महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महत्या सेनया सार्धं ततो युद्धमवर्तत ॥ ३९ ॥
राजन्! आपके पुत्रोंने विशाल सेनाके साथ आकर गंगानन्दन भीष्मको सब ओरसे घेर लिया। तत्पश्चात् वहाँ विकट युद्ध होने लगा ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मदुर्योधनसंवादे
नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म-दुर्योधन-संवादविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥
११०-
दशाधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनके प्रोत्साहनसे शिखण्डीका भीष्मपर आक्रमण और दोनों सेनाओंके प्रमुख वीरोंका परस्पर युद्ध तथा दुःशासनका अर्जुनके साथ घोर युद्ध
संजय उवाच
अर्जुनस्तु रणे राजन् दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् ।
शिखण्डिनमथोवाच समभ्येहि पितामहम् ॥ १ ॥
न चापि भीस्त्वया कार्या भीष्मादद्य कथंचन ।
अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैः पातयिष्ये रथोत्तमात् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! रणभूमिमें भीष्मका पराक्रम देखकर अर्जुनने शिखण्डीसे कहा—'वीर! तुम पितामहका सामना करनेके लिये आगे बढ़ो। आज भीष्मजीसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। मैं स्वयं अपने पैने बाणोंद्वारा इनको उत्तम रथसे मार गिराऊँगा' ।। १-२ ।।
एवमुक्तस्तु पार्थेन शिखण्डी भरतर्षभ ।
अभ्यद्रवत गाङ्गेयं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जब अर्जुनने शिखण्डीसे ऐसा कहा, तब उसने पार्थके उस कथनको सुनकर गंगानन्दन भीष्मपर धावा किया ।। ३ ।।
धृष्टद्युम्नस्तथा राजन् सौभद्रश्च महारथः ।
हृष्टावाद्रवतां भीष्मं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ॥ ४ ॥
राजन्! पार्थका वह भाषण सुनकर धृष्टद्युम्न तथा सुभद्राकुमार महारथी अभिमन्यु—ये दोनों वीर हर्ष और उत्साहमें भरकर भीष्मकी ओर दौड़े ।। ४ ।।
विराटद्रुपदौ वृद्धौ कुन्तिभोजश्च दंशितः ।
अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं पुत्रस्य तव पश्यतः ॥ ५ ॥
दोनों वृद्ध नरेश विराट और द्रुपद तथा कवचधारी कुन्तिभोज भी आपके पुत्रके देखते-देखते गंगानन्दन भीष्मपर टूट पड़े ।। ५ ।।
नकुलः सहदेवश्च धर्मराजश्च वीर्यवान् ।
तथेतराणि सैन्यानि सर्वाण्येव विशाम्पते ॥ ६ ॥
समाद्रवन्त गाङ्गेयं श्रुत्वा पार्थस्य भाषितम् ।
प्रजानाथ! नकुल, सहदेव, पराक्रमी धर्मराज युधिष्ठिर तथा दूसरे समस्त सैनिक अर्जुनका उपर्युक्त वचन सुनकर भीष्मजीकी ओर बढ़ने लगे ।। ६ १/२ ।।
प्रत्युद्ययुस्तावकाश्च समेतांस्तान् महारथान् ॥ ७ ॥
यथाशक्ति यथोत्साहं तन्मे निगदतः शृणु ।
इस प्रकार एकत्र हुए पाण्डव महारथियोंपर आपके पुत्रोंने भी जिस प्रकार अपनी शक्ति और उत्साहके अनुसार आक्रमण किया, वह सब बताता हूँ, सुनिये ॥
चित्रसेनो महाराज चेकितानं समभ्ययात् ॥ ८ ॥
भीष्मप्रेप्सुं रणे यान्तं वृषं व्याघ्रशिशुर्यथा ।
महाराज! चित्रसेनने भीष्मके पास पहुँचनेकी इच्छासे रणमें जाते हुए चेकितानका सामना किया, मानो बाघका बच्चा बैलका सामना कर रहा हो ॥ ८ १/२ ॥
धृष्टद्युम्नं महाराज भीष्मान्तिकमुपागतम् ॥ ९ ॥
त्वरमाणं रणे यत्तं कृतवर्मा न्यवारयत् ।
राजन्! कृतवर्माने भीष्मजीके निकट पहुँचकर युद्धके लिये उतावलीपूर्वक प्रयत्न करनेवाले धृष्टद्युम्नको रोका ॥
भीमसेनं सुसंक्रुद्धं गाङ्गेयस्य वधैषिणम् ॥ १० ॥
त्वरमाणो महाराज सौमदत्तिर्न्यवारयत् ।
महाराज! भीमसेन भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर गङ्गानन्दन भीष्मका वध करना चाहते थे; परंतु सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाने तुरंत आकर उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १० १/२ ॥
तथैव नकुलं शूरं किरन्तं सायकान् बहून् ॥ ११ ॥
विकर्णो वारयामास इच्छन् भीष्मस्य जीवितम् ।
इसी प्रकार शूरवीर नकुल बहुत-से सायकोंकी वर्षा कर रहे थे, परंतु भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले विकर्णने उन्हें रोक दिया ॥ ११ १/२ ॥
सहदेवं तथा राजन् यान्तं भीष्मरथं प्रति ॥ १२ ॥
वारयामास संक्रुद्धः कृपः शारद्वतो युधि ।
राजन्! युद्धस्थलमें भीष्मके रथकी ओर जाते हुए सहदेवको कुपित हुए शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने रोक दिया ॥ १२ १/२ ॥
राक्षसं क्रूरकर्माणं भैमसैनिं महाबलम् ॥ १३ ॥
भीष्मस्य निधनं प्रेप्सुं दुर्मुखोऽभ्यद्रवद् बली ।
भीष्मकी मृत्यु चाहनेवाले क्रूरकर्मा राक्षस महाबली भीमसेनकुमार घटोत्कचपर बलवान् दुर्मुखने आक्रमण किया ॥ १३ १/२ ॥
सात्यकिं समरे यान्तं तव पुत्रो न्यवारयत् ॥ १४ ॥
(भीष्मस्य वधमिच्छन्तं पाण्डवप्रीतिकाम्यया ।)
पाण्डवोंकी प्रसन्नताके लिये भीष्मका वध चाहनेवाले सात्यकिको युद्धके लिये जाते देख आपके पुत्र दुर्योधनने रोका ॥ १४ ॥
अभिमन्युं महाराज यान्तं भीष्मरथं प्रति ।
सुदक्षिणो महाराज काम्बोजः प्रत्यवारयत् ।। १५ ।।
महाराज! भीष्मके रथकी ओर अग्रसर होनेवाले अभिमन्युको काम्बोजराज सुदक्षिणने रोका ।। १५ ।।
विराटद्रुपदौ वृद्धौ समेतावरिमर्दनौ ।
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धौ वारयामास भारत ।। १६ ।।
भारत! एक साथ आये हुए शत्रुमर्दन बूढ़े नरेश विराट और द्रुपदको क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाने रोक दिया ।।
