महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सोऽहं कितवमातेव द्वयोरपि महामते ।
एकस्य जयमाशंसे द्वितीयस्यापराजयम् ॥ ११ ॥
महामते! जैसे दो जुआरियोंकी एक ही माता एककी जीत चाहती है तो दूसरेकी भी पराजय नहीं चाहती, उसी प्रकार मैं भी इन दोनों सुहृदोंमेंसे एककी विजयकामना करता हूँ तो दूसरेकी भी पराजय नहीं चाहता ॥ ११ ॥
ममैवं क्लिश्यमानस्य नारदोभयतः सदा ।
वक्तुमर्हसि यच्छ्रेयो ज्ञातीनामात्मनस्तथा ॥ १२ ॥
नारदजी! इस प्रकार मैं सदा उभय पक्षका हित चाहनेके कारण दोनों ओरसे कष्ट पाता रहता हूँ। ऐसी दशामें मेरा अपना तथा इन जाति-भाइयोंका भी जिस प्रकार भला हो, वह उपाय आप बतानेकी कृपा करें ॥
नारद उवाच
आपदो द्विविधाः कृष्ण बाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ह ।
प्रादुर्भवन्ति वार्ष्णेय स्वकृता यदि वान्यतः ॥ १३ ॥
नारदजीने कहा—वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! आपत्तियाँ दो प्रकारकी होती हैं—एक बाह्य और दूसरी आभ्यन्तर। वे दोनों ही स्वकृत१ और परकृत२-भेदसे दो-दो प्रकारकी होती हैं ॥ १३ ॥
सेयमाभ्यन्तरा तुभ्यमापत् कृच्छ्रा स्वकर्मजा ।
अक्रूरभोजप्रभवा सर्वे ह्येते त्वदन्वयाः ॥ १४ ॥
अक्रूर और आहुकसे उत्पन्न हुई यह कष्टदायिनी आपत्ति जो आपको प्राप्त हुई है, आभ्यन्तर है और अपनी ही करतूतोंसे प्रकट हुई है। ये सभी जिनके नाम आपने गिनाये हैं, आपके ही वंशके हैं ॥ १४ ॥
अर्थहेतोर्हि कामाद् वा वाचा बीभत्सयापि वा ।
आत्मना प्राप्तमैश्वर्यमन्यत्र प्रतिपादितम् ॥ १५ ॥
आपने स्वयं जिस ऐश्वर्यको प्राप्त किया था, उसे किसी प्रयोजनवश या स्वेच्छासे अथवा कटुवचनसे डरकर दूसरेको दे दिया ॥ १५ ॥
कृतमूलमिदानीं तज्ज्ञातिवृन्दं सहायवन् ।
न शक्यं पुनरादातुं वान्तमन्नमिव त्वया ॥ १६ ॥
सहायशाली श्रीकृष्ण! इस समय उग्रसेनको दिया हुआ वह ऐश्वर्य दृढ़मूल हो चुका है। उग्रसेनके साथ जातिके लोग भी सहायक हैं; अतः उगले हुए अन्नकी भाँति आप उस दिये हुए ऐश्वर्यको वापस नहीं ले सकते ॥ १६ ॥
बभूग्रसेनयो राज्यं नाप्तुं शक्यं कथंचन ।
ज्ञातिभेदभयात् कृष्ण त्वया चापि विशेषतः ॥ १७ ॥
श्रीकृष्ण! अक्रूर और उग्रसेनके अधिकारमें गये हुए राज्यको भाई-बन्धुओंमें फूट पड़नेके भयसे अन्यकी तो कौन कहे इतने शक्तिशाली होकर स्वयं भी आप किसी तरह वापस नहीं ले सकते ।। १७ ।। तच्च सिध्येत् प्रयत्नेन कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । महाक्षयं व्ययो वा स्याद् विनाशो वा पुनर्भवेत् ।। १८ ।। बड़े प्रयत्नसे अत्यन्त दुष्कर कर्म महान् संहाररूप युद्ध करनेपर राज्यको वापस लेनेका कार्य सिद्ध हो सकता है, परंतु इसमें धनका बहुत व्यय और असंख्य मनुष्योंका पुनः विनाश होगा ।। १८ ।। अनायसेन शस्त्रेण मृदुना हृदयच्छिदा । जिह्वामुद्धर सर्वेषां परिमृज्यानुमृज्य च ।। १९ ।। अतः श्रीकृष्ण! आप एक ऐसे कोमल शस्त्रसे, जो लोहेका बना हुआ न होनेपर भी हृदयको छेद डालनेमें समर्थ है, परिमार्जन³ और अनुमार्जन³ करके उन सबकी जीभ उखाड़ लें—उन्हें मूक बना दें (जिससे फिर कलहका आरम्भ न हो) ।। १९ ।।
वासुदेव उवाच
अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम् । येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च ।। २० ।। **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**मुने! बिना लोहेके बने हुए उस कोमल शस्त्रको मैं कैसे जानूँ, जिसके द्वारा परिमार्जन और अनुमार्जन करके इन सबकी जिह्वाको उखाड़ लूँ ।। २० ।।
