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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

मयास्य दत्तं राजर्षे गृह्णीयां तत् कथं पुनः । काममत्रापराधो मे दण्डमाज्ञापय प्रभो ॥ १०२ ॥ **विकृत बोला—**राजर्षे! मैंने इसे दान दिया था; फिर वह दान इससे वापस कैसे ले लूँ। भले, इसमें मेरा अपराध समझा जाय; परंतु मैं दिया हुआ दान वापस नहीं ले सकता। प्रभो! मुझे दण्ड भोगनेकी आज्ञा प्रदान करें ॥ १०२ ॥

विरूप उवाच

दीयमानं यदि मया नेषिष्यसि कथञ्चन । नियंस्यति त्वां नृपतिरयं धर्मानुशासकः ॥ १०३ ॥ **विरूपने कहा—**विकृत! यदि तुम मेरी दी हुई वस्तु स्वीकार नहीं करोगे तो ये धर्मपूर्ण शासन करनेवाले नरेश तुम्हें कैद कर लेंगे ॥ १०३ ॥

विकृत उवाच

स्वं मया याचितेनेह दत्तं कथमिहाद्य तत् । गृह्णीयां गच्छतु भवानभ्यनुज्ञां ददानि ते ॥ १०४ ॥ **विकृत बोला—**तुम्हारे माँगनेपर मैंने अपना धन दानके रूपमें दिया था; फिर आज उसे वापस कैसे ले सकता हूँ? तुम्हारे ऊपर मेरा कुछ भी पावना नहीं है। मैं तुम्हें जानेके लिये आज्ञा देता हूँ, तुम जाओ ॥ १०४ ॥

ब्राह्मण उवाच

श्रुतमेतत्त्वया राजन्ननयोः कथितं द्वयोः । प्रतिज्ञातं मया यत्ते तद् गृहाणाविचारितम् ॥ १०५ ॥ **इसी बीचमें जापक ब्राह्मण बोल उठा—**राजन्! आपने इन दोनोंकी बातें सुन लीं। मैंने आपको देनेके लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आप मेरा दान बिना विचारे ग्रहण करें ॥ १०५ ॥

राजोवाच

प्रस्तुतं सुमहत् कार्यमनयोर्गह्वरं यथा । जापकस्य दृढीकारः कथमेतद् भविष्यति ॥ १०६ ॥ **राजाने मन-ही-मन कहा—**इन दोनोंका बड़ा भारी और गहन कार्य सामने आ गया है। इधर जापक ब्राह्मणका सुदृढ़ आग्रह ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। इससे निपटारा कैसे होगा ॥ १०६ ॥

यदि तावन्न गृह्णामि ब्राह्मणेनापवर्जितम् । कथं न लिप्येयमहं पापेन महताद्य वै ॥ १०७ ॥

यदि मैं आज ब्राह्मणकी दी हुई वस्तु ग्रहण न करूँ तो किस प्रकार महान् पापसे निर्लिप्त रह सकूँगा ॥ १०७ ॥
तौ चोवाच स राजर्षिः कृतकार्यों गमिष्यथः ।
नेदानीं मामिहासाद्य राजधर्मो भवेन्मृषा ॥ १०८ ॥
इसके बाद राजर्षि इक्ष्वाकुने उन दोनोंसे कहा—'तुम दोनों अपने विवादका निपटारा हो जानेपर ही यहाँसे जाना। इस समय मेरे पास आकर अपना कार्य पूर्ण हुए बिना न जाना। मुझे भय है कि राजधर्म मिथ्या अथवा कलंकित न हो जाय ॥ १०८ ॥
स्वधर्मः परिपाल्यस्तु राज्ञामिति विनिश्चयः ।
विप्रधर्मश्च गहनो मामनात्मानमाविशत् ॥ १०९ ॥
राजाओंको अपने धर्मका पालन करना चाहिये, यही शास्त्रका सिद्धान्त है। इधर मुझ अजितात्माके भीतर गहन ब्राह्मणधर्मने प्रवेश किया है ॥ १०९ ॥

ब्राह्मण उवाच

गृहाण धारयेऽहं च याचितं संश्रुतं मया ।
न चेद् ग्रहीष्यसे राजन् शपिष्ये त्वां न संशयः ॥ ११० ॥
**ब्राह्मणने कहा—**राजन्! आपने जो वस्तु माँगी थी और जिसे देनेकी मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी, उसे मैं आपकी धरोहरके रूपमें अपने पास रखता हूँ; अतः शीघ्र उसे ले लें। यदि नहीं लेंगे तो निस्संदेह मैं आपको शाप दे दूँगा ॥ ११० ॥

राजोवाच

धिग्राजधर्मं यस्यायं कार्यस्येह विनिश्चयः ।
इत्यर्थं मे ग्रहीतव्यं कथं तुल्यं भवेदिति ॥ १११ ॥
**राजाने कहा—**धिक्कार है राजधर्मको, जिसके कार्यका यहाँ यह परिणाम निकला। ब्राह्मणको और मुझको समान फलकी प्राप्ति कैसे हो, इसी उद्देश्यसे मुझे यह दान ग्रहण करना है ॥ १११ ॥
एष पाणिरपूर्वं मे निक्षेपार्थं प्रसारितः ।
यन्मे धारयसे विप्र तदिदानीं प्रदीयताम् ॥ ११२ ॥
ब्रह्मन्! यह मेरा हाथ जो आजसे पहले किसीके सामने नहीं फैलाया गया था, आज आपसे धरोहर लेनेके लिये आपके सामने फैला है। आप मेरा जो कुछ भी धरोहर धारण करते हैं, उसे इस समय मुझे दे दीजिये ॥

