भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1873)

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिषष्टितमोऽध्यायः

युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़

संजय उवाच

हते तस्मिन् गजानीके पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
भीमसेनं घ्नतेत्येवं सर्वसैन्यान्यचोदयत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! हाथियोंकी उस सेनाके मारे जानेपर आपके पुत्र दुर्योधनने समस्त सैनिकोंको आज्ञा दी कि सब मिलकर भीमसेनको मार डालो ॥ १ ॥

ततः सर्वाण्यनीकानि तव पुत्रस्य शासनात् ।
अभ्यद्रवन् भीमसेनं नदन्तं भैरवान् रवान् ॥ २ ॥
तदनन्तर आपके पुत्रकी आज्ञासे समस्त सेनाएँ भैरव गर्जना करती हुई भीमसेनपर टूट पड़ीं ॥ २ ॥

तं बलौघमपर्यन्तं देवैरपि सुदुःसहम् ।
आपतन्तं सुदुष्पारं समुद्रमिव पर्वणि ॥ ३ ॥
सेनाका वह अनन्त वेग देवताओंके लिये भी दुःसह था। पूर्णिमाको बढ़े हुए समुद्रके समान अपार जान पड़ता था ॥

रथनागाश्वकलिलं शङ्खदुन्दुभिनादितम् ।
अनन्तरथपादातं रजसा सर्वतो वृतम् ॥ ४ ॥
वह सैन्य-समुद्र रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरा हुआ था। शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे कोलाहलपूर्ण हो रहा था। उसमें रथ और पैदलोंकी संख्या नहीं बतायी जा सकती थी तथा उस सेनामें सब ओर धूल व्याप्त हो रही थी ॥ ४ ॥

तं भीमसेनः समरे महोदधिमिवापरम् ।
सेनासागरमक्षोभ्यं वेलेव समवारयत् ॥ ५ ॥
दूसरे महासागरके समान उस अक्षोभ्य सैन्यसमुद्रको युद्धमें भीमसेनने तटप्रदेशकी भाँति रोक दिया ॥ ५ ॥

तदाश्चर्यमपश्याम पाण्डवस्य महात्मनः ।
भीमसेनस्य समरे राजन् कर्मातिमानुषम् ॥ ६ ॥
राजन्! उस समय संग्रामभूमिमें हमलोगोंने महामना पाण्डुनन्दन भीमसेनका अत्यन्त आश्चर्यमय अतिमानुष कर्म देखा था ॥ ६ ॥

उदीर्णान् पार्थिवान् सर्वान् साश्वान् सरथकुञ्जरान् ।

असम्भ्रमं भीमसेनो गदया समवारयत् ॥ ७ ॥
घोड़े, हाथी तथा रथसहित जितने भी भूपाल वहाँ आगे बढ़ रहे थे, उन सबको केवल गदाकी सहायतासे भीमसेनने बिना किसी घबराहटके रोक दिया ॥ ७ ॥
स संवार्य बलौघांस्तान् गदया रथिनां वरः ।
अतिष्ठत् तुमुले भीमो गिरिर्मेरुरिवाचलः ॥ ८ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ भीमसेन उस सारे सैन्यसमूहको गदाद्वारा रोककर उस भयंकर युद्धमें मेरु पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे ॥ ८ ॥
तस्मिन् सुतुमुले घोरे काले परमदारुणे ।
भ्रातरश्चैव पुत्राश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ९ ॥
द्रौपदेयाऽभिमन्युश्च शिखण्डी चापराजितः ।
न प्राजहन् भीमसेनं भये जाते महाबलम् ॥ १० ॥
उस महान् भयंकर तथा अत्यन्त दारुण भयके समय महाबली भीमसेनको उनके भाई, पुत्र, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु और अपराजित वीर शिखण्डी—ये कोई भी छोड़कर नहीं गये ॥ ९-१० ॥
ततः शैक्वायसीं गुर्वी प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
अधावत् तावकान् योधान् दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् पूर्णतः फौलादकी बनी हुई विशाल एवं भारी गदा हाथमें लेकर भीमसेन दण्डपाणि यमराजकी भाँति आपके सैनिकोंपर टूट पड़े ॥ ११ ॥
पोथयन् रथवृन्दानि वाजीवृन्दानि चाभिभूः ।
कर्षयन् रथवृन्दानि बाहुवेगेन पाण्डवः ॥ १२ ॥
विनिघ्नन् व्यचरत् संख्ये युगान्ते कालवद् विभुः ।
फिर वे प्रभावशाली बलवान् पाण्डुनन्दन रथियों और घोड़ोंके समूहको नष्ट करके अपनी भुजाओंके वेगसे रथोंके समुदायको खींचते और नष्ट करते हुए प्रलयकालके यमराजकी भाँति संग्रामभूमिमें विचरने लगे ॥ १२ १/२ ॥
ऊरुवेगेन संकर्षन् रथजालानि पाण्डवः ॥ १३ ॥
बलानि सम्ममर्द्राशु नड्वलानीव कुञ्जरः ।
पाण्डुनन्दन भीम अपने महान् वेगसे रथसमूहोंको खींचकर नष्ट कर देते और शीघ्र ही सारी सेनाको उसी प्रकार रौंद डालते थे, जैसे हाथी नरकुलके पौधोंको ॥
मृद्नन् रथेभ्यो रथिनो गजेभ्यो गजयोधिनः ॥ १४ ॥
सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातिनः ।
गदया व्यधमत् सर्वान् वातो वृक्षानिवौजसा ॥ १५ ॥
भीमसेनो महाबाहुस्तव पुत्रस्य वै बले ।

महाबाहु भीमसेन रथोंसे रथियोंको, हाथियोंसे हाथी-सवारोंको, घोड़ोंकी पीठोंसे घुड़सवारोंको और पृथ्वीपर पैदलोंको मसलते हुए गदासे आपके पुत्रकी सेनाके सब लोगोंको उसी प्रकार नष्ट कर देते थे, जैसे हवा अपने वेगसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है ।। सापि मज्जावसामांसैः प्रदिग्धा रुधिरेण च ।। १६ ।। अदृश्यत महारौद्रा गदा नागाश्वपातनी । हाथियों और घोड़ोंको मार गिरानेवाली उनकी वह गदा भी मज्जा, वसा, मांस तथा रक्तमें सनकर बड़ी भयानक दिखायी देती थी ।। १६ १/२ ।। तत्र तत्र हतैश्चापि मनुष्यगजवाजिभिः ।। १७ ।। रणाङ्गणं समभवन्मृरावाससंनिभम् । जहाँ-तहाँ मरकर गिरे हुए मनुष्य, हाथी और घोड़ोंसे वह सारी रणभूमि मृत्युके निवासस्थान-सी प्रतीत होती थी ।। १७ १/२ ।। पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् ।। १८ ।। यमदण्डोपमामुग्रामिन्द्राशनिसमस्वनाम् । ददृशुर्भीमसेनस्य रौद्रीं विशसनीं गदाम् ।। १९ ।। भीमसेनकी उस संहारकारिणी भयंकर गदाको लोगोंने प्रलयकालमें पशुओं (जीवों)-का संहार करनेवाले रुद्रके पिनाक और यमदण्डके समान भयंकर देखा। उसकी आवाज इन्द्रके वज्रके समान थी ।। १८-१९ ।। आविद्धयतो गदां तस्य कौन्तेयस्य महात्मनः । बभौ रूपं महाघोरं कालस्येव युगक्षये ।। २० ।। अपनी गदाको घुमाते हुए महामना कुन्तीकुमार भीमसेनका रूप युगान्त-कालके यमराजके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था ।। २० ।। तं तथा महतीं सेनां द्रावयन्तं पुनः पुनः । दृष्ट्वा मृत्युमिवायान्तं सर्वे विमनसोऽभवन् ।। २१ ।। उस विशाल सेनाको बारंबार भगानेवाले भीमसेनको मौतके समान सामने आते देख समस्त योद्धाओंका मन उदास हो जाता था ।। २१ ।। यतो यतः प्रेक्षते स्म गदामुद्यम्य पाण्डवः । तेन तेन स्म दीर्यन्ते सर्वसैन्यानि भारत ।। २२ ।। भारत! भीमसेन गदा उठाकर जिस-जिस ओर देखते थे, उधर-उधरसे सारी सेनाओंमें दरार पड़ जाती थी (वहाँके सैनिक भागकर स्थान खाली कर देते थे) ।। २२ ।। प्रदारयन्तं सैन्यानि बलेनामितविक्रमम् । ग्रसमानमनीकानि व्यादितास्यमिवान्तकम् ।। २३ ।। तं तथा भीमकर्माणं प्रगृहीतमहागदम् । दृष्ट्वा वृकोदरं भीष्मः सहसैव समभ्ययात् ।। २४ ।।

