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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

श्रेयो ह्यनाहिताग्नित्वमग्निहोत्रं न निष्क्रियम् ॥ २१ ॥
जिसका सदाचार एवं सत्कर्म कभी लुप्त नहीं होता, वह ब्राह्मण (अग्निहोत्र न करनेपर भी) अग्निहोत्री ही है। सदाचारका ठीक-ठीक पालन होनेपर अग्निहोत्र न हो सके तो भी अच्छा है; किंतु सदाचारका त्याग करके केवल अग्निहोत्र करना कदापि कल्याणकारी नहीं है ॥

अग्निरात्मा च माता च पिता जनयिता तथा ।
गुरुश्च नरशार्दूल परिचर्या यथातथम् ॥ २२ ॥

पुरुषसिंह! अग्नि, आत्मा, माता, जन्म देनेवाले पिता तथा गुरु—इन सबकी यथायोग्य सेवा करनी चाहिये ॥

मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी
विद्वान् क्लीबः पश्यति प्रीतियोगात् ।
दाक्ष्येण हीनो धर्मयुक्तो नदान्तो
लोकेऽस्मिन् वै पूज्यते सद्भिदार्यः ॥ २३ ॥

जो अभिमानका त्याग करके वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करता, विद्वान् एवं काम-भोगमें अनासक्त होकर सबको प्रेमभावसे देखता, मनमें चतुराई न रखकर धर्ममें संलग्न रहता और दूसरोंका दमन या हिंसा नहीं करता है, वह मनुष्य इस लोकमें श्रेष्ठ है तथा सत्पुरुष भी उसका आदर करते हैं ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां
द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९२ ॥

पराशरगीता—शूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्संगकी महिमा और चारों वर्णोंके धर्मपालनका महत्त्व

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त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीता—शूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्संगकी महिमा और चारों वर्णोंके धर्मपालनका महत्त्व

पराशर उवाच

वृत्तिः सकाशाद् वर्णेभ्यस्त्रिभ्यो हीनस्य शोभना ।
प्रीत्योपनीता निर्दिष्टा धर्मिष्ठान् कुरुते सदा ॥ १ ॥
**पराशरजी कहते हैं—**राजन्! शूद्रके लिये तीनों वर्णोंकी सेवासे जीवन-निर्वाह करना ही सबसे उत्तम है। शूद्रके लिये निर्दिष्ट सेवावृत्तिका यदि वे प्रेमपूर्वक पालन करें तो वह सदा उन्हें धर्मिष्ठ बनाती है ॥ १ ॥

वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा ।
न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रयोजयेत् ॥ २ ॥
यदि शूद्रके पास बाप-दादोंका दिया हुआ जीविकाका कोई निश्चित साधन नहीं है तो वह दूसरी किसी वृत्तिका अनुसंधान न करे। तीनों वर्णोंकी सेवाको ही जीविकाके उपयोगमें लाये ॥ २ ॥

सद्भिस्तु सह संसर्गः शोभते धर्मदर्शिभिः ।
नित्यं सर्वास्ववस्थासु नासद्भिरिति मे मतिः ॥ ३ ॥
धर्मपर दृष्टि रखनेवाले सत्पुरुषोंके संसर्गमें रहना सदा ही श्रेष्ठ है; परंतु किसी भी दशामें कभी दुष्ट पुरुषोंका संग अच्छा नहीं है, यह मेरा दृढ़ निश्चय है ॥

यथोदयगिरौ द्रव्यं संनिकर्षेण दीप्यते ।
तथा सत्संनिकर्षेण हीनवर्णोऽपि दीप्यते ॥ ४ ॥
जैसे सूर्यका सामीप्य प्राप्त होनेसे उदयाचल पर्वतकी प्रत्येक वस्तु चमक उठती है, उसी प्रकार साधु पुरुषोंके निकट रहनेसे नीच वर्णका मनुष्य भी सद्गुणोंसे सुशोभित होने लगता है ॥ ४ ॥

यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्बरम् ।
तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवेहि मे ॥ ५ ॥
श्वेत वस्त्रको जैसे रंगमें रँगा जाता है, वह वैसा ही रूप धारण कर लेता है। इसी प्रकार जैसा संग किया जाता है, वैसा ही रंग अपने ऊपर चढ़ता है। यह बात मुझसे अच्छी तरह समझ लो ॥ ५ ॥

तस्माद् गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कदाचन ।
अनित्यमिह मर्त्यानां जीवितं हि चलाचलम् ॥ ६ ॥

इसलिये तुम गुणोंमें ही अनुराग रखो, दोषोंमें कभी नहीं; क्योंकि यहाँ मनुष्योंका जीवन अनित्य और चंचल है ॥ ६ ॥

सुखे वा यदि वा दुःखे वर्त मानो विचक्षणः ।
यश्चिनोति शुभान्येव स तन्त्राणीह पश्यति ॥ ७ ॥
जो विद्वान् सुख अथवा दुःखमें रहकर भी सदा शुभकर्मका ही अनुष्ठान करता है, वही यहाँ शास्त्रोंको देखता और समझता है ॥ ७ ॥

धर्मादपेतं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् ।
न तत् सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते ॥ ८ ॥
धर्मके विपरीत कर्म यदि लौकिक दृष्टिसे बहुत लाभदायक हो तो भी बुद्धिमान् पुरुषको उसका सेवन नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे इस जगत्में हितकर नहीं बताया जाता है ॥ ८ ॥

(धर्मेण सहितं यत् तु भवेदल्पफलोदयम् ।
तत् कार्यमविशङ्केन कर्मात्यन्तं सुखावहम् ॥)
यो हृत्वा गोसहस्राणि नृपो दद्यादरक्षिता ।
स शब्दमात्रफलभाग् राजा भवति तस्करः ॥ ९ ॥
जो कार्य धर्मके अनुकूल हो, वह अल्प लाभदायक होनेपर भी निःशंक होकर कर लेने योग्य है; क्योंकि वह अन्तमें अत्यन्त सुख देनेवाला होता है। जो राजा दूसरोंकी हजारों गौएँ छीनकर दान करता है और प्रजाकी रक्षा नहीं करता, वह नाममात्रका ही दानी और राजा है। वास्तवमें तो वह चोर और डाकू है ॥ ९ ॥

स्वयम्भूरसृजच्चाग्रे धातारं लोकसत्कृतम् ।
धातासृजत् पुत्रमेकं लोकानां धारणे रतम् ॥ १० ॥
ईश्वरने सबसे पहले लोकपूजित ब्रह्माको उत्पन्न किया। ब्रह्माने एक पुत्र (पर्जन्य)-को जन्म दिया, जो सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमें तत्पर है ॥ १० ॥

तमर्चयित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत् ।
रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपयोज्यं द्विजातिभिः ॥ ११ ॥
अजिह्यैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रयोक्तृभिः ।
शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ॥ १२ ॥
उसीकी पूजा करके वैश्यको चाहिये कि खेती और पशुपालन आदिके द्वारा उसे अत्यन्त समृद्धिशाली बनाये। राजाको उसकी रक्षा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे कुटिलता, शठता एवं क्रोधको त्यागकर हव्य-कव्यका प्रयोग करते हुए उस अन्न-धनका यज्ञ (लोकहितके कार्य) में सदुपयोग करें। शूद्रोंको यज्ञभूमि तथा त्रैवर्णिकोंके घरोंको झाड़-बुहारकर साफ रखना चाहिये। ऐसा करनेसे धर्मका नाश नहीं होता ॥ ११-१२ ॥

अप्रणष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः ।

सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः ।। १३ ।।

धर्मका नाश न होकर उसका पालन होता रहे तो सारी प्रजा सुखी होती है। राजेन्द्र!

प्रजाओंके सुखी होनेपर स्वर्गमें देवता भी प्रसन्न रहते हैं ।। १३ ।।

तस्माद् यो रक्षति नृपः स धर्मेणेति पूज्यते ।

अधीते चापि यो विप्रो वैश्यो यश्चार्जने रतः ।। १४ ।।

यश्च शुश्रूषते शूद्रः सततं नियतेन्द्रियः ।

अतोऽन्यथा मनुष्येन्द्र स्वधर्मात् परिहीयते ।। १५ ।।

जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करता है, वह उस धर्माचरणके कारण ही लोकमें

पूजित होता है। इसी प्रकार जो ब्राह्मण धर्मपूर्वक स्वाध्याय करता है, जो वैश्य धर्मके

अनुसार धनोपार्जनमें तत्पर रहता है तथा जो शूद्र जितेन्द्रिय भावसे रहकर सर्वदा

द्विजातियोंकी सेवा करता है, वे सभी अपने-अपने धर्माचरणके कारण लोकमें सम्मानित

होते हैं। नरेन्द्र! इसके विपरीत आचरण करनेसे सब लोग अपने धर्मसे गिर जाते हैं ।।

प्राणसंतापनिर्दिष्टाः काकिण्योऽपि महाफलाः ।

न्यायेनोपार्जिता दत्ताः किमुतान्याः सहस्रशः ।। १६ ।।

प्राणोंको कष्ट देकर भी यदि न्यायसे कमायी हुई थोड़ी-सी कौड़ियोंका भी दान किया

जाय तो वे महान् फल देनेवाली होती हैं; फिर जो दूसरी वस्तुएँ हजारोंकी संख्यामें दी जाती

हैं, उनकी तो बात ही क्या है ।। १६ ।।

सत्कृत्य हि द्विजातिभ्यो यो ददाति नराधिपः ।

यादृशं तादृशं नित्यमश्नाति फलमूर्जितम् ।। १७ ।।

जो राजा ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें जैसा दान देता है, वैसा ही उत्तम फलका वह

सदा ही उपभोग करता है ।। १७ ।।

अभिगम्य च तत् तुष्ट्या दत्तमाहुरभिष्टुतम् ।

याचितेन तु यद् दत्तं तदाहुर्मध्यमं बुधाः ।। १८ ।।

स्वयं ही ब्राह्मणके पास जाकर उसे संतुष्ट करते हुए जो दान दिया जाता है, उसे

प्रशंसनीय—उत्तम बताया गया है और याचना करनेपर जो कुछ दिया जाता है, उसे विद्वान्

पुरुष मध्यम श्रेणीका दान कहते हैं ।।

अवज्ञा दीयते यत् तथैवाश्रद्धयापि वा ।

तमाहुरधमं दानं मुनयः सत्यवादिनः ।। १९ ।।

अतिक्रामेन्मज्जमानो विविधेन नरः सदा ।

तथा प्रयत्नं कुर्वीत यथा मुच्येत संशयात् ।। २० ।।

अवहेलना अथवा अश्रद्धासे जो कुछ दिया जाता है, उसे सत्यवादी मुनियोंने अधम

श्रेणीका दान कहा है। डूबता हुआ मनुष्य जिस तरह नाना प्रकारके उपायद्वारा समुद्रसे पार

हो जाता है, वैसे ही तुमको भी सदा ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिस प्रकार संसार-समुद्रसे छुटकारा मिले ॥ १९-२० ॥ दमेन शोभते विप्रः क्षत्रियो विजयेन तु ।
धनेन वैश्यः शूद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते ॥ २१ ॥
ब्राह्मण इन्द्रियसंयमसे, क्षत्रिय युद्धमें विजय पानेसे, वैश्य न्यायपूर्वक उपार्जित धनसे और शूद्र सदा सेवाकार्यमें कुशलताका परिचय देनेसे शोभा पाता है ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां
त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं)

पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके

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चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीता—ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश

पराशर उवाच

प्रतिग्रहागता विप्रे क्षत्रिये युधि निर्जिताः ।
वैश्ये न्यायार्जिताश्चैव शूद्रे शुश्रूषयार्जिताः ॥ १ ॥
स्वल्पाप्यर्थाः प्रशस्यन्ते धर्मस्यार्थे महाफलाः ।
**पराशरजी कहते हैं—**राजन्! ब्राह्मणके यहाँ प्रतिग्रहसे मिला हुआ, क्षत्रियके घर युद्धसे जीतकर लाया हुआ, वैश्यके पास न्यायपूर्वक (खेती आदिसे) कमाया हुआ और शूद्रके यहाँ सेवासे प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी धन हो तो उसकी बड़ी प्रशंसा होती है तथा धर्मके कार्यमें उसका उपभोग हो तो वह महान् फल देनेवाला होता है ॥ १ ½ ॥

नित्यं त्रयाणां वर्णानां शुश्रूषुः शूद्र उच्यते ॥ २ ॥
क्षत्रधर्मा वैश्यधर्मा नाव़ृत्तिः पतते द्विजः ।
शूद्रधर्मा यदा तु स्यात् तदा पतति वै द्विजः ॥ ३ ॥
शूद्रको तीनों वर्णोंका नित्य सेवक बताया जाता है। यदि ब्राह्मण जीविकाके अभावमें क्षत्रिय अथवा वैश्यके धर्मसे जीवन-निर्वाह करे तो वह पतित नहीं होता है; किंतु जब वह शूद्रके धर्मको अपनाता है, तब तत्काल पतित हो जाता है ॥ २-३ ॥

वाणिज्यं पाशुपाल्यं च तथा शिल्पोपजीवनम् ।
शूद्रस्यापि विधीयन्ते यदा वृत्तिर्न जायते ॥ ४ ॥
जब शूद्र सेवावृत्तिसे जीविका न चला सके, तब उसके लिये भी व्यापार, पशुपालन तथा शिल्पकला आदिसे जीवन-निर्वाह करनेकी आज्ञा है ॥ ४ ॥

