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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

२८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय. १

२८कठोपनिषद्[ अध्याय. १

| किमयम्रैकान्ततो निःश्रेयस-<br>साधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्प-<br>रीक्षणार्थमाह— | यह ( नचिकेता ) निःश्रेयसके<br>साधन आत्मज्ञानके योग्य पूर्णतया<br>है या नहीं—इस बातकी परीक्षा<br>करनेके लिये यमराजने कहा— |

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥

पूर्वकालमें इस विषयमें देवताओंको भी सन्देह हुआ था, क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म सुगमतासे जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेताः ! तू दूसरा वर माँग ले, मुझे न रोक । तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥

| देवैरप्यत्रैतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्वं न हि सुज्ञेयं सुष्ठु ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्जनैर्यतोऽणुः सूक्ष्म एष आत्माख्यो धर्मोऽतोऽन्यमसंदिग्धफलं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मां मोपरोत्सीरुपरोधं मा कार्षीरधमर्णम् इवोत्तमर्णः । अतिसृज विमुञ्च एनं वरं मा मां प्रति ॥ २१ ॥ | इस आत्मतत्त्वके विषयमें पहले—पूर्वकालमें देवताओंने भी विचिकित्सा—संशय किया था । साधारण पुरुषोंके लिये यह तत्त्व सुने जानेपर भी सुज्ञेय—अच्छी तरह जानने योग्य नहीं है, क्योंकि यह 'आत्मा' नामवाला धर्म बड़ा ही अणु—सूक्ष्म है । अतः हे नचिकेताः ! कोई दूसरा निश्चित फल देनेवाला वर माँग ले । जैसे धनी ऋणीको दबाता है उसी प्रकार तू मुझे न रोक । इस वरको तू मेरे लिये छोड़ दे ॥ २१ ॥ |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९

नचिकेताकी स्थिरता

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥

[ नचिकेता बोला—] हे मृत्यो ! इस विषयमें निश्चय ही देवताओंको भी सन्देह हुआ था तथा इसे आप भी सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते । [इसीसे वह मुझे और भी अधिक अभीष्ट है] तथा इस धर्मका वक्ता भी आपके समान अन्य कोई नहीं मिल सकता और न इसके समान कोई दूसरा वर ही है ॥ २२ ॥

| देवैरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं किलेति भवत एव नः श्रुतम् । त्वं च मृत्यो यद्यस्मान्न सुज्ञेयमात्मतत्त्वमात्थ कथयसि अतः पण्डितैरप्यवेदनीयत्वाद् वक्ता चास्य धर्मस्य त्वादृक्त्वत्तुल्यः अन्यः पण्डितश्च न लभ्यः अन्विष्यमाणोऽपि । अयं तु वरो निःश्रेयसप्राप्तिहेतुः । अतो नान्यो वरस्तुल्यः सदृशोऽस्त्येतस्य कश्चिदप्यनित्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यैवेत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥ | यह बात हमने अभी आपहीसे सुनी है कि इस विषयमें देवताओंने भी सन्देह किया था । और हे मृत्यो ! आप भी इस आत्मतत्त्वको सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते । अतः पण्डितोंसे अज्ञातव्य होनेके कारण इस धर्मका कथन करनेवाला आपके समान कोई और पण्डित ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता । और यह वर भी निःश्रेयसकी प्राप्तिका कारण है । अतः इसके समान और कोई भी वर नहीं है, क्योंकि और सभी वर अनित्य फलयुक्त हैं—यह इसका अभिप्राय है ॥ २२ ॥ |

३० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

३०कठोपनिषद्[ अध्याय १

यमराजका प्रलोभन

एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभ- <br> यन्नुवाच मृत्युः—नचिकेताके इस प्रकार कहनेपर <br> भी मृत्यु • उसे प्रलोभित करता <br> हुआ फिर बोला—

शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व<br> बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् ।<br>भूमेर्महदायतनं वृणीष्व<br> स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥

हे नचिकेता ! तू सौ वर्षकी आयुवाले बेटे-पोते, बहुत-से पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े माँग ले, विशाल भूमण्डल भी माँग ले तथा स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवित रह ॥ २३ ॥

