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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

फलार्थमूलं व्युच्छिद्येत् तेन नन्दन्ति शत्रवः ।
न चास्मै मानुषं कर्म दैवमस्योपवर्णय ॥ २१ ॥
शत्रुके राज्यमें जो फल-मूल और खेती आदि हो, उसे गुप्तरूपसे नष्ट करा दे। इससे उसके शत्रु प्रसन्न होते हैं। यह कार्य किसी मनुष्यका किया हुआ न बतावे। दैवी घटना कहकर इसका वर्णन करे ॥ २१ ॥

असंशयं दैवपरः क्षिप्रमेव विनश्यति ।
याजयैनं विश्वजिता सर्वस्वेन वियुज्य तम् ॥ २२ ॥
इसमें संदेह नहीं कि दैवका मारा हुआ मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। हो सके तो शत्रुको विश्वजित् नामक यज्ञमें लगा दो और उसके द्वारा दक्षिणारूपमें सर्वस्वदान कराकर उसे निर्धन बना दो ॥ २२ ॥

ततो गच्छसि सिद्धार्थःपीड्यमानं महाजनम् ।
योगधर्मविदं पुण्यं कंचिदस्योपवर्णयेत् ॥ २३ ॥
अपि त्यागं बुभूषेत कच्चिद् गच्छेदनामयम् ।
सिद्धैनौषधियोगेन सर्वशत्रुविनाशिना ।
नागानश्वांन् मनुष्यांश्च कृतकैरुपघातयेत् ॥ २४ ॥
इससे तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा। तदनन्तर तुम्हें कष्ट पाते हुए किसी श्रेष्ठपुरुषकी दुरवस्थाका और किसी योगधर्मके ज्ञाता पुण्यात्मा पुरुषकी महिमाका राजाके सामने वर्णन करना चाहिये, जिससे शत्रु राजा अपने राज्यको त्याग देनेकी इच्छा करने लगे। यदि कदाचित् वह प्रकृतिस्थ ही रह जाय, उसके ऊपर वैराग्यका प्रभाव न पड़े, तब अपने नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा सर्वशत्रुविनाशक सिद्ध औषधके प्रयोगसे शत्रुके हाथी, घोड़े और मनुष्योंको मरवा डालना चाहिये ॥ २३-२४ ॥

एते चान्ये च बहवो दम्भयोगाः सुचिन्तिताः ।
शक्या विषहता कर्तुं पुरुषेण कृतात्मना ॥ २५ ॥
राजकुमार! अपने मनको वशमें रखनेवाला पुरुष यदि धर्मविरुद्ध आचरण करना सह सके तो ये तथा और भी बहुत-से भलीभाँति सोचे हुए कपटपूर्ण प्रयोग हैं, जो उसके द्वारा किये जा सकते हैं ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥

* - जैसे कुत्ते बहुत जागते हैं, उसी तरह शत्रु की गतिविधको देखनेके लिये बराबर जागता रहे। जिस प्रकार हिरन बहुत चौकन्ने होते हैं, जरा भी भयकी आशंका होते ही भाग जाते हैं, उसी तरह हर समय सावधान रहे। भय आनेके पहले ही वहाँसे खिसक जाय। जैसे कौए प्रत्येक मनुष्यकी चेष्टा देखते रहते हैं, किसीको हाथ उठाते देख तुरंत उड़ जाते हैं; इसी प्रकार शत्रु की चेष्टा पर सदा दृष्टि रखे।

नाधर्मयुक्तानिच्छेयमर्थान् सुमहतोऽप्यहम् ॥ १ ॥

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षडधिकशततमोऽध्यायः

कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना

राजोवाच

न निकृत्या न दम्भेन ब्रह्मन्निच्छामि जीवितुम् ।
नाधर्मयुक्तानिच्छेयमर्थान् सुमहतोऽप्यहम् ॥ १ ॥
**राजाने कहा—**ब्रह्मन्! मैं कपट और दम्भका आश्रय लेकर जीवित नहीं रहना चाहता। अधर्मके सहयोगसे मुझे बहुत बड़ी सम्पत्ति मिलती हो तो भी मैं उसकी इच्छा नहीं करता ॥ १ ॥

पुरस्तादेव भगवन् मयैतदपवर्जितम् ।
येन मां नाभिशङ्केत येन कृत्स्नं हितं भवेत् ॥ २ ॥
भगवन्! मैंने तो पहलेसे ही इन सब दुर्गुणोंका परित्याग कर दिया है, जिससे किसीका मुझपर संदेह न हो और सबका सम्पूर्णरूपसे हित हो ॥ २ ॥

आनृशंस्येन धर्मेण लोके ह्यस्मिन् जिजीविषुः ।
नाहमेतदलं कर्तुं नैतत् त्वय्युपपद्यते ॥ ३ ॥
मैं दया-धर्मका आश्रय लेकर ही इस जगत्में जीना चाहता हूँ। मुझसे यह अधर्माचरण कदापि नहीं हो सकता, और ऐसा उपदेश देना आपको भी शोभा नहीं देता ॥ ३ ॥

मुनिरुवाच

उपपन्नस्त्वमेतेन यथा क्षत्रिय भाषसे ।
प्रकृत्या ह्युपपन्नोऽसि बुद्ध्या वा बहुदर्शनः ॥ ४ ॥
**मुनिने कहा—**राजकुमार! तुम जैसा कहते हो, वैसे ही गुणोंसे सम्पन्न भी हो। तुम धार्मिक स्वभावसे युक्त हो और अपनी बुद्धिके द्वारा बहुत कुछ देखने तथा समझनेकी शक्ति रखते हो ॥ ४ ॥

उभयोरेव वामर्थे यतिष्ये तव तस्य च ।
संश्लेषं वा करिष्यामि शाश्वतं ह्यनपायिनम् ॥ ५ ॥
मैं तुम्हारे और राजा जनक—दोनोंके ही हितके लिये अब स्वयं ही प्रयत्न करूँगा और तुम दोनोंमें ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करा दूँगा, जो अमिट और चिरस्थायी हो ॥ ५ ॥

