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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

५६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रस्य— कण्डिका ॥ ९० ॥ सू० १ ।—अथ मधुपर्को उच्यते । आचार्ये गृहमागते इदं कर्म करोति । सू० ९ ।—सूक्तं जपित्वा पुनराचार्य उदकमभिमंत्रयते । कण्डिका ॥ ९२ ॥ सू० १४ ।—आचार्यो ब्रूते तृणानि गौरस्त्विति । तृणानि ददाति गवे । सू० २५ ।--भूयसो भूयस्मेति मंत्रेण ॥— ॥ इति द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ कण्डिका ॥ ९३ ॥ अद्भुतकर्मपरिभाषा उच्यन्ते । ⸱⸱⸱लोकविरुद्धं दृश्यते यत्तदद्भुतमित्युच्यते । अद्भुतशान्तियंत्र न क्रियते तत्र दोषो भवति । अद्भुतं यत्र भवति तत्पराभवति विनश्यति । विनाशार्थे अद्भुतं देवाः सृजन्ति । सू० ९ ।--श्वौषस्थामनुदित्यां ⸱⸱ उषामनुदित्यां । सू० १० ।--दारुणसंवत्सरे दुर्भिक्षे मारके वा । सू० १३ ।-- देवतेषु⸱⸱⸱सू० २१। —धेनुर्धेनुं धयत्यां । सू०२२।—आकाशफेनं पिबति । सू० २६।— अनाज्ञातमद्भुतं दृश्यते । यदद्भुतेन पठितं तदनाज्ञातमद्भुतमथवालौकिकं जुगु- प्सितं वा अदृष्टं वा । सू० ३२ ।--यूपो । सू० ३४ ।—धूमकेतुः सप्तऋषीन् । सू० ३६ ।-मांसमुखो । सू० ३७ ।-अनग्नावभासे । सू० ३८ ।-श्वसति । सू० ४० ।-ग्रास्योऽग्निः । सू० ४२ ।-कुम्भोद्धाने— कण्डिका ॥ ९४—१२० ॥ १०० क०-सू० ३ ।-शकधूममिति सूक्तेनाज्यं जुहुयात् । विषासहिमित्यनु- वाकेन । रोहितैरुपतिष्ठते । १०३--अववर्षणे ग्रहनक्षत्राणां समापेक्षे⸱⸱⸱शान्तिः । १०४-सू० २ ।-या असुरा इति द्वाभ्यां ।-१०५-या असुरा ।-१०६ ।—सीता- मध्ये लाङ्गलसंसर्गे पुच्छसंसर्गे च ।-११५।-सू० १ ।-पुरुषो वा आकाशफेनं भक्षयति ।-११६ । सू० ३-४ ।-पिपीलिकायां शान्तिः समाप्ता । अथ पिपीलि- काभिचार उच्यते-११८ ।-अथ मधुजालके गृहे लग्ने शान्तिरुच्यन्ते-११९। अथ सर्वाद्भुतेषु शान्तिरुच्यते । भार्गव्याणि । गार्ग्याणि । बार्हस्पत्याद्भुतानि । महा- ऽद्भुतानि औशनसाद्भुतानि । यद् ग्रंथे न पठ्यते तत्सर्वमनाज्ञातमित्युच्यते । यदपि परिशिष्टेषु पठ्यते । इतिहासपुराणज्योतिःशास्त्रे अश्ववैद्यके नरवैद्यकेषु पठि- तेषु अद्भुतेषु सर्वाद्भुतेषु एषा शान्तिः । अथवा महाशान्तिरमृता घृतकम्बलकोटि- होम सर्वाद्भुतेषु कौशिकअपठितेषु एषा शान्तिः । महाशान्तिर्वा विकल्पात् इति भाष्यकारः । इति त्रयोदशोऽध्यायश्चतुर्दशश्च ॥ १३ ॥ १४ ॥

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। शुद्धिपत्रम् ॥ —❀— पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध १७ ५ सूर्योदयन्तः सूर्योदयतः ,, १२ हाम होम १९ १० शमा शमी ,, १२ यजकर्ताक यज्ञ कर्त्ता को ,, १३ कम कर्म ,, १५ प्रयाग प्रयोग २० ३ प्रमन्दा प्रमन्दो ,, ६ तल तिल ,, ६ प्रिङ्ग प्रियङ्गु २१ ७ वनस्पतानिति वनस्पतीनिति ,, १९ श्रोत्रियाय श्रोत्राय २२ ७ जिह्वा जिह्वां ,, १८ अथव अथर्व २३ २७ आग्रयण आग्रहायण २५ १६ मथ्न मन्थ २६ ११ लोभानि लोमानि ,, १३ ॥ ६२ ॥ ॥ २ ॥ २७ ९ ॥ ६ ॥ ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ ,, १० लोमणि लोममणि ,, १३ अङ्गल अङ्गुल ,, १७ किलासमये किलासमजे २८ ६ समिंध समिध ३१ २१ अङ्गर भङ्गार ३५ १ भूतो भृतो

