लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
क्षेत्रव्यवहारः । ( १३७ ) भुजकोट्योर्योगे कर्णे च ज्ञाते पृथक्करणसूत्रं वृत्तम् - भुज और कोटिका योग तथा कर्ण जानकर भुज और कोटिको अलग अलग जाननेकी रीति एक श्लोकमें- कर्णस्य वर्गाद्द्विगुणाद्विशोध्यो दोःकोटियोगः स्वगुणोऽस्य मूलम् ॥ योगो द्विधा मूलविहीन- युक्तः स्यातां तदर्द्धे भुजकोटिमाने ॥ १४ ॥ अन्वयः-द्विगुणात् कर्णस्य वर्गात् स्वगुणः दोःकोटियोगः विशोध्यः अस्य मूलं ग्राह्यम् । योगः द्विधा मूलविहीनयुक्तः कार्य्यः तदर्द्धे भुजकोटिमाने स्याताम् ॥ १४ ॥ अर्थः-कर्णके वर्गको दोसे गुणा करे तब जो अङ्क हों उनमें भुज और कोटिके योगका वर्ग घटा दे जो शेष रहे उसका मूल ले; भुजकोटिके योगको दो स्थानोंमें लिख; एक स्थानमें पहले लिया हुआ मूल घटा दे और एक स्थानमें जोड दे; फिर दोनों स्थानोंके घटाये हुए और जोडे हुए अङ्कोंको आधा कर ले; तब भुज और कोटिके प्रमाण होते हैं ॥ १४ ॥ उदाहरणम्- दशसप्ताधिकः कर्णस्त्र्यधिका विंशतिः सखे ॥ भुजकोटियुतिर्यत्र तत्र ते मे पृथग्वद् ॥ १० ॥ अन्वयः-हे सखे ! यत्र दशसप्ताधिकः कर्णः त्र्यधिका विंशतिः भुजकोटियुतिः तत्र ते मे पृथक् वद् ॥ १० ॥ अर्थः-हे मित्र ! जहां कर्णका प्रमाण १७ है और भुजकोटिका योग २३ तेईस है; तहां भुज और कोटिका प्रमाण अलग अलग कहो ॥ १० ॥ न्यासः १५ १७ कर्णः १७ दोःकोटियोगः २३ जाते भुजकोटी ८ । १५ ॥ २३ ८ फैलाव-यहां कर्ण १७ है और भुजकोटियोग २३ है, यहां भुजकोटिका अलग २ प्रमाण जाननेके अर्थ उपरोक्त नियमानुसार कर्ण १७ का वर्ग किया २८९ इसको दोसे गुणा किया तब ५७८ हुए; इसमें भुज कोटिके योग
( १३८ ) लीलावती । २३ का वर्ग ५२९ घटाया तब ४९ बाकी रहे इन ४९ का मूल लिया तब ७ मिले फिर भुजकोटियोगको दो स्थानोंमें लिखा, एक स्थानमें पहले लिया हुआ मूल ७ घटाया और एक स्थानमें जोडा तब १६ । ३० हुए; इनको आधा किया तब क्रमसे भुज और कोटिका प्रमाण ८ । १५ हुआ; अर्थात् भुजका प्रमाण ८ और कोटिका १३____ १५ हुआ ॥ १० ॥ उदाहरणम्- दोःकोट्योरन्तरं शैलाः कर्णो यत्र त्रयोदश ॥ भुजकोटी पृथक्तत्र वदाऽऽशु गणकोत्तम ॥ ११ ॥ अन्वयः-हे गणकोत्तम ! यत्र शैलाः भुजकोटयोः अन्तरम् । त्रयोदश कर्णः । तत्र भुजकोटी पृथक् आशु वद ॥ ११ ॥ अर्थः-हे गणितशास्त्रको अच्छा जाननेवाले ! जहां भुजकोटिका अन्तर ७ सात ह और कर्ण १३ तेरह है वहां भुज, कोटि अलग अलग शीघ्र कहो ॥ ११ ॥ न्यास कर्णः १३ भुजकोट्योरन्तरम् ७ लब्धे भुजकोटी ५ । १२ फैलाव-कर्ण १३ के वर्ग १६९ को दूना किया तब ३३८ हुए; इनमें भुजकोटिके अन्तर ७ का वर्ग ४९ घटाया तब २८९ इनका मूल लिया तब १७ मिले, इसमें अन्तरको एक स्थानमें घटाया और एक स्थानमें जोडा तब १० । २४ हुए; इनको आधा किया तब क्रमसे भुजकोटिका प्रमाण ५ । १२ हुए. लम्बावबाधाज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- लम्ब और अवबाधा जाननेकी रीति एक श्लोकमें- अन्योन्यमूलाग्रगसूत्रयोगाद्वेण्वोर्वधे योगहृते च लम्बः ॥ वंशौ स्वयोगेन हतावभीष्टभूम्रौ च लम्बोभयतः कुखण्डे ॥ १५ ॥ अन्वयः-अन्योन्यमूलाग्रगसूत्रयोगात् वेण्वोः वधे कृते योगहृते च लम्बः स्यात् । वंशौ स्वयोगेन हतौ अभीष्टभूम्रौ च लम्बोभयतः कुखण्डे स्याताम् ॥ १५ ॥
क्षेत्रव्यवहारः। ( १३९ ) अर्थः-दोनों बाँसोंकी उँचाईका परस्पर घात करे; फिर इसी घातमें दोनों बाँसोंकी उँचाईके योगका भाग दे, जो लब्धि हो वही लम्बका प्रमाण होता है. दोनों बाँसोंका उँचाईका अलग अलग उन ही बाँसोंकी भूमिसे गुणा करे; जो गुणनफल हो उसमें उँचाईके योगका भाग लेनेसे जो लब्धि हो वह अपनी अपनी की अबबाधा मालूम होती है ॥ १५ ॥ उदाहरणम्- पञ्चदशदशकरोच्छ्रयवेण्वोरज्ञातमध्यभूमिकयोः ॥ इतरेतरमूलाग्रगसूत्रयुतेर्लम्बमानमाचक्ष्व ॥ १२ ॥ अन्वयः-हे गणक ! अज्ञातमध्यभूमिकयोः पञ्चदशदशकरोच्छ्रयवेण्वोः इतरेतर मूलाग्रगसूत्रयुतेः लम्बमानम् आचक्ष्व ॥ १२ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! एक १५ पन्द्रह हाथ लम्बा और दूसरा १० दश हाथ लम्बा ये दो बाँस कुछ अन्तरसे पृथिवीमें खड़े किये यह नहीं जानते कि, कितने अन्तरसे खड़े किये थे; उन दोनों बाँसोंमें सूत बांधा जैसे एकके मूलमें बांधकर दूसरेके अग्रभागमें बांधा और दूसरेकी जड़में बांधकर पहलेके अग्रभागमें बांधा तौ कहो कि, जहां दोनों सूतोंका मेल हुआ, वहांसे पृथवीतक यदि लम्ब (रेखा) डाला जाय तो इस लम्बका क्या प्रमाण होगा ? ॥ १२ ॥ न्यासः- वंशौ १५। १० जातो लम्बः ६ वंशा- न्तरभूमिः ५ अत्र जाते भूखण्डे ३।२ अथवा भूः १० खण्डे ६।४ वा भूः २० खण्डे १२।८ एवं सर्वत्र लम्बः स एव यद्यत्र भूमितुल्ये भुजे वंशः कोटिस्तदा भूखण्डेन किमिति त्रैराशिकेन सर्वत्र प्रतीतिः ॥ फैलाव-उपरोक्त लम्ब वह है जो कि, दोनों बांसोंके मूलसे अग्रभागपर्यन्त
