महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ऊपर-ऊपर प्रकाशित होनेवाले स्वयंप्रकाश देवताओंसे यह अप्रमेय आकाश भी भरा हुआ-सा प्रतीत होता है ॥ २६ ॥
पृथिव्यन्ते समुद्रास्तु समुद्रान्ते तमः स्मृतम् ।
तमसोऽन्ते जलं प्राहुर्जलस्यान्तेऽग्निरेव च ॥ २७ ॥
पृथ्वीके अन्तमें समुद्र हैं। समुद्रके अन्तमें घोर अन्धकार है। अन्धकारके अन्तमें जल है और जलके अन्तमें अग्निकी स्थिति बतायी गयी है ॥ २७ ॥
रसातलान्ते सलिलं जलान्ते पन्नगाधिपाः ।
तदन्ते पुनराकाशमाकाशान्ते पुनर्जलं ॥ २८ ॥
रसातलके अन्तमें जल है। जलके अन्तमें नागराज शेष हैं। उनके अन्तमें पुनः आकाश और आकाशके ही अन्तभागमें पुनः जल है ॥ २८ ॥
एवमन्तं भगवतः प्रमाणं सलिलस्य च ।
अग्निमारुततोयेभ्यो दुर्ज्ञेयं दैवतैरपि ॥ २९ ॥
इस प्रकार भगवान्का, आकाशका, जलका तथा अग्नि और वायुका भी अन्त और परिमाण जानना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ २९ ॥
अग्निमारुततोयानां वर्णाः क्षितितलस्य च ।
आकाशादवगृह्यन्ते भिद्यन्तेऽतत्त्वदर्शनात् ॥ ३० ॥
अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी—इनके रंग-रूप आकाशसे ही गृहीत होते हैं; अतः उससे भिन्न नहीं हैं। तत्त्वज्ञान न होनेसे ही उनमें भेदकी प्रतीति होती है ॥
पठन्ति चैव मुनयः शास्त्रेषु विविधेषु च ।
त्रैलोक्ये सागरे चैव प्रमाणं विहितं यथा ॥ ३१ ॥
अदृश्याय त्वगम्याय कः प्रमाणमुदाहरेत् ।
सिद्धानां देवतानां च यदा परिमिता गतिः ॥ ३२ ॥
ऋषियोंने विविध शास्त्रोंमें तीनों लोकों और समुद्रोंके विषयमें तो कुछ निश्चित प्रमाण बताया भी है; परंतु जो दृष्टिसे परे हैं और जहाँतक इन्द्रियोंकी पहुँच नहीं है, उस परमात्माका परिमाण कोई कैसे बतायेगा? आखिर इन सिद्धों और देवताओंका ज्ञान भी तो परिमित ही है ॥ ३१-३२ ॥
तदा गौणमनन्तस्य नामानन्तेति विश्रुतम् ।
नामधेयानुरूपस्य मानसस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
अतः परमात्मा मानसदेव अपने नामके अनुरूप ही अनन्त हैं। उनका सुप्रसिद्ध अनन्त नाम उनके गुणके अनुसार ही है ॥ ३३ ॥
यदा तु दिव्यं तद् रूपं हसते वर्धते पुनः ।
कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्तो योऽपि स्यात् तद्विधोऽपरः ॥ ३४ ॥
जब उन परमात्माका वह दिव्यस्वरूप उनकी मायासे कभी बहुत छोटा हो जाता है और कभी बहुत बढ़ जाता है, तब कोई उनसे भिन्न दूसरा उन्हींके समान प्रतिभाशाली कौन है, जो कि उस स्वरूपका यथार्थ परिमाण जान सके अर्थात् ऐसा कोई नहीं है ॥ ३४ ॥
ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्तिमान् प्रभुः ।
ब्रह्मा धर्ममयः पूर्वः प्रजापतिरनुत्तमः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर पूर्वोक्त कमलसे सर्वज्ञ, मूर्तिमान्, प्रभाव-शाली, परम उत्तम तथा प्रथम प्रजापति धर्ममय ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ३५ ॥
भरद्वाज उवाच
पुष्कराद् यदि सम्भूतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् ।
ब्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान् संदेह एव मे ॥ ३६ ॥
भरद्वाजने पूछा— प्रभो! यदि ब्रह्माजी कमलसे प्रकट हुए तब तो कमल ही ज्येष्ठ प्रतीत होता है; परंतु आपने ब्रह्माजीको पूर्वज बताया है; अतः यह संदेह मेरे मनमें बना ही रह गया ॥ ३६ ॥
भृगुरुवाच
मानसस्येह या मूर्तिर्ब्रह्मत्वं समुपागता ।
तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ॥ ३७ ॥
भृगुने कहा— मुने! मानसदेवका जो स्वरूप बताया गया है, वही ब्रह्मरूपमें प्रकट है। उन्हीं ब्रह्माजीके आसनके लिये इस पृथ्वीको ही पद्म (कमल) कहते हैं ॥ ३७ ॥
कर्णिका तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः ।
तस्य मध्ये स्थितो लोकान् सृजते जगतः प्रभुः ॥ ३८ ॥
इस कमलकी कर्णिका मेरुपर्वत है, जो आकाशमें बहुत ऊँचेतक गया है। उसी पर्वतके मध्यभागमें स्थित होकर जगदीश्वर ब्रह्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करते हैं ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु और भरद्वाजका संवादविषयक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं)
* यहाँ जो सृष्टिका क्रम बताया गया है, वह श्रुतिसम्मत क्रमसे भिन्न है। श्रुतिने आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथ्वीकी उत्पत्तिका क्रम बताया है।
आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन
त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
आकाशसे अन्य चार स्थूल भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन
भरद्वाज उवाच
प्रजाविसर्गं विविधं कथं स सृजते प्रभुः ।
मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा तद् ब्रूहि द्विजसत्तम ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! मेरुपर्वतके मध्यभागमें स्थित होकर ब्रह्माजी नाना प्रकारकी प्रजासृष्टि कैसे करते हैं, यह मुझे बताइये? ॥ १ ॥
भृगुरुवाच
प्रजाविसर्गं विविधं मानसो मनसासृजत् ।