ब्राह्मण उवाच

संहितां जपता यावान् गुणः कश्चित् कृतो मया ।
तत् सर्वं प्रतिगृह्णीष्व यदि किञ्चिदिहास्ति मे ॥ ११३ ॥

ब्राह्मणने कहा-राजन्! मैंने संहिताका जप करते हुए कहींसे जितना भी पुण्य

अथवा सद्गुण संग्रह किया है, वह सब आप ले लें। इसके सिवा भी मेरे पास जो कुछ पुण्य

हो, उसे ग्रहण करें ।। ११३ ।।

राजोवाच

जलमेतन्निपतितं मम पाणौ द्विजोत्तम ।

सममस्तु सहैवास्तु प्रतिगृह्णातु वै भवान् ।। ११४ ।।

राजाने कहा- द्विजश्रेष्ठ! मेरे हाथपर यह संकल्पका जल पड़ा हुआ है। मेरा और

आपका सारा पुण्य हम दोनों के लिये समान हो और हम साथ-साथ उसका उपभोग करें;

इस उद्देश्यसे आप मेरा दिया हुआ दान भी ग्रहण करें ।। ११४ ।।

विरूप उवाच

कामक्रोधौ विद्धि नौ त्वमावाभ्यां कारितो भवान् ।

सहेति च यदुक्तं ते समा लोकास्तवास्य च ।। ११५ ।।

विरूपने कहा- राजन्! आपको विदित हो कि हम दोनों काम और क्रोध हैं। हमने ही

आपको इस कार्यमें लगाया है। आपने जो साथ-साथ फल भोगनेकी बात कही है, इससे

आपको और इस ब्राह्मणको एक समान लोक प्राप्त होंगे ।। ११५ ।।

नायं धारयते किञ्चिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ।

कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ।। ११६ ।।

सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निघृष्टं पश्यतस्तव ।

गच्छ लोकान् जितान् स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ।। ११७ ।।

यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझपर भी इसका कोई ऋण नहीं है।

यह सब खेल तो हमलोगोंने आपकी परीक्षा लेनेके लिये किया था। काल, धर्म, मृत्यु, काम,

क्रोध और आप दोनों-ये सब-के-सब एक-दूसरेकी कसौटीपर आपके देखते-देखते कसे

गये हैं। अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्मसे जीते हुए उन लोकोंमें

जाइये ।। ११६-११७ ।।

जापकानां फलावाप्तिर्मया ते सम्प्रदर्शिता ।

गतिः स्थानं च लोकाश्च जापकेन यथा जिताः ।। ११८ ।।

भीष्मजी कहते हैं- राजन्! जापकोंको किस प्रकार फलकी प्राप्ति होती है? इस

बातका दिग्दर्शन मैंने तुम्हें करा दिया। जापक ब्राह्मणने कौन-सी गति प्राप्त की? किस

स्थानपर अधिकार किया? कौन-कौन-से लोक उसके लिये सुलभ हुए? और यह सब किस

प्रकार सम्भव हुआ? ये बातें बतायी जायँगी ।। ११८ ।।

प्रयाति संहिताध्यायी ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।

अथवाग्निं समायाति सूर्यमाविशतेऽपि वा ।। ११९ ।।

संहिताका स्वाध्याय करनेवाला द्विज परमेष्ठी ब्रह्माको प्राप्त होता है अथवा अग्निमें समा जाता है अथवा सूर्यमें प्रवेश कर जाता है ।। ११९ ।।

स तैजसेन भावेन यदि तत्र रमत्युत ।
गुणांस्तेषां समाधत्ते रागेण प्रतिमोहितः ॥ १२० ॥
यदि वह जापक तैजस् शरीरसे उन लोकोंमें रमण करता है तो रागसे मोहित होकर उनके गुणोंको अपने भीतर धारण कर लेता है ।। १२० ।।

एवं सोमे तथा वायौ भूम्याकाशशरीरगः ।
सरागस्तत्र वसति गुणांस्तेषां समाचरन् ॥ १२१ ॥
इसी प्रकार संहिताका जप करनेवाला पुरुष रागयुक्त होनेपर चन्द्रलोक, वायुलोक, भूमिलोक तथा अन्तरिक्षलोकके योग्य शरीर धारण करके वहाँ निवास करता है और उन लोकोंमें रहनेवाले पुरुषोंके गुणोंका आचरण करता रहता है ।। १२१ ।।

अथ तत्र विरागी स गच्छति त्वथ संशयम् ।
परमव्ययमिच्छन् स तमेवाविशते पुनः ॥ १२२ ॥
यदि उन लोकोंकी उत्कृष्टतामें संदेह हो जाय और इस कारण वह जापक वहाँसे विरक्त हो जाय तो वह उत्कृष्ट एवं अविनाशी मोक्षकी इच्छा रखता हुआ फिर उसी परमेष्ठी ब्रह्मामें प्रवेश कर जाता है ।। १२२ ।।

अमृताच्चामृतं प्राप्तः शान्तीभूतो निरात्मवान् ।
ब्रह्मभूतः स निर्द्वन्द्वः सुखी शान्तो निरामयः ॥ १२३ ॥
अन्य लोकोंकी अपेक्षा परमेष्ठिभावकी प्राप्ति अमृतरूप है। उससे भी उत्कृष्ट कैवल्यरूपी अमृतको प्राप्त होकर वह शान्त (निष्काम), अहंकारशून्य, निर्द्वन्द्व, सुखी, शान्तिपरायण तथा रोग-शोकसे रहित ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ।। १२३ ।।