( १४० ) लीलावती । एकका दूसरेमें सूत्र बांधनेसे जहां सूत्रोंका मेल होता है वहांसे पृथ्वीतक जो अन्तर है उसपर रेखा डाली जाती है और अवबाधा वह है कि जो लम्बके इधर उधर दोनों तरफकी पृथ्वी है; उसी लंब और अवबाधाके जाननेके निमित्त उपरोक्त नियमानुसार दोनों बांसोंके प्रमाण १५।१० का परस्पर घात किया तब १५० हुए, इनमें बांसोंके योग २५ का भाग दिया तब ६ लब्धि हुए यही सूत्रोंके योगसे पृथ्वीतक जो लम्ब डाला है उसका प्रमाण है और उन बांसोंके बीचमें भूमि पांच ५ मानी तो इसी भूमिको पहले बांस १५ से गुणा किया तब ७५ हुए, इसमें दोनों बांसोंके योग २५ का भाग लेनेसे ३ लब्धि हुए; यही बडे बांसके ओरकी अवबाधा है; फिर उसी पांचको दूसरे बांस १० से गुणा किया तब ५० हुए; इसमें भी दोनों बांसके योग २५ का भाग दिया तब २ लब्धि हुए; यही दूसरे छोटे बांसकी अवबाधा हुई, जब दश १० को मध्य भूमि कल्पना किया तब उक्त रीतिके अनुसार बडे बाँसके ओरकी अवबाधा ६ हुई और छोटे बांसके ओर की अवबाधा ४ हुई इसी प्रकार १५ को मध्यकी भूमि माना तो क्रमसे १२।८ दोनों अवबाधा हुईं. भूमि चाहे जितनी मानो पर लंब वही ६ मिलेगा, जब यहां भूमि तुल्य भुज माना और वंशतुल्य कोटि माना तब त्रैराशिकसे ही सर्वत्र प्रतीति हो सकती है, जैसे कि, ५ भूमिपर बाँस कोटि मिलती है तो अवबाधापर क्या कोटि मिलेगी ? इस प्रकार दोनों ओरसे वही लम्ब आता है ॥ अथाक्षेत्रलक्षणसूत्रम्- अब अक्षेत्रका लक्षण लिखते हैं- धृष्टोद्दिष्टमृजुभुजं क्षेत्रं यत्रैकबाहुतः स्वल्पा ॥ तदितरभुजयुतिरथवा तुल्या ज्ञेयं तदक्षेत्रम् ॥ १६ ॥ अन्वयः-यत्र एकबाहुतः तदितरभुजयुतिः स्वल्पा अथवा तुल्या तत् धृष्टोद्दिष्टम् ऋजुभुजं क्षेत्रम् अक्षेत्रं ज्ञेयम् ॥ १६ ॥ अर्थः-जिस त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रमें एक भुजसे अन्यभुजोंका योग न्यून हो अथवा तुल्य हो वह ढीठ पुरुषका कहा हुआ क्षेत्र अक्षेत्र है ॥ १६ ॥
क्षेत्रव्यवहारः। ( १४१ ) उदाहरणम्- चतुरस्रे त्रिषड्द्व्यर्का भुजास्त्र्यस्रे त्रिषण्णवाः ॥ उद्दिष्टा यत्र धृष्टेन तदक्षेत्रं विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥ अन्वयः-यत्र धृष्टेन चतुरस्रे त्रिषड्द्व्यर्काः। तथा त्र्यस्रे त्रिषण्णवाः भुजाः उद्दिष्टाः तत् अक्षेत्रम् विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥ अर्थ:-जिस चतुरस्र क्षेत्रमें तीन, छ, दो, बारह ३ । ६ । २ । १२ प्रमाणकी चार भुज हैं और त्र्यस्र (त्रिकोण) में ३ तीन ६ छ ९ नौ प्रमाणकी तीन भुज हैं यदि कोई ढीठ ऐसा प्रश्न करे तो उसको अक्षेत्र कहना चाहिये ॥ १३ ॥ न्यासः एते अनुपपन्ने क्षेत्रे. भुजप्रमाणा ऋजुशलाका भुजस्थानेषु विन्यस्या- नुपपत्तिर्दर्शनीयेति ॥ फैलाव-यह दोनों अक्षेत्र हैं, इनकी अक्षेत्रता जाननेको भुजके प्रमाणकी सूधी शलाकाएँ भुजके स्थानोंमें रखकर दिखावे, इस कारण रेखाओंसे प्रत्यक्ष कर दिखाते हैं ॥ चतुर्भज क्षेत्रमें तीन भुज २ । ३ । ६ का योग ११ है और बडा भुज १२ है, इस कारण तीनों भुजांका योग ११ बडी एक भुज १२ बारहसे छोटा है, इस कारण अक्षेत्र कहना उचित है, ऐसे क्षेत्रमें क्षेत्रफल नहीं मिलता क्योंकि क्षेत्रफल भूमि और कोटि तथा लम्बिके अधीन हैं और ऐस प्रश्नमें सब भुज भूमिमें मिल जाते हैं, इसी कारण त्रिभुज भी अक्षेत्र है, दोनों क्षेत्रोंका रूप रेखाओंसे दिखाते हैं ॥