रङ्गावतरणं चैव तथा रूपोपजीवनम् ।
मद्यमांसोपजीव्यं च विक्रयं लोहचर्मणोः ॥ ५ ॥
अपूर्विणा न कर्तव्यं कर्म लोके विगर्हितम् ।
कृतपूर्वं तु त्यजतो महान् धर्म इति श्रुतिः ॥ ६ ॥
रंगमंचपर स्त्री आदिके वेषमें उतरकर नाचना या खेल दिखाना, बहुरूपियेका काम करना, मदिरा और मांस बेचकर जीविका चलाना तथा लोहे और चमड़ेकी बिक्री करना—ये सब काम (सबके लिये) लोकमें निन्दित माने गये हैं। जिसके घरमें पूर्वपरम्परासे ये काम

न होते आये हों, उसे स्वयं इनका आरम्भ नहीं करना चाहिये। जिसके यहाँ पहलेसे इन्हें करनेकी प्रथा हो, वह भी छोड़ दे तो महान् धर्म होता है—ऐसा शास्त्रका निर्णय है ॥

संसिद्धः पुरुषो लोके यदाचरति पापकम् । मदेनाभिप्लुतमनास्तच्च न ग्राह्यमुच्यते ॥ ७ ॥ यदि कोई जगत्में प्रसिद्ध हुआ पुरुष घमण्डमें आकर या मनमें लोभ भरा रहनेके कारण पापाचरण करने लगे तो उसका वह कार्य अनुकरण करने योग्य नहीं बताया गया है ॥ ७ ॥

श्रूयन्ते हि पुराणेषु प्रजा धिग्दण्डशासनाः । दान्ता धर्मप्रधानाश्च न्यायधर्मानुवृत्तिकाः ॥ ८ ॥ पुराणोंमें सुना जाता है कि पहले अधिकांश मनुष्य संयमी, धार्मिक तथा न्यायोचित आचारका ही अनुसरण करनेवाले थे। उस समय अपराधियोंको धिक्कारमात्रका ही दण्ड दिया जाता था ॥ ८ ॥

धर्म एव सदा नृणामिह राजन् प्रशस्यते । धर्मवृद्धा गुणानैव सेवन्ते हि नरा भुवि ॥ ९ ॥ राजन्! इस जगत्में सदा मनुष्योंके धर्मकी ही प्रशंसा होती आयी है। धर्ममें बढ़े-चढ़े लोग इस भूतलपर केवल सद्गुणोंका ही सेवन करते हैं ॥ ९ ॥

तं धर्ममसुरास्तात नामृष्यन्त जनाधिप । विवर्धमानाः क्रमशस्तत्र तेऽन्वाविशन् प्रजाः ॥ १० ॥ तात! जनेश्वर! परंतु उस धर्मको असुर नहीं सह सके। वे क्रमशः बढ़ते हुए प्रजाके शरीरमें समा गये ॥ १० ॥

तासां दर्पः समभवत् प्रजानां धर्मनाशनः । दर्पात्मनां ततः पश्चात् क्रोधस्तासामजायत ॥ ११ ॥ तब प्रजाओंमें धर्मको नष्ट करनेवाला दर्प प्रकट हुआ। फिर जब प्रजाओंके मनमें दर्प आ गया, तब क्रोधका भी प्रादुर्भाव हो गया ॥ ११ ॥

ततः क्रोधाभिभूतानां वृत्तं लज्जासमन्वितम् । ह्रीश्चैवाप्यनशद् राजंस्ततो मोहो व्यजायत ॥ १२ ॥ राजन्! तदनन्तर क्रोधसे आक्रान्त होनेपर मनुष्योंके लज्जायुक्त सदाचारका लोप हो गया। उनका संकोच भी जाता रहा। इसके बाद उनमें मोहकी उत्पत्ति हुई ॥ १२ ॥

ततो मोहपरीतास्ता नापश्यन्त यथा पुरा । परस्परावमर्देन वर्धयन्त्यो यथासुखम् ॥ १३ ॥ मोहसे घिर जानेपर उनमें पहले-जैसी विवेकपूर्ण दृष्टि नहीं रह गयी; अतः वे परस्पर एक-दूसरेका विनाश करके अपने-अपने सुखको बढ़ानेकी चेष्टा करने लगे ॥ १३ ॥

ताः प्राप्य तु स धिग्दण्डो न कारणमतोऽभवत् ।

ततोऽभ्यगच्छन् देवांश्च ब्राह्मणांश्चावमन्य ह ॥ १४ ॥
उन बिगड़े हुए लोगोंको पाकर धिक्कारका दण्ड उन्हें राहपर लानेमें सफल न हो सका। सभी मनुष्य देवता और ब्राह्मणोंका अपमान करके मनमाने तौरपर विषय-भोगोंका सेवन करने लगे ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु देवा देववरं शिवम् ।
अगच्छन् शरणं धीरं बहुरूपं गुणाधिकम् ॥ १५ ॥
ऐसा अवसर उपस्थित होनेपर सम्पूर्ण देवता अनेक रूपधारी, अधिक गुणशाली, धीरजस्वभाव देवेश्वर भगवान् शिवकी शरणमें गये ॥ १५ ॥
तेन स्म ते गगनगाः सपुराः पातिताः क्षितौ ।
त्रिधाप्येकेन बाणेन देवाप्यायिततेजसा ॥ १६ ॥
तब शिवजीने देवताओंके द्वारा बढ़ाये हुए तेजसे युक्त एक ही शक्तिशाली बाणके द्वारा तीन नगरोंसहित आकाशमें विचरनेवाले उन समस्त असुरोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ १६ ॥
तेषामधिपतिस्त्वासीद् भीमो भीमपराक्रमः ।
देवतानां भयकरः स हतः शूलपाणिना ॥ १७ ॥
उन असुरोंका स्वामी भयंकर आकारवाला तथा भीषण पराक्रमी था। देवताओंको वह सदा भयभीत किये रहता था; किंतु भगवान् शूलपाणिने उसे भी मार डाला ॥ १७ ॥
तस्मिन् हतेऽथ स्वं भावं प्रत्यपद्यन्त मानवाः ।
प्रापद्यन्त च वेदान् वै शास्त्राणि च यथा पुरा ॥ १८ ॥
उस असुरके मारे जानेपर सब मनुष्य प्रकृतिस्थ हो गये तथा उन्हें पूर्ववत् वेद और शास्त्रोंका ज्ञान हो गया ॥ १८ ॥
ततोऽभिषिच्य राज्येन देवानां दिवि वासवम् ।
सप्तर्षयश्चान्वयुञ्जन् नराणां दण्डधारणे ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् सप्तर्षियोंने इन्द्रको स्वर्गमें देवताओंके राज्यपर अभिषिक्त किया और वे स्वयं मनुष्यके शासन-कार्यमें लग गये ॥ १९ ॥
सप्तर्षीणामथोर्ध्वं च विपृथुर्नाम पार्थिवः ।
राजानः क्षत्रियाश्चैव मण्डलेषु पृथक् पृथक् ॥ २० ॥
सप्तर्षियोंके बाद विपृथु नामक राजा भूमण्डलका स्वामी हुआ तथा और भी बहुत-से क्षत्रिय भिन्न-भिन्न मण्डलोंके राजा हुए ॥ २० ॥
महाकुलेषु ये जाता वृद्धाः पूर्वतराश्च ये ।
तेषामप्यासुरो भावो हृदयान्नापसर्पति ॥ २१ ॥
उस समय जो उच्च कुलोंमें उत्पन्न हुए थे, अवस्था और गुणोंमें बढ़े-चढ़े थे तथा जो उनसे भी पूर्ववर्ती पुरुष थे, उनके हृदयसे भी आसुरभाव पूर्णरूपसे नहीं निकला

