महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अमृतभोजन-सम्बन्धी दो सौ
इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोकः हैं)
२२२-
द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना
युधिष्ठिर उवाच
केचिदाहुर्द्विजा लोके त्रिधा राजन्ननेकधा ।
न प्रत्ययो न चान्यच्च दृश्यते ब्रह्म नैव तत् ॥
नानाविधानि शास्त्राणि युक्ताश्चैव पृथग्विधाः ।
किमधिष्ठाय तिष्ठामि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**राजन्! जगत्में कुछ विद्वान् जड और चेतन अथवा प्रकृति और पुरुष दो तत्त्वोंका प्रतिपादन करते हैं। कुछ लोग जीव, ईश्वर और प्रकृति—इन तीन तत्त्वोंका वर्णन करते हैं और कितने ही विद्वान् अनेक तत्त्वोंका निरूपण करते रहते हैं; अतः कहीं न विश्वास किया जा सकता है, न अविश्वास। इसके सिवा वह परब्रह्म परमात्मा दिखायी नहीं देता है। नाना प्रकारके शास्त्र हैं और भिन्न-भिन्न प्रकारसे उनका वर्णन किया गया है; इसलिये पितामह! मैं किस सिद्धान्तका आश्रय लेकर रहूँ, यह मुझे बताइये ॥
भीष्म उवाच
स्वे स्वे युक्ता महात्मानः शास्त्रेषु प्रभविष्णवः ।
वर्तन्ते पण्डिता लोके को विद्वान् कश्च पण्डितः ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! शास्त्रोंके विचारमें प्रभावशाली सभी महात्मा अपने-अपने सिद्धान्तके प्रतिपादनमें स्थित हैं। ऐसे पण्डित इस जगत्में बहुत हैं; परंतु उनमें वास्तवमें कौन तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् है और कौन शास्त्रचर्चामें पण्डित है? यह कहना कठिन है ॥
सर्वेषां तत्त्वमज्ञाय यथारुचि तथा भवेत् ।
अस्मिन्नर्थे पुराभूतमितिहासं पुरातनम् ॥
महाविवादसंयुक्तमृषीणां भावितात्मनाम् ।
सबके तत्त्वको भलीभाँति समझकर जैसी रुचि हो, उसीके अनुसार आचरण करे। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। एक समय बहुत-से भावितात्मा मुनियोंका इसी विषयको लेकर आपसमें बड़ा भारी वाद-विवाद हुआ था ॥
हिमवत्पार्श्व आसीना ऋषयः संशितव्रताः ॥
षण्णां तानि सहस्राणि ऋषीणां गणमाहितम् ।
हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें कठोर व्रतका पालन करनेवाले छः हजार ऋषियोंकी एक बैठक हुई थी ॥
तत्र केचिद् ध्रुवं विश्वं सेश्वरं तु निरीश्वरम् । प्राकृतं कारणं नास्ति सर्वं नैवमिदं जगत् ॥ उनमेंसे कुछ लोग इस जगत्को ध्रुव (सदा रहनेवाला) बताते थे, कुछ इसे ईश्वरसहित कहते थे और कुछ लोग बिना ईश्वरके ही जगत्की उत्पत्तिका प्रतिपादन करते थे। कुछ लोगोंका कहना था कि इसका कोई प्राकृत कारण नहीं है तथा कुछ लोगोंका मत यह था कि वास्तवमें इस सम्पूर्ण जगत्की सत्ता है ही नहीं ।।
अनेन चापरे विप्राः स्वभावं कर्म चापरे । पौरुषं कर्म दैवं च यत् स्वभावादिरेव तम् ॥ इसी प्रकार दूसरे ब्राह्मणोंमेंसे कुछ लोग स्वभावको, कितने ही कर्मको, बहुतेरे पुरुषार्थको, दूसरे लोग दैवको और अन्य बहुत-से लोग स्वभाव-कर्म आदि सभीको जगत्का कारण बताते थे ।।
नानाहेतुशतैर्युक्ता नानाशास्त्रप्रवर्तकाः । स्वभावाद् ब्राह्मणा राजञ्जिगीषन्तः परस्परम् ॥ वे नाना प्रकारके शास्त्रोंके प्रवर्तक थे तथा अनेक प्रकारकी सैकड़ों युक्तियोंद्वारा अपने मतका पोषण करते थे। राजन्! वे सभी ब्राह्मण स्वभावसे ही इस शास्त्रार्थमें एक दूसरेको पराजित करनेकी इच्छा करते थे ।।
ततस्तु मूलमुद्भूतं वादिप्रत्यर्थिसंयुतम् । पात्रदण्डविघातं च वल्कलाजिनवाससाम् ॥ एके मन्युसमापन्नास्ततः शान्ता द्विजोत्तमाः । वशिष्ठमब्रुवन् सर्वे त्वं नो ब्रूहि सनातनम् ॥ नाहं जानामि विप्रेन्द्राः प्रत्युवाच स तान् प्रभुः । तदनन्तर उन वादी और प्रतिवादियोंमें मूलभूत प्रश्नको लेकर बड़ा भारी वाद-विवाद खड़ा हो गया। उनमेंसे कितने ही क्रोधमें भरकर एक दूसरेके पात्र, दण्ड, वल्कल, मृगचर्म और वस्त्रोंको भी नष्ट करने लगे। तत्पश्चात् शान्त होनेपर वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि वशिष्ठसे बोले—'प्रभो! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें।' यह सुनकर वशिष्ठने उत्तर दिया—'विप्रवरो! मैं उस सनातन तत्त्वके विषयमें कुछ नहीं जानता' ।।
ते सर्वे सहिता विप्रा नारदमृषिमब्रुवन् ॥ त्वं नो ब्रूहि महाभाग तत्त्वविच्च भवानसि । तब वे सब ब्राह्मण एक साथ नारदमुनिसे बोले—'महाभाग! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें; क्योंकि आप तत्त्ववेत्ता हैं' ।।
नाहं द्विजा विजानामि क्व हि गच्छाम संगताः ।। इति तानाह भगवांस्ततः प्राह च स द्विजान् । को विद्वानिह लोकेऽस्मिन्नमोहोऽमृतमद्भुतम् ॥
तब भगवान् नारदने उन ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रगण! मैं उस तत्त्वको नहीं जानता। हम सब लोग मिलकर कहीं और चलें। इस जगत्में कौन ऐसा विद्वान् है, जिसमें मोह न हो तथा जो उस अद्भुत अमृततत्त्वके प्रतिपादनमें समर्थ हो' ।।