शतायुषः शतं वर्षाण्यायूंषि एषां ताञ्शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व । किं च गवादिलक्षणान् बहून्पशून् हस्तिहिरण्यं हस्ती च हिरण्यं च हस्तिहिरण्यम् अश्वांश्च किं च भूमेः पृथिव्या महद्विस्तीर्णमायतनमाश्रयं मण्डलं राज्यं वृणीष्व । किं च सर्वमप्येतद् अनर्थकं स्वयं चेदल्पायुरित्यत आह—स्वयं च जीव त्वं जीव धारय शरीरं समग्रेन्द्रियकलापं शरदो वर्षाणि यावदिच्छसि जीवितुम् ॥ २३ ॥जिनकी सौ वर्षकी आयु हो ऐसे शतायु पुत्र और पौत्र माँग ले। तथा गौ आदि बहुत-से पशु, हाथी और सुवर्ण तथा घोड़े और पृथिवी-का महान् विस्तृत आयतन—आश्रय—मण्डल अर्थात् राज्य माँग ले । परन्तु यदि स्वयं अल्पायु हो तो ये सब व्यर्थ ही हैं—इसलिये कहते हैं—तू स्वयं भी जितना जीना चाहे उतने वर्ष जीवित रह; अर्थात् शरीर यानी समग्र इन्द्रिय-कलापको धारण कर ॥ २३ ॥

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१


एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं

वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।

महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि

कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥

इसीके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले । हे नचिकेतः ! इस विस्तृत भूमिमें तू वृद्धिको प्राप्त हो । मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ ॥ २४ ॥

एतत्तुल्यमेतेन यथोपदिष्टेन सदृशमन्यमपि यदि मन्यसे वरं तमपि वृणीष्व । किं च वित्तं प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविकां च सह वित्तेन वृणीष्वेत्येतत् । किं बहुना महत्यां भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव । किं चान्यत्कामानां दिव्यानां मानुषाणां च त्वा त्वां कामभाजं कामभागिनं कामार्हं करोमि सत्यसंकल्पो ह्यहं देवः ॥ २४ ॥इस उपर्युक्त वरके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे भी माँग ले । यही नहीं, धन अर्थात् प्रचुर सुवर्ण और रत्न आदि तथा उस धनके साथ चिरस्थायिनी जीविका भी माँग ले । अधिक क्या, हे नचिकेतः ! इस विस्तृत भूमिमें तू राजा होकर वृद्धिको प्राप्त हो । और तो क्या, मैं तुझे दैवी और मानुषी सभी कामनाओंका कामभागी अर्थात् इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ, क्योंकि मैं सत्य-संकल्प देवता हूँ ॥ २४ ॥

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके

सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।

३२ कठोपनिषद् [ अध्याय १

३२ कठोपनिषद् [ अध्याय १

इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥

मनुष्यलोकमें जो-जो भोग दुर्लभ हैं उन सब भोगोंको तू स्वच्छन्दता-पूर्वक माँग ले । यहाँ रथ और बाजोंके सहित ये रमणियाँ हैं । ऐसी स्त्रियाँ मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं होतीं । मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियोंसे तू अपनी सेवा करा । परन्तु हे नचिकेता ! तू मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ ॥ २५ ॥

| ये ये कामाः प्रार्थनीया दुर्लभाश्च मर्त्यलोके सर्वांस्तान् कामांश्छन्दत इच्छात्तः प्रार्थयस्व । किं चेमा दिव्या अप्सरसो रमयन्ति पुरुषानिति रामाः सह रथैर्वर्तन्त इति सरथाः सतूर्याः सवादित्रास्ताश्च न हि लम्भनीयाः प्रापणीया ईदृशा एवंविधा मनुष्यैर्मर्त्यैरस्मदादिप्रसादमन्तरेण । आभिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभिः परिचारिणीभिः परिचारयस्व आत्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रूषां कारयात्मन इत्यर्थः । नचिकेतो | इस मर्त्यलोकमें जो-जो कामनाएँ—प्रार्थनीय वस्तुएँ दुर्लभ हैं उन सबको छन्दतः—इच्छानुसार माँग ले । इसके सिवा ये रामा—जो पुरुषोंके साथ रमण करती हैं उन्हें 'रामा' कहते हैं, ऐसी ये दिव्य अप्सराएँ सरथा—रथोंके सहित और सतूर्या—तूर्यों ( बाजों ) के सहित मौजूद हैं । हम-जैसे देवताओंकी कृपाके बिना ये अर्थात् ऐसी स्त्रियाँ मरणधर्मा मनुष्योंको प्राप्त होने योग्य नहीं हैं । मेरे द्वारा दी हुई इन परिचारिकाओंसे तू अपनी परिचर्या अर्थात् पादप्रक्षालनादि सेवा करा; किन्तु हे नचिकेता ! मरण अर्थात् |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