नारद उवाच
शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षार्जवमार्दवम् । यथार्हप्रतिपूजा च शस्त्रमेतदनायसम् ।। २१ ।। **नारदजीने कहा—**श्रीकृष्ण! अपनी शक्तिके अनुसार सदा अन्नदान करना, सहनशीलता, सरलता, कोमलता तथा यथायोग्य पूजन (आदर-सत्कार) करना—यही बिना लोहेका बना हुआ शस्त्र है ।। २१ ।। ज्ञातीनां वक्तुकामानां कटुकानि लघूनि च । गिरा त्वं हृदयं वाचं शमयस्व मनांसि च ।। २२ ।। जब सजातीय बन्धु आपके प्रति कड़वी तथा ओछी बातें कहना चाहें, उस समय आप मधुर वचन बोलकर उनके हृदय, वाणी तथा मनको शान्त कर दें ।। नामहापुरुषः कश्चिन्नानात्मा नासहायवान् । महतीं धुरमाधत्ते तामुद्यम्योरसा वह ।। २३ ।।
जो महापुरुष नहीं है, जिसने अपने मनको वशमें नहीं किया है तथा जो सहायकोंसे सम्पन्न नहीं है, वह कोई भारी भार नहीं उठा सकता। अतः आप ही इस गुरुतर भारको हृदयसे उठाकर वहन करें।। २३ ।।
सर्व एव गुरुं भारमनड्वान् वहते समे । दुर्गे प्रतीतः सुगवो भारं वहति दुर्वहम् ॥ २४ ॥ समतल भूमिपर सभी बैल भारी भार वहन कर लेते हैं; परंतु दुर्गम भूमिपर कठिनाईसे वहन करनेयोग्य गुरुतर भारको अच्छे बैल ही ढोते हैं।। २४ ।।
भेदाद् विनाशः संघानां संघमुख्योऽसि केशव । यथा त्वां प्राप्य नोत्सीदेदयं संघस्तथा कुरु ॥ २५ ॥ केशव! आप इस यादवसंघके मुखिया हैं। यदि इसमें फूट हो गयी तो इस समूचे संघका विनाश हो जायगा; अतः आप ऐसा करें जिससे आपको पाकर इस संघका—इस यादवगणतन्त्र राज्यका मूलोच्छेद न हो जाय ।। २५ ।।
नान्यत्र बुद्धिक्षान्तिभ्यां नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् । नान्यत्र धनसंत्यागाद् गणः प्राज्ञेऽवतिष्ठते ॥ २६ ॥ बुद्धि, क्षमा और इन्द्रिय-निग्रहके बिना तथा धन वैभवका त्याग किये बिना कोई गण अथवा संघ किसी बुद्धिमान् पुरुषकी आज्ञाके अधीन नहीं रहता है ।।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वपक्षोद्भावनं सदा । ज्ञातीनामविनाशः स्याद् यथा कृष्ण तथा कुरु ॥ २७ ॥ श्रीकृष्ण! सदा अपने पक्षकी ऐसी उन्नति होनी चाहिये जो धन, यश तथा आयुकी वृद्धि करनेवाली हो और कुटुम्बीजनोंमेंसे किसीका विनाश न हो। यह सब जैसे भी सम्भव हो, वैसा ही कीजिये ।। २७ ।।
आयत्यां च तदात्वे च न तेऽस्त्यविदितं प्रभो । षाड्गुण्यस्य विधानेन यात्रायानविधौ तथा ॥ २८ ॥ प्रभो! संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छहों गुणोंके यथासमय प्रयोगसे तथा शत्रुपर चढ़ाई करनेके लिये यात्रा करनेपर वर्तमान या भविष्यमें क्या परिणाम निकलेगा? यह सब आपसे छिपा नहीं है ।। २८ ।।
यादवाः कुकुरा भोजाः सर्वे चान्धकवृष्णयः । त्वय्यासक्ता महाबाहो लोका लोकेश्वराश्च ये ॥ २९ ॥ उपासते हि त्वद्बुद्धिमृषयश्चापि माधव । महाबाहु माधव! कुकुर, भोज, अन्धक और वृष्णिवंशके सभी यादव आपमें प्रेम रखते हैं। दूसरे लोग और लोकेश्वर भी आपमें अनुराग रखते हैं। औरोंकी तो बात ही क्या है? बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी आपकी बुद्धिका आश्रय लेते हैं ।। २९ १/२ ।।
त्वं गुरुः सर्वभूतानां जानीषे त्वं गतागतम् ।
त्वामासाद्य यदुश्रेष्ठमेधन्ते यादवाः सुखम् ॥ ३० ॥
आप समस्त प्राणियोंके गुरु हैं। भूत, वर्तमान और भविष्यको जानते हैं। आप-जैसे यदुकुलतिलक महापुरुषका आश्रय लेकर ही समस्त यादव सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते हैं ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वासुदेवनारदसंवादो नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्ण-नारदसंवाद नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
१. जो आपत्तियाँ स्वतः अपने ही करतूतोंसे आती हैं, उन्हें स्वकृत कहते हैं।
२. जिन्हें लानेमें दूसरे लोग निमित्त बनते हैं, वे विपत्तियाँ परकृत कहलाती हैं।
१. क्षमा, सरलता और कोमलताके द्वारा दोषोंको दूर करना ‘परिमार्जन’ कहलाता है।
२. यथायोग्य सेवा-सत्कारके द्वारा हृदयमें प्रीति उत्पन्न करना, ‘अनुमार्जन’ कहा गया है।
मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान
द्व्यशीतितमोऽध्यायः
मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान
भीष्म उवाच
एषा प्रथमतॊ वृत्तिर्द्वितीयां शृणु भारत ।
यः कश्चिज्जनयेदर्थं राज्ञा रक्ष्यः सदा नरः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भरतनन्दन! यह राजा अथवा राजनीतिकी पहली वृत्ति है, अब दूसरी सुनो। जो कोई मनुष्य राजाके धनकी वृद्धि करे, उसकी राजाको सदा रक्षा करनी चाहिये ॥ १ ॥
ह्रियमाणममात्येन भृत्यो वा यदि वा भृतः ।
यो राजकोशं नश्यन्तमाचक्षीत युधिष्ठिर ॥ २ ॥
श्रोतव्यमस्य च रहो रक्ष्यश्चामात्यतो भवेत् ।
अमात्या ह्यपहर्तारो भूयिष्ठं घ्नन्ति भारत ॥ ३ ॥
भरतवंशी युधिष्ठिर! यदि मन्त्री राजाके खजानेसे धनका अपहरण करता हो और कोई सेवक अथवा राजाके द्वारा पालित हुआ दूसरा कोई मनुष्य राजकीय कोषके नष्ट होनेका समाचार राजाको बतावे, तब राजाको उसकी बात एकान्तमें सुननी चाहिये और मन्त्रीसे उसके जीवनकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि चोरी करनेवाले मन्त्री अपना भंडाफोड़ करनेवाले मनुष्यको प्रायः मार डाला करते हैं ॥ २-३ ॥
राजकोशस्य गोप्तारं राजकोशविलोपकाः ।
समेत्य सर्वे बाधन्ते स विनश्यत्यरक्षितः ॥ ४ ॥
जो राजाके खजानेकी रक्षा करनेवाला है, उस पुरुषको राजकीय कोष लूटनेवाले सब लोग एकमत होकर सताने लगते हैं। यदि राजाके द्वारा उसकी रक्षा नहीं की जाय तो वह बेचारा बेमौत मारा जाता है ॥ ४ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मुनिः कालकवृक्षीयः कौसल्यं यदुवाच ह ॥ ५ ॥
इस विषयमें जानकार लोग, कालकवृक्षीय मुनिने कोसलराजको जो उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ५ ॥
कोसलानामाधिपत्यं सम्प्राप्तं क्षेमदर्शिनम् ।
मुनिः कालकवृक्षीय आजगामेति नः श्रुतम् ॥ ६ ॥
हमने सुना है कि राजा क्षेमदर्शी जब कोसल प्रदेशके राजसिंहासनपर आसीन थे, उन्हीं दिनों कालक-वृक्षीय मुनि उस राज्यमें पधारे थे ।। ६ ।।
स काकं पञ्जरे बद्ध्वा विषयं क्षेमदर्शिनः ।
सर्वं पर्यचरद् युक्तः प्रवृत्त्यर्थी पुनः पुनः ।। ७ ।।
उन्होंने क्षेमदर्शीके सारे देशमें, उस राज्यका समाचार जाननेके लिये एक कौएको पिंजड़ेमें बाँधकर साथ ले बड़ी सावधानीके साथ बारंबार चक्कर लगाया ।।
अधीध्वं वायसीं विद्यां शंसन्ति मम वायसाः ।
अनागतमतीतं च यच्च सम्प्रति वर्तते ।। ८ ।।
घूमते समय वे लोगोंसे कहते थे, 'सज्जनो! तुमलोग मुझसे वायसी विद्या (कौओंकी बोली समझनेकी कला) सीखो। मैंने सीखी है, इसलिये कौए मुझसे भूत, भविष्य तथा इस समय जो वर्तमान है, वह सब बता देते हैं' ।। ८ ।।
इति राष्ट्रे परिपतन् बहुभिः पुरुषैः सह ।
सर्वेषां राजयुक्तानां दुष्करं परिदृष्टवान् ।। ९ ।।
यही कहते हुए वे बहुतेरे मनुष्योंके साथ उस राष्ट्रमें सब ओर घूमते फिरे। उन्होंने राजकार्यमें लगे हुए समस्त कर्मचारियोंका दुष्कर्म अपनी आँखों देखा ।। ९ ।।
स बुद्ध्वा तस्य राष्ट्रस्य व्यवसायं हि सर्वशः ।
राजयुक्तापहारांश्च सर्वान् बुद्ध्वा ततस्ततः ।। १० ।।
ततः स काकमादाय राजानं द्रष्टुमागमत् ।
सर्वज्ञोऽस्मीति वचनं ब्रुवाणः संशितव्रतः ।। ११ ।।
उस राष्ट्रके सारे व्यवसायोंको जानकर तथा राजकीय कर्मचारियोंद्वारा राजाकी सम्पत्तिके अपहरण होनेकी सारी घटनाओंका जहाँ-तहाँसे पता लगाकर वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि अपनेको सर्वज्ञ घोषित करते हुए उस कौएको साथ ले राजासे मिलनेके लिये आये ।। १०-११ ।।
स स्म कौसल्यमागम्य राजामात्यमलंकृतम् ।
प्राह काकस्य वचनादमुत्रेदं त्वया कृतम् ।। १२ ।।
असौ चासौ च जानीते राजकोशस्त्वया हृतः ।
एवमाख्याति काकोऽयं तच्छीघ्रमनुगम्यताम् ।। १३ ।।
कोसलनरेशके निकट उपस्थित हो मुनिने सज-धजकर बैठे हुए राजमन्त्रीसे कौएके कथनका हवाला देते हुए कहा—'तुमने अमुक स्थानपर राजाके अमुक धनकी चोरी की है। अमुक-अमुक व्यक्ति इस बातको जानते हैं, जो इसके साक्षी हैं'। हमारा यह कौआ कहता है कि 'तुमने राजकीय कोषका अपहरण किया है; अतः तुम अपने इस अपराधको शीघ्र स्वीकार करो' ।। १२-१३ ।।
तथान्यानपि स प्राह राजकोशहरांस्तदा ।
न चास्य वचनं किंचिदनृतं श्रूयते क्वचित् ॥ १४ ॥ इसी प्रकार मुनिने राजाके खजानेसे चोरी करनेवाले अन्य कर्मचारियोंसे भी कहा—'तुमने चोरी की है। मेरे इस कौएकी कही हुई कोई भी बात कभी और कहीं भी झूठी नहीं सुनी गयी है' ॥ १४ ॥
तेन विप्रकृताः सर्वे राजयुक्ताः कुरुद्वह । तमस्यभिप्रसुप्तस्य निशि काकमवेधयन् ॥ १५ ॥ कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार मुनिके द्वारा तिरस्कृत हुए सभी राजकर्मचारियोंने अँधेरी रातमें सोये हुए मुनिके उस कौएको बाणसे बींधकर मार डाला ॥ १५ ॥
वायसं तु विनिर्भिन्नं दृष्ट्वा बाणेन पञ्जरे । पूर्वाह्ने ब्राह्मणो वाक्यं क्षेमदर्शिनमब्रवीत् ॥ १६ ॥ अपने कौएको पिंजड़ेमें बाणसे विदीर्ण हुआ देखकर ब्राह्मणने पूर्वाह्नमें राजा क्षेमदर्शीसे इस प्रकार कहा— ॥
राजंस्त्वामभयं याचे प्रभुं प्राणधनेश्वरम् । अनुज्ञातस्त्वया ब्रूयां वचनं भवतो हितम् ॥ १७ ॥ 'राजन्! आप प्रजाके प्राण और धनके स्वामी हैं। मैं आपसे अभयकी याचना करता हूँ। यदि आज्ञा हो तो मैं आपके हितकी बात कहूँ ॥ १७ ॥
मित्रार्थमभिसंतप्तो भक्त्या सर्वात्मनाऽऽगतः । 'आप मेरे मित्र हैं। मैं आपके ही हितके लिये आपके प्रति सम्पूर्ण हृदयसे भक्तिभाव रखकर यहाँ आया हूँ। आपकी जो हानि हो रही है, उसे देखकर मैं बहुत संतप्त हूँ ॥ १७½ ॥
अयं तवार्थो ह्रियते यो ब्रूयादक्षमान्वितः ॥ १८ ॥ सम्बुबोधयिषुर्मित्रं सदश्वमिव सारथिः । अतिमन्युप्रसक्तो हि प्रसह्य हितकारणात् ॥ १९ ॥ तथाविधस्य सुहृदा क्षन्तव्यं स्वं विजानता । ऐश्वर्यमिच्छता नित्यं पुरुषेण बुभूषता ॥ २० ॥ 'जैसे सारथि अच्छे घोड़ेको सचेत करता है, उसी प्रकार यदि कोई मित्र मित्रको समझानेके लिये आया हो, मित्रकी हानि देखकर जो अत्यन्त दुखी हो और उसे सहन न कर सकनेके कारण जो हठपूर्वक अपने सुहृद् राजाका हितसाधन करनेके लिये उसके पास आकर कहे कि 'राजन्! तुम्हारे इस धनका अपहरण हो रहा है' तो सदा ऐश्वर्य और उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले विज्ञ एवं सुहृद् पुरुषको अपने उस हितकारी मित्रकी बात सुननी चाहिये और उसके अपराधको क्षमा कर देना चाहिये' ॥ १८—२० ॥
तं राजा प्रत्युवाचेदं यत् किंचिन्मां भवान् वदेत् । कस्मादहं न क्षमेयेमाकाङ्क्षन्नात्मनो हितम् ॥ २१ ॥
ब्राह्मण प्रतिजाने ते प्रब्रूहि यदिहेच्छसि । करिष्यामि हि ते वाक्यं यदस्मान्विप्र वक्ष्यसि ॥ २२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 558)
राजा क्षेमदर्शी और कालकवृक्षीय मुनि
तब राजाने मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया—'ब्राह्मण! आप जो कुछ कहना चाहें, मुझसे निर्भय होकर कहें। अपने हितकी इच्छा रखनेवाला मैं आपको क्षमा क्यों नहीं करूँगा? विप्रवर! आप जो चाहें, कहिये। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप मुझसे जो कोई भी बात कहेंगे, आपकी उस आज्ञाका मैं पालन करूँगा' ।। २१-२२ ।।
मुनिरुवाच
ज्ञात्वा पापानपापांश्च भृत्यतस्ते भयानि च । भक्त्या वृत्तिं समाख्यातुं भवतोऽन्तिकमागमम् ।। २३ ।। **मुनि बोले—**महाराज! आपके कर्मचारियोंमेंसे कौन अपराधी है और कौन निरपराध? इस बातका पता लगाकर तथा आपपर आपके सेवकोंकी ओरसे ही अनेक भय आने वाले हैं, यह जानकर प्रेमपूर्वक राज्यका सारा समाचार बतानेके लिये मैं आपके पास आया था ।। २३ ।।
प्रागेवोक्तस्तु दोषोऽयमाचार्यैर्नृपसेविनाम् । अगतीकगतिर्ह्येषा पापा राजोपसेविनाम् ।। २४ ।। नीतिशास्त्रके आचार्योंने राजसेवकोंके इस दोषका पहलेसे ही वर्णन कर रखा है कि जो राजाकी सेवा करनेवाले लोग हैं, उनके लिये यह पापमयी जीविका अगतिक गति है, अर्थात् जिन्हें कहीं भी सहारा नहीं मिलता, वे राजाके सेवक होते हैं ।। २४ ।।
आशीविषैश्च तस्याहुः संगतं यस्य राजभिः । बहुमित्राश्च राजानो बह्वमित्रास्तथैव च ।। २५ ।। तेभ्यः सर्वेभ्य एवाहुर्भयं राजोपजीविनाम् । तथैषां राजतो राजन् मुहूतदेव भीर्भवेत् ।। २६ ।। जिसका राजाओंके साथ मेल-जोल हो गया, उसकी विषधर सर्पोंके साथ सङ्गति हो गयी, ऐसा नीतिज्ञोंका कथन है। राजाके जहाँ बहुतसे मित्र होते हैं, वहीं उनके अनेक शत्रु भी हुआ करते हैं। राजाके आश्रित होकर जीविका चलानेवालोंको उन सभीसे भय बताया गया है। राजन्! स्वयं राजासे भी उन्हें घड़ी-घड़ीमें खतरा रहता है ।। २५-२६ ।।
नैकान्तेन प्रमादो हि शक्यः कर्तुं महीपतौ । न तु प्रमादः कर्तव्यः कथंचिद् भूतिमिच्छता ।। २७ ।। राजाके पास रहनेवालोंसे कभी कोई प्रमाद हो ही नहीं, यह तो असम्भव है, परंतु जो अपना भला चाहता हो उसे किसी तरह उसके पास जान-बूझकर प्रमाद नहीं करना चाहिये ।। २७ ।।
प्रमादाद्धि स्खलेद् राजा स्खलिते नास्ति जीवितम् । अग्निं दीप्तमिवासीदेद् राजानमुपशिक्षितः ।। २८ ।।
यदि सेवकके द्वारा असावधानीके कारण कोई अपराध बन गया तो राजा पहलेके उपकारको भुलाकर कुपित हो उससे द्वेष करने लगता है और जब राजा अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो जाय तो उस सेवकके जीवनकी आशा नहीं रह जाती। जैसे जलती हुई आगके पास मनुष्य सचेत होकर जाता है, उसी प्रकार शिक्षित पुरुषको राजाके पास सावधानीसे रहना चाहिये ॥ २८ ॥
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति मानवः ॥ २९ ॥
राजा प्राण और धन दोनोंका स्वामी है। जब वह कुपित होता है तो विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाता है; अतः मनुष्यको चाहिये कि 'मैं जीवित नहीं हूँ' ऐसा मानकर अर्थात् अपनी जानको हथेलीपर लेकर सदा बड़े यत्नसे राजाकी सेवा करे ॥ २९ ॥
दुर्व्याहृताच्छङ्कमानो दुष्कृताद् दुरधिष्ठितात् ।
दुरासिताद् दुर्व्रजितादिङ्गितादङ्गचेष्टितात् ॥ ३० ॥
मुँहसे कोई बुरी बात न निकल जाय, कोई बुरा काम न बन जाय, खड़ा होते, किसी आसनपर बैठते, चलते, संकेत करते तथा किसी अंगके द्वारा कोई चेष्टा करते समय असभ्यता अथवा बेअदबी न हो जाय, इसके लिये सदा सतर्क रहना चाहिये ॥ ३० ॥
देवतेव हि सर्वार्थान् कुर्याद् राजा प्रसादितः ।
वैश्वानर इव क्रुद्धः समूलमपि निर्दहेत् ॥ ३१ ॥
यदि राजाको प्रसन्न कर लिया जाय तो वह देवताकी भाँति सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध कर देता है और यदि कुपित हो जाय तो जलती हुई आगकी भाँति जड़-मूलसहित भस्म कर डालता है ॥ ३१ ॥
इति राजन् यमः प्राह वर्तते च तथैव तत् ।
अथ भूयांसमेवार्थं करिष्यामि पुनः पुनः ॥ ३२ ॥
राजन्! यमराजने जो यह बात कही है, वह ज्यों-की-त्यों ठीक है; फिर भी मैं तो बारंबार आपके महान् अर्थका साधन करूँगा ही ॥ ३२ ॥
ददात्यस्मद्विधोऽमात्यो बुद्धिसहाय्यमापदि ।
वायसस्त्वेष मे राजन् ननु कार्याभिसंहितः ॥ ३३ ॥
मेरे जैसा मन्त्री आपत्तिकालमें बुद्धिद्वारा सहायता देता है। राजन्! मेरा यह कौआ भी आपके कार्यसाधनमें संलग्न था; किंतु मारा गया (सम्भव है मेरी भी वही दशा हो) ॥ ३३ ॥
न च मेऽत्र भवान् गर्ह्यो न च येषां भवान् प्रियः ।
हिताहितांस्तु बुद्धयेथा मा परोक्षमतिर्भवेः ॥ ३४ ॥
परंतु इसके लिये मैं आपकी और आपके प्रेमियोंकी निन्दा नहीं करता। मेरा कहना तो इतना ही है कि आप स्वयं अपने हित और अनहितको पहचानिये। प्रत्येक कार्यको अपनी
आँखोंसे देखिये। दूसरोंकी देख-भालपर विश्वास न कीजिये ॥ ३४ ॥
ये त्वादानपरा एव वसन्ति भवतो गृहे ।
अभूतिकाम भूतानां तादृशैर्मेऽभिसंहितम् ॥ ३५ ॥
जो लोग आपका खजाना लूट रहे हैं और आपके ही घरमें रहते हैं, वे प्रजाकी भलाई चाहनेवाले नहीं हैं। वैसे लोगोंने मेरे साथ वैर बाँध लिया है ॥ ३५ ॥
यो वा भवद्विनाशन राज्यमिच्छत्यनन्तरम् ।
आन्तरैरभिसंधाय राजन् सिद्ध्यति नान्यथा ॥ ३६ ॥
राजन्! जो आपका विनाश करके आपके बाद इस राज्यको अपने हाथमें लेना चाहता है, उसका वह कर्म अन्तःपुरके सेवकोंसे मिलकर कोई षड्यन्त्र करनेसे ही सफल हो सकता है; अन्यथा नहीं (अतः आपको सावधान हो जाना चाहिये) ॥ ३६ ॥
तेषामहं भयाद् राजन् गमिष्याम्यन्यमाश्रमम् ।
तैर्हि मे संधितो बाणः काके निपतितः प्रभो ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! मैं उन विरोधियोंके भयसे दूसरे आश्रममें चला जाऊँगा। प्रभो! उन्होंने मेरे लिये ही बाणका संधान किया था; किंतु वह उस कौएपर जा गिरा ॥ ३७ ॥
छद्मकामैरकामस्य गमितो यमसादनम् ।
दृष्टं ह्येतन्मया राजंस्तपोदीर्घेन चक्षुषा ॥ ३८ ॥
मैं कोई कामना लेकर यहाँ नहीं आया था तो भी छल-कपटकी इच्छा रखनेवाले षड्यन्त्रकारियोंने मेरे कौएको मारकर यमलोक पहुँचा दिया। राजन्! तपस्याके द्वारा प्राप्त हुई दूरदर्शिनी दृष्टिसे मैंने यह सब देखा है ॥
बहुनक्रझषग्राहां तिमिङ्गिलगणैर्युताम् ।
काकेन बालिशेनेमां यामतार्षमहं नदीम् ॥ ३९ ॥
यह राजनीति एक नदीके समान है। राजकीय पुरुष उसमें मगर, मत्स्य, तिमिङ्गल-समूहों और ग्राहोंके समान हैं। बेचारे कौएके द्वारा मैं किसी तरह इस नदीसे पार हो सका हूँ ॥ ३९ ॥
स्थाण्वश्मकण्टकवतीं सिंहव्याघ्रसमाकुलाम् ।
दुरासदां दुष्प्रसहां गुहां हैमवतीमिव ॥ ४० ॥
जैसे हिमालयकी कन्दरामें ठूँठ, पत्थर और काँटे होते हैं, उसके भीतर सिंह और व्याघ्रोंका भी निवास होता है तथा इन्हीं सब कारणोंसे उसमें प्रवेश पाना या रहना अत्यन्त कठिन एवं दुःसह हो जाता है, उसी प्रकार दुष्ट अधिकारियोंके कारण इस राज्यमें किसी भले मनुष्यका रहना मुश्किल है ॥ ४० ॥
अग्निना तामसं दुर्गं नौभिराप्यं च गम्यते ।
राजदुर्गावतरणे नोपायं पण्डिता विदुः ॥ ४१ ॥
अन्धकारमय दुर्गको अग्निके प्रकाशसे तथा जल-दुर्गको नौकाओंद्धारा पार किया जा सकता है; परंतु राजारूपी दुर्गसे पार होनेके लिये विद्वान् पुरुष भी कोई उपाय नहीं जानते हैं ।। ४१ ।।
गहनं भवतो राज्यमन्धकारं तमोऽन्वितम् । नेह विश्वसितुं शक्यं भवतापि कुतो मया ।। ४२ ।। आपका यह राज्य गहन अन्धकारसे आच्छन्न और दुःखसे परिपूर्ण है। आप स्वयं भी इस राज्यपर विश्वास नहीं कर सकते; फिर मैं कैसे करूँगा ।। ४२ ।।
अतो नायं शुभो वासस्तुल्ये सदसती इह । वधो ह्येवात्र सुकृते दुष्कृते न च संशयः ।। ४३ ।। अतः यहाँ रहनेमें किसीका कल्याण नहीं है। यहाँ भले-बुरे सब एक समान हैं। इस राज्यमें बुराई करनेवाले और भलाई करनेवालेका भी वध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है ।। ४३ ।।
न्यायतो दुष्कृते घातः सुकृते न कथंचन । नेह युक्तं स्थिरं स्थातुं जवेनैवाव्रजेद् बुधः ।। ४४ ।। न्यायकी बात तो यह है कि बुराई करनेवालेको ही मारा जाय और पुण्य—श्रेष्ठ कर्म करनेवालेको किसी तरह भी कोई कष्ट न होने पावे, परंतु यहाँ ऐसा नहीं होता; अतः इस राज्यमें स्थिरभावसे निवास करना किसीके लिये भी उचित नहीं है। विद्वान् पुरुषको यहाँसे अति शीघ्र हट जाना चाहिये ।। ४४ ।।
सीता नाम नदी राजन् प्लवो यस्यां निमज्जति । तथोपमामिमां मन्ये वागुरां सर्वघातिनीम् ।। ४५ ।। राजन्! सीता नामसे प्रसिद्ध एक नदी है, जिसमें नाव भी डूब जाती है, वैसी ही यहाँकी राजनीति भी है (इसमें मेरे जैसे सहायकोंके भी डूब जानेकी आशङ्का है)। मैं तो इसे समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली फाँसी ही समझता हूँ ।। ४५ ।।
मधुप्रपातो हि भवान् भोजनं विषसंयुक्तम् । असतामिव ते भावो वर्तते न सतामिव ।। ४६ ।। आप शहदके छत्तेसे युक्त पेड़की उस ऊँची डालीके समान हैं, जहाँसे नीचे गिरनेका ही भय है। आप विष मिलाये हुए भोजनके तुल्य हैं, आपका भाव असज्जनोंके समान है, सज्जनोंके तुल्य नहीं है ।। ४६ ।।
आशीविषैः परिवृतः कूपस्त्वमसि पार्थिव । दुर्गतीर्था बृहत्कूला कारीरा वेत्रसंयुता ।। ४७ ।। नदी मधुरपानीया यथा राजंस्तथा भवान् ।
भूपाल! आप विषैले सर्पोंसे घिरे हुए कुएँके समान हैं, राजन्! आपकी अवस्था उस मीठे जलवाली नदीके समान हो गयी है, जिसके घाटक पहुँचना कठिन है, जिसके दोनों किनारे बहुत ऊँचे हों और वहाँ करीलके झाड़ तथा बेंतकी वल्लरियाँ सब ओर छा रही हों ।। ४७ ½ ।।
श्वगृध्रगोमायुयुतो राजहंससमो ह्यसि ॥ ४८ ॥
यथाऽऽश्रित्य महावृक्षं कक्षः संवर्धते महान् ।
ततस्तं संवृणोत्येव तमतीत्य च वर्धते ॥ ४९ ॥
तेनैवोग्रेन्धनेनैवं दावो दहति दारुणः।
तथोपमा ह्यमात्यास्ते राजंस्तान् परिशोधय ॥ ५० ॥
जैसे कुत्तों, गीधों और गीदड़ोंसे घिरा हुआ राजहंस बैठा हो, उसी तरह दुष्ट कर्मचारियोंसे आप घिरे हुए हैं। जैसे लताओंका विशाल समूह किसी महान् वृक्षका आश्रय लेकर बढ़ता है, फिर धीरे-धीरे उस वृक्षको लपेट लेता है और उसका अतिक्रमण करके उससे भी ऊँचेतक फैल जाता है, फिर वही सूखकर भयानक ईंधन बन जाता है, तब दारुण दावानल उसी ईंधनके सहारे उस विशाल वृक्षको भी जला डालता है, राजन्! आपके मन्त्री भी उन्हीं सूखी लताओंके समान हो गये हैं अर्थात् आपके ही आश्रयसे बढ़कर आपके विनाशका कारण बन रहे हैं। अतः आप उनका शोधन कीजिये ॥ ४८—५० ॥
त्वया चैव कृता राजन् भवता परिपालिताः ।
भवन्तमभिसंधाय जिघांसन्ति भवत्प्रियम् ॥ ५१ ॥
नरेश्वर! आपने ही जिन्हें मन्त्री बनाया और आपने जिनका पालन किया, वे आपसे ही कपटभाव रखकर आपके ही हितका विनाश करना चाहते हैं ।। ५१ ।।
उषितं शङ्कमानेन प्रमादं परिरक्षता ।
अन्तःसर्प इवागारे वीरपत्नया इवालये ॥ ५२ ॥
शीलं जिज्ञासमानेन राजंश्च सहजीविनः ।
मैं राजाके साथ रहनेवाले अधिकारियोंका शील-स्वभाव जानना चाहता था, इसलिये सदा सशङ्क रहकर बड़ी सावधानीके साथ यहाँ रहा हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई साँपवाले मकानमें रहता हो अथवा किसी शूरवीरकी पत्नीके घरमें घुस गया हो ।। ५२ ½ ।।
कच्चिज्जितेन्द्रियो राजा कच्चिदस्यान्तरा जिताः ॥ ५३ ॥
कच्चिदेषां प्रियो राजा कच्चिद् राज्ञः प्रिया प्रजाः ।
विजिज्ञासुरिह प्राप्तस्तवाहं राजसत्तम ॥ ५४ ॥
क्या इस देशके राजा जितेन्द्रिय हैं? क्या इनके अंदर रहनेवाले सेवक इनके वशमें हैं? क्या यहाँकी प्रजाओंका राजापर प्रेम है? और राजा भी क्या अपनी प्रजाओंपर प्रेम रखते हैं? नृपश्रेष्ठ! इन्हीं सब बातोंको जाननेकी इच्छासे मैं आपके यहाँ आया था ।। ५३-५४ ।।
तस्य मे रोचते राजन् क्षुधितस्येव भोजनम् ।
अमात्या मे न रोचन्ते वितृष्णस्य यथोदकम् ।। ५५ ।।
जैसे भूखेको भोजन अच्छा लगता है, उसी प्रकार आपका दर्शन मुझे बड़ा प्रिय लगता है; परंतु जैसे प्यास न रहनेपर पानी अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार आपके ये मन्त्री मुझे अच्छे नहीं जान पड़ते हैं ।। ५५ ।।
भवतोऽर्थकृदित्येवं मयि दोषो हि तैः कृतः ।
विद्यते कारणं नान्यदिति मे नात्र संशयः ।। ५६ ।।
मैं आपकी भलाई करनेवाला हूँ, यही इन मन्त्रियोंने मुझमें बड़ा भारी दोष पाया है और इसीलिये ये मुझसे द्वेष रखने लगे हैं। इसके सिवा दूसरा कोई इनके रोषका कारण नहीं है। मुझे अपने इस कथनकी सत्यतामें कोई संदेह नहीं है ।। ५६ ।।
न हि तेषामहं दृग्धस्तत्तेषां दोषदर्शनम् ।
अरेर्हि दुर्हृदाद् भयं भग्नपुच्छादिवोरगात् ।। ५७ ।।
यद्यपि मैं इन लोगोंसे द्रोह नहीं करता तो भी मेरे प्रति इन लोगोंकी दोष-दृष्टि हो गयी है। जिसकी पूँछ दबा दी गयी हो, उस सर्पके समान दुष्ट हृदयवाले शत्रुसे सदा डरते रहना चाहिये (इसलिये अब मैं यहाँ रहना नहीं चाहता) ।। ५७ ।।
राजोवाच
भूयसा परिहारेण सत्कारेण च भूयसा ।
पूजितो ब्राह्मणश्रेष्ठ भूयो वस गृहे मम ।। ५८ ।।
**राजाने कहा—**विप्रवर! आपपर आनेवाले भय अथवा संकटका विशेषरूपसे निवारण करते हुए मैं आपको बड़े आदर-सत्कारके साथ अपने यहाँ रखूँगा। आप मेरे द्वारा सम्मानित हो बहुत कालतक मेरे महलमें निवास कीजिये ।। ५८ ।।
ये त्वां ब्राह्मण नेच्छन्ति ते न वत्स्यन्ति मे गृहे ।
भवतैव हि तज्ज्ञेयं यत्तदेषामनन्तरम् ।। ५९ ।।
ब्रह्मन्! जो आपको मेरे यहाँ नहीं रहने देना चाहते हैं, वे स्वयं ही मेरे घरमें नहीं रहने पायेंगे अब इन विरोधियोंका दमन करनेके लिये जो आवश्यक कर्त्तव्य हो, उसे आप स्वयं ही सोचिये और समझिये ।। ५९ ।।
यथा स्यात् सुधृतो दण्डो यथा च सुकृतं कृतम् ।
तथा समीक्ष्य भगवन् श्रेयसे विनियुङ्क्ष्व माम् ।। ६० ।।
भगवन्! जिस तरह राजदण्डको मैं अच्छी तरह धारण कर सकूँ और मेरे द्वारा अच्छे ही कार्य होते रहें, वह सब सोचकर आप मुझे कल्याणके मार्गपर लगाइये ।। ६० ