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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

महत्तत्त्व आदि गुणोंकी उत्पत्ति प्रकृति और पुरुषके परस्पर संयोगसे होती है; अतः एक-दूसरेका अधिष्ठान होनेके कारण पुरुषको भी क्षेत्र कहते हैं ।। १४ ।। यदा तु गुणजालं तदव्यक्तात्मनि संक्षिपेत् । तदा सह गुणैस्तैस्तु पञ्चविंशो विलीयते ।। १५ ।। योगी जब अपने योगके प्रभावसे प्रकृतिके गुण-समूहको अव्यक्त मूल प्रकृतिमें विलीन कर देता है, तब उन गुणोंका विलय होनेके साथ-साथ पचीसवाँ तत्त्व पुरुष भी परमात्मामें मिल जाता है। इस दृष्टिसे उसे भी क्षर कह सकते हैं ।। १५ ।। गुणा गुणेषु लीयन्ते तदैका प्रकृतिर्भवेत् । क्षेत्रज्ञोऽपि यदा तात तत्क्षेत्रे सम्प्रलीयते ।। १६ ।। तात! जब कार्यभूत गुण कारणभूत गुणोंमें लीन हो जाते हैं, उस समय सब कुछ एकमात्र प्रकृतिस्वरूप हो जाता है तथा जब क्षेत्रज्ञ भी परमात्मामें लीन हो जाता है, तब उसका भी पृथक् अस्तित्व नहीं रहता ।। १६ ।। तदा क्षरत्वं प्रकृतिर्गच्छते गुणसंश्रिता । निर्गुणत्वं च वैदेह गुणेष्वप्रतिवर्तनात् ।। १७ ।। विदेहराज! उस समय त्रिगुणमयी प्रकृति क्षरत्व (नाश) को प्राप्त होती है और पुरुष भी गुणोंमें प्रवृत्त न होनेके कारण निर्गुण (गुणातीत) हो जाता है ।। १७ ।। एवमेव च क्षेत्रज्ञः क्षेत्रज्ञानपरिक्षये । प्रकृत्या निर्गुणस्त्वेष इत्येवमनुशुश्रुम ।। १८ ।। इस प्रकार जब क्षेत्रका ज्ञान नहीं रहता अर्थात् पुरुषको प्रकृतिका ज्ञान नहीं रहता, तब वह स्वभावसे ही निर्गुण है—यह हमने सुन रखा है ।। १८ ।। क्षरो भवत्येष यदा तदा गुणवतीमथ । प्रकृतिं त्वभिजानाति निर्गुणत्वं तथाऽऽत्मनः ।। १९ ।। जब यह पुरुष क्षर होता है, अर्थात् परमात्मामें लीन हो जाता है, उस समय वह प्रकृतिके सगुणत्वको और अपने निर्गुणत्वको यथार्थ समझ लेता है ।। १९ ।। तदा विशुद्धो भवति प्रकृतेः परिवर्जनात् । अन्योऽहमन्येयमिति यदा बुध्यति बुद्धिमान् ।। २० ।। इस तरह ज्ञानवान् पुरुष जब यह जान लेता है कि मैं अन्य हूँ और यह प्रकृति मुझसे भिन्न है, तब वह प्रकृतिसे रहित हो जानेसे अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित होता है ।। २० ।। तदैष तत्त्वतामेति न चापि मिश्रतां व्रजेत् । प्रकृत्या चैव राजेन्द्र मिश्रौ ह्यन्यश्च दृश्यते ।। २१ ।। राजेन्द्र! प्रकृतिसे संयोगके समय उससे अभिन्न-सा प्रतीत होनेके कारण यह पुरुष तद्रूपताको प्राप्त हुआ-सा जान पड़ता है, परंतु उस अवस्थामें भी उसका प्रकृतिके साथ

मिश्रण नहीं होता, उसकी पृथक्ता बनी रहती है। इस प्रकार पुरुष प्रकृतिके साथ संयुक्त और पृथक् भी दिखायी देता है ॥ २१ ॥

यदा तु गुणजालं तत् प्राकृतं वै जुगुप्सते ।
पश्यते च परं पश्यं तदा पश्यन्न संत्यजेत् ॥ २२ ॥
जब वह प्राकृत गुणसमुदायको कुत्सित समझकर उससे विरत हो जाता है, उस समय वह परम दर्शनीय परमात्माका दर्शन पा जाता है और उसको देखकर फिर भी उसका त्याग नहीं करता अर्थात् उससे अलग नहीं होता ॥ २२ ॥

किं मया कृतमेतावद् योऽहं कालमिमं जनम् ।
मत्स्यो जालं ह्यविज्ञानादनुवर्तितवानिह ॥ २३ ॥
(जिस समय जीवात्माको विवेक होता है, उस समय वह यों विचार करने लगता है—)
'ओह! मैंने यह क्या किया? जैसे मछली अज्ञानवश स्वयं ही जाकर जालमें फँस जाती है, उसी प्रकार मैं भी आजतक यहाँ इस प्राकृत शरीरका ही अनुसरण करता रहा ॥ २३ ॥

अहमेव हि सम्मोहादन्यमन्यं जनाज्जनम् ।
मत्स्यो यथोदकज्ञानादनुवर्तितवानहम् ॥ २४ ॥
'जैसे मत्स्य पानीको ही अपने जीवनका मूल समझकर एक जलाशयसे दूसरे जलाशयको जाता है, उसी तरह मैं भी मोहवश एक शरीरसे दूसरे शरीरमें भटकता रहा ॥ २४ ॥

मत्स्योऽन्यत्वं यथाज्ञानादुदकान्नाभिमन्यते ।
आत्मानं तद्वदज्ञानादन्यत्वं नैव वेद्म्यहम् ॥ २५ ॥
'जैसे मत्स्य अज्ञानवश अपनेको जलसे भिन्न नहीं समझता, उसी प्रकार मैं भी अपनी अज्ञताके कारण इस प्राकृत शरीरसे अपनेको भिन्न नहीं समझता था ॥

ममास्तु धिग्बुद्धस्य योऽहं मग्नमिमं पुनः ।
अनुवर्तितवान् मोहादन्यमन्यं जनाज्जनम् ॥ २६ ॥
'मुझ मूढ़को धिक्कार है; जो कि संसारसागरमें डूबे हुए इस शरीरका आश्रय ले मोहवश एक शरीरसे दूसरे शरीरका अनुसरण करता रहा ॥ २६ ॥

अयमत्र भवेद् बन्धुरनेन सह मे क्षमम् ।
साम्यमेकत्वमायातो यादृशस्तादृशस्त्वहम् ॥ २७ ॥
'वास्तवमें इस जगत्के भीतर यह परमात्मा ही मेरा बन्धु है। इसीके साथ मेरी मैत्री हो सकती है। पहले मैं कैसा भी क्यों न रहा होऊँ, इस समय तो मैं इसकी समानता और एकताको प्राप्त हो चुका हूँ, जैसा वह है वैसा ही मैं हूँ ॥ २७ ॥