अपने बलसे सेनाको विदीर्ण करनेवाले भीमसेन सम्पूर्ण सैनिकोंको अपना ग्रास बनानेके लिये मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ते थे। उस समय बड़ी भारी गदा उठाये हुए भयंकर पराक्रमी भीमसेनको देखकर भीष्मजी सहसा वहाँ पहुँचे ॥ २३-२४ ॥ महता रथघोषेण रथेनादित्यवर्चसा । छादयन् शरवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ २५ ॥ वे सूर्यके समान तेजस्वी तथा पहियोंके गम्भीर घोषसे युक्त विशाल रथपर आरूढ़ हो बरसते हुए मेघके समान बाणोंकी वर्षासे सबको आच्छादित करते हुए वहाँ आये थे ॥ २५ ॥ तमायान्तं तथा दृष्ट्वा व्यात्ताननमिवान्तकम् । भीष्मं भीमो महाबाहुः प्रत्युदीयादमर्षितः ॥ २६ ॥ मुँह फैलाये हुए यमराजके समान भीष्मजीको आते देख महाबाहु भीमसेन अमर्षमें भरकर उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ २६ ॥ तस्मिन् क्षणे सात्यकिः सत्यसंधः शिनिप्रवीरोऽभ्यपतत् पितामहम् । निघ्नन्नमित्रान् धनुषा दृढेन संकंपयंस्तव पुत्रस्य सैन्यम् ॥ २७ ॥ उस समय शिनिवंशके प्रमुख वीर सत्यप्रतिज्ञ सात्यकि अपने सुदृढ़ धनुषसे शत्रुओंका संहार करते और आपके पुत्रकी सेनाको कँपाते हुए पितामह भीष्मपर चढ़ आये ॥ २७ ॥ तं यान्तमश्वै रजतप्रकाशैः शरान् वपन्तं निशितान् सुपुङ्खान् । नाशक्नुवन् धारयितुं तदानीं सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ॥ २८ ॥ भारत! चाँदीके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा जाते और सुन्दर पंखयुक्त तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए सात्यकिको उस समय आपके समस्त सैनिकगण रोक न सके ॥ २८ ॥ अविध्यदेनं दशभिः पृषत्कै- रलम्बुषो राक्षसऽसौ तदानीम् । शरैश्चतुर्भिः प्रतिविद्ध्य तं च नप्ता शिनेरभ्यपतद् रथेन ॥ २९ ॥ केवल अलम्बुष नामक राक्षसने उस समय उन्हें दस बाणोंसे घायल किया। तब शिनिके पौत्रने भी उस राक्षसको चार बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया और रथके द्वारा भीष्मपर धावा किया ॥ २९ ॥ अन्वागतं वृष्णिवरं निशम्य तं शत्रुमध्ये परिवर्तमानम् ।

प्रद्रावयन्तं कुरुपुङ्गवांश्च पुनः पुनश्च प्रणदन्तमाजौ ॥ ३० ॥ योधास्त्वदीयाः शरवर्षैरवर्षन् मेघा यथा भूधरमम्बुवेगैः । तथापि तं धारयितुं न शेकु- र्मध्यन्दिने सूर्यमिवातपन्तम् ॥ ३१ ॥ वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुष सात्यकि आकर शत्रुओंके बीचमें विचर रहे हैं और युद्धस्थलमें कौरवसेनाके मुख्य-मुख्य वीरोंको भगाते हुए बारंबार गर्जना कर रहे हैं; यह सुनकर आपके योद्धा उनपर उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगे, जैसे मेघ पर्वतपर जलकी धाराएँ गिराते हैं, इतनेपर भी वे दोपहरके तपते हुए सूर्यकी भाँति उन्हें रोक न सके ॥ ३०-३१ ॥ न तत्र कश्चिन्नविषण्ण आसी- दृते राजन् सोमदत्तस्य पुत्रात् । स वै समादाय धनुर्महात्मा भूरिश्रवा भारत सौमदत्तिः ॥ ३२ ॥ दृष्ट्वा रथान् स्वान् व्यपनीयमानान् प्रत्युद्ययौ सात्यकिं योद्धुमिच्छन् ॥ ३३ ॥ राजन्! उस समय वहाँ सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं था, जो विषाद-ग्रस्त न हुआ हो। भारत! सोमदत्तकुमार महामना भूरिश्रवाने अपने रथियोंको विवश होकर भागते देख धनुष ले युद्ध करनेकी इच्छासे सात्यकिपर चढ़ाई की ॥ ३२-३३ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सात्यकिभूरिश्रवःसमागमे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सात्यकिभूरिश्रवा-समागमविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1878)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुःषष्टितमोऽध्यायः

भीमसेन और घटोत्कचका पराक्रम, कौरवोंकी पराजय तथा चौथे दिनके युद्धकी समाप्ति

संजय उवाच

ततो भूरिश्रवा राजन् सात्यकिं नवभिः शरैः ।
प्राविध्यद् भृशसंक्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तब भूरिश्रवाने अत्यन्त क्रुद्ध होकर सात्यकिको नौ बाणोंसे उसी प्रकार बींध डाला, जैसे महान् गजराजको अंकुशोंद्वारा पीड़ित किया जाता है ॥ १ ॥

कौरवं सात्यकिश्चैव शरैः संनतपर्वभिः ।
अवारयदमेयात्मा सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ २ ॥
तब अमेय आत्मबलसम्पन्न सात्यकिने भी झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे सब लोगोंके देखते-देखते कुरुवंशी भूरिश्रवाको रोक दिया ॥ २ ॥

ततो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः परिवारितः ।
सौमदत्तिं रणे यत्तः समन्तात् पर्यवारयत् ॥ ३ ॥
यह देख भाइयोंसहित राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उद्यत होकर भूरिश्रवाको चारों ओरसे घेरकर उसकी रक्षामें तत्पर हो गये ॥ ३ ॥

तं चैव पाण्डवाः सर्वे सात्यकिं रभसं रणे ।
परिवार्य स्थिताः संख्ये समन्तात् सुमहौजसः ॥ ४ ॥
उधर महान् तेजस्वी समस्त पाण्डव भी युद्धमें वेगपूर्वक आगे बढ़नेवाले सात्यकिको सब ओरसे घेरकर समरभूमिमें डट गये ॥ ४ ॥

भीमसेनस्तु संक्रुद्धो गदामुद्यम्य भारत ।
दुर्योधनमुखान् सर्वान् पुत्रांस्ते पर्यवारयत् ॥ ५ ॥
भारत! क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने गदा उठाकर आपके दुर्योधन आदि सब पुत्रोंको अकेले ही रोक दिया ॥

रथैरनेकसाहस्रैः क्रोधामर्षसमन्वितः ।
नन्दकस्तव पुत्रस्तु भीमसेनं महाबलम् ॥ ६ ॥
विव्याध विशिखैः षड्भिः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ।
तब क्रोध और अमर्षमें भरे हुए आपके पुत्र नन्दकने कई हजार रथियोंके साथ आकर शिलापर तेज किये हुए कंकपत्रयुक्त छः बाणोंसे महाबली भीमसेनको बींध डाला ॥ ६ ½ ॥

दुर्योधनश्च समरे भीमसेनं महारथम् ।। ७ ।।
आजघानोरसि क्रुद्धो मार्गणैर्नवभिः शितैः ।
कुपित हुए दुर्योधनने भी महारथी भीमसेनको उस युद्धमें उनकी छातीको लक्ष्य करके नौ तीखे बाण मारे ।। ७ १/२ ।।

ततो भीमो महाबाहुः स्वरथं सुमहाबलः ।। ८ ।।
आरुरोह रथश्रेष्ठं विशोकं चेदमब्रवीत् ।
तब महाबली महाबाहु भीमसेन अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो गये और सारथि विशोकसे इस प्रकार बोले— ।। ८ १/२ ।।

एते महारथाः शूरा धार्तराष्ट्राः समागताः ।। ९ ।।
मामेव भृशसंक्रुद्धा हन्तुमभ्युद्यता युधि ।
'ये महारथी शूरवीर धृतराष्ट्रपुत्र अत्यन्त कुपित हो युद्धमें मुझे ही मारनेके लिये उद्यत हो यहाँ आये हैं ।। ९ १/२ ।।

मनोरथद्रुमोऽस्माकं चिन्तितो बहुवार्षिकः ।। १० ।।
सफलः सूत चाद्येह योऽहं पश्यामि सोदरान् ।
'सूत! मेरे मनमें बहुत वर्षोंसे जिसका चिन्तन हो रहा था, वह मनोरथरूपी वृक्ष आज सफल होना चाहता है; क्योंकि इस समय यहाँ मैं दुर्योधनके भाइयोंको एकत्र देख रहा हूँ ।। १० १/२ ।।

यत्राशोक समुत्क्षिप्ता रेणवो रथनेमिभिः ।। ११ ।।
प्रयास्यन्त्यन्तरिक्षं हि शरवृन्दैर्दिगन्तरे ।
तत्र तिष्ठति संनद्धः स्वयं राजा सुयोधनः ।। १२ ।।
'विशोक! जहाँ रथके पहियोंसे ऊपर उड़ी हुई धूल बाणसमूहोंके साथ अन्तरिक्ष और दिगन्तमें फैल रही है, वहीं स्वयं राजा दुर्योधन कवच आदिसे सुसज्जित होकर युद्धके लिये खड़ा है ।। ११-१२ ।।

भ्रातरश्चास्य संनद्धाः कुलपुत्रा मदोत्कटाः ।
एतानद्य हनिष्यामि पश्यतस्ते न संशयः ।। १३ ।।
तस्मान्ममाश्वान् संग्रामे यत्तः संयच्छ सारथे ।
'उसके कुलीन और मदोन्मत्त भाई भी वहीं कवच बाँधकर खड़े हैं। आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इन सबका विनाश करूँगा, इसमें संशय नहीं है। अतः सारथे! तुम सावधान होकर संग्राममें मेरे घोड़ोंको काबूमें रखो' ।। १३ १/२ ।।

एवमुक्त्वा ततः पार्थस्तव पुत्रं विशाम्पते ।। १४ ।।
विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैः कनकभूषणैः ।
नन्दकं च त्रिभिर्बाणैरभ्यविध्यत् स्तनान्तरे ।। १५ ।।

राजन्! ऐसा कहकर कुन्तीकुमार भीमने स्वर्णभूषित दस तीखे बाणोंद्वारा आपके पुत्र दुर्योधनको बींध डाला और नन्दककी छातीमें भी तीन बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ १४-१५ ॥ तं तु दुर्योधनःषष्ट्या विद्ध्वा भीमं महाबलम् । त्रिभिरन्यैः सुनिशितैर्विशोकं प्रत्यविध्यत ॥ १६ ॥ यह देख दुर्योधनने साठ बाणोंसे महाबली भीमसेनको घायल करके अन्य तीन पैने बाणोंसे सारथि विशोकको भी घायल कर दिया ॥ १६ ॥ भीमस्य च रणे राजन् धनुश्छिच्छेद भासुरम् । मुष्टिदेशे भृशं तीक्ष्णैस्त्रिभिर्भल्लैर्हसन्निव ॥ १७ ॥ राजन्! इसके बाद दुर्योधनने युद्धस्थलमें तीन अत्यन्त तीखे भल्लोंद्वारा हँसते हुए-से भीमके तेजस्वी धनुषको भी बीचसे काट दिया ॥ १७ ॥ समरे प्रेक्ष्य यन्तारं विशोकं तु वृकोदरः । पीडितं विशिखैस्तीक्ष्णैस्तव पुत्रेण धन्विना ॥ १८ ॥ अमृष्यमाणः संरब्धो धनुर्दिव्यं परामृशत् । पुत्रस्य ते महाराज वधार्थं भरतर्षभ ॥ १९ ॥ समाधत्त सुसंक्रुद्धः क्षुरप्रं लोमवाहिनम् । तेन चिच्छेद नृपतेर्भीमः कार्मुकमुत्तमम् ॥ २० ॥ आपके धनुर्धर पुत्रद्वारा समरांगणमें अपने सारथि विशोकको तीखे बाणोंके आघातसे पीड़ित होता देख भीमसेन सह न सके। उन्होंने कुपित होकर अपना दिव्य धनुष हाथमें लिया। महाराज! भरतश्रेष्ठ! फिर आपके पुत्रके वधके लिये अत्यन्त कुपित होकर उन्होंने पंखयुक्त क्षुरप्रका संधान किया और उसके द्वारा राजा दुर्योधनके उत्तम धनुषको काट डाला ॥ १८—२० ॥ सोऽपविद्धय धनुश्छिन्नं पुत्रस्ते क्रोधमूर्च्छितः । अन्यत् कार्मुकमादत्त सत्वरं वेगवत्तरम् ॥ २१ ॥ राजन्! धनुष कटनेपर आपका पुत्र क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा। उसने उस कटे हुए धनुषको फेंककर तुरंत ही उससे भी अधिक वेगशाली दूसरा धनुष ले लिया ॥ २१ ॥ संदधे विशिखं घोरं कालमृत्युसमप्रभम् । तेनाजघान संक्रुद्धो भीमसेनं स्तनान्तरे ॥ २२ ॥ फिर उसके ऊपर काल और मृत्युके समान तेजस्वी भयंकर बाण रखा और कुपित हो उसके द्वारा भीमसेनकी छातीमें गहरा आघात किया ॥ २२ ॥ स गाढविद्धो व्यथितः स्यन्दनोपस्थ आविशत् । स निषण्णो रथोपस्थे मूर्च्छामभिजगाम ह ॥ २३ ॥