संरक्षणार्थं भूतानां सृष्टं प्रथमतॊ जलम् ॥ २ ॥
भृगुने कहा— उन मानसदेवने अपने मानसिक संकल्पसे ही नाना प्रकारकी प्रजासृष्टि की है। उन्होंने प्राणियोंकी रक्षाके लिये सबसे पहले जलकी सृष्टि की ॥ २ ॥
यत् प्राणः सर्वभूतानां वर्धन्ते येन च प्रजाः ।
परित्यक्ताश्च नश्यन्ति तेनेदं सर्वमावृतम् ॥ ३ ॥
वह जल समस्त प्राणियोंका जीवन है। उसीसे प्रजाकी वृद्धि होती है। जलके न मिलनेसे प्राणी नष्ट हो जाते हैं। उसीने इस सम्पूर्ण जगत्के व्याप्त कर रखा है ॥ ३ ॥
पृथिवी पर्वता मेघा मूर्तिमन्तश्च ये परे ।
सर्वं तद् वारुणं ज्ञेयमापस्तस्तम्भिरे यतः ॥ ४ ॥
पृथ्वी, पर्वत, मेघ तथा अन्य जो मूर्तिमान् वस्तुएँ हैं, उन सबको जलमय समझना चाहिये; क्योंकि जलने ही उन सबको स्थिर कर रखा है ॥ ४ ॥
भरद्वाज उवाच
कथं सलिलमुत्पन्नं कथं चैवाग्निमारुतौ ।
कथं वा मेदिनी सृष्टेत्यत्र मे संशयो महान् ॥ ५ ॥
भरद्वाजने पूछा— भगवन्! जलकी उत्पत्ति कैसे हुई? अग्नि और वायुकी सृष्टि किस प्रकार हुई तथा पृथ्वीकी भी रचना कैसे की गयी, इस विषयमें मुझे महान् संदेह है ॥ ५ ॥
भृगुरुवाच
ब्रह्मकल्पे पुरा ब्रह्मन् ब्रह्मर्षीणां समागमे ।
लोकसम्भवसंदेहः समुत्पन्नो महात्मनाम् ॥ ६ ॥
भृगुने कहा— ब्रह्मन्! पूर्वकालमें जब ब्रह्मकल्प चल रहा था, उस समय ब्रह्मर्षियोंका परस्पर समागम हुआ। उन महात्माओंकी उस सभामें लोकसृष्टिविषयक संदेह उपस्थित हुआ ।। ६ ।।
तेऽतिष्ठन् ध्यानमालम्ब्य मौनमास्थाय निश्चलाः ।
त्यक्ताहाराः पवनपा दिव्यं वर्षशतं द्विजाः ।। ७ ।।
वे ब्रह्मर्षि भोजन छोड़कर वायु पीकर रहते हुए सौ दिव्य वर्षोंतक ध्यान लगाकर मौनका आश्रय ले निश्चलभावसे बैठे रह गये ।। ७ ।।
तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत् ।
दिव्या सरस्वती तत्र सम्बभूव नभस्तलात् ।। ८ ।।
उस ध्यानावस्थामें उन सबके कानोंमें ब्रह्ममयी वाणी सुनायी पड़ी। उस समय वहाँ आकाशसे दिव्य सरस्वती प्रकट हुई थी ।। ८ ।।
पुरा स्तिमितमाकाशमनन्तमचलोपमम् ।
नष्टचन्द्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव सम्बभौ ।। ९ ।।
वह आकाशवाणी इस प्रकार है—'पूर्वकालमें अनन्त आकाश पर्वतके समान निश्चल था। उसमें चन्द्रमा, सूर्य अथवा वायु किसीके दर्शन नहीं होते थे। वह सोया हुआ-सा जान पड़ता था ।। ९ ।।
ततः सलिलमुत्पन्नं तमसीवापरं तमः ।
तस्माच्च सलिलोत्पीडादुदतिष्ठत मारुतः ।। १० ।।
'तदनन्तर आकाशसे जलकी उत्पत्ति हुई; मानो अन्धकारमें ही दूसरा अन्धकार प्रकट हुआ हो। उस जलप्रवाहसे वायुका उत्थान हुआ ।। १० ।।
यथा भाजनमच्छिद्रं निःशब्दमिव लक्ष्यते ।
तच्चाम्भसा पूर्यमाणं सशब्दं कुरुतेऽनिलः ।। ११ ।।
'जैसे कोई छिद्ररहित पात्र निःशब्द-सा लक्षित होता है; परंतु जब उसमें छिद्र करके जल भरा जाता है, तब वायु उसमें आवाज प्रकट कर देती है ।। ११ ।।
तथा सलिलसंरुद्धे नभसोऽन्ते निरन्तरे ।
भित्त्वार्णवतलं वायुः समुत्पतति घोषवान् ।। १२ ।।
'इसी प्रकार जलसे आकाशका सारा प्रान्त ऐसा अवरुद्ध हो गया था कि उसमें कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं था। तब उस एकार्णवके तलप्रदेशका भेदन करके बड़ी भारी आवाजके साथ वायुका प्राकट्य हुआ ।। १२ ।।
स एष चरते वायुरर्णवोत्पीडसम्भवः ।
आकाशस्थानमासाद्य प्रशान्तिं नाधिगच्छति ।। १३ ।।
'इस प्रकार समुद्रके जलसमुदायसे प्रकट हुई यह वायु सर्वत्र विचरने लगी और आकाशके किसी भी स्थानमें पहुँचकर वह शान्त नहीं हुई ।। १३ ।।
तस्मिन् वाय्वम्बुसंघर्षे दीप्ततेजा महाबलः । प्रादुर्भूदूर्ध्वशिखः कृत्वा निस्तिमिरं नभः ॥ १४ ॥ ‘वायु और जलके उस संघर्षसे अत्यन्त तेजोमय महाबली अग्निदेवका प्राकट्य हुआ, जिनकी लपटें ऊपरकी ओर उठ रही थीं। वह आग आकाशके सारे अन्धकारको नष्ट करके प्रकट हुई थी ॥ १४ ॥
अग्निः पवनसंयुक्तः खं समाक्षिपते जलम् । सोऽग्निमारुतसंयोगाद् घनत्वमुपपद्यते ॥ १५ ॥ ‘वायुका संयोग पाकर अग्नि जलको आकाशमें उछालने लगी; फिर वही जल अग्नि और वायुके संयोगसे घनीभूत हो गया ॥ १५ ॥
तस्याकाशे निपतितः स्नेहस्तिष्ठति योऽपरः । स संघातत्वमापन्नो भूमित्वमनुगच्छति ॥ १६ ॥ ‘उसका जो वह गीलापन आकाशमें गिरा, वही घनीभूत होकर पृथ्वीके रूपमें परिणत हो गया ॥ १६ ॥
रसानां सर्वगन्धानां स्नेहानां प्राणिनां तथा । भूमियोंनिरिह ज्ञेया यस्यां सर्वं प्रसूयते ॥ १७ ॥ ‘इस पृथ्वीको सम्पूर्ण रसों, गन्धों, स्नेहों तथा प्राणियोंका कारण समझना चाहिये। इसीसे सबकी उत्पत्ति होती है’ ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे मानसभूतोत्पत्तिकथने त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु और भरद्वाजसंवादके प्रसंगमें मानसभूतोंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥
पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
पञ्चमहाभूतोंके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन
भरद्वाज उवाच
त एते धातवः पञ्च ब्रह्मा यानसृजत् पुरा ।