तच्च ते शुश्रुवुर्वाक्यं ब्राह्मणा ह्यशरीरिणः ।
सनद्धाम द्विजा गत्वा पृच्छध्वं स च वक्ष्यति ।।
यह बातचीत हो ही रही थी कि उन ब्राह्मणोंने किसी अदृश्य देवताकी बात सुनी—'ब्राह्मणो! सनत्कुमारके आश्रमपर जाकर पूछो। वे तुम्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे' ।।
तमाह कश्चिद् द्विजवर्यसत्तमो
विभाण्डको मण्डितवेदराशिः ।
कस्त्वं भवानर्थविभेदमध्ये
न दृश्यसे वाक्यमुदीरयंश्च ।।
उस समय वेदराशिके ज्ञानसे सुशोभित विभाण्डक नामक किन्हीं ब्राह्मणशिरोमणिने उस अदृश्य देवतासे पूछा—'हम लोगोंमें तत्त्वके विषयमें मतभेद उत्पन्न हो गया है; ऐसी स्थितिमें आप कौन हैं, जो बात तो कर रहे हैं, किंतु दीखते नहीं हैं' ।।
अथाहेदं तं भगवान् सनन्तं
महामुने विद्धि मां पण्डितोऽसि ।
ऋषिं पुराणं सततैकरूपं
यमक्षयं वेदविदो वदन्ति ।
(भीष्मजी कहते हैं—राजन्!) तब भगवान् सनत्कुमारने उनसे कहा—'महामुने! तुम तो पण्डित हो। तुम मुझे सदा एकरूपसे ही विचरण करनेवाला पुरातन ऋषि सनत्कुमार समझो। मैं वही हूँ, जिसे वेदवेत्ता पुरुष अक्षय बताते हैं' ।।
पुनस्तमाहेदमसौ महात्मा
स्वरूपसंस्थं वद आह पार्थ ।
त्वमेकोऽस्मदृषिपुङ्गवाद्य
न सत्स्वरूपमथवा पुनः किम् ।।
कुन्तीनन्दन! तब उन महात्मा विभाण्डकने पुनः उनसे कहा—'आदिमुनिप्रवर! आप अपने स्वरूपका परिचय दीजिये। केवल आप ही हमसे विलक्षण जान पड़ते हैं, आपका स्वरूप हमारे सामने प्रत्यक्ष नहीं है। अथवा यदि आपका भी कोई स्वरूप है तो वह कैसा है?' ।।
अथाह गम्भीरतरानुपादं
वाक्यं महात्मा ह्यशरीर आदिः ।
न ते मुने श्रोत्रमुखेऽपि चास्यं
न पादहस्तौ प्रपदात्मकेन ।।
तब उस अदृश्य आदि-महात्माने गम्भीर स्वरमें यह बात कही—'मुने! तुम्हारे न तो कान है, न मुख है, न हाथ है, न पैर है और न पैरोंके पंजे ही हैं'॥ ब्रुवन् मुनीन् सत्यमथो निरीक्ष्य स्वमाह विद्वान् मनसा निगम्य । ऋषे कथं वाक्यमिदं ब्रवीषि न चास्य मन्ता न च विद्यते चेत् ॥ न शुश्रुवुस्ततस्तत् तु प्रतिवाक्यं द्विजोत्तमाः । निरीक्ष्यमाणा आकाशं प्रहसन्तस्ततस्ततः ॥ मुनियोंसे बातचीत करते हुए विद्वान् विभाण्डकने अपने विषयमें जब यह सब सत्य देखा तो मन-ही-मन विचार करके कहा—'ऋषे! आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? यदि इसको जाननेवाला या न जाननेवाला कोई न रहे, तब क्या होगा?' परंतु इसका उत्तर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फिर नहीं सुनायी दिया। वे हँसते हुए आकाशकी ओर देखते ही रह गये ॥ आश्चर्यमिति मत्वा ते ययुर्हैमं महागिरिम् । सनत्कुमारसंकाशं सगणा मुनिसत्तमाः ॥ 'यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है' ऐसा मानकर वे सभी मुनिश्रेष्ठ दल-बलसहित सुवर्णमय महागिरि मेरुपर सनत्कुमारजीके पास गये ॥ तं पर्वतं समारुह्य ददृशुर्ध्यानमाश्रिताः । कुमारं देवमर्हन्तं वेदपाराविवर्जितम् ॥ उस पर्वतपर आरूढ़ हो ध्यानका आश्रय ले उन ऋषियोंने पूजनीय देव सनत्कुमारको देखा, जो निरन्तर वेदके पारायणमें लगे हुए थे ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे प्रकृतिस्थं महामुनिम् । सनत्कुमारं राजेन्द्र प्रणिपत्य द्विजाः स्थिताः ॥ आगतान् भगवानाह ज्ञाननिर्धूतकल्मषः । ज्ञातं मया मुनिगणा वाक्यं तदशरीरिणः ॥ कार्यमद्य यथाकामं पृच्छध्वं मुनिपुङ्गवाः । राजेन्द्र! एक वर्ष पूर्ण होनेपर जब महामुनि सनत्कुमार प्रकृतिस्थ हुए, तब वे ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गये। ज्ञानसे जिनके सारे पाप धुल गये थे, उन भगवान् सनत्कुमारने वहाँ पधारे हुए ऋषियोंसे कहा—'मुनिगण! अदृश्य देवताने जो बात कही है, वह मुझे ज्ञात है; अतः आज आपलोगोंके प्रश्नोंका उत्तर देना है। मुनिवरो! आप इच्छानुसार प्रश्न करें'॥ तमब्रुवन् प्राञ्जलयो महामुनिं द्विजोत्तमं ज्ञाननिधिं सुनिर्मलम् । कथं वयं ज्ञाननिधिं वरेण्यं
यक्ष्यामहे विश्वरूपं कुमार ।।
(भीष्मजी कहते हैं—) तब उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर परम निर्मल ज्ञाननिधि द्विजश्रेष्ठ महामुनि सनत्कुमारसे कहा—'कुमार! हमलोग ज्ञानके भण्डार और सर्वश्रेष्ठ विश्वरूप परमेश्वरका किस प्रकार यजन करें? ।।
प्रसीद नो भगवन् ज्ञानलेशं
मधु प्रयाताय सुखाय सन्तः ।
यत् तत्पदं विश्वरूपं महामुने
तत्र ब्रूहि किं कुत्र महानुभाव ।।
'भगवन्! महामुने! महानुभाव! आप हमपर प्रसन्न होइये और हमें ज्ञानरूपी मधुर अमृतका लेशमात्र दान दीजिये; क्योंकि संत अपने शरणागतोंको सदा सुख देते हैं। वह जो विश्वरूप पद है, वह क्या है? यह हमें बताइये' ।।
स तैर्वियुक्तो भगवान् महात्मा
यः संगवान् सत्यवित् तच्छृणुष्व ।
उनके इस प्रकार विशेष अनुरोध करनेपर परब्रह्म परमात्मामें आसक्तचित्त सत्यवेत्ता महात्मा भगवान् सनत्कुमारने जो कुछ कहा, उसे सुनो ।।