( २ ) पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ४९ १७ अभिमंन्त्रण अभिमंत्रण ५१ ४ निवति निर्वपति ५५ २८ बहुमूल बहुमूत्र ५६ १३ मूस्त ' मूस ५६ १७ अग्निमंत्रण अभिमंत्रण ,, २४ उपर ऊपर ५७ ४ भूमि भूमिं ५८ १७ अवसेचत अवसेचन ,, ,, जलोदरक जलोदरके ५९ ११ हाथ धनुष को हाथ में धनुष को लेकर ६३ २० ओलनी ओलती ६९ १४ विल्लिगी विलिगी ७० २१ शीर शीभ ७५ २३ सिंचन कर सिञ्चन करे ८० १६ तेहतीसवी तेतीसवीं ८४ २९ पैहाने पैताने ८६ २७ ॥ ७ ॥ ॥ १७ ॥ ,, २९ ॥ ११ ॥ ॥ १८ ॥ ९१ १५ अकवीन अकवन ९६ १६ सत सूत ९७ २२ पिवे पीवे १०९ ५ बभूथ बभूव १११ ५ मन्याशायां मन्याशालायां ११२ २३ पांशों पाशों १२८ १० गडूजी गुडूची १२९ २६ ही हो १३५ १४ माता और पिता माता माता और पिता १५० १५ भूमिका भूमिको १५६ १७ दाता देवे देवे १६२ १० सच सबको

( ३ ) पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध १६२ ११ ,, १२ ,, १३ ,, १४ ,, १५ } सब सबको ,, १६ ,, १७ ,, १८ १६४ २४ सदसठ सरसठ १६५ १९ थजमा को यजमान से १५१ २४ रवि रवीँ ,, २७ रवि रवीँ १७४ १८ पुतावे न बुझावे १८३ १८ कमर इजर कमर में इजार १९० २३ हय यह २०७ १७ कह कहे २०९ १८ नावे नाव को घरे २१८ २४ भो भोः २३१ २६ चारवी चौथी २३४ २३ आठहवी आठवीं २४३ २३ वन के आध टीका संग्रह शुद्धा शुद्धि वन के आधे ९ ८ मध्यमधर मध्यमा धर २४ २७ अमिमृ अभिमृ २५ २५ काराणि द्वाराणि २५ ३० मृगारव मृगाखर ३० १६ तदक्षन् तद्वदत् ३० २२ चिन्याद्या चित्याद्या ३१ २३ वा प्रताप वा प्रतापयति ३१ २८ यांखे यां त्वे ३१ २९ न शिक्षस्य शिक्षस्य

विज्ञापन । प्रत्येक बड़े २ रोगों, भूत, प्रेतादिक उपद्रवों, जादू टोनादिको दूर करना, इनकी अचूक दवा, वेदोक्त यन्त्र, आभिमंत्रित बूटियों द्वारा रोगों को दूर करना, युद्ध, मोकदमा, की जीत होगी। इत्यादि । १ मृतवत्सा रोग—गर्भ या जन्मते ही या छोटे या स्याने होने पर बच्चे मर जाया करते । २ वन्ध्या —अनेक प्रकार की होती है। इनको नहीं जानने से लोग प्रारब्ध पर तकिया करके निरुपाय हो बैठ जाते हैं। ३ सन्तान न होना, जन्म भर दुःखी रहना—प्रेतादि के आवेश से, डाइन के करतूत से, शाप से, पूर्व- जन्म कृत पाप से, तथा अन्यान्य अज्ञात कारणों से, ऐसा होता है। ४ सूतिका को—बच्चा होते समय ऐसी पीड़ा होने लगती जो ३-४ दिन तक उसकी मरण की दशा हो जाती या तो मरजाया करती या उसका डाक्टर द्वारा औपरे- शन होता है, ऐसी स्त्री ३ प्रकार की होती है। विकृतगर्भा, (टेढ़ा मेढ़ा, उलटा) मूढ़गर्भा (पता नहीं लगता कि क्या कारण है) और मृतगर्भा (पेट ही में बच्चा मरजाता) में बहुत ख़र्च करने पर अत्यल्पसंख्यकों की जान बच जाती है। अधिकांश की मृत्यु ही हो जाती है। ५ प्रेत, भूत, पिशाच, व चूडैल, यक्ष (जिन्न) अप्सरा (परी) आदि के आवेश से प्रायः स्त्रियां बालक और छोटे बच्चे तथा कतिपय पुरुष भी दुःखी होते हैं। ६ भूतादि आविष्ट व्यक्ति रोगयुक्त होने पर, रोगों की दवा करते करते, आविष्ट रोगी मरजाते परन्तु केवल दवा से रोगी अच्छे नहीं हो पाते) जब तक भूतादि को यन्त्रादि अलौकिक शक्ति से काम न लिया जाय । ७ बहुत सी स्त्रियाँ, पुरुष, बालक, आदि प्रयोग से वशी करण, पागलपन, उच्चाटन, मारण, मोहन आदि का प्रयोग करने पर लोग बेकार हो जाते हैं। ८ जिन्न, परी, जबरदस्त प्रेत, विनायक जो मामूली मन्त्र प्रयोक्ता से नहीं हटते, मकान, पाखाना, स्कूल, आदि में भी बदमाश प्रेत लोगोंको कष्ट पहुँचाते हैं। बहुत से नये मकान बनवा कर लोग उनमें रह नहीं पाते—रहने से आ जन्म दुःखी या बहुत से मरने लगते हैं।