तुल्यतामिह पश्यामि सदृशोऽहमनेन वै ।
अयं हि विमलो व्यक्तमहमीदृशकस्तथा ॥ २८ ॥

'इसीमें मुझे अपनी समानता दिखायी देती है। मैं अवश्य इसके ही सदृश हूँ। यह परमात्मा प्रत्यक्ष ही अत्यन्त निर्मल है और मैं भी ऐसा ही हूँ॥ २८ ॥ योऽहमज्ञानसम्मोहाज्जज्ञया सम्प्रवृत्तवान्।
ससङ्गयाहं निःसङ्गः स्थितः कालमिमं त्वहम् ॥ २९ ॥
'मैं जो कि आसक्तिसे सर्वथा रहित हूँ तो भी अज्ञान एवं मोहके वशीभूत होकर इतने समयतक इस आसक्तिमयी जड प्रकृतिके साथ रमता रहा ॥ २९ ॥
अनयाहं वशीभूतः कालमेतं न बुद्धवान्।
उच्चमध्यमनीचानां तामहं कथमावसे ॥ ३० ॥
'इसने मुझे इस तरह वशमें कर लिया था कि मुझे आजतकके समयका पता ही न चला। यह तो उच्च, मध्यम तथा नीच सब श्रेणीके लोगोंके साथ रहती है। भला, इसके साथ मैं कैसे रह सकता हूँ? ॥ ३० ॥
समानयानया चेह सह वासमहं कथम्।
गच्छाम्यबुद्धभावत्वादेषेदानीं स्थिरो भवे ॥ ३१ ॥
'जो मेरे साथ संयुक्त होकर मेरी समानता करने लगी है, ऐसी इस प्रकृतिके साथ मैं मूर्खतावश सहवास कैसे कर सकता हूँ? यह लो, अब मैं स्थिर हो रहा हूँ॥
सहवासं न यास्यामि कालमेतद्धि वञ्चनात्।
वञ्चितोऽस्म्यनया यद्धि निर्विकारो विकारया ॥ ३२ ॥
'मैं निर्विकार होकर भी इस विकारमयी प्रकृतिके द्वारा ठगा गया। इतने समयतक इसने मेरे साथ ठगी की है। इसलिये अब इसके साथ नहीं रहूँगा ॥ ३२ ॥
न चायमपराधोऽस्या ह्यपराधो ह्ययं मम।
योऽहमत्राभवं सक्तः पराङ्मुखमुपस्थितः ॥ ३३ ॥
'किंतु यह इसका अपराध नहीं है, सारा अपराध मेरा ही है; जो कि मैं परमात्मासे विमुख होकर इसमें आसक्त हुआ स्थित रहा ॥ ३३ ॥
ततोऽस्मि बहुरूपासु स्थितो मूर्तिष्वमूर्तिमान्।
अमूर्त्तश्चापि मूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षितः ॥ ३४ ॥
'यद्यपि मैं सर्वथा अमूर्त हूँ अर्थात् किसी आकार-वाला नहीं हूँ तो भी मैं प्रकृतिकी अनेक रूपवाली मूर्तियोंमें स्थित हुआ देहरहित होकर भी ममतासे परास्त होनेके कारण देहधारी बना रहा ॥ ३४ ॥
प्राक् कृतेन ममत्वेन तासु तास्विह योनिषु।
निर्ममस्य ममत्वेन किं कृतं तासु तासु च ॥ ३५ ॥
'पहले जो मैंने इसके प्रति ममता की थी, उसके कारण मुझे भिन्न-भिन्न योनियोंमें भटकना पड़ा। यद्यपि मैं ममतारहित हूँ तो भी इस प्रकृतिजनित ममताने भिन्न-भिन्न योनियोंमें मुझे डालकर मेरी बड़ी दुर्दशा कर डाली ॥

योनीषु वर्तमानेन नष्टसंज्ञेन चेतसा ।
न ममात्रानया कार्यमहंकारकृतात्मया ॥ ३६ ॥
'इसके साथ नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकनेके कारण मेरी चेतना खो गयी थी। अब इस अहंकारमयी प्रकृतिसे मेरा कोई काम नहीं है ॥ ३६ ॥
आत्मानं बहुधा कृत्वा येयं भूयो युनक्ति माम् ।
इदानीमेष बुद्धोऽस्मि निर्ममो निरहंकृतः ॥ ३७ ॥
'अब भी यह बहुत-से रूप धारण करके मेरे साथ संयोगकी चेष्टा कर रही है; किंतु अब मैं सावधान हो गया हूँ, इसलिये ममता और अहंकारसे रहित हो गया हूँ ॥ ३७ ॥
ममत्वमनया नित्यमहंकारकृतात्मकम् ।
अपेत्याहमिमां हित्वा संश्रयिष्ये निरामयम् ॥ ३८ ॥
'अब तो इसको और इसकी अहंकारस्वरूपिणी ममताको त्यागकर इससे सर्वथा अतीत होकर मैं निरामय परमात्माकी शरण लूँगा ॥ ३८ ॥
अनेन साम्यं यास्यामि नानयाहमचेतया ।
क्षेमं मम सहानेन नैकत्वमनया सह ॥ ३९ ॥
'उन परमात्माकी ही समानता प्राप्त करूँगा। इस जड प्रकृतिकी समानता नहीं धारण करूँगा। परमात्माके साथ संयोग करनेमें ही मेरा कल्याण है। इस प्रकृतिके साथ नहीं ॥ ३९ ॥
एवं परमसम्बोधात् पञ्चविंशोऽनुबुद्धवान् ।
अक्षरत्वं नियच्छेत त्यक्त्वा क्षरमनामयम् ॥ ४० ॥
'इस प्रकार उत्तम विवेकके द्वारा अपने शुद्ध स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवाँ आत्मा क्षरभाव (विनाशशीलता) का त्याग करके निरामय अक्षरभावको प्राप्त होता है ॥ ४० ॥
अव्यक्तं व्यक्तधर्माणं सगुणं निर्गुणं तथा ।
निर्गुणं प्रथमं दृष्ट्वा तादृग् भवति मैथिल ॥ ४१ ॥
'मिथिलानरेश! अव्यक्त प्रकृति, व्यक्त महत्तत्त्वादि, सगुण (जडवर्ग), निर्गुण (आत्मा) तथा सबके आदिभूत निर्गुण परमात्माका साक्षात्कार करके मनुष्य स्वयं भी वैसा ही हो जाता है ॥ ४१ ॥
अक्षरक्षरयोरेतदुक्तं तव निदर्शनम् ।
मयेह ज्ञानसम्पन्नं यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥ ४२ ॥
राजन्! वेदमें जैसा वर्णन किया गया है, उसके अनुरूप यह क्षर-अक्षरका विवेक करानेवाला ज्ञान मैंने तुम्हें सुनाया है ॥ ४२ ॥
निःसंदिग्धं च सूक्ष्मं च विबुद्धं विमलं यथा ।
प्रवक्ष्यामि तु ते भूयस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥ ४३ ॥