अनेकसाहस्रकलेषु चैव
प्रसन्नधातुं च शुभाज्ञया सत् ।।
वे अनेक सहस्र ऋषियोंके बीचमें बैठे थे। उन्होंने उनके शुभ निवेदनसे सत्स्वरूप आनन्दमय परमेश्वरका इस प्रकार प्रतिपादन प्रारम्भ किया ।।
यथाह पूर्वं युष्मासु ह्यशरीरी द्विजोत्तमाः ।
तथैव वाक्यं तत् सत्यमजानन्तश्च कीर्तितम् ।।
**सनत्कुमार बोले—**द्विजोत्तमो! आपलोगोंके बीचमें पहले अदृश्य देवताने जो कुछ कहा था, उनका वह कथन उसी रूपमें सत्य है। आपलोगोंने उसे न जानते हुए ही उसके साथ वार्तालाप किया था ।।
शृणुध्वं परमं कारणमस्ति । स एव सर्व विद्वान् बिभेति न गच्छति । कुत्राहं कस्य नाहं केन केनेत्यवर्तमानो विजानाति ।
सुनिये, वह विश्वरूप परमात्मा सबका परम कारण है। जो उस सर्वस्वरूप परमेश्वरको जानता है, वह न तो भयभीत होता है और न कहीं जाता है। मैं कहाँ हूँ? किसका हूँ? किसका नहीं हूँ? किस-किस साधनसे कार्य करता हूँ? इत्यादि विचारोंमें न पड़कर परमात्माको अनुभव करता है ।।
स युगत्तो व्यापी । स पृथक् स्थितः । तदपरमार्थम् ।
वह परमात्मा युग-युगमें व्यापक है। वह जडात्मक प्रपंचसे अत्यन्त भिन्न रूपमें पृथक् स्थित है। उस परमात्मासे भिन्न जो कोई भी जड वस्तु है, उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं
है ।।
यथा वायुरेकः सन् बहुधेरितः । यथावद् द्विजे मृगे व्याघ्रे च । मनुजे वेणुसंश्रयो भिद्यते वायुरथैकः । आत्मा तथासौ परमात्मासावन्य इव भाति । जैसे वायु एक होकर भी अनेक रूपोंमें संचरित होता है। पक्षी, मृग, व्याघ्र और मनुष्यमें तथा वेणुमें यथार्थ रूपसे स्थित होकर एक ही वायुके भिन्न-भिन्न स्वरूप हो जाते हैं। जो आत्मा है वही परमात्मा है; परंतु वह जीवात्मासे भिन्न-सा जान पड़ता है ।।
एवमात्मा स एव गच्छति । सर्वमात्मा पश्यन् शृणोति जिघ्रति भाषते । इस प्रकार वह आत्मा ही परमात्मा है। वही जाता है, वह आत्मा ही सबको देखता है, सबकी बातें सुनता है, सभी गंधोंको सूँघता है और सबसे बातचीत करता है ।।
चक्रेऽस्य तं महात्मानं परितो दश रश्मयः । विनिष्क्रम्य यथासूर्यमनुगच्छति तं प्रभुम् ।। सूर्यदेवके चक्रमें सब ओर दस-दस किरणें हैं, जो वहाँसे निकलकर महात्मा भगवान् सूर्यके पीछे-पीछे चलती हैं ।।
दिने दिनेऽस्तमभ्येति पुनरुद्गच्छते दिशः । तावुभौ न रवौ चास्तां तथा वित्त शरीरिणम् ।। सूर्यदेव प्रतिदिन अस्त होते और पुनः पूर्वदिशामें उदित होते हैं; परंतु वे उदय और अस्त दोनों ही सूर्यमें नहीं हैं। इसी प्रकार शरीरके अन्तर्गत अन्तर्यामीरूपसे जो भगवान् नारायण विराजमान हैं, उनको जानो (उनमें शरीर और अशरीरभाव सूर्यमें उदय-अस्तकी ही भाँति कल्पित हैं) ।।
पतिते वित्त विप्रेन्द्रा भक्षणे चरणे परः । ऊर्ध्वमेकस्तथाधस्तादेकस्तिष्ठति चापरः ।। विप्रवरो! आपलोगोंको गिरते-पड़ते, चलते-फिरते और खाते-पीते प्रत्येक कार्यके समय, ऊपर-नीचे आदि प्रत्येक देश और दिशामें एकमात्र भगवान् नारायण सर्वत्र विराज रहे हैं—ऐसा अनुभव करना चाहिये ।।
हिरण्यसदनं ज्ञेयं समेत्य परमं पदम् । आत्मना ह्यात्मदीपं तमात्मनि ह्यात्मपूरुषम् ।। उनका दिव्य सुवर्णमय धाम ही परमपद जानना चाहिये, उसे पाकर जीवन कृतार्थ हो जाता है। वह स्वयं ही अपना प्रकाशक और स्वयं ही अपने-आपमें अन्तर्यामी आत्मा है ।।
संचितं संचितं पूर्वं भ्रमरो वर्तते भ्रमन् । योऽभिमानीव जानाति न मुह्यति न हीयते ।। भौंरा पहले रसका संचय कर लेता है तब फूलके चारों ओर चक्कर लगाने लगता है, उसी प्रकार जो ज्ञानी पुरुष देहाभिमानी-जैसा बनकर लोकसंग्रहके लिये सब विषयोंका अनुभव करता है वह न तो मोहमें पड़ता है और न क्षीण ही होता है ।।
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनं हृदा मनीषा पश्यति रूपमस्य । इज्यते यस्तु मन्त्रेण यजमानो द्विजोत्तमः ॥ कोई भी उस परमात्माको अपने चर्मचक्षुओंसे नहीं देख सकता। अन्तःकरणमें स्थित निर्मल बुद्धिके द्वारा ही उसके रूपको ज्ञानी पुरुष देख पाता है। उस परमात्माका मन्त्रद्वारा यजन किया जाता है तथा श्रेष्ठ द्विज ही उसका यजन करता है ।।
नैव धर्मी न चाधर्मी द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । ज्ञानतृप्तः सुखं शेते ह्यमृतात्मा न संशयः ॥ वह अमृतस्वरूप परमात्मा न धर्मी है, न अधर्मी। वह द्वन्द्वोंसे अतीत और ईर्ष्या-द्वेषसे शून्य है। इसमें संदेह नहीं कि वह ज्ञानसे परितृप्त होकर सुखपूर्वक सोता है ।।
एवमेष जगत्सृष्टिं कुरुते मायया प्रभुः । न जानाति विमूढात्मा कारणं चात्मनो ह्यसौ ॥ तथा ये भगवान् अपनी मायाद्वारा जगत्की सृष्टि करते हैं। जिसका हृदय मोहसे आच्छन्न है वह अपने कारणभूत परमात्माको नहीं जानता ।।