था ।। २१ ।। तस्मात् तेनैव भावेन सानुषङ्गेण पार्थिवाः । आसुराण्येव कर्माणि न्यसेवन् भीमविक्रमाः ।। २२ ।। अतः उसी आनुषंगिक आसुरभावसे युक्त होकर कितने ही भयंकर पराक्रमी भूपाल असुरोचित कर्मोंका ही सेवन करने लगे ।। २२ ।। प्रत्यतिष्ठंश्च तेष्वेव तान्येव स्थापयन्त्यपि । भजन्ते तानि चाद्यापि ये बालिशतरा नराः ।। २३ ।। जो मनुष्य अत्यन्त मूर्ख हैं, वे आज भी उन्हीं आसुरभावोंमें स्थित हैं, उन्हींकी स्थापना करते हैं और उन्हींको सब प्रकारसे अपनाते हैं ।। २३ ।। तस्मादहं ब्रवीमि त्वां राजन् संचिन्त्य शास्त्रतः । संसिद्धाधिगमं कुर्यात् कर्म हिंसात्मकं त्यजेत् ।। २४ ।। अतः राजन्! मैं शास्त्रके अनुसार खूब सोच-विचारकर कहता हूँ कि मनुष्यको उन्नत होनेका प्रयत्न तो करना चाहिये, किंतु हिंसात्मक कर्मका त्याग कर देना चाहिये ।। २४ ।। न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षणः । धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते ।। २५ ।। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह धर्म करनेके लिये न्यायको त्यागकर पापमिश्रित मार्गसे धनका संग्रह न करे; क्योंकि उसे कल्याणकारी नहीं बताया जाता है ।। २५ ।। स त्वमेवंविधो दान्तः क्षत्रियः प्रियबान्धवः । प्रजा भृत्यांश्च पुत्रांश्च स्वधर्मेणानुपालय ।। २६ ।। नरेश्वर! तुम भी इसी प्रकार जितेन्द्रिय क्षत्रिय होकर बन्धु-बान्धवोंसे प्रेम रखते हुए प्रजा, भृत्य और पुत्रोंका स्वधर्मके अनुसार पालन करो ।। २६ ।। इष्टानिष्टसमायोगो वैरं सौहार्दमेव च । अथ जातिसहस्राणि बहूनि परिवर्तते ।। २७ ।। इष्ट और अनिष्टका संयोग, वैर और सौहार्द—इन सबका अनुभव करते-करते जीवके कई सहस्र जन्म बीत जाते हैं ।। २७ ।। तस्माद् गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कथंचन । निर्गुणोऽपि हि दुर्बुद्धिरात्मनः सोऽतिरज्यते ।। २८ ।। इसलिये तुम सद्गुणोंमें ही अनुराग रखो, दोषोंमें किसी प्रकार नहीं; क्योंकि गुणहीन और दुर्बुद्धि मनुष्य भी अपने गुणोंके अभिमानसे अत्यन्त संतुष्ट रहता है ।। मानुषेषु महाराज धर्माधर्मौ प्रवर्ततः । न तथान्येषु भूतेषु मनुष्यरहितेष्विह ।। २९ ।। महाराज! यहाँ मनुष्योंमें जैसे धर्म और अधर्म निवास करते हैं, उस प्रकार मनुष्येतर अन्य प्राणियोंमें नहीं ।। २९ ।।

धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा ।
आत्मभूतः सदा लोके चरेद् भूतान्यहिंसया ॥ ३० ॥

धर्मशील विद्वान् मनुष्य सचेष्ट हो चाहे चेष्टारहित, उसे चाहिये कि सदैव जगत्‌में सबके प्रति आत्मभाव रखकर किसी भी प्राणीकी हिंसा न करते हुए समभावसे व्यवहार करे ॥ ३० ॥
यदा व्यपेतहृल्लेखं मनो भवति तस्य वै ।
नानृतं चैव भवति तदा कल्याणमृच्छति ॥ ३१ ॥

जब मनुष्यका मन कामना और कर्म-संस्कारोंसे रहित हो जाता है तथा वह मिथ्याचारसे रहित हो जाता है, उस समय उसे कल्याणकी प्राप्ति होती है ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां
चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९४ ॥

पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश

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पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीता—विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश

पराशर उवाच

एष धर्मविधिस्तात गृहस्थस्य प्रकीर्तितः ।
तपोविधिं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ १ ॥
पराशरजी कहते हैं—तात! यह मैंने गृहस्थके धर्मका विधान बताया है। अब मैं तपकी विधि बताऊँगा, उसे मेरे मुखसे सुनो ॥ १ ॥

प्रायेण च गृहस्थस्य ममत्वं नाम जायते ।
सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावै राजसतामसैः ॥ २ ॥
नरश्रेष्ठ! गृहस्थ पुरुषको प्रायः राजस और तामस भावोंके संसर्गवश पदार्थ और व्यक्तियोंमें ममता हो जाती है ॥ २ ॥

गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च ।
दाराः पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै ॥ ३ ॥
घरका आश्रय लेते ही मनुष्यका गौ, खेती-बारी, धन-दौलत, स्त्री-पुत्र तथा भरण-पोषणके योग्य अन्यान्य कुटुम्बीजनोंसे सम्बन्ध स्थापित हो जाता है ॥ ३ ॥

एवं तस्य प्रवृत्तस्य नित्यमेवानुपश्यतः ।
रागद्वेषौ विवर्धेते ह्यनित्यत्वमपश्यतः ॥ ४ ॥
इस प्रकार प्रवृत्तिमार्गमें रहकर वह नित्य ही उन वस्तुओंको देखता है, किंतु उनकी अनित्यताकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती; इसलिये उसके मनमें इनके प्रति राग और द्वेष बढ़ने लगते हैं ॥ ४ ॥