( १४२ ) लीलावती । चतुर्भुजका स्वरूप. त्रिभुजका स्वरूप. ६ ३ २ ६ ३ ━━━━━━━━━━━━━ ━━━━━━━━━━ १२ १२ ९ अथवा इन भुजाओंकी तुल्य सींकोंको मिलाके रखनेसे प्रत्यक्ष क्षेत्रका स्वरूप जान पडता है ॥ आबाधादिज्ञानाय करणसूत्रमार्याद्वयम् । आबाधा आदि जाननेकी रीति आर्याके दो श्लोकोंमें- त्रिभुजे भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो भुवा हृतो लब्ध्या ॥ द्विःस्था भूरूनयुता दलिताबाधे तयोः स्याताम् ॥ १७ ॥ स्वाबाधाभुजकृत्योरन्तरमूलं प्रजायते लम्बः ॥ लम्बगुणं भूम्यर्द्धं स्पष्टं त्रिभुजे फलं भवति १८ ॥ अन्वयः-त्रिभुजे भुजयोः योगः कार्य्यः ततः तदन्तरगुणः कार्य्यः । ततः भुव हृतः कार्य्यः । लब्ध्या द्विःस्था भूः ऊनयुता कार्य्या सा दलिता तयोः आबाधे स्याताम् ॥ १७ ॥ स्वाबाधाभुजकृत्योः अन्तरमूलं लम्बः प्रजायते । भूम्यर्द्धं लम्बगुणं त्रिभुजे स्पष्टम् फलम् भवति ॥ १८ ॥ अर्थः-त्रिभुजक्षेत्रमें दो भुजाओंका योग करे तब जो अङ्क हों उनको उन हीं दोनों भुजाओंके अन्तरसे गुणा करे; जिन ऊपरकी भुजाओंका योग किया है फिर गुण- नफलमें भूमि मानी हुई नीचेकी भुजका भाग दे; जो लब्धि हो वह दो स्थानोंमें रक्खी हुई भूमि मानी हुई भुजामें एक स्थानमें घटा दे और एक स्थानमें जोड दे; उसको आधा आधा कर ले, तब जो अङ्क मिले, वही दोनों भुजाओंकी आबाधा है ॥ १७ ॥ अपनी आबाधा और अपनी भुजका वर्ग करे, उन वर्गोंका अन्तर करे, उस अन्तरका मूल ले, तब जो अङ्क मिले वही लम्बका प्रमाण होता है, भूमिको आधा कर लम्बसे गुणा कर दे तब त्रिभुजमें स्पष्ट फल होता है ॥ १८ ॥ उदाहरणम्- क्षेत्रे मही मनुमिता त्रिभुजे भुजौ तु यत्र त्रयोदशतिथि- प्रमितौ च यस्य ॥ तत्राऽवलम्बकमथो कथयावबाधे क्षिप्रं तथा च समकोष्ठमिति फलाख्याम् ॥ १४ ॥ अन्वयः-यत्र त्रिभुजे क्षेत्रे मही मनुमिता यस्य भुजौ तु त्रयोदशतिथिप्रमितौ तत्र अवलम्बकम् अथो अवबाधे तथा च फलाख्याम् समकोष्ठमिति च क्षिप्रं कथय ॥१४॥
क्षेत्रव्यवहारः। ( १४३ ) अर्थः-जिस त्रिभुजक्षेत्रमें १४ प्रमाण भूमि हैं और दोनों भुज १३ और १५ प्रमाण हैं तहां लम्ब और दोनों अवबाधा तथा चतुष्कोणरूप फलका प्रमाण भी शीघ्र कहो ॥ १४ ॥ न्यासः- भूः १४ भुजौ १३ । १५ लब्धे आबाधे ५ । ९ । लम्बश्च १२ क्षेत्रफलञ्च ८४ ॥ फैलाव-इस त्रिभुजक्षेत्रमें भूमि १४ दोनों भुज १३ । १५ हैं यहाँ आबाधा जान- नेको उपरोक्त नियमानुसार ऊपरके दोनों भुजों १३ । १५ का योग किया तब २८ हुए, इन ही दोनोंको अन्तर २ से गुणा किया तब ५६ हुए, भूमि मानी हुई भुज १४ का भाग दिया तब ४ लब्धि हुए, इन्हें भूमि १४ में एक स्थानमें घटाया और एक स्थानमें जोडा तब १० । १८ हुए इनको आधा किया तब क्रमसे आबाधा मिली ५ । ९ अर्थात् पहली भुजकी आबाधा ५ और दूसरी भुजकी आबाधा ९ मिली, फिर लम्ब जाननेके लिये अपनी अपनी भुज और आबाधाका वर्ग किया उस वर्गका अन्तर किया उस अन्त- रका मूल लिया, तब लम्ब हुआ जैसे पहली भुज १३ का वर्ग १६९ हुए और पहली आबाधा ५ का वर्ग २५ हुआ, इनका अन्तर लिया तब १४४ बचे, इसका मूल लिया तब १२ मिले यही लम्बका प्रमाण है, इसी प्रकार दूसरी भुज १५ का वर्ग किया तब २२५ हुए उसीकी आबाधा ९ का वर्गकिया तब ८१ हुए इनका अन्तर लिया तब १४४ बचे इनका मूल लिया तब वही लम्बका प्रमाण १२ मिला, फिर क्षेत्रफल जाननेके लिये भूमि १४ के आधे ७ को लम्ब १२ से गुणा किया तब ८४ हुए. यही क्षेत्रफल होगा ॥ ऋणाबाधोदाहरणम्-ऋणआबाधा जाननेका उदाहरण- दशसप्तदशप्रमौ भुजौ त्रिभुजे यत्र दशप्रमा मही ॥ अबधे वद लम्बकं तथा गणितं गणितिकाऽऽशु तत्र मे ॥ १५ ॥ अन्वयः-यत्र त्रिभुजे दशसप्तदशप्रमौ भुजौ नवप्रमा मही हे गणितिक ! तत्र अबधे लम्बकं तथा गणितम् मे आशु वद ॥ १५ ॥ अर्थः-जिस त्रिभुजक्षेत्रमें दश और सत्रह प्रमाण तो दोनों भुज हैं और नौ प्रमाण
( १४४ ) लीलावती । पृथ्वी है, हे गणितके जाननेवाले ! उस क्षेत्रमें दोनों आबाधा बताओ, लम्ब बताओ और क्षेत्रफल भी शीघ्र कहो ॥ १५ ॥ न्यासः- भुजौ १० । १७ भूमिः ९ अत्र त्रिभुजे भुजयोर्योग इत्यादिना लब्धम् २१ अनेन भूरूना न स्यात् । अस्मादेव भूरपनांताशेषा- र्द्धमृणगता वा दिग्वैपरीत्येनेत्यर्थः । तथा जाते आबाधे ६ । १५ अत उभयत्राऽपि जातो लम्बः ८ फलम् ३६ । फैलाव-यहां लम्बभूमिसे बाहर निकल जाता है, इस कारण यह ऋणाबाधा का उदाहरण कहलाता है. यहां उपरोक्त नियमानुसार दोनों भुजा १० । १७ का योग किया तब २७ हुए; इसको उन हीं भुजाओंके अन्तर ७ से गुणा किया तब १८९ हुए. इसमें भूमि ९ का भाग दिया तब २१ मिलें, इसको भूमि ९ में ऋणबाधा भू जोडा तब ३० हुए; इसका आधा किया तब १५ मिले, यह १७ की आबाधा हुई. अब पहली भुजकी आबाधा जाननेके अर्थ उसी लब्धि २१ को भूमिमें घटाना चाहिये; परन्तु घट नहीं सकती, इस कारण दिग्वैपरीत्य कर दिया, अर्थात भूमिमें लब्धि न घटा कर लब्धि में भूमिको घटाया तब १२ रहे, इसको आधा किया तब ६ हुए, यही ऋणाबाधा है, इस प्रकार दोनों आबाधा ६।१५ हुई, इन ही आबाधाओंसे लम्ब जाननेके लिये पहली भुज १० का वर्ग किया तब १०० हुए, इसी भुजकी आबाधा ६ का वर्ग किया तब ३६ हुए, इनका अन्तर किया तब ६४ बचे, इसका वर्ग- मूल लिया तब पहली आबाधासे लम्ब मिला ८ । इसी प्रकार दूसरी भुज १७ का वर्ग किया तब २८९ हुए, इसी भुजकी आबाधा १५ का वर्ग किया तब २२५ हुए इनका अन्तर किया तब ६४ बचे इनका मूल लिया तब वही लम्बप्रमाण ८ मिला, इस प्रकार दोनों आबाधाओंसे एक ही लम्ब मिला. अब क्षेत्रफल जाननेको भूमिके आधे ४ १/२ को लम्ब ८ से गुणा किया तब ३६ मिले. यही क्षेत्रफल है ॥ चतुर्भुजे त्रिभुजे चास्पष्टस्पष्टफलानयने करणसूत्रं वृत्तम्- चतुर्भुजमें अस्पष्ट और त्रिभुजमें स्पष्ट फल जाननेकी रीति एक श्लोकमें-
क्षेत्रव्यवहारः। (१४६) सर्वदोर्युतिदलञ्चतुःस्थितं बाहुभिर्विरहितं च तद्घात्॥ मूलमस्फुटफलं चतुर्भुजे स्पष्टमेवमुदितं त्रिबाहुके ॥१९॥ अन्वयः-सर्वदोर्युतिदलं चतुःस्थितं कार्यम् ततः बाहुभिः विरहितं च कार्यम्। तद्घात् मूलं चतुर्भुजे अस्फुटफलम् भवति। एवं त्रिबाहुके स्पष्टम् फलम् उदितम्॥ १९॥ अर्थः-सब भुजाओंका योग कर आधा कर ले तब जो अंक हों उनको चार स्थानमें लिखे; फिर चार स्थानोंमें लिखे हुए अंकोंमें अलग अलग एक एक भुजको घटावे जो शेष अंक हों उनका योग करे, फिर इसी योगका मूल ले; वही चतुर्भुज क्षेत्रमें अस्फुट (ठीक नहीं) फल होता है, इसी रीतिसे त्रिभुजमें स्पष्ट (ठीक) फल होता है ॥ १९॥ उदाहरणम्- भूमिश्चतुर्दशमिता मुखमङ्कसंख्यं बाहू त्रयोदशदिवाकर- सम्मितौ च ॥ लम्बोऽपि यत्र रविसंख्यक एव तत्र क्षेत्रे फलं कथय तत्कथितं यदाद्यैः ॥१६॥ अन्वयः-यत्र क्षेत्रे चतुर्दशमिता भूमिः अंकसंख्यम् मुखं त्रयोदशदिवाकर सम्मितौ च बाहू यत्र लम्बः अपि रविसंख्यकः एव तत्र यत् आद्यैः कथितं तत् फलं कथय ॥ १६॥ अर्थः-जिस क्षेत्रमें १४ भूमि है ९ मुख है १३ और १२ दोनों भुज हैं और जहां लम्ब भी १२ है; उस क्षेत्रमें जो प्राचीनोंने कहा है वह फल कहो॥ १६॥ न्यासः-भूमिः १४ मुखम् ९ बाहू १३। १२ लम्बः १२
उक्तवत्करणेन जातं क्षेत्रफलम् १९८०० अस्याः पदं किञ्चिन्न्यनमेकचत्वारिंशच्छ- तम् १४१ इदमत्र क्षेत्रे न वास्तवम्फलं किन्तु "लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्ड- मिति" वक्ष्यमाणकरणेन वास्तवम्फ- लम् १३८ ॥ १०
( १४६ ) लीलावती । फैलाघ-उपरोक्त रीति के अनुसार क्षेत्रफल जानने के लिये सब भुजों ९ । १२ । १४ । १३ के योग ४८ को आधा २४ किया फिर इनको चार स्थानमें लिखा; फिर एक एक स्थानमें क्रमसे भुजोंको घटाया तब जो शेष रहा १५ । १२ । १० । ११ उनका परस्पर घात किया तब १९८०० हुए; इसका मूल क्षेत्रफल है; परन्तु इसका पूरा पूरा मूल मिल नहीं सकता, इस कारण यह करणीगत फल | योगार्द्ध. | भुज. | शेष. | कहाता है; और इसका आसन्न मूल लिया तब | २४ | ९ | १५ | कुछ कम १४१ मिला; परन्तु यह क्षेत्रफल | २४ | १२ | १२ | ठीक नहीं है पर आगे जो सम- | २४ | १४ | १० | लम्बचतुर्भुजक्षेत्रके फल लानेकी रीति लिखेंगे; | २४ | १३ | ११ | "भूमि और मुखका योगकर आधा कर ले; और लम्बसे गुणा कर दे" उसी रीतिके अनुसार यहां भी भूमि १४ और मुख ९ का योग कर आधा किया तब २३/२ हुए; इनको लंब १२ से गुणा किया तब १३८ हुए; यह ठीक क्षेत्रफल है ॥ उसी क्षेत्रके दो खण्ड करके और रीतिसे क्षेत्रफल लाते हैं उपरोक्त चतुर्भुजक्षेत्रमें लम्ब डालनेसे समचतुर्भुज बनता है और एक त्रिभुज बन जाता है और चतुर्भुजके सम होनेसे मुख ९ के समान ही भूमि ९ हो जाती है, शेष ५ त्रिभुजकी भूमि हो जाता है; तब त्रिभुजमें भुज ५ कोटि १२ कर्ण १३ होता है; यही भुज और कोटि ५ । १२ का घात किया तब ६० हुए इनका आधा किया तब ३० हुए; यही त्रिभुजका फल हुआ; फिर चतुर्भुजके भुज ९ और कोटि १२ का घात किया तब १०८ हुए; इन दोनोंका योग किया तब वही १३८ ठीक फल हुआ ॥
क्षेत्रव्यवहारः। ( १४७ ) सर्वदोर्युतिदलमित्यादिना त्रिभुजे स्पष्टफलायनाय अत्र त्रिभुजस्य पूर्वोदाहृतस्य न्यासः-भूमिः १४ भुजौ १३ । १५ अनेनापि प्रकारेण त्रिबाहुके तदेव वास्तवं फलम् ८४ अत्र चतुर्भुजस्या- स्पष्टमुदितम् ॥ फैलाव-सर्वदोरीत्यादि ऊपर कही हुई रीतिसे त्रिभुजक्षेत्रमें स्पष्ट फल लानेके निमित्त यहां पूर्व उदाहरण दिये हुए ही त्रिभुजपर गणित करते हैं. यहां तीनों भुजों १३ । १५ । १४ का योग किया तब ४२ हुए; इनका आधा २१ कर चार स्थानोंमें लिखा; इनमेंसे अलग अलग एक २ भुजको घटाया तब क्रमसे शेष रहा ८ । ६ । ७ । २१ इनका घात किया तब ७०५६ हुए; इनका मूल लिया तो मिले ८४ यही क्षेत्रफल हुआ और पहले जो क्षेत्रफल लाये थे यह उसीके तुल्य है; इस कारण यह स्पष्ट फल है चतुर्भुजका तो अस्पष्ट फल दिखा चुके हैं. अथ स्थूलत्वनिरूपणार्थं सूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- जिस रीतिके अनुसार चतुर्भुजका स्थूल आता है; वह रीति पीछे कह आये हैं; तहां जो स्थूलत्व है उसके दिखानेको नियम लिखते हैं; चतुर्भुजस्यानियतौ हि कर्णौ कथं ततोऽस्मिन्नियतम्फलं स्यात् ॥ प्रसाधितौ तच्छ्रवणौ यदाद्यैः स्वकल्पितौ तावितरत्र न स्तः ॥२०॥ अन्वयः-हि चतुर्भुजस्य कर्णौ अनियतौ ततः अस्मिन् फलं नियतं कथं स्यात् । यत् आद्यैः स्वकल्पितौ तच्छ्रवणौ प्रसाधितौ तौ इतरत्र न स्तः॥ २० ॥ अर्थः-निश्चय है कि, चतुर्भुजमें कर्ण अनियत है अर्थात् एक ही क्षेत्रमें अनेक प्रकारके कर्ण होते हैं तिस कारण यहां नियत फल किस प्रकार हो सकता है और जो प्राचीनोंने अपने अपने कल्पना किये हुए चतुर्भुजमें कर्ण साधन किये हैं वह सब स्थानमें नहीं हो सकते ॥ २० ॥ तेष्वेव बाहुष्वपरौ च कर्णावनेकधा क्षेत्रफलं ततश्च ॥ अन्वयः-तेषु एव बाहुषु कर्णौ अनेकधा भवतः।ततः क्षेत्रफलंच अनेकधा भवति॥
( १४८ ) लीलावती । अर्थ:-उन हीं भुजाओंमें कर्ण अनेक प्रकारके हो जाते हैं; तिससे क्षेत्रफल भी अनेक प्रकारका होता है ॥ चतुर्भुजे हि एकान्तरकोणावाक्रम्यान्तः प्रवेश्यमानौ भुजौ तत्संसक्तं कर्णं संकोचयतः, इतरौ तु बहिः प्रसरन्तौ स्वकर्णं वर्द्धयतः अत उक्तम्- "तेष्वेव बाहुष्वपरौ च कर्णाविति" ॥ अर्थ:-चतुर्भुजक्षेत्रमें एक एक बीचका कोना छोड़कर सन्मुखके दोनों कोणोंको खैंचनेसे भीतरको घुसते हुए भुज अपनेसे मिले हुए अपने कर्णको संकुचित करते हैं और जो भुज खैंचनेसे बाहरको फैलते हैं; वह अपने कर्णको बढ़ाते हैं; इसी- कारण ऊपर कहा है कि कर्णोंके अनेक प्रकार होनेसे फल भी अनेक प्रकारका होता है; परन्तु भुज वही रहते हैं, क्योंकि, कोनोंके खैंचनेसे वह कण तो बढ़ेगा और दूसरा कर्ण छोटा होगा तो कर्ण अनेक प्रकारके होंगे; इसी कारण उसी क्षेत्रके फल भी बहुत रीतिंके होंगे ॥ लम्बयोः कर्णयोर्वैकमनिर्दिश्यापरः कथम् ॥ पृच्छत्यनियतत्वेऽपि नियतञ्चापि तत्फलम् ॥ १ ॥ स पृच्छकः पिशाचो वा वक्ता वा नितरां ततः ॥ यो न वेत्ति चतुर्बाहुक्षेत्रस्यानियतां स्थितिम् ॥ २ ॥ अन्वयः-अपरः लम्बयोः वा कर्णयोः एकम् अनिर्दिश्य अनियतत्त्वेऽपि नियतं तत्फलं कथम् पृच्छति ॥ १ ॥ सः पिशाचः पृच्छकः वा वक्ता अपि ततः नितरां पिशाचः यः चतुर्बाहुक्षेत्रस्य अनियतां स्थितिम् न वेत्ति ॥ २ ॥ अर्थः-जो चतुर्भुज क्षेत्रके फलका प्रश्न करनेवाला लम्ब या कर्ण एक भी बिना कहे अनियत होनेपर भी चतुर्भुजका नियत फल बूझता है वह पिशाच तुल्य है यदि वक्ता उत्तर देनेको तैयार हो तो वह प्रश्न करनेवालेसे भी बडा पिशाच है क्योंकि जो चतुर्भुजकी अनियत फलकी स्थितिको नहीं जानता है ॥ १ ॥ ॥ २ ॥ समचतुर्भुजायतयोः फलानयने करणसूत्रं सार्द्धश्लोकद्वयम्- समचतुर्भुज और आयतचतुर्भुजके फल लानेकी रीति ढाई श्लोकमें- इष्टा श्रुतिस्तुल्यचतुर्भुजस्य कल्प्या च तद्वर्गविवर्जिता या ॥२१॥ चतुर्गुणा बाहुकृतिस्तदीयं मूलं द्वितीय- श्रवणप्रमाणम्॥अतुल्यकर्णाभिहतिर्द्विभक्ता फलं स्फुटं
क्षेत्रव्यवहारः । (१४९) तुल्यचतुर्भुजे स्यात् ॥२२॥ समश्रुतौ तुल्यचतुर्भुजे च तथाऽऽयते तद्भुजकोटिघातः ॥ चतुर्भुजेऽन्यत्र समानलम्बे लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्॥ २३ ॥ अन्वयः-तुल्यचतुर्भुजस्येष्टा श्रुतिः कल्प्या तद्वर्गविवर्जिता या चतुर्गुणाबाहुकृतिः तदयिम् मूलं ग्राह्यम् तत् द्वितीयश्रवणप्रमाणम् भवेत् । अतुल्यकर्णाभिहतिःद्विभक्ता कार्य्या तदा फलं तुल्यचतुर्भुजे स्फुटं स्यात् । समश्रुतौ तुल्यचतुर्भुजे तथा आयते चतुर्भुजे च तद्भुजकोटिघातः फलं स्यात् । अन्यत्र समानलम्बे क्षेत्रे कुमुखैक्यखंडं लम्बेन निघ्नम् फलम् भवति ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अर्थ-समचतुर्भुजक्षेत्रमें एक इष्ट कर्ण कल्पना करै; फिर कल्पना किये हुए कर्णका वर्ग करनेसे जो अङ्क हों उनको चार ४ से गुणा किय हुए भुजके वर्गमें घटावे, जो शेष रहे उसका मूल ले वह दूसरा कर्ण होता है. चतुर्भुजमें अतुल्य कर्णोंका घातकर जो अङ्क हों उनमें दोका भाग दे तब जो फल मिलता है वह तुल्य चतुर्भुजमें स्पष्ट फल होगा; समकर्णतुल्यचतुर्भुजमें तथा समकर्ण आयतचतुर्भुजमें उस क्षेत्रकी भुजकोटिका घात करनेसे क्षेत्रफल होता है और समानलम्बविषमचतुर्भुजमें पृथ्वी और मुखका योगकर आधा कर ले; तब जो अङ्क हों उनको लम्बसे गुणा कर दे, तब क्षेत्रफल मिलता है ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अत्रोद्देशकः-समचतुर्भुज, समकर्णचतुर्भुज तथा आयतचतुर्भुजका उदाहरण- क्षेत्रस्य पञ्चकृतितुल्यचतुर्भुजस्य कर्णौ ततश्च गणितं गणक प्र चक्ष्व ॥ तुल्यश्रुतैश्च खलु तस्य तथायतस्य यद्विस्तृती रस- मिताष्टमितञ्च दैर्घ्यम् ॥ १७ ॥ अन्वयः-हे गणक ! पञ्चकृतितुल्यचतुर्भुजस्य क्षेत्रस्य कर्णौ ततः गणितं च प्रचक्ष्व तथा तुल्यश्रुतेः गणितम् प्रचक्ष्व खलु यद्विस्तृतिः रसमिता दैर्घ्य च अष्टमितं तस्य आयतस्य च गणितम् प्रचक्ष्व ॥ १७ ॥ अर्थः-हे गणक ! पांचका वर्ग अर्थात् २५ तुल्य चारों भुजावाले, चतुर्भुजक्षेत्रके दोनों कर्ण और क्षेत्रफल भी कहो; तथा समकर्ण समचतुर्भुजका क्षेत्रफल कहो; और जहां चौडाई ६ है और लम्बाई ८ आठ है उस समकर्ण आयतचतुर्भुजक भी क्षेत्रफल कहो ॥ १७ ॥
( १६० ) लीलावती । प्रथमोदाहरणे न्यासः-भुजाः २५ । २५ । २५ । २५ २५ २५ अत्र त्रिंशन्मितामेकां ३० श्रुतिं प्रकल्प्य ३० यथोक्तकरणेन जाताऽन्या श्रुतिः ४० २५ २५ फलम् ६०० ४० फैलाव-इस क्षेत्रमें चारों भुजोंका प्रमाण पचीस पचीस हैं यहाँ कर्ण जाननेको तथा क्षेत्रफल जाननेको उपरोक्त नियमानुसार ३० को इष्ट कर्ण कल्पना किया फिर इस कर्ण ३० का वर्ग किया तब ९०० हुए; इनको भुज २५ के वर्ग ६२५ को चार ४ से गुणा करनेपर जो अंक हुए २५०० इनमेंसे घटाया तब १६०० शेष रहे इसका मूल लिया तब ४० मिले यही यहाँ ४० दूसरा कर्ण है; अब इन कर्णोंको जानकर उपरोक्त २५ २५ नियमानुसार दोनों कर्णों ३० । ४० का घात किया क्षे० फल. ३० तब १२०० हुए; इनमें दोका भाग दिया, तब ६०० ६०।० लब्धि हुए; यही यहाँ क्षेत्रफल है ॥ २५ २५ २५ २५ न्यासः-अथवा चतुर्दशमितामेकां १४ श्रुतिं १४ प्रकल्प्योक्तवत्करणेन जातान्या श्रुतिः ४८ २५ २५ फलञ्च ३३६ ४८ अथवा-१४ को इष्ट कर्ण माना फिर पूर्व रीति के अनुसार इस माने हुए कर्णका वर्ग किया १९६ हुए इनको भुज २५ के वर्ग ६२५ ४८ को चार ४ से गुणा करनेपर जो अङ्क हुए २५०० २५ २५ इनमें घटाया तब २३०४ बचे इनका मूल लिया तब क्षे० फल. ४८ मिले; यही दूसरे कर्णका प्रमाण है; अब क्षेत्रफल ३३६ १४ जाननेके निमित्त पूर्वोक्त रीति के अनुसार साधे हुए दोनों २५ २५ कर्णों १४ । ४८ का घात किया तब ६७२ हुए इनमें दोका भाग दिया तब ३३६ लब्धि हुए; यही यहां क्षेत्रफल है; इसी रीति से जैसे कर्णको इष्ट मानोंगे वैसे ही अनेक प्रकार के कर्ण होंगे और कर्णों के अधीन क्षेत्रफल भी अनेक होंगे, परन्तु भुज वही रहेंगे ।
क्षेत्रव्यवहारः। ( १६१ ) द्वितीयोदाहरणे न्यासः- तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः इति जाता करणीगता श्रुतिरुभयत्र तुल्यैव १२५० गणितञ्च ६२५ दूसरे-समकर्णचतुर्भुजके उदाहरणमें क्षेत्रफल जाननेके निमित्त तथा कर्ण जाननेके निमित्त पहले कही हुई रीतिके अनुसार अर्थात् "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे भुज २५ कोटि २५ के वर्गों ६२५ । ६२५ का योग किया तब १२५० हुए, इनका मूल कर्ण प्रमाण होना चाहिये परन्तु यही ठीक मूल नहीं मिलता इस कारण यह १२५० करणीगत कर्ण हुआ; दोनों स्थानोंमें कर्ण कोटिका प्रमाण समान ही है; इस कारण कर्ण प्रमाण भी दोनों स्थानोंमें समान ही होगा; अर्थात् दोनों कर्णोंका प्रमाण १२५० होगा, अब क्षेत्रफल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई "तद्भुजकोटिघातः" रीति के अनुसार समकर्ण होनेसे भुज २५ कोटि २५ का घात किया; तब ६२५ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ ॥ अथायतस्य न्यासः- विस्तृतितः ६ दैर्ध्यम् ८ अस्य गणितम् ४८ । अब आयतचतुर्भुजका फल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार भूमि ८ और मुख ८ का योग किया तब १६ हुए; इनको आधा किया तब ८ आठ रहे; इनको लम्ब ६ से गुणा किया तब ४८ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ; यहां लम्ब समान था; इस कारण "लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्य- खण्डम्" इस रीतिसे क्षेत्रफल लाये हैं; यहाँ "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे कर्ण जानकर भी समकर्ण होनेसे "तद्भुजकोटिघातः" इस रीतिसे भी
( १६२ ) लीलावती । क्षेत्रफल मालूम होजाता है; जैसे भुज ८ कोटि ६ इनके वर्गों ६४ । ३६ का योग किया तब १०० हुए;इनका मूल लिया तब १०मिले; भुज कोटि समान होनेसे दोनों कर्ण समान १० । १० ही होंगे; इस कारण समकर्ण होनेसे भुज कोटिका घात करनेसे भी वही ४८ क्षेत्रफल होगा ॥ उदाहरणम्- क्षेत्रस्य यस्य वदनं मदनारितुल्यं विश्वम्भरा द्विगुणितेन मुखेन तुल्या ॥ बाहू त्रयोदशनखप्रमितौ च लम्बः सूर्यो- न्मितश्च गणितं वद तत्र किं स्यात् ॥ १८ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यस्य क्षेत्रस्य वदनम् मदनारितुल्यम् । द्विगुणितेन मुखेन तुल्या विश्वंभरा । त्रयोदशनखप्रमितौ च वाहू । सूर्योन्मितः च लम्बः । तत्र गणितं किं स्यात् इति वद ॥ १८ ॥ अर्थः हेगणक ! जिस क्षेत्रका मुख तो मदनारि तुल्य अर्थात् ११ है; द्विगुणित मुखके समान अर्थात् २२ भूमि है और १३ और २० प्रमाण दोनों भुज हैं; तथा सूर्य्यसंख्यक अर्थात् १२ लम्ब हैं; तहां क्षेत्रफल क्या होगा ? सो कहो ॥ १८ ॥ न्यासः- वदनम् ११ विश्वम्भरा २२ बाहू १३ । २० लम्बः १२ अत्र" सर्वदोर्युतिदलम्” इत्यादिना स्थूलफलम् २५० वास्तवं तु “ लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डमिति ” जातम्फलम् १९८ क्षेत्रस्य खण्डत्रयं कृत्वा फलानि पृथगानीय खण्डत्रयदर्शनम् ॥ न्यासः-प्रथमस्य भुजकोटिकर्णाः ५ । १२ । १३ द्वितीयस्यायतस्य विस्तृतिः ६ दैर्घ्यम् १२ तृतीयस्य भुजको- टिकर्णाः १६ । १२ । २० अत्र त्रिभुजयोः क्षेत्रयोः भुजकोटि- घातादर्द्धम्फलम् । आयते चतुरस्रे क्षेत्रे तद्भुजकोटिघातः फलम् ।
क्षेत्रव्यवहारः । ( १५३ ) यथा प्रथमक्षेत्रे फलम् ३० द्वितीये ७२ तृतीये ९६ एषा- मैकयं सर्वक्षेत्रफलम् १९८ जातम् । फैलाव-मुख ११ भूमि २२ दोनों भुज १३ । २० लम्ब १२ हैं अब इस उदाहरण में “सर्वदोरित्यादि” रीति से सब भुजों ११ । २० । २२ । १३ का योग किया तब ६६ हुए; इनको आधा ३३ कर चार ४ स्थानोंमें लिखा फिर अलग २ एक एक स्थानमें सब भुजोंको घटाया योगार्द्ध. भुज. शेष. | तब जो शेषाङ्क हुए उनका परस्पर घात किया ३३ ११ २२ | तब ६२९२० हुए; इनका मूल लिया तब कुछ ३३ २० १३ | कम २५० मिला; परन्तु यह ठीक नहीं ठीक ३३ २२ १३ | जाननेके निमित्त “लम्बेन निघ्नमित्यादि” इस ३३ १३ २० | रीतिसे फल लाये; अर्थात् मुख ११ और भूमि २२ इनको जोडा तब ३३ हुए; इनका आधा किया तब ३३/२ हुए; इनको लम्ब १२ से गुणा किया तब १९८ हुए यही ठीक क्षेत्रफल हुआ; अब क्षेत्रके तीन खण्ड करके अलग २ क्षेत्रफल लाकर तीनों खण्डोंपर गणित दिखलाते हैं यहां प्रथम खण्डमें भुज ५ कोटि १२ कर्ण १३ है। दूसरे खण्डमें विस्तार ६ लम्बापन १२ है। तीसरे खण्डमें भु० १६ को १२ कर्ण २० है; पहले त्रिभुजक्षेत्रमें फल लानेके लिये ५ । १२ भुजकोटिका घात किया तब ६० हुए; इनको आधा किया तब ३० हुए; यही प्रथम क्षेत्रका फल है; द्वितीयखण्ड आयत चतुर्भुजमें भुज ६ कोटि १२ का घात किया तब ७२ हुए; यही क्षेत्रके द्वितीय खण्डका फल है; तृतीय खण्ड जात्य- त्रिभुजके भुज १६ कोटि १२ का घात किया तब १९२ हुए; इनका आधा किया तब ९६ हुए यही तृतीय खण्डका क्षेत्रफल हुआ; इस प्रकार तीनों खण्डोंके फल ३० । ७२ । ९६ को जोड़नेसे वही १९८ क्षेत्रफल हुआ । CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
( १५४ ) लीलावती । अथान्यदुदाहरणम्-और उदाहरण दिखाते हैं- पञ्चाशदेकसहिता वदनं यदीयं भूः पञ्चसप्ततिमिता प्रमितोऽष्टषष्ट्या ॥ सव्यो भुजो द्विगुणविंशतिसम्मितोऽ- न्यस्तस्मिन्फलं श्रवणलम्बमिती प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अन्वयः-एकसहिता पञ्चाशत यदीयं वदनम् । पञ्चसप्ततिमिता भूः अष्टषष्ट्या प्रमितः सव्यः भुजः । द्विगुणविंशतिसम्मितः अन्यः भुजः । तस्मिन् फलं श्रवणलम्बमिती च प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अर्थः-५१ इक्यावन जिस क्षेत्रका मुख है; ७५ प्रमाण भूमि है, ६८ प्रमाण दायाँ भुज है, ४० प्रमाण बायाँ दूसरा भुज है; उस क्षेत्रमें फल और कर्ण तथ लम्बका प्रमाण भी कहो ॥ १९ ॥ न्यासः- वदनम् ५१ भूमिः ७५ भुजौ ६८ । ४० यहाँ मुख ५१ हैं; भूमि ७५ हैं; दोनों भुज ६८ । ४८ हैं; अत्र फलावलम्बश्रुतीनां सूत्रं वृत्तार्द्धम्- ऊपर दिखाये हुए क्षेत्रमें फल; लम्ब और कर्णके विषयमें सूत्र आधा श्लोक- ज्ञातेऽवलम्बे श्रवणः श्रुतौ तु लम्बः फलं स्यान्नियतं तु तत्र ॥ कर्णस्यानियतत्वाल्लम्बोऽप्यनियत इत्यर्थः ॥ अन्वयः-अवलम्बे ज्ञाते श्रवणः ज्ञातः स्यात् । श्रुतौ ज्ञातायां लम्बः ज्ञातः स्यात् तत्र फलं तु नियतं स्यात् ॥ अर्थः-नियत लम्ब जाननेसे नियतकर्ण ज्ञात होता है; नियतकर्ण जाननेपर नियत लम्ब ज्ञात होता है; अर्थात् लम्ब जाननेसे कर्ण जाना जाता है और कर्ण जाननेसे लम्ब जाना जाता है और लंब या कर्णके नियत होनेसे फल भी नियत होता है और यदि कर्ण सम्मुख दोनों कोणोंके खेंचनेसे अनियत हो तो लम्ब भी अनियत होता है और कर्णोंके ही अनियत होनेसे एक ही क्षेत्रके अनेक रूप