ध्याता द्रष्टा तथा मन्ता बोद्धा दृष्टान् स एव सः । को विद्वान् परमात्मानमनन्तं लोकभावनम् ॥ यत्तु शक्यं मया प्रोक्तं गच्छध्वं मुनिपुङ्गवाः । वही ध्यान, दर्शन, मनन और देखी हुई वस्तुओंका बोध प्राप्त करनेवाला है। सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति करनेवाले उस अनन्त परमात्माको कौन जान सकता है? मुनिवरो! मुझसे जहाँतक हो सकता था मैंने इसका स्वरूप बता दिया। अब आपलोग जाइये ।।
भीष्म उवाच
एवं प्रणम्य विप्रेन्द्रा ज्ञानसागरसम्भवम् । सनत्कुमारं संदृश्य जग्मुस्ते रुचिरं पुनः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार ज्ञानके समुद्रकी उत्पत्तिके कारणभूत मनोहर आकृतिवाले सनत्कुमारको प्रणाम करके उनका दर्शन करनेके पश्चात् वे सब ऋषि-मुनि वहाँसे चले गये ।।
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय ज्ञानयोगपरो भव । ज्ञानमेव महाराज सर्वदुःखविनाशनम् ॥ अतः महाराज कुन्तीनन्दन! तुम भी ज्ञानयोगके साधनमें तत्पर हो जाओ। ऐसा ज्ञान ही सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाला है ।।
इदं महादुःखसमाकराणां नृणां परित्राणविनिर्मितं पुरा ।
पुराणपुंसा ऋषिणा महात्मना महामुनीनां प्रवरेण तद् ध्रुवम् ॥) जो लोग महान् दुःखके आकर बने हुए हैं, उन मनुष्योंके परित्राणके लिये पूर्वकालमें पुराणपुरुष महात्मा महामुनिशिरोमणि नारायणऋषिने इस ज्ञानको प्रकट किया था, यह अविनाशी है ।।
युधिष्ठिर उवाच यदिदं कर्म लोकेऽस्मिन् शुभं वा यदि वाशुभम् । पुरुषं योजयत्येव फलयोगेन भारत ॥ १ ॥ कर्तास्ति तस्य पुरुष उताहो नेति संशयः । एतदिच्छामि तत्त्वेन त्वत्तः श्रोतुं पितामह ॥ २ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—भारत! इस लोकमें जो यह शुभ अथवा अशुभ कर्म होता है, वह पुरुषको उसके सुख-दुःखरूप फल भोगनेमें लगा ही देता है; परंतु पुरुष उस कर्मका कर्ता है या नहीं, इस विषयमें मुझे संदेह है; अतः पितामह! मैं आपके द्वारा इसका तत्त्वयुक्त समाधान सुनना चाहता हूँ ॥ १-२ ॥
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रह्लादस्य च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ३ ॥ भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और प्रह्लादके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥ असक्तं धूतपाप्मानं कुले जातं बहुश्रुतम् । अस्तब्धमनहङ्कारं सत्त्वस्थं समये रतम् ॥ ४ ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिं दान्तं शून्यागारनिवासिनम् । चराचराणां भूतानां विदितप्रभवाप्ययम् ॥ ५ ॥ अक्रुध्यन्तमहृष्यन्तमप्रियेषु प्रियेषु च । काञ्चने वाथ लोष्ठे वा उभयोः समदर्शनम् ॥ ६ ॥ आत्मनि श्रेयसि ज्ञाने धीरं निश्चितनिश्चयम् । परावरज्ञं भूतानां सर्वज्ञं समदर्शनम् ॥ ७ ॥ (भक्तं भागवतं नित्यं नारायणपरायणम् । ध्यायन्तं परमात्मानं हिरण्यकशिपोः सुतम् ॥) शक्रः प्रह्लादमासीनमेकान्ते संयतेन्द्रियम् । बुभुत्समानस्तत्प्रज्ञामभिगम्येदमब्रवीत् ॥ ८ ॥
प्रह्लादजीके मनमें किसी विषयके प्रति आसक्ति नहीं थी। उनके सारे पाप धुल गये थे। वे कुलीन और बहुश्रुत विद्वान् थे। वे गर्व और अहंकारसे रहित थे। वे धर्मकी मर्यादाके पालनमें तत्पर और शुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित रहते थे। निन्दा और स्तुतिको समान समझते, मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखते और एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उन्हें चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशका ज्ञान था। अप्रियकी प्राप्तिमें क्रोधयुक्त तथा प्रियकी प्राप्ति होनेपर हर्षयुक्त नहीं होते थे। मिट्टीके ढेले और सुवर्ण दोनोंमें उनकी समानदृष्टि थी। वे ज्ञानस्वरूप कल्याणमय परमात्माके ध्यानमें स्थित और धीर थे। उन्हें परमात्मतत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया था। उन्हें परावरस्वरूप ब्रह्मका पूर्ण ज्ञान था। वे सर्वज्ञ, सम्पूर्णभूत-प्राणियोंमें समदर्शी एवं जितेन्द्रिय थे। वे भगवान् नारायणके प्रिय भक्त और सदा उन्हींके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले थे। हिरण्यकशिपुनन्दन प्रह्लादजीको एकान्तमें बैठकर परमात्मा श्रीहरिका ध्यान करते देख इन्द्र उनकी बुद्धि और विचारको जाननेकी इच्छासे उनके निकट जाकर इस प्रकार बोले— ॥ ४-८ ॥
यैः कश्चित् सम्मतो लोके गुणैः स्यात् पुरुषो नृषु । भवत्यनपगान् सर्वान्स्तान् गुणाँल्लक्षयामहे ॥ ९ ॥ ‘दैत्यराज! संसारमें जिन गुणोंको पाकर कोई भी पुरुष सम्मानित हो सकता है, उन सबको मैं आपके भीतर स्थिरभावसे स्थित देखता हूँ ॥ ९ ॥
अथ ते लक्ष्यते बुद्धिः समा बालजनैरिव । आत्मानं मन्यमानः सन् श्रेयः किमिह मन्यसे ॥ १० ॥ ‘आपकी बुद्धि बालकोंके समान राग-द्वेषसे रहित दिखायी देती है। आप आत्माका अनुभव करते हैं, इसीलिये आपकी ऐसी स्थिति है; अतः मैं पूछता हूँ कि इस जगत्में आप किसको आत्मज्ञानका सर्वश्रेष्ठ साधन मानते हैं? ॥ १० ॥