मरणं मरणसंबद्धं प्रश्नं प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपरीक्षारूपं मानुप्राक्षीमैवं प्रष्टुमर्हसि ॥२५॥मरनेके पश्चात् जीव रहता है या नहीं—ऐसा कौएके दाँतोंकी परीक्षाके समान मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ, तुझे ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है ॥ २५ ॥

एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता महाह्रदवदक्षोभ्य आह—इस प्रकार प्रलोभित किये जानेपर भी नचिकेताने महान् सरोवरके समान अक्षुब्ध रहकर कहा—

नचिकेताकी निरीहता

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत-
त्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥

हे यमराज ! ये भोग 'कल रहेंगे या नहीं'—इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें [ हमें उनकी आवश्यकता नहीं है ] ॥ २६ ॥

श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति संदिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां भोगानां ते श्वोभावाः। किं च मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो यदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तज्जरयन्ति अपक्षयन्त्यप्सरःप्रभृतयो भोगाःआपने जिन भोगोंका उल्लेख किया है वे तो श्वोभाव हैं—जिनका भाव अर्थात् अस्तित्व 'कल रहेंगे या नहीं' इस प्रकार सन्देहयुक्त हो उन्हें श्वोभाव कहते हैं। बल्कि हे अन्तक—हे मृत्यो ! ये अप्सरा आदि भोग तो मनुष्यका जो यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंका तेज है उसे

३४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

३४कठोपनिषद्[ अध्याय १

| अनर्थायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयशःप्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं दित्ससि तत्रापि शृणु । सर्वं यद्ब्रह्मणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदादिदीर्घजीविका । अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥ | जीर्ण—क्षीण ही कर देते हैं, अतः धर्म, वीर्य, प्रज्ञा, तेज और यश आदिका क्षय करनेवाले होनेसे ये अनर्थके ही कारण हैं । और आप जो दीर्घजीवन देना चाहते हैं उसके विषयमें भी सुनिये । ब्रह्माका जो सम्पूर्ण जीवन—आयु है वह भी अल्प ही है, फिर हम-जैसोंके दीर्घजीवनकी तो बात ही क्या है ? अतः आपके रथादि वाहन और नाच-गान आपके ही रहें ॥ २६ ॥ |

| किं च— | इसके सिवा— |

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥

मनुष्यको धनसे तृप्त नहीं किया जा सकता । अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे । जबतक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ॥ २७ ॥

| न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः । न हि लोके वित्तलाभः कस्यचित्तृप्तिकरो दृष्टः | मनुष्यको अधिक धनसे भी तृप्त नहीं किया जा सकता है । लोकमें धनकी प्राप्ति किसीको भी तृप्त करनेवाली नहीं देखी गयी । |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३५

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३५


यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लप्स्यामहे प्राप्स्यामह इत्येतद्वित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम्। जीवितमपि तथैव। जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् ईशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः कथं हि मर्त्यस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत्। वरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्मविज्ञानम् ॥ २७ ॥अब, जब कि हम आपको देख चुके हैं तो, यदि हमें धनकी लालसा होगी तो, उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे। इसी प्रकार दीर्घजीवन भी पा लेंगे। जबतक आप याम्यपदपर शासन करेंगे तबतक हम भी जीवित रहेंगे। भला कोई भी मनुष्य आपके सम्पर्कमें आकर अल्पायु या अल्पधन कैसे रह सकता है ? किन्तु वर तो वह जो आत्मविज्ञान है वही हमारा वरणीय है ॥ २७ ॥
यतश्च—क्योंकि—

अजीर्यताममृतानामुपेत्य<br>जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।<br>अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा-<br>नतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥

कभी जराग्रस्त न होनेवाले अमरोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथिवी-पर रहनेवाला कौन जराग्रस्त विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरिक वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले [ स्त्रीसम्भोग आदि ] सुखोंको [ अस्थिर रूपमें ] देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवनमें सुख मानेगा ? ॥ २८ ॥

अजीर्यतां वयोहानिमप्राप्नुवताममृतानां सकाशमुपेत्य उपगम्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोजनान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्यः प्रजानन्वयोहानिरूप जीर्णताको प्राप्त न होनेवाले अमरों—देवताओं-की सन्निधिमें पहुँचकर उनसे प्राप्त होने योग्य अपने अन्य उत्कृष्ट प्रयोजनको—प्राप्तव्यको जानता—प्राप्त करता हुआ भी