त्वादृशं हि कुले जातमन्शंसं बहुश्रुतम् ।
अमात्यं को न कुर्वीत राज्यप्रणयकोविदम् ॥ ६ ॥

तुम्हारा जन्म उच्चकुलमें हुआ है। तुम दयालु, अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता तथा राज्यसंचालनकी कलामें कुशल हो। तुम्हारे-जैसे योग्य पुरुषको कौन अपना मन्त्री नहीं बनायेगा? ॥ ६ ॥

यस्त्वं प्रच्यावितो राज्याद् व्यसनं चोत्तमं गतः ।
आनृशंस्येन वृत्तेन क्षत्रियेच्छसि जीवितुम् ॥ ७ ॥
राजकुमार! तुम्हें राज्यसे भ्रष्ट कर दिया गया है। तुम बड़ी भारी विपत्तिमें पड़ गये हो तथापि तुमने क्रूरताको नहीं अपनाया, तुम दयायुक्त बर्तावसे ही जीवन बिताना चाहते हो ॥ ७ ॥

आगन्ता मद्गृहं तात वैदेहः सत्यसंगरः ।
अथाहं तं नियोक्ष्यामि तत् करिष्यत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
तात! सत्यप्रतिज्ञ विदेहराज जनक जब मेरे आश्रमपर पधारेंगे, उस समय मैं उन्हें जो भी आज्ञा दूँगा, उसे वे निःसंदेह पूर्ण करेंगे ॥ ८ ॥

तत आहूय वैदेहं मुनिर्वचनमब्रवीत् ।
अयं राजकुले जातो विदिताभ्यन्तरो मम ॥ ९ ॥
तदनन्तर मुनिने विदेहराज जनकको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहा—'राजन्! यह राजकुमार राज-वंशमें उत्पन्न हुआ है, इसकी आन्तरिक बातोंको भी मैं जानता हूँ ॥ ९ ॥

आदर्श इव शुद्धात्मा शारदश्चन्द्रमा यथा ।
नास्मिन् पश्यामि वृजिनं सर्वतो मे परीक्षितः ॥ १० ॥
'इसका हृदय दर्पणके समान शुद्ध और शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल है। मैंने इसकी सब प्रकारसे परीक्षा कर ली है। इसमें मैं कोई पाप या दोष नहीं देख रहा हूँ ॥ १० ॥

तेन ते संधिरेवास्तु विश्वासास्मिन् यथा मयि ।
न राज्यमनमात्येन शक्यं शास्तुमपि त्र्यहम् ॥ ११ ॥
'अतः इसके साथ अवश्य ही तुम्हारी संधि हो जानी चाहिये। तुम जैसा मुझपर विश्वास करते हो, वैसा ही इसपर भी करो। कोई भी राज्य बिना मन्त्रीके तीन दिन भी नहीं चलाया जा सकता ॥ ११ ॥

अमात्यः शूर एव स्याद् बुद्धिसम्पन्न एव वा ।
ताभ्यां चैवोभयं राजन् पश्य राज्यप्रयोजनम् ॥ १२ ॥
'मन्त्री वही हो सकता है, जो शूरवीर अथवा बुद्धिमान् हो। शौर्य और बुद्धिसे ही लोक और परलोक दोनोंका सुधार होता है। राजन्! उभयलोककी सिद्धि ही राज्यका प्रयोजन है। इसे अच्छी तरह देखो और समझो ॥ १२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 711)

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कालकवृक्षीय मुनि राजा जनकका राजकुमार क्षेमदर्शीके साथ मेल करा रहे हैं

धर्मात्मनां क्वचिल्लोके नान्यास्ति गतिरीदृशी ।
महात्मा राजपुत्रोऽयं सतां मार्गमनुष्ठितः ॥ १३ ॥
'जगत्में धर्मात्मा राजाओंके लिये अच्छे मन्त्रीके समान दूसरी कोई गति नहीं है। यह राजकुमार महामना है। इसने सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय लिया है ॥ १३ ॥
सुसंगृहीतस्त्वेवैष त्वया धर्मपुरोगमः ।
संसेव्यमानः शत्रूंस्ते गृह्णीयान्महतो गणान् ॥ १४ ॥
'यदि तुमने धर्मको सामने रखकर इसे सम्मान-पूर्वक अपनाया तो तुमसे सेवित होकर यह तुम्हारे शत्रुओंके भारी-से-भारी समुदायोंको काबूमें कर सकता है ॥ १४ ॥
यद्ययं प्रतियुद्ध्येत् त्वां स्वकर्म क्षत्रियस्य तत् ।
जिगीषमाणस्त्वां युद्धे पितृपैतामहे पदे ॥ १५ ॥
'यदि यह अपने बाप-दादोंके राज्यके लिये युद्धमें तुम्हें जीतनेकी इच्छा रखकर तुम्हारे साथ संग्राम छेड़ दे तो क्षत्रियके लिये यह स्वधर्मका पालन ही होगा ॥ १५ ॥
त्वं चापि प्रतियुद्ध्येथा विजिगीषुव्रते स्थितः ।
अयुध्वैव नियोगान्मे वशे कुरु हिते स्थितः ॥ १६ ॥
उस समय तुम भी विजयाभिलाषी राजाके व्रतमें स्थित हो इसके साथ युद्ध करोगे ही। अतः मेरी आज्ञा मानकर इसके हित-साधनमें तत्पर हो जाओ और युद्ध किये बिना ही इसे वशमें कर लो ॥ १६ ॥
स त्वं धर्ममवेक्षस्व हित्वा लोभमसाम्प्रतम् ।
न च कामान्न च द्रोहात् स्वधर्मं हातुमर्हसि ॥ १७ ॥
'अनुचित लोभका परित्याग करके तुम धर्मपर ही दृष्टि रखो, कामना अथवा द्रोहसे भी अपने धर्मका परित्याग न करो ॥ १७ ॥
नैव नित्यं जयस्तात नैव नित्यं पराजयः ।
तस्माद् भोजयितव्यश्च भोक्तव्यश्च परो जनः ॥ १८ ॥
'तात! किसीकी भी न तो सदा जय होती है और न नित्य पराजय ही होती है। जैसे राजा दूसरे मनुष्योंको जीतकर उसका तथा उसकी सम्पत्तिका उपभोग करता है, वैसे ही दूसरोंको भी उसे अपनी सम्पत्ति भोगनेका अवसर देना चाहिये ॥ १८ ॥
आत्मन्यपि च संदृश्यावुभौ जयपराजयौ ।
निःशेषकारिणां तात निःशेषकरणाद् भयम् ॥ १९ ॥
'वत्स! अपनेमें भी जय और पराजय दोनोंको देखना चाहिये। जो दूसरोंकी सम्पत्ति छीनकर उसके पास कुछ भी शेष नहीं रहने देते, उन्हें उस सर्वस्वापहरणरूपी पापसे अपने लिये भी सदा भय बना रहता है' ॥ १९ ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं वचनं ब्राह्मणर्षभम् ।
प्रतिपूज्याभिसत्कृत्य पूजार्हमनुमान्य च ॥ २० ॥