उस बाणसे अत्यन्त घायल हो भीमसेन व्यथाके मारे रथकी बैठकमें बैठ गये। वहाँ बैठते ही उन्हें मूर्च्छा आ गयी ॥ २३ ॥

तं दृष्ट्वा व्यथितं भीममभिमन्युपुरोगमाः ।
नामृष्यन्त महेष्वासाः पाण्डवानां महारथाः ॥ २४ ॥
भीमसेनको प्रहारसे पीड़ित हुआ देख अभिमन्यु आदि महाधनुर्धर पाण्डव महारथी यह सहन न कर सके ॥ २४ ॥

ततस्तु तुमुलां वृष्टिं शस्त्राणां तिग्मतेजसाम् ।
पातयामासुर्व्यग्राः पुत्रस्य तव मूर्धनि ॥ २५ ॥
फिर तो सब लोगोंने आपके पुत्रके मस्तकपर निर्भय होकर तेजस्वी शस्त्रोंकी भयंकर वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ २५ ॥

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां भीमसेनो महाबलः ।
दुर्योधनं त्रिभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् होशमें आनेपर महाबली भीमसेनने दुर्योधनको पहले तीन बाणोंसे बींधकर फिर पाँच बाणोंसे घायल किया ॥ २६ ॥

शल्यं च पञ्चविंशत्या शरैर्विव्याध पाण्डवः ।
रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासः स विद्धो व्यपयाद् रणात् ॥ २७ ॥
फिर महाधनुर्धर पाण्डुपुत्र भीमने सुवर्णमय पंखसे युक्त पचीस बाणोंद्वारा राजा शल्यको बींध दिया। उन बाणोंसे घायल होकर वे रणभूमिसे भाग गये ॥ २७ ॥

प्रत्युद्ययुस्ततो भीमं तव पुत्राश्चतुर्दश ।
सेनापतिः सुषेणश्च जलसंधः सुलोचनः ॥ २८ ॥
उग्रो भीमरथो भीमो वीरबाहुरलोलुपः ।
दुर्मुखो दुष्प्रधर्षश्च विवित्सुर्विकटः समः ॥ २९ ॥
विसृजन्तो बहून् बाणान् क्रोधसंरक्तलोचनाः ।
भीमसेनमभिद्रुत्य विव्यधुः सहिता भृशम् ॥ ३० ॥
राजन्! तब आपके चौदह पुत्रोंने भीमसेनपर धावा किया। उनके नाम ये हैं—सेनापति, सुषेण, जलसंध, सुलोचन, उग्र, भीमरथ, भीम, वीरबाहु, अलोलुप, दुर्मुख, दुष्प्रधर्ष, विवित्सु, विकट और सम—ये सब क्रोधसे लाल आँखें करके बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए भीमसेनपर टूट पड़े और एक साथ होकर उन्हें अत्यन्त घायल करने लगे ॥ २८—३० ॥

पुत्रांस्तु तव सम्प्रेक्ष्य भीमसेनो महाबलः ।
सृक्किणी विलिहन् वीरः पशुमध्ये यथा वृकः ॥ ३१ ॥
अभिपत्य महाबाहुर्गरुत्मानिव वेगितः ।
सेनापतेः क्षुरप्रेण शिरश्छिच्छेद पाण्डवः ॥ ३२ ॥

महाबली महाबाहु वीर भीमसेन आपके पुत्रोंको देखकर पशुओंके बीचमें खड़े हुए भेड़ियेके समान अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए गरुड़के समान बड़े वेगसे उनके सामने गये। वहाँ पहुँचकर पाण्डुकुमारने क्षुरप्र नामक बाणसे सेनापतिका सिर काट लिया।। ३१-३२।।

सम्प्रहस्य च हृष्टात्मा त्रिभिर्बाणैर्महाभुजः।
जलसंधं विनिर्भिद्य सोऽनयद् यमसादनम् ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् प्रसन्नचित्त हो उन महाबाहुने हँसते-हँसते जलसंधको तीन बाणोंसे विदीर्ण करके यमलोक पहुँचा दिया ।। ३३ ।।

सुषेणं च ततो हत्वा प्रेषयामास मृत्यवे।
उग्रस्य सशिरस्त्राणं शिरश्चन्द्रोपमं भुवि ॥ ३४ ॥
पातयामास भल्लेन कुण्डलाभ्यां विभूषितम्।
तदनन्तर सुषेणको मारकर मौतके घर भेज दिया और उग्रके कुण्डलमण्डित चन्द्रोपम मस्तकको एक भल्लके द्वारा शिरस्त्राणसहित काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया।। ३४ १/२ ।।

वीरबाहुं च सप्तत्या साश्वकेतुं ससारथिम् ॥ ३५ ॥
निनाय समरे वीरः परलोकाय पाण्डवः।
इसके बाद पाण्डुनन्दन वीरवर भीमसेनने समरभूमिमें घोड़े, ध्वज और सारथिसहित वीरबाहुको सत्तर बाणोंसे मारकर परलोक पहुँचा दिया ।। ३५ १/२ ।।

भीमभीमरथौ चोभौ भीमसेनो हसन्निव ॥ ३६ ॥
पुत्रौ ते दुर्मदौ राजन्ननयद् यमसादनम्।
राजन्! तत्पश्चात् भीमसेनने हँसते हुए-से आपके दो पुत्र भीम और भीमरथको भी, जो युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे, यमलोक भेज दिया ।। ३६ १/२ ।।

ततः सुलोचनं भीमः क्षुरप्रेण महामृधे ॥ ३७ ॥
मिषतां सर्वसैन्यानामनयद् यमसादनम्।
इसके बाद उस महासमरमें भीमसेनने सम्पूर्ण सेनाओंके देखते-देखते क्षुरप्रसे मारकर सुलोचनको भी यमलोकका अतिथि बना दिया ।। ३७ १/२ ।।

पुत्रास्तु तव तं दृष्ट्वा भीमसेनपराक्रमम् ॥ ३८ ॥
शेषा येऽन्येऽभवंस्तत्र ते भीमस्य भयार्दिताः।
विप्रद्रुता दिशो राजन् वध्यमाना महात्मना ॥ ३९ ॥
राजन्! आपके जो अन्य शेष पुत्र वहाँ मौजूद थे, वे भीमसेनका पराक्रम देखकर उनके भयसे पीड़ित हो उन महामना पाण्डुकुमारके बाणकी मार खाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ।। ३८-३९ ।।