आवृता यैरिमे लोका महाभूताभिसंज्ञिताः ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा— भगवन्! लोकमें ये पाँच धातु ही 'महाभूत' कहलाते हैं, जिन्हें ब्रह्माने सृष्टिके आदिमें रचा था। ये ही इन समस्त लोकोंमें व्याप्त हैं ॥ १ ॥
यदासृजत् सहस्राणि भूतानां स महामतिः ।
पञ्चानामेव भूतत्वं कथं समुपपद्यते ॥ २ ॥
परंतु जब महाबुद्धिमान् ब्रह्माजीने और भी हजारों भूतोंकी रचना की है, तब इन पाँचको ही 'भूत' कहना कहाँतक युक्तिसंगत है? ॥ २ ॥
भृगुरुवाच
अमितानां महाशब्दो यान्ति भूतानि सम्भवम् ।
ततस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥ ३ ॥
भृगुजीने कहा— मुने! ये पाँच भूत ही असीम हैं, इसलिये इन्हींके साथ 'महा' शब्द जोड़ा जाता है। इन्हींसे भूतोंकी उत्पत्ति होती है; अतः इन्हींके लिये 'महाभूत' शब्दका प्रयोग सुसंगत है ॥ ३ ॥
चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः ।
पृथिवी चात्र संघातः शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥ ४ ॥
प्राणियोंका शरीर इन पाँच महाभूतोंका ही संघात है। इसमें जो चेष्टा या गति है, वह वायुका भाग है। जो खोखलापन है, वह आकाशका अंश है। ऊष्मा (गर्मी) अग्निका अंश है। लोहू आदि तरल पदार्थ जलके अंश हैं और हड्डी, मांस आदि ठोस पदार्थ पृथ्वीके अंश हैं ॥ ४ ॥
इत्येतैः पञ्चभिर्भूतैर्युक्तं स्थावरजङ्गमम् ।
श्रोत्रं घ्राणं रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेन्द्रियसंज्ञिताः ॥ ५ ॥
इस प्रकार सारा स्थावर-जंगम जगत् इन पाँच भूतोंसे युक्त है। इन्हींके सूक्ष्म अंश श्रोत्र (कान), घ्राण (नासिका), रसना, त्वचा और नेत्र—इन पाँच इन्द्रियोंके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ५ ॥
भरद्वाज उवाच
पञ्चभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजङ्गमाः ।
स्थावराणां न दृश्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ॥ ६ ॥
**भरद्वाजने पूछा—**भगवन्! आपके कथनानुसार यदि समस्त स्थावर-जंगम पदार्थ इन पाँच महाभूतोंसे ही संयुक्त हैं तो स्थावरोंके शरीरोंमें तो पाँच भूत नहीं दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥
अनूष्मणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः ।
वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ॥ ७ ॥
वृक्षोंके शरीरमें गर्मी नहीं है, कोई चेष्टा भी नहीं है तथा वास्तवमें वे घन हैं; अतः उनके शरीरमें पाँचों भूतोंकी उपलब्धि नहीं होती है ॥ ७ ॥
न शृण्वन्ति न पश्यन्ति न गन्धरसवेदिनः ।
न च स्पर्शं विजानन्ति ते कथं पाञ्चभौतिकाः ॥ ८ ॥
वे न सुनते हैं, न देखते हैं, न गन्ध और रसका ही अनुभव करते हैं और न उन्हें स्पर्शका ही ज्ञान होता है; फिर वे पाञ्चभौतिक कैसे कहे जाते हैं? ॥ ८ ॥
अद्रवत्पादनग्नित्वादभूमित्वादवायुतः ।
आकाशस्याप्रमेयत्वाद् वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥ ९ ॥
उनमें न तो द्रवत्व देखा जाता है, न अग्निका अंश, न पृथ्वी और वायुका ही भाग उपलब्ध होता है। आकाश तो अप्रमेय है; अतः वह भी वृक्षोंमें नहीं है, इसलिये वृक्षोंकी पाञ्चभौतिकता नहीं सिद्ध होती है ॥ ९ ॥
भृगुरुवाच
घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः ।
तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपद्यते ॥ १० ॥
**भृगुजीने कहा—**मुने! यद्यपि वृक्ष ठोस जान पड़ते हैं तो भी उनमें आकाश हैं, इसमें संशय नहीं है। इसीसे उनमें नित्यप्रति फल-फूल आदिकी उत्पत्ति सम्भव हो सकती है ॥ १० ॥
ऊष्मतो म्लायते पर्णं त्वक् फलं पुष्पमेव च ।
म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥ ११ ॥
वृक्षोंके भीतर जो ऊष्मा या गर्मी है, उसीसे उनके पत्ते, छाल, फल फूल, कुम्हलाते हैं, मुरझाकर झड़ जाते हैं; इससे उनमें स्पर्शका होना भी सिद्ध होता है ॥ ११ ॥
वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्यते ।
श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वन्ति पादपाः ॥ १२ ॥
यह भी देखा जाता है कि वायु, अग्नि और बिजलीकी कड़क आदि भीषण शब्द होनेपर वृक्षोंके फल-फूल झड़कर गिर जाते हैं। शब्दका ग्रहण तो श्रवणेन्द्रियसे ही होता है; इससे यह सिद्ध हुआ कि वृक्ष भी सुनते हैं ॥ १२ ॥
वल्ली वेष्टयते वृक्षं सर्वतश्चैव गच्छति । न ह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात् पश्यन्ति पादपाः ॥ १३ ॥ लता वृक्षको चारों ओरसे लपेट लेती है और उसके ऊपरी भागतक चढ़ जाती है। बिना देखे किसीको अपने जानेका मार्ग नहीं मिल सकता; इससे सिद्ध है कि वृक्ष देखते भी हैं ॥ १३ ॥
पुण्यापुण्यैस्तथा गन्धैर्धूपैश्च विविधैरपि । अर्रोगाः पुष्पिताः सन्ति तस्माज्जिघ्रन्ति पादपाः ॥ १४ ॥ पवित्र और अपवित्र गन्धसे तथा नाना प्रकारके धूपोंकी गन्धसे वृक्ष नीरोग होकर फूलने-फलने लग जाते हैं; इससे प्रमाणित होता है कि वृक्ष भी सूँघते हैं ॥ १४ ॥