३६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

३६कठोपनिषद्[ अध्याय १

| उपलभमानः स्वयं तु जीर्यन्मर्त्यो जरामरणवान्क्वधःस्थः कुः पृथिवी अधश्चान्तरिक्षादिलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठतीति क्वधःस्थः सन् कथमेवमविवेकिभिः प्रार्थनीयं पुत्रवित्तहिरण्याद्यस्थिरं वृणीते । <br><br> क्व तदास्थ इति वा पाठान्तरम् । अस्मिन्पक्षे चाक्षरयोजना । तेषु पुत्रादिष्वास्था आस्थितिः तात्पर्येण वर्तनं यस्य स तदास्थः ततोऽधिकतरं पुरुषार्थं दुष्प्रापमपि प्रापिषयिषुः क्व तदास्थो भवेन्न कश्चित्तदसारज्ञस्तदर्थी स्याद् इत्यर्थः। सर्वो ह्युपर्युपर्य्येव बुभूषति लोकस्तस्मान्न पुत्रवित्तादिलोभैः प्रलोभ्योऽहम् । किं चाप्सरःप्रमुखान्वर्णरतिप्रमोदाननवस्थित- | जो स्वयं जीर्ण होनेवाला और मरणधर्मा है अर्थात् जरामरणशील है ऐसा क्वधःस्थ—'कु' पृथिवीको कहते हैं, वह अन्तरिक्षादि लोकोंकी अपेक्षा अधः—नीची [होनेके कारण 'क्वधः' कहलाती] है, उसपर जो स्थित होता है वह क्वधःस्थ कहा जाता है; ऐसा होकर भी—इस प्रकार अविवेकियोंद्वारा प्रार्थनीय पुत्र, धन और सुवर्ण आदि अस्थिर पदार्थोंको कैसे माँगेगा ? <br><br> कहीं 'क्वधःस्थः' के स्थानमें 'क्व तदास्थः' ऐसा भी पाठ है । इस पक्षमें अक्षरोंकी योजना इस प्रकार करनी चाहिये । उन पुत्रादिमें जिसकी आस्था—आस्थिति अर्थात् तत्परतापूर्वक प्रवृत्ति है वह 'तदास्थ' है । जो उनसे भी उत्कृष्टतर और दुष्प्राप्य पुरुषार्थको पानेका इच्छुक है वह पुरुष उनमें आस्था करनेवाला कैसे होगा ? अर्थात् उन्हें असार समझनेवाला कोई भी पुरुष उनका अर्थी (इच्छुक) नहीं हो सकता, क्योंकि सभी लोग उत्तरोत्तर उन्नत ही होना चाहते हैं; अतः मैं पुत्र-धन आदि लोभोंसे प्रलोभित नहीं किया जा सकता । तथा वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले अप्सरा आदि सुखोंकी अस्थिररूपमें भावना करता |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


रूपतयाभिध्यायन्निरूपयन्यथावत् अतिदीर्घे जीविते को विवेकी रमेत ॥ २८ ॥हुआ; उन्हें यथावत् ( मिथ्यारूपसे ) समझता हुआ कौन विवेकी पुरुष अति दीर्घ जीवनमें प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥

अतो विहायानित्यैः कामैः प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्—अतः मुझे इन मिथ्या भोगोंसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके लिये मैंने प्रार्थना की है और—

यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥

हे मृत्यो ! जिस ( परलोकगत जीव ) के सम्बन्धमें लोग 'है या नहीं हैं' ऐसा सन्देह करते हैं तथा जो महान् परलोकके विषयमें [ निश्चित विज्ञान ] है वह हमसे कहिये । यह जो गहनतामें अनुप्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं माँगता ॥ २९ ॥

यस्मिन्प्रेत इदं विचिकित्सनं विचिकित्सन्ति अस्ति नास्तीत्येवंप्रकारं हे मृत्यो साम्पराये परलोकविषये महति महत्प्रयोजननिमित्ते आत्मनोहे मृत्यो ! जिस परलोकगत जीवके विषयमें ऐसा सन्देह करते हैं कि मरनेके अनन्तर 'रहता है या नहीं रहता' उस महान्—महान् प्रयोजनके निमित्तभूत साम्पराय—परलोकके सम्बन्धमें उस आत्माका जो निश्चित विज्ञान