रागद्वेषाभिभूतं च नरं द्रव्यवशानुगम् ।
मोहजाता रतिर्नाम समुपैति नराधिप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! राग और द्वेषके वशीभूत होकर जब मनुष्य द्रव्यमें आसक्त हो जाता है, तब मोहकी कन्या रति उसके पास आ जाती है ॥ ५ ॥

कृतार्थं भोगिनं मत्वा सर्वो रतिपरायणः ।
लाभं ग्राम्यसुखादन्यं रतितो नानुपश्यति ॥ ६ ॥
तब रतिकी उपासनामें लगे हुए सभी लोग भोगीको ही कृतार्थ मानकर रतिके द्वारा जो विषय-सुख प्राप्त होता है, उससे बढ़कर दूसरा कोई लाभ नहीं समझते हैं ॥

ततो लोभाभिभूतात्मा संगाद् वर्धयते जनम् ।

पुष्ट्यर्थं चैव तस्येह जनस्यार्थं चिकीर्षति ॥ ७ ॥ तदनन्तर उनके मनपर लोभका अधिकार हो जाता है और वे आसक्तिवश अपने परिजनोंकी संख्या बढ़ाने लगते हैं। इसके बाद उन कुटुम्बीजनोंके पालन-पोषणके लिये मनुष्यके मनमें धन-संग्रहकी इच्छा होती है ॥ ७ ॥

स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः । बालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षयाच्चानुतप्यते ॥ ८ ॥ यद्यपि मनुष्य जानता है कि अमुक काम करना पाप है, तो भी वह धनके लिये उसका सेवन करता है। बाल-बच्चोंके स्नेहमें उसका मन डूबा रहता है और उनमेंसे जब कोई मर जाता है तब उनके लिये वह बारंबार संतप्त होता है ॥ ८ ॥

ततो मानेन सम्पन्नो रक्षन्नात्मपराजयम् । करोति येन भोगी स्यामिति तस्माद् विनश्यति ॥ ९ ॥ धनसे जब लोकमें सम्मान बढ़ता है, तब वह मानसम्पन्न पुरुष सदा अपने अपमानसे बचनेके लिये प्रयत्न करता रहता है एवं 'मैं भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न होऊँ' यह उद्देश्य लेकर ही वह सारा कार्य करता है और इसी प्रयत्नमें एक दिन नष्ट हो जाता है ॥ ९ ॥

तथा हि बुद्धियुक्तानां शाश्वतं ब्रह्मवादिनाम् । अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ॥ १० ॥ वास्तवमें जो शुभ कर्मोंका अनुष्ठान तो करते हैं, परन्तु उनसे सुख पानेकी इच्छाको त्याग देते हैं, उन समत्व-बुद्धिसे युक्त ब्रह्मवादी पुरुषोंको ही सनातन पदकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥

स्नेहायतननाशाच्च धननाशाच्च पार्थिव । आधिव्याधिप्रतापाच्च निर्वेदमुपगच्छति ॥ ११ ॥ पृथ्वीनाथ! संसारी जीवोंको तो जब उनके स्नेहके आधारभूत स्त्री-पुत्र आदिका नाश हो जाता, धन चला जाता और रोग तथा चिन्तासे कष्ट उठाना पड़ता है, तभी वैराग्य होता है ॥ ११ ॥

निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाच्छास्त्रदर्शनम् । शास्त्रार्थदर्शनाद् राजंस्तप एवानुपश्यति ॥ १२ ॥ राजन्! वैराग्यसे मनुष्यको आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा होती है। जिज्ञासासे शास्त्रोंके स्वाध्यायमें मन लगता है तथा शास्त्रोंके अर्थ और भावके ज्ञानसे वह तपको ही कल्याणका साधन समझता है ॥ १२ ॥

दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नरः प्रत्यवमर्शवान् । यो वै प्रियसुखे क्षीणे तपः कर्तुं व्यवस्यति ॥ १३ ॥ नरेन्द्र! संसारमें ऐसा विवेकी मनुष्य दुर्लभ है, जो स्त्री-पुत्र आदि प्रियजनोंसे मिलनेवाले सुखके न रहनेपर तपमें प्रवृत्त होनेका ही निश्चय करता है ॥ १३ ॥

तपः सर्वगतं तात हीनस्यापि विधीयते । जितेन्द्रियस्य दान्तस्य स्वर्गमार्गप्रवर्तकम् ॥ १४ ॥ तात! तपस्यामें सभीका अधिकार है। जितेन्द्रिय और मनोनिग्रहसम्पन्न हीन वर्णके लिये भी तपका विधान है; क्योंकि तप पुरुषको स्वर्गकी राहपर लानेवाला है ॥ १४ ॥ प्रजापतिः प्रजाः पूर्वमसृजत् तपसा विभुः । क्वचित् क्वचिद् ब्रह्मपरो व्रतान्यास्थाय पार्थिव ॥ १५ ॥ भूपाल! पूर्वकालमें शक्तिशाली प्रजापतिने तपमें स्थित होकर और कभी-कभी ब्रह्मपरायण व्रतमें स्थित होकर संसारकी रचना की थी ॥ १५ ॥ आदित्या वसवो रुद्रास्तथैवाग्न्यश्विमारुताः । विश्वेदेवास्तथा साध्याः पितरोऽथ मरुद्गणाः ॥ १६ ॥ यक्षराक्षसगन्धर्वाः सिद्धाश्चान्ये दिवौकसः । संसिद्धास्तपसा तात ये चान्ये स्वर्गवासिनः ॥ १७ ॥ तात! आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, अश्विनीकुमार, वायु, विश्वेदेव, साध्य, पितर, मरुद्गण, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सिद्ध तथा अन्य जो स्वर्गवासी देवता हैं, वे सब-के-सब तपस्यासे ही सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ये चादौ ब्राह्मणाः सृष्टा ब्रह्मणा तपसा पुरा । ते भावयन्तः पृथिवीं विचरन्ति दिवं तथा ॥ १८ ॥ ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन मरीचि आदि ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था, वे तपके ही प्रभावसे पृथ्‍वी और आकाशको पवित्र करते हुए ही विचरते हैं ॥ १८ ॥ मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः । महाकुलेषु दृश्यन्ते तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ १९ ॥ मर्त्यलोकमें भी जो राजे-महाराजे तथा अन्यान्य गृहस्थ महान् कुलोंमें उत्पन्न देखे जाते हैं, वह सब उनकी तपस्याका ही फल है ॥ १९ ॥ कौशिकानि च वस्त्राणि शुभान्याभरणानि च । वाहनासनपानानि तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २० ॥ रेशमी वस्त्र, सुन्दर आभूषण, वाहन, आसन और उत्तम खान-पान आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥ मनोऽनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः । वासः प्रासादपृष्ठे च तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २१ ॥ मनके अनुकूल चलनेवाली सहस्रों रूपवती युवतियाँ और महलोंका निवास आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥ २१ ॥ शयनानि च मुख्यानि भोज्यानि विविधानि च । अभिप्रेतानि सर्वाणि भवन्ति शुभकर्मणाम् ॥ २२ ॥