ततोऽब्रवीच्छान्तनवः सर्वानैव महारथान्।
एष भीमो रणे क्रुद्धो धार्तराष्ट्रान् महारथान् ॥ ४० ॥

यथा प्राग्र्यान् यथा ज्येष्ठान् यथा शूरांश्च संगतान् । निपातयत्युग्रधन्वा तं प्रगृह्णीत माचिरम् ॥ ४१ ॥ तदनन्तर शान्तनुनन्दन भीष्मने सभी महारथियोंसे कहा—'ये भयंकर धनुर्धर भीमसेन युद्धमें क्रुद्ध होकर सामने आये हुए श्रेष्ठ, ज्येष्ठ एवं शूर महारथी धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार गिराते हैं। अतः तुम सब लोग मिलकर इन्हें शीघ्र काबूमें करो' ॥ ४०-४१ ॥

एवमुक्तास्ततः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य सैनिकाः । अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धा भीमसेनं महाबलम् ॥ ४२ ॥ उनके ऐसा कहनेपर दुर्योधनके सभी सैनिक कुपित हो महाबली भीमसेनकी ओर दौड़े ॥ ४२ ॥

भगदत्तः प्रभिन्नेन कुञ्जरेण विशाम्पते । अभ्ययात् सहसा तत्र यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥ ४३ ॥ प्रजानाथ! राजा भगदत्त मदवर्षी गजराजपर आरूढ़ हो सहसा उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ भीमसेन खड़े थे ॥ ४३ ॥

आपतन्नेव च रणे भीमसेनं शिलीमुखैः । अदृश्यं समरे चक्रे जीमूत इव भास्करम् ॥ ४४ ॥ युद्धमें आते ही उन्होंने अपने बाणोंसे भीमसेनको अदृश्य कर दिया, मानो सूर्य बादलोंसे ढक गये हों ॥

अभिमन्युमुखास्तत् तु नामृष्यन्त महारथाः । भीमस्याच्छादनं संख्ये स्वबाहुबलमाश्रिताः ॥ ४५ ॥ त एनं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवारयन् । गजं च शरवृष्ट्या तु बिभिदुस्ते समन्ततः ॥ ४६ ॥ उस समय अभिमन्यु आदि महारथी भीमका इस प्रकार बाणोंसे आच्छादित हो जाना सहन न कर सके। वे अपने बाहुबलका आश्रय ले युद्धमें भगदत्तपर सब ओरसे बाणोंकी वर्षा करते हुए उन्हें रोकने लगे। उन्होंने अपने बाणोंकी वृष्टिसे भगदत्तके हाथीको भी सब ओरसे छेद डाला ॥ ४५-४६ ॥

स शस्त्रवृष्ट्याभिहतः समस्तैस्तैर्महारथैः । प्राग्ज्योतिषगजो राजन् नानालिङ्गैः सुतेजनैः ॥ ४७ ॥ संजातरुधिरोत्पीडः प्रेक्षणीयोऽभवद् रणे । गभस्तिभिरिवार्कस्य संस्यूतो जलदो महान् ॥ ४८ ॥ राजन्! जो नाना प्रकारके चिह्न धारण करनेवाले और अत्यन्त तेजस्वी थे, उन समस्त महारथियोंद्वारा की हुई अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे बहुत ही घायल होकर प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्तका वह हाथी मस्तकपर रक्तसे रंजित हो रणक्षेत्रमें देखने ही योग्य हो रहा था, मानो सूर्यकी अरुण किरणोंसे व्याप्त रँगा हुआ महामेघ हो ॥

संचोदितो मदस्रावी भगदत्तेन वारणः ।
अभ्यधावत तान् सर्वान् कालोत्सृष्ट इवान्तकः ॥ ४९ ॥
द्विगुणं जवमास्थाय कम्पयंश्चरणैर्महीम् ।
भगदत्तसे प्रेरित होकर कालके भेजे हुए यमराजकी भाँति वह मदस्रावी गजराज दूने वेगका आश्रय ले अपने पैरोंकी धमकसे इस पृथ्वीको कँपाता हुआ उन सबकी ओर दौड़ा ॥ ४९ १/२ ॥

तस्य तत् सुमहद् रूपं दृष्ट्वा सर्वे महारथाः ॥ ५० ॥
असह्यं मन्यमानाश्च नातिप्रमनसोऽभवन् ।
उसके उस विशाल रूपको देखकर सब महारथी अपने लिये असह्य मानते हुए हतोत्साह हो गये ॥ ५० १/२ ॥

ततस्तु नृपतिः क्रुद्धो भीमसेनं स्तनान्तरे ॥ ५१ ॥
आजघान महाराज शरेणानतपर्वणा ।
महाराज! तत्पश्चात् राजा भगदत्तने कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे भीमसेनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५१ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो महेष्वासस्तेन राज्ञा महारथः ॥ ५२ ॥
मूर्च्छयाभिपरीतात्मा ध्वजयष्टिं समाश्रयत् ।
राजा भगदत्तसे इस प्रकार अत्यन्त घायल किये गये महाधनुर्धर महारथी भीमसेनने मूर्च्छासे व्याप्त हो ध्वजका डंडा थाम लिया ॥ ५२ १/२ ॥

तांस्तु भीतान् समालक्ष्य भीमसेनं च मूर्च्छितम् ॥ ५३ ॥
ननाद बलवन्नादं भगदत्तः प्रतापवान् ।
उन सब महारथियोंको भयभीत और भीमसेनको मूर्च्छित हुआ देख प्रतापी भगदत्तने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ५३ १/२ ॥

ततो घटोत्कचो राजन् प्रेक्ष्य भीमं तथागतम् ॥ ५४ ॥
संक्रुद्धो राक्षसो घोरस्तत्रैवान्तरधीयत ।
राजन्! तदनन्तर भीमको वैसी अवस्थामें देखकर भयंकर राक्षस घटोत्कच अत्यन्त कुपित हो वहीं अदृश्य हो गया ॥ ५४ १/२ ॥

स कृत्वा दारुणां मायां भीरूणां भयवर्धिनीम् ॥ ५५ ॥
अदृश्यत निमेषार्धाद् घोररूपं समास्थितः ।
ऐरावणं समारूढः स वै मायाकृतं स्वयम् ॥ ५६ ॥
(कैलासगिरिसंकाशं वज्रपाणिरिवाभ्ययात् ।)
फिर उसने कायरोंका भय बढ़ानेवाली अत्यन्त दारुण माया प्रकट की। वह आधे निमेषमें ही भयंकर रूप धारण करके दृष्टिगोचर हुआ। घटोत्कच अपनी ही मायाद्वारा

निर्मित कैलासपर्वतके समान श्वेत वर्णवाले ऐरावत हाथीपर बैठकर वज्रधारी इन्द्रके समान वहाँ आया था ॥ ५५-५६ ॥

