भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

अब्रवीत् परमो देवो ज्वलन्निव तदा शिवम् ॥ २० ॥
प्रजावर्गके हितकी इच्छासे महादेवजीके अपने सामने आनेपर तेजसे जलते हुए-से परमदेव ब्रह्माजी उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
करवाण्यद्य कं कामं वरार्होऽसि मतो मम ।
कर्ता ह्यस्मि प्रियं शम्भो तव यद् हृदि वर्तते ॥ २१ ॥
‘शम्भो! मैं तुम्हें वर पानेके योग्य समझता हूँ, बोलो, आज तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ? तुम्हारे हृदयमें जो भी प्रिय मनोरथ हो, उसे मैं पूर्ण करूँगा’ ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादोपक्रमे
षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिके संवादका उपक्रमविषयक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५६ ॥

२५७-

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति

स्थाणुरुवाच

प्रजासर्गनिमित्तं मे कार्यवत्तामिमां प्रभो ।
विद्धि सृष्टास्त्वया हीमा मा कुप्यासां पितामह ॥ १ ॥
**महादेवजीने कहा—**प्रभो! पितामह! मेरा मनोरथ या प्रयोजन आपसे प्रजासर्गकी रक्षाके लिये प्रार्थना करना है। आप इस बातको जान लें। आपहीने इन प्रजाओंकी सृष्टि की है; अतः आप इनपर क्रोध न कीजिये ॥ १ ॥

तव तेजोऽग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ॥ २ ॥
देव! जगदीश्वर! आज आपकी क्रोधाग्निसे सारी प्रजाएँ दग्ध हो रही हैं। उन्हें उस अवस्थामें देखकर मुझे दया आती है, आप उनपर क्रोध न करें ॥ २ ॥

प्रजापतिरुवाच

न कुप्ये न च मे कामो न भवेयुः प्रजा इति ।
लाघवार्थं धरण्यास्तु ततः संहार इष्यते ॥ ३ ॥
**प्रजापति ब्रह्माजी बोले—**शिव! मैं प्रजापर कुपित नहीं हूँ और न मेरी यही इच्छा है कि प्रजाओंका विनाश हो जाय। पृथ्वीका भार हल्का करनेके लिये ही प्रजाके संहारकी आवश्यकता प्रतीत हुई है ॥ ३ ॥

इयं हि मां सदा देवी भारार्ता समचोदयत् ।
संहारार्थं महादेव भारेणाप्सु निमज्जति ॥ ४ ॥
महादेव! यह पृथ्वीदेवी भारी भारसे पीड़ित हो सदा मुझे प्रजाके संहारके लिये प्रेरित करती रही है; क्योंकि यह जगत्के भारसे समुद्रमें डुबी जा रही है ॥

यदाहं नाधिगच्छामि बुद्ध्या बहु विचारयन् ।
संहारमासां वृद्धानां ततो मां क्रोध आविशत् ॥ ५ ॥
जब बहुत विचार करनेपर भी मुझे इन बढ़ी हुई प्रजाओंके संहारका कोई उपाय न सूझा, तब मुझे क्रोध आ गया ॥ ५ ॥

स्थाणुरुवाच

संहारार्थं प्रसीदस्व मा क्रुधो विबुधेश्वर ।
मा प्रजाः स्थावरं चैव जङ्गमं च व्यनीनशत् ॥ ६ ॥

महादेवजीने कहा— देवेश्वर! संहारके लिये आप क्रोध न करें। प्रजापर प्रसन्न हों। कहीं ऐसा न हो कि समस्त चराचर प्राणियोंका विनाश हो जाय ।। ६ ।।
पल्वलानि च सर्वाणि सर्वं चैव तृणोपलम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। ७ ।।
तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् सर्वमुपप्लुतम् ।
प्रसीद भगवन् साधो वर एष वृतो मया ।। ८ ।।
ये सारे जलाशय, सब-के-सब घास और लता-बेलें तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) भस्मीभूत हो रहे हैं। सारे जगत्‌का प्रलय उपस्थित हो गया है। भगवन्! प्रसन्न होइये। साधो! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ ।। ७-८ ।।
नष्टा न पुनरेष्यन्ति प्रजा ह्येताः कथंचन ।
तस्मान्निवर्ततामेतत् तेन स्वेनैव तेजसा ।। ९ ।।
यदि इन प्रजाओंका नाश हो गया तो ये किसी तरह फिर यहाँ उपस्थित न हो सकेंगी। इसलिये आप अपने ही प्रभावसे इस क्रोधाग्निको निवृत्त कीजिये ।। ९ ।।
उपायमन्यं सम्पश्य भूतानां हितकाम्यया ।
यथामी जन्तवः सर्वे न दह्येरन् पितामह ।। १० ।।
पितामह! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये संहारका कोई दूसरा ही उपाय सोचिये, जिससे ये सारे जीव-जन्तु एक साथ ही दग्ध न हो जायें ।। १० ।।
अभावं हि न गच्छेयुरुच्छिन्नप्रजनाः प्रजाः ।
अधिदैवे नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेश्वरेश्वर ।। ११ ।।
लोकेश्वरेश्वर! आपने मुझे देवताओंके आधिपत्य-पदपर नियुक्त किया है, अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, यदि प्रजाकी संततिका उच्छेद होगा तो समस्त प्रजाओंका सर्वथा अभाव ही हो जायगा; अतः आप इस विनाशको बंद कीजिये ।। ११ ।।
त्वद्भवं हि जगन्नाथ एतत् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रसाद्य त्वां महादेव याचाम्यावृत्तिजाः प्रजाः ।। १२ ।।
जगन्नाथ! महादेव! यह समस्त चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः मैं आपको प्रसन्न करके यह याचना करता हूँ कि ये सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो—मरकर पुनः जन्म धारण करे ।। १२ ।।

नारद उवाच

श्रुत्वा तु वचनं देवः स्थाणोर्नियतवाङ्‌मनाः ।
तेजस्तत् संनिजग्राह पुनरेवान्तरात्मनि ।। १३ ।।
नारदजी कहते हैं— राजन्! महादेवजीकी वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्माने मन और वाणीका संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मामें ही लीन कर

लिया ।। १३ ।।

ततोऽग्निमुपसंगृह्य भगवाँल्लोकपूजितः ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कल्पयामास वै प्रभुः ।। १४ ।।
तब लोकपूजित भगवान् ब्रह्माने उस अग्निका उपसंहार करके प्रजाके लिये जन्म और मृत्युकी व्यवस्था की ।। १४ ।।

उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तदा ।
प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यः खेभ्यो नारी महात्मनः ।। १५ ।।
उस क्रोधाग्निका उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे एक मूर्तिमती नारी प्रकट हुई ।। १५ ।।

कृष्णरक्ताम्बरधरा कृष्णनेत्रतलान्तरा ।
दिव्यकुण्डलसम्पन्ना दिव्याभरणभूषिता ।। १६ ।।
उसके वस्त्र काले और लाल थे। आँखोंके निम्न और आभ्यन्तर प्रदेश भी काले रंगके ही थे। वह दिव्य कुण्डलोंसे कान्तिमती तथा अलौकिक आभूषणोंसे विभूषित थी ।। १६ ।।

सा विनिःसृत्य वै खेभ्यो दक्षिणामाश्रिता दिशम् ।
ददृशाते च तां कन्यां देवौ विश्वेश्वरावुभौ ।। १७ ।।
वह ब्रह्माजीके इन्द्रियछिद्रोंसे निकलकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दी। उस समय उन दोनों जगदीश्वरों (ब्रह्मा और शिव) ने उस कन्याको देखा ।। १७ ।।

तामाहूय तदा देवो लोकानामादिरीश्वरः ।
मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ।। १८ ।।
भूपाल! तब लोकोंके आदिकारण भगवान् ब्रह्माने उसे 'मृत्यु' कहकर पुकारा और निकट बुलाकर कहा—'तुम इन प्रजाओंका समय-समयपर विनाश करती रहो ।। १८ ।।

त्वं हि संहारबुद्ध्या मे चिन्तिता रुषितेन च ।
तस्मात् संहर सर्वास्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ।। १९ ।।
'मैंने प्रजाके संहारकी भावनासे रोषमें भरकर तुम्हारा चिन्तन किया था; इसलिये तुम मूढ़ और विद्वानोंसहित सम्पूर्ण प्रजाओंका संहार करो ।। १९ ।।

अविशेषेण चैव त्वं प्रजाः संहर कामिनि ।
मम त्वं हि नियोगेन श्रेयः परमवाप्स्यसि ।। २० ।।
कामिनि! तुम मेरे आदेशसे सामान्यतः सारी प्रजाका संहार करो। इससे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी' ।। २० ।।

एवमुक्ता तु सा देवी मृत्युः कमलमालिनी ।
प्रदध्यौ दुःखिता बाला साश्रुपातमतीव च ।। २१ ।।
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर कमलोंकी मालासे अलंकृत नवयौवना मृत्यु देवी नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दुखी हो बड़ी चिन्तामें पड़ गयी ।। २१ ।।

पाणिभ्यां चैव जग्राह तान्यश्रूणि जनेश्वरः ।
मानवानां हितार्थाय ययाचे पुनरेव ह ॥ २२ ॥

तब जनेश्वर ब्रह्माजीने मानवोंके हितके लिये अपने दोनों हाथोंमें मृत्युके आँसू ले लिये। फिर मृत्युने उनसे इस प्रकार प्रार्थना की ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे
सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिका संवादविषयक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५७ ॥

२५८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना

नारद उवाच

विनीय दुःखमबला साऽऽत्मनैवायतेक्षणा ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लतेवावर्जिता तदा ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वह विशाल नेत्रोंवाली अबला स्वयं ही उस दुःखको दूर हटाकर झुकायी हुई लताके समान विनम्र हो हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे बोली— ॥ १ ॥

त्वया सृष्टा कथं नारी मादृशी वदतां वर ।
रौद्रकर्माभिजायेत सर्वप्राणिभयङ्करी ॥ २ ॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रजापते! (यदि मुझसे क्रूर कर्म ही कराना था तो) आपने मुझ-जैसी कोमलहृदया नारीको क्यों उत्पन्न किया? क्या मुझ-जैसी स्त्री समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर तथा क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली हो सकती है? ॥ २ ॥

बिभेम्यहमधर्मस्य धर्म्यमादिश कर्म मे ।
त्वं मां भीतामवेक्षस्व शिवेनेक्षस्व चक्षुषा ॥ ३ ॥
‘भगवन्! मैं अधर्मसे बहुत डरती हूँ। आप मुझे धर्मानुकूल कार्य करनेकी आज्ञा दें। मुझ भयभीत अबलापर दृष्टिपात करें और कल्याणमयी दृष्टिसे मेरी ओर देखें ॥ ३ ॥

बालान् वृद्धान् वयस्थांश्च न हरेयमनागसः ।
प्राणिनः प्राणिनामीश नमस्तेऽस्तु प्रसीद मे ॥ ४ ॥
‘समस्त प्राणियोंके अधीश्वर! मैं निरपराध बाल, वृद्ध और तरुण प्राणियोंके प्राण नहीं लूँगी। आपको नमस्कार है, आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ ४ ॥

प्रियान् पुत्रान् वयस्यांश्च भ्रातॄन् मातृः पितॄनपि ।
अपध्यास्यन्ति यद्येवं मृतास्तेषां बिभेम्यहम् ॥ ५ ॥
‘जब मैं लोगोंके प्यारे पुत्रों, मित्रों, भाइयों, माताओं तथा पिताओंको मारने लगूँगी, तब उनके सम्बन्धी उनके इस प्रकार मारे जानेके कारण मेरा अनिष्ट-चिन्तन करेंगे; अतः मैं उन लोगोंसे बहुत डरती हूँ ॥ ५ ॥

कृपणाश्रुपरिक्लेदो दहेन्मां शाश्वतीः समाः ।
तेभ्योऽहं बलवद् भीता शरणं त्वामुपागता ॥ ६ ॥

‘उन दीन-दुखियोंके नेत्रोंसे जो आँसू बहकर उनके कपोलों और वक्षःस्थलको भिगो देगा, वह मुझे सदा अनन्त वर्षोंतक जलाता रहेगा। मैं उनसे बहुत डरी हुई हूँ, इसलिये आपकी शरणमें आयी हूँ।। ६ ।।

यमस्य भवने देव पात्यन्ते पापकर्मिणः ।
प्रसादये त्वां वरद प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ७ ॥
‘वरदायक प्रभो! देव! सुना है कि पापाचारी प्राणी यमराजके लोकमें गिराये जाते हैं, अतः आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करती हूँ, आप मुझपर कृपा कीजिये ।।
एतदिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह ।
इच्छेयं त्वत्प्रसादार्थं तपस्तप्तुं महेश्वर ॥ ८ ॥
‘लोकपितामह! महेश्वर! मैं आपसे अपनी एक अभिलाषाकी पूर्ति चाहती हूँ। मेरी इच्छा है कि मैं आपकी प्रसन्नताके लिये कहीं जाकर तप करूँ' ।। ८ ।।

