे भी नहीं चमकते और न यह विद्युत् ही चमचमाती है; फिर इस अग्निकी तो बात ही क्या है? उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है और उसके प्रकाशसे ही यह सब कुछ भासता है ॥ १५ ॥

संस्कृतहिन्दी
न तत्र तस्मिन्स्वात्मभूते ब्रह्मणि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो भाति तद्ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमस्मद्दृष्टिगोचरः अग्निः। किंवहुना यदिदमादिकं सर्वं भाति तत्तमेव परमेश्वरं भान्तं दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते। यथा जलोल्मुकाद्यग्निसंयोगादग्निं दहन्तमनु दहति न स्वतस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि विभाति।वहाँ—उस अपने आत्मस्वरूप ब्रह्ममें सबको प्रकाशित करनेवाला होकर भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता अर्थात् वह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता। इसी प्रकार ये चन्द्रमा, तारे और विद्युत् भी प्रकाशित नहीं होते। फिर हमारी दृष्टिके विषयभूत इस अग्निका तो कहना ही क्या है? अधिक क्या कहा जाय? यह सूर्य आदि जो कुछ प्रकाशित हो रहे हैं वे सब उस परमात्माके प्रकाशित होते हुए ही अनुभासित हो रहे हैं, जिस प्रकार जल और उल्मुक (जलते हुए काष्ठ) आदि अग्निके संयोगसे अग्निके प्रज्वलित होते हुए ही दहन करते हैं उसी प्रकार उसके प्रकाश—तेजसे ही ये सूर्य आदि सब प्रकाशित हो रहे हैं।
यत एवं तदेव ब्रह्म भाति च विभाति च। कार्यगतेनक्योंकि ऐसा है इसलिये वही ब्रह्म प्रकाशित होता है और विशेषरूपसे प्रकाशित होता है। कार्यगत

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५


| विविधेन भासा तस्य ब्रह्मणो भारूपत्वं स्वतोऽवगम्यते । न हि स्वतोऽविद्यमानं भासनमन्यस्य कर्तुं शक्यम् । घटादीनाम् अन्यावभासकत्वादर्शनाद्भासनरूपाणां चादित्यादीनां तद्दर्शनात् ॥ १५ ॥ | नाना प्रकारके प्रकाशसे उस ब्रह्मकी प्रकाशस्वरूपता स्वतः सिद्ध है, क्योंकि जिसमें स्वतः प्रकाश नहीं है वह दूसरेको भी प्रकाशित नहीं कर सकता, जैसा कि घटादिका दूसरोंको प्रकाशित करना नहीं देखा गया और प्रकाशस्वरूप आदित्यादिका दूसरोंको प्रकाशित करना देखा गया है ॥ १५ ॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥२॥ (५)

१३६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१३६कठोपनिषद्[ अध्याय २

तृतीया वल्ली

संसाररूप अश्वत्थ वृक्ष

तूलावधारणेनैव मूलावधारणं वृक्षस्य क्रियते लोके यथा, एवं संसारकार्यवृक्षावधारणेन तन्मूलस्य ब्रह्मणः स्वरूपावदिधारयिषयेयं षष्ठी वल्लयारभ्यते—लोकमें जिस प्रकार तूल¹ (कार्य) का निश्चय कर लेनेसे ही वृक्षके मूलका निश्चय किया जाता है उसी प्रकार संसारकार्यरूप वृक्षके निश्चयसे उसके मूल ब्रह्मका स्वरूप निर्धारण करनेकी इच्छासे यह छठी वल्ली आरम्भ की जाती है—

ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।
एतद्वै तत् ॥ १॥

जिसका मूल ऊपरकी ओर तथा शाखाएँ नीचेकी ओर हैं ऐसा यह अश्वत्थ वृक्ष सनातन (अनादिकालीन) है। वही विशुद्ध ज्योतिःस्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है। सम्पूर्ण लोक उसीमें आश्रित हैं; कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही निश्चय वह [ब्रह्म] है ॥ १ ॥

ऊर्ध्वमूल ऊर्ध्वं मूलं यत् तद्विष्णोः परमं पदमस्येति सोऽयमव्यक्तादिस्थावरान्तः संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूलः। वृक्षश्च व्रश्चनात्।ऊर्ध्व (ऊपरकी ओर) अर्थात् जो वह भगवान् विष्णुका परम पद है वही जिसका मूल है ऐसा यह अव्यक्तसे स्थावरपर्यन्त संसारवृक्ष 'ऊर्ध्वमूल' है। इसका व्रश्चन—छेदन होनेके कारण यह वृक्ष