तथा पाण्डुसुतं ज्येष्ठं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् ।
भारद्वाजो रणे यत्तो धर्मपुत्रमवारयत् ।। १७ ।।
भीष्मके वधकी अभिलाषा रखनेवाले ज्येष्ठ पाण्डव धर्मपुत्र युधिष्ठिरको युद्धमें द्रोणाचार्यने यत्नपूर्वक रोका ।। १७ ।।
अर्जुनं रभसं युद्धे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।
भीष्मप्रेप्सुं महाराज भासयन्तं दिशो दश ।। १८ ।।
दुःशासनो महेष्वासो वारयामास संयुगे ।
महाराज! दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए वेगशाली वीर अर्जुन युद्धमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको मारना चाहते थे। उस समय महाधनुर्धर दुःशासनने युद्धके मैदानमें आकर उन्हें रोका ।। १८ १/२ ।।
अन्ये च तावका योधाः पाण्डवानां महारथान् ।। १९ ।।
भीष्मस्याभिमुखान् यातान् वारयामासुराहवे ।
राजन्! इसी प्रकार आपके अन्य योद्धाओंने भीष्मके सम्मुख गये हुए पाण्डव महारथियोंको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। १९ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नस्तु सैन्यानि प्राक्रोशत् पुनः पुनः ।। २० ।।
अभिद्रवत संरब्धा भीष्ममेकं महाबलम् ।
एषोऽर्जुनो रणे भीष्मं प्रयाति कुरुनन्दनः ।। २१ ।।
अभिद्रवत मा भैष्ट भीष्मो हि प्राप्स्यते न वः ।
अर्जुनं समरे योद्धुं नोत्सहेतापि वासवः ।। २२ ।।
किमु भीष्मो रणे वीरा गतसत्त्वोऽल्पजीवितः ।
धृष्टद्युम्न अपने सैनिकोंसे बारंबार पुकार-पुकारकर कहने लगे—‘वीरो! तुम सब लोग उत्साहित होकर एकमात्र महाबली भीष्मपर आक्रमण करो। ये कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले अर्जुन रणक्षेत्रमें भीष्मपर चढ़ाई करते हैं। तुम भी उनपर टूट पड़ो। डरो मत। भीष्म तुमलोगोंको नहीं पा सकेंगे। इन्द्र भी समरांगणमें अर्जुनके साथ युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; फिर ये धैर्य और शक्तिसे शून्य भीष्म रणक्षेत्रमें उनका सामना कैसे कर सकते हैं? अब इनका जीवन थोड़ा ही शेष रहा है’ ।। २०—२२ १/२ ।।
इति सेनापतेः श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ॥ २३ ॥ अभ्यद्रवन्त संहृष्टा गाङ्गेयस्य रथं प्रति । सेनापतिकी यह वचन सुनकर पाण्डव महारथी अत्यन्त हर्षमें भरकर गंगानन्दन भीष्मके रथपर टूट पड़े ॥
आगच्छमानान् समरे वार्योघान् प्रलयानिव ॥ २४ ॥ अवारयन्त संहृष्टास्तावकाः पुरुषर्षभाः । युद्धमें प्रलयकालीन जलप्रवाहके समान आते हुए उन वीरोंको आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुषोंने हर्ष और उत्साहमें भरकर रोका ॥ २४ १/२ ॥
दुःशासनो महाराज भयं त्यक्त्वा महारथः ॥ २५ ॥ भीष्मस्य जीविताकाङ्क्षी धनंजयमुपाद्रवत् । महाराज! महारथी दुःशासनने भय छोड़कर भीष्मकी जीवन-रक्षाके लिये धनंजयपर धावा किया ॥ २५ १/२ ॥
तथैव पाण्डवाः शूरा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥ २६ ॥ अभ्यद्रवन्त संग्रामे तव पुत्रान् महारथाः । इसी प्रकार शूरवीर महारथी पाण्डवोंने युद्धमें गंगानन्दन भीष्मके रथकी ओर खड़े हुए आपके पुत्रोंपर आक्रमण किया ॥ २६ १/२ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम चित्ररूपं विशाम्पते ॥ २७ ॥ दुःशासनरथं प्राप्य यत् पार्थो नात्यवर्तत । प्रजानाथ! वहाँ हमने सबसे अद्भुत और विचित्र बात यह देखी कि अर्जुन दुःशासनके रथके पास पहुँचकर वहाँसे आगे न बढ़ सके ॥ २७ १/२ ॥
यथा वारयते वेला क्षुब्धतोयं महार्णवम् ॥ २८ ॥ तथैव पाण्डवं क्रुद्धं तव पुत्रो न्यवारयत् । जैसे तटकी भूमि विक्षुब्ध जलराशिवाले महासागरको रोके रहती है, उसी प्रकार आपके पुत्रने क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको रोक दिया था ॥ २८ १/२ ॥
उभौ तौ रथिनां श्रेष्ठावुभौ भारत दुर्जयौ ॥ २९ ॥ उभौ चन्द्रार्कसदृशौ कान्त्या दीप्त्या च भारत । तथा तौ जातसंरम्भावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ॥ ३० ॥ (दुःशासनार्जुनौ वीरौ वृत्रेन्द्रसमतेजसौ ।) समीयतुर्महासंख्ये मयशक्रौ यथा पुरा ।
भारत! वे दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ और दुर्जय वीर थे। दोनों ही कान्ति और दीप्तिमें चन्द्रमा और सूर्यके समान जान पड़ते थे और भारत! दुःशासन तथा अर्जुन दोनों वीर वृत्रासुर एवं इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे दोनों क्रोधमें भरकर एक-दूसरेके वधकी अभिलाषा रखते थे। उस महायुद्धमें वे उसी प्रकार एक-दूसरेसे भिड़े हुए थे, जैसे पूर्वकालमें मयासुर और इन्द्र आपसमें लड़ते थे ॥ २९-३० १/२ ॥
दुःशासनो महाराज पाण्डवं विशिखैस्त्रिभिः ॥ ३१ ॥
वासुदेवं च विंशत्या ताडयामास संयुगे ।
महाराज! दुःशासनने तीन बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुनको और बीस बाणोंसे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको युद्धमें घायल किया ॥ ३१ १/२ ॥
ततोऽर्जुनो जातमन्युर्वार्ष्णेयं वीक्ष्य पीडितम् ॥ ३२ ॥
दुःशासनं शतेनाजौ नाराचानां समर्पयत् ।
भगवान् श्रीकृष्णको बाणोंसे पीड़ित हुआ देख अर्जुनका क्रोध उभड़ आया और उन्होंने दुःशासनको युद्धमें सौ नाराचोंसे घायल कर दिया ॥ ३२ १/२ ॥
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ॥ ३३ ॥
(यथैव पन्नगा राजंस्तटाकं तृषितास्तथा ।)
वे नाराच रणक्षेत्रमें दुःशासनका कवच विदीर्ण करके उसका रक्त पीने लगे, मानो प्यासे सर्प तालाबमें घुस गये हों ॥ ३३ ॥