पितामह उवाच

मृत्यो संकल्पिता मे त्वं प्रजासंहारहेतुना ।
गच्छ संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा च विचारय ॥ ९ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**मृत्यो! प्रजाके संहारके लिये ही मैंने संकल्पपूर्वक तुम्हारी सृष्टि की है। जाओ, सारी प्रजाका संहार करो। इसके लिये मनमें कोई विचार न करो ।। ९ ।।
एतदेवमवश्यं हि भविता नैतदन्यथा ।
क्रियतामनवद्याङ्गि यथोक्तं मद्वचोऽनघे ॥ १० ॥
यह बात अवश्य ही इसी प्रकार होनेवाली है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। निर्दोष अंगोंवाली देवि! मैंने जो बात कही है, उसका पालन करो। इससे तुम्हें पाप नहीं लगेगा ।। १० ।।
एवमुक्ता महाबाहो मृत्युः परपुरंजय ।
न व्याजहार तस्थौ च प्रह्रा भगवदुन्मुखी ॥ ११ ॥
महाबाहो! शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले नरेश! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मृत्यु उन्हींकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े खड़ी रह गयी—कुछ बोल न सकी ।। ११ ।।
पुनः पुनरथोक्ता सा गतसत्त्वेव भामिनी ।
तूष्णीमासीत् ततो देवो देवानामीश्वरेश्वरः ॥ १२ ॥
प्रससाद किल ब्रह्मा स्वयमेवात्मनाऽऽत्मनि ।
स्मयमानश्च लोकेशो लोकान् सर्वानवैक्षत ॥ १३ ॥
उनके बारंबार कहनेपर वह मानिनी नारी निष्प्राण-सी होकर मौन रह गयी। ‘हाँ' या ‘ना' कुछ भी न बोल सकी। तदनन्तर देवताओंके भी देवता और ईश्वरोंके भी ईश्वर

लोकनाथ ब्रह्माजी स्वयं ही अपने मनमें बड़े प्रसन्न हुए और मुसकराते हुए समस्त लोकोंकी ओर देखने लगे॥ निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते। सा कन्याथ जगामास्य समीपादिति नः श्रुतम् ॥ १४ ॥ उन अपराजित भगवान् ब्रह्माका रोष निवृत्त हो जानेपर वह कन्या भी उनके निकटसे चली गयी, ऐसा हमने सुना है॥ १४॥ अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा। त्वरमाणेव राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! उस समय प्रजाका संहार करनेके विषयमें कोई प्रतिज्ञा न करके मृत्यु वहाँसे हट गयी और बड़ी उतावलीके साथ धेनुकाश्रममें जा पहुँची॥ १५॥ सा तत्र परमं देवी तपोऽचरद् दुष्करम्। समा ह्येकपदे तस्थौ दश पद्मानि पञ्च च ॥ १६ ॥ वहाँ मृत्युदेवीने अत्यन्त दुष्कर और उत्तम तपस्या की। वह पंद्रह पद्म वर्षोंतक एक पैरपर खड़ी रही॥ तां तथा कुर्वतीं तत्र तपः परमदुष्करम्। पुनरेव महातेजा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥ इस प्रकार वहाँ अत्यन्त दुष्कर तपस्या करती हुई मृत्युसे महातेजस्वी ब्रह्माजीने पुनः जाकर इस प्रकार कहा—॥ कुरुष्व मे वचो मृत्यो तदनादृत्य सत्वरा। तथैकपदे तात पुनरन्यानि सप्त सा ॥ १८ ॥ तस्थौ पद्मानि षट् चैव पञ्च द्वे चैव मानद। ‘मृत्यो! तुम मेरी आज्ञाका पालन करो।’ दूसरोंको मान देनेवाले तात! उनके इस कथनका आदर न करके मृत्युने तुरंत ही दूसरे बीस पद्म वर्षोंतक पुनः एक पैरपर खड़ी हो तपस्या आरम्भ कर दी ॥ १८ १/२ ॥ भूयः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा ॥ १९ ॥ द्वे चायुते नरश्रेष्ठ वाय्वाहारा महामते। तात! महामते! नरश्रेष्ठ! फिर वह दस हजार पद्म वर्षोंतक मृगोंके साथ विचरती रही। इसके बाद बीस हजार वर्षोंतक उसने केवल वायुका आहार किया॥ १९ १/२ ॥ पुनरेव ततो राजन् मौनमातिष्ठदुत्तमम् ॥ २० ॥ अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च पार्थिव। राजन्! तदनन्तर उसने उत्तम मौन-व्रत धारण कर लिया। पृथ्वीपते! फिर उसने जलमें आठ हजार वर्षोंतक रहकर तपस्या की॥ २० १/२ ॥ ततो जगाम सा कन्या कौशिकीं नृपसत्तम ॥ २१ ॥

तत्र वायुजलाहारा चचार नियमं पुनः । नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर वह कन्या कौशिकी नदीके तटपर गयी। वहाँ वायु और जलका आहार करके उसने पुनः कठोर नियमोंका पालन किया ॥ २१ १/२ ॥ ततो ययौ महाभागा गङ्गां मेरुं च केवलम् ॥ २२ ॥ तस्थौ दार्विव निश्चेष्टा प्रजानां हितकाम्यया । तत्पश्चात् वह महाभागा ब्रह्मकन्या गङ्गाजीके किनारे और केवल मेरुपर्वतपर गयी। वहाँ प्रजावर्गके हितकी इच्छासे वह काठकी भाँति निश्चेष्ट खड़ी रही ॥ २२ १/२ ॥ ततो हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवाः समीजिरे ॥ २३ ॥ तत्राङ्गुष्ठेन राजेन्द्र निखर्वमपरं ततः । तस्थौ पितामहं चैव तोषयामास यत्नतः ॥ २४ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर हिमालय पर्वतके शिखरपर जहाँ पहले देवताओंने यज्ञ किया था, उस स्थानपर वह परम शुभलक्षणा कन्या एक निखर्व वर्षोंतक अँगूठेके बलपर खड़ी रही। इस प्रकार यत्न करके उसने पितामह ब्रह्माजीको संतुष्ट कर लिया ॥ २३-२४ ॥ ततस्तामब्रवीत् तत्र लोकानां प्रभवाप्ययः । किमिदं वर्तते पुत्रि क्रियतां मम तद् वचः ॥ २५ ॥ तब सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत ब्रह्माजी वहाँ उस कन्यासे बोले—'बेटी! तुम यह क्या करती हो? मेरी आज्ञाका पालन करो' ॥ २५ ॥ ततोऽब्रवीत् पुनर्मृत्युर्भगवन्तं पितामहम् । न हरेयं प्रजा देव पुनश्चाहं प्रसादये ॥ २६ ॥ तब मृत्युने पुनः भगवान् पितामहसे कहा—'देव! मैं प्रजाका नाश नहीं कर सकती। इसके लिये पुनः आपका कृपाप्रसाद चाहती हूँ' ॥ २६ ॥ तामधर्मभयाद् भीतां पुनरेव प्रयाचतीम् । तदाब्रवीद् देवदेवो निगृह्येदं वचस्ततः ॥ २७ ॥ अधर्मके भयसे डरकर पुनः कृपाकी भीख माँगती हुई मृत्युको रोककर देवाधिदेव ब्रह्माने उससे यह बात कही— ॥ २७ ॥ अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संयच्छेमाः प्रजाः शुभे । मया ह्युक्तं मृषा भद्रे भविता नेह किंचन ॥ २८ ॥ 'मृत्यो! तुम इन प्रजाओंका संहार करो। शुभे! इससे तुम्हें पाप नहीं लगेगा। भद्रे! मेरी कही हुई कोई भी बात यहाँ झूठी नहीं हो सकती ॥ २८ ॥ धर्मः सनातनश्च त्वामिहैवानुप्रवेक्ष्यति । अहं च विबुधाश्चैव त्वद्धिते निरताः सदा ॥ २९ ॥ 'सनातन धर्म यहीं तुम्हारे भीतर प्रवेश करेगा। मैं तथा ये सम्पूर्ण देवता सदा तुम्हारे हितमें लगे रहेंगे ॥ २९ ॥

इममन्यं च ते कामं ददानि मनसेप्सितम् । न त्वां दोषेण यास्यन्ति व्याधिसम्पीडिताः प्रजाः ॥ ३० ॥ पुरुषेषु स्वरूपेण पुरुषस्त्वं भविष्यसि । स्त्रीषु स्त्रीरूपिणी चैव तृतीयेषु नपुंसकम् ॥ ३१ ॥ 'मैं तुम्हें यह दूसरा भी मनोवाञ्छित वर दे रहा हूँ कि रोगोंसे पीड़ित हुई प्रजा तुम्हारे प्रति दोष-दृष्टि नहीं करेगी। तुम पुरुषोंमें पुरुषरूपसे रहोगी, स्त्रियोंमें स्त्रीरूप धारण कर लोगी और नपुंसकोंमें नपुंसक हो जाओगी' ॥ ३०-३१ ॥ सैवमुक्ता महाराज कृताञ्जलिरुवाच ह । पुनरेव महात्मानं नेति देवेशमव्ययम् ॥ ३२ ॥ महाराज! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर मृत्यु हाथ जोड़कर उन अविनाशी महात्मा देवेश्वर ब्रह्मासे पुनः इस प्रकार बोली—'प्रभो! मैं प्राणियोंका संहार नहीं करूँगी' ॥ ३२ ॥ तामब्रवीत् तदा देवी मृत्यो संहर मानवान् । अधर्मस्ते न भविता तथा ध्यास्याम्यहं शुभे ॥ ३३ ॥ तब ब्रह्माजीने उससे कहा—'मृत्यो! तुम मनुष्योंका संहार करो, तुम्हें पाप नहीं लगेगा। शुभे! मैं तुम्हारे लिये शुभ चिन्तन करता रहूँगा ॥ ३३ ॥ यानश्रुबिन्दून् पतितानपश्यं ये पाणिभ्यां धारितास्ते पुरस्तात् । ते व्याधयो मानवान् घोररूपाः प्राप्ते काले कालयिष्यन्ति मृत्यो ॥ ३४ ॥ 'मृत्यो! मैंने पहले तुम्हारे जिन अश्रुबिन्दुओंको गिरते देखा और जिन्हें अपने हाथोंमें धारण कर लिया था, वे ही समय आनेपर भयंकर रोग बनकर मनुष्योंको कालके गालमें डाल देंगे ॥ ३४ ॥ सर्वेषां त्वं प्राणिनामन्तकाले कामक्रोधौ सहितौ योजयेथाः । एवं धर्मस्त्वामुपैष्यत्यमेयो न चाधर्मं लप्स्यसे तुल्यवृत्तिः ॥ ३५ ॥ 'सभी प्राणियोंके अन्तकालमें तुम काम और क्रोधको एक साथ नियुक्त कर देना। इस प्रकार तुम्हें अप्रमेय धर्मकी प्राप्ति होगी और तुम्हें पाप नहीं लगेगा; क्योंकि तुम्हारी चित्तवृत्ति सम (राग-द्वेषसे शून्य) है ॥ ३५ ॥ एवं धर्मं पालयिष्यस्यथो त्वं न चात्मानं मज्जयिष्यस्यधर्मे । तस्मात् कामं रोचयाभ्यागतं त्वं संयोज्याथो संहरस्वेह जन्तून् ॥ ३६ ॥