( २ ) कतिपय रोगों का नाम—कोष्ठबद्ध ( कब्ज ), अतीसार ( बहुत दस्त होना या आंव ), पाण्डु ( कामला ), तक्षण ( कठिन ज्वर ), काश, पामन् ( चर्मरोग, खुजली ), बलास ( क्षयरोग, थैसिस ) कुष्ठ व्याधि, रक्त स्राव ( खून बहना ) प्रस्त्राव बन्द ( पेशाबबन्द), वक्षःपीड़ा, क्षेत्रिय रोग ( Hiriditary diseases ) गठिया ( पक्षाघात ) कृमिरोग ( मनुष्य का ), कृमिरोग ( पशुका ) । नष्टवीर्य, विष, सर्पविष, क्षत ( जखम ) नेत्र की बीमारी, बालों का उड़- जाना, शोथ, गण्डमाला, शूल रोग, यक्ष्मा ( तपेदिक ), पागलपन, धातुक्षीणता, वातव्याधि। इत्यादि अनेक रोग जिनका इलाज करने पर भी भला नहीं होता हो। पाञ्चभौतिक शरीर या स्थूल शरीर, लिङ्गशरीर और कारण शरीर—ये तीन शरीर होते हैं । आयुर्वेद, एलो पैथिक, होमिओपैथिक आदि का जो इलाज या दवा करायी जाती है वह केवल भौतिक वा स्थूल शरीर का ही इलाज होता है । यह बात जानने की है जो रोग तीन प्रकार से अच्छा किया जाता है । दवा देकर ( खिलाकर, सूंघाकर, लगाकर, सूई देकर, घाव को चीर कर, मलहमादि से ) यह तो हुआ एक प्रकार । दूसरा प्रकार मन्त्रों से झाड़ कर, तीसरा यन्त्र वा एक जड़ी के उपयोग से पहिले प्रकार से जो इलाज होता है वह कम सफल होता-प्रत्युत अनाड़ी वैद्य, डाक्टर से काम पड़ा तो मुक्ति हो जाती है या शरीर बेकार हो जाता, हमारे आर्य्य पूज्य महर्षियों ने अथर्ववेदादि द्वारा प्रत्येक रोगों को मन्त्रों से यन्त्रों द्वारा और केवल एक २ जड़ी के उपयोग से छुड़ाने का उपाय बतलाया है आज मुझे ८१ वर्ष की उमर हुई एक समय मुझको चित्रकूट जाने का संयोग हुआ । और वहां एक मुझे सिद्ध साधु का दर्शन हुआ जो वेद का भी ज्ञाता थे इन से १ सप्ताह संग हुआ इनके द्वारा हमको हिन्दू धर्म, मन्त्र, तन्त्र, यन्त्रादि का रहस्य मालूम हुआ । इन्हीं कारणों से हमने अपने अन्तिम जीवन में जनता की सेवा करने के विचार से यह विज्ञापन दिया है कि सर्व साधारण इस कार्यालय से पत्र व्यवहार कर इन अलौकिक शक्ति निहित यन्त्र, मन्त्र, जड़ियों से फायदा उठावें । केवल एक जड़ी का दाम एवं इसके काम बताते हैं । स्त्रियों को बच्चा जनने समय जो असह्य कष्ट होता है प्रत्युत बहुतों को मृत्यु तक हो जाया करती । चाहे जिस प्रकार का कष्ट हो—इस जड़ी से प्रसव दुःख न होकर बच्चा मरा या जिन्दा अवश्य वेदना रहित दश मिनट के भीतर गर्भ से निकल बाहर हो जावेगा । जड़ी का दाम २॥) डाक व्यय सहित । इसको पत्थर पर घस कर सूतिका स्त्री अपने दोनों हाथों में लगा कर ५ मिनट तक एक दृष्टि से देखेगी इतने ही में बच्चा सुख पूर्वक बाहर आयेगा । स्मरण रहे कि घड़ी में ५ मिनट से अधिक समय न हो, अन्यथा स्त्री का आन्त्र सहित बाहर हो जावेगा और-यह जड़ी उपविष है इसलिये शीघ्र ही हाथों को साबुन आदि