दुःशासनस्त्रिभिः क्रुद्धः पार्थं विव्याध पत्रिभिः ।
ललाटे भरतश्रेष्ठ शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३४ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब दुःशासनने कुपित होकर अर्जुनके ललाटमें झुकी हुई गाँठवाले तीन पंखयुक्त बाण मारे ॥ ३४ ॥
ललाटस्थैस्तु तैर्बाणैः शुशुभे पाण्डवो रणे ।
यथा मेरुर्महाराज शृङ्गैरत्यर्थमुच्छ्रितैः ॥ ३५ ॥
ललाटमें लगे हुए उन बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुन युद्धमें उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे मेरुपर्वत अपने तीन अत्यन्त ऊँचे शिखरोंसे सुशोभित होता है ॥ ३५ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासः पुत्रेण तव धन्विना ।
व्यराजत रणे पार्थः किंशुकः पुष्पवानिव ॥ ३६ ॥
आपके धनुर्धर पुत्रद्वारा युद्धमें अधिक घायल किये जानेपर महाधनुर्धर अर्जुन खिले हुए पलाशवृक्षके समान शोभा पाने लगे ॥ ३६ ॥
दुःशासनं ततः क्रुद्धः पीडयामास पाण्डवः ।
पर्वणीय सुसंक्रुद्धो राहुः पूर्णं निशाकरम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर कुपित हुए पाण्डुपुत्र अर्जुन दुःशासनको उसी प्रकार पीड़ा देने लगे, जैसे पूर्णिमाके दिन अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ राहु पूर्ण चन्द्रमाको पीड़ा देता है ॥ ३७ ॥
पीड़्यमानो बलवता पुत्रस्तव विशाम्पते । विव्याध समरे पार्थं कङ्कपत्त्रैः शिलाशितैः ॥ ३८ ॥ प्रजानाथ! बलवान् अर्जुनके द्वारा पीड़ित होनेपर आपके पुत्रने शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कंक-पत्रयुक्त बाणोंद्वारा समरभूमिमें उन कुन्तीकुमारको बींध डाला ॥ ३८ ॥
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा रथं चास्य त्रिभिः शरैः । आजघान ततः पश्चात् पुत्रं ते निशितैः शरैः ॥ ३९ ॥ तब अर्जुनने तीन बाणोंसे दुःशासनके रथ और धनुषको छिन्न-भिन्न करके आपके उस पुत्रको पैने बाणोंद्वारा अच्छी तरह घायल किया ॥ ३९ ॥
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय भीष्मस्य प्रमुखे स्थितः । अर्जुनं पञ्चविंशत्या बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ४० ॥ तब दुःशासनने दूसरा धनुष ले भीष्मके सामने खड़े होकर अर्जुनकी दोनों भुजाओं और छातीमें पचीस बाण मारे ॥ ४० ॥
तस्य क्रुद्धो महाराज पाण्डवः शत्रुतापनः । अप्रेषीद् विशिखान् घोरान् यमदण्डोपमान् बहून् ॥ ४१ ॥ महाराज! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो दुःशासनपर यमदण्डके समान भयंकर बहुत-से बाण चलाये ॥ ४१ ॥
अप्राप्तानेव तान् बाणांश्छिच्छेद तनयस्तव । यतमानस्य पार्थस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४२ ॥ परंतु आपके पुत्रने अर्जुनके प्रयत्नशील होते हुए भी उन बाणोंको अपने पास आनेके पहले ही काट डाला। वह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ ४२ ॥
पार्थं च निशितैर्बाणैर्विध्यत् तनयस्तव । ततः क्रुद्धो रणे पार्थः शरान् संधाय कार्मुके ॥ ४३ ॥ प्रेषयामास समरे स्वर्णपुङ्खाञ्छिलाशितान् । बाणोंको काटनेके पश्चात् आपके पुत्रने कुन्तीकुमार अर्जुनको तीखे बाणोंद्वारा बींध डाला, तब रणक्षेत्रमें अर्जुनने कुपित होकर अपने धनुषपर स्वर्णमय पंखसे युक्त एवं शिलापर रगड़कर तेज किये हुए बाणोंका संधान किया और उन्हें दुःशासनपर चलाया ॥ ४३ १/२ ॥
न्यमज्जंस्ते महाराज तस्य काये महात्मनः ॥ ४४ ॥ यथा हंसा महाराज तडागं प्राप्य भारत । महाराज! भरतनन्दन! जैसे हंस तालाबमें पहुँचकर उसके भीतर गोते लगाते हैं, उसी प्रकार वे बाण महामना दुःशासनके शरीरमें धँस गये ॥ ४४ १/२ ॥
पीडितश्चैव पुत्रस्ते पाण्डवेन महात्मना ॥ ४५ ॥ हित्वा पार्थं रणे तूर्णं भीष्मस्य रथमाव्रजत् ।
अगाधे मज्जतस्तस्य द्वीपो भीष्मोऽभवत् तदा ॥ ४६ ॥
इस प्रकार महामना पाण्डुनन्दन अर्जुनके द्वारा पीड़ित होकर आपका पुत्र दुःशासन युद्धमें अर्जुनको छोड़कर तुरंत ही भीष्मके रथपर जा बैठा। उस समय अगाध समुद्रमें डूबते हुए दुःशासनके लिये भीष्मजी द्वीप हो गये ॥ ४५-४६ ॥
प्रतिलभ्य ततः संज्ञां पुत्रस्तव विशाम्पते ।
अवारयत् ततः शूरो भूय एव पराक्रमी ॥ ४७ ॥
शरैः सुनिशितैः पार्थं यथा वृत्रं पुरंदरः ।
निर्बिभेद महाकायो विव्यथे नैव चार्जुनः ॥ ४८ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर होश-हवास ठीक होनेपर आपके पराक्रमी एवं शूरवीर पुत्र दुःशासनने पुनः अत्यन्त तीखे बाणोंद्वारा कुन्तीकुमार अर्जुनको रोका, मानो इन्द्रने वृत्रासुरकी गतिको अवरुद्ध कर दिया हो। महाकाय दुःशासनने अर्जुनको अपने बाणोंसे क्षत-विक्षत कर दिया; परंतु वे तनिक भी व्यथित नहीं हुए ॥ ४७-४८ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अर्जुनदुःशासनसमागमे दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें अर्जुन और दुःशासनका युद्धविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४९ १/३ श्लोक हैं।]
कौरव-पाण्डवपक्षके प्रमुख महारथियोंके द्वन्द्व-युद्धका वर्णन
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
कौरव-पाण्डवपक्षके प्रमुख महारथियोंके द्वन्द्व-युद्धका वर्णन
संजय उवाच
सात्यकिं दंशितं युद्धे भीष्मायाभ्युद्यतं रणे ।
आर्ष्यशृङ्गिर्महेष्वासो वारयामास संयुगे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! युद्धस्थलमें कवचधारी सात्यकिको भीष्मसे युद्ध करनेके लिये उद्यत देख महाधनुर्धर राक्षस अलम्बुषने आकर उन्हें रोका ॥ १ ॥