मुनिके इस प्रकार कहनेपर राजाने उन पूजनीय ब्राह्मणशिरोमणि महर्षिका पूजन और आदर-सत्कार करके उनकी बातका अनुमोदन करते हुए इस तरह उत्तर दिया ॥ २० ॥ यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयान्महाश्रुतः । श्रेयस्कामो यथा ब्रूयादुभयोरेव तत् क्षमम् ॥ २१ ॥ 'कोई महाबुद्धिमान्-जैसी बात कह सकता है, कोई महाविद्वान्-जैसी वाणी बोल सकता है, तथा दूसरोंका कल्याण चाहनेवाला महापुरुष जैसा उपदेश दे सकता है, वैसी ही बात आपने कही है। यह हम दोनोंके लिये ही शिरोधार्य करने योग्य है ॥ २१ ॥ यद् यद् वचनमुक्तोऽस्मि करिष्यामि च तत् तथा । एतद्धि परमं श्रेयो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ २२ ॥ 'भगवन्! आपने मेरे लिये जो-जो आदेश दिया है, उसका मैं उसी रूपमें पालन करूँगा। यह मेरे लिये परम कल्याणकी बात है। इसके सम्बन्धमें मुझे दूसरा कोई विचार नहीं करना है' ॥ २२ ॥ ततः कौसल्यमाहूय मैथिलो वाक्यमब्रवीत् । धर्मतो नीतितश्चैव लोकश्च विजितो मया ॥ २३ ॥ अहं त्वया चात्मगुणैर्जितः पार्थिवसत्तम । आत्मानमनवज्ञाय जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २४ ॥ तदनन्तर मिथिलानरेशने कोसल-राजकुमारको अपने निकट बुलाकर कहा—'नृपश्रेष्ठ! मैंने धर्म और नीतिका सहारा लेकर सम्पूर्ण जगत्पर विजय पायी है, परंतु आज तुमने अपने गुणोंसे मुझे भी जीत लिया। अतः तुम अपनी अवज्ञा न करके एक विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २३-२४ ॥ नावमन्यामि ते बुद्धिं नावमन्ये च पौरुषम् । नावमन्ये जयामीति जितवद् वर्ततां भवान् ॥ २५ ॥ 'मैं तुम्हारी बुद्धिका अनादर नहीं करता, तुम्हारे पुरुषार्थकी अवहेलना नहीं करता और विजयी हूँ, यह सोचकर तुम्हारा तिरस्कार भी नहीं करता; अतः तुम विजयी वीरके समान बर्ताव करो ॥ २५ ॥ यथावत् पूजितो राजन् गृहं गन्तासि मे भृशम् । ततः सम्पूज्य तौ विप्रं विश्वस्तौ जग्मतुर्गृहान् ॥ २६ ॥ 'राजन्! तुम मेरेद्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर मेरे घर पधारो।' इतना कहकर वे दोनों परस्पर विश्वस्त हो उन ब्रह्मर्षिकी पूजा करके घरकी ओर चल दिये ॥ २६ ॥ वैदेहस्त्वथ कौसल्यं प्रवेश्य गृहमञ्जसा । पाद्यार्घ्यमधुपर्कैस्तं पूजार्हं प्रत्यपूजयत् ॥ २७ ॥ विदेहराजने कोसल-राजकुमारको आदरपूर्वक अपने महलके भीतर ले जाकर अपने उस पूजनीय अतिथिका पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा मधुपर्कके द्वारा पूजन

किया ।। २७ ।।

ददौ दुहितरं चास्मै रत्नानि विविधानि च ।
एष राज्ञां परो धर्मोऽनित्यौ जयपराजयौ ।। २८ ।।

तत्पश्चात् उनके साथ अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया और दहेजमें नाना प्रकारके रत्न भेंट किये। यही राजाओंका परम धर्म है, जय और पराजय तो अनित्य हैं ।। २८ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कालकवृक्षीये षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय मुनिका उपदेशविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ।। १०६ ।।

गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति

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सप्ताधिकशततमोऽध्यायः

गणतन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति

युधिष्ठिर उवाच

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
धर्मवृत्तं च वित्तं च वृत्त्युपायाः फलानि च ।। १ ।।
राज्ञां वित्तं च कोशं च कोशसंचयनं जयः ।
अमात्यगुणवृत्तिश्च प्रकृतीनां च वर्धनम् ।। २ ।।
षाड्गुण्यगुणकल्पश्च सेनावृत्तिस्तथैव च ।
परिज्ञानं च दुष्टस्य लक्षणं च सतामपि ।। ३ ।।
समहीनाधिकानां च यथावल्लक्षणं च यत् ।
मध्यमस्य च तुष्ट्यर्थं यथा स्थेयं विवर्धता ।। ४ ।।
क्षीणग्रहणवृत्तिश्च यथाधर्मं प्रकीर्तितम् ।
लघुना देशरूपेण ग्रन्थयोगेन भारत ।। ५ ।।