तस्य चान्येऽपि दिङ्नागा बभूवुरनुयायिनः ।
अञ्जनो वामनश्चैव महापद्मश्च सुप्रभः ॥ ५७ ॥
त्रय एते महानागा राक्षसैः समधिष्ठिताः ।
उसके पीछे अंजन, वामन और उत्तम कान्तिसे युक्त महापद्म—से तीन दिग्गज और थे, जिनपर उसके साथी राक्षस सवार थे ॥ ५७ ½ ॥

महाकायास्त्रिधा राजन् प्रसवन्तो मदं बहु ॥ ५८ ॥
तेजोवीर्यबलोपेता महाबलपराक्रमाः ।
राजन्! वे सभी विशालकाय दिग्गज तीन स्थानोंसे बहुत मद बहा रहे थे और तेज, वीर्य एवं बलसे सम्पन्न तथा महाबली और महापराक्रमी थे ॥ ५८ ½ ॥

घटोत्कचस्तु स्वं नागं चोदयामास तं तदा ॥ ५९ ॥
सगजं भगदत्तं तु हन्तुकामः परंतपः ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले घटोत्कचने अपने हाथीको गजारूढ़ राजा भगदत्तकी ओर बढ़ाया। वह उन्हें हाथीसहित मार डालना चाहता था ॥ ५९ ½ ॥

ते चान्ये चोदिता नागा राक्षसैस्तैर्महाबलैः ॥ ६० ॥
परिपेतूः सुसंरब्धाश्चतुर्दंष्ट्राश्चतुर्दिशम् ।
महाबली राक्षसोंद्वारा प्रेरित अन्यान्य दिग्गज भी जिनके चार-चार दाँत थे, अत्यन्त कुपित हो चारों दिशाओंमें टूट पड़े ॥ ६० ½ ॥

भगदत्तस्य तं नागं विषाणैरभ्यपीडयन् ॥ ६१ ॥
स पीड्यमानस्तैर्नागैर्वेदनातः शराहतः ।
अनदत् सुमहानादमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ ६२ ॥
वे सब-के-सब भगदत्तके हाथीको अपने दाँतोंसे पीड़ा देने लगे। वह बाणोंसे बहुत घायल हो चुका था; अतः इन हाथियोंद्वारा पीड़ित होनेपर वेदनासे व्याकुल हो बड़े जोर-जोरसे चीत्कार करने लगा। उसकी आवाज इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी ॥ ६१-६२ ॥

तस्य तं नदतो नादं सुघोरं भीमनिःस्वनम् ।
श्रुत्वा भीष्मोऽब्रवीद् द्रोणं राजानं च सुयोधनम् ॥ ६३ ॥
भयंकर आवाजके साथ अत्यन्त घोर शब्द करनेवाले हाथीके उस चीत्कारको सुनकर भीष्मने द्रोणाचार्य तथा राजा दुर्योधनसे कहा— ॥ ६३ ॥

एष युध्यति संग्रामे हैडिम्बेन दुरात्मना ।
भगदत्तो महेष्वासः कृच्छ्रे च परिवर्तते ॥ ६४ ॥

'ये महाधनुर्धर राजा भगदत्त युद्धमें दुरात्मा घटोत्कचके साथ जूझ रहे हैं और संकटमें पड़ गये हैं ।। ६४ ।।

राक्षसश्च महाकायः स च राजातिकोपनः । एतौ समेतौ समरे कालमृत्युसमावुभौ ।। ६५ ।। 'वह राक्षस विशालकाय है और वे राजा भी अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए हैं। वे दोनों समरमें काल और मृत्युके समान हैं ।। ६५ ।।

श्रूयते चैव हृष्टानां पाण्डवानां महास्वनः । हस्तिनश्चैव सुमहान् भीतस्य रुदितध्वनिः ।। ६६ ।। 'देखो, हर्षमें भरे हुए पाण्डवोंका महान् सिंहनाद सुनायी पड़ता है और भगदत्तके डरे हुए हाथीके रोनेकी ध्वनि भी बड़े जोर-जोरसे कानोंमें आ रही है ।। ६६ ।।

तत्र गच्छाम भद्रं वो राजानं परिरक्षितुम् । अरक्ष्यमाणः समरे क्षिप्रं प्राणान् विमोक्ष्यति ।। ६७ ।। 'तुम सब लोगोंका कल्याण हो। हम राजा भगदत्तकी रक्षा करनेके लिये वहाँ चलें; अन्यथा अरक्षित होनेपर वे समरभूमिमें शीघ्र ही प्राण त्याग देंगे ।। ६७ ।।

ते त्वरध्वं महावीर्याः किं चिरेण प्रयामहे । महान् हि वर्तते रौद्रः संग्रामो लोमहर्षणः ।। ६८ ।। 'महापराक्रमी वीरो! जल्दी करो। विलम्बसे क्या लाभ? हमें जल्दी चलना चाहिये; क्योंकि वह संग्राम अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी है ।। ६८ ।।

भक्तश्च कुलपुत्रश्च शूरश्च पृतनापतिः । युक्तं तस्य परित्राणं कर्तुमस्माभिरच्युत ।। ६९ ।। 'राजा भगदत्त कुलीन, शूरवीर, हमारे भक्त और सेनापति हैं। अतः अच्युत! हमें उनकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये' ।। ६९ ।।

भीष्मस्य तद् वचः श्रुत्वा सर्व एव महारथाः । द्रोणभीष्मौ पुरस्कृत्य भगदत्तपरीप्सया ।। ७० ।। उत्तमं जवमास्थाय प्रययुर्यत्र सोऽभवत् । भीष्मका यह वचन सुनकर सभी महारथी द्रोणाचार्य और भीष्मको आगे करके भगदत्तकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे उस स्थानपर गये, जहाँ भगदत्त थे ।। ७० १/२ ।।

तान् प्रयातान् समालोक्य युधिष्ठिरपुरोगमाः ।। ७१ ।। पञ्चालाः पाण्डवैः सार्धं पृष्ठतोऽनुययुः परान् । उन्हें जाते देख युधिष्ठिर आदि पाण्डवों तथा पांचालोंने भी शत्रुओंका पीछा किया ।। ७१ १/२ ।।

तान्यनीकान्यथालोक्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।। ७२ ।। ननाद सुमहानादं विस्फोटमशनेरिव ।