श्रेष्ठ शय्या, भाँति-भाँतिके उत्तम भोजन तथा सभी मनोवांछित पदार्थ पुण्यकर्म करनेवाले लोगोंको ही प्राप्त होते हैं ॥ २२ ॥ नाप्राप्यं तपसः किंचित् त्रैलोक्येऽपि परंतप । उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ॥ २३ ॥ परंतप! त्रिलोकीमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तपस्यासे प्राप्त न हो सके; किंतु जिन्होंने काम्य अथवा निषिद्ध कर्म नहीं किये हैं, उनकी तपस्याका फल सुखभोगोंका परित्याग ही है ॥ २३ ॥ सुखितो दुःखितो वापि नरो लोभं परित्यजेत् । अवेक्ष्य मनसा शास्त्रं बुद्ध्या च नृपसत्तम ॥ २४ ॥ नृपश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, मन और बुद्धिसे शास्त्रका तत्त्व समझकर लोभका परित्याग कर दे ॥ २४ ॥ असंतोषोऽसुखायेति लोभादिन्द्रियसम्भ्रमः । ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता ॥ २५ ॥ असंतोष दुःखका ही कारण है। लोभसे मन और इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, उससे मनुष्यकी बुद्धि उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे बिना अभ्यासके विद्या ॥ नष्टप्रज्ञो यदा तु स्यात् तदा न्यायं न पश्यति । तस्मात् सुखक्षये प्राप्ते पुमानुग्रं तपश्चरेत् ॥ २६ ॥ जब मनुष्यकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, तब वह न्यायको नहीं देख पाता अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय नहीं कर पाता है। इसलिये सुखका क्षय हो जानेपर प्रत्येक पुरुषको घोर तपस्या करनी चाहिये ॥ यदिष्टं तत् सुखं प्राहुर्द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते । कृताकृतस्य तपसः फलं पश्यस्व यादृशम् ॥ २७ ॥ जो अपनेको प्रिय जान पड़ता है, उसे सुख कहते हैं तथा जो मनके प्रतिकूल होता है, वह दुःख कहलाता है। तपस्या करनेसे सुख और न करनेसे दुःख होता है। इस प्रकार तप करने और न करनेका जैसा फल होता है, उसे तुम भलीभाँति समझ लो ॥ २७ ॥ नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषयांश्चोपभुञ्जते । प्राकाश्यं चैव गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ॥ २८ ॥ मनुष्य पापरहित तपस्या करके सदा अपना कल्याण ही देखते हैं। मनोवांछित विषयोंका उपभोग करते हैं और संसारमें उनकी ख्याति होती है ॥ २८ ॥ अप्रियाण्यवमानांश्च दुःखं बहुविधात्मकम् । फलार्थी तत्फलं त्यक्त्वा प्राप्नोति विषयात्मकम् ॥ २९ ॥ मनके अनुकूल फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सकाम कर्मका अनुष्ठान करके अप्रिय, अपमान और नाना प्रकारके दुःख पाता है, किंतु उस फलका परित्याग करके वह

सम्पूर्ण विषयोंके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ २९ ॥

धर्मे तपसि दाने च विचिकित्सास्य जायते ।
स कृत्वा पापकान्येव निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३० ॥
जिसे धर्म, तपस्या और दानमें संशय उत्पन्न हो जाता है, वह पापकर्म करके नरकमें पड़ता है ॥ ३० ॥

सुखे तु वर्तमानो वै दुःखे वापि नरोत्तम ।
सुवृत्ताद् यो न चलते शास्त्रचक्षुः स मानवः ॥ ३१ ॥
नरश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, जो सदाचारसे कभी विचलित नहीं होता, वही शास्त्रका ज्ञाता है ॥

इषुप्रापातमात्रं हि स्पर्शयोगे रतिः स्मृता ।
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशाम्पते ॥ ३२ ॥
प्रजानाथ! बाणको धनुषसे छूटकर पृथ्वीपर गिरनेमें जितनी देर लगती है, उतना ही समय स्पर्शेन्द्रिय, रसना, नेत्र, नासिका और कानके विषयोंका सुख अनुभव करनेमें लगता है अर्थात् विषयोंका सुख क्षणिक है ॥

ततोऽस्य जायते तीव्रा वेदना तत्क्षयात् पुनः ।
अबुधा न प्रशंसन्ति मोक्षं सुखमनुत्तमम् ॥ ३३ ॥
फिर वह सुख जब नष्ट हो जाता है, तब उसके लिये मनमें बड़ी वेदना होती है। इतनेपर भी अज्ञानी पुरुष (विषयोंमें ही लिप्त रहते हैं, वे) सर्वोत्तम मोक्ष-सुखकी प्रशंसा नहीं करते हैं अर्थात् उसे नहीं चाहते ॥ ३३ ॥

ततः फलार्थं सर्वस्य भवन्ति ज्यायसे गुणाः ।
धर्मवृत्त्या च सततं कामार्थाभ्यां न हीयते ॥ ३४ ॥
अतः प्रत्येक विवेकी पुरुषके मनमें श्रेष्ठ मोक्षफलकी प्राप्ति करानेके लिये शम-दम आदि गुणोंकी उत्पत्ति होती है। निरन्तर धर्मका पालन करनेसे मनुष्य कभी धन और भोगोंसे वंचित नहीं रहता ॥ ३४ ॥

अप्रयत्नागताः सेव्या गृहस्थैर्विषयाः सदा ।
प्रयत्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ॥ ३५ ॥
इसलिये गृहस्थ पुरुषको सदा बिना प्रयत्न अपने-आप प्राप्त हुए विषयोंका ही सेवन करना चाहिये और प्रयत्न करके तो अपने धर्मका ही पालन करना चाहिये। यही मेरा मत है ॥ ३५ ॥

मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम् ।
क्रियाधर्मविमुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम् ॥ ३६ ॥
क्रियमाणं यदा कर्म नाशं गच्छति मानुषम् ।
तेषां नान्यदृते लोके तपसः कर्म विद्यते ॥ ३७ ॥

जब उत्तम कुलमें उत्पन्न, सम्मानित तथा शास्त्रके अर्थको जाननेवाले पुरुषोंका और असमर्थताके कारण कर्म-धर्मसे रहित एवं आत्मतत्त्वसे अनभिज्ञ मनुष्योंका भी किया हुआ लौकिक कर्म नष्ट हो ही जाता है, तब यही निष्कर्ष निकलता है कि जगत्में उनके लिये तपके सिवा दूसरा कोई सत्कर्म नहीं है ॥ ३६-३७ ॥