अब पुनः श्रुतिके अनुसार संदेहरहित, सूक्ष्म तथा अत्यन्त निर्मल विशिष्ट ज्ञानकी बात तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४३ ॥ सांख्ययोगौ मया प्रोक्तौ शास्त्रद्वयनिदर्शनात् । यदेव शास्त्रं सांख्योक्तं योगदर्शनमेव तत् ॥ ४४ ॥ मैंने सांख्य और योगका जो वर्णन किया है, उसमें इन दोनोंको पृथक्-पृथक् दो शास्त्र बताया है; परंतु वास्तवमें जो सांख्यशास्त्र है, वही योगशास्त्र भी है (क्योंकि दोनोंका फल एक ही है) ॥ ४४ ॥ प्रबोधनकरं ज्ञानं सांख्यानामवनीपते । विस्पष्टं प्रोच्यते तत्र शिष्याणां हितकाम्यया ॥ ४५ ॥ पृथ्वीनाथ! मैंने शिष्योंके हितकी कामनासे उनके लिये ज्ञानजनक जो सांख्यदर्शन है, उसका तुम्हारे निकट स्पष्टरूपसे वर्णन किया है ॥ ४५ ॥ बृहच्चैवमिदं शास्त्रमित्याहुर्विदुषो जनाः । अस्मिंश्च शास्त्रे योगानां पुनर्वेदे पुरःसरः ॥ ४६ ॥ विद्वान् पुरुषोंका कहना है कि यह सांख्यशास्त्र महान् है। इस शास्त्रमें, योगशास्त्रमें तथा वेदमें अधिक प्रामाणिकता समझकर मनुष्यको इनके अध्ययनके लिये आगे बढ़ना चाहिये ॥ ४६ ॥ पञ्चविंशात् परं तत्त्वं पठ्यते न नराधिप । सांख्यानां तु परं तत्त्वं यथावदनुवर्णितम् ॥ ४७ ॥ नरेश्वर! सांख्यशास्त्रके आचार्य पचीसवें तत्त्वसे परे और किसी तत्त्वका वर्णन नहीं करते हैं। यह मैंने सांख्योंके परम तत्त्वका यथावत्रूपसे वर्णन किया है ॥ ४७ ॥ बुद्धमप्रतिबुद्धत्वाद् बुध्यमानं च तत्त्वतः । बुध्यमानं च बुद्धं च प्राहुर्योगनिदर्शनम् ॥ ४८ ॥ जो नित्य ज्ञानसम्पन्न परब्रह्म परमात्मा है, वही बुद्ध है तथा जो परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण जिज्ञासु जीवात्मा है, उसकी ‘बुध्यमान’ संज्ञा होती है। इस प्रकार योगके सिद्धान्तके अनुसार बुद्ध (नित्य ज्ञानसम्पन्न परमात्मा) और बुध्यमान (जिज्ञासु जीव)—ये दो चेतन माने गये हैं ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठकरालजनकसंवादविषयक तीन सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०७ ॥

क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजन

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अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

क्षर-अक्षर और परमात्म-तत्त्वका वर्णन, जीवके नानात्व और एकत्वका दृष्टान्त, उपदेशके अधिकारी और अनधिकारी तथा इस ज्ञानकी परम्पराको बताते हुए वसिष्ठ-करालजनक-संवादका उपसंहार

वसिष्ठ उवाच

अथ बुद्धमथाबुद्धमिमं गुणविधिं शृणु । आत्मानं बहुधा कृत्वा तान्येव प्रविचक्षते ॥ १ ॥ वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! अब बुद्ध (परमात्मा), अबुद्ध (जीवात्मा) और इस गुणमयी सृष्टि (प्राकृत प्रपंच) का वर्णन सुनो। जीवात्मा अपने-आपको अनेक रूपोंमें प्रकट करके उन रूपोंको सत्य मानकर देखता रहता है ॥ १ ॥

एतदेवं विकुर्वाणो बुध्यमानो न बुध्यते । गुणान् धारयते ह्येष सृजत्याक्षिपते तदा ॥ २ ॥ वास्तवमें ज्ञानसम्पन्न होनेपर भी इस प्रकार प्रकृतिके संसर्गसे विकारको प्राप्त हुआ जीवात्मा ब्रह्मको नहीं जान पाता। वह गुणोंको धारण करता है; अतः कर्तृत्वका अभिमान लेकर रचना और संहार किया करता है ॥ २ ॥

अजस्रं त्विह क्रीडार्थं विकरोति जनाधिप । अव्यक्तबोधनाच्चैव बुध्यमानं वदन्त्यपि ॥ ३ ॥ जनेश्वर! जीवात्मा इस जगत्में सदा क्रीड़ा करनेके लिये ही विकारको प्राप्त होता है। वह अव्यक्त प्रकृतिको जानता है, इसलिये ऋषि-मुनि उसे 'बुध्यमान' कहते हैं ॥ ३ ॥

न त्वेव बुध्यतेऽव्यक्तं सगुणं तात निर्गुणम् । कदाचित् त्वेव खल्वेतदाहुरप्रतिबुद्धकम् ॥ ४ ॥ तात! परब्रह्म परमात्मा सगुण हो या निर्गुण, उसे प्रकृति कभी नहीं जानती (क्योंकि वह जड है), अतः सांख्यवादी विद्वान् इस प्रकृतिको अप्रतिबुद्ध (ज्ञानशून्य) कहते हैं ॥ ४ ॥

बुध्यते यदि वाव्यक्तमेतद् वै पञ्चविंशकम् । बुध्यमानो भवत्येव सङ्गात्मक इति श्रुतिः । अनेनाप्रतिबुद्धेति वदन्त्यव्यक्तमच्युतम् ॥ ५ ॥ यदि यह मान लिया जाय कि प्रकृति भी जानती है तो यह केवल पचीसवें तत्त्व— पुरुषको ही उससे संयुक्त होकर जान पाती है, प्रकृतिके साथ संयुक्त होनेके कारण ही जीव

सांगात्मक (संगी) होता है; ऐसा श्रुतिका कथन है। इस संगदोषके कारण ही अव्यक्त एवं अविकारी जीवात्माको लोग 'मूढ़' कह दिया करते हैं।। ५ ।। अव्यक्तबोधनाच्चापि बुध्यमानं वदन्त्युत । पञ्चविंशं महात्मानं न चासावपि बुध्यते ।। ६ ।। षड्विंशं विमलं बुद्धमप्रमेयं सनातनम् । स तु तं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं च बुध्यते ।। ७ ।। पचीसवाँ तत्त्वरूप महान् आत्मा अव्यक्त प्रकृतिको जानता है, इसलिये उसे 'बुध्यमान' कहते हैं; परंतु वह भी छब्बीसवें तत्त्वरूप निर्मल नित्य शुद्ध बुद्ध अप्रमेय सनातन परमात्माको नहीं जानता है; किंतु वह सनातन परमात्मा उस पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको तथा चौबीसवीं प्रकृतिको भी भलीभाँति जानता है ।। ६-७ ।। दृश्यादृश्ये ह्यनुगतं स्वभावेन महाद्युते । अव्यक्तमत्र तद् ब्रह्म बुध्यते तात केवलम् ।। ८ ।। तात! महातेजस्वी नरेश! वह अव्यक्त एवं अद्वितीय ब्रह्म यहाँ दृश्य और अदृश्य सभी वस्तुओंमें स्वभावसे ही व्याप्त है; अतः वह सबको जानता है ।। ८ ।। केवलं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं न पश्यति । बुध्यमानो यदाऽऽत्मानमन्योऽहमिति मन्यते ।। ९ ।। तदा प्रकृतिमानेष भवत्यव्यक्तलोचनः । चौबीसवीं अव्यक्त प्रकृति न तो अद्वितीय ब्रह्मको देख पाती है और न पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको। जब जीवात्मा अव्यक्त ब्रह्मकी ओर दृष्टि रखकर अपनेको प्रकृतिसे भिन्न मानता है, तब यह प्रकृतिका अधिपति हो जाता है ।। ९ १/२ ।। बुध्यते च परां बुद्धिं विशुद्धाममलां यदा ।। १० ।। षड्विंशो राजशार्दूल तथा बुद्धत्वमाव्रजेत् । ततस्त्यजति सोऽव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मि वै ।। ११ ।। नृपश्रेष्ठ! जब जीवात्मा शुद्ध ब्रह्मविषयिणी, निर्मल एवं सर्वोत्कृष्ट बुद्धिको प्राप्त कर लेता है, तब वह छब्बीसवें तत्त्वरूप परब्रह्मका साक्षात्कार करके तद्रूप हो जाता है। उस स्थितिमें वह नित्य शुद्ध-बुद्ध ब्रह्मभावमें ही प्रतिष्ठित होता है। फिर तो वह सृष्टि और प्रलयरूप धर्मवाली अव्यक्त प्रकृतिसे सर्वथा अतीत हो जाता है ।। १०-११ ।। निर्गुणः प्रकृतिं वेद गुणयुक्तामचेतनाम् । ततः केवलधर्मासौ भवत्यव्यक्तदर्शनात् ।। १२ ।। वह गुणोंसे अतीत होकर त्रिगुणमयी प्रकृतिको जडरूपमें जान लेता है, इस प्रकार प्रकृतिको अपनेसे सर्वथा अभिन्न देखनेके कारण वह कैवल्यको प्राप्त हो जाता है ।। १२ ।। केवलेन समागम्य विमुक्तोऽऽत्मानमाप्नुयात् ।