पादैः सलिलपानाच्च व्याधीनां चापि दर्शनात् । व्याधिप्रतिक्रियत्वाच्च विद्यते रसनं द्रुमे ॥ १५ ॥ वृक्ष अपनी जड़से जल पीते हैं और कोई रोग होनेपर जड़में ओषधि डालकर उनकी चिकित्सा भी की जाती है; इससे सिद्ध है कि वृक्षमें रसनेन्द्रिय भी है ॥ १५ ॥
वक्त्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत् । तथा पवनसंयुक्तः पादैः पिबति पादपः ॥ १६ ॥ जैसे मनुष्य कमलकी नाल मुँहमें लगाकर उसके द्वारा ऊपरको जल खींचता है, उसी तरह वायुकी सहायतासे युक्त वृक्ष अपनी जड़ोंद्वारा ऊपरकी ओर पानी खींचता है ॥ १६ ॥
सुखदुःखयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात् । जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥ १७ ॥ वृक्ष कट जानेपर उनमें नया अंकुर उत्पन्न हो जाता है और वे सुख-दुःखको ग्रहण करते हैं। इससे मैं देखता हूँ कि वृक्षोंमें जीव भी हैं। वे अचेतन नहीं हैं ॥ १७ ॥
तेन तज्जलमादत्तं जरयत्यग्निमारुतौ । आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥ १८ ॥ वृक्ष अपनी जड़से जो जल खींचता है, उसे उसके अंदर रहनेवाली वायु और अग्नि पचाती है। आहारका परिपाक होनेसे वृक्षमें स्निग्धता आती है और वे बढ़ते हैं ॥ १८ ॥
जङ्गमानां च सर्वेषां शरीरे पञ्च धातवः । प्रत्येकशः प्रभिद्यन्ते यैः शरीरं विचेष्टते ॥ १९ ॥ समस्त जंगमोंके शरीरोंमें भी पाँच भूत रहते हैं; परंतु वहाँ उनके स्वरूपमें भेद होता है। उन पाँच भूतोंके सहयोगसे ही शरीर चेष्टाशील होता है ॥ १९ ॥
त्वक् च मांसं तथास्थीनि मज्जा स्नायुश्च पञ्चमम् । इत्येतदिह संघातं शरीरे पृथिवीमयम् ॥ २० ॥
शरीरमें त्वचा, मांस, हड्डी, मज्जा और स्नायु—इन पाँच वस्तुओंका समुदाय पृथ्वीमय है ॥ २० ॥
तेजो ह्यग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च ।
अग्निर्जरयते यश्च पञ्चाग्नेयाः शरीरिणः ॥ २१ ॥
तेज, क्रोध, नेत्र, ऊष्मा और जठरानल—ये पाँच वस्तुएँ देहधारियोंके शरीरमें अग्निमय हैं ॥ २१ ॥
श्रोत्रं घ्राणं तथाऽऽस्यं च हृदयं कोष्ठमेव च ।
आकाशात् प्राणिनामेते शरीरे पञ्च धातवः ॥ २२ ॥
कान, नासिका, मुख, हृदय और उदर प्राणियोंके शरीरमें ये पाँच धातुमय खोखलापन आकाशसे उत्पन्न हुए हैं— ॥ २२ ॥
श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च ।
इत्यापः पञ्चधा देहे भवन्ति प्राणिनां सदा ॥ २३ ॥
कफ, पित्त, स्वेद, चर्बी और रुधिर—ये प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाली पाँच गीली वस्तुएँ जलरूप हैं ॥ २३ ॥
प्राणात् प्रणीयते प्राणी व्यानाद् व्यायच्छते तथा ।
गच्छत्यपानोऽधश्चैव समानो हृद्यवस्थितः ॥ २४ ॥
उदानादुच्छ्वसिति च प्रतिभेदाच्च भाषते ।
इत्येते वायवः पञ्च चेष्टयन्तीह देहिनम् ॥ २५ ॥
प्राणसे प्राणी चलने-फिरनेका काम करता है, व्यानसे व्यायाम (बलसाध्य उद्यम) करता है, अपान वायु ऊपरसे नीचेकी ओर जाती है, समान वायु हृदयमें स्थित होती है, उदानसे पुरुष उच्छ्वास लेता है और कण्ठ, तालु आदि स्थानोंके भेदसे शब्दों एवं अक्षरोंका उच्चारण करता है। इस प्रकार ये पाँच वायुके परिणाम हैं, जो शरीरधारीको चेष्टाशील बनाते हैं ॥ २४-२५ ॥
भूमेर्गन्धगुणान् वेत्ति रसं चाद्भ्यः शरीरवान् ।
ज्योतिषा चक्षुषा रूपं स्पर्शं वेत्ति च वाहिना ॥ २६ ॥
जीव भूमिसे ही (अर्थात् घ्राणेन्द्रियद्वारा) गन्ध गुणका अनुभव करता है, जलसम्बन्धी इन्द्रिय रसनासे शरीरधारी पुरुष रसका आस्वादन करता है, तेजोमय नेत्रके द्वारा रूपका तथा वायुसम्बन्धी त्वगिन्द्रियके द्वारा उसे स्पर्शका ज्ञान होता है ॥ २६ ॥
गन्धः स्पर्शो रसो रूपं शब्दश्चात्र गुणाः स्मृताः ।
तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान् गुणान् ॥ २७ ॥
गन्ध, स्पर्श, रस, रूप और शब्द—ये पृथ्वीके गुण माने गये हैं। इनमेंसे प्रधान गन्धके गुणोंका मैं विस्तार-पूर्वक वर्णन करता हूँ ॥ २७ ॥
इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरः कटुरेव च ।
निहारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च ॥ २८ ॥
एवं नवविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्धविस्तरः ।
अनुकूल, प्रतिकूल, मधुर, कटु, निहारी अर्थात् दूरसे आनेवाली, तेज गन्धमिश्रित, स्निग्ध, रूक्ष और विशद—ये गन्धके नौ भेद जानने चाहिये। इस प्रकार पार्थिव गन्धका विस्तार बताया गया ॥ २८ १/२ ॥
ज्योतिः पश्यति चक्षुर्भ्यां स्पर्शं वेत्ति च वायुना ॥ २९ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः ।
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३० ॥
मनुष्य दोनों नेत्रोंसे रूपको देखता है और त्वगिन्द्रियसे स्पर्शका अनुभव करता है। शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये जलके गुण माने गये हैं। उनमें प्रधान गुण रस है, उसकी जानकारीके लिये अब मैं उसके भेदोंका वर्णन करता हूँ। तुम उसे मेरे मुँहसे सुनो ॥ २९-३० ॥
रसो बहुविधः प्रोक्त ऋषिभिः प्रथितात्मभिः ।
मधुरो लवणस्तिक्तः कषायोऽम्लः कटुस्तथा ॥ ३१ ॥