३८ कठोपनिषद् [ अध्याय १

३८ कठोपनिषद् [ अध्याय १

| निर्णयविज्ञानं यत्तद्ब्रूहि कथय<br>नोऽस्मभ्यम्। किं बहुना योऽयं<br>प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढं<br>गहनं दुर्वि्वेचनं प्राप्तोऽनुप्रविष्टः<br>तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थ-<br>नीयमनित्यविषयं वरं नचिकेता<br>न वृणीते मनसापीतिश्रुतेर्वचन-<br>मिति ॥ २९ ॥ | है वह हमसे कहिये। अधिक क्या,<br>यह जो आत्मविषयक प्रकृत वर है<br>वह बड़ा ही गूढ—गहन है और<br>दुर्वि्वेचनीयताको प्राप्त हो रहा है।<br>उस वरसे अन्य अविवेकी पुरुषोंद्वारा<br>प्रार्थनीय कोई और अनित्य वस्तु-<br>विषयक वर नचिकेता मनसे भी नहीं<br>माँगता—यह श्रुतिका वचन है॥२९॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ १ ॥

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९

द्वितीया वल्ली

श्रेय-प्रेयविवेक

परीक्ष्य शिष्यं विद्यायोग्यतां चावगम्याह—इस प्रकार शिष्यकी परीक्षा कर और उसमें विद्या-ग्रहणकी योग्यता जान यमराजने कहा—

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-
स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु-
र्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥

श्रेय (विद्या) और है तथा प्रेय (अविद्या) और ही है। वे दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होते हुए ही पुरुषको बाँधते हैं। उन दोनोंमेंसे श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयको वरण करता है वह पुरुषार्थसे पतित हो जाता है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
अन्यत्पृथगेव श्रेयो निःश्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेयः प्रियतरमपि । ते प्रेयःश्रेयसी उभे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्मकर्त्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः। श्रेयःप्रेयसोर्ह्यभ्युदयामृतत्वार्थीश्रेय अर्थात् निःश्रेयस अन्यत्—भिन्न ही है तथा प्रेय यानी प्रियतर वस्तु भी अन्य ही है। वे श्रेय और प्रेय दोनों विभिन्न प्रयोजनवाले होनेपर भी अधिकारी यानी वर्णाश्रमादिविशिष्ट पुरुषका बन्धन कर देते हैं; अर्थात् सब लोग उन्हींके द्वारा अपने [विद्या-अविद्यासम्बन्धी] कर्त्तव्यसे युक्त हो जाते हैं। अभ्युदयकी इच्छावाला पुरुष प्रेयसे और अमृतत्वका

४० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

४०कठोपनिषद्[ अध्याय १

| पुरुषः प्रवर्तते। अतः श्रेयःप्रेयः-प्रयोजनकर्तव्यतया ताभ्यां बद्ध इत्युच्यते सर्वः पुरुषः। <br><br> ते यद्यप्येकैकपुरुषार्थसम्बन्धिनौ विद्याविद्यारूपत्वाद्विरुद्धे इत्यन्यतरापरित्यागेनैकेन पुरुषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोर्हित्वाविद्यारूपं प्रेयः श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः साधु शोभनं शिवं भवति। यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकात्प्रयोजनान्नित्यात् प्रच्यवत इत्यर्थः। कोऽसौ य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥ १ ॥ | इच्छुक श्रेयसे प्रवृत्त होता है। अतः श्रेय और प्रेय इन दोनोंके प्रयोजनोंकी कर्तव्यताके कारण सब लोग उनसे बद्ध कहे जाते हैं। <br><br> वे यद्यपि एक-एक पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं तो भी विद्या और अविद्यारूप होनेके कारण परस्पर विरुद्ध हैं, अतः एकका परित्याग किये बिना एक पुरुषद्वारा उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान न हो सकनेके कारण उनमेंसे अविद्यारूप प्रेयको छोड़कर केवल श्रेयको ही स्वीकार करनेवालेका साधु—शुभ यानी कल्याण होता है। जो मूढ़ दूरदर्शी नहीं है वह इस अर्थ—पुरुषार्थ अर्थात् परमार्थसम्बन्धी नित्य प्रयोजनसे च्युत हो जाता है; वह कौन है? वही जो कि प्रेयको वरण करता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥ |


| यद्युभे अपि कर्तुं स्वायत्ते पुरुषेण किमर्थं प्रेय एवादत्ते बाहुल्येन लोक इत्युच्यते— | यदि श्रेय और प्रेय इन दोनोंहीका करना मनुष्यके स्वाधीन है तो लोग अधिकतासे प्रेयको ही क्यों स्वीकार करते हैं? इसपर कहा जाता है— |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१


श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत-
स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २ ॥