ब्रह्मस्थानमनावर्तमेकमक्षरसंज्ञकम् ।
अदुःखमजरं शान्तं स्थानं तत् प्रतिपद्यते ॥ १२४ ॥
ब्रह्मपद पुनरावृत्तिरहित, एक, अविनाशी, संज्ञारहित, दुःख-शून्य, अजर और शान्त आश्रय है, उसे ही वह जापक प्राप्त होता है ।। १२४ ।।

चतुर्भिर्लक्षणैर्हीनं तथा षड्भिः सषोडशैः ।
पुरुषं तमतिक्रम्य आकाशं प्रतिपद्यते ॥ १२५ ॥
जापक पूर्वोक्त परमेष्ठी पुरुष (सगुण ब्रह्म) से भी ऊपर उठकर आकाशस्वरूप निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होता है। वहाँ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—इन चारों प्रमाणों और लक्षणोंकी पहुँच नहीं है। क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह तथा जरा और मृत्यु—ये छः तरंगें वहाँ नहीं हैं। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँचों कर्मेन्द्रियाँ, पाँचों प्राण तथा मन—इन सोलह उपकरणोंसे भी वह रहित है ।। १२५ ।।

अथ नेच्छति रागात्मा सर्वं तदधितिष्ठति ।

यच्च प्रार्थयते तच्च मनसा प्रतिपद्यते ॥ १२६ ॥
यदि उसके मनमें भोगोंके प्रति राग है और वह निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होना नहीं चाहता है तो वह सभी पुण्यलोकोंका अधिष्ठाता बन जाता है और मनसे जिस वस्तुको पाना चाहता है, उसे तुरंत प्राप्त कर लेता है ॥ १२६ ॥
अथवा चेक्षते लोकान् सर्वान् निरयसंज्ञितान् ।
निस्पृहः सर्वतो मुक्तस्तत्र वै रमते सुखम् ॥ १२७ ॥
अथवा वह सम्पूर्ण उत्तम लोकोंको भी नरकके तुल्य देखता है और सब ओरसे निःस्पृह एवं मुक्त होकर उसी निर्गुण ब्रह्ममें सुखपूर्वक रमण करता है ॥ १२७ ॥
एवमेषा महाराज जापकस्य गतिर्यथा ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १२८ ॥
महाराज! इस प्रकार यह जापककी गति बतायी गयी है। यह सारा प्रसंग मैंने कह सुनाया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ १२८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९९ ॥

जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता

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द्विशततमोऽध्यायः

जापक ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकुकी उत्तम गतिका वर्णन तथा जापकको मिलनेवाले फलकी उत्कृष्टता

युधिष्ठिर उवाच

किमुत्तरं तदा तौ स्म चक्रतुस्तस्य भाषिते ।
ब्राह्मणो वाथवा राजा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! उस समय विरूपके पूर्वोक्त वचन कहनेपर ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकु उन दोनोंने उसे क्या उत्तर दिया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
अथवा तौ गतौ तत्र यदेतत् कीर्तितं त्वया ।
संवादो वा तयोः कोऽभूत् किं वा तौ तत्र चक्रतुः ॥ २ ॥
तथा आपने जो यह सद्योमुक्ति, क्रममुक्ति और लोकान्तरकी प्राप्तिरूप तीन प्रकारकी गति बतायी है, उनमेंसे वे दोनों किस गतिको प्राप्त हुए? उस समय उन दोनोंमें क्या बातचीत हुई और उन्होंने क्या किया? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

तथेत्येवं प्रतिश्रुत्य धर्मं सम्पूज्य च प्रभो ।
यमं कालं च मृत्युं च स्वर्गं सम्पूज्य चार्हतः ॥ ३ ॥
पूर्वं ये चापरे तत्र समेता ब्राह्मणर्षभाः ।
सर्वान् सम्पूज्य शिरसा राजानं सोऽब्रवीद् द्विजः ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— प्रभो! तब 'बहुत अच्छा' कहकर ब्राह्मणने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग—इन सभी पूजनीय देवताओंका पूजन किया। वहाँ पहलेसे जो ब्राह्मण मौजूद थे और दूसरे भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबके चरणोंमें सिर झुकाकर सबकी यथोचित पूजा करके ब्राह्मणने राजासे कहा— ॥ ३-४ ॥
फलेनानेन संयुक्तो राजर्षे गच्छ मुख्यताम् ।
भवता चाभ्यनुज्ञातो जपेयं भूय एव ह ॥ ५ ॥
'राजर्षे! इस फलसे संयुक्त होकर आप श्रेष्ठ गतिको प्राप्त कीजिये और आपकी आज्ञा लेकर मैं फिर जपमें लग जाऊँगा ॥ ५ ॥
वरश्च मम पूर्वं हि दत्तो देव्या महाबल ।
श्रद्धा ते जपतो नित्यं भवत्विति विशाम्पते ॥ ६ ॥

'महाबली प्रजानाथ! मुझे देवी सावित्रीने वर दिया है कि जपमें तुम्हारी नित्य श्रद्धा बनी रहेगी'॥ ६॥

राजोवाच

यद्येवमफला सिद्धिः श्रद्धा च जपितुं तव। गच्छ विप्र मया सार्धं जापकं फलमाप्नुहि॥ ७॥ राजाने कहा— विप्रवर! यदि इस प्रकार मुझे फल समर्पण करनेके कारण आपको फलकी प्राप्ति नहीं हो रही है और पुनः जप करनेमें ही आपकी श्रद्धा होती है तो आप मेरे साथ ही चलें और जप-दानजनित फलको प्राप्त करें॥ ७॥