उन सेनाओंको आते देख प्रतापी राक्षसराज घटोत्कचने बड़े जोरसे सिंहनाद किया, मानो वज्र फट पड़ा हो ॥ ७२ १/२ ॥ तस्य तं निनदं श्रुत्वा दृष्ट्वा नागांश्च युध्यतः ॥ ७३ ॥ भीष्मः शान्तनवो भूयो भारद्वाजमभाषत । घटोत्कचकी वह गर्जना सुनकर तथा जूझते हुए हाथियोंको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने पुनः द्रोणाचार्यसे कहा— ॥ ७३ १/२ ॥ न रोचते मे संग्रामो हैडिम्बेन दुरात्मना ॥ ७४ ॥ बलवीर्यसमाविष्टः ससहायश्च साम्प्रतम् । 'मुझे इस समय दुरात्मा घटोत्कचके साथ युद्ध करना अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वह बल और पराक्रमसे सम्पन्न है और इस समय उसे प्रबल सहायक भी मिल गये हैं ॥ ७४ १/२ ॥ नैष शक्यो युधा जेतुमपि वज्रभृता स्वयम् ॥ ७५ ॥ लब्धलक्ष्यः प्रहारी च वयं च श्रान्तवाहनाः । पाञ्चालैः पाण्डवेयैश्च दिवसं क्षतविक्षताः ॥ ७६ ॥ 'ऐसी दशामें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी उसे युद्धमें पराजित नहीं कर सकते। यह प्रहार करनेमें कुशल तथा लक्ष्य भेदनेमें सफल है। इधर हमलोगोंके वाहन थक गये हैं। पाण्डवों और पांचालोंके द्वारा दिनभर क्षत-विक्षत होते रहे हैं ॥ ७५-७६ ॥ तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकाशिभिः । घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥ ७७ ॥ 'इसलिये विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डवोंके साथ इस समय युद्ध करना मुझे पसंद नहीं आता। आज युद्धका विराम घोषित कर दिया जाय। कल सबेरे हमलोग शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे' ॥ ७७ ॥ पितामहवचः श्रुत्वा तथा चक्रुः स्म कौरवाः । उपायेनापयानं ते घटोत्कचभयार्दिताः ॥ ७८ ॥ पितामह भीष्मकी यह बात सुनकर कौरवोंने उपाय-पूर्वक युद्धसे हट जाना स्वीकार कर लिया; क्योंकि उस समय वे घटोत्कचके भयसे पीड़ित थे ॥ ७८ ॥ कौरवेषु निवृत्तेषु पाण्डवा जितकाशिनः । सिंहनादान् भृशं चक्रुः शङ्खान् दध्मुश्च भारत ॥ ७९ ॥ भारत! कौरवोंके निवृत्त हो जानेपर विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव बारंबार सिंहनाद करने और शंख बजाने लगे ॥ ७९ ॥ एवं तदभवद् युद्धं दिवसं भरतर्षभ । पाण्डवानां कुरूणां च पुरस्कृत्य घटोत्कचम् ॥ ८० ॥

भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उस दिन दिनभर घटोत्कचको आगे करके कौरवों और पाण्डवोंका युद्ध चलता रहा ॥ ८० ॥

कौरवास्तु ततो राजन् प्रययुः शिविरं स्वकम् । व्रीडमाना निशाकाले पाण्डवेयैः पराजिताः ॥ ८१ ॥ राजन्! तदनन्तर निशाके प्रारम्भकालमें पाण्डवोंसे पराजित होकर कौरव लज्जित हो अपने शिविरको गये ॥

शरविक्षतगात्रास्तु पाण्डुपुत्रा महारथाः । युद्धे सुमनसो भूत्वा जग्मुः स्वशिविरं प्रति ॥ ८२ ॥ महारथी पाण्डवोंके शरीर भी युद्धमें बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे, तथापि वे प्रसन्नचित्त होकर अपने शिविरको लौटे ॥ ८२ ॥

पुरस्कृत्य महाराज भीमसेनघटोत्कचौ । पूजयन्तस्तदान्योन्यं मुदा परमया युताः ॥ ८३ ॥ नदन्तो विविधान् नादांस्तूर्यस्वनविमिश्रितान् । सिंहनादांश्च कुर्वन्तो विमिश्रान् शङ्खनिःस्वनैः ॥ ८४ ॥ महाराज! भीमसेन और घटोत्कचको आगे करके परस्पर एक दूसरेकी प्रशंसा करते हुए पाण्डवसैनिक बड़ी प्रसन्नताके साथ नाना प्रकारके सिंहनाद करते हुए गये। उनकी उस गर्जनाके साथ विविध वाद्योंकी ध्वनि तथा शंखोंके शब्द भी मिले हुए थे ॥ ८३-८४ ॥

विनदन्तो महात्मानः कम्पयन्तश्च मेदिनीम् । घट्टयन्तश्च मर्माणि तव पुत्रस्य मारिष ॥ ८५ ॥ प्रयाताः शिबिरायैव निशाकाले परंतप । शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रेष्ठ नरेश! महात्मा पाण्डव गर्जते, पृथ्वीको कँपाते और आपके पुत्रके मर्मस्थानोंपर चोट पहुँचाते हुए निशाकालमें शिविरको ही लौट गये ॥ ८५ १/२ ॥

दुर्योधनस्तु नृपतिर्दीनो भ्रातृवधेन च ॥ ८६ ॥ मुहूर्तं चिन्तयामास बाष्पशोकसमाकुलः । अपने भाइयोंके मारे जानेसे राजा दुर्योधन अत्यन्त दीन हो रहा था। वह नेत्रोंसे आँसू बहाता हुआ शोकसे व्याकुल हो दो घड़ीतक भारी चिन्तामें पड़ा रहा ॥ ८६ १/२ ॥

ततः कृत्वा विधिं सर्वं शिविरस्य यथाविधि । प्रदध्यौ शोकसंतप्तो भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥ ८७ ॥ वह शिविरकी यथायोग्य सारी आवश्यक व्यवस्था करके भाइयोंके मारे जानेसे दुःखी एवं शोकसंतप्त हो चिन्तामें डूब गया ॥ ८७ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थदिवसावहारे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिनका युद्धविरामविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८७ १/२ श्लोक हैं।]

धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन

धृतराष्ट्र उवाच

भयं मे सुमहज्जातं विस्मयश्चैव संजय ।
श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवैः सुदुष्करम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! पाण्डवोंका देवताओंके लिये भी दुष्कर पराक्रम सुनकर मुझे बड़ा भारी भय और विस्मय हो रहा है ॥ १ ॥

पुत्राणां च पराभावं श्रुत्वा संजय सर्वशः ।
चिन्ता मे महती सूत भविष्यति कथं त्विति ॥ २ ॥
सूत संजय! अपने पुत्रोंकी सब प्रकारसे पराजयका हाल सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ती ही जा रही है। सोचता हूँ कैसे उनकी विजय होगी ॥ २ ॥

ध्रुवं विदुरवाक्यानि धक्ष्यन्ति हृदयं मम ।
यथा हि दृश्यते सर्वं दैवयोगेन संजय ॥ ३ ॥
संजय! निश्चय ही विदुरके वाक्य मेरे हृदयको जलाकर भस्म कर डालेंगे, क्योंकि उन्होंने जैसा कहा था, दैवयोगसे वह सब वैसा ही होता दिखायी देता है ॥ ३ ॥

यत्र भीष्ममुखान् सर्वान् शस्त्रज्ञान् योधसत्तमान् ।
पाण्डवानामनीकेषु योधयन्ति प्रहारिणः ॥ ४ ॥
पाण्डवोंकी सेनाओंमें ऐसे-ऐसे प्रहारकुशल योद्धा हैं, जो शस्त्रविद्याके ज्ञाता एवं योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म आदि समस्त महारथियोंके साथ भी युद्ध कर लेते हैं ॥

केनावध्या महात्मानः पाण्डुपुत्रा महाबलाः ।
केन दत्तवरास्तात किं वा ज्ञानं विदन्ति ते ॥ ५ ॥
तात! महाबली महात्मा पाण्डव किस कारणसे अवध्य हैं? किसने उन्हें वर दिया है अथवा कौन-सा ज्ञान वे जानते हैं? ॥ ५ ॥