श्रेय और प्रेय [परस्पर मिले हुए-से होकर] मनुष्यके पास आते हैं। उन दोनोंको बुद्धिमान् पुरुष भली प्रकार विचारकर अलग-अलग करता है। विवेकी पुरुष प्रेयके सामने श्रेयको ही वरण करता है; किन्तु मूढ योग-क्षेमके निमित्तसे प्रेयको वरण करता है ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सत्यं स्वायत्ते तथापि साधनतः फलतश्च मन्दबुद्धीनां दुर्वि्वेकरूपे सती व्यामिश्रीभूते इव मनुष्यमेतं पुरुषमा इतः प्राप्नुतः श्रेयश्च प्रेयश्च। अतो हंस इवाम्भसः पयस्तौ श्रेयःप्रेयःपदार्थौ सम्परीत्य सम्यक्परिगम्य मनसालोच्य गुरुलाघवं विविनक्ति पृथक्करोति धीरो धीमान् । विविच्य च श्रेयो हि श्रेय एवाभिवृणीते प्रेयसोऽभ्यर्हितत्वात् । कोऽसौ धीरः ।वे मनुष्यके अधीन हैं—यह बात ठीक है। तथापि वे श्रेय और प्रेय मन्दबुद्धि पुरुषोंके लिये साधन और फलदृष्टिसे जिनका पार्थक्य करना बहुत कठिन है ऐसे होकर परस्पर मिले हुएसे ही मनुष्य यानी इस जीवको प्राप्त होते हैं। अतः हंस जिस प्रकार जलसे दूध अलग कर लेता है उसी प्रकार धीर—बुद्धिमान् पुरुष उन श्रेय और प्रेय पदार्थोंका भली प्रकार परिगमन कर—मनसे उनकी आलोचना कर उनके गौरव और लाघवका विवेक यानी पृथक्करण करता है। इस प्रकार श्रेयका विवेचन कर वह प्रेयकी अपेक्षा अधिक अभीष्ट होनेके कारण श्रेयको ही ग्रहण करता हैं। परन्तु ऐसा करता कौन है? वही जो बुद्धिमान् है।

४२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

४२कठोपनिषद्[ अध्याय १

| यस्तु मन्दोऽल्पबुद्धिः स विवेकासामर्थ्याद्योगक्षेमाद्योग-क्षेमनिमित्तं शरीराद्युपचयरक्षण-निमित्तमित्येतत्प्रेयः पशुपुत्रादि-लक्षणं वृणीते ॥ २ ॥ | इसके विपरीत जो मन्द—अल्प बुद्धि है वह, विवेकशक्तिका अभाव होनेके कारण, जो योग-क्षेमका ही कारण है अर्थात् जो शरीरादिकी वृद्धि और रक्षाका ही निमित्त है उस पशु-पुत्रादिरूप प्रेयको ही वरण करता है ॥ २ ॥ |


स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामा-<br> नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।<br> नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो<br> यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥

हे नचिकेतः ! उस तूने पुत्र-वित्तादि प्रिय और अप्सरा आदि प्रियरूप भोगोंको, उनका असारत्व चिन्तन करके, त्याग दिया है और जिसमें बहुत-से मनुष्य डूब जाते हैं उस इस धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं हुआ ॥ ३ ॥

स त्वं पुनःपुनर्मया प्रलोभ्य-मानोऽपि प्रियान् पुत्रादीन् प्रियरूपांश्चाप्सरःप्रभृतिलक्षणान् कामानभिध्यायंश्चिन्तयंस्तेषाम् अनित्यत्वासारत्वादिदोषान् हे नचिकेतोऽत्यस्राक्षीरतिसृष्टवान् परित्यक्तवानस्यहो बुद्धिमत्ता तव। नैतामवाप्तवानसि सृङ्कां सृतिं कुत्सितां मूढजनप्रवृत्तांहे नचिकेतः ! तेरी बुद्धिमत्ता धन्य है; जिस तूने कि मेरे द्वारा बारम्बार प्रलोभित किये जानेपर भी पुत्रादि प्रिय तथा अप्सरा आदि प्रियरूप भोगोंको, उनकी अनित्यता और असारता आदि दोषोंका विचार करके परित्याग कर दिया, और जिसमें मूढ़ पुरुष प्रवृत्त हुआ करते हैं उस वित्तमयी—धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३


वित्तमयीं धनप्रायाम्। यस्यां सृत्तौ मज्जन्ति सीदन्ति बहवोऽनेके मूढा मनुष्याः ॥ ३ ॥हुआ, जिस मार्गमें कि बहुत-से मूढ पुरुष डूब जाते अर्थात् दुःख उठाते हैं॥ ३ ॥

तयोः श्रेय आददानस्य साधुर्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीत<br><br>इत्युक्तं तत्कस्माद्यतः—‘उनमेंसे श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयको वरण करता है वह स्वार्थसे पतित हो जाता है’ ऐसा जो ऊपर (इस वल्लीके प्रथम मन्त्रमें) कहा गया है, सो क्यों ? [इसपर यमराज कहते हैं, ] क्योंकि—