युधिष्ठिरने कहा— परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं—उन सब लोगोंके यथावत् लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये—इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता—इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है ।। १—५ ।।

विजिगीषोस्तथा वृत्तमुक्तं चैव तथैव ते ।
गणानां वृत्तिमिच्छामि श्रोतुं मतिमतां वर ।। ६ ।।

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! आपने विजया-भिलाषी राजाके बर्तावका भी वर्णन कर दिया है। अब मैं गणों (गणतन्त्र राज्यों)-का बर्ताव एवं वृतान्त सुनना चाहता हूँ ।। ६ ।।

यथा गणाः प्रवर्धन्ते न भिद्यन्ते च भारत ।
अरींश्च विजिगीषन्ते सुहृदः प्राप्नुवन्ति च ।। ७ ।।

भारत! गणतन्त्र-राज्योंकी जनता जिस प्रकार अपनी उन्नति करती है, जिस प्रकार आपसमें मतभेद या फूट नहीं होने देती, जिस तरह शत्रुओंपर विजय पाना चाहती है और

जिस उपायसे उसे सुहृदोंकी प्राप्ति होती है—ये सारी बातें सुननेके लिये मेरी बड़ी इच्छा है॥ ७॥

भेदमूलो विनाशो हि गणानामुपलक्षये । मन्त्रसंवरणं दुःखं बहूनामिति मे मतिः ॥ ८॥ मैं देखता हूँ, संघबद्ध राज्योंके विनाशका मूल कारण है आपसकी फूट। मेरा विश्वास है कि बहुत-से मनुष्योंके जो समुदाय हैं, उनके लिये किसी गुप्त मन्त्रणा या विचारको छिपाये रखना बहुत ही कठिन है॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं निखिलेन परंतप । यथा च ते न भिद्येरंस्तच्च मे वद पार्थिव ॥ ९ ॥ 'परंतप राजन्! इन सारी बातोंको मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहता हूँ। किस प्रकार वे संघ या गण आपसमें फूटते नहीं हैं, यह मुझे बताइये ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच

गणानां च कुलानां च राज्ञां भरतसत्तम । वैरसंदीपनावेतौ लोभामर्षौ नराधिप ॥ १० ॥ भीष्मजीने कहा—भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! गणोंमें, कुलोंमें तथा राजाओंमें वैरकी आग प्रज्वलित करनेवाले ये दो ही दोष हैं—लोभ और अमर्ष ॥ १० ॥

लोभमेको हि वृणुते ततोऽमर्षमनन्तरम् । तौ क्षयव्ययसंयुक्तावन्योन्यं च विनाशिनौ ॥ ११॥ पहले एक मनुष्य लोभका वरण करता है (लोभवश दूसरेका धन लेना चाहता है), तदनन्तर दूसरेके मनमें अमर्ष पैदा होता है; फिर वे दोनों लोभ और अमर्षसे प्रभावित हुए व्यक्ति समुदाय, धन और जनकी बड़ी भारी हानि उठाकर एक-दूसरेके विनाशक बन जाते हैं॥ ११ ॥

चारमन्त्रबलादानैः सामदानविभेदनैः । क्षयव्ययभयोपायैः प्रकर्षन्तीतरेतरम् ॥ १२॥ वे भेद लेनेके लिये गुप्तचरोंको भेजते हैं, गुप्त मन्त्रणाएँ करते तथा सेना एकत्र करनेमें लग जाते हैं। साम, दान और भेदनीतिके प्रयोग करते हैं, तथा जन-संहार, अपार धनराशिके व्यय एवं अनेक प्रकारके भय उपस्थित करनेवाले विविध उपायोंद्वारा एक-दूसरेको दुर्बल कर देते हैं ॥ १२ ॥

तत्रादानेन भिद्यन्ते गणाः संघातवृत्तयः । भिन्ना विमनसः सर्वे गच्छन्त्यरिवशं भयात् ॥ १३ ॥ संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले गणराज्यके सैनिकोंको भी यदि समयपर भोजन और वेतन न मिले तो भी वे फूट जाते हैं। फूट जानेपर सबके मन एक-दूसरेके

विपरीत हो जाते हैं और वे सबके सब भयके कारण शत्रुओंके अधीन हो जाते हैं ॥ १३ ॥ भेदे गणा विनश्युर्हि भिन्नास्तु सुजयाः परैः । तस्मात् संघातयोगेन प्रयतेरन् गणाः सदा ॥ १४ ॥ आपसमें फूट होनेसे ही संघ या गणराज्य नष्ट हुए हैं। फूट होनेपर शत्रु उन्हें अनायास ही जीत लेते हैं; अतः गणोंको चाहिये कि वे सदा संघबद्ध—एकमत होकर ही विजयके लिये प्रयत्न करें ॥ १४ ॥ अर्थाश्चैवाधिगम्यन्ते संघातबलपौरुषैः । बाह्याश्च मैत्रीं कुर्वन्ति तेषु संघातवृत्तिषु ॥ १५ ॥ जो सामूहिक बल और पुरुषार्थसे सम्पन्न हैं, उन्हें अनायास ही सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थोंकी प्राप्ति हो जाती है। संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले लोगोंके साथ संघसे बाहरके लोग भी मैत्री स्थापित करते हैं ॥ ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति शुश्रूषन्तः परस्परम् । विनिवृत्ताभि संधानाः सुखमेधन्ति सर्वशः ॥ १६ ॥ ज्ञानवृद्ध पुरुष गणराज्यके नागरिकोंकी प्रशंसा करते हैं। संघबद्ध लोगोंके मनमें आपसमें एक-दूसरेको ठगनेकी दुर्भावना नहीं होती। वे सभी एक-दूसरेकी सेवा करते हुए सुखपूर्वक उन्नति करते हैं ॥ १६ ॥ धर्मिष्ठान् व्यवहारांश्च स्थापयन्तश्च शास्त्रतः । यथावत् प्रतिपश्यन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १७ ॥ गणराज्यके श्रेष्ठ नागरिक शास्त्रके अनुसार धर्मानुकूल व्यवहारोंकी स्थापना करते हैं। वे यथोचित दृष्टिसे सबको देखते हुए उन्नतिकी दिशामें आगे बढ़ते जाते हैं ॥ १७ ॥ पुत्रान् भ्रातॄन् निगृह्णन्तो विनयन्तश्च तान् सदा । विनीतांश्च प्रगृह्णन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ॥ १८ ॥ गणराज्यके श्रेष्ठ पुरुष पुत्रों और भाइयोंको भी यदि वे कुमार्गपर चलें तो दण्ड देते हैं। सदा उन्हें उत्तम शिक्षा प्रदान करते हैं और शिक्षित हो जानेपर उन सबको बड़े आदरसे अपनाते हैं। इसलिये वे विशेष उन्नति करते हैं ॥ १८ ॥ चारमन्त्रविधानेषु कोशसंनिचयेषु च । नित्ययुक्ता महाबाहो वर्धन्ते सर्वतो गणाः ॥ १९ ॥ महाबाहु युधिष्ठिर! गणराज्यके नागरिक गुप्तचर या दूतका काम करने, राज्यके हितके लिये गुप्त मन्त्रणा करने, विधान बनाने तथा राज्यके लिये कोश-संग्रह करने आदिके लिये सदा उद्यत रहते हैं, इसीलिये सब ओरसे उनकी उन्नति होती है ॥ १९ ॥ प्राज्ञान् शूरान् महोत्साहान् कर्मसु स्थिरपौरुषान् । मानयन्तः सदा युक्ता विवर्धन्ते गणा नृप ॥ २० ॥