येन क्षयं न गच्छन्ति दिवि तारागणा इव ।
पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं सैन्यं तु पाण्डवैः ॥ ६ ॥
जिससे आकाशके तारोंके समान वे नष्ट नहीं हो रहे हैं। मैं पाण्डवोंके द्वारा बारंबार अपनी सेनाके मारे जानेकी बात सुनकर सहन नहीं कर पाता हूँ ॥ ६ ॥

मय्येव दण्डः पतति दैवात् परमदारुणः ।

यथावध्याः पाण्डुसुता यथा वध्याश्च मे सुताः ।। ७ ।। एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन संजय । दैववश मेरे ही ऊपर अत्यन्त भयंकर दण्ड पड़ रहा है। संजय! क्यों पाण्डव अवध्य हैं और क्यों मेरे पुत्र मारे जा रहे हैं? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताओ ।। न हि पारं प्रपश्यामि दुःखस्यास्य कथंचन ।। ८ ।। समुद्रस्येव महतो भुजाभ्यां प्रतरन् नरः । जैसे अपनी भुजाओंसे तैरनेवाला मनुष्य महासागरका पार नहीं पा सकता, उसी प्रकार मैं इस दुःखका अन्त किसी प्रकार नहीं देखता हूँ ।। ८ १/२ ।। पुत्राणां व्यसनं मन्ये ध्रुवं प्राप्तं सुदारुणम् ।। ९ ।। घातयिष्यति मे सर्वान् पुत्रान् भीमो न संशयः । निश्चय ही मेरे पुत्रोंपर अत्यन्त भयंकर संकट प्राप्त हो गया है। मेरा विश्वास है कि भीमसेन मेरे सभी पुत्रोंको मार डालेंगे, इसमें संशय नहीं है ।। ९ १/२ ।। न हि पश्यामि तं वीरं यो मे रक्षेत् सुतान् रणे ।। १० ।। ध्रुवं विनाशः सम्प्राप्तः पुत्राणां मम संजय । मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो रणक्षेत्रमें मेरे पुत्रोंकी रक्षा कर सके। संजय! अवश्य ही मेरे पुत्रोंके विनाशकी घड़ी आ पहुँची है ।। १० १/२ ।। तस्मान्मे कारणं सूत शक्तिं चैव विशेषतः ।। ११ ।। पृच्छतो वै यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि । अतः सूत! मैं तुमसे शक्ति³ और कारणके³ विषयमें जो विशेष प्रश्न कर रहा हूँ, वह सब यथार्थरूपसे बताओ ।। दुर्योधनश्च यच्चक्रे दृष्ट्वा स्वान् विमुखान् रणे ।। १२ ।। भीष्मद्रोणौ कृपश्चैव सौबलश्च जयद्रथः । द्रौणिर्वापि महेष्वासो विकर्णो वा महाबलः ।। १३ ।। निश्चयो वापि कस्तेषां तदा ह्यासीन्महात्मनाम् । विमुखेषु महाप्राज्ञ मम पुत्रेषु संजय ।। १४ ।। युद्धमें अपने सैनिकोंको विमुख हुआ देख दुर्योधनने क्या किया? भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शकुनि, जयद्रथ, महाधनुर्धर अश्वत्थामा और महाबली विकर्णने भी क्या किया? महाप्राज्ञ संजय! मेरे पुत्रोंके विमुख होनेपर उन महामना महारथियोंने उस समय क्या निश्चय किया? ।। १२—१४ ।।

संजय उवाच

शृणु राजन्नवहितः श्रुत्वा चैवावधारय । नैव मन्त्रकृतं किंचिन्नैव मायां तथाविधाम् ।। १५ ।।

संजयने कहा— महाराज! सावधान होकर सुनिये और सुनकर स्वयं ही पाण्डवोंकी शक्ति और अपनी पराजयके कारणके विषयमें निश्चय कीजिये। पाण्डवोंमें न कोई मन्त्रका प्रभाव है और न कोई वैसी माया ही वे करते हैं ॥ १५ ॥

न वै विभीषिकां कांचिद् राजन् कुर्वन्ति पाण्डवाः ।
युध्यन्ति ते यथान्यायं शक्तिमन्तश्च संयुगे ॥ १६ ॥
राजन्! पाण्डवलोग युद्धमें किसी विभीषिकाका प्रदर्शन नहीं करते। अर्थात् किसी भी प्रकारसे भयभीत नहीं होते। वे न्यायपूर्वक युद्ध करते हैं। शक्तिशाली तो वे हैं ही ॥ १६ ॥

धर्मेण सर्वकार्याणि जीवितादीनि भारत ।
आरभन्ते सदा पार्थाः प्रार्थयाना महद् यशः ॥ १७ ॥
भारत! कुन्तीके पुत्र जीवन-निर्वाह आदिके सभी कार्य सदा धर्मपूर्वक ही आरम्भ करते हैं। कारण कि वे जगत्में अपना महान् यश फैलाना चाहते हैं ॥ १७ ॥

न ते युद्धात्निवर्तन्ते धर्मोपेता महाबलाः ।
श्रिया परमया युक्ता यतो धर्मस्ततो जयः ॥ १८ ॥
वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं। धर्मबलसे सम्पन्न होनेके कारण ही वे महाबली और उत्तम समृद्धिसे युक्त हैं। जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी विजय होती है ॥ १८ ॥

तेनावध्या रणे पार्था जययुक्ताश्च पार्थिव ।
तव पुत्रा दुरात्मानः पापेष्वभिरताः सदा ॥ १९ ॥
निष्ठुरा हीनकर्माणस्तेन हीयन्ति संयुगे ।
महाराज! धर्मके ही कारण कुन्तीके पुत्र युद्धमें अवध्य और विजयी हो रहे हैं। इधर आपके दुरात्मा पुत्र सदा पापोंमें ही तत्पर रहते हैं। निर्दय होनेके साथ ही निकृष्ट कर्ममें लगे रहते हैं। इसीलिये युद्धस्थलमें उन्हें हानि उठानी पड़ती है ॥ १९ ½ ॥

सुबहूनि नृशंसानि पुत्रैस्तव जनेश्वर ॥ २० ॥
निकृतीनीह पाण्डूनां नीचैरिव यथा नरैः ।
सर्वं च तदनादृत्य पुत्राणां तव किल्बिषम् ॥ २१ ॥
सापह्रवाः सदैवासन् पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज ।
न चैतान् बहु मन्यन्ते पुत्रास्तव विशाम्पते ॥ २२ ॥
जनेश्वर! आपके पुत्रोंने नीच मनुष्योंकी भाँति पाण्डवोंके प्रति बहुत-से क्रूरतापूर्ण बर्ताव तथा छल-कपट किये हैं, परंतु आपके पुत्रोंका वह सारा अपराध भुलाकर पाण्डव सदा उन दोषोंपर पर्दा ही डालते आये हैं। पाण्डुके बड़े भाई महाराज! इसपर भी आपके पुत्र इन पाण्डवोंको अधिक आदर नहीं देते हैं ॥ २०—२२ ॥

तस्य पापस्य सततं क्रियमाणस्य कर्मणः ।
साम्प्रतं सुमहद् घोरं फलं प्राप्तं जनेश्वर ॥ २३ ॥