ब्राह्मण उवाच

कृतः प्रयत्नः सुमहान् सर्वेषां संनिधाविह। सह तुल्यफलावावां गच्छावो यत्र नौ गतिः॥ ८॥ ब्राह्मणे कहा— राजन्! मैंने यहाँ सबके समीप आपको अपने जपका फल देनेके लिये महान् प्रयत्न किया है; फिर भी आपका आग्रह साथ-साथ फलका उपभोग करनेका रहा है; अतः हम दोनों समान फलके ही भागी हों। चलिये, जहाँतक हम दोनोंकी गति हो सके, साथ-साथ चलें॥ ८॥

भीष्म उवाच

व्यवसायं तयोस्तत्र विदित्वा त्रिदशेश्वरः। सह देवैरुपययौ लोकपालैस्तथैव च॥ ९॥ साध्याश्च विश्वे मरुतो वाद्यानि सुमहान्ति च। नद्यः शैलाः समुद्राश्च तीर्थानि विविधानि च॥ १०॥ तपांसि संयोगविधिर्वेदाः स्तोभाः सरस्वती। नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहूहूः॥ ११॥ गन्धर्वश्चित्रसेनश्च परिवारगणैर्युतः। नागाः सिद्धाश्च मुनयो देवदेवः प्रजापतिः॥ १२॥ विष्णुः सहस्रशीर्षश्च देवोऽचिन्त्यः समागमत्। अवाद्यन्तान्तरिक्षे च भेर्यस्तूर्याणि वा विभो॥ १३॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उन दोनोंका वहाँ ऐसा निश्चय जानकर सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्र उस स्थानपर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवगण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकारके तीर्थ, तपस्या, संयोगविधि, वेद, स्तोभ (साम-गानकी पूर्तिके लिये बोले जानेवाले अक्षर हाई हावु इत्यादि), सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवारसहित

चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तकवाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधारे। प्रभो! उस समय आकाशमें भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे ।। ९–१३ ।।
पुष्पवर्षाणि दिव्यानि तत्र तेषां महात्मनाम् ।
ननृतुश्चाप्सरःसंघास्तत्र तत्र समन्ततः ।। १४ ।।
वहाँ उन महात्माओंपर दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगी। झुंडकी झुंड अप्सराएँ सब ओर नृत्य करने लगीं ।। १४ ।।
अथ स्वर्गस्तथा रूपी ब्राह्मणं वाक्यमब्रवीत् ।
संसिद्धस्त्वं महाभाग त्वं च सिद्धस्तथा नृप ।। १५ ।।
तदनन्तर मूर्तिमान् स्वर्गने ब्राह्मणसे कहा—‘महाभाग! तुम सिद्ध हो गये।’ फिर राजासे कहा—‘नरेश्वर! तुम भी सिद्ध हो गये’ ।। १५ ।।
अथ तौ सहितौ राजन्नन्योन्यविधिना ततः ।
विषयप्रतिसंहारमुभावेव प्रचक्रतुः ।। १६ ।।
राजन्! तदनन्तर वे दोनों एक-दूसरेका उपकार करते हुए एक साथ हो गये। उन्होंने एक ही साथ अपने मनको विषयोंकी ओरसे हटा लिया ।। १६ ।।
प्राणापानौ तथोदानं समानं व्यानमेव च ।
एवं तौ मनसि स्थाप्य दधतुः प्राणयोर्मनः ।। १७ ।।
उपस्थितकृतौ तौ च नासिकाग्रमधो भ्रुवोः ।
भ्रुकुट्या चैव मनसा शनैर्धारयतस्तदा ।। १८ ।।
तदनन्तर प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—इन पाँचों प्राण-वायुओंको हृदयमें स्थापित किया; इस प्रकार स्थित हुए उन दोनोंने मनको प्राण और अपानके साथ मिला दिया। भौहोंके नीचे नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए मनसहित प्राण-अपानको उन्होंने दोनों भौहोंके बीच स्थिर किया ।। १७-१८ ।।
निश्चेष्टाभ्यां शरीराभ्यां स्थिरदृष्टी समाहितौ ।
जितात्मानौ तथाऽऽधाय मूर्धन्यात्मानमेव च ।। १९ ।।
इस प्रकार मनको जीतकर दृष्टिको एकाग्र करके उन दोनोंने प्राणसहित मनको सुषुम्णा मार्गद्वारा मूर्धामें स्थापित कर दिया। फिर वे दोनों समाधिमें स्थित हो गये। उस समय उन दोनोंके शरीर जड़की भाँति चेष्टाहीन हो गये ।। १९ ।।
तालुदेशमथोद्वाल्य ब्राह्मणस्य महात्मनः ।
ज्योतिर्ज्याला सुमहती जगाम त्रिदिवं तदा ।। २० ।।
इसी समय महात्मा ब्राह्मणके तालुदेश (ब्रह्म-रन्ध्र) का भेदन करके एक ज्योतिर्मयी विशाल ज्वाला निकली और स्वर्गकी ओर चल दी ।। २० ।।
हाहाकारस्तथा दिक्षु सर्वेषां सुमहानभूत् ।

तज्ज्योतिः स्तूयमानं स्म ब्रह्माणं प्राविशत् तदा ।। २१ ।।
ततः स्वागतमित्याह तत् तेजः प्रपितामहः ।
प्रादेशमात्रं पुरुषं प्रत्युद्गम्य विशाम्पते ।। २२ ।।
फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंमें महान् कोलाहल मच गया। उस ज्योतिकी सभी लोग स्तुति करने लगे। प्रजानाथ! प्रादेशके बराबर लंबे पुरुषका आकार धारण किये वह तेजःपुंज ब्रह्माजीके पास पहुँचा, तब ब्रह्माजीने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया ।। २१-२२ ।।
भूयश्चैवापरं प्राह वचनं मधुरं तदा ।
जापकैस्तुल्यफलता योगानां नात्र संशयः ।। २३ ।।
ब्रह्माजीने उस तेजोमय पुरुषका स्वागत करनेके पश्चात् पुनः उससे मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा—'विप्रवर! योगियोंको जो फल मिलता है, निस्संदेह वही फल जप करनेवालोंको भी प्राप्त होता है ।। २३ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1289)