बद्धः पाशैश्च्युतः स्थानाद् द्विषतां वशमागतः । श्रिया विहीनः प्रह्राद शोचितव्ये न शोचसि ॥ ११ ॥ ‘आप रस्सियोंसे बाँधे गये, अपने राज्यसे भ्रष्ट हुए और शत्रुओंके वशमें पड़ गये थे। आप अपनी राज्यलक्ष्मीसे वंचित हो गये। प्रह्लादजी! ऐसी शोचनीय स्थितिमें पड़ जानेपर भी आप शोक नहीं कर रहे हैं? ॥
प्रज्ञालाभात् तु दैतेय उताहो धृतिमत्तया । प्रह्राद सुस्थरूपोऽसि पश्यन् व्यसनमात्मनः ॥ १२ ॥ ‘प्रह्लादजी! आप अपने ऊपर संकट आया देखकर भी निश्चिन्त कैसे हैं? दैत्यराज! आपकी यह स्थिति आत्मज्ञानके कारण है या धैर्यके कारण?’ ॥ १२ ॥
इति संचोदितस्तेन धीरो निश्चितनिश्चयः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा स्वां प्रज्ञामनुवर्णयन् ॥ १३ ॥
इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर परमात्मतत्त्वको निश्चितरूपसे जाननेवाले धीरबुद्धि प्रह्लादजीने अपने ज्ञानका वर्णन करते हुए मधुर वाणीमें कहा ॥ १३ ॥
प्रह्लाद उवाच
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च भूतानां यो न बुद्ध्यते । तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भोऽनुपश्यतः ॥ १४ ॥ प्रह्लादजी बोले—देवराज! जो प्राणियोंकी प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानता, उसीको अविवेकके कारण स्तम्भ (जडता या मोह) होता है। जिसे आत्माका साक्षात्कार हो गया है, उसको कभी मोह नहीं होता ॥
स्वभावात् सम्प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते तथैव च । सर्वे भावास्तथाभावाः पुरुषार्थो न विद्यते ॥ १५ ॥ सब तरहके भाव और अभाव स्वभावसे ही आते-जाते रहते हैं। उसके लिये पुरुषका कोई प्रयत्न नहीं होता ॥ १५ ॥
पुरुषार्थस्य चाभावे नास्ति कश्चिच्च कारकः । स्वयं न कुर्वतस्तस्य जातु मानो भवेदिह ॥ १६ ॥ पुरुषका प्रयत्न न होनेसे कोई पुरुष कर्ता नहीं हो सकता; परंतु स्वयं कभी न करते हुए भी उसे इस जगत्में कर्तापनका अभिमान हो जाता है ॥ १६ ॥
यस्तु कर्तारमात्मानं मन्यते साध्वसाधु वा । तस्य दोषवती प्रज्ञा अतत्त्वज्ञेति मे मतिः ॥ १७ ॥ जो आत्माको शुभ या अशुभ कर्मोंका कर्ता मानता है, उसकी बुद्धि दोषसे युक्त और तत्त्वज्ञानसे रहित है—ऐसी मेरी मान्यता है ॥ १७ ॥
यदि स्यात् पुरुषः कर्ता शक्रात्मश्रेयसे ध्रुवम् । आरम्भास्तस्य सिद्ध्येयुर्न तु जातु परा भवेत् ॥ १८ ॥ इन्द्र! यदि पुरुष ही कर्ता होता तो वह अपने कल्याणके लिये जो कुछ भी करता, उसके भी सारे कार्य अवश्य सिद्ध होते। उसे अपने प्रयत्नमें कभी पराभव नहीं प्राप्त होता ॥ १८ ॥
अनिष्टस्य हि निर्वृत्तिरनिर्वृत्तिः प्रियस्य च । लक्ष्यते यतमानानां पुरुषार्थस्ततः कुतः ॥ १९ ॥ परंतु देखा यह जाता है कि इष्टसिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवालोंको अनिष्टकी भी प्राप्ति होती है और इष्टकी सिद्धिसे वे वंचित रह जाते हैं; अतः पुरुषार्थकी प्रधानता कहाँ रही? ॥ १९ ॥
अनिष्टस्याभिनिर्वृत्तिमिष्टसंवृत्तिमेव च । अप्रयत्नेन पश्यामः केषाञ्चित् तत्स्वभावतः ॥ २० ॥
कितने ही प्राणियोंको बिना किसी प्रयत्नके ही हमलोग अनिष्टकी प्राप्ति और इष्टका निवारण होते देखते हैं। यह बात स्वभावसे ही होती है ॥ २० ॥
प्रतिरूपतराः केचिद् दृश्यन्ते बुद्धिमत्तराः ।
विरूपेभ्योऽल्पबुद्धिभ्यो लिप्समाना धनागमम् ॥ २१ ॥
कितने ही सुन्दर और अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुष भी कुरूप और अल्पबुद्धि मनुष्योंसे धन पानेकी आशा करते देखे जाते हैं ॥ २१ ॥
स्वभावप्रेरिताः सर्वे निविशन्ते गुणा यदा ।
शुभाशुभास्तदा तत्र कस्य किं मानकारणम् ॥ २२ ॥
जब शुभ और अशुभ सभी प्रकारके गुण स्वभावकी ही प्रेरणासे प्राप्त होते हैं, तब किसीको भी उनपर अभिमान करनेका क्या कारण है? ॥ २२ ॥
स्वभावादेव तत्सर्वमिति मे निश्चिता मतिः ।
आत्मप्रतिष्ठा प्रज्ञा वा मम नास्ति ततोऽन्यथा ॥ २३ ॥
मेरी तो यह निश्चित धारणा है कि स्वभावसे ही सब कुछ प्राप्त होता है। मेरी आत्मनिष्ठ बुद्धि भी इसके विपरीत विचार नहीं रखती ॥ २३ ॥
कर्मजं त्विह मन्यन्ते फलयोगं शुभाशुभम् ।
कर्मणां विषयं कृत्स्नमहं वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २४ ॥
यहाँपर जो शुभ और अशुभ फलकी प्राप्ति होती है, उसमें लोग कर्मको ही कारण मानते हैं; अतः मैं तुमसे कर्मके विषयका ही पूर्णतया वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
यथा वेदयते कश्चिदोदनं वायसो ह्यदन् ।
एवं सर्वाणि कर्माणि स्वभावस्यैव लक्षणम् ॥ २५ ॥
जैसे कोई कौआ कहीं गिरे हुए भातको खाते समय काँव-काँव करके अन्य काकोंको यह जता देता है कि यहाँ अन्न है, उसी प्रकार समस्त कर्म अपने स्वभावको ही सूचित करनेवाले हैं ॥ २५ ॥
विकारानेव यो वेद न वेद प्रकृतिं पराम् ।
तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भोऽनुपश्यतः ॥ २६ ॥