सर्वात्मनानुकुर्वीत गृहस्थः कर्मनिश्चयम् ।
दाक्ष्येण हव्यकव्यार्थं स्वधर्मे विचरन् नृप ॥ ३८ ॥
नरेश्वर! गृहस्थको सर्वथा अपने कर्तव्यका निश्चय करके स्वधर्मका पालन करते हुए कुशलतापूर्वक यज्ञ तथा श्राद्ध आदि कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ३८ ॥

यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
एवमाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ३९ ॥
जैसे सम्पूर्ण नदियाँ और नद समुद्रमें जाकर मिलते हैं, उसी प्रकार समस्त आश्रम गृहस्थका ही सहारा लेते हैं ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां
पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९५ ॥

पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर

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षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराशरगीता—वर्णविशेषकी उत्पत्तिका रहस्य, तपोबलसे उत्कृष्ट वर्णकी प्राप्ति, विभिन्न वर्णोंके विशेष और सामान्य धर्म, सत्कर्मकी श्रेष्ठता तथा हिंसारहित धर्मका वर्णन

जनक उवाच

वर्णो विशेषवर्णानां महर्षे केन जायते ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
जनकने पूछा— वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ब्राह्मण आदि विशेष-विशेष वर्णोंका जो वर्ण है, वह कैसे उत्पन्न होता है? यह मैं जानना चाहता हूँ। आप इस विषयको बतायें ॥ १ ॥

यदेतज्जायतेऽपत्यं स एवायमिति श्रुतिः ।
कथं ब्राह्मणतो जातो विशेषग्रहणं गतः ॥ २ ॥
श्रुति कहती है कि जिससे यह संतान उत्पन्न होती है, तद्रूप ही समझी जाती है अर्थात् संततिके रूपमें जन्मदाता पिता ही नूतन जन्म धारण करता है। ऐसी दशामें प्रारम्भमें ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंसे ही सबका जन्म हुआ है, तब उनकी क्षत्रिय आदि विशेष संज्ञा कैसे हो गयी? ॥ २ ॥

पराशर उवाच

एवमेतन्महाराज येन जातः स एव सः ।
तपसस्त्वपकर्षेण जातिग्रहणतां गतः ॥ ३ ॥
पराशरजीने कहा— महाराज! यह ठीक है कि जिससे जो जन्म लेता है, उसीका वह स्वरूप होता है तथापि तपस्याकी न्यूनताके कारण लोग निकृष्ट जातिको प्राप्त हो गये हैं ॥ ३ ॥

सुक्षेत्राच्च सुबीजाच्च पुण्यो भवति सम्भवः ।
अतोऽन्यतरतो हीनादवरो नाम जायते ॥ ४ ॥
उत्तम क्षेत्र और उत्तम बीजसे जो जन्म होता है, वह पवित्र ही होता है। यदि क्षेत्र और बीजमेंसे एक भी निम्नकोटिका हो तो उससे निम्न संतानकी ही उत्पत्ति होती है ॥ ४ ॥

वक्त्राद् भुजाभ्यामूरुभ्यां पद्भ्यां चैवाथ जज्ञिरे ।
सृजतः प्रजापतेर्लोकानिति धर्मविदो विदुः ॥ ५ ॥
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजी जब मानव-जगत्की सृष्टि करने लगे, उस समय उनके मुख, भुजा, ऊरु और पैर—इन अंगोंसे मनुष्योंका प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ५ ॥

मुखजा ब्राह्मणास्तात बाहुजाः क्षत्रियाः स्मृताः ।
ऊरुजा धनिनो राजन् पादजाः परिचारकाः ॥ ६ ॥
तात! जो मुखसे उत्पन्न हुए, वे ब्राह्मण कहलाये। दोनों भुजाओंसे उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंको क्षत्रिय माना गया। राजन्! जो ऊरुओं (जाँघों) से उत्पन्न हुए, वे धनवान् (वैश्य) कहे गये; जिनकी उत्पत्ति चरणोंसे हुई, वे सेवक या शूद्र कहलाये ॥ ६ ॥

चतुर्णामेव वर्णानामागमः पुरुषर्षभ ।
अतोऽन्ये त्वतिरिक्ता ये ते वै संकरजाः स्मृताः ॥ ७ ॥
पुरुषप्रवर! इस प्रकार ब्रह्माजीके चार अंगोंसे चार वर्णोंकी ही उत्पत्ति हुई। इनसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे मनुष्य हैं, वे इन्हीं चार वर्णोंके सम्मिश्रणसे उत्पन्न होनेके कारण वर्णसंकर कहलाते हैं ॥ ७ ॥

क्षत्रियातिरथाम्बष्ठा उग्रा वैदेहकास्तथा ।
श्वपाकाः पुल्कसाः स्तेना निषादाः सूतमागधाः ॥ ८ ॥
अयोगाः करणा व्रात्याश्चाण्डालाश्च नराधिप ।
एते चतुर्भ्यो वर्णेभ्यो जायन्ते वै परस्परात् ॥ ९ ॥
नरेश्वर! क्षत्रिय, अतिरथ, अम्बष्ठ, उग्र, वैदेह, श्वपाक, पुल्कस, स्तेन, निषाद, सूत, मागध, अयोग, करण, व्रात्य और चाण्डाल—ये ब्राह्मण आदि चार वर्णोंसे अनुलोम और विलोम वर्णकी स्त्रियोंके साथ परस्पर संयोग होनेसे उत्पन्न होते हैं ॥ ८-९ ॥

जनक उवाच

ब्रह्मणैकेन जातानां नानात्वं गोत्रतः कथम् ।
बहूनीह हि लोके वै गोत्राणि मुनिसत्तम ॥ १० ॥
**जनकने पूछा—**मुनिश्रेष्ठ! जब सबको एकमात्र ब्रह्माजीने ही जन्म दिया है, तब मनुष्योंके भिन्न-भिन्न गोत्र कैसे हुए? इस जगत्में मनुष्योंके बहुत-से गोत्र सुने जाते हैं ॥ १० ॥

यत्र तत्र कथं जाताः स्वयोनिं मुनयो गताः ।
शुद्धयोनौ समुत्पन्ना वियोनौ च तथा परे ॥ ११ ॥
ऋषि-मुनि जहाँ-तहाँ जन्म ग्रहण करके अर्थात् जो शुद्ध योनिमें और दूसरे जो विपरीत योनिमें उत्पन्न हुए हैं, वे सब ब्राह्मणत्वको कैसे प्राप्त हुए? ॥ ११ ॥