उदारचेता महर्षियोंने रसके अनेक भेद बताये हैं—मधुर, लवण, तिक्त, कषाय, अम्ल और कटु। इन छः रूपोंमें विस्तारको प्राप्त हुआ रस जलमय माना गया है ॥ ३१ ॥
एष षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ॥ ३२ ॥
ज्योतिः पश्यति रूपाणि रूपं च बहुधा स्मृतम् ।
शब्द, स्पर्श और रूप—ये अग्निके तीन गुण बताये जाते हैं। ज्योतिर्मय नेत्र रूपको देखते हैं। अग्निके प्रधान गुण रूपको भी अनेक प्रकारका माना गया है ॥ ३२ १/२ ॥
ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणुवृत्तवान् ॥ ३३ ॥
शुक्लः कृष्णस्तथा रक्तः पीतो नीलारुणस्तथा ।
कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो मृदुदारुणः ॥ ३४ ॥
एवं षोडशविस्तारो ज्योतिरूपगुणः स्मृतः ।
ह्रस्व दीर्घ, स्थूल, चौकोर और सब ओरसे गोल, सफेद, काला, लाल, पीला और आकाशकी भाँति नीला, कठिन, चिक्कण, अल्प, पिच्छिल, मृदु और दारुण—इस प्रकार ज्योतिर्मय रूप नामक गुण सोलह भेदोंमें विस्तारको प्राप्त हुआ है ॥ ३३-३४ १/२ ॥
शब्दस्पर्शौ च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत ॥ ३५ ॥
वायव्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः ।
वायुके दो गुण जानने चाहिये—शब्द और स्पर्श। वायुका प्रमुख गुण स्पर्श ही है, जिसके अनेक भेद माने गये हैं— ॥ ३५ १/२ ॥
उष्णः शीतः सुखो दुःखः स्निग्धो विशद एव च ॥ ३६ ॥
तथा खरो मृदू रूक्षो लघुर्गुरुतरोऽपि च । एवं द्वादशधा स्पर्शो वायव्यो गुण उच्यते ॥ ३७ ॥ उष्ण, शीत, सुख, दुःख, स्निग्ध, विशद, खर, मृदु, रूक्ष, हलका, भारी और अधिक भारी—इस प्रकार वायु-सम्बन्धी स्पर्श गुणके बारह भेद कहे जाते हैं ॥ ३६-३७ ॥
तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् । तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तरं विविधात्मकम् ॥ ३८ ॥ षड्ज ऋषभगान्धारौ मध्यमो धैवतस्तथा । पञ्चमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान् ॥ ३९ ॥ एष सप्तविधः प्रोक्तो गुण आकाशसम्भवः । आकाशका एकमात्र गुण शब्द ही माना गया है। उस शब्दगुणका अनेक भेदोंमें जो विस्तार हुआ है, उसका वर्णन करता हूँ—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद—ये आकाशजनित शब्द गुणके सात भेद बताये गये हैं, जिन्हें जानना चाहिये ॥ ३८-३९ १/२ ॥
ऐश्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु ॥ ४० ॥ मृदङ्गभेरीशङ्खानां स्तनयित्नो रथस्य च । यः कश्चिच्छूयते शब्दः प्राणिनोऽप्राणिनोऽपि वा । एतेषामेव सर्वेषां विषये सम्प्रकीर्तितः ॥ ४१ ॥ अपने व्यापक स्वरूपसे तो शब्द सर्वत्र है, किंतु पटह (नगाड़े) आदिमें इसकी विशेषरूपसे अभिव्यक्ति होती है। मृदंग, भेरी, शंख, मेघ तथा रथकी घर्घरहाट आदिमें जो कुछ शब्द सुना जाता है और जड या चेतनका जो कुछ भी शब्द श्रवणगोचर होता है, वह सब इन सात भेदोंके ही अन्तर्गत बताया गया है ॥ ४०-४१ ॥
एवं बहुविधाकारः शब्द आकाशसम्भवः । आकाशजं शब्दमाहुरेभिर्वायुगुणैः सह ॥ ४२ ॥ इस प्रकार आकाशजनित शब्दके अनेक भेद हैं। वायुसम्बन्धी गुणोंके साथ ही आकाशजनित शब्द होता है; ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं ॥ ४२ ॥
अव्याहतैश्चेतयते न वेत्ति विषमस्थितैः । आप्याय्यन्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः ॥ ४३ ॥ जब वायुसम्बन्धी गुण बाधित न होकर शब्दके साथ रहता है, तब मनुष्य शब्दको सुनता और समझता है; किंतु जब वायुसम्बन्धी गुण दीवार अथवा प्रतिकूल वायुसे बाधित होकर विषम अवस्थामें स्थित हो जाते हैं, तब शब्दका ग्रहण नहीं होता है। वे शब्द आदिके उत्पादक धातु (इन्द्रियगोलक) धातुओं (इन पाँचों भूतों) द्वारा ही पोषित होते हैं ॥ ४३ ॥
आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु । मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिताः ॥ ४४ ॥
जल, अग्नि और वायु—ये तीन तत्त्व सदा देहधारियोंमें जाग्रत् रहते हैं। ये ही शरीरके मूल हैं और प्राणोंमें ओत-प्रोत होकर शरीरमें स्थित रहते हैं ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥
शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
शरीरके भीतर जठरानल तथा प्राण-अपान आदि वायुओंकी स्थिति आदिका वर्णन
भरद्वाज उवाच
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं प्रभो । अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥ १ ॥ **भरद्वाजने पूछा—**प्रभो! शरीरके भीतर रहनेवाली अग्नि पार्थिव धातु (पांचभौतिक देह) का आश्रय लेकर कैसे रहती है और वायु भी उसी पार्थिव धातुका आश्रय लेकर अवकाश-विशेषके द्वारा देहको कैसे चेष्टाशील बनाती है? ॥ १ ॥
भृगुरुवाच
वायोर्गतिमहं ब्रह्मन् कथयिष्यामि तेऽनघ । प्राणिनामनिलो देहान् यथा चेष्टयते बली ॥ २ ॥ **भृगुने कहा—**ब्रह्मन्! निष्पाप महर्षे! मैं तुमसे वायुकी गतिका वर्णन करता हूँ। प्रबल वायु प्राणियोंके शरीरोंको किस प्रकार चेष्टाशील बनाती है? यह बताता हूँ ॥ २ ॥