जो विकारों (कार्यों) को ही जानता है, उनकी परम प्रकृति (स्वभाव) को नहीं जानता, उसीको अविवेकके कारण मोह या अभिमान होता है। जो इस बातको ठीक-ठीक समझता है, उसे मोह नहीं होता ॥ २६ ॥
स्वभावभाविनो भावान् सर्वानिवेह निश्चयात् ।
बुद्ध्यमानस्य दर्पो वा मानो वा किं करिष्यति ॥ २७ ॥
सभी भाव स्वभावसे ही उत्पन्न होते हैं। इस बातको जो निश्चितरूपसे जान लेता है, उसका दर्प या अभिमान क्या बिगाड़ सकता है? ॥ २७ ॥
वेद धर्मविधिं कृत्स्नं भूतानां चाप्यनित्यताम् ।
तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥ २८ ॥
इन्द्र! मैं धर्मकी पूरी-पूरी विधि तथा सम्पूर्ण भूतोंकी अनित्यताको जानता हूँ। इसलिये, ‘यह सब नाशवान् है’ ऐसा समझकर किसीके लिये शोक नहीं करता ॥ २८ ॥
निर्ममो निरहंकारो निराशीर्मुक्तबन्धनः ।
स्वस्थो व्यपेतः पश्यामि भूतानां प्रभवाप्ययौ ॥ २९ ॥
ममता, अहंकार तथा कामनाओंसे शून्य और सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित हो आत्मनिष्ठ एवं असंग रहकर मैं प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशको सदा देखता रहता हूँ ॥ २९ ॥
कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिषः ।
नायासो विद्यते शक्र पश्यतो लोकमव्ययम् ॥ ३० ॥
इन्द्र! मैं शुद्ध-बुद्धि तथा मन और इन्द्रियोंको अपने अधीन करके स्थित हूँ। मैं तृष्णा और कामनासे रहित हूँ और सदा अविनाशी आत्मापर ही दृष्टि रखता हूँ, इसलिये मुझे कभी कष्ट नहीं होता ॥ ३० ॥
प्रकृतौ च विकारे च न मे प्रीतिर्न च द्विषे ।
द्वेष्टारं च न पश्यामि यो मामद्य ममायते ॥ ३१ ॥
प्रकृति और उसके कार्योंके प्रति मेरे मनमें न तो राग है, न द्वेष। मैं किसीको न अपना द्वेषी समझता हूँ और न आत्मीय ही मानता हूँ ॥ ३१ ॥
नोर्ध्वं नावाङ् न तिर्यक् च न क्वचिच्छक्र कामये ।
न हि ज्ञेये न विज्ञाने न ज्ञाने कर्म विद्यते ॥ ३२ ॥
इन्द्र! मुझे ऊपर (स्वर्गकी), नीचे (पातालकी) तथा बीचके लोक (मर्त्यलोक) की भी कभी कामना नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान और ज्ञेयके निमित्त भी मेरे लिये कोई कर्म आवश्यक नहीं है ॥ ३२ ॥
शक्र उवाच
येनैषा लभ्यते प्रज्ञा येन शान्तिरवाप्यते ।
प्रब्रूहि तमुपायं मे सम्यक् प्रह्राद पृच्छतः ॥ ३३ ॥
इन्द्रने कहा—प्रह्लादजी! जिस उपायसे ऐसी बुद्धि और इस तरहकी शान्ति प्राप्त होती है, उसे पूछता हूँ। आप मुझे अच्छी तरह उसे बताइये ॥ ३३ ॥
प्रह्राद उवाच
आर्जवेनाप्रमादेन प्रसादेनात्मवत्तया ।
वृद्धशुश्रूषया शक्र पुरुषो लभते महत् ॥ ३४ ॥
प्रह्लादने कहा—इन्द्र! सरलता, सावधानी, बुद्धिकी निर्मलता, चित्तकी स्थिरता तथा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेसे पुरुषको महत्-पदकी प्राप्ति होती है ॥ ३४ ॥
स्वभावाल्लभते प्रज्ञां शान्तिमेति स्वभावतः ।
स्वभावादेव तत्सर्वं यत्किंचिदनुपश्यसि ॥ ३५ ॥
इन गुणोंको अपनानेपर स्वभावसे ही ज्ञान प्राप्त होता है, स्वभावसे ही शान्ति मिलती है तथा जो कुछ भी तुम देख रहे हो, सब स्वभावसे ही प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥
इत्युक्तो दैत्यपतिना शक्रो विस्मयमागमत् ।
प्रीतिमांश्च तदा राजंस्तद्वाक्यं प्रत्यपूजयत् ॥ ३६ ॥
राजन्! दैत्यराज प्रह्लादके इस प्रकार कहनेपर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने बहुत प्रसन्न होकर उनके वचनोंकी प्रशंसा की ॥ ३६ ॥
स तदाभ्यर्च्य दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यपतिरीश्वरः ।
असुरेन्द्रमुपामन्त्र्य जगाम स्वं निवेशनम् ॥ ३७ ॥
इतना ही नहीं, त्रिलोकीनाथ देवेश्वर इन्द्रने उस समय दैत्यों और असुरोंके स्वामी प्रह्लादका पूजन किया और उनकी आज्ञा लेकर वे अपने निवास-स्थान स्वर्गलोकको चले गये ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शक्रप्रह्लादसंवादो नाम
द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें इन्द्र और प्रह्लादका संवादनामक दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४५½ श्लोक मिलाकर कुल ८२½ श्लोक हैं)
इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर
त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
इन्द्र और बलिका संवाद—इन्द्रके आक्षेपयुक्त वचनोंका बलिके द्वारा कठोर प्रत्युत्तर
युधिष्ठिर उवाच
यथा बुद्ध्या महीपालो भ्रष्टश्रीर्विचरेन्महीम् ।
कालदण्डविनिष्पिष्टस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो गया हो और कालके दण्डसे पिस गया हो, वह भूपाल किस बुद्धिसे इस पृथ्वीपर विचरे, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वासवस्य च संवादं बलेर्वैरोचनस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य विरोचनकुमार बलि और इन्द्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