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जापक ब्राह्मण एवं महाराज इक्ष्वाकुकी ऊर्ध्वगति

योगस्य तावदेतेभ्यः प्रत्यक्षं फलदर्शनम् ।
जापकानां विशिष्टं तु प्रत्युत्थानं समाहितम् ॥ २४ ॥
'योगियोंको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह इन सभासदोंने प्रत्यक्ष देखा है; किंतु जापकोंको उनसे भी श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, यह सूचित करनेके लिये ही मैंने उठकर तुम्हारा स्वागत किया है ॥ २४ ॥
उष्यतां मयि चेत्युक्त्वा चेतयत् सततं पुनः ।
अथास्यं प्रविवेशास्य ब्राह्मणो विगतज्वरः ॥ २५ ॥
'अब तुम मेरे भीतर सुखपूर्वक निवास करो।' इतना कहकर ब्रह्माजीने उसे पुनः तत्त्वज्ञान प्रदान किया। आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण-तेज रोग-शोकसे मुक्त हो ब्रह्माजीके मुखारविन्दमें प्रविष्ट हो गया ॥ २५ ॥
राजाप्येतेन विधिना भगवन्तं पितामहम् ।
यथैव द्विजशार्दूलस्तथैव प्राविशत् तदा ॥ २६ ॥
राजा इक्ष्वाकु भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी ही भाँति विधिपूर्वक भगवान् ब्रह्माजीके मुखारविन्दमें प्रविष्ट हो गये ॥ २६ ॥
स्वयम्भुवमथो देवा अभिवाद्य ततोऽब्रुवन् ।
जापकानां विशिष्टं तु प्रत्युत्थानं समाहितम् ॥ २७ ॥
तदनन्तर देवताओंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा—'भगवन्! आपने जो आगे बढ़कर इस ब्राह्मणका स्वागत किया है, इससे सिद्ध हो गया कि जापकोंको योगियोंसे भी श्रेष्ठ फलकी प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥
जापकार्थमयं यत्नो यदर्थं वयमागताः ।
कृतपूजाविमौ तुल्यौ त्वया तुल्यफलाविमौ ॥ २८ ॥
'इस जापक ब्राह्मणको सद्गति देनेके लिये ही आपने ऐसा उद्योग किया था। इसीको देखनेके लिये हमलोग भी आये थे। आपने इन दोनोंका समानरूपसे आदर किया और ये दोनों ही एक-सी स्थितिमें पहुँचकर आपके समान फलके भागी हुए हैं ॥ २८ ॥
योगजापकयोर्दृष्टं फलं सुमहदद्य वै ।
सर्वाँल्लोकानतिक्रम्य गच्छेतां यत्र वाञ्छितम् ॥ २९ ॥
'आज हमलोगोंने योगी और जापकके महान् फलको प्रत्यक्ष देख लिया। वे सम्पूर्ण लोकोंको लाँघकर जहाँ उनकी इच्छा हो, जा सकते हैं' ॥ २९ ॥

ब्रह्मोवाच
महास्मृतिं पठेद् यस्तु तथैवानुस्मृतिं शुभाम् ।
तावप्येतेन विधिना गच्छेतां मत्सलोकताम् ॥ ३० ॥
यश्च योगे भवेद् भक्तः सोऽपि नास्त्यत्र संशयः ।

विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्नुयात् ।
साधये गम्यतां चैव यथास्थानानि सिद्धये ॥ ३१ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृतिका पाठ करता है, वह भी इसी विधिसे मेरा सालोक्य प्राप्त कर लेता है। जो योगका भक्त है, वह भी देहत्यागके पश्चात् इसी विधिसे मेरे लोकोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। अब तुम सब लोग अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको जाओ। मैं तुम लोगोंका अभीष्ट साधन करता रहूँगा ॥ ३०-३१ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्त्वा स तदा देवस्तत्रैवान्तरधीयत ।
आमन्त्र्य च ततो देवा ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ ३२ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। देवता भी उनकी आज्ञा पाकर अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ३२ ॥
ते च सर्वे महात्मानो धर्मं सत्कृत्य तत्र वै ।
पृष्ठतोऽनुययू राजन् सर्वे सुप्रीतचेतसः ॥ ३३ ॥
राजन्! फिर वे सभी महात्मा धर्मको सत्कार-पूर्वक आगे करके प्रसन्नचित्त हो पीछे-पीछे चल दिये ॥ ३३ ॥
एतत् फलं जापकानां गतिश्चैषा प्रकीर्तिता ।
यथाश्रुतं महाराज किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ३४ ॥
महाराज! मैंने जैसा सुना था, उसके अनुसार जापकोंको मिलनेवाले इस उत्तम फल और गतिका वर्णन किया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०० ॥

२०१-

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एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः

बृहस्पतिके प्रश्नके उत्तरमें मनुद्वारा कामनाओंके त्यागकी एवं ज्ञानकी प्रशंसा तथा परमात्मतत्त्वका निरूपण

युधिष्ठिर उवाच

किं फलं ज्ञानयोगस्य वेदानां नियमस्य च ।
भूतात्मा च कथं ज्ञेयस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! ज्ञानयोगका, वेदोंका तथा वेदोक्त नियम (अग्निहोत्र आदि) का क्या फल है? समस्त प्राणियोंके भीतर रहनेवाले परमात्माका ज्ञान कैसे हो सकता है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मनोः प्रजापतेर्वादं महर्षेश्च बृहस्पतेः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें प्रजापति मनु तथा महर्षि बृहस्पतिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