दूरमेते विपरीते विषूची
अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये
न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥

जो विद्या और अविद्यारूपसे जानी गयी हैं वे दोनों अत्यन्त विरुद्ध स्वभाववाली और विपरीत फल देनेवाली हैं। मैं तुझ नचिकेताको विद्याभिलाषी मानता हूँ, क्योंकि तुझे बहुत-से भोगोंने भी नहीं लुभाया ॥ ४ ॥

दूरं दूरेण महतान्तरेणैते विपरीते अन्योन्यव्यावृत्तरूपे विवेकाविवेकात्मकत्वात्तमःप्रकाशाइव।<br><br>विषूची विषूच्यौ नानागती भिन्नफले संसारमोक्षहेतुत्वेनेत्येतत् ।ये दोनों प्रकाश और अन्धकारके समान विवेक और अविवेकरूप होनेसे ‘दूरम्’ अर्थात् महान् अन्तरके साथ विपरीत हैं—आपसमें एक-दूसरेसे व्यावृत्तरूप हैं।<br><br>और विषूची अर्थात् नाना गतिवाले हैं यानी संसार और मोक्षके कारण होनेसे विभिन्न फलयुक्त हैं।

४४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

४४कठोपनिषद्[ अध्याय १

| के ते इत्युच्यते। या चाविद्या प्रेयोविषया विद्येति च श्रेयोविषया ज्ञाता निर्ज्ञातावगता पण्डितैः। तत्र विद्याभीप्सिनं विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये। कस्माद्यस्मादविद्वद्बुद्धिप्रलोभिनः कामा अप्सरःप्रभृतयो बहवोऽपि त्वा त्वां नालोलुपन्त न विच्छेदं कृतवन्तः श्रेयोमार्गादात्मोपभोगाभिवाञ्छासंपादनेन। अतो विद्यार्थिनं श्रेयोभाजनं मन्य इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ | वे कौन हैं—इसपर कहते हैं—'जो कि पण्डितोंद्वारा प्रेयको विषय करनेवाली अविद्या तथा श्रेयोविषया विद्यारूपसे जानी गयी हैं। उनमें तुझ नचिकेताको मैं विद्याभिलाषी अर्थात् विद्यार्थी मानता हूँ। क्यों मानता हूँ ? क्योंकि अविवेकियोंकी बुद्धिको प्रलोभित करनेवाले अप्सरा आदि बहुत-से भोग भी तुम्हें लुभा नहीं सके—उन्होंने तेरे हृदयमें अपने भोगकी इच्छा उत्पन्न करके तुझे श्रेयोमार्गसे विचलित नहीं किया। अतः मैं तुझे विद्यार्थी यानी श्रेयका पात्र समझता हूँ—यह इसका अभिप्राय है ॥ ४ ॥ |

अविद्याग्रस्तोंकी दुर्दशा

ये तु संसारभाजनाः—किन्तु जो संसारके पात्र हैं—

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥

वे अविद्याके भीतर रहनेवाले, अपने-आप बड़े बुद्धिमान् बने हुए और अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ पुरुष, अन्धेसे ही ले जाये जाते हुए अन्धेके समान अनेकों कुटिल गतियोंकी इच्छा करते हुए भटकते रहते हैं ॥ ५ ॥

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५


| अविद्यायामन्तरे मध्ये घनीभूत इव तमसि वर्तमाना वेष्ट्यमानाः पुत्रपश्वादितृष्णापाशशतैः । स्वयं वयं धीराः प्रज्ञावन्तः पण्डिताः शास्त्रकुशलाश्चेति मन्यमानास्ते दन्द्रम्यमाणा अत्यर्थं कुटिलामनेकरूपां गतिम् इच्छन्तो जरामरणरोगादिदुःखैः परियन्ति परिगच्छन्ति मूढा अविवेकिनोऽन्धेनैव दृष्टिहीनेनैव नीयमाना विषमे पथि यथा बहवोऽन्धा महान्तमनर्थमृच्छन्ति तद्वत् ॥५॥ | वे घनीभूत अन्धकारके समान अविद्याके भीतर स्थित हो पुत्र-पशु आदि सैकड़ों तृष्णापाशोंसे बँधे हुए [व्यवहारमें लगे रहते हैं] । जिस प्रकार अन्धे यानी दृष्टिहीन पुरुषसे विषम मार्गमें ले जाये जाते हुए बहुत-से अन्धे महान् अनर्थको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार 'हम बड़े धीर यानी बुद्धिमान् हैं और पण्डित अर्थात् शास्त्रकुशल हैं' इस प्रकार अपनेको माननेवाले वे मूढ़—अविवेकी पुरुष नाना प्रकारकी अत्यन्त कुटिल गतियोंकी इच्छा करते हुए जरा, मरण और रोगादि दुःखोंसे सब ओर भटकते रहते हैं ॥ ५ ॥ | | अत एव मूढत्वात्— | अतएव मूढ़ताके कारण— |