पितामहमुपागम्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।
सर्वानिवासुरान् जित्वा बलिं पप्रच्छ वासवः ॥ ३ ॥
एक समय इन्द्र समस्त असुरोंपर विजय पाकर पितामह ब्रह्माजीके पास गये और हाथ जोड़कर प्रणाम करके उन्होंने पूछा—'भगवन्! बलि कहाँ रहता है?' ॥ ३ ॥
यस्य स्म ददतो वित्तं न कदाचन हीयते ।
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ॥ ४ ॥
'ब्रह्मन्! जिसके दान देते समय उसके धनका भण्डार कभी खाली नहीं होता था, उस राजा बलिको मैं ढूँढ़नेपर भी नहीं पा रहा हूँ। आप मुझे बलिका पता बताइये ॥ ४ ॥
स वायुर्वरुणश्चैव स रविः स च चन्द्रमाः ।
सोऽग्निस्तपति भूतानि जलं च स भवत्युत ॥ ५ ॥
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ।
'वह राजा बलि ही वायु बनकर चलता, वरुण बनकर वर्षा करता, सूर्य और चन्द्रमा बनकर प्रकाश करता, अग्नि बनकर समस्त प्राणियोंको ताप देता तथा जल बनकर सबकी प्यास बुझाता था, उसी राजा बलिको मैं कहीं नहीं पा रहा हूँ। ब्रह्मन्! आप मुझे बलिका पता बताइये ॥ ५ १/२ ॥
स एव ह्यस्तमयते स स्म विद्योतते दिशः ॥ ६ ॥
स वर्षति स्म वर्षाणि यथाकालमतन्द्रितः ।
तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ।। ७ ।। 'वही यथासमय आलस्य छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाशित होता, वही अस्त होता और वही वर्षा करता था। ब्रह्मन्! उस बलिको मैं ढूँढ़नेपर भी नहीं पा रहा हूँ। आप मुझे राजा बलिका पता बताइये ।। ६-७ ।।
ब्रह्मोवाच नैतत् ते साधु मघवन् यदेनमनुपृच्छसि । पृष्टस्तु नानृतं ब्रूयात् तस्माद् वक्ष्यामि ते बलिम् ।। ८ ।। **ब्रह्माजीने कहा—**मघवन्! यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है कि तुम मुझसे बलिका पता पूछ रहे हो। पूछनेपर झूठ नहीं बोलना चाहिये, इसलिये मैं तुमसे बलिका पता बता रहा हूँ ।। ८ ।।
उष्ट्रेषु यदि वा गोषु खरेष्वश्वेषु वा पुनः । वरिष्ठो भविता जन्तुः शून्यागारे शचीपते ।। ९ ।। शचीपते! किसी शून्य घरमें ऊँट, गौ, गर्दभ अथवा अश्वजातिके पशुओंमें जो श्रेष्ठ जीव उपलब्ध हो, उसे बलि समझो ।। ९ ।।
शक्र उवाच यदि स्म बलिना ब्रह्मन् शून्यागारे समेयिवान् । हन्यामेनं न वा हन्यां तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ।। १० ।। **इन्द्रने पूछा—**ब्रह्मन्! यदि किसी एकान्त गृहमें राजा बलिसे मेरी भेंट हो जाय तो मैं उन्हें मार डालूँ या न मारूँ, यह मुझे बतावें ।। १० ।।
ब्रह्मोवाच मा स्म शक्र बलिं हिंसीर्न बलिर्वधमर्हति । न्यायस्तु शक्र प्रष्टव्यस्त्वया वासव काम्यया ।। ११ ।। **ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्र! तुम बलिका वध न करना, बलि वधके योग्य नहीं है। वासव! तुम उनसे इच्छानुसार न्यायोचित व्यवहारके विषयमें प्रश्न कर सकते हो ।। ११ ।।
भीष्म उवाच एवमुक्तो भगवता महेन्द्रः पृथिवीं तदा । चचारैरावतस्कन्धमधिरुह्य श्रिया वृतः ।। १२ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् ब्रह्माजीके इस प्रकार आदेश देनेपर देवराज इन्द्र ऐरावतकी पीठपर सवार हो राजलक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए पृथ्वीपर विचरने लगे ।। १२ ।।
ततो ददर्श स बलिं खरवेषेण संवृतम् ।
यथाऽऽख्यातं भगवता शून्यागारकृतालयम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर उन्होंने भगवान् ब्रह्माके बताये अनुसार एक शून्य घरमें निवास करनेवाले राजा बलिको देखा, जिन्होंने गर्दभके वेषमें अपने आपको छिपा रखा था ॥ १३ ॥
शक्र उवाच
खरयोनिमनुप्राप्तस्तुषभक्षोऽसि दानव ।
इयं ते योनिरधमा शोचस्याहो न शोचसि ॥ १४ ॥
**इन्द्र बोले—**दानव! तुम गदहेकी योनिमें पड़कर भूसी खा रहे हो। यह नीच योनि तुम्हें प्राप्त हुई है। इसके लिये तुम्हें शोक होता है या नहीं? ॥ १४ ॥
अदृष्टं बत पश्यामि द्विषतां वशमागतम् ।
श्रिया विहीनं मित्रैश्च भ्रष्टवीर्यपराक्रमम् ॥ १५ ॥
आज तुम्हारी ऐसी अवस्था देख रहा हूँ, जो पहले कभी नहीं देखी गयी थी। तुम शत्रुओंके वशमें पड़ गये हो। राजलक्ष्मी तथा मित्रोंसे हीन हो गये हो तथा तुम्हारा बल-पराक्रम नष्ट हो गया है ॥ १५ ॥
यत् तद् यानसहस्रैस्त्वं ज्ञातिभिः परिवारितः ।
लोकान् प्रतापयन् सर्वान् यास्यस्मानवितर्कयन् ॥ १६ ॥
पहले तुम अपने सहस्रों वाहनों और सजातीय बन्धुओंसे घिरकर सब लोगोंको ताप देते और हम देवताओंको कुछ न समझते हुए यात्रा करते थे ॥ १६ ॥
त्वन्मुखाश्चैव दैतेया व्यतिष्ठंस्तव शासने ।
अकृष्टपच्या च मही तवैश्वर्ये बभूव ह ॥ १७ ॥
इदं च तेऽद्य व्यसनं शोचस्याहो न शोचसि ।
सब दैत्य तुम्हारा मुँह जोहते हुए तुम्हारे ही शासनमें रहते थे। तुम्हारे राज्यमें पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अनाज पैदा करती थी। परंतु आज तुम्हारे ऊपर यह संकट आ पहुँचा है। इसके लिये तुम शोक करते हो या नहीं? ॥ १७ १/२ ॥