पराशर उवाच

राजन्नेतद् भवेद् ग्राह्यमपकृष्टेन जन्मना ।
महात्मनां समुत्पत्तिस्तपसा भावितात्मनाम् ॥ १२ ॥
**पराशरजीने कहा—**राजन्! तपस्यासे जिनके अन्तःकरण शुद्ध हो गये हैं, उन महात्मा पुरुषोंके द्वारा जिस संतानकी उत्पत्ति होती है, अथवा वे स्वेच्छासे जहाँ-कहीं भी

जन्म ग्रहण करते हैं, वह क्षेत्रकी दृष्टिसे निकृष्ट होनेपर भी उसे उत्कृष्ट ही मानना चाहिये ।। १२ ।।

उत्पाद्य पुत्रान् मुनयो नृपते यत्र तत्र ह ।
स्वेनैव तपसा तेषामृषित्वं विदधुः पुनः ।। १३ ।।
नरेश्वर! मुनियोंने जहाँ-तहाँ कितने ही पुत्र उत्पन्न करके उन सबको अपने ही तपोबलसे ऋषि बना दिया ।। १३ ।।

पितामहश्च मे पूर्वमृष्यशृङ्गश्च काश्यपः ।
वेदस्ताण्ड्यः कृपश्चैव कक्षीवान् कमठादयः ।। १४ ।।
यवक्रीतश्च नृपते द्रोणश्च वदतां वरः ।
आयुर्मतङ्गो दत्तश्च द्रुपदो मत्स्य एव च ।। १५ ।।
एते स्वां प्रकृतिं प्राप्ता वैदेह तपसोऽऽश्रयात् ।
प्रतिष्ठिता वेदविदो दमेन तपसैव हि ।। १६ ।।
विदेहराज! मेरे पितामह वसिष्ठजी, काश्यप-गोत्रीय ऋष्यशृङ्ग, वेद, ताण्ड्य, कृप, कक्षीवान्, कमठ आदि, यवक्रीत, वक्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोण, आयु, मतंग, दत्त, द्रुपद तथा मत्स्य—ये सब तपस्याका आश्रय लेनेसे ही अपनी-अपनी प्रकृतिको प्राप्त हुए थे। इन्द्रियसंयम और तपसे ही वे वेदोंके विद्वान् तथा समाजमें प्रतिष्ठित हुए थे ।।

मूलगोत्राणि चत्वारि समुत्पन्नानि पार्थिव ।
अङ्गिराः कश्यपश्चैव वसिष्ठो भृगुरेव च ।। १७ ।।
कर्मतोऽन्यानि गोत्राणि समुत्पन्नानि पार्थिव ।
नामधेयानि तपसा तानि च ग्रहणं सताम् ।। १८ ।।
पृथ्वीनाथ! पहले अंगिरा, कश्यप, वसिष्ठ और भृगु—ये ही चार मूल गोत्र प्रकट हुए थे। अन्य गोत्र कर्मके अनुसार पीछे उत्पन्न हुए हैं। वे गोत्र और उनके नाम उन गोत्र-प्रवर्तक महर्षियोंकी तपस्यासे ही साधु-समाजमें सुविख्यात एवं सम्मानित हुए हैं ।। १७-१८ ।।

जनक उवाच

विशेषधर्मान् वर्णानां प्रब्रूहि भगवन् मम ।
ततः सामान्यधर्मांश्च सर्वत्र कुशलो ह्यसि ।। १९ ।।
**जनकने पूछा—**भगवन्! आप मुझे सब वर्णोंके विशेष धर्म बताइये, फिर सामान्य धर्मोंका भी वर्णन कीजिये; क्योंकि आप सब विषयोंका प्रतिपादन करनेमें कुशल हैं ।। १९ ।।

पराशर उवाच

प्रतिग्रहो याजनं च तथैवाध्यापनं नृप ।
विशेषधर्मा विप्राणां रक्षा क्षत्रस्य शोभना ।। २० ।।

पराशरजीने कहा—राजन्! दान लेना, यज्ञ कराना तथा विद्या पढ़ाना—ये ब्राह्मणोंके विशेष धर्म हैं (जो उनकी जीविकाके साधन हैं)। प्रजाकी रक्षा करना क्षत्रियके लिये श्रेष्ठ धर्म है॥ २०॥
कृषिश्च पशुपाल्यं च वाणिज्यं च विशामपि।
द्विजानां परिचर्या च शूद्रकर्म नराधिप॥ २१॥
नरेश्वर! कृषि, पशुपालन और व्यापार—ये वैश्योंके कर्म हैं तथा द्विजातियोंकी सेवा शूद्रका धर्म है॥ २१॥
विशेषधर्मा नृपते वर्णानां परिकीर्तिताः।
धर्मान् साधारणांस्तात विस्तरेण शृणुष्व मे॥ २२॥
महाराज! ये वर्णोंके विशेष धर्म बताये गये हैं। तात! अब उनके साधारण धर्मोंका विस्तारपूर्वक वर्णन मुझसे सुनो॥ २२॥
आनृशंस्यमहिंसा चाप्रमादः संविभागिता।
श्राद्धकर्मातिथेयं च सत्यमक्रोध एव च॥ २३॥
स्वेषु दारेषु संतोषः शौचं नित्यानसूयता।
आत्मज्ञानं तितिक्षा च धर्माः साधारणा नृप॥ २४॥
क्रूरताका अभाव (दया), अहिंसा, अप्रमाद (सावधानी), देवता-पितर आदिको उनके भाग समर्पित करना अथवा दान देना, श्राद्धकर्म, अतिथिसत्कार, सत्य, अक्रोध, अपनी ही पत्नीमें संतुष्ट रहना, पवित्रता रखना, कभी किसीके दोष न देखना, आत्मज्ञान तथा सहनशीलता—ये सभी वर्णोंके सामान्य धर्म हैं॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः।
अत्र तेषामधीकारो धर्मेषु द्विपदां वर॥ २५॥
नरश्रेष्ठ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन वर्ण द्विजाति कहलाते हैं। उपर्युक्त धर्मोंमें इन्हींका अधिकार है॥
विकर्मावस्थिता वर्णाः पतन्ते नृपते त्रयः।
उन्नमन्ति यथासन्तमाश्रित्येह स्वकर्मसु॥ २६॥
नरेश्वर! ये तीन वर्ण विपरीत कर्मोंमें प्रवृत्त होनेपर पतित हो जाते हैं। सत्पुरुषोंका आश्रय ले अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहनेसे जैसे इनकी उन्नति होती है, वैसे ही विपरीत कर्मोंके आचरणसे पतन भी हो जाता है॥ २६॥
न चापि शूद्रः पततीति निश्चयो
न चापि संस्कारमिहार्हतीति वा।
श्रुतिप्रवृत्तं न च धर्ममाप्नुते
न चास्य धर्मे प्रतिषेधनं कृतम्॥ २७॥