श्रितो मूर्धानमात्मा तु शरीरं परिपालयन् । प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥ ३ ॥ आत्मा मस्तकके रन्ध्रस्थानमें स्थित होकर सम्पूर्ण शरीरकी रक्षा करता है और प्राण मस्तक तथा अग्नि दोनोंमें स्थित होकर शरीरको चेष्टाशील बनाता है ॥ ३ ॥
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयश्च सः ॥ ४ ॥ वह प्राणसे संयुक्त आत्मा ही जीव है, वही सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा सनातन पुरुष है। वही मन, बुद्धि, अहंकार, पाँचों भूत और विषयरूप हो रहा है ॥ ४ ॥
एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिचाल्यते । पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥ ५ ॥ इस प्रकार (जीवात्मासे संयुक्त हुए) प्राणके द्वारा शरीरके भीतरके समस्त विभाग तथा इन्द्रिय आदि सारे बाह्य अंग परिचालित होते हैं। तत्पश्चात् समान वायुके रूपमें परिणत हो प्राण ही अपनी-अपनी गतिके आश्रित शरीरका संचालक होता है ॥ ५ ॥
बस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं चाप्यपानः परिवर्तते ॥ ६ ॥
अपान वायु जठरानल, मूत्राशय और गुदाका आश्रय ले मल एवं मूत्रको निकालता हुआ ऊपरसे नीचेको घूमता रहता है ॥ ६ ॥
प्रयत्ने कर्मणि बले य एकस्त्रिषु वर्तते ।
उदान इति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ॥ ७ ॥
जिस एक ही वायुकी प्रयत्न, कर्म और बल तीनोंमें प्रवृत्ति होती है, उसे अध्यात्मतत्त्वके जाननेवाले पुरुषोंने उदान कहा है ॥ ७ ॥
संधिष्वपि च सर्वेषु संनिविष्टस्तथानिलः ।
शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥ ८ ॥
जो मनुष्योंके शरीरोंमें और उनकी समस्त संधियोंमें भी व्याप्त है, उस वायुको 'व्यान' कहते हैं ॥ ८ ॥
धातुष्वग्निस्तु विततः समानेन समीरिताः ।
रसान् धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन्नवतिष्ठते ॥ ९ ॥
शरीरके समस्त धातुओंमें व्याप्त जो अग्नि है, वह समान वायुद्वारा संचालित होती है। वह समान वायु ही शरीरगत रसों, धातुओं (इन्द्रियों) और दोषों (कफ आदि) का संचालन करती हुई सम्पूर्ण शरीरमें स्थित है ॥ ९ ॥
अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमाहितः ।
समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्पचति पावकः ॥ १० ॥
अपान और प्राणके मध्यभाग (नाभि) में प्राण और अपान दोनोंका आश्रय लेकर स्थित हुआ जठरानल खाये हुए अन्नको भलीभाँति पचाता है ॥ १० ॥
आस्यं हि पायुपर्यन्तमन्ते स्याद् गुदसंज्ञितम् ।
स्रोतस्तस्मात् प्रजायन्ते सर्वस्रोतांसि देहिनाम् ॥ ११ ॥
मुखसे लेकर पायु (गुदा) तक जो महान् स्रोत (प्राणके प्रवाहित होनेका मार्ग) है, वही अन्तिम छोरमें गुदाके नामसे प्रसिद्ध है। उसी महान् स्रोतसे देहधारियोंके अन्य सभी छोटे-छोटे स्रोत (प्राणोंके संचरणके मार्ग अथवा नाडीसमुदाय) प्रकट होते हैं ॥ ११ ॥
प्राणानां संनिपाताच्च संनिपातः प्रजायते ।
ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥ १२ ॥
उन स्रोतोंद्वारा सारे अंगोंमें प्राणोंका सम्बन्ध या प्रसार होनेसे उसके साथ रहनेवाले जठरानलका भी सम्बन्ध या प्रसार हो जाता है। प्राणियोंके शरीरमें जो गर्मीका अनुभव होता है, उसे उस जठरानलका ही ताप समझना चाहिये। वही देहधारियोंके खाये हुए अन्नको पचाता है ॥ १२ ॥
अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते ।
स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥ १३ ॥
अग्निके वेगसे बहता हुआ प्राण गुदाके निकट जाकर प्रतिहत हो जाता है; फिर ऊपरकी ओर लौटकर समीपवर्ती अग्निको भी ऊपर उठा देता है ।। १३ ।।
पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः ।
नाभिमध्ये शरीरस्य सर्वे प्राणाश्च संस्थिताः ।। १४ ।।
नाभिसे नीचे पक्वाशय और ऊपर आमाशय स्थित है तथा नाभिके मध्यभागमें शरीरसम्बन्धी सभी प्राण स्थित हैं ।। १४ ।।
प्रस्थिता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ।
वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दश प्राणप्रचोदिताः ।। १५ ।।
वे समस्त प्राण हृदयसे इधर-उधर और ऊपर-नीचे प्रस्थान करते हैं; इसलिये दस* प्राणोंसे परिचालित होकर सारी नाड़ियाँ अन्नका रस वहन करती हैं ।। १५ ।।
एष मार्गोऽथ योगानां येन गच्छन्ति तत्पदम् ।
जितक्लमाः समा धीरा मूर्धन्यात्मानमादधन् ।। १६ ।।
यह मुखसे लेकर गुदातकका जो महान् स्रोत है, वह योगियोंका मार्ग है। उससे वे योगी परमपदको प्राप्त होते हैं, जिन्होंने सारे क्लेशोंको जीत लिया है, जो सर्वत्र समदर्शी और धीर हैं तथा जिन महात्माओंने सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा मस्तकमें पहुँचकर वहीं अपने-आपको स्थित कर दिया है ।। १६ ।।
एवं सर्वेषु विहितः प्राणापानेषु देहिनाम् ।
तस्मिन् समिध्यते नित्यमग्निः स्थाल्यामिवाहितः ।। १७ ।।
प्राणियोंके प्राण, अपान आदि सभी वायुओंमें स्थापित हुई जठराग्नि शरीरमें ही रहकर सदा अग्नि-कुण्डमें रखी हुई अग्निकी भाँति प्रज्वलित होती रहती है ।। १७ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८५ ।।