( ३ ) से भलीभांति साफ कर लेना चाहिये-दाम २॥) रु० है। इसमें ५ सूतिका का काम चलेगा और किसी पुरुष के धातु क्षीणता चाहे असाध्य हो, उसका यन्त्र, दवा, तरकीब दाम ५) और थैसिस-जो १ सालके भीतर का हो । यन्त्र, दवा, तरकीब १०) । बाकी रोगों का हाल लिखकर जवाबी टिकट या पोस्टकार्ड भेजना । पत्र लिखते समय रोगी या दुःखी व्यक्ति स्त्री हो या पुरुष उसको उमर, जाति, शरीर का रंग, स्वभाव हो सके तो उसका फोटो एवं पत्र को उसके दहीने ( पुरुष ) या बायें हाथ (यदि स्त्री हो) से स्पर्श करा कर भेजना चाहिये । रोगी किस धर्म को मानने वाला है, मांस खानेवाला है या निरामिष, ईश्वर में उसे विश्वास है या नास्तिक है। इत्यादि बातें लिखनी चाहिये । लिफाफा के भीतर तीन पैसे या डेढ़ आने का टिकट जवाब के लिये -)॥ पैसे का टिकट यों ≡)॥ का टिकट अवश्य भेजना चाहिये । पत्र हिन्दी, संस्कृत या अंग्रेजी में होना चाहिये । एवं अपना पता पूरा देना चाहिये ।

ठाकुर गणेशदत्त सिंह, शास्त्रप्रकाशभवन, मधुरापुर, डाक, बिद्दूपुर बाज़ार । जि. मुज़फ्फरपुर, ( बिहार ) ।

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विक्रेय पुस्तकों की सूची । १—न्यायदर्शन वात्स्यायनभाष्य और भाषानुवाद ३।।) २—गोभिल गृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... २॥) ३—द्राह्यायण गृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... २।।) ४—खादिर गृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... २।।) ५—वाराह गृह्यसूत्र सानुवाद ... ... १।।) ६—क्षत्रियवंश भास्कर ... ... -) ७—क्षत्रियधर्म दिवाकर ... ... =) ८—तम्बाकू बीड़ी निषेध ... ... ) नीचे लिखे ग्रन्थ सटीक सानुवाद छप रहे हैं — १—आश्वलायन गृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... ४) २—पारस्कर गृह्यसूत्र सभाष्य, शौचसूत्र, स्नानसूत्रादि सहित सानुवाद ... ... ५) ३—मानव गृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... ५) ४—आपस्तम्ब गृह्यसूत्र सानुवाद ... ... ५) ५—ऋग्वेदीय शांख्यायन गृह्यसूत्र सानुवाद ... ३) ६—बौधायन गृह्यसूत्र सानुवाद ... ... ५) ७—वैखानस गृह्यसूत्र सानुवाद ... ... ३) ८—भरद्वाज गृह्यसूत्र सानुवाद ... ... ९) ९—हिरण्य केशीयगृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... १२) १०—जैमिनीय गृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... ५) ११—काठकगृह्यसूत्र सटीक सानुवाद ... ६) ज्योतिष के अपूर्व ग्रन्थ दोबारे छप रहे हैं । १—सूर्यसिद्धान्त, तत्त्वविवेककार पं० कमलाकरकृत् सौरभाष्य और बृहद् भूमिका सहित सानुवाद ... ६) २—आर्यभटीय तीन टीकाओं सहित भाषानुवाद . ५) अन्यान्य ग्रन्थों का अनुवाद हो रहा है । भवदीय— ठा० उदयनारायण सिंह ।