एतत् तु तत्त्वमित्याहुर्निस्तत्त्वमजरामरम् ॥ १३ ॥ केवल (अद्वितीय) ब्रह्मसे मिलकर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हुआ अपने परमार्थस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है। इसीको परमार्थतत्त्व कहते हैं। यह सब तत्त्वोंसे अतीत तथा जरा-मरणसे रहित है॥ १३॥

तत्त्वसंश्रयणादेतत् तत्त्ववन्न च मानद । पञ्चविंशति तत्त्वानि प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ १४ ॥ सबको मान देनेवाले नरेश! जीवात्मा तत्त्वोंका आश्रय लेनेसे ही तत्त्व-सदृश प्रतीत होता है। वास्तवमें वह तत्त्वोंका द्रष्टामात्र होनेके कारण तत्त्व नहीं है—तत्त्वोंसे सर्वथा भिन्न ही है। इस प्रकार मनीषी पुरुष (प्रकृतिके चौबीस तत्त्वोंके साथ) जीवात्माको भी एक तत्त्व मानकर कुल पचीस तत्त्वोंका प्रतिपादन करते हैं॥ १४॥

न चैष तत्त्ववांस्तात निस्तत्त्वस्त्वेष बुद्धिमान् । एष मुञ्चति तत्त्वं हि क्षिप्रं बुद्धस्य लक्षणम् ॥ १५ ॥ तात! यह जीवात्मा वास्तवमें तत्त्वोंसे अतीत है, अतः तद्रूप नहीं होता है; अपितु ज्ञानवान् होनेके कारण ब्रह्मज्ञानका उदय होनेपर यह शीघ्र ही प्राकृत तत्त्वोंका त्याग कर देता है और उसमें नित्य शुद्ध-बुद्ध ब्रह्मके लक्षण प्रकट हो जाते हैं॥ १५॥

षड्विंशोऽहमिति प्राज्ञो गृह्यमाणोऽजरामरः । केवलेन बलेनैव समतां यात्यसंशयम् ॥ १६ ॥ 'मैं पचीस तत्त्वोंसे भिन्न छब्बीसवाँ परमात्मा हूँ। नित्य ज्ञानसम्पन्न और जाननेके योग्य अजर-अमरस्वरूप हूँ,' इस प्रकार विचार करते-करते जीवात्मा केवल विवेक-बलसे ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ १६॥

षड्विंशेन प्रबुद्धेन बुध्यमानोऽप्यबुद्धिमान् । एतन्नानात्वमित्युक्तं सांख्यश्रुतिनिदर्शनात् ॥ १७ ॥ जीव छब्बीसवें तत्त्व ज्ञानस्वरूप परमात्माके प्रकाशसे ही जडवर्गको जानता है; परंतु उसे जानकर भी परमात्माको न जाननेके कारण वह अज्ञानी ही रह जाता है। यह अज्ञान ही जीवके नानात्वरूप बन्धनका कारण बताया जाता है। जैसा कि सांख्यशास्त्र और श्रुतियोंद्वारा दिग्दर्शन कराया गया है॥ १७॥

चेतनेन समेतस्य पञ्चविंशतिकस्य ह । एकत्वं वै भवत्यस्य यदा बुद्ध्या न बुध्यते ॥ १८ ॥ जब जीवात्मा बुद्धिके द्वारा जडवर्गको अपना नहीं समझता अर्थात् उससे सम्बन्ध नहीं जोड़ता, तब नित्य चेतन परमात्मासे संयुक्त हुए उस जीवात्माकी परमात्माके साथ एकता हो जाती है॥ १८॥

बुध्यमानोऽप्रबुद्धेन समतां याति मैथिल । सङ्गधर्मा भवत्येष निःसङ्गात्मा नराधिप ॥ १९ ॥

मिथिलानरेश! जबतक जीवात्मा जडवर्गको अपना समझता है, तबतक उस जडवर्गकी ही समताको वह प्राप्त होता है। यद्यपि वह स्वरूपसे असंग है तो भी प्रकृतिके सम्पर्कसे आसक्तिरूप धर्मवाला हो जाता है ।। १९ ।।
निःसङ्गात्मानमासाद्य षड्‌विंशकमजं विभुम् ।
विभुस्त्यजति चाव्यक्तं यदा त्वेतद् विबुद्ध्यते ।। २० ।।
चतुर्विंशमसारं च षड्‌विंशस्य प्रबोधनात् ।
छब्बीसवाँ तत्त्व परमात्मा अजन्मा, सर्वव्यापी और संगदोषसे रहित है। उसकी शरण लेकर जब जीवात्मा उसके स्वरूपका साक्षात्कार कर लेता है, तब परमात्म-ज्ञानके प्रभावसे स्वयं भी सर्वव्यापी हो जाता है तथा चौबीस तत्त्वोंसे युक्त प्रकृतिको असार समझकर त्याग देता है ।। २० १/२ ।।
एष ह्यप्रतिबुद्धश्च बुध्यमानश्च तेऽनघ ।। २१ ।।
प्रोक्तो बुद्धश्च तत्त्वेन यथाश्रुतिनिदर्शनात् ।
नानात्वैकत्वमेतावद् द्रष्टव्यं शास्त्रदर्शनात् ।। २२ ।।
निष्पाप नरेश! इस प्रकार मैंने तुमसे अप्रतिबुद्ध (क्षर), बुध्यमान (अक्षर जीवात्मा) और बुद्ध (ज्ञानस्वरूप परमात्मा)—इन तीनोंका श्रुतिके निर्देशके अनुसार यथार्थरूपसे प्रतिपादन किया है। शास्त्रीय दृष्टिके अनुसार जीवात्माके नानात्व और एकत्वको इसी तरह समझना चाहिये ।। २१-२२ ।।
मशकोदुम्बरे यद्वदन्यत्वं तद्वदेतयोः ।
मत्स्योदके यथा तद्वदन्यत्वमुपलभ्यते ।। २३ ।।
जैसे गूलर और उसके कीड़े एक साथ रहते हुए भी परस्पर भिन्न हैं, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुषमें भी भिन्नता है। जैसे मछली और जल एक-दूसरेसे भिन्न हैं, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुषमें भी भेद उपलब्ध होता है ।। २३ ।।
एवमेवावगन्तव्यं नानात्वैकत्वमेतयोः ।
एतद्धि मोक्ष इत्युक्तमव्यक्तज्ञानसंहितम् ।। २४ ।।
इसी प्रकार प्रकृति और पुरुषकी एकता और अनेकताको समझना चाहिये। अव्यक्त प्रकृतिका पुरुषसे जो नित्य भेद है, उसके यथार्थज्ञानसे पुरुष उसके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसीको मोक्ष कहा गया है ।।
पञ्चविंशतिकस्यास्य योऽयं देहेषु वर्तते ।
एष मोक्षयितव्येति प्राहुरव्यक्तगोचरात् ।। २५ ।।
इस शरीरमें जो पचीसवाँ तत्त्व अन्तर्यामी पुरुष विद्यमान है, उसे अव्यक्तके कार्यभूत महत्तत्त्वादिके बन्धनसे मुक्त करना आवश्यक है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं ।। २५ ।।
सोऽयमेवं विमुच्येत नान्यथेति विनिश्चयः ।
परेण परधर्मा च भवत्येष समेत्य वै ।। २६ ।।