माधवस्तु सुसंक्रुद्धो राक्षसं नवभिः शरैः ।
आजघान रणे राजन् प्रहसन्निव भारत ॥ २ ॥
राजन्! भरतनन्दन! यह देख सात्यकिने अत्यन्त कुपित हो उस रणक्षेत्रमें राक्षस अलम्बुषको हँसते हुए-से नौ बाण मारे ॥ २ ॥
तथैव राक्षसो राजन् माधवं नवभिः शरैः ।
अर्दयामास राजेन्द्र संक्रुद्धः शिनिपुङ्गवम् ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! तब उस राक्षसने भी अत्यन्त कुपित होकर मधुवंशी सात्यकिको नौ बाणोंसे पीड़ित किया ॥ ३ ॥
शैनेयः शरसंघं तु प्रेषयामास संयुगे ।
राक्षसाय सुसंक्रुद्धो माधवः परवीरहा ॥ ४ ॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले मधुवंशी सात्यकि-का क्रोध बहुत बढ़ गया और समरभूमिमें उन्होंने राक्षसपर बाणसमूहोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ४ ॥
ततो रक्षो महाबाहुं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।
विव्याध विशिखैस्तीक्ष्णैः सिंहनादं ननाद च ॥ ५ ॥
तदनन्तर राक्षसने सत्यपराक्रमी महाबाहु सात्यकिको तीखे सायकोंसे बींध डाला और सिंहके समान गर्जना की ॥ ५ ॥
माधवस्तु भृशं विद्धो राक्षसेन रणे तदा ।
वार्यमाणश्च तेजस्वी जहास च ननाद च ॥ ६ ॥
उस समय राक्षसके द्वारा रणक्षेत्रमें रोके जाने और अत्यन्त घायल होनेपर भी मधुवंशी तेजस्वी सात्यकि हँसने और गर्जना करने लगे ॥ ६ ॥
भगदत्तस्ततः क्रुद्धो माधवं निशितैः शरैः ।
ताडयामास समरे तोत्रैरिव महागजम् ॥ ७ ॥
तब क्रोधमें भरे हुए भगदत्तने पैने बाणोंद्वारा मधुवंशी सात्यकिको समरभूमिमें उसी प्रकार पीड़ित किया, जैसे महावत अंकुशोंद्वारा महान् गजराजको पीड़ा देता है।। विहाय राक्षसं युद्धे शैनेयो रथिनां वरः। प्राग्ज्योतिषाय चिक्षेप शरान् संनतपर्वणः॥ ८॥ तब रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने युद्धमें उस राक्षसको छोड़कर प्राग्ज्योतिषपुरनरेश भगदत्तपर झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाण चलाये॥ ८॥ तस्य प्राग्ज्योतिषो राजा माधवस्य महद् धनुः। चिच्छेद शतधारेण भल्लेन कृतहस्तवत्॥ ९॥ यह देख प्राग्ज्योतिषपुरनरेश भगदत्तने सात्यकिके विशाल धनुषको एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति सौ धारवाले भल्लके द्वारा काट डाला॥ ९॥ अथान्यद् धनुरदाय वेगवत् परवीरहा। भगदत्तं रणे क्रुद्धं विव्याध निशितैः शरैः॥ १०॥ तब शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले सात्यकिने दूसरा वेगवान् धनुष लेकर पैने बाणोंद्वारा युद्धमें क्रुद्ध हुए भगदत्तको बींध डाला॥ १०॥ सोऽतिविद्धो महेष्वासः सृक्किणी परिसंलिहन्। शक्तिं कनकवैदूर्यभूषितामायसीं दृढाम्॥ ११॥ यमदण्डोपमां घोरां चिक्षेप परमाहवे। इस प्रकार अत्यन्त घायल होनेपर महाधनुर्धर भगदत्त अपने मुँहके दोनों कोने चाटने लगे। फिर उन्होंने उस महायुद्धमें कनक और वैदूर्य मणियोंसे विभूषित लोहेकी बनी हुई सुदृढ़ एवं यमदण्डके समान भयंकर शक्ति चलायी॥ ११ ½॥ तामापतन्तीं सहसा तस्य बाहुबलेरिताम्॥ १२॥ सात्यकिः समरे राजन् द्विधा चिच्छेद सायकैः। उनके बाहुबलसे प्रेरित होकर समरभूमिमें सहसा अपने ऊपर गिरती हुई उस शक्तिके सात्यकिने बाणों-द्वारा दो टुकड़े कर दिये॥ १२ ½॥ ततः पपात सहसा महोल्केव हतप्रभा॥ १३॥ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशाम्पते। महता रथवंशेन वारयामास माधवम्॥ १४॥ तब वह शक्ति प्रभाहीन हुई बहुत बड़ी उल्काके समान सहसा भूमिपर गिर पड़ी। प्रजानाथ! भगदत्तकी शक्तिको नष्ट हुई देख आपके पुत्रने विशाल रथसेनाके साथ आकर सात्यकिको रोका॥ १३-१४॥ तथा परिवृतं दृष्ट्वा वार्ष्णेयानां महारथम्। दुर्योधनो भृशं क्रुद्धो भ्रातॄन् सर्वानुवाच ह॥ १५॥
वृष्णिवंशी महारथी सात्यकिको रथसेनासे घिरा हुआ देख दुर्योधनने अत्यन्त कुपित होकर अपने समस्त भाइयोंसे कहो— ॥ १५ ॥ तथा कुरुत कौरव्या यथा वः सात्यको युधि । न जीवन् प्रतिनिर्याति महतोऽस्माद् रथव्रजात् ॥ १६ ॥ ‘कौरवो! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे इस समरांगणमें आये हुए सात्यकि हमारे इस महान् रथ-समुदायसे जीवित न निकलने पावें ॥ १६ ॥ तस्मिन् हते हतं मन्ये पाण्डवानां महद् बलम् । तथेति च वचस्तस्य परिगृह्य महारथाः ॥ १७ ॥ शैनेयं योधयामासुर्भीष्मायाभ्युद्यतं रणे । ‘सात्यकिके मारे जानेपर मैं पाण्डवोंकी विशाल सेनाको मरी हुई ही मानता हूँ।’ दुर्योधनकी इस बातको मानकर कौरव महारथियोंने रणभूमिमें भीष्मका सामना करनेके लिये उद्यत हुए सात्यकिसे युद्ध आरम्भ किया ॥ १७ १/२ ॥ (अभिमन्युं तथाऽऽयान्तं भीष्मस्याभ्युद्यतं वधे ।) काम्बोजराजो बलवान् वारयामास संयुगे ॥ १८ ॥ इसी प्रकार भीष्मका वध करनेके लिये उद्यत होकर आते हुए अर्जुनकुमार अभिमन्युको बलवान् काम्बोजराजने युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १८ ॥ आर्जुनिं नृपतिर्विद्ध्वा शरैः संनतपर्वभिः । पुनरेव चतुःषष्ट्या राजन् विव्याध तं नृप ॥ १९ ॥ राजन्! नरेश्वर! काम्बोजराजने झुकी हुई गाँठवाले अनेक बाणोंद्वारा अभिमन्युको घायल करके पुनः चौंसठ बाणोंसे मारकर उन्हें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १९ ॥ सुदक्षिणस्तु समरे पुनर्विव्याध पञ्चभिः । सारथिं चास्य नवभिरिच्छन् भीष्मस्य जीवितम् ॥ २० ॥ तदनन्तर समरांगणमें भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले काम्बोजराज सुदक्षिणने अभिमन्युको पुनः पाँच बाण मारे और नौ बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ २० ॥ तद् युद्धमासीत् सुमहत् तयोस्तत्र समागमे । यदाभ्यधावद् गाङ्गेयं शिखण्डी शत्रुकर्शनः ॥ २१ ॥ जब शत्रुसूदन शिखण्डीने गंगानन्दन भीष्मपर धावा किया था, उस समय उन दोनों (अभिमन्यु और सुदक्षिण)-के संघर्षमें वहाँ बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥ २१ ॥ विराटद्रुपदौ वृद्धौ वारयन्तौ महाचमूम् । भीष्मं च युधि संरब्धावादद्रवन्तौ महारथौ ॥ २२ ॥ बूढ़े राजा महारथी विराट और द्रुपद दुर्योधनकी उस विशाल सेनाको रोकते हुए अत्यन्त क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें भीष्मपर चढ़ आये ॥ २२ ॥
