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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
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४४६ | किरातार्जुनीयम्
| पद / पाद | स० | श्लो० | पद / पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| सज्यं धनुर्वहति यो | १३ | ७१ | समुज्झिता यावदराति | १४ | ५६ |
| स ततार संकटवतो | ६ | १६ | समुन्नतः काशदुकूल | ८ | ९ |
| स तदोजसा विजित | १२ | २९ | समुल्लसत्प्रासमहोभि | १६ | ४ |
| स तमालनिभे रिपो | १३ | २४ | स यौवराज्ये नवयौवन | १ | २२ |
| स तमाससाद घननील | १२ | ५३ | सरजसमपहाय | १० | २६ |
| सदृशमतनुमाकृतेः | १० | १३ | सरभसमवलम्ब्य | १० | ५४ |
| सद्मनां विरचनाहित | ९ | ३४ | सरोजपत्रे नु विलीन | ८ | ३५ |
| सद्भावितेवाभिनिविष्ट | १७ | ११ | सललितचलित | १० | ५२ |
| स धनुर्महेषुधि | १२ | २७ | सलोलयासक्तलता | ८ | १६ |
| स ध्वानं निपतितनिर्झरासु | ७ | २२ | सलेनमुल्लिङ्गितशात्रवे | १४ | २ |
| सनादक्वनितं नितम्ब | ५ | २७ | स वशस्यावदातस्य | ११ | ७५ |
| सपदि प्रियरूपमंवरखः | १३ | २५ | सविनयमपरानिसृत्य | १० | ५७ |
| सपदि हरिसखैवधू | ११ | १८ | सवृषध्वजसायकावभिन्नं | १३ | २८ |
| स पिङ्गलः श्रीमान् | १८ | ४५ | सव्यलीकमवधोरित | ९ | ४५ |
| स विशङ्कजटावलिः | १५ | ४७ | सव्यासव्यध्वनितो | १७ | २५ |
| स पुमानर्थवज्जन्मा | ११ | ६२ | सब्रीडमन्दैरिव | ३ | ४६ |
| स प्रच्छदनयाम्बुदनादि | १७ | १० | ससस्वरतिदे नित्यं | १५ | २७ |
| स प्रयुज्य तनये | १३ | ३६ | स समुद्धरता विचित्त्य | १३ | ३४ |
| स बभार रणापेता | १५ | ३३ | स सम्प्रधायैवमहार्य | १६ | २५ |
| सविभति भीषण | ६ | ३२ | स सायकान्साध्वस | १७ | २१ |
| स भवस्य भवक्षयैक | १३ | १९ | स सासिः सासुसूः | १५ | ५ |
| स भोगिसंघः शम | १६ | ४८ | ससुरचापमनेकमणि | ५ | १२ |
| समदशिखिरुतानि | १० | २५ | सहशरधि निजं तथा | १८ | १६ |
| स मन्थरावलित | ४ | १७ | सहसा विदधीत | २ | ३० |
| समवृत्तिरुपैति | २ | १८ | सहसोपगतः स | २ | ५६ |
| समस्य सम्पादयता | १४ | ६ | संक्रान्तचन्दनरसा | ८ | ५७ |
| समानकान्तीनि तुषार | ८ | २५ | सन्ततं निशमयन्त | १३ | ४७ |
| समुच्छ्वसत्पङ्कजकोश | ८ | २४ | सन्निबद्धमपहर्तुं | १८ | ३० |
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श्लोकानुक्रमणिका
| प्रथम पाद | स० | श्लो० | प्रथम पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| सम्पश्यतमिति | १९ | ५३ | सुरकृत्यमेतदवगम्य | १२ | ३६ |