क्षेत्रव्यवहारः। (१५५) रहजाते हैं; बुद्धिमान् इस रूपभेदकी परीक्षा रस्सीका क्षेत्राकार बनाकर प्रत्यक्ष कर सकता है॥ लम्बज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- चतुर्भुजमें लम्बके जाननेकी रीति एक श्लोकमें- चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजेऽवलम्बः प्राग्वद्भुजौ कर्णभुजौ मही भूः ॥२४॥ अन्वयः-चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजे प्राग्वत् अवलम्बः कार्य्यः। तदा कर्णभुजौ भुजौ स्तः भूः मही स्यात् ॥ २४ ॥ अर्थः-चतुर्भुजके भीतर जो जात्यत्रिभुज है; उसमें लम्ब डाले; काण और भुजको भुजाएँ माने महीको पृथ्वी जाने ॥ २४॥ अत्र लम्बज्ञानार्थं सव्यभुजाग्राद्दक्षिणभुजमूलगामी इष्टः कर्णः सप्तसप्ततिमितः कल्पितस्तेन चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजं कल्पितं तत्राऽसौ कर्णः एको भुजः ७७ द्वितीयस्तु सव्यभुजः ६८ भूः सैव ७५ अत्र प्राग्वल्लब्धो लम्बः ३०८/५ फैलाव-यहां लम्ब जानना हो तो बाँई भुजके मूलसे रेखाको दक्षिण भुजके अग्रमें पहुँचा दे, उसीको इष्टकर्ण कल्पना ७७ सतत्तर किया उसीसे चतुर्भुजके भीतर एक त्रिभुज बनाया; उसमें यही कल्पित कर्ण ७७ एक भुज हुआ; दूसरा सव्य भुज ६८ है; भूमि वही ७५ है यहां पहिले कही हुई "त्रिभुजे भुजयोर्योगः" इत्यादि रीतिसे आबाधा जाननेके लिये दोनों ७७। ६८ भुजोंका योग किया तब १४५ हुए उन हीं भुजाओंके अन्तर ९ से गुणा किया तब १३०५ हुए; इनमें भूमि ७५ का भाग दिया; इत्यादि क्रिया करनेसे दोनों आबाधा २३१/५ १४४/५ मिली; इन हीं आबाधाओंपरसे लंब मिला; ३०८/५
( १५६ ) लीलावती। लंबे ज्ञाते कर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तम्- लम्ब जानकर कर्ण जाननेकी रीति श्लोक एक- यल्लंबलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं कथिताऽबधा सा ॥ तदूनभूवर्गसमन्वितस्य यल्लंबवर्गस्य पदं स कर्णः ॥ २५ ॥ अन्वयः-यत् लम्बेलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं सा अबाधा कथिता। तदून भूवर्गसमन्वितस्य लंबवर्गस्य यत् पदं स कर्णः ॥ २५ ॥ अर्थः-लंब और लम्बको आश्रय करनेवाला भुज इन दोनोंके वर्गान्तरका मूल आबाधाका प्रमाण होता है; लम्बके प्रमाणसे होने जो भूमिके वर्गयुक्त लंबका वर्ग उसका जो मूल सो कर्ण है ॥ २५ ॥ अत्र सव्यभुजाग्रालम्बः किल कल्पितः ३०८/५ अतो जाता- बाधा १४४/५ तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यादिना जातः कर्णः ७७॥ अर्थः-दहिने भुजके अग्रभागसे डाला हुआ लम्ब ३०८/५ है; इससे आबाधा हुई १४४/५ "तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यत्यादि" रीतिसे कर्णका प्रमाण हुआ॥ ७७ ॥ द्वितीयकर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तद्वयम्- दूसरा कर्ण जाननेके लिये रीति दो श्लोकमें- इष्टोऽत्र कर्णः प्रथमं प्रकल्प्यस्त्र्यस्रे तु कर्णोभयतः स्थिते ये॥ कर्णं तयोः क्ष्मामितरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये२६ आबाधयोरेकककुप्स्थयोर्यत्स्यादन्तरं तत्कृतिसंयुतस्य ॥ लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णो भवेत्सर्वचतुर्भुजेषु ॥ २७ ॥ अन्वयः-प्रथमम् अत्र इष्टः कर्णः प्रकल्प्यः। कर्णोभयतः तु ये त्र्यस्रे स्थिते तयोः कर्णं क्ष्मां प्रकल्प्य इतरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये ॥ २६ ॥ सर्वचतुर्भुजेषु एकककुप्स्थयोः आबाधयोः यत् अन्तरं स्यात् तत्कृतिसंयुतस्य लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णः भवेत् ॥ २७ ॥ अर्थः-पहले यहां इष्ट कर्ण कल्पना करे; कर्णके दोनों ओर जो दो जात्य- त्रिभुज स्थित हैं उनके कर्णको भूमि कल्पना करके तथा और दोनोंको भुजकल्पना करके लंब और आबाधा साधे ॥ २६ ॥ सब चतुर्भुजक्षेत्रोंमें एक दिशामें स्थित आबाधाओंका जो अन्तर हो उसके वर्गसे युक्त लंब योगके वर्गका मूल ले; वही दूसरा कर्ण होगा ॥ २७ ॥