अश्वत्थामा रणे क्रुद्धः समायाद्रथसत्तमः । ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोस्तस्य च भारत ॥ २३ ॥ तब रथियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा रणभूमिमें कुपित होकर आया। भारत! फिर अश्वत्थामाका विराट और द्रुपदके साथ भारी युद्ध छिड़ गया ॥ २३ ॥
विराटो दशभिर्भल्लैराजघान परंतप । यतमानं महेष्वासं द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥ २४ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! राजा विराटने संग्राममें शोभा पानेवाले प्रयत्नशील एवं महाधनुर्धर अश्वत्थामाको भल्ल नामक दस बाणोंसे घायल किया ॥ २४ ॥
द्रुपदश्च त्रिभिर्बाणैर्विव्याध निशितैस्तदा । गुरुपुत्रं समासाद्य प्रहरन्तौ महाबलौ ॥ २५ ॥ अश्वत्थामा ततस्तौ तु विव्याध बहुभिः शरैः । विराटद्रुपदौ वीरौ भीष्मं प्रति समुद्यतौ ॥ २६ ॥ उस समय द्रुपदने भी तीन तीखे बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको घायल कर दिया। इस प्रकार प्रहार करते हुए उन दोनों महाबली नरेशोंको अश्वत्थामाने अनेक बाणोंद्वारा बींध डाला। विराट और द्रुपद दोनों वीर भीष्मका वध करनेके लिये उद्यत थे ॥ २५-२६ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम वृद्धयोश्चरितं महत् । यद् द्रौणिसायकान् घोरान् प्रत्यवारयतां युधि ॥ २७ ॥ राजन्! वहाँ उन दोनों बूढ़े नरेशोंका हमने अद्भुत एवं महान् पराक्रम यह देखा कि वे युद्धमें अश्वत्थामाके भयंकर बाणोंका निवारण करते जा रहे थे ॥ २७ ॥
सहदेवं तथा यान्तं कृपः शारद्वतोऽभ्ययात् । यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमुपाद्रवत् ॥ २८ ॥ इसी प्रकार भीष्मपर चढ़ाई करनेवाले सहदेवको शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने सामने आकर रोका, मानो वनमें किसी मतवाले हाथीपर मदोन्मत्त गजराजने आक्रमण किया हो ॥ २८ ॥
कृपश्च समरे शूरो माद्रीपुत्रं महारथम् । आजघान शरैस्तूर्णं सप्तत्या रुक्मभूषणैः ॥ २९ ॥ शूरवीर कृपाचार्यने समरभूमिमें महारथी माद्रीकुमार सहदेवको सुवर्णभूषित सत्तर बाणोंसे तुरंत घायल कर दिया ॥ २९ ॥
तस्य माद्रीसुतश्चापं द्विधा चिच्छेद सायकैः । अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध नवभिः शरैः ॥ ३० ॥ तब माद्रीकुमार सहदेवने भी अपने सायकोंद्वारा उनके धनुषके दो टुकड़े कर दिये और धनुष कट जानेपर उन्हें नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३० ॥
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय समरे भारसाधनम् ।
माद्रीपुत्रं सुसंहृष्टो दशभिर्निशितैः शरैः ॥ ३१ ॥ आजघानोरसि क्रुद्ध इच्छन् भीष्मस्य जीवितम् । तदनन्तर भीष्मके जीवनकी रक्षा चाहनेवाले कृपाचार्यने समरांगणमें भार सहन करनेमें समर्थ दूसरा धनुष लेकर अत्यन्त हर्षके साथ सहदेवकी छातीमें क्रोधपूर्वक दस तीखे बाण मारे ॥ ३१ १/२ ॥
तथैव पाण्डवो राजञ्छारद्वतममर्षणम् ॥ ३२ ॥ आजघानोरसि क्रुद्धो भीष्मस्य वधकाङ्क्षया । तयोर्युद्धं समभवद् घोररूपं भयावहम् ॥ ३३ ॥ राजन्! इसी प्रकार पाण्डुकुमार सहदेवने भी कुपित हो भीष्मके वधकी इच्छासे अमर्षशील कृपाचार्यकी छातीमें अपने बाणोंद्वारा प्रहार किया। उन दोनोंका वह युद्ध अत्यन्त घोर एवं भयंकर हो चला ॥ ३२-३३ ॥
नकुलं तु रणे क्रुद्धो विकर्णः शत्रुतापनः । विव्याध सायकैः षष्ट्या रक्षन् भीष्मं महाबलम् ॥ ३४ ॥ दूसरी ओर क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी विकर्णने युद्धके मैदानमें महाबली भीष्मकी रक्षामें तत्पर हो साठ बाणोंद्वारा नकुलको घायल कर दिया ॥ ३४ ॥
नकुलोऽपि भृशं विद्धस्तव पुत्रेण धीमता । विकर्णं सप्तसप्तत्या निर्बिभेद शिलीमुखैः ॥ ३५ ॥ आपके बुद्धिमान् पुत्र विकर्णद्वारा अत्यन्त घायल होकर नकुलने भी सतहत्तर बाणोंसे विकर्णको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३५ ॥
तत्र तौ नरशार्दूलौ भीष्महेतोः परंतपौ । अन्योन्यं जघ्नुतुर्वीरौ गोष्ठे गोवृषभाविव ॥ ३६ ॥ जैसे गोशालामें दो साँड़ आपसमें लड़ते हों, उसी प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाले दोनों पुरुषसिंह वीर विकर्ण और नकुल भीष्मकी रक्षाके लिये एक-दूसरेपर घातक प्रहार कर रहे थे ॥ ३६ ॥
घटोत्कचं रणे यान्तं निघ्नन्तं तव वाहिनीम् । दुर्मुखः समरे प्रायाद् भीष्महेतोः पराक्रमी ॥ ३७ ॥ उसी समय पराक्रमी दुर्मुखने समरभूमिमें भीष्मकी रक्षाके लिये राक्षस घटोत्कचपर आक्रमण किया, जो युद्धके मैदानमें आपकी सेनाका संहार करता हुआ आगे बढ़ रहा था ॥ ३७ ॥