'इस प्रकार तुम धर्मका पालन करोगी और अपने-आपको पापमें नहीं डुबाओगी; अतः अपनेको प्राप्त होनेवाले इस अधिकारको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करो और कामको इस कार्यमें लगाकर इस जगत्के प्राणियोंका संहार करो' ॥ ३६ ॥ सा वै तदा मृत्युसंज्ञापदेशा भीता शापाद् बाढमित्यब्रवीत् तम् । अथो प्राणान् प्राणिनामन्तकाले कामक्रोधौ प्राप्य निर्मोह्य हन्ति ॥ ३७ ॥ तब वह मृत्यु नामवाली नारी शापसे डरकर ब्रह्माजीसे बोली—'बहुत अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है।' वही मृत्यु प्राणियोंका अन्तकाल आनेपर काम और क्रोधको प्रेरित करके उनके द्वारा उन्हें मोहमें डालकर मार डालती है ॥ ३७ ॥ मृत्योर्ये ते व्याधयश्चाश्रुपाता मनुष्याणां रुज्यते यैः शरीरम् । सर्वेषां वै प्राणिनां प्राणनान्ते तस्माच्छोकं मा कृथा बुद्धय बुद्धया ॥ ३८ ॥ पहले मृत्युके जो अश्रुबिन्दु गिरे थे, वे ही ज्वर आदि रोग हो गये; जिनके द्वारा मनुष्योंका शरीर रुग्ण हो जाता है। वह मृत्यु सभी प्राणियोंकी आयु समाप्त होनेपर उनके पास आती है। अतः राजन्! तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो। इस विषयको बुद्धिके द्वारा समझो ॥ ३८ ॥ सर्वे देवाः प्राणिनां प्राणनान्ते गत्वा वृत्ताः संनिवृत्तास्तथैव । एवं सर्वे मानवाः प्राणनान्ते गत्वा वृत्ता देववद् राजसिंह ॥ ३९ ॥ राजसिंह! जैसे इन्द्रियाँ जाग्रत्-अवस्थाके अन्तमें सुषुप्तिके समय निष्क्रिय होकर विलीन हो जाती हैं और जाग्रत्-अवस्था आनेपर पुनः लौट आती हैं, उसी प्रकार सारे प्राणी ही जीवनके अन्तमें परलोकमें जाकर कर्मोंके अनुसार देवताओंके तुल्य अथवा नरकगामी होते हैं और कर्मोंके क्षीण होनेपर इस जगत्में लौटकर पुनः मनुष्य आदि योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं ॥ ३९ ॥ वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः स सर्वेषां प्राणिनां प्राणभूतः । नानावृत्तिर्देहिनां देहभेदे तस्माद् वायुर्देवदेवो विशिष्टः ॥ ४० ॥ भयंकर शब्द करनेवाला महान् बलशाली भयानक प्राणवायु ही समस्त प्राणियोंका प्राणस्वरूप है। वही देहधारियोंके देहका नाश होनेपर नाना प्रकारके रूपों या शरीरोंको

प्राप्त होता है। अतः इस शरीरके भीतर देवाधिदेव वायु (प्राण) ही सबसे श्रेष्ठ है ॥ ४० ॥

सर्वे देवा मर्त्यसंज्ञाविशिष्टाः
सर्वे मर्त्या देवसंज्ञाविशिष्टाः ।
तस्मात् पुत्रं मा शुचो राजसिंह
पुत्रः स्वर्गं प्राप्य ते मोदते ह ॥ ४१ ॥
सभी देवता पुण्य क्षय होनेपर इस लोकमें आकर मरणधर्मा नामसे विभूषित होते हैं और सभी मरणधर्मा मनुष्य पुण्यके प्रभावसे मृत्युके पश्चात् देवसंज्ञासे संयुक्त होते हैं। अतः राजसिंह! तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो। तुम्हारा पुत्र स्वर्गलोकमें जाकर आनन्द भोग रहा है ॥

एवं मृत्युर्देवसृष्टा प्रजानां
प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत् ।
तस्याश्चैव व्याधयस्तेऽश्रुपाताः
प्राप्ते काले संहरन्तीह जन्तून् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार ब्रह्माजीने ही प्राणियोंकी मृत्यु रची है। वह मृत्यु ठीक समय आनेपर यथावत् रूपसे जीवोंका संहार करती है। उसके जो अश्रुपात हैं, वे ही मृत्युकाल प्राप्त होनेपर रोग बनकर इस जगत्के प्राणियोंका संहार करते हैं ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे
अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मृत्यु और प्रजापतिका
संवादविषयक दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५८ ॥

धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय

युधिष्ठिर उवाच

इमे वै मानवाः सर्वे धर्मं प्रति विशङ्किताः ।
कोऽयं धर्मः कुतो धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! ये सभी मनुष्य प्रायः धर्मके विषयमें संशयशील हैं; अतः मैं जानना चाहता हूँ कि धर्म क्या है? और उसकी उत्पत्ति कहाँसे हुई है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

धर्मस्त्वयमिहार्थः किममुत्रार्थोऽपि वा भवेत् ।
उभयार्थो हि वा धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
पितामह! इस लोकमें सुख पानेके लिये जो कर्म किया जाता है, वही धर्म है या परलोकमें कल्याणके लिये जो कुछ किया जाता है, उसे धर्म कहते हैं? अथवा लोक-परलोक दोनोंके सुधारके लिये कुछ किया जानेवाला कर्म ही धर्म कहलाता है? यह मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

सदाचारः स्मृतिर्वेदास्त्रिविधं धर्मलक्षणम् ।
चतुर्थमर्थमित्याहुः कवयो धर्मलक्षणम् ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! वेद, स्मृति और सदाचार—ये तीन धर्मके स्वरूपको लक्षित करानेवाले हैं। कुछ विद्वान् अर्थको भी धर्मका चौथा लक्षण बताते हैं ॥ ३ ॥

अपि ह्युक्तानि धर्म्याणि व्यवस्यन्त्युत्तरापरे ।
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः ॥ ४ ॥
शास्त्रोंमें जो धर्मानुकूल कार्य बताये गये हैं, उन्हें ही प्रधान एवं अप्रधान सभी लोग निश्चित रूपसे धर्म मानते हैं। लोकयात्राका निर्वाह करनेके लिये ही महर्षियोंने यहाँ धर्मकी मर्यादा स्थापित की है ॥ ४ ॥

उभयत्र सुखोदर्क इह चैव परत्र च ।
अलब्ध्वा निपुणं धर्मं पापः पापेन युज्यते ॥ ५ ॥
धर्मका पालन करनेसे आगे चलकर इस लोक और परलोकमें भी सुख मिलता है। पापी मनुष्य विचारपूर्वक धर्मका आश्रय न लेनेसे पापमें प्रवृत्त हो उसके दुःखरूप फलका भागी होता है ॥ ५ ॥

न च पापकृतः पापान्मुच्यन्ते केचिदापदि ।

अपापवादी भवति यथा भवति धर्मकृत् ।
धर्मस्य निष्ठा त्वाचारस्तमेवाश्रित्य भोत्स्यसे ॥ ६ ॥
पापाचारी मनुष्य आपत्तिकालमें कष्ट भोगकर भी उस पापसे मुक्त नहीं होते और धर्मका आचरण करनेवाले लोग आपत्तिकालमें भी पापका समर्थन नहीं करते हैं। आचार (शौचाचार-सदाचार) ही धर्मका आधार है; अतः युधिष्ठिर! तुम उस आचारका आश्रय लेकर ही धर्मके यथार्थ स्वरूपको जान सकोगे ॥ ६ ॥

यथा धर्मसमाविष्टो धनं गृह्णाति तस्करः ।
रमते निर्हरन् स्तेनः परवित्तमराजके ॥ ७ ॥
जैसे चोर धर्मकार्यमें प्रवृत्त होकर भी दूसरोंके धनका अपहरण कर ही लेता है और अराजक-अवस्थामें पराये धनका अपहरण करनेवाला लुटेरा सुखका अनुभव करता है ॥ ७ ॥