१. 'तूल' कपासको कहते हैं। वह कपासके पौधेका कार्य है। अतः यहाँ 'तूल' शब्दसे सम्पूर्ण कार्यवर्ग उपलक्षित होता है।

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३७

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३७


जन्मजरामरणशोकाद्यनेकानर्था-कहलाता है। जो जन्म, जरा, मरण और शोक आदि अनेक अनर्थोंसे
त्मकः प्रतिक्षणमन्यथास्वभावोभरा हुआ, क्षण-क्षणमें अन्यथा भाव-को प्राप्त होनेवाला, माया मृगतृष्णा-
मायामरीच्युदकगन्धर्वनगरादि-के जल और गन्धर्वनगरादिके समान
वद्दृष्टनष्टस्वरूपत्वादवसाने चदृष्टनष्टस्वरूप होनेसे अन्तमें वृक्षके समान अभावरूप हो जानेवाला,
वृक्षवदभावात्मकः कदलीस्तम्भ-केलेके खम्भेके समान निःसार और सैकड़ों पाखण्डियोंकी बुद्धिके वि-
वन्निःसारोऽनेकशतपाखण्डबुद्धि-कल्पोंका आश्रय है। तत्त्वजिज्ञासु-ओंद्वारा जिसका तत्त्व 'इदम्' रूपसे
विकल्पास्पदस्तत्त्वविजिज्ञासुभिःनिर्धारित नहीं किया गया, वेदान्त-निर्णीत परब्रह्म ही जिसका
अनिर्धारितेदंतत्त्वो वेदान्तनिर्धा-मूल और सार है, जो अविद्या काम
रितपरब्रह्ममूलसारोऽविद्याकाम-कर्म और अव्यक्तरूप बीजसे उत्पन्न होनेवाला है, ज्ञान और क्रिया—ये
कर्माव्यक्तबीजप्रभवोऽपरब्रह्मवि-दोनों शक्तियाँ जिसकी स्वरूपभूत हैं वह अपरब्रह्मरूप हिरण्यगर्भ ही
ज्ञानक्रियाशक्तिद्वयात्मकहिरण्य-जिसका अङ्कुर है, सम्पूर्ण प्राणियों-के लिङ्गशरीर ही जिसके स्कन्ध
गर्भाङ्कुरः सर्वप्राणिलिङ्गभेद-हैं, जो तृष्णारूप जलके सिंचनसे बढ़े हुए तेजवाला, बुद्धि, इन्द्रिय और
स्कन्धस्तृष्णाजलावसेकोद्भूत-विषयरूप नूतन पल्लवोंके अङ्कुरों-वाला, श्रुति, स्मृति, न्याय और
दर्पो बुद्धीन्द्रियविषयप्रवालाङ्कुरःज्ञानोपदेशरूप पत्तोंवाला,यज्ञ, दान, तप आदि अनेक क्रियाकलापरूप
श्रुतिस्मृतिन्यायविद्योपदेश-सुन्दर फूलोंवाला, सुख, दुःख और
पलाशो यज्ञदानतपआद्यनेकक्रिया-वेदनारूप अनेक प्रकारके रसोंसे
सुपुष्पः सुखदुःखवेदनानेकरसः