हैडिम्बस्तु रणे राजन् दुर्मुखं शत्रुतापनम् । आजघानोरसि क्रुद्धः शरेणानतपर्वणा ॥ ३८ ॥ राजन्! उस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले दुर्मुखको क्रोधमें भरे हुए हिडिम्बाकुमारने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उसकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ३८ ॥
भीमसेनसुतं चापि दुर्मुखः सुमुखैः शरैः । षष्ट्या वीरो नदन् हृष्टो विव्याध रणमूर्धनि ॥ ३९ ॥ तब वीर दुर्मुखने हर्षपूर्वक गर्जना करते हुए अपने तीखी नोकवाले बाणोंद्वारा भीमसेनके पुत्र घटोत्कचको युद्धके मुहानेपर साठ बाणोंसे बींध डाला ॥ ३९ ॥ धृष्टद्युम्नं तथाऽऽयान्तं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् । हार्दिक्यो वारयामास रथश्रेष्ठं महारथः ॥ ४० ॥ इसी प्रकार भीष्मके वधकी इच्छासे आते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्नको महारथी कृतवर्माने रोक दिया ॥ ४० ॥ हार्दिक्यः पार्षतं चापि विद्ध्वा पञ्चभिरायसैः । पुनः पञ्चाशता तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ४१ ॥ कृतवर्माने द्रुपदकुमारको लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे बींधकर फिर तुरंत ही पचास बाणोंसे घायल किया और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४१ ॥ आजघान महाबाहुः पार्षतं तं महारथम् । तं चैव पार्षतो राजन् हार्दिक्यं नवभिः शरैः ॥ ४२ ॥ विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः । इस प्रकार महाबाहु कृतवर्माने महारथी धृष्टद्युम्नको गहरी चोट पहुँचायी। राजन्! तब धृष्टद्युम्नने भी कंकपत्रविभूषित सीधे जानेवाले तीखे एवं पैने नौ बाणोंसे कृतवर्माको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ४२ १/२ ॥ तयोः समभवद् युद्धं भीष्महेतोर्महाहवे ॥ ४३ ॥ अन्योन्यातिशये युक्तं यथा वृत्रमहेन्द्रयोः । उस समय भीष्मजीके निमित्त उस महान् संग्राममें वृत्रासुर और इन्द्रके समान उन दोनों वीरोंका घोर युद्ध होने लगा, जिसमें वे एक-दूसरेसे आगे बढ़ जानेके प्रयत्नमें लगे थे ॥ ४३ १/२ ॥ भीमसेनं तथाऽऽयान्तं भीष्मं प्रति महारथम् ॥ ४४ ॥ भूरिश्रवाभ्ययात् तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । इसी तरह महारथी भीष्मकी ओर आते हुए भीमसेनपर भूरिश्रवाने तुरंत आक्रमण किया और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४४ १/२ ॥ सौमदत्तिरथो भीममाजघान स्तनान्तरे ॥ ४५ ॥ नाराचेन सुतीक्ष्णेन रुक्मपुङ्खेन संयुगे । तदनन्तर सोमदत्तकुमारने युद्धस्थलमें सुवर्णमय पंखसे युक्त अत्यन्त तीखे नाराचद्वारा भीमसेनकी छातीमें प्रहार किया ॥ ४५ १/२ ॥ उरःस्थेन बभौ तेन भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ४६ ॥ स्कन्दशक्त्या यथा क्रौञ्चः पुरा नृपतिसत्तम ।
नृपश्रेष्ठ! छातीमें लगे हुए उस बाणसे प्रतापी भीमसेन वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयकी शक्तिसे आविद्ध होनेपर क्रौंच पर्वतकी शोभा हुई थी॥ ४६ १/२ ॥
तौ शरान् सूर्यसंकाशान् कर्मारपरिमार्जितान् ॥ ४७ ॥
अन्योन्यस्य रणे क्रुद्धौ चिक्षिपाते नरर्षभौ ।
क्रोधमें भरे हुए वे दोनों नरश्रेष्ठ युद्धमें एक-दूसरेपर लोहारके द्वारा माँजकर साफ किये हुए सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंका प्रहार कर रहे थे॥ ४७ १/२ ॥
भीमो भीष्मवधाकाङ्क्षी सौमदत्तिं महारथम् ॥ ४८ ॥
तथा भीष्मजये गृध्नुः सौमदत्तिस्तु पाण्डवम् ।
कृतप्रतिकृते यत्तौ योधयामासतू रणे ॥ ४९ ॥
भीमसेन भीष्मके वधकी इच्छा रखकर महारथी भूरिश्रवापर चोट करते थे और भूरिश्रवा भीष्मकी विजय चाहता हुआ पाण्डुकुमार भीमसेनपर प्रहार करता था। वे दोनों युद्धमें एक-दूसरेके अस्त्रोंका प्रतीकार करते हुए लड़ रहे थे॥ ४८-४९॥
युधिष्ठिरं तु कौन्तेयं महत्या सेनया वृतम् ।
भीष्माभिमुखमायान्तं भारद्वाजो न्यवारयत् ॥ ५० ॥
(तत्र युद्धमभूद् घोरं तयोः पुरुषसिंहयोः ।)
दूसरी ओर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको विशाल सेनाके साथ भीष्मके सम्मुख आते देख द्रोणाचार्यने रोक दिया; वहाँ उन दोनों पुरुषसिंहोंमें घोर युद्ध हुआ॥ ५० ॥
द्रोणस्य रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् ।
श्रुत्वा प्रभद्रका राजन् समकम्पन्त मारिष ॥ ५१ ॥
राजन्! द्रोणाचार्यके रथकी घरघराहट मेघकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी। आर्य! उसे सुनकर प्रभद्रक वीर काँप उठे॥ ५१॥
सा सेना महती राजन् पाण्डुपुत्रस्य संयुगे ।
द्रोणेन वारिता यत्ता न चचाल पदात् पदम् ॥ ५२ ॥
महाराज! उस युद्धस्थलमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी वह विशाल सेना द्रोणके द्वारा जब रोक दी गयी, तब प्रयत्न करनेपर भी वह एक पग भी आगे न बढ़ सकी॥ ५२॥
चेकितानं रणे यत्तं भीष्मं प्रति जनेश्वर ।
चित्रसेनस्तव सुतः क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ५३ ॥
जनेश्वर! दूसरी ओर भीष्मके प्रति प्रयत्नपूर्वक आक्रमण करनेवाले क्रोधमें भरे हुए चेकितानको रणभूमिमें आपके पुत्र चित्रसेनने रोक दिया॥ ५३॥
भीष्महेतोः पराक्रान्तश्चित्रसेनः पराक्रमी ।
चेकितानं परं शक्त्या योधयामास भारत ॥ ५४ ॥
तथैव चेकितानोऽपि चित्रसेनमवारयत् ।
तद् युद्धमासीत् सुमहत् तयोस्तत्र समागमे ॥ ५५ ॥
पराक्रमी चित्रसेन भीष्मकी रक्षाके लिये पराक्रम दिखा रहा था। भारत! उसने पूरी शक्ति लगाकर चेकितानके साथ युद्ध किया। इसी प्रकार चेकितानने भी चित्रसेनकी गति रोक दी। उन दोनोंकी मुठभेड़में वहाँ महान् युद्ध होने लगा ।। ५४-५५ ।।