यदास्य तद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति ।
तदा तेषां स्पृहयते ये वै तुष्टाः स्वकैर्धनैः ॥ ८ ॥
परंतु जब दूसरे लोग उस चोरका भी धन हर लेते हैं, तब वह चोर भी प्रजाकी रक्षा करने और चोरोंको दण्ड देनेवाले राजाको चाहता है—उसकी आवश्यकताका अनुभव करता है। उस अवस्थामें वह उन पुरुषोंके समान बननेकी इच्छा करता है, जो अपने ही धनसे संतुष्ट रहते हैं—दूसरोंके धनपर हाथ लगाना पाप समझते हैं ॥ ८ ॥

अभीतः शुचिरभ्येति राजद्वारमशङ्कितः ।
न हि दुश्चरितं किंचिदन्तरात्मनि पश्यति ॥ ९ ॥
जो पवित्र है—जिसमें चोरी आदिके दोष नहीं हैं, वह मनुष्य निर्भय और निःशंक होकर राजाके द्वारपर चला जाता है; क्योंकि वह अपनी अन्तरात्मामें कोई दुराचार नहीं देखता है ॥ ९ ॥

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।
सत्येन विधृतं सर्वं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥
सत्य बोलना शुभ कर्म है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई कार्य नहीं है। सत्यने ही सबको धारण कर रखा है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ १० ॥

अपि पापकृतो रौद्राः सत्यं कृत्वा पृथक् पृथक् ।
अद्रोहमविसंवादं प्रवर्तन्ते तदाश्रयाः ॥ ११ ॥
क्रूर स्वभाववाले पापी भी पृथक्-पृथक् सत्यकी शपथ खाकर ही आपसमें द्रोह या विवादसे बचे रहते हैं। इतना ही नहीं, वे सत्यका आश्रय लेकर सत्यकी ही दुहाई देकर अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ ११ ॥

ते चेन्मिथोऽधृतिं कुर्युर्विनश्येयुरसंशयम् ।
न हर्तव्यं परधनमिति धर्मः सनातनः ॥ १२ ॥

वे यदि आपसकी शपथको भंग कर दें तो निस्संदेह परस्पर लड़-भिड़कर नष्ट हो जायँ। दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये—यही सनातन धर्म है॥

मन्यन्ते बलवन्तस्तं दुर्बलैः सम्प्रवर्तितम् ।
यदा नियतिदौर्बल्यमथैषामेव रोचते ॥ १३ ॥
कुछ बलवान् लोग (बलके घमंडमें नास्तिकभावका आश्रय लेकर) धर्मको दुर्बलोंका चलाया हुआ मानते हैं; किंतु जब भाग्यवश वे भी दुर्बल हो जाते हैं, तब अपनी रक्षाके लिये उन्हें भी धर्मका ही सहारा लेना अच्छा जान पड़ता है ॥ १३ ॥

न ह्यात्यन्तं बलवन्तो भवन्ति सुखिनोऽपि वा ।
तस्मादनार्जवे बुद्धिर्न कार्या ते कदाचन ॥ १४ ॥
संसारमें कोई भी न तो अत्यन्त बलवान् होते हैं और न बहुत सुखी ही। इसलिये तुम्हें अपनी बुद्धिमें कभी कुटिलताका विचार नहीं लाना चाहिये ॥ १४ ॥

असाधुभ्योऽस्य न भयं न चौरेभ्यो न राजतः ।
अकिंचित् कस्यचित् कुर्वन् निर्भयः शुचिरावसेत् ॥ १५ ॥
जो किसीका कुछ बिगाड़ता नहीं है, उसे दुष्टों, चोरों अथवा राजासे भय नहीं होता। शुद्ध आचार-विचारवाला पुरुष सदा निर्भय रहता है ॥ १५ ॥

सर्वतः शङ्कते स्तेनो मृगो ग्राममिवेयिवान् ।
बहुधाऽऽचरितं पापमन्यत्रैवानुपश्यति ॥ १६ ॥
गाँवोंमें आये हुए हिरणकी भाँति चोर सबसे डरता रहता है। वह अनेकों बार दूसरोंके साथ जैसा पापाचार कर चुका है, दूसरोंको भी वैसा ही पापाचारी समझता है ॥ १६ ॥

मुदितः शुचिरभ्येति सर्वतो निर्भयः सदा ।
न हि दुश्चरितं किंचिदात्मनोऽन्येषु पश्यति ॥ १७ ॥
जिसका आचार-विचार शुद्ध है, उसे कहींसे कोई खटका नहीं होता। वह सदा प्रसन्न एवं सब ओरसे निर्भय बना रहता है तथा वह अपना कोई दुष्कर्म दूसरोंमें नहीं देखता है ॥ १७ ॥

दातव्यमित्ययं धर्म उक्तो भूतहिते रतैः ।
तं मन्यन्ते धनयुताः कृपणैः सम्प्रवर्तितम् ॥ १८ ॥
समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले महात्माओंने 'दान करना चाहिये' ऐसा कहकर इसे धर्म बताया है; परंतु बहुत-से धनवान् उसे दरिद्रोंका चलाया हुआ धर्म समझते हैं ॥ १८ ॥

यदा नियतिकार्पण्यमथैषामेव रोचते ।
न ह्यात्यन्तं धनवन्तो भवन्ति सुखिनोऽपि वा ॥ १९ ॥
परंतु यदि भाग्यवश वे भी निर्धन या दर-दरके भिखारी हो जाते हैं, उस समय उनको भी यह धर्म उत्तम जान पड़ता है; क्योंकि कोई भी न तो अत्यन्त धनवान् होते हैं और न