१३८ कठोपनिषद् [ अध्याय २

१३८ कठोपनिषद् [ अध्याय २


प्रण्युपजीव्यानन्तफलस्तत्तृष्णास-युक्त, प्राणियोंकी आजीविकारूप
लिलावसेकप्ररूढजडीकृतदृढबद्ध-अनन्त फलोंवाला तथा फलोंकी
मूलः सत्यनामादिसप्तलोकब्रह्मा-तृष्णारूप जलके सिंचनसे बढ़े हुए और [सात्त्विक आदि भावोंसे] मिश्रित एवं दृढ़तापूर्वक स्थिर हुए [कर्म-वासनादिरूप अवान्तर] मूलोंवाला है; ब्रह्मा आदि पक्षियोंने जिसपर सत्यादि नामोंवाले सात लोकोंरूप घोंसले बना रखे हैं, जो प्राणियोंके सुख-दुःख-जनित हर्ष-शोकसे उत्पन्न हुए नृत्य, गान, वाद्य, क्रीडा, आस्फोटन, (खम ठोंकना) हँसी, आक्रन्दन, रोदन तथा हाय-हाय छोड़-छोड़ इत्यादि अनेक प्रकारके शब्दोंकी तुमुलध्वनिसे अत्यन्त गुञ्जायमान हो रहा है तथा वेदान्तविहित ब्रह्मात्मैक्यदर्शनरूप असङ्गशस्त्रसे जिसका उच्छेद होता है ऐसा यह संसाररूप वृक्ष अश्वत्थ है, अर्थात् अश्वत्थ वृक्षके समान कामना और कर्मरूप वायुसे प्रेरित हुआ नित्य चञ्चल स्वभाववाला है। स्वर्ग, नरक, तिर्यक् और प्रेतादि शाखाओंके कारण यह नीचेकी ओर फैली शाखाओंवाला है तथा सनातन यानी अनादि होनेके कारण चिरकालसे चला आ रहा है।
दिभूतपक्षिकृतनीडः प्राणिसुख-
दुःखोद्भूतहर्षशोकजातनृत्यगीत-
वादित्रक्ष्वेलितास्फोटितहसिता-
क्रुष्टरुदितहाहामुञ्चमुञ्चेत्याद्यनेक-
शब्दकृततुमुलीभूतमहारवो वेदा-
न्तविहितब्रह्मात्मदर्शनासङ्गशस्त्र-
कृतोच्छेद एष संसारवृक्षोऽ-
श्वत्थोऽश्वत्थवत्कामकर्मवातेरित-
नित्यप्रचलितस्वभावः, स्वर्ग-
नरकतिर्यक्प्रेतादिभिः शाखाभिः
अवाक्शाखः; सनातनोऽनादि-
त्वाच्चिरं प्रवृत्तः।
यदस्य संसारवृक्षस्य मूलं तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं ज्योतिष्मत्।इस संसारका जो मूल है वही शुक्र—शुभ्र—शुद्ध—ज्योतिर्मय अर्थात्

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३९

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३९


| चैतन्यात्मज्योतिःस्वभावं तदेव ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् । तदेवामृतम् अविनाशस्वभावमुच्यते कथ्यते सत्यत्वात् । वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतम् अन्यदतो मर्त्यम् । तस्मिन्परमार्थसत्ये ब्रह्मणि लोका गन्धर्वनगरमरीच्युदकमायासमाः परमार्थदर्शनाभावावगमनाः श्रिता आश्रिताः सर्वे समस्ता उत्पत्तिस्थितिलयेषु । तदु तद्ब्रह्म नात्येति नातिवर्तते मृदादिमिव घटादिकार्यं कश्चन कश्चिदपि विकारः । एतद्वै तत् ॥ १ ॥ | चैतन्यात्मज्योतिःस्वरूप है । वही सबसे महान् होनेके कारण ब्रह्म है। वही सत्यस्वरूप होनेके कारण अमृत अर्थात् अविनाशी स्वभाववाला कहा जाता है । विकार वाणीका विलास और केवल नाममात्र है अतः उस ब्रह्मसे अन्य सब मिथ्या और नाशवान् है । उस परमार्थ-सत्य ब्रह्ममें उत्पत्ति, स्थिति और लयके समय सम्पूर्ण लोक गन्धर्व-नगर, मरीचिका-जल और मायाके समान आश्रित हैं ये परमार्थदर्शन हो जानेपर बाधित हो जानेवाले हैं । जिस प्रकार घट आदि कोई भी कार्य मृत्तिका आदिका अतिक्रमण नहीं कर सकते उस प्रकार कोई भी विकार उस ब्रह्मका अतिक्रमण नहीं कर सकता । निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ १ ॥ |


| यद्विज्ञानादमृता भवन्तीत्युच्यते जगतो मूलं तदेव नास्ति ब्रह्मासत एवेदं निःसृतमिति । <br><br> तन्न— | शङ्का—'जिसके ज्ञानसे अमर हो जाते हैं' ऐसा जिसके विषयमें कहा जाता है वह जगत्‌का मूलभूत ब्रह्म तो वस्तुतः है ही नहीं; यह सब तो असत्‌से ही प्रादुर्भूत हुआ है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है [ क्योंकि—] |