नरेश्वर! संघराज्यके सदस्य सदा बुद्धिमान्, शूरवीर, महान् उत्साही और सभी कार्योंमें दृढ़ पुरुषार्थका परिचय देनेवाले लोगोंका सदा सम्मान करते हुए राज्यकी उन्नतिके लिये उद्योगशील बने रहते हैं। इसीलिये वे शीघ्र आगे बढ़ जाते हैं ।। २० ।।

द्रव्यवन्तश्च शूराश्च शस्त्रज्ञाः शास्त्रपारगाः ।
कृच्छ्रास्वापत्सु सम्मूढान् गणाः संतारयन्ति ते ।। २१ ।।
गणराज्यके सभी नागरिक धनवान्, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् होते हैं। वे कठिन विपत्तिमें पड़कर मोहित हुए लोगोंका उद्धार करते रहते हैं ।। २१ ।।

क्रोधो भेदो भयं दण्डः कर्षणं निग्रहो वधः ।
नयत्यरिवशं सद्यो गणान् भरतसत्तम ।। २२ ।।
भरतश्रेष्ठ! संघराज्यके लोगोंमें यदि क्रोध, भेद (फूट), भय, दण्डप्रहार, दूसरोंको दुर्बल बनाने, बन्धनमें डालने या मार डालनेकी प्रवृत्ति पैदा हो जाय तो वह उन्हें तत्काल शत्रुओंके वशमें डाल देती है ।। २२ ।।

तस्मान्मानयितव्यास्ते गणमुख्याः प्रधानतः ।
लोकयात्रा समायत्ता भूयसी तेषु पार्थिव ।। २३ ।।
राजन्! इसलिये तुम्हें गणराज्यके जो प्रधान-प्रधान अधिकारी हैं, उन सबका सम्मान करना चाहिये; क्योंकि लोकयात्राका महान् भार उनके ऊपर अवलम्बित है ।।

मन्त्रगुप्तिः प्रधानेषु चारश्चामित्रकर्षण ।
न गणाः कृत्स्नशो मन्त्रं श्रोतुमर्हन्ति भारत ।। २४ ।।
शत्रुसूदन! भारत! गण या संघके सभी लोग गुप्त मन्त्रणा सुननेके अधिकारी नहीं हैं। मन्त्रणाको गुप्त रखने तथा गुप्तचरोंकी नियुक्तिका कार्य प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंके ही अधीन होता है ।। २४ ।।

गणमुख्यैस्तु सम्भूय कार्यं गणहितं मिथः ।
पृथग्गणस्य भिन्नस्य विततस्य ततोऽन्यथा ।। २५ ।।
अर्थाः प्रत्यवसीदन्ति तथानर्था भवन्ति च ।
गणके मुख्य-मुख्य व्यक्तियोंको परस्पर मिलकर समस्त गणराज्यके हितका साधन करना चाहिये; अन्यथा यदि संघमें फूट होकर पृथक्-पृथक् कई दलोंका विस्तार हो जाय तो उसके सभी कार्य बिगड़ जाते और बहुत-से अनर्थ पैदा हो जाते हैं ।। २५ १/२ ।।

तेषामन्योन्यभिन्नानां स्वशक्तिमनुतिष्ठताम् ।। २६ ।।
निग्रहः पण्डितैः कार्यः क्षिप्रमेव प्रधानतः ।
परस्पर फूटकर पृथक्-पृथक् अपनी शक्तिका प्रयोग करनेवाले लोगोंमें जो मुख्य-मुख्य नेता हों, उनका संघराज्यके विद्वान् अधिकारियोंको शीघ्र ही दमन करना चाहिये ।। २६ १/२ ।।