अतिशय सुखी ही हुआ करते हैं (अतः धनका अभिमान नहीं करना चाहिये) ।। १९ ।। यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः । न तत् परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मनः ।। २० ।। मनुष्य दूसरोंद्वारा किये हुए जिस व्यवहारको अपने लिये वांछनीय नहीं मानता, दूसरोंके प्रति भी वह वैसा बर्ताव न करे। उसे यह जानना चाहिये कि जो बर्ताव अपने लिये अप्रिय है, वह दूसरोंके लिये भी प्रिय नहीं हो सकता ।। २० ।। योऽन्यस्य स्यादुपपतिः स कं किं वक्तुमर्हति । यदन्यस्य ततः कुर्यान्न मृष्येदिति मे मतिः ।। २१ ।। जो स्वयं दूसरेके घरमें उपपति (जार) बनकर जाता है—परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करता है, वह दूसरेको वैसा ही कर्म करते देख किससे क्या कह सकता है? यदि दूसरेकी उसी प्रवृत्तिके कारण वह निन्दा करे तो वह पुरुष उसकी निन्दाको नहीं सह सकता—ऐसा मेरा विश्वास है ।। २१ ।। जीवितुं यः स्वयं चेच्छेत् कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् । यद् यदात्मनि चेच्छेत तत् परस्यापि चिन्तयेत् ।। २२ ।। जो स्वयं जीवित रहना चाहता हो, वह दूसरोंके प्राण कैसे ले सकता है? मनुष्य अपने लिये जो-जो सुख-सुविधा चाहे, वही दूसरेके लिये भी सुलभ करानेकी बात सोचे ।। २२ ।। अतिरिक्तैः संविभजेद् भोगैरन्यानकिंचनान् । एतस्मात् कारणाद् धात्रा कुसीदं सम्प्रवर्तितम् ।। २३ ।। जो अपनी आवश्यकतासे अधिक हो, उन भोगपदार्थोंको दूसरे दीन-दुखियोंके लिये बाँट दे। इसीलिये विधाताने सूदपर धन देनेकी वृत्ति चलायी है ।। यस्मिंस्तु देवाः समये संतिष्ठेरंस्तथा भवेत् । अथवा लाभसमये स्थितिर्धर्मेऽपि शोभना ।। २४ ।। जिस सन्मार्ग या मर्यादापर देवता स्थित होते हैं, उसीपर मनुष्यको भी स्थिर रहना चाहिये अथवा धन-लाभके समय धर्ममें स्थित रहना भी अच्छा है ।। २४ ।। सर्वं प्रियाभ्युपगतं धर्ममाहुर्मनीषिणः । पश्यैतं लक्षणोद्देशं धर्माधर्मे युधिष्ठिर ।। २५ ।। युधिष्ठिर! सबके साथ प्रेमपूर्ण बर्ताव करनेसे जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब धर्म है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है तथा जो इसके विपरीत है, वह अधर्म है। तुम धर्म और अधर्मका संक्षेपसे यही लक्षण समझो ।। २५ ।। लोकसंग्रहसंयुक्तं विधात्रा विहितं पुरा । सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ।। २६ ।। विधाताने पूर्वकालमें सत्पुरुषोंके जिस उत्तम आचरणका विधान किया है, वह विश्वके कल्याणकी भावनासे युक्त है और उससे धर्म एवं अर्थके सूक्ष्म स्वरूपका ज्ञान होता

है ।। २६ ।।
धर्मलक्षणमाख्यातमेतत् ते कुरुसत्तम ।
तस्मादनार्जवे बुद्धिर्न ते कार्या कथंचन ।। २७ ।।
कुरुश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे धर्मका लक्षण बताया है; अतः तुम्हें किसी तरह कुटिल मार्गमें अपनी बुद्धिको नहीं ले जाना चाहिये ।। २७ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि धर्मलक्षणे
एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २५९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें धर्मका लक्षणविषयक दो सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५९ ।।


युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना

⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना

युधिष्ठिर उवाच

सूक्ष्मं साधु समादिष्टं भवता धर्मलक्षणम् ।
प्रतिभा त्वस्ति मे काचित् तां ब्रूयाममुमानतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! आपने धर्मका सूक्ष्म एवं सुन्दर लक्षण बताया है; परंतु मुझे कुछ और ही स्फुरित हो रहा है। अतः मैं उसके सम्बन्धमें अनुमानसे ही कुछ कहूँगा ॥ १ ॥

भूयांसो हृदये ये मे प्रश्नास्ते व्याहृतास्त्वया ।
इदं त्वन्यत् प्रवक्ष्यामि न राजन् निग्रहादिव ॥ २ ॥
मेरे हृदयमें जो बहुत-से प्रश्न उठे थे, उन सबका निराकरण आपने कर दिया। महाराज! अब मैं यह दूसरा प्रश्न उपस्थित कर रहा हूँ। इसमें जिज्ञासा ही कारण है, दुराग्रह नहीं ॥ २ ॥

इमानि हि प्राणयन्ति सृजन्त्युत्तारयन्ति च ।
न धर्मः परिपाठेन शक्यो भारत वेदितुम् ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! धर्म ही इन प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं। धर्म ही उनके जीवनधारण और उद्धारमें कारण होते हैं; परंतु धर्मको केवल वेदोंके पाठमात्रसे नहीं जाना जा सकता ॥ ३ ॥

अन्यो धर्मः समस्थस्य विषमस्थस्य चापरः ।
आपदस्तु कथं शक्याः परिपाठेन वेदितुम् ॥ ४ ॥
जो मनुष्य अच्छी स्थितिमें है, उसका धर्म दूसरा है और जो संकटमें पड़ा हुआ है, उसका धर्म दूसरा ही है। केवल वेदोंके पाठसे आपद्धर्मका ज्ञान कैसे हो सकता है? ॥ ४ ॥

सदाचारो मतो धर्मः सन्तस्त्वाचारलक्षणाः ।
साध्यासाध्यं कथं शक्यं सदाचारो ह्यलक्षणः ॥ ५ ॥
आपके कथनानुसार सत्पुरुषोंका आचरण धर्म माना गया है और जिनमें धर्माचरण लक्षित होता है, वे ही सत्पुरुष हैं। ऐसी दशामें अन्योन्याश्रय दोष पड़नेके कारण साध्य और असाध्यका विवेक कैसे हो सकता है? ऐसी दशामें सदाचार धर्मका लक्षण नहीं हो सकता ॥

दृश्यते हि धर्मरूपेणाधर्मं प्राकृतश्चरन् ।
धर्मं चाधर्मरूपेण कश्चिदप्राकृतश्चरन् ॥ ६ ॥

इस लोकमें देखा जाता है कि कितने ही प्राकृत मनुष्य धर्म-से दिखायी देनेवाले अधर्मका आचरण करते हैं और कितने ही अप्राकृत (शिष्ट) पुरुष अधर्म प्रतीत होनेवाले धर्मका अनुष्ठान करते हैं (अतः केवल आचारसे धर्माधर्मका निर्णय नहीं हो सकता) ।। ६ ।।

पुनरस्य प्रमाणं हि निर्दिष्टं शास्त्रकोविदैः ।
वेदवादाश्चानुयुगं ह्रसन्तीतीह नः श्रुतम् ।। ७ ।।
शास्त्रज्ञ पुरुषोंने धर्ममें वेदको ही प्रमाण बताया है; किंतु हमने सुना है कि युग-युगमें वेदोंका ह्रास होता है अर्थात् धर्मके सम्बन्धमें जो वेदोंका निश्चय है, वह प्रत्येक युगमें बदलता रहता है ।। ७ ।।

अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे परे ।
अन्ये कलियुगे धर्मा यथाशक्ति कृता इव ।। ८ ।।
सत्ययुगके धर्म कुछ और हैं, त्रेता और द्वापरके धर्म कुछ और ही हैं और कलियुगके धर्म कुछ और ही बताये गये हैं। मानो मुनियोंने लोगोंकी शक्तिके अनुसार ही धर्मकी व्यवस्था की है ।। ८ ।।

आम्नायवचनं सत्यमित्ययं लोकसंग्रहः ।
आम्नायेभ्यः पुनर्वेदाः प्रसृताः सर्वतोमुखाः ।। ९ ।।
वेदोंका वचन सत्य है, यह कथन लोकरंजनमात्र है। वेदोंसे ही सर्वतोमुखी स्मृतियोंका प्रचार और प्रसार हुआ है ।। ९ ।।

ते चेत् सर्वप्रमाणं वै प्रमाणं ह्यत्र विद्यते ।
प्रमाणेऽप्यप्रमाणेन विरुद्धे शास्त्रता कुतः ।। १० ।।
यदि सम्पूर्ण वेद प्रामाणिक हैं तो स्मृतियाँ भी प्रामाणिक हो सकती हैं; परंतु जब (युग-युगमें धर्मके विषयमें विभिन्न प्रकारकी बात कहनेसे) प्रमाणभूत वेद भी अप्रामाणिक हो तो वेदमूलक स्मृतियाँ भी प्रामाणिक नहीं रहेंगी। यदि स्मृतिका श्रुतिके साथ विरोध हो तो उसमें शास्त्रत्व कैसे रह सकता है? ।। १० ।।

धर्मस्य क्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।
या या विक्रियते संस्था ततः सापि प्रणश्यति ।। ११ ।।
जब धर्मका अनुष्ठान हो रहा हो, उस समय बलवान् दुरात्माओंद्वारा उसमें जो-जो विकृति उत्पन्न की जाती है, उसके कारण उस धर्ममर्यादाका ही लोप हो जाता है ।। ११ ।।

विद्म चैवं न वा विद्म शक्यं वा वेदितुं न वा ।
अणीयान् क्षुरधाराया गरीयानपि पर्वतात् ।। १२ ।।
हम धर्मको जानते हों या न जानते हों, धर्मस्वरूप जाना जा सकता हो या नहीं; इतना तो हम समझते ही हैं कि धर्म छूरेकी धारसे भी सूक्ष्म और पर्वतसे भी अधिक विशाल एवं भारी है ।। १२ ।।

गन्धर्वनगराकारः प्रथमं सम्प्रदृश्यते ।

अन्वीक्ष्यमाणः कविभिः पुनर्गच्छत्यदर्शनम् ।। १३ ।।
धर्मके विषयमें जब आलोचना की जाती है, तब पहले तो वह गन्धर्वनगरके समान दिखायी देता है; फिर विद्वानोंद्वारा विशेष रूपसे विचार करनेपर यह प्रतीत होता है कि वह अदृश्य हो गया ।। १३ ।।
निपानानीव गोभ्योऽपि क्षेत्रे कुल्ये च भारत ।
स्मृतिर्हि शाश्वतो धर्मो विप्रहीणो न दृश्यते ।। १४ ।।
भरतनन्दन! जैसे बहुत-सी गौओंको पानी पिलानेसे निपान (क्षुद्र जलाशय) सूख जाते हैं तथा जैसे अधिक खेतोंकी सिंचाई करनेसे नहरोंका पानी निपट जाता है, उसी प्रकार सनातन वैदिक धर्म अथवा स्मृति-शास्त्र धीरे-धीरे क्षीण होकर कलियुगके अन्तिम भागमें दिखायी ही नहीं देता है ।। १४ ।।
कामादन्येच्छया चान्ये कारणैरपरैस्तथा ।
असन्तोऽपि वृथाचारं भजन्ते बहवोऽपरे ।। १५ ।।
क्योंकि उस समय कुछ लोग स्वार्थवश, दूसरे लोग दूसरोंकी इच्छासे तथा अन्य मनुष्य अन्यान्य कारणोंसे धर्माचरण करते हैं और बहुत-से असाधु पुरुष भी व्यर्थ धर्माचरणका ढोंग फैला लेते हैं ।। १५ ।।
धर्मो भवति स क्षिप्रं प्रलापस्त्वेव साधुषु ।
अथैतानाहुरुन्मत्तानपि चावहसन्त्युत ।। १६ ।।
उन दिनों लोगोंद्वारा प्रायः सकामभावसे ही धर्मका आचरण होता देखा जाता है। श्रेष्ठ पुरुषोंमें जो यथार्थ धर्म होता है, वह शीघ्र ही मूढ़ मनुष्योंकी दृष्टिमें प्रलापमात्र सिद्ध होता है। वे मूढ़ उन धर्मात्मा पुरुषोंको पागल कहते और उनकी हँसी उड़ाते हैं ।। १६ ।।
महाजना ह्युपावृत्ता राजधर्मं समाश्रिताः ।
न हि सर्वहितः कश्चिदाचारः सम्प्रवर्तते ।। १७ ।।
आचार्य द्रोण-जैसे महापुरुष भी स्वधर्मसे हटकर क्षत्रियधर्मका आश्रय लेते हैं; अतः कोई भी आचार ऐसा नहीं है, जो सबके लिये समानरूपसे हितकर या सबके द्वारा समानरूपसे पालित हो ।। १७ ।।
तेनैवान्यः प्रभवति सोऽपरं बाधते पुनः ।
दृश्यते चैव स पुनस्तुल्यरूपो यदृच्छया ।। १८ ।।
यह भी देखा जाता है कि उसी धर्मके आचरणसे विश्वामित्र आदि अन्य महापुरुषोंने उन्नति प्राप्त की है तथा रावणादि निशाचर उसी धर्मके बलसे दूसरोंको पीड़ा देते हैं एवं कश्यप आदि अनेक महर्षि ईश्वरकी इच्छासे उसी धर्मके द्वारा सदा एक-सी स्थितिमें दिखायी देते हैं ।। १८ ।।
येनैवान्यः प्रभवति सोऽपरानपि बाधते ।
आचाराणामनैकाग्र्यं सर्वेषामुपलक्षयेत् ।। १९ ।।