वह यह जीवात्मा पूर्वोक्त प्रकारसे ही मुक्त हो सकता है, अन्यथा नहीं। यही विद्वानोंका निश्चय है। यह दूसरेसे मिलकर उसीका समानधर्मी हो जाता है।। विशुद्धधर्मा शुद्धेन बुद्धेन च स बुद्धिमान्। विमुक्तधर्मा मुक्तेन समेत्य पुरुषर्षभ ।। २७ ।। पुरुषप्रवर! जीवात्मा शुद्ध पुरुषका संग करके विशुद्ध धर्मवाला होता है। किसी ज्ञानी या बुद्धिमान्‌का संग करनेसे बुद्धिमान् होता है। किसी मुक्तसे मिलनेपर उसमें मुक्तके-से ही धर्म या लक्षण प्रकट होते हैं ।। वियोगधर्मिणा चैव विमुक्तात्मा भवत्यथ। विमोक्षिणा विमोक्षश्च समेत्येह तथा भवेत् ।। २८ ।। जिसका प्रकृतिसे सम्बन्ध हट गया है, ऐसे पुरुषसे मिलनेपर वह विमुक्तात्मा होता है। जो मोक्षधर्मसे युक्त है, उसका साथ करनेसे जीवको मोक्ष प्राप्त होता है ।। शुचिकर्मा शुचिश्चैव भवत्यमितदीप्तिमान्। विमलात्मा च भवति समेत्य विमलात्मना ।। २९ ।। जिसके आचार-विचार शुद्ध हैं, उससे मिलनेपर वह पवित्रकर्मा एवं पवित्र होता है। जिसका अन्तःकरण निर्मल है, उसके सम्पर्कमें जानेपर वह भी निर्मलात्मा और अमिततेजस्वी होता है ।। २९ ।। केवलात्मा तथा चैव केवलेन समेत्य वै। स्वतन्त्रश्च स्वतन्त्रेण स्वतन्त्रत्वमवाप्नुते ।। ३० ।। अद्वितीय परमात्मासे सम्बन्ध स्थापित करके वह तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है अर्थात् अद्वितीय परमात्माको प्राप्त हो जाता है। स्वतन्त्र परमेश्वरसे सम्बन्ध रखनेके कारण वह वास्तवमें स्वतन्त्र होकर वास्तविक स्वतन्त्रता प्राप्त कर लेता है ।। ३० ।। एतावदेतत् कथितं मया ते तथ्यं महाराज यथार्थतत्त्वम्। अमत्सरत्वं परिगृह्य चार्थं सनातनं ब्रह्म विशुद्धमाद्यम् ।। ३१ ।। महाराज! मैंने ईर्ष्या-द्वेषसे रहित भावको स्वीकार करके और तुम्हारे प्रयोजनको समझकर तुमसे प्रेमपूर्वक इस शुद्ध सनातन एवं सबके आदिभूत सत्यस्वरूप ब्रह्मके यथार्थ तत्त्वका इस रूपमें वर्णन किया है ।। ३१ ।। नावेदनिष्ठस्य जनस्य राजन् प्रदेयमेतत् परमं त्वया भवेत्। विधित्समानाय विबोधकारण प्रबोधहेतोः प्रणतस्य शासनम् ।। ३२ ।।

राजन्! जो मनुष्य वेदमें श्रद्धा रखनेवाला न हो, उसे इस उत्तम ज्ञानका उपदेश तुम्हें नहीं करना चाहिये। जिसे बोधके लिये अधिक प्यास हो तथा जो जिज्ञासुभावसे शरणमें आया हो, वही इस उपदेशको सुननेका अधिकारी है ॥ ३२ ॥

न देयमेतच्च तथानृतात्मने शठाय क्लीबाय न जिह्मबुद्धये । न पण्डितज्ञानपरोपतापिने देयं तु देयं च निबोध यादृशे ॥ ३३ ॥

असत्यवादी, शठ, नीच, कपटी, अपनेको पण्डित माननेवाले और दूसरेको कष्ट पहुँचानेवाले मनुष्यको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। कैसे पुरुषको इस ज्ञानका उपदेश देना और अवश्य देना चाहिये—यह भी सुन लो ॥ ३३ ॥

श्रद्धान्वितायाथ गुणान्विताय परापवादाद् विरताय नित्यम् । विशुद्धयोगाय बुधाय नित्यं क्रियावते च क्षमिणे हिताय ॥ ३४ ॥ विविक्तशीलाय विधिप्रियाय विवादहीनाय बहुश्रुताय । विजानते चैव न चाहितक्षमे दमे च शक्ताय शमे च देयम् ॥ ३५ ॥

श्रद्धालु, गुणवान्, परनिन्दासे सदा दूर रहनेवाले, विशुद्ध योगी, विद्वान्, सदा शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले, क्षमाशील, सबके हितैषी, एकान्तवासी, शास्त्रविधिका आदर करनेवाले, विवादहीन, बहुज्ञ, विज्ञ, किसीका अहित न करनेवाले तथा इन्द्रियसंयम एवं मनोनिग्रहमें समर्थ पुरुषको ही इस ज्ञानका उपदेश देना चाहिये ॥

एतैर्गुणैर्हीनतमे न देय- मेतत् परं ब्रह्म विशुद्धमाहुः । न श्रेयसा योक्ष्यति तादृशे कृतं धर्मप्रवक्तारमपात्रदानात् ॥ ३६ ॥

जो इन सद्गुणोंसे अत्यन्त हीन हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। यह ज्ञान विशुद्ध परब्रह्मस्वरूप बताया गया है। वैसे गुणहीन पुरुषको दिया हुआ यह ज्ञान उसके लिये कल्याणकारी नहीं होगा तथा कुपात्रको उपदेश देनेसे वह वक्ताका भी कल्याण नहीं करेगा ॥ ३६ ॥

पृथ्वीमिमां यद्यपि रत्नपूर्णां दद्यान्न देयं त्विदमव्रताय । जितेन्द्रियायैतदसंशयं ते