* प्राणवायुके दस भेद इस प्रकार हैं—प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान तथा नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय।
१८६-
षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
जीवकी सत्तापर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे शंका उपस्थित करना
भरद्वाज उवाच
यदि प्राणयते वायुर्वायुरेव विचेष्टते ।
श्वसित्याभाषते चैव तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा— भगवन्! यदि वायु ही प्राणीको जीवित रखती है, वायु ही शरीरको चेष्टाशील बनाती है, वही साँस लेती और वही बोलती भी है, तब तो इस शरीरमें जीवकी सत्ता स्वीकार करना व्यर्थ ही है ॥ १ ॥
यद्यूष्मभाव आग्नेयो वह्निना पच्यते यदि ।
अग्निर्जरयते चैतत् तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ २ ॥
यदि शरीरमें गर्मी अग्निका अंश है, यदि अग्निसे ही खाये हुए अन्नका परिपाक होता है, यदि अग्नि ही सबको जीर्ण करती है, तब तो जीवकी सत्ता मानना व्यर्थ ही है ॥ २ ॥
जन्तोः प्रमीयमाणस्य जीवो नैवोपलभ्यते ।
वायुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ॥ ३ ॥
जब किसी प्राणीकी मृत्यु होती है; तब वहाँ जीवकी उपलब्धि नहीं होती। प्राणवायु ही इस प्राणीका परित्याग करती है और शरीरकी गर्मी नष्ट हो जाती है ॥ ३ ॥
यदि वायुमयो जीवः संश्लेषो यदि वायुना ।
वायुमण्डलवद् दृश्यो गच्छेत् सह मरुद्गणैः ॥ ४ ॥
यदि जीव वायुमय है, यदि वायुसे उसका घनिष्ठ सम्पर्क है, तब तो वायुमण्डलके समान उसे प्रत्यक्ष अनुभवमें आना चाहिये। वह मृत्युके पश्चात् वायुके साथ ही जाता हुआ दिखायी देना चाहिये ॥ ४ ॥
संश्लेषो यदि वातेन यदि तस्मात् प्रणश्यति ।
महार्णवविमुक्तत्वादन्यत् सलिलभाजनम् ॥ ५ ॥
यदि वायुके साथ जीवका दृढ़ संयोग है और उसीके कारण वह वायुके साथ ही नष्ट हो जाता है, तब तो जैसे जलपात्रमें पत्थर भरकर उसे कोई समुद्रमें डाल दे और वह डूब जाय, उसी प्रकार वायुके सम्पर्कसे ही जीवका विनाश मानना पड़ेगा। उस दशामें जैसे प्रस्तरसे पृथक् जलपात्रकी उपलब्धि होती है, उसी प्रकार प्राणवायुसे पृथक् जीवकी उपलब्धि होनी चाहिये ॥ ५ ॥
कूपे वा सलिलं दद्यात् प्रदीपं वा हुताशने ।
क्षिप्रं प्रविश्य नश्येत यथा नश्यत्यसौ तथा ॥ ६ ॥ पञ्चधारणके ह्यस्मिन् शरीरे जीवितं कुतः । तेषामन्यतराभावाच्चतुर्णं नास्ति संशयः ॥ ७ ॥ अथवा जैसे कुआँमें जल गिराया जाय या जलती आगमें जला हुआ दीपक डाल दिया जाय, तो वे दोनों शीघ्र ही उनमें प्रविष्ट होकर अपना पृथक् अस्तित्व खो बैठते हैं। उसी प्रकार पांचभौतिक शरीरका नाश होनेपर जीव भी पाँचों तत्त्वमें विलीन होकर अपने पृथक् अस्तित्वसे रहित हो जाना चाहिये, ऐसा मान लेनेपर तो पाँच भूतोंसे धारण किये हुए इस शरीरमें जीव है ही कहाँ? अतः यह सिद्ध हुआ कि पांचभौतिक संघातसे भिन्न जीव नहीं है; उन पाँच तत्त्वोंमेंसे किसी एकका अभाव होनेपर शेष चारोंका भी अभाव हो जाता है—इसमें संशय नहीं है ॥ ६-७ ॥
नश्यन्त्यापो ह्यनाहाराद् वायुरुच्छ्वासनिग्रहात् । नश्यते कोष्ठभेदात् खमग्निर्नश्यत्यभोजनात् ॥ ८ ॥ जलका सर्वथा त्याग करनेसे शरीरके जलीय अंशका नाश हो जाता है, श्वास रुक जानेसे वायुका नाश होता है। उदरका भेदन होनेसे आकाशतत्त्व नष्ट होता है और भोजन बंद कर देनेसे शरीरके अग्नितत्त्वका नाश हो जाता है ॥ ८ ॥
व्याधिव्रणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते । पीडितेऽन्यतरे ह्येषां संघातॊ याति पञ्चधा ॥ ९ ॥ ज्वर आदि रोग, घाव तथा अन्यान्य प्रकारके क्लेशोंसे शरीरका पृथ्वीतत्त्व बिखर जाता है। इन पाँचों तत्त्वोंमेंसे एक तत्त्वको भी यदि हानि पहुँची तो इनका सारा संघात ही पंचत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
तस्मिन् पञ्चत्वमापन्ने जीवः किमनुधावति । किं वेदयति वा जीवः किं शृणोति ब्रवीति च ॥ १० ॥ पांचभौतिक संघात (शरीर) के नष्ट होनेपर यदि जीव है तो वह किसके पीछे दौड़ता है? क्या अनुभव करता है? क्या सुनता है और क्या बोलता है? ॥ १० ॥
एषा गौः परलोकस्थं तारयिष्यति मामिति । यो दत्त्वा म्रियते जन्तुः सा गौः कं तारयिष्यति ॥ ११ ॥ मृत्युके समय लोग इस आशासे गोदान करते हैं कि यह गौ परलोकमें जानेपर मुझे तार देगी; परंतु जीव तो गोदान करके मर जाता है; फिर वह गौ किसको तारेगी? ॥ ११ ॥
गौश्च प्रतिग्रहीता च दाता चैव समं यदा । इहैव विलयं यान्ति कुतस्तेषां समागमः ॥ १२ ॥ गौ, गोदान करनेवाला मनुष्य तथा उसको लेनेवाला ब्राह्मण—ये तीनों जब यहीं मर जाते हैं, तब परलोकमें उनका कैसे समागम होता है? ॥ १२ ॥
विहगैरुपभुक्तस्य शैलाग्रात् पतितस्य च ।
अग्निना चोपयुक्तस्य कुतः संजीवनं पुनः ॥ १३ ॥
इनमेंसे जो मरता है, उसे या तो पक्षी खा जाते हैं या वह पर्वतके शिखरसे गिरकर चूर-चूर हो जाता है अथवा आगमें जलकर भस्म हो जाता है। ऐसी दशामें उनका पुनः जीवित होना कैसे सम्भव है? ॥ १३ ॥
छिन्नस्य यदि वृक्षस्य न मूलं प्रतिरोहति ।