कुलेषु कलहा जाताः कुलवृद्धैरुपेक्षिताः ।। २७ ।।
गोत्रस्य नाशं कुर्वन्ति गणभेदस्य कारकम् ।
कुलोंमें जो कलह होते हैं, उनकी यदि कुलके वृद्ध पुरुषोंने उपेक्षा कर दी तो वे कलह गणोंमें फूट डालकर समस्त कुलका नाश कर डालते हैं ।। २७ १/२ ।।
आभ्यन्तरं भयं रक्ष्यमसारं बाह्यतो भयम् ।। २८ ।।
आभ्यन्तरं भयं राजन् सद्यो मूलानि कृन्तति ।
भीतरी भय दूर करके संघकी रक्षा करनी चाहिये। यदि संघमें एकता बनी रहे तो बाहरका भय उसके लिये निःसार है (वह उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता)। राजन्! भीतरका भय तत्काल ही संघराज्यकी जड़ काट डालता है ।। २८ १/२ ।।
अकस्मात् क्रोधमोहाभ्यां लोभाद् वापि स्वभावजात् ।। २९ ।।
अन्योन्यं नाभिभाषन्ते तत्पराभवलक्षणम् ।
अकस्मात् पैदा हुए क्रोध और मोहसे अथवा स्वाभाविक लोभसे भी जब संघके लोग आपसमें बातचीत करना बंद कर दें, तब यह उनकी पराजयका लक्षण है ।। २९ १/२ ।।
जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा ।। ३० ।।
न चोद्योगेन बुद्ध्या वा रूपद्रव्येण वा पुनः ।
भेदाच्चैव प्रदानाच्च भिद्यन्ते रिपुभिर्गणाः ।। ३१ ।।
तस्मात् संघातमेवाहुर्गणानां शरणं महत् ।। ३२ ।।
जाति और कुलमें सभी एक समान हो सकते हैं; परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप-सम्पत्तिमें सबका एक-सा होना सम्भव नहीं है। शत्रुलोग गणराज्यके लोगोंमें भेदबुद्धि पैदा करके तथा उनमेंसे कुछ लोगोंको धन देकर भी समूचे संघमें फूट डाल देते हैं; अतः संघबद्ध रहना ही गणराज्यके नागरिकोंका महान् आश्रय है ।। ३०-३२ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि गणवृत्ते
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ।। १०७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें गणराज्यका बर्तावविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०७ ।।

महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत ।

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः

माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व

युधिष्ठिर उवाच

महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत ।
किंस्विदेवेह धर्माणांमनुष्ठेय तमं मतम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भारत! धर्मका यह मार्ग बहुत बड़ा है तथा इसकी बहुत-सी शाखाएँ हैं इन धर्मोंमेंसे किसको आप विशेषरूपसे आचरणमें लानेयोग्य समझते हैं? ॥ १ ॥

किं कार्यं सर्वधर्माणां गरीयो भवतो मतम् ।
यथाहं परमं धर्ममिह च प्रेत्य चाप्नुयाम् ॥ २ ॥
सब धर्मोंमें कौन-सा कार्य आपको श्रेष्ठ जान पड़ता है, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोकमें भी परम धर्मका फल प्राप्त कर सकूँ? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा बहुमता मम ।
इह युक्तो नरो लोकान् यशश्च महदश्नुते ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! मुझे तो माता-पिता तथा गुरुजनोंकी पूजा ही अधिक महत्त्वकी वस्तु जान पड़ती है। इसलोकमें इस पुण्य कार्यमें संलग्न होकर मनुष्य महान् यश और श्रेष्ठ लोक पाता है ॥ ३ ॥

यच्च तेऽभ्यनुजानीयुः कर्म तात सुपूजिताः ।
धर्माधर्मविरुद्धं वा तत् कर्तव्यं युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
तात युधिष्ठिर! भलीभाँति पूजित हुए वे माता-पिता और गुरुजन जिस कामके लिये आज्ञा दें, वह धर्मके अनुकूल हो या विरुद्ध, उसका पालन करना ही चाहिये ॥ ४ ॥

न च तैरभ्यनुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ।
यं च तेऽभ्यनुजानीयुः स धर्म इति निश्चयः ॥ ५ ॥
जो उनकी आज्ञाके पालनमें संलग्न है, उसके लिये दूसरे किसी धर्मके आचरणकी आवश्यकता नहीं है। जिस कार्यके लिये वे आज्ञा दें, वही धर्म है ऐसा धर्मात्माओंका निश्चय है ॥ ५ ॥

एत एव त्रयो लोका एत एवाश्रमास्त्रयः ।
एत एव त्रयो वेदा एत एव त्रयोऽग्नयः ॥ ६ ॥

ये माता-पिता और गुरुजन ही तीनों लोक हैं, यही तीनों आश्रम हैं, यही तीनों वेद हैं तथा ये ही तीनों अग्नयाँ हैं ॥ ६ ॥

पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुराहवनीयस्तु साग्निस्त्रेता गरीयसी ॥ ७ ॥
पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, माता दक्षिणाग्नि मानी गयी है और गुरु आहवनीय अग्निका स्वरूप है। लौकिक अग्नियोंसे माता-पिता आदि त्रिविध अग्नियोंका गौरव अधिक है ॥ ७ ॥

त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रींल्लोकांश्च विजेष्यसि ।
पितृवृत्त्या त्विमं लोकं मातृवृत्त्या तथा परम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मलोकं गुरोर्वृत्त्या नियमेन तरिष्यसि ।
यदि तुम इन तीनोंकी सेवामें कोई भूल नहीं करोगे तो तीनों लोकोंको जीत लोगे। पिताकी सेवासे इस लोकको, माताकी सेवासे परलोकको तथा नियमपूर्वक गुरुकी सेवासे ब्रह्मलोकको भी लाँघ जाओगे ॥ ८ १/२ ॥

सम्यगेतेषु वर्तस्व त्रिषु लोकेषु भारत ॥ ९ ॥
यशः प्राप्स्यसि भद्रं ते धर्मं च सुमहत्फलम् ।
भरतनन्दन! इसलिये तुम त्रिविध लोकस्वरूप इन तीनोंके प्रति उत्तम बर्ताव करो। तुम्हारा कल्याण हो। ऐसा करनेसे तुम्हें यश और महान् फल देनेवाले धर्म की प्राप्ति होगी ॥ ९ १/२ ॥

नैतानतिशयेज्जातु नात्यश्रीयान्न दूषयेत् ॥ १० ॥
नित्यं परिचरेच्चैव तद् वै सुकृतमुत्तमम् ।
कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम ॥ ११ ॥
इन तीनोंकी आज्ञाका कभी उल्लङ्घन न करे, इनको भोजन करानेके पहले स्वयं भोजन न करे, इनपर कोई दोषारोपण न करे और सदा इनकी सेवामें संलग्न रहे। यही सबसे उत्तम पुण्यकर्म है। नृपश्रेष्ठ! इनकी सेवासे तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तमलोक सब कुछ प्राप्त कर लोगे ॥ १०-११ ॥