भवेत् प्रदेयं परमं नरेन्द्र ॥ ३७ ॥ नरेन्द्र! जिसने व्रत और नियमोंका पालन न किया हो, वह यदि रत्नोंसे भरी हुई इस सारी पृथ्वीका राज्य दे तो भी उसे इस ज्ञानका उपदेश नहीं देना चाहिये। परंतु जितेन्द्रिय पुरुषको निस्संदेह इस परम उत्तम ज्ञानका उपदेश देना तुझे उचित है ॥ ३७ ॥ कराल मा ते भयमस्तु किञ्चि- देतच्छ्रुतं ब्रह्म परं त्वयाद्य । यथावदुक्तं परमं पवित्रं विशोकमत्यन्तमनादिमध्यम् ॥ ३८ ॥ अगाधजन्मामरणं च राजन् निरामयं वीतभयं शिवं च । समीक्ष्य मोहं त्यज वाद्य सर्व- ज्ञानस्य तत्त्वार्थमिदं विदित्वा ॥ ३९ ॥ कराल! तुमने मुझसे आज परब्रह्मका ज्ञान सुना है; अतः तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये। वह परब्रह्म परम पवित्र, शोकरहित, आदि, मध्य और अन्तसे शून्य, जन्म-मृत्युसे बचानेवाला, निरामय, निर्भय तथा कल्याणमय है। राजन्! उसका मैंने यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया है। वही सम्पूर्ण ज्ञानोंका तात्त्विक अर्थ है। ऐसा जानकर उसका ज्ञान प्राप्त करके आज मोहका परित्याग कर दो ॥ ३८-३९ ॥ अवाप्तमेतद्धि मया सनातना- द्धिरण्यगर्भाद् गदतो नराधिप । प्रसाद्य यत्नेन तमुग्रचेतसं सनातनं ब्रह्म यथाद्य वै त्वया ॥ ४० ॥ नरेश्वर! जिस प्रकार आज तुमने मुझसे सनातन ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त किया है; इसी प्रकार मैंने भी हिरण्यगर्भ नामसे प्रसिद्ध सनातन उग्रचेता ब्रह्माजीके मुखसे, उन्हें बड़े यत्नसे प्रसन्न करके इसे प्राप्त किया था ॥ ४० ॥ पृष्टस्त्वया चास्मि यथा नरेन्द्र यथा मयेदं त्वयि चोक्तमद्य । तथावाप्तं ब्रह्मणो मे नरेन्द्र महाज्ञानं मोक्षविदां परायणम् ॥ ४१ ॥ नरेन्द्र! जैसे तुमने मुझसे पूछा है और जैसे मैंने तुम्हारे प्रति आज इस ज्ञानका उपदेश किया है, उसी प्रकार मैंने भी ब्रह्माजीसे प्रश्न करके उनके मुखसे इस महान् ज्ञानको प्राप्त किया है। यह मोक्ष ज्ञानियोंका परम आश्रय है ॥ ४१ ॥

भीष्म उवाच

एतदुक्तं परं ब्रह्म यस्मान्नावर्तते पुनः ।
पञ्चविंशो महाराज परमर्षिनिदर्शनात् ॥ ४२ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**महाराज! महर्षि वसिष्ठके बताये अनुसार यह परब्रह्मका स्वरूप मैंने तुम्हें बताया है, जिसे पाकर जीवात्मा फिर इस संसारमें नहीं लौटता ॥

पुनरावृत्तिमाप्नोति परं ज्ञानमवाप्य च ।
नावबुध्यति तत्त्वेन बुध्यमानोऽजरामरम् ॥ ४३ ॥
जो इस उत्तम ज्ञानको गुरुके मुखसे पाकर भी भलीभाँति समझता नहीं है, वह पुनरावृत्ति (बारंबार आवागमन) को प्राप्त होता है और जो इसे तत्त्वतः समझ लेता है, वह जरा-मृत्युसे रहित परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥

एतन्निःश्रेयसकरं ज्ञानं ते परमं मया ।
कथितं तत्त्वतस्तात श्रुत्वा देवर्षितो नृप ॥ ४४ ॥
तात! नरेश्वर! यह परम कल्याणकारी उत्तम ज्ञान मैंने देवर्षि नारदजीके मुँहसे सुना था। जिसे यथार्थरूपसे तुम्हें भी बताया है ॥ ४४ ॥

हिरण्यगर्भादृषिणा वसिष्ठेन महात्मना ।
वसिष्ठादृषिशार्दूलान्नारदोऽवाप्तवानिदम् ॥ ४५ ॥
नारदाद् विदितं मह्यमेतद् ब्रह्म सनातनम् ।
मा शुचः कौरवेन्द्र त्वं श्रुत्वैतत् परमं पदम् ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीसे महात्मा वसिष्ठ मुनिने यह ज्ञान प्राप्त किया था। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे यह नारदजीको उपलब्ध हुआ और नारदजीसे मुझे यह सनातन ब्रह्मका उपदेश प्राप्त हुआ है। कौरवनरेश! यह ज्ञान परमपद है। इसे सुनकर अब तुम शोकका त्याग कर दो ॥ ४५-४६ ॥

येन क्षराक्षरे वित्ते भयं तस्य न विद्यते ।
विद्यते तु भयं तस्य यो नैतद् वेत्ति पार्थिव ॥ ४७ ॥
पृथ्वीनाथ! जिसने क्षर और अक्षरके तत्त्वको जान लिया है, उसमें किसी प्रकारका भी भय नहीं होता। जो इसे नहीं जानता, उसीमें भय रहता है ॥ ४७ ॥

अविज्ञानाच्च मूढात्मा पुनः पुनरुपाद्रवत् ।
प्रेत्य जातिसहस्राणि मरणान्तान्युपाश्नुते ॥ ४८ ॥
मूर्ख मनुष्य इस तत्त्वको न जाननेके कारण बारंबार संसारमें आता है और हजारों योनियोंमें जन्म-मरणके कष्टका अनुभव करता है ॥ ४८ ॥

देवलोकं तथा तिर्यङ्मनुष्यमपि चाश्नुते ।
यदि शुध्यति कालेन तस्मादज्ञानसागरात् ॥ ४९ ॥
(उत्तीर्णोऽस्मादगाधात् स परमाप्नोति शोभनम् ।)

वह देव, मनुष्य और पशु-पक्षी आदिकी योनिमें भटकता रहता है। यदि कभी समयके अनुसार शुद्ध हो गया तो उस अगाध अज्ञानसमुद्रसे पार होकर परम कल्याणका भागी होता है॥ ४९॥

अज्ञानसागरो घोरो ह्यव्यक्तोऽगाध उच्यते।
अहन्यहनि मज्जन्ति यत्र भूतानि भारत॥ ५०॥

भरतनन्दन! अज्ञानरूपी समुद्र अव्यक्त, अगाध और भयंकर बताया जाता है। इसमें असंख्य प्राणी प्रतिदिन गोते खाते रहते हैं॥ ५०॥

यस्मादगाधादव्यक्तादुत्तीर्णस्त्वं सनातनात्।
तस्मात् त्वं विरजाश्चैव वितमस्कश्च पार्थिव॥ ५१॥

राजन्! तुम मेरा उपदेश पाकर इस अव्यक्त, अगाध एवं प्रवाहरूपमें सदा रहनेवाले भवसागरसे पार हो गये हो, इसलिये अब तुम रजोगुण और तमोगुणसे भी रहित हो गये हो॥ ५१॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादसमाप्तौ
अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ ३०८॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ-करालजनक-संवादकी समाप्तिविषयक तीन सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५१ १/३ श्लोक हैं)

जनकवंशी वसुमान्‌को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश

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नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

जनकवंशी वसुमान्‌को एक मुनिका धर्मविषयक उपदेश

भीष्म उवाच

मृगयां विचरन् कश्चिद् विजने जनकात्मजः ।
वने ददर्श विप्रेन्द्रमृषिं वंशधरं भृगोः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! एक समयकी बात है, जनकवंशका कोई राजकुमार शिकार खेलनेके लिये एक निर्जन वनमें घूम रहा था। उसने वनमें बैठे हुए एक मुनिको देखा; जो ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ एवं महर्षि भृगुके वंशधर थे ॥ १ ॥

उपासीनमुपासीनः प्रणम्य शिरसा मुनिम् ।
पश्चादनुमतस्तेन पप्रच्छ वसुमानिदम् ॥ २ ॥

पास ही बैठे हुए मुनिको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वह राजकुमार उनके समीपमें ही बैठ गया। उसका नाम वसुमान् था। उसने महर्षिकी आज्ञा लेकर उनसे इस प्रकार पूछा — ॥ २ ॥