| सम्प्रति लब्धजन्म | ५ | ४३ | सुरसरिति परं तपो | १० | १२ |
| सम्प्रीयमाणोऽनुबभूव | १७ | १३ | सुलभैः सदा नयवता | ५ | २० |
| सम्भिन्नामविरलपातिभिः | ७ | २३ | सृजन्तमाजविषु | ३ | २० |
| सम्भिन्नैरिव तुरगावगाह | ७ | ११ | सुहृदः सहजा | २ | ४५ |
| सम्भोगजमगहनामयो | ७ | २६ | सेतुत्वं दधति पयोमुचां | ७ | १९ |
| सम्मूर्च्छतां रजतभित्ति | ५ | ४१ | सोढवान्नो दशामन्त्यां | ११ | ५३ |
| संरम्भवेगोज्झित | १७ | ४९ | सोढावगीतप्रयमा | १३ | २८ |
| संवाता मुहुरनिलेन | ७ | १४ | सोत्कण्ठेरमरगणैः | ७ | २ |
| संविधातुमभिषेक | ९ | ३२ | स्तुवन्ति गुर्वीमभिधेय | १४ | ५ |
| संसिद्धावितिकरणोय | ७ | १५ | स्थितमुन्नते तुहिन | १२ | २१ |
| संसेवन्ते दानशीला | १८ | २४ | स्थितं विशुद्धे नभसीव | १७ | ४८ |
| संस्कारवत्त्वादप्रयत्सु | १७ | ६ | स्थित्यतिक्रान्तिभीरूणि | ११ | ५४ |
| साचि लोचनयुगं | ९ | ४४ | स्नपितनवलतातह | ५ | ४४ |
| सादृश्यं गतमपनिद्र | ५ | २६ | स्पृहणीयगुणेर्महा | २ | ३४ |
| सादृश्यं दधति गभीर | ७ | ३१ | स्फुटता न पदैरपा | २ | २७ |
| साफल्यमश्नुते रिपु | १६ | ४९ | स्फुःपौरुषमापपात | १३ | ३२ |
| सामोदं कुसुमतरो | ७ | २८ | स्फुटबद्धस्तटोन्नति | १३ | २ |
| साम्यं गतेनाशनिना | १७ | ५१ | स्फुरतिषङ्गमोर्वीकं | १५ | ०९ |
| सावलेपमुपलिप्सिते | १३ | ५६ | स्मर्यते तनुभृतां सनातनं | १३ | ४२ |
| सितच्छदानांमपदिश्य | ४ | ३० | स्यन्दना नो चतुरगाः | ०५ | १६ |
| सितवाजिने निजगाद् | ६ | ९ | स्वकेतुभिः पाण्डुर | १६ | ५८ |
| सिन्दूरैः कृतचयः | ७ | ८ | स्वगोचरे सत्यपि चित्त | ८ | १३ |
| सिषिचुरवनिम्बुवाहाः | १८ | १७ | स्वधर्ममनुरुन्धन्ते | ११ | ७८ |
| सुकुमारमेकमणु मर्म | ६ | ४० | स्वयं संराध्यैवं शतमख | १० | ६३ |
| सुखेन लभ्या दधतः | १ | १७ | स्वदितः स्वयमथैधित | ९ | ५५ |
| सुगेषु दुर्गेषु च तुल्य | १४ | ३२ | ह | ||
| सुता न यूयं किमु | ३ | ५३ | हताहतेत्युद्धतभीम | १६ | ५ |
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४४८ किराताजुंनीयम्
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| हरपृथासुतयो | १८ | २ | हृतोत्तरीयां प्रसभं | ११ | ४१ |
| हरसैनिकाः प्रतिभये | १२ | ४८ | ह्रदाम्भसि व्यस्तवधू | ८ | ४३ |
| हरिन्मणीयाममुदग्र | १४ | ४१ | ह्रीतया गलितनीवि | ९ | ४८ |
| हंसा बुहन्तः सुरसद्म | १८ | १९ | ह्रेपयन्नहिमतेजसं | १३ | १५ |
| हता गुणैरस्य भयेन | १४ | ६१ |
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