प्रजापतिं श्रेष्ठतमं प्रजानां
देवर्षिसंघप्रवरो महर्षिः ।
बृहस्पतिः प्रश्नमिमं पुराणं
पप्रच्छ शिष्योऽथ गुरुं प्रणम्य ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, देवता और ऋषियोंकी मण्डलीमें प्रधान महर्षि बृहस्पतीने प्रजाओंके श्रेष्ठतम प्रजापति गुरु मनुको शिष्यभावसे प्रणाम करके यह प्राचीन प्रश्न पूछा— ॥ ३ ॥

यत्कारणं यत्र विधिः प्रवृत्तो
ज्ञाने फलं यत्प्रवदन्ति विप्राः ।
यन्मन्त्रशब्दैरकृतप्रकाशं
तदुच्यतां मे भगवन् यथावत् ॥ ४ ॥
भगवन्! जो इस जगत्‌का कारण है, जिसके लिये वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान किया जाता है, ब्राह्मण लोग जिसे ही ज्ञान होनेपर प्राप्त होनेवाला फल (परब्रह्म परमात्मा) बताते हैं तथा वेदके मन्त्र-वाक्योंद्वारा जिसका तत्त्व पूर्णरूपसे प्रकाशमें नहीं आता, उस नित्य वस्तुका मेरे लिये यथावद्रूपसे वर्णन कीजिये ॥ ४ ॥

यच्चार्थशास्त्रागममन्त्रविद्भि-

यज्ञैरनेकैरथ गोप्रदानैः । फलं महद्भिर्यदुपास्यते च किं तत्कथं वा भविता क्व वा तत् ॥ ५ ॥ अर्थशास्त्र, आगम (वेद) और मन्त्रको जाननेवाले विद्वान् पुरुष अनेकानेक महान् यज्ञों और गोदानोंद्वारा जिस सुखमय फलकी उपासना करते हैं, वह क्या है, किस प्रकार प्राप्त होता है और कहाँ उसकी स्थिति है? ॥ ५ ॥ मही महीजाः पवनोऽन्तरिक्षं जलौकसश्चैव जलं दिवं च । दिवौकसश्चापि यतः प्रसूता- स्तदुच्यतां मे भगवन् पुराणम् ॥ ६ ॥ भगवन्! पृथ्वी, पार्थिव पदार्थ, वायु, आकाश, जलजन्तु, जल, द्युलोक और देवता जिससे उत्पन्न होते हैं, वह पुरातन वस्तु क्या है? यह मुझे बताइये ॥ ६ ॥ ज्ञानं यतः प्रार्थयते नरो वै ततस्तदर्था भवति प्रवृत्तिः । न चाप्यहं वेद परं पुराणं मिथ्याप्रवृत्तिं च कथं नु कुर्याम् ॥ ७ ॥ मनुष्यको जिस वस्तुका ज्ञान होता है, उसीको वह पाना चाहता है और पानेकी इच्छा उत्पन्न होनेपर उसके लिये वह प्रयत्न आरम्भ करता है; परंतु मैं तो उस पुरातन परमोत्कृष्ट वस्तुके विषयमें कुछ जानता ही नहीं हूँ; फिर उसे पानेके लिये झूठा प्रयत्न कैसे करूँ? ॥ ७ ॥ ऋक्सामसंघांश्च यजूंषि चापि च्छन्दांसि नक्षत्रगतिं निरुक्तम् । अधीत्य च व्याकरणं सकल्पं शिक्षां च भूतप्रकृतिं न वेद्मि ॥ ८ ॥ मैंने ऋक्, साम और यजुर्वेदका तथा छन्दका अर्थात् अथर्ववेदका एवं नक्षत्रोंकी गति, निरुक्त, व्याकरण, कल्प और शिक्षाका भी अध्ययन किया है तो भी मैं आकाश आदि पाँचों महाभूतोंके उपादान कारणको न जान सका ॥ ८ ॥ स मे भवान् शंसतु सर्वमेतत् सामान्यशब्दैश्च विशेषणैश्च । स मे भवान् शंसतु तावदेत- ज्ज्ञाने फलं कर्मणि वा यदस्ति ॥ ९ ॥ यथा च देहाच्च्यवते शरीरी पुनः शरीरं च यथाभ्युपैति ।

अतः आप सामान्य और विशेष शब्दोंद्वारा इस सम्पूर्ण विषयका मेरे निकट वर्णन कीजिये। तत्त्वज्ञान होनेपर कौन-सा फल प्राप्त होता है? कर्म करनेपर किस फलकी उपलब्धि होती है? देहाभिमानी जीव देहसे किस प्रकार निकलता है और फिर दूसरे शरीरमें कैसे प्रवेश करता है?—ये सारी बातें भी आप मुझे बताइये ॥ ९⅓ ॥

प्रजापति मनु एवं महर्षि बृहस्पतिका संवाद

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प्रजापति मनु एवं महर्षि बृहस्पतिका संवाद

मनुरुवाच

यद् यत्प्रियं यस्य सुखं तदाहु- स्तदेव दुःखं प्रवदन्त्यनिष्टम् ॥ १० ॥ इष्टं च मे स्यादितरच्च न स्या- देतत्कृते कर्मविधिः प्रवृत्तः । इष्टं त्वनिष्टं च न मां भजेते- त्येतत्कृते ज्ञानविधिः प्रवृत्तः ॥ ११ ॥ मनुने कहा— जिसको जो-जो विषय प्रिय होता है, वही उसके लिये सुखरूप बताया गया है और जो अप्रिय होता है, उसे ही दुःखरूप कहा गया है। मुझे इष्ट (प्रिय) की प्राप्ति हो और अनिष्टका निवारण हो जाय, इसीके लिये कर्मोंका अनुष्ठान आरम्भ किया गया है तथा इष्ट और अनिष्ट दोनों ही मुझे प्राप्त न हों, इसके लिये ज्ञानयोगका उपदेश किया गया है ॥ १०-११ ॥