भगवन् किमिदं श्रेयः प्रेत्य चापीह वा भवेत् ।
पुरुषस्याध्रुवे देहे कामस्य वशवर्तिनः ॥ ३ ॥

‘भगवन्! इस क्षणभंगुर शरीरमें कामके अधीन होकर रहनेवाले पुरुषका इस लोक और परलोकमें किस उपायसे कल्याण हो सकता है? ॥ ३ ॥

सत्कृत्य परिपृष्टः सन् सुमहात्मा महातपाः ।
निजगाद ततस्तस्मै श्रेयस्करमिदं वचः ॥ ४ ॥

सत्कारपूर्वक प्रश्न करनेपर उन महातपस्वी महात्मा मुनिने राजकुमार वसुमान्‌से यह कल्याणकारी वचन कहा ॥ ४ ॥

ऋषिरुवाच

मनसोऽप्रतिकूलानि प्रेत्य चेह च वाञ्छसि ।
भूतानां प्रतिकूलेभ्यो निवर्तस्व यतेन्द्रियः ॥ ५ ॥

ऋषि बोले—राजकुमार! यदि तुम इस लोक और परलोकमें अपने मनके अनुकूल वस्तुएँ पाना चाहते हो तो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर समस्त प्राणियोंके प्रतिकूल आचरणोंसे दूर हट जाओ ॥ ५ ॥

धर्मः सतां हितः पुंसां धर्मश्चैवाश्रयः सताम् ।
धर्माल्लोकास्त्रयस्तात प्रवृत्ताः सचराचराः ॥ ६ ॥

धर्म ही सत्पुरुषोंका कल्याण करनेवाला और धर्म ही उनका आश्रय है। तात! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोक धर्मसे ही उत्पन्न हुए हैं॥ ६॥

स्वादुकामुक कामानां वैतृष्ण्यं किं न गच्छसि ।
मधु पश्यसि दुर्बुद्धे प्रपातं नानुपश्यसि ॥ ७ ॥
भोगोंका रस लेनेकी इच्छा रखनेवाले दुर्बुद्धि मानव! तुम्हारी कामपिपासा शान्त क्यों नहीं होती? अभी तुम्हें वृक्षकी ऊँची डालीमें लगा हुआ केवल मधु ही दिखायी देता है। वहाँसे गिरनेपर प्राणान्त हो सकता है, इसकी ओर तुम्हारी दृष्टि नहीं है (अर्थात् अभी तुम भोगोंकी मिठासपर ही लुभाये हुए हो। उससे होनेवाले पतनकी ओर तुम्हारा ध्यान नहीं जा रहा है) ॥ ७ ॥

यथा ज्ञाने परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ।
तथा धर्मे परिचयः कर्तव्यस्तत्फलार्थिना ॥ ८ ॥
जैसे ज्ञानका फल चाहनेवालेके लिये ज्ञानसे परिचित होना आवश्यक है, उसी प्रकार धर्मका फल चाहनेवाले मनुष्यको भी धर्मका परिचय प्राप्त करना चाहिये ॥ ८ ॥

असता धर्मकामेन विशुद्धं कर्म दुष्करम् ।
सता तु धर्मकामेन सुकरं कर्म दुष्करम् ॥ ९ ॥
दुष्ट पुरुष यदि धर्मकी इच्छा करे तो भी उसके द्वारा विशुद्ध कर्मका सम्पादन होना कठिन है और साधु पुरुष यदि धर्मके अनुष्ठानकी इच्छा करे तो उसके लिये कठिन-से-कठिन कर्म भी करना सहज है ॥ ९ ॥

वने ग्राम्यसुखाचारो यथा ग्राम्यस्तथैव सः ।
ग्रामे वनसुखाचारो यथा वनचरस्तथा ॥ १० ॥
वनमें रहकर भी जो ग्रामीण सुखोंका उपभोग करनेमें लगा है, उसको ग्रामीण ही समझना चाहिये तथा गाँवोंमें रहकर भी जो वनवासी मुनियोंके-से बर्तावमें ही सुख मानता है, उसकी गिनती वनवासियोंमें ही करनी चाहिये ॥ १० ॥

मनोवाक्कायिके धर्मे कुरु श्रद्धां समाहितः ।
निवृत्तौ वा प्रवृत्तौ वा सम्प्रधार्य गुणागुणान् ॥ ११ ॥
पहले निवृत्ति और प्रवृत्ति-मार्गमें जो गुण-अवगुण हैं, उनका तुम अच्छी तरह निश्चय कर लो; फिर एकाग्रचित्त हो मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले धर्ममें श्रद्धा करो (अर्थात् श्रद्धापूर्वक धर्मके पालनमें लग जाओ) ॥ ११ ॥

नित्यं च बहु दातव्यं साधुभ्यश्चानसूयता ।
प्रार्थितं व्रतशौचाभ्यां सत्कृतं देशकालयोः ॥ १२ ॥
प्रतिदिन व्रत और शौचाचारका पालन करते हुए उत्तम देश और कालमें साधु पुरुषोंको प्रार्थना और सत्कारपूर्वक अधिक-से-अधिक दान करना चाहिये और उनमें दोषदृष्टि नहीं रखनी चाहिये ॥ १२ ॥

शुभेन विधिना लब्धमर्हाय प्रतिपादयेत् ।
क्रोधमुत्सृज्य दद्याच्च नानुसन्तप्येन्न कीर्तयेत् ॥ १३ ॥
शुभकर्मोंद्वारा प्राप्त हुआ धन सत्पात्रको अर्पण करना चाहिये। क्रोधको त्यागकर दान देना चाहिये और देनेके बाद न तो उसके लिये पश्चात्ताप करना चाहिये और न उसे दूसरोंको बताना ही चाहिये ॥ १३ ॥

अनृशंसः शुचिर्दान्तः सत्यवागार्जवे स्थितः ।
योनिकर्मविशुद्धश्च पात्रं स्याद् वेदविद् द्विजः ॥ १४ ॥
दयालु, पवित्र, जितेन्द्रिय, सत्यवादी, सरलतापूर्ण बर्ताव करनेवाला तथा योनिसे अर्थात् जन्मसे और कर्मसे शुद्ध वेदवेत्ता ब्राह्मण ही दान पानेका उत्तम पात्र है ॥ १४ ॥

सत्कृता चैकपत्नी च जात्या योनिरिहेष्यते ।
ऋग्यजुःसामगो विद्वान् षट्कर्मा पात्रमुच्यते ॥ १५ ॥
अपनी ही जातिके उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई तथा पतिद्वारा सम्मानित पतिव्रता स्त्री यहाँ उत्तम योनि मानी गयी है। अतः जिसका ऐसी मातासे जन्म हुआ हो वह जन्मसे शुद्ध है। ऋक्, यजुष् और सामवेदका विद्वान् होकर सदा (यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह इन) छः कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला ब्राह्मण कर्मसे शुद्ध एवं उत्तम पात्र बताया गया है ॥ १५ ॥

स एव धर्मः सोऽधर्मस्तं तं प्रति नरं भवेत् ।
पात्रकर्मविशेषेण देशकालाववेक्ष्य च ॥ १६ ॥
देश, काल, पात्र और कर्मविशेषपर विचार करनेसे एक ही कर्म भिन्न-भिन्न मनुष्यके लिये धर्म और अधर्मरूप हो जाता है ॥ १६ ॥