बीजान्यस्य प्रवर्तन्ते मृतः क्व पुनरेष्यति ॥ १४ ॥
यदि जड़से कटे हुए वृक्षका मूल फिर अंकुरित नहीं होता है, केवल उसके बीज ही जमते हैं, तब मरा हुआ मनुष्य फिर कहाँसे आ जायगा? ॥ १४ ॥
बीजमात्रं पुरा सृष्टं यदेतत् परिवर्तते ।
मृतामृताः प्रणश्यन्ति बीजाद् बीजं प्रवर्तते ॥ १५ ॥
पूर्वकालमें बीजमात्रकी सृष्टि हुई थी, जिससे यह जगत् चलता आ रहा है। जो लोग मर जाते हैं, वे तो नष्ट हो जाते हैं और बीजसे बीज पैदा होता रहता है ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जीवस्वरूपाक्षेपे
षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥
इस प्रकार महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जीवके स्वरूपपर आक्षेपविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥
१८७-
सप्तशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
जीवकी सत्ता तथा नित्यताको युक्तियोंसे सिद्ध करना
भृगुरुवाच
न प्रणाशोऽस्ति जीवस्य दत्तस्य च कृतस्य च ।
याति देहान्तरं प्राणी शरीरं तु विशीर्यते ॥ १ ॥
**भृगुजीने कहा—**ब्रह्मन्! जीवका तथा उसके दिये हुए दान एवं किये हुए कर्मका कभी नाश नहीं होता है। जीव तो दूसरे शरीरमें चला जाता है, केवल उसका छोड़ा हुआ शरीर ही यहाँ नष्ट होता है ॥ १ ॥
न शरीराश्रितो जीवस्तस्मिन् नष्टे प्रणश्यति ।
समिधामिव दग्धानां यथाग्निर्दृश्यते तथा ॥ २ ॥
शरीरके आश्रयसे रहनेवाला जीव उसके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता है। जैसे समिधाओंके आश्रित हुई आग उनके जल जानेपर भी देखी जाती है, उसी प्रकार जीवकी सत्ताका भी प्रत्यक्ष अनुभव होता है ॥ २ ॥
भरद्वाज उवाच
अग्नेर्यथा तथा तस्य यदि नाशो न विद्यते ।
इन्धनस्योपयोगान्ते स चाग्निर्नोपलभ्यते ॥ ३ ॥
**भरद्वाजने पूछा—**भगवन्! यदि अग्निके समान जीवका नाश नहीं होता तो ईंधनके जल जानेपर वह भी तो बुझ ही जाती है; फिर उसकी तो उपलब्धि नहीं होती है ॥ ३ ॥
नश्यतीत्येव जानामि शान्तमग्निमनिन्धनम् ।
गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते ॥ ४ ॥
अतः मैं ईंधनरहित बुझी हुई आगको यही समझता हूँ कि वह नष्ट हो गयी; क्योंकि जिसकी गति, प्रमाण अथवा स्थिति नहीं है, उसका नाश भी मानना पड़ता है। यही दशा जीवकी भी है ॥ ४ ॥
भृगुरुवाच
समिधामुपयोगान्ते यथाग्निर्नोपलभ्यते ।
आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्राह्यो हि निराश्रयः ॥ ५ ॥
**भृगुजीने कहा—**मुने! समिधाओंके जल जानेपर अग्निका नाश नहीं होता। वह आकाशमें अव्यक्तरूपसे स्थित हो जाती है, इसलिये उसकी उपलब्धि नहीं होती; क्योंकि
बिना किसी आश्रयके अग्निका ग्रहण होना अत्यन्त कठिन है ।। ५ ।। तथा शरीरसंत्यागे जीवो ह्याकाशवत् स्थितः । न गृह्यते तु सूक्ष्मत्वाद् यथा ज्योतिर्न संशयः ।। ६ ।। उसी प्रकार शरीरको त्याग देनेपर जीव आकाशकी भाँति स्थित होता है। वह अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण बुझी हुई आगके समान अनुभवमें नहीं आता, परंतु रहता अवश्य है; इसमें संशय नहीं है ।। ६ ।। प्राणान् धारयते ह्यग्निः स जीव उपधार्यताम् । वायुसंधारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् ।। ७ ।। अग्नि प्राणोंको धारण करती है। जीवको उस अग्निके समान ही ज्योतिर्मय समझो। उस अग्निको वायु देहके भीतर धारण किये रहती है। श्वास रुक जानेपर वायुके साथ-साथ अग्नि भी नष्ट हो जाती है ।। ७ ।। तस्मिन् नष्टे शरीराग्नौ ततो देहमचेतनम् । पतितं याति भूमित्वमयनं तस्य हि क्षितिः ।। ८ ।। जङ्गमानां हि सर्वेषां स्थावराणां तथैव च । आकाशं पवनोऽन्वेति ज्योतिस्तमनुगच्छति । तेषां त्रयाणामेकत्वाद् द्वयं भूमौ प्रतिष्ठितम् ।। ९ ।। उस शरीराग्निके नष्ट होनेपर अचेतन शरीर पृथ्वीपर गिरकर पार्थिवभावको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि पृथ्वी ही उसका आधार है। समस्त स्थावरों और जंगमोंकी प्राणवायु आकाशको प्राप्त होती है और अग्नि भी उस वायुका ही अनुसरण करती है। इस प्रकार आकाश, वायु और अग्नि—ये तीन तत्त्व एकत्र हो जाते हैं और जल तथा पृथ्वी—दो तत्त्व भूमिपर ही रह जाते हैं ।। ८-९ ।। यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत्र मारुतः । अमूर्तयस्ते विज्ञेया मूर्तिमन्तः शरीरिणाम् ।। १० ।। जहाँ आकाश होता है, वहीं वायुकी स्थिति होती है और जहाँ वायु होती है, वहीं अग्नि भी रहती है। ये तीनों तत्त्व यद्यपि निराकार हैं तथापि देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित होकर मूर्तिमान् समझे जाते हैं ।। १० ।।
भरद्वाज उवाच यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु । जीवः किंलक्षणस्तत्रेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ।। ११ ।। भरद्वाजने पूछा—निष्पाप मुनिवर! यदि देह-धारियोंके शरीरोंमें केवल अग्नि, वायु, भूमि, आकाश और जल-तत्त्व ही विद्यमान है तो उनमें रहनेवाले जीवके क्या लक्षण हैं? यह मुझे बताइये ।। ११ ।।