सर्वे तस्यादृता लोका यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः ॥ १२ ॥
जिसने इन तीनोंका आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं ॥ १२ ॥

न चायं न परो लोकस्तस्य चैव परंतप ।
अमानिता नित्यमेव यस्यैते गुरुवस्त्रयः ॥ १३ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जिसने इन तीनों गुरुजनोंका सदा अपमान ही किया है, उसके लिये न तो यह लोक सुखद है और न परलोक ॥ १३ ॥

न चास्मिन्नपरे लोके यशस्तस्य प्रकाशते ।
न चान्यदपि कल्याणं परत्र समुदाहृतम् ॥ १४ ॥
न इस लोकमें और न परलोकमें ही उसका यश प्रकाशित होता है। परलोकमें जो अन्य कल्याणमय सुखकी प्राप्ति बतायी गयी है, वह भी उसे सुलभ नहीं होती है ॥ १४ ॥
तेभ्य एव हि यत् सर्वं कृत्वा च विसृजाम्यहम् ।
तदासीन्मे शतगुणं सहस्रगुणमेव च ॥ १५ ॥
तस्मान्मे सम्प्रकाशन्ते त्रयो लोका युधिष्ठिर ।
मैं तो सारा शुभ कर्म करके इन तीनों गुरुजनोंको ही समर्पित कर देता था। इससे मेरे उन सभी शुभ कर्मोंका पुण्य सौगुना और हजारगुना बढ़ गया है। युधिष्ठिर! इसीसे तीनों लोक मेरी दृष्टिके सामने प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १५ १/२ ॥
दशैव तु सदाऽऽचार्यः श्रोत्रियानतिरिच्यते ॥ १६ ॥
दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान् पिता दश ।
पितॄन् दश तु मातैका सर्वां वा पृथिवीमपि ॥ १७ ॥
गुरुत्वेनाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः ।
आचार्य सदा दस श्रोत्रियोंसे बढ़कर है। उपाध्याय (विद्यागुरु) दस आचार्योंसे अधिक महत्त्व रखता है, पिता दस उपाध्यायोंसे बढ़कर है और माताका महत्त्व दस पिताओंसे भी अधिक है। वह अकेली ही अपने गौरवके द्वारा सारी पृथ्‍वीको भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥
गुरुर्गरीयान् पितृतो मातृतश्चेति मे मतिः ॥ १८ ॥
उभौ हि मातापितरौ जन्मन्येवोपयुज्यतः ।
परंतु मेरा विश्वास यह है कि गुरुका पद पिता और मातासे भी बढ़कर है; क्योंकि माता-पिता तो केवल इस शरीरको जन्म देनेके ही उपयोगमें आते हैं ॥
शरीरमेव सृजतः पिता माता च भारत ॥ १९ ॥
आचार्यशिष्टा या जातिः सा दिव्या साजरामरा ।
भारत! पिता और माता केवल शरीरको ही जन्म देते हैं; परंतु आचार्यका उपदेश प्राप्त करके जो द्वितीय जन्म उपलब्ध होता है, वह दिव्य है, अजर-अमर है ॥ १९ १/२ ॥
अवध्या हि सदा माता पिता चाप्यपकारिणौ ॥ २० ॥
न संदुष्यति तत् कृत्वा न च ते दूषयन्ति तम् ।
धर्माय यतमानानां विदुर्देवा महर्षिभिः ॥ २१ ॥
पिता-माता यदि कोई अपराध करें तो भी वे सदा अवध्य ही हैं; क्योंकि पुत्र या शिष्य पिता-माता और गुरुका अपराध करके भी उनकी दृष्टिमें दूषित नहीं होते हैं। वे गुरुजन पुत्र या शिष्यपर स्नेहवश दोषारोपण नहीं करते; बल्कि सदा उसे धर्मके मार्गपर ही ले जानेका

प्रयत्न करते हैं। ऐसे पिता-माता आदि गुरुजनोंका महत्त्व महर्षियोंसहित देवता ही जानते हैं॥ २०-२१॥

यश्चावृणोत्यवितथेन कर्मणा ऋतं ब्रुवन्ननृतं सम्प्रयच्छन्। तं वै मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत् कृतमस्य जानन्॥ २२॥ जो सत्य कर्म (के द्वारा यथार्थ उपदेश) के द्वारा पुत्र या शिष्यको कवचकी भाँति ढक लेता है, सत्यस्वरूप वेदका उपदेश देता और असत्यकी रोक-थाम करता है, उस गुरुको ही पिता और माता समझे और उसके उपकारको जानकर कभी उससे द्रोह न करे॥ २२॥

विद्यां श्रुत्वा ये गुरुं नाद्रियन्ते प्रत्यासन्ना मनसा कर्मणा वा। तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं नान्यस्तेभ्यः पापकृदस्ति लोके। यथैव ते गुरुभिर्भावनीया- स्तथा तेषां गुरवोऽभ्यर्चनीयाः॥ २३॥ जो लोग विद्या पढ़कर गुरुका आदर नहीं करते, निकट रहकर मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुकी सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भके बालककी हत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है। संसारमें उनसे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं है। जैसे गुरुओंका कर्तव्य है, शिष्यको आत्मोन्नतिके पथपर पहुँचाना, उसी तरह शिष्योंका धर्म है गुरुओंका पूजन करना॥ २३॥

तस्मात् पूजयितव्याश्च संविभज्याश्च यत्नतः। गुरवोऽर्चयितव्याश्च पुराणं धर्ममिच्छता॥ २४॥ अतः जो पुरातन धर्मका फल पाना चाहते हैं, उन्हें चाहिये कि वे गुरुओंकी पूजा-अर्चा करें और प्रयत्नपूर्वक उन्हें आवश्यक वस्तुएँ लाकर दें॥ २४॥

येन प्रीणाति पितरं तेन प्रीतः प्रजापतिः। प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता॥ २५॥ मनुष्य जिस कर्मसे पिताको प्रसन्न करता है, उसीके द्वारा प्रजापति ब्रह्माजीभी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बर्तावसे वह माताको प्रसन्न कर लेता है, उसीके द्वारा समूची पृथिवीकी भी पूजा हो जाती है॥ २५॥

येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद् ब्रह्म पूजितम्। मातुतः पितृतश्चैव तस्मात् पूज्यतमो गुरुः॥ २६॥ जिस कर्मसे शिष्य उपाध्याय (विद्यागुरु) को प्रसन्न करता है, उसीके द्वारा परब्रह्म परमात्माकी पूजा सम्पन्न हो जाती है; अतः गुरु माता-पितासे भी अधिक पूजनीय

है ।। २६ ।।
ऋषयश्च हि देवाश्च प्रीयन्ते पितृभिः सह ।
पूज्यमानेषु गुरुषु तस्मात् पूज्यतमो गुरुः ।। २७ ।।
गुरुओंके पूजित होनेपर पितरोंसहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं; इसलिये गुरु परम पूजनीय है ।।
केनचिन्न च वृत्तेन ह्यवज्ञेयो गुरुर्भवेत् ।
न च माता न च पिता मन्यते यादृशो गुरुः ।। २८ ।।
किसी भी बर्तावके कारण गुरु अपमानके योग्य नहीं होता। इसी तरह माता और पिता भी अनादरके योग्य नहीं हैं। जैसे गुरु माननीय हैं, वैसे ही माता-पिता भी हैं ।।
न तेऽवमानमर्हन्ति न तेषां दूषयेत् कृतम् ।
गुरूणामेव सत्कारं विदुर्देवा महर्षिभिः ।। २९ ।।
वे तीनों कदापि अपमानके योग्य नहीं हैं। उनके किये हुए किसी भी कार्यकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। गुरुजनोंके इस सत्कारको देवता और महर्षि भी अपना सत्कार मानते हैं ।। २९ ।।
उपाध्यायं पितरं मातरं च
येऽभिद्रुह्यन्ते मनसा कर्मणा वा ।
तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं
तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ।। ३० ।।
अध्यापक, पिता और माताके प्रति जो मन-वाणी और क्रियाद्वारा द्रोह करते हैं, उन्हें भ्रूणहत्यासे भी महान् पाप लगता है। संसारमें उससे बढ़कर दूसरा कोई पापाचारी नहीं है ।। ३० ।।
भृतो वृद्धो यो न बिभर्ति पुत्रः
स्वयोनिजः पितरं मातरं च ।
तद् वै पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं
तस्मान्नान्यः पापकृदस्ति लोके ।। ३१ ।।
जो पिता-माताका औरस पुत्र है और पाल-पोसकर बड़ा कर दिया गया है, वह यदि अपने माता-पिताका भरण-पोषण नहीं करता है तो उसे भ्रूणहत्यासे भी बढ़कर पाप लगता है और जगत्में उससे बड़ा पापात्मा दूसरा कोई नहीं है ।। ३१ ।।
मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य स्त्रीघ्नस्य गुरुघातिनः ।
चतुर्णां वयमेतेषां निष्कृतिं नानुशुश्रुम ।। ३२ ।।
मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्रीहत्यारे और गुरुघाती—इन चारोंके पापका प्रायश्चित्त हमारे सुननेमें नहीं आया है ।।
एतत्सर्वमनिर्देशनैवमुक्तं

यत् कर्तव्यं पुरुषेणेह लोके । एतच्छ्रेयो नान्यदस्माद् विशिष्टं सर्वान् धर्माननुसृत्यैतदुक्तम् ॥ ३३ ॥

ये सारी बातें जो इस जगत्‌में पुरुषके द्वारा पालनीय हैं, यहाँ विस्तारके साथ बतायी गयी हैं। यही कल्याणकारी मार्ग है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है। सम्पूर्ण धर्मोंका अनुसरण करके यहाँ सबका सार बताया गया है ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि मातृपितृगुरुमाहात्म्ये अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें माता-पिता और गुरुका माहात्म्यविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥

सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन

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नवाधिकशततमोऽध्यायः

सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् नरो वर्तेत भारत ।
विद्वन् जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतनन्दन! धर्ममें स्थित रहनेकी इच्छावाला मनुष्य कैसा बर्ताव करे? विद्वन्! मैं इस बातको जानना चाहता हूँ। भरतश्रेष्ठ! आप मुझसे इसका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

सत्यं चैवानृतं चोभे लोकानावृत्य तिष्ठतः ।
तयोः किमाचरेद् राजन् पुरुषो धर्मनिश्चितः ॥ २ ॥
राजन्! सत्य और असत्य—ये दोनों सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं; किंतु धर्मपर विश्वास करनेवाला मनुष्य इन दोनोंमेंसे किसका आचरण करे? ॥ २ ॥

किंस्वित् सत्यं किमनृतं किंस्विद् धर्म्यं सनातनम् ।
कस्मिन् काले वदेत् सत्यं कस्मिन् कालेऽनृतं वदेत् ॥ ३ ॥
क्या सत्य है और क्या झूठ? तथा कौन-सा कार्य सनातन धर्मके अनुकूल है? किस समय सत्य बोलना चाहिये और किस समय झूठ? ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।
यत्तू लोकेषु दुर्ज्ञानं तत् प्रवक्ष्यामि भारत ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भारत! सत्य बोलना अच्छा है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है; परंतु लोकमें जिसे जानना अत्यन्त कठिन है, उसीको मैं बता रहा हूँ ॥ ४ ॥

भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥ ५ ॥
जहाँ झूठ ही सत्यका काम करे (किसी प्राणीको संकटसे बचाये) अथवा सत्य ही झूठ बन जाय (किसीके जीवनको संकटमें डाल दे); ऐसे अवसरोंपर सत्य नहीं बोलना चाहिये। वहाँ झूठ बोलना ही उचित है ॥ ५ ॥

तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिष्ठितम् ।
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ॥ ६ ॥