लीलयाल्पं यथा गात्रात् प्रमृज्यात् तु रजः पुमान् ।
बहुयत्नेन च महत् पापनिर्हरणं तथा ॥ १७ ॥
जैसे शरीरमें थोड़ी-सी धूल लगी हुई हो तो मनुष्य उसे अनायास ही झाड़-पोंछकर दूर कर देता है; परंतु बहुत अधिक मैल बैठ जाय तो उसे बड़े प्रयत्नसे दूर कर सकता है, उसी प्रकार थोड़ा पाप थोड़े-से प्रयत्नसे और महान् पाप महान् प्रायश्चित्त करनेसे दूर होता है ॥ १७ ॥

विरिक्तस्य यथा सम्यग् घृतं भवति भेषजम् ।
तथा निर्हृतदोषस्य प्रेत्य धर्मः सुखावहः ॥ १८ ॥
जैसे जिसने विरेचनके द्वारा अपने पेटको अच्छी तरह साफ कर लिया हो, वह मनुष्य यदि घी खाय तो वह उसके लिये दवाके समान लाभदायक होता है। उसी तरह जिसके सारे पाप-दोष दूर हो गये हैं, उसीके लिये धर्म परलोकमें सुख देनेवाला होता है ॥ १८ ॥

मानसं सर्वभूतेषु वर्तते वै शुभाशुभम् ।
अशुभेभ्यः सदाऽऽक्षिप्य शुभेष्वेवावतारयेत् ॥ १९ ॥

सभी प्राणियोंके मनमें शुभ और अशुभ विचार उठते रहते हैं। मनुष्यको चाहिये कि वह चित्तको सदा अशुभ विचारोंकी ओरसे हटाकर शुभ विचारोंमें ही लगाये ॥ १९ ॥ सर्वं सर्वेण सर्वत्र क्रियमाणं च पूजय । स्वधर्मे यत्र रागस्ते कामं धर्मो विधीयताम् ॥ २० ॥ अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार सबके द्वारा सब जगह किये जानेवाले सब प्रकारके कर्मोंका आदर करो। तुम भी अपने धर्मके अनुसार जिस कर्ममें तुम्हारा अनुराग हो, उसका इच्छानुसार पालन करते रहो ॥ २० ॥ अधृतात्मन् धृतौ तिष्ठ दुर्बुद्धे बुद्धिमान् भव । अप्रशान्तः प्रशाम्य त्वमप्राज्ञः प्राज्ञवच्चर ॥ २१ ॥ अधीरचित्त नरेश! धीरताका आश्रय लो। दुर्बुद्धे! बुद्धिमान् बनो। तुम सदा अशान्त रहते हो। अबसे शान्त हो जाओ और अबतक मूर्खोंके-से बर्ताव करते रहे, अब विद्वानोंके समान आचरण करो ॥ २१ ॥ तेजसा शक्यते प्राप्तुमुपायः सहचारिणा । इह च प्रेत्य च श्रेयस्तस्य मूलं धृतिः परा ॥ २२ ॥ जो सत्पुरुषोंका संग करता है, उसे उन्हींके तेज या प्रतापसे कोई ऐसा उपाय प्राप्त हो सकता है, जो इस लोक और परलोकमें भी कल्याण करनेवाला हो। उत्तम धृति (मनकी स्थिरता) ही कल्याणका मूल है ॥ २२ ॥ राजर्षिरधृतिः स्वर्गात् पतितो हि महाभिषः । ययातिः क्षीणपुण्योऽपि धृत्या लोकानवाप्तवान् ॥ २३ ॥ राजर्षि महाभिष धृतिमान् न होनेके कारण ही स्वर्गसे नीचे गिरे और राजा ययाति अपना पुण्य क्षीण हो जानेके बाद भी धृतिके ही बलसे उत्तम लोकोंको प्राप्त हुए ॥ २३ ॥ तपस्विनां धर्मवतां विदुषां चोपसेवनात् । प्राप्स्यसे विपुलां बुद्धिं तथा श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥ २४ ॥ राजन्! तपस्वी, धर्मात्मा एवं विद्वानोंकी सेवा करनेसे तुम्हें विशाल बुद्धि प्राप्त होगी, जिससे तुम कल्याणके भागी हो सकोगे ॥ २४ ॥

<center>भीष्म उवाच</center>

स तु स्वभावसम्पन्नस्तच्छ्रुत्वा मुनिभाषितम् । विनिवर्त्य मनः कामाद् धर्मे बुद्धिं चकार ह ॥ २५ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! राजकुमार वसुमान् अच्छे स्वभावसे सम्पन्न था। उसने मुनिके उस उपदेशको सुनकर अपने मनको कामनाओंसे हटा लिया और बुद्धिको धर्ममें ही लगा दिया ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जनकानुशासने
नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जनकवंशी वसुमान्‌को
उपदेशविषयक तीन सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०९ ॥

धर्माधर्मविमुक्तं यद् विमुक्तं सर्वसंशयात् ।

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दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

याज्ञवल्क्यका राजा जनकको उपदेश—सांख्यमतके अनुसार चौबीस तत्त्वों और नौ प्रकारके सर्गोंका निरूपण

युधिष्ठिर उवाच

धर्माधर्मविमुक्तं यद् विमुक्तं सर्वसंशयात् ।
जन्ममृत्युविमुक्तं च विमुक्तं पुण्यपापयोः ॥ १ ॥
यच्छिवं नित्यमभयं नित्यमक्षरमव्ययम् ।
शुचि नित्यमनायासं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! जो धर्म और अधर्मके बन्धनसे मुक्त, सम्पूर्ण संशयोंसे रहित, जन्म और मृत्युसे रहित, पुण्य और पापसे मुक्त, नित्य, निर्भय, कल्याणमय, अक्षर, अव्यय (अविकारी), पवित्र एवं क्लेशरहित तत्त्व है, उसका आप हमें उपदेश कीजिये ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
याज्ञवल्क्यस्य संवादं जनकस्य च भारत ॥ ३ ॥
**भीष्मजी बोले—**भरतनन्दन! इस विषयमें मैं तुम्हें जनक और याज्ञवल्क्यका संवादरूप एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा ॥ ३ ॥
याज्ञवल्क्यमृषिश्रेष्ठं दैवरातिर्महायशाः ।
पप्रच्छ जनको राजा प्रश्नं प्रश्नविदां वरम् ॥ ४ ॥
एक बार देवरातके महायशस्वी पुत्र राजा जनकने प्रश्नका रहस्य समझनेवालोंमें श्रेष्ठ मुनिवर याज्ञवल्क्यजीसे पूछा ॥ ४ ॥

जनक उवाच

कतीन्द्रियाणि विप्रर्षे कति प्रकृतयः स्मृताः ।
किमव्यक्तं परं ब्रह्म तस्माच्च परतस्तु किम् ॥ ५ ॥
प्रभवं चाप्ययं चैव कालसंख्यां तथैव च ।
वक्तुमर्हसि विप्रेन्द्र त्वदनुग्रहकाङ्क्षिणः ॥ ६ ॥
**जनक बोले—**ब्रह्मर्षे! इन्द्रियाँ कितनी हैं? प्रकृतिके कितने भेद माने गये हैं? अव्यक्त क्या है? और उससे परे परब्रह्म परमात्माका क्या स्वरूप है? सृष्टि और प्रलय क्या है? और कालकी गणना कैसे की जाती है? विप्रेन्द्र! ये सब बतानेकी कृपा करें; क्योंकि हमलोग आपकी कृपाके अभिलाषी हैं ॥ ५-६ ॥