कामात्मकाश्छन्दसि कर्मयोगा एभिर्विमुक्तः परमश्रुवीत । नानाविधे कर्मपथे सुखार्थी नरः प्रवृत्तो न परं प्रयाति ॥ १२ ॥ वेदमें जो कर्मोंके प्रयोग बताये गये हैं, वे प्रायः सकामभावसे युक्त हैं। जो इन कामनाओंसे मुक्त होता है, वही परमात्माको पा सकता है। नाना प्रकारके कर्ममार्गमें सुखकी इच्छा रखकर प्रवृत्त होनेवाला मनुष्य परमात्माको प्राप्त नहीं होता ॥ १२ ॥

बृहस्पतिरुवाच

इष्टं त्वनिष्टं च सुखासुखे च साशीस्त्ववच्छन्दति कर्मभिश्च । बृहस्पतिने कहा— भगवन्! सुख सबको अभीष्ट होता है और दुःख किसीको भी प्रिय नहीं होता। इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टके निवारणके लिये जो कामना होती है, वही मनुष्योंसे कर्म करवाती है और उन कर्मोंद्वारा उनका मनोरथ पूर्ण करती है; अतः कामनाको आप त्याज्य कैसे बताते हैं? ॥ १२½ ॥

मनुरुवाच

एभिर्विमुक्तः परमाविवेश एतत् कृते कर्मविधिः प्रवृत्तः । कामात्मकांश्छन्दति कर्मयोग एभिर्विमुक्तः परमाददीत ॥ १३ ॥

मनुने कहा— मनुष्य इन कामनाओंसे मुक्त हो निष्काम-भावसे कर्मोंका अनुष्ठान करके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करे, इसी उद्देश्यसे कर्मोंका विधान किया है, वेदमें स्वर्ग आदिकी कामनासे जो योगादि कर्मोंका विधान किया गया है, वह उन्हीं मनुष्योंको अपने जालमें फँसाता है, जिनका मन भोगोंमें आसक्त है। वास्तवमें इन कामनाओंसे दूर रहकर परमात्माको ही प्राप्त करनेका प्रयत्न करे (भगवत्प्राप्तिके लिये ही कर्म करे, क्षुद्र भोगोंके लिये नहीं) ।। १३ ।।
आत्मादिभिः कर्मभिरिध्यमानो
धर्मे प्रवृत्तो द्युतिमान् सुखार्थी ।
परं हि तत् कर्मपथादपेतं
निराशिषं ब्रह्मपरं ह्युवैति ॥ १४ ॥
जब मन नित्य कर्मोंके अनुष्ठानसे राग आदि दोषोंको दूर करके दर्पणकी भाँति स्वच्छ एवं दीप्तिमान् हो जाता है, तब वह द्युतिमान् (सदसद्-विवेकके प्रकाशसे युक्त) और नित्य सुखका अभिलाषी (मुमुक्षु) होकर निर्वाणभावसे धर्ममें प्रवृत्त होता है एवं कर्ममार्गसे अतीत तथा कामनाओंसे रहित परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ १४ ॥
प्रजाः सृष्टा मनसा कर्मणा च
द्वावेवैतौ सत्पथौ लोकजुष्टौ ।
दृष्टं कर्म शाश्वतं चान्तवच्च
मनस्त्यागः कारणं नान्यदस्ति ॥ १५ ॥
ब्रह्माजीने मन और कर्म—इन दोनोंके सहित प्रजाकी सृष्टि की है; अतः ये दोनों लोकसेवित सन्मार्गरूप हैं। कर्म दो प्रकारका देखा गया है—एक सनातन और दूसरा विनाशशील, (मोक्षका हेतुभूत कर्म सनातन है और नश्वर भोगोंकी प्राप्ति करानेवाला नाशवान् है) मनके द्वारा किये जानेवाले फलकी इच्छाका त्याग ही कर्मोंको सनातन बनाने और उनके द्वारा परब्रह्मकी प्राप्ति करानेमें कारण है, दूसरा कुछ नहीं ॥ १५ ॥
स्वेनात्मना चक्षुरिव प्रणेता
निशात्यये तमसा संवृतात्मा ।
ज्ञानं तु विज्ञानगुणेन युक्तं
कर्माशुभं पश्यति वर्जनीयम् ॥ १६ ॥
जब रात बीत जाती है और अन्धकारका आवरण हट जाता है, उस समय जैसे चलनेमें प्रवृत्त करनेवाला नेत्र अपने तैजस् स्वरूपसे युक्त हो रास्तेमें पड़े हुए त्यागने योग्य काँटे आदिको देखते हैं, उसी प्रकार बुद्धि भी मोहका पर्दा हट जानेपर ज्ञानके प्रकाशसे युक्त हो त्यागने योग्य अशुभ कर्मको देखती है ॥ १६ ॥
सर्पान् कुशाग्राणि तथोदपानं
ज्ञात्वा मनुष्याः परिवर्जयन्ति ।