अर्जुनो वार्यमाणस्तु बहुशस्तत्र भारत ।
विमुखीकृत्य पुत्रं ते सेनां तव ममर्द ह ।। ५६ ।।
भरतनन्दन! वहाँ बारंबार रोके जानेपर भी अर्जुनने आपके पुत्रको युद्धसे विमुख करके आपकी सेनाको रौंद डाला ।। ५६ ।।
दुःशासनोऽपि परया शक्त्या पार्थमवारयत् ।
कथं भीष्मं न नो हन्यादिति निश्चित्य भारत ।। ५७ ।।
भारत! उस समय दुःशासन भी यह निश्चय करके कि ये किसी प्रकार हमारे भीष्मको मार न सकें, पूरी शक्ति लगाकर अर्जुनको रोकनेका प्रयत्न करता रहा ।। ५७ ।।
(पार्थोऽपि समरे राजन् दुःशासनमताडयत् ।
ताडिते बहुधा पुत्रे पार्थबाणैरजिह्मगैः ।।
बभूव व्यथिता सेना दृष्ट्वा पार्थपराक्रमम् ।
पुनश्च ताडिता तेन पार्थेनामिततेजसा ।।)
राजन्! अर्जुनने भी समरमें दुःशासनको अपने बाणोंसे बहुत घायल किया। सीधे जानेवाले अर्जुनके बाणोंसे आपके पुत्रके बार-बार घायल होनेपर पार्थके उस पराक्रमको देखकर आपकी सारी सेना व्यथित हो उठी। अमित तेजस्वी अर्जुनने उसे बारंबार पीड़ित किया।
सा वध्यमाना समरे पुत्रस्य तव वाहिनी ।
लोड्यते रथिभिः श्रेष्ठैस्तत्र तत्रैव भारत ।। ५८ ।।
भरतनन्दन! उस संग्राममें आपके पुत्रकी सारी सेनाको जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ रथियोंने बाणोंसे विद्ध करके मथ डाला था ।। ५८ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वन्द्वयुद्धे
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। १११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वन्द्वयुद्धविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १११ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६१ श्लोक हैं।]
११२-
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
द्रोणाचार्यका अश्वत्थामाको अशुभ शकुनोंकी सूचना देते हुए उसे भीष्मकी रक्षाके लिये धृष्टद्युम्नसे युद्ध करनेका आदेश देना
संजय उवाच
अथ वीरो महेष्वासो मत्तवारणविक्रमः ।
समादाय महच्चापं मत्तवारणवारणम् ॥ १ ॥
विधुन्वानो नरश्रेष्ठो द्रावयाणो वरूथिनीम् ।
पृतनां पाण्डवेयानां गाहमाना महाबलः ॥ २ ॥
निमित्तानि निमित्तज्ञः सर्वतो वीक्ष्य वीर्यवान् ।
प्रतपन्तमनीकानि द्रोणः पुत्रमभाषत ॥ ३ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर महाधनुर्धर, मतवाले हाथीके समान पराक्रमी, वीर, नरश्रेष्ठ, महाबली तथा शुभाशुभ निमित्तोंके ज्ञाता एवं अद्भुत शक्तिशाली द्रोणाचार्य मतवाले हाथियोंकी गतिको कुण्ठित कर देनेवाले विशाल धनुषको हाथमें लेकर उसे खींचने और विपक्षी सेनाको भगाने लगे। उन्होंने पाण्डवोंकी सेनामें प्रवेश करते समय सब ओर बुरे निमित्त (शकुन) देखकर शत्रुसेनाको संताप देते हुए पुत्र अश्वत्थामासे इस प्रकार कहा— ॥
अयं हि दिवसस्तात यत्र पार्थो महाबलः ।
जिघांसुः समरे भीष्मं परं यत्नं करिष्यति ॥ ४ ॥
‘तात! यही वह दिन है, जब कि महाबली अर्जुन समरभूमिमें भीष्मको मार डालनेकी इच्छासे महान् प्रयत्न करेंगे ॥ ४ ॥
उत्पतन्ति हि मे बाणा धनुः प्रस्फुरतीव च ।
योगमस्त्राणि गच्छन्ति क्रूरे मे वर्तते मतिः ॥ ५ ॥
‘मेरे बाण तरकससे उछले पड़ते हैं, धनुष फड़क उठता है, अस्त्र स्वयं ही धनुषसे संयुक्त हो जाते हैं और मेरे मनमें क्रूरकर्म करनेका संकल्प हो रहा है ॥ ५ ॥
दिक्ष्वशान्तानि घोराणि व्याहरन्ति मृगद्विजाः ।
नीचैर्गृध्रा निलीयन्ते भारतानां चमूं प्रति ॥ ६ ॥
‘सम्पूर्ण दिशाओंमें पशु और पक्षी अशान्तिपूर्ण भयंकर बोली बोल रहे हैं। गीध नीचे आकर कौरव-सेनामें छिप रहे हैं ॥ ६ ॥
नष्टप्रभ इवादित्यः सर्वतो लोहिता दिशः ।
रसते व्यथते भूमिः कम्पतीव च सर्वशः ॥ ७ ॥
‘सूर्यकी प्रभा मन्द-सी पड़ गयी है। सम्पूर्ण दिशाएँ लाल हो रही हैं। पृथिवी सब ओरसे कोलाहलपूर्ण, व्यथित और कम्पित-सी हो रही है ।। ७ ।।
कङ्का गृध्रा बलाकाश्च व्याहरन्ति मुहुर्मुहुः ।
शिवाश्चैवाशिवा घोरा वेदयन्त्यो महद् भयम् ।। ८ ।।
(ववाशिरे भयकरा दीप्तास्याभिमुखे रवेः ।)
‘कंक, गीध और बगले बारंबार बोल रहे हैं। अमंगलमयी घोररूपवाली गीदड़ियाँ महान् भयकी सूचना देती हुई सूर्यकी ओर मुँह करके भयानक बोली बोला करती हैं और उनका मुँह प्रज्वलित-सा जान पड़ता है ।। ८ ।।
पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलात् ।
सकबन्धाश्च परिघो भानुमावृत्य तिष्ठति ।। ९ ।।
‘सूर्यमण्डलके मध्यभागसे बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरी हैं। कबन्धयुक्त परिघ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर स्थित है ।। ९ ।।
परिवेषस्तथा घोरश्चन्द्रभास्करयोरभूत् ।
वेद्यानो भयं घोरं राज्ञां देहावकर्तनम् ।। १० ।।
‘चन्द्रमा और सूर्यके चारों ओर भयंकर घेरा पड़ने लगा है, जो क्षत्रियोंके शरीरका विनाश करनेवाले घोर भयकी सूचना दे रहा है ।। १० ।।
देवतायतनस्थाश्च कौरवेन्द्रस्य देवताः ।
कम्पन्ते च हसन्ते च नृत्यन्ति च रुदन्ति च ।। ११ ।।
‘कौरवराज धृतराष्ट्रके देवालयोंकी देवमूर्तियाँ हिलती, हँसती, नाचती तथा रोती जान पड़ती हैं ।। ११ ।।
अपसव्यं ग्रहाश्चक्रुरलक्ष्माणं दिवाकरम् ।
अवाक्शिराश्च भगवानुपातिष्ठत चन्द्रमाः ।। १२ ।।
‘ग्रहोंने सूर्यकी वामावर्त परिक्रमा करके उन्हें अशुभ लक्षणोंका सूचक बना दिया है, भगवान् चन्द्रमा अपने दोनों कोनोंके सिरे नीचे करके उदित हुए हैं ।। १२ ।।
वपूंषि च नरेन्द्राणां विगताभानि लक्षये ।
धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु न च भ्राजन्ति दंशिताः ।। १३ ।।
‘राजाओंके शरीरोंको मैं श्रीहीन देख रहा हूँ। दुर्योधनकी सेनाओंमें जो लोग कवच धारण करके स्थित हैं, उनकी शोभा नहीं हो रही है ।। १३ ।।
सेनयोरुभयोश्चापि समन्ताच्छ्रूयते महान् ।
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषो गाण्डीवस्य च निःस्वनः ।। १४ ।।
‘दोनों ही सेनाओंमें चारों ओर पांचजन्य शंखका गम्भीर घोष और गाण्डीवधनुषकी टंकारध्वनि सुनायी देती है ।। १४ ।।
ध्रुवमास्थाय बीभत्सुरुत्तमास्त्राणि संयुगे ।
अपास्यान्थान् रणे योधामभ्येष्यति पितामहम् ॥ १५ ॥
'इससे यह निश्चय जान पड़ता है कि अर्जुन युद्धस्थलमें उत्तम अस्त्रोंका आश्रय ले दूसरे योद्धाओंको दूर हटाकर रणभूमिमें पितामह भीष्मके पास पहुँच जायेंगे ॥ १५ ॥
हृष्यन्ति रोमकूपाणि सीदतीव च मे मनः ।
चिन्तयित्वा महाबाहो भीष्मार्जुनसमागमम् ॥ १६ ॥
'महाबाहो! भीष्म और अर्जुनके युद्धका विचार करके मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं और मन शिथिल-सा होता जा रहा है ॥ १६ ॥
तं चेह निकृतिप्रज्ञं पाञ्चाल्यं पापचेतसम् ।
पुरस्कृत्य रणे पार्थो भीष्मस्यायोधनं गतः ॥ १७ ॥
'शठताके पूरे पण्डित उस पापात्मा पांचाल-राजकुमार शिखण्डीको यहाँ रणमें आगे करके कुन्तीकुमार अर्जुन भीष्मसे युद्ध करनेके लिये गये हैं ॥ १७ ॥
अब्रवीच्च पुरा भीष्मो नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ।
स्त्री ह्येषा विहिता धात्रा दैवाच्च स पुनः पुमान् ॥ १८ ॥
'भीष्मने पहले ही यह कह दिया था कि मैं शिखण्डीको नहीं मारूँगा; क्योंकि विधाताने इसे स्त्री ही बनाया था। फिर भाग्यवश यह पुरुष हो गया ॥ १८ ॥
अमङ्गल्यध्वजश्चैव याज्ञसेनिर्महाबलः ।
न चामङ्गलिके तस्मिन् प्रहरेदापगासुतः ॥ १९ ॥
'इसके सिवा द्रुपदका यह महाबली पुत्र अपनी ध्वजामें अमंगलसूचक चिह्न धारण करता है। अतः इस अमांगलिक शिखण्डीपर गंगानन्दन भीष्म कभी प्रहार नहीं करेंगे ॥ १९ ॥
एतद् विचिन्तयानस्य प्रज्ञा सीदति मे भृशम् ।
अभ्युद्यतो रणे पार्थः कुरुवृद्धमुपाद्रवत् ॥ २० ॥
'इन सब बातोंपर जब मैं विचार करता हूँ, तब मेरी बुद्धि अत्यन्त शिथिल हो जाती है। आज अर्जुनने पूरी तैयारीके साथ रणभूमिमें कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भीष्मजीपर धावा किया है ॥ २० ॥
युधिष्ठिरस्य च क्रोधो भीष्मश्चार्जुनसङ्गतः ।
मम चास्त्रसमारम्भः प्रजानामशिवं ध्रुवम् ॥ २१ ॥
'युधिष्ठिरका क्रोध करना, भीष्म और अर्जुनका संघर्ष होना और मेरा अपने विविध अस्त्रोंके प्रयोगके लिये उद्योग करना—ये तीनों बातें निश्चय ही प्रजाजनोंके अमंगलकी सूचना देनेवाली हैं ॥ २१ ॥
मनस्वी बलवाञ्छूरः कृतास्त्रो लघुविक्रमः ।
दूरपाती दृढेषुश्च निमित्तज्ञश्च पाण्डवः ॥ २२ ॥
'पाण्डुनन्दन अर्जुन मनस्वी, बलवान्, शूरवीर, अस्त्रविद्याके पण्डित, शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले, दूरतकका लक्ष्य बेधनेवाले, सुदृढ़ बाणोंका संग्रह रखनेवाले तथा शुभाशुभ निमित्तोंके ज्ञाता हैं ।। २२ ।। अजेयः समरे चापि देवैरपि सवासवैः । बलवान् बुद्धिमांश्चैव जितक्लेशो युधां वरः ।। २३ ।। 'इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उन्हें युद्धमें पराजित नहीं कर सकते। वे बलवान्, बुद्धिमान्, क्लेशोंपर विजय पानेवाले और योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं ।। २३ ।। विजयी च रणे नित्यं भैरवास्त्रश्च पाण्डवः । तस्य मार्गं परिहरन् द्रुतं गच्छ यतव्रत ।। २४ ।। 'उन्हें युद्धमें सदा विजय प्राप्त होती है। पाण्डुनन्दन अर्जुनके अस्त्र बड़े भयंकर हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुत्र! इसलिये तुम उनका रास्ता छोड़कर शीघ्र भीष्मजीकी रक्षाके लिये चले जाओ ।। २४ ।। पश्याद्यैतन्महाघोरे संयुगे वैशसं महत् । हेमचित्राणि शूराणां महान्ति च शुभानि च ।। २५ ।। कवचान्यवदीर्यन्ते शरैः संनतपर्वभिः । छिद्यन्ते च ध्वजाग्राणि तोमराश्च धनूंषि च ।। २६ ।। 'देखो, इस महाघोर संग्राममें आज यह कैसा महान् जनसंहार हो रहा है? शूरवीरोंके स्वर्णजटित, शुभ एवं महान् कवच अर्जुनके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा विदीर्ण किये जा रहे हैं। ध्वजके अग्रभाग, तोमर और धनुषोंके टुकड़े-टुकड़े किये जा रहे हैं ।। २५-२६ ।। प्रासाश्च विमलास्तीक्ष्णाः शक्तयश्च कनकोज्ज्वलाः । वैजयन्त्यश्च नागानां संक्रुद्धेन किरीटिना ।। २७ ।। 'चमकीले प्रास, सुवर्णजटित होनेके कारण सुनहरी कान्तिसे प्रकाशित होनेवाली तीखी शक्तियाँ और हाथियोंपर फहराती हुई वैजयन्ती पताकाएँ क्रोधमें भरे हुए किरीटधारी अर्जुनके द्वारा छिन्न-भिन्न की जा रही हैं ।। २७ ।। नायं संरक्षितुं कालः प्राणान् पुत्रोपजीविभिः । याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे विजयाय च ।। २८ ।। 'बेटा! आश्रित रहकर जीविका चलानेवाले पुरुषोंके लिये यह अपने प्राणोंकी रक्षाका अवसर नहीं है। तुम स्वर्गको सामने रखकर यश और विजयकी प्राप्तिके लिये भीष्मजीके पास जाओ ।। २८ ।। रथनागहयावर्तां महाघोरां सुदुर्गमाम् । रथेन संग्रामनदीं तरत्येष कपिध्वजः ।। २९ ।। 'यह युद्ध एक महाघोर और अत्यन्त दुर्गम नदीके समान है। उसमें रथ, हाथी और घोड़े भँवर हैं, कपिध्वज अर्जुन रथरूपी नौकाके द्वारा इसे पार कर रहे हैं ।। २९ ।।