यदाऽऽतिष्ठः समुद्रस्य पूर्वकूले विलेलिहन् ॥ १८ ॥
ज्ञातीन् विभजतो वित्तं तदाऽऽसीत् ते मनः कथम् ।
जिस समय तुम समुद्रके पूर्वतटपर विविध भोगोंका आस्वादन करते हुए निवास करते थे और अपने भाई-बन्धुओंको धन बाँटते थे, उस समय तुम्हारे मनकी अवस्था कैसी रही होगी? ॥ १८ १/२ ॥
यत् ते सहस्रसमिता ननृतुर्देवयोषितः ॥ १९ ॥
बहूनि वर्षपूगानि विहारे दीप्यतः श्रिया ।
सर्वाः पुष्करमालिन्यः सर्वाः काञ्चनसुप्रभाः ॥ २० ॥
कथमद्य तदा चैव मनस्ते दानवेश्वर ।
तुमने बहुत वर्षोंतक राजलक्ष्मीसे सुशोभित हो विहारमें समय बिताया है। उस समय सुवर्णकी-सी कान्तिवाली सहस्रों देवांगनाएँ जो सब-की-सब पद्ममालाओंसे अलंकृत होती थीं, तुम्हारे सामने नृत्य किया करती थीं। दानवराज! उन दिनों तुम्हारे मनकी क्या अवस्था थी और अब कैसी है? ।। १९-२०१/२ ।।
छत्रं तवासीत् सुमहत् सौवर्णं रत्नभूषितम् ।। २१ ।।
ननृतुस्तत्र गन्धर्वाः षट् सहस्राणि सप्तधा ।
एक समय था, जब कि तुम्हारे ऊपर सोनेका बना हुआ रत्नभूषित विशाल छत्र तना रहता था और छः हजार गन्धर्व सप्त स्वरोंमें गीत गाते हुए तुम्हारे सम्मुख अपनी नृत्यकलाका प्रदर्शन करते थे ।। २११/२ ।।
यूपस्तवासीत् सुमहान् यजतः सर्वकाञ्चनः ।। २२ ।।
यत्राददः सहस्राणि अयुतानां गवां दश ।
अनन्तरं सहस्रेण तदाऽऽसीद् दैत्य का मतिः ।। २३ ।।
यज्ञ करते समय तुम्हारे यज्ञमण्डपका अत्यन्त विशाल मध्यवर्ती स्तम्भ पूरा-का-पूरा सोनेका बना होता था। जिस समय तुम निरन्तर दस-दस करोड़ गौओंका सहस्रों बार दान किया करते थे, दैत्यराज! उस समय तुम्हारे मनमें कैसे विचार उठते रहे होंगे? ।। २२-२३ ।।
यदा च पृथिवीं सर्वां यजमानोऽनुपर्यगाः ।
शम्याक्षेपेण विधिना तदाऽऽसीत् किं तु ते हृदि ।। २४ ।।
जब तुमने शम्याक्षेपकी* विधिसे यज्ञ करते हुए सारी पृथ्वीकी परिक्रमा की थी, उस समय तुम्हारे हृदयमें कितना उत्साह रहा होगा? ।। २४ ।।
न ते पश्यामि भृङ्गारं न च्छत्रं व्यजने न च ।
ब्रह्मदत्तां च ते मालां न पश्याम्यसुराधिप ।। २५ ।।
असुरराज! अब तो मैं तुम्हारे पास न तो सोनेकी झारी, न छत्र और न चँवर ही देखता हूँ तथा ब्रह्माजीकी दी हुई वह दिव्य माला भी तुम्हारे गलेमें नहीं दिखायी देती है ।।
(भीष्म उवाच
ततः प्रहस्य स बलिर्वासवेन समीरितम् ।
निशम्य भावगम्भीरं सुरराजमथाब्रवीत् ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इन्द्रकी कही हुई वह भावगम्भीर वाणी सुनकर राजा बलि हँस पड़े और देवराजसे इस प्रकार बोले ।।
बलिरुवाच
अहो हि तव बालिश्यमिह देवगणाधिप ।
अयुक्तं देवराजस्य तव कत्थमिदं वचः ।।)
बलिने कहा— देवेश्वर! यहाँ तुमने जो मूर्खता दिखायी है, वह मेरे लिये आश्चर्यजनक है। तुम देवताओंके राजा हो। इस तरह दूसरोंको कष्ट देनेवाली बात कहना तुम्हारे लिये योग्य नहीं है।।
न त्वं पश्यसि भृङ्गारं न छत्रं व्यजने न च ।
ब्रह्मदत्तां च मे मालां न त्वं द्रक्ष्यसि वासव ॥ २६ ॥
इन्द्र! इस समय तुम मेरी सोनेकी झारीको, मेरे छत्र और चँवरको तथा ब्रह्माजीकी दी हुई मेरी उस दिव्य मालाको भी नहीं देख सकोगे ।। २६ ।।
गुहायां निहितानि त्वं मम रत्नानि पृच्छसि ।
यदा मे भविता कालस्तदा त्वं तानि द्रक्ष्यसि ॥ २७ ॥
तुम मेरे जिन रत्नोंके विषयमें पूछ रहे हो, वे सब गुफामें छिपा दिये गये हैं। जब मेरे लिये अच्छा समय आयेगा, तब तुम फिर उन्हें देखोगे ।। २७ ।।
न त्वेतदनुरूपं ते यशसो वा कुलस्य च ।
समृद्धार्थोऽसमृद्धार्थं यन्मां कथितुमिच्छसि ॥ २८ ॥
इस समय तुम समृद्धिशाली हो और मेरी समृद्धि छिन गयी है, ऐसी अवस्थामें जो तुम मेरे सामने अपनी प्रशंसाके गीत गाना चाहते हो, यह तुम्हारे कुल और यशके अनुरूप नहीं है ।। २८ ।।
न हि दुःखेषु शोचन्ते न प्रहृष्यन्ति चर्धिषु ।
कृतप्रज्ञा ज्ञानतृप्ताः क्षान्ताः सन्तो मनीषिणः ॥ २९ ॥
जिसकी बुद्धि शुद्ध है तथा जो ज्ञानसे तृप्त हैं, वे क्षमाशील मनीषी सत्पुरुष दुःख पड़नेपर शोक नहीं करते और समृद्धि प्राप्त होनेपर हर्षसे फूल नहीं उठते ।। २९ ।।
त्वं तु प्राकृतया बुद्ध्या पुरन्दर विकत्थसे ।
यदाहमिव भावी स्यास्तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ३० ॥
पुरन्दर! तुम अपनी अशुद्ध बुद्धिके कारण मेरे सामने आत्मप्रशंसा कर रहे हो। जब मेरी-जैसी स्थिति तुम्हारी भी हो जायगी, तब ऐसी बात नहीं बोल सकोगे ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादो नाम
त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि और इन्द्रका संवाद नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं)
*– शम्याक्षेप कहते हैं शम्यापातको। ‘शम्या’ एक ऐसे काठके डंडेको कहते हैं, जिसका निचला भाग मोटा होता है। उसे जब कोई बलवान् पुरुष उठाकर जोरसे फेंके, तब जितनी दूरीपर जाकर वह गिरे, उतने भूभागको एक ‘शम्यापात’ कहते हैं।