अज्ञानतस्तत्र पतन्ति केचि-
ज्ज्ञाने फलं पश्य यथा विशिष्टम् ॥ १७ ॥
मनुष्य जब जान लेते हैं कि रास्तेमें सर्प है, कुशोंके काँटे हैं और कुएँ हैं, तब उनसे बचकर निकलते हैं। जो नहीं जानते हैं, ऐसे कितने ही पुरुष उन्हींपर गिर पड़ते हैं। अतः ज्ञानका जो विशिष्ट फल है, उसे तुम प्रत्यक्ष देख लो ॥ १७ ॥

कृत्स्नस्तु मन्त्रो विधिवत् प्रयुक्तो
यथा यथोक्तास्त्विह दक्षिणाश्च ।
अन्नप्रदानं मनसः समाधिः
पञ्चात्मकं कर्मफलं वदन्ति ॥ १८ ॥
विधिपूर्वक सम्पूर्ण मन्त्रोंका उच्चारण, वेदोक्त विधानके अनुसार यज्ञोंका अनुष्ठान, यथायोग्य दक्षिणा, अन्नका दान और मनकी एकाग्रता—इन पाँच अंगोंसे सम्पन्न होनेपर ही यज्ञ-कर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं ॥ १८ ॥

गुणात्मकं कर्म वदन्ति वेदा-
स्तस्मान्मन्त्रो मन्त्रपूर्वं हि कर्म ।
विधिर्विधेयं मनसोपपत्तिः
फलस्य भोक्ता तु तथा शरीरी ॥ १९ ॥
वेदोंका कहना है कि कर्म त्रिगुणात्मक होते हैं अर्थात् सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारके होते हैं; इसीलिये मन्त्र भी सात्त्विक आदि भेदसे तीन प्रकारके ही होते हैं; क्योंकि मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही कर्मका अनुष्ठान किया जाता है। इसी तरह उन कर्मोंकी विधि, विधेय (उनके लिये किया जानेवाला कार्य), मनके द्वारा अभीष्ट फलकी सिद्धि और उसका भोक्ता देहाभिमानी जीव—ये सभी तीन-तीन प्रकारके होते हैं ॥ १९ ॥

शब्दाश्च रूपाणि रसाश्च पुण्याः
स्पर्शाश्च गन्धाश्च शुभास्तथैव ।
नरो न संस्थानगतः प्रभुः स्या-
देतत् फलं सिद्ध्यति कर्मलोके ॥ २० ॥
शब्द, रूप, पवित्र रस, सुखद स्पर्श और सुन्दर गन्ध—ये ही कर्मोंके फल हैं; किंतु इस शरीरमें स्थित हुआ मनुष्य इन फलोंको प्राप्त करनेमें समर्थ नहीं है। कर्मोंके फलकी प्राप्ति जो उनका फल भोगनेके लिये प्राप्त शरीरमें होती है, वह दैवाधीन है ॥ २० ॥

यद् यच्छरीरेण करोति कर्म
शरीरयुक्तः समुपाश्नुते तत् ।
शरीरमेवायतनं सुखस्य
दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् ॥ २१ ॥

जीव शरीरसे जो-जो अशुभ या शुभ कर्म करता है, शरीरसे युक्त हुआ ही उसके फलोंको भोगता है; क्योंकि शरीर ही सुख और दुःख भोगनेका स्थान है ।। २१ ।। वाचा तु यत् कर्म करोति किंचिद् वाचैव सर्वं समुपाश्नुते तत् । मनस्तु यत् कर्म करोति किञ्चि- न्मनःस्थ एवायमुपाश्नुते तत् ।। २२ ।। मनुष्य वाणीद्वारा जो कोई कर्म करता है, उसका सारा फल वह वाणीद्वारा ही भोगता है और मनसे जो कुछ कर्म करता है, उसका फल यह जीवात्मा मनके साथ हुआ मनसे ही भोगता है ।। २२ ।। यथा यथा कर्मगुणं फलार्थी करोत्ययं कर्मफले निविष्टः । तथा तथायं गुणसम्प्रयुक्तः शुभाशुभं कर्मफलं भुनक्ति ।। २३ ।। फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य कर्मके फलमें आसक्त हो जैसे-जैसे गुणवाला— सात्त्विक, राजस या तामस कर्म करता है, वैसे-ही-वैसे गुणोंसे प्रेरित होकर इसे उस कर्मका शुभाशुभ फल भोगना पड़ता है ।। २३ ।। मत्स्यो यथा स्रोत इवाभिपाती तथा कृतं पूर्वमुपैति कर्म । शुभे त्वसौ तुष्यति दुष्कृते तु न तुष्यते वै परमः शरीरी ।। २४ ।। जैसे मछली जलके बहावके साथ बह जाती है, उसी प्रकार मनुष्य पहिलेके किये हुए कर्मका अनुसरण करता है। उसे उस कर्मप्रवाहमें बहना पड़ता है; परंतु उस दशामें वह श्रेष्ठ देहधारी जीव शुभ फल मिलनेपर तो संतुष्ट होता है और अशुभ फल प्राप्त होनेपर दुखी हो जाता है (यह उसकी मूढ़ता ही तो है) ।। २४ ।। यतो जगत् सर्वमिदं प्रसूतं ज्ञात्वाऽऽत्मवन्तो व्यतियान्ति यत् तत् । यन्मन्त्रशब्दैरकृतप्रकाशं तदुच्यमानं शृणु मे परं यत् ।। २५ ।। जिससे इस सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति हुई है, जिसे जानकर मनको वशमें रखनेवाले ज्ञानी पुरुष इस संसारको लाँघकर परमपद प्राप्त कर लेते हैं तथा वेदके मन्त्रवाक्योंद्वारा जिसका तात्त्विक स्वरूप पूर्णतः प्रकाशमें नहीं आता, उस सर्वोत्कृष्ट वस्तुका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ।। २५ ।। रसैर्विमुक्तं विविधैश्च गन्धै-