न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥

धनके मोहसे अन्धे हुए और प्रमाद करनेवाले उस मूर्खको परलोकका साधन नहीं सूझता । यह लोक है, परलोक नहीं है—ऐसा माननेवाला पुरुष बारम्बार मेरे वशको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥

४६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

४६कठोपनिषद्[ अध्याय १

| न साम्परायः प्रतिभाति । सम्पर ईयत इति सम्परायः परलोकस्तत्प्राप्तिप्रयोजनः साधनविशेषः शास्त्रीयः साम्परायः । स च बालमविवेकिनं प्रति न प्रतिभाति न प्रकाशते नोपतिष्ठत इत्येतत् । | उसे साम्पराय भांसित नहीं होता । देहपातके अनन्तर जिसके प्रति गमन किया जाय उसे सम्पराय—परलोक कहते हैं । उसकी प्राप्ति ही जिसका प्रयोजन है वह साधनविशेष शास्त्रीय साम्पराय है । वह बाल अर्थात् अविवेकी पुरुषके प्रति प्रकाशित नहीं होता, अर्थात् वह उसके चित्तके सम्मुख उपस्थित नहीं होता । | | प्रमाद्यन्तं प्रमादं कुर्वन्तं पुत्रपश्वादिप्रयोजनेष्वासक्तमनसं तथा वित्तमोहेन वित्तनिमित्तेनाविवेकेन मूढं तमसाच्छन्नं सन्तम् । 'अयमेव लोको योऽयं दृश्यमानः स्त्र्यन्नपानादिविशिष्टो नास्ति परोऽदृष्टो लोक इत्येवं मननशीलो मानी पुनः पुनर्जनित्वा वशं मदधीनतामापद्यते मे मृत्योर्मम । जननमरणादिलक्षणदुःखप्रबन्धारूढ एव भवतीत्यर्थः । प्रायेण ह्येवंविध एव लोकः ॥६॥ |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७

आत्मज्ञानकी दुर्लभता

यस्तु श्रेयोऽर्थी सहस्रेषु कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधो यस्मात्—किन्तु जो तेरे समान श्रेयकी इच्छावाला है ऐसा तो हजारोंमें कोई ही आत्मवेत्ता होता है; क्योंकि—

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः
शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा-
श्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥

जो बहुतोंको तो सुननेके लिये भी प्राप्त होनेयोग्य नहीं है, जिसे बहुत-से सुनकर भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्वका निरूपण करनेवाला भी आश्चर्य्यरूप है, उसको प्राप्त करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्यद्वारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्य्यरूप है ॥ ७ ॥

श्रवणायापि श्रवणार्थं श्रोतुम् अपि यो न लभ्य आत्मा बहुभिरनेकैः शृण्वन्तोऽपि बहवोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युर्न विदन्त्यभागिनोऽसंस्कृतात्मानो न विजानीयुः । किं चास्य वक्तापि आश्चर्योऽद्भुतवदेवानेकेषु कश्चिद् एव भवति । तथा श्रुत्वाप्यस्य आत्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति । यस्माद् आश्चर्यो ज्ञाता कश्चिदेव कुशलानुशिष्टः कुशलेन निपुणेन आचार्येणानुशिष्टः सन् ॥७॥जो आत्मा बहुतोंको तो सुननेके लिये भी नहीं मिलता तथा दूसरे बहुत-से अभागी अशुद्धचित्त पुरुष जिस आत्मतत्त्वको सुनकर भी नहीं जान पाते । यही नहीं, इसका वक्ता भी आश्चर्य अर्थात् अद्भुत-सा ही है—वह भी अनेकोंमें कोई ही होता है । तथा सुनकर भी इस आत्माका लब्धा (ग्रहण करनेवाला) तो अनेकोंमें कोई निपुण पुरुष ही होता है, क्योंकि जिसे [आत्मदर्शनमें] कुशल आचार्यने उपदेश किया हो ऐसा इसका ज्ञाता भी आश्चर्य्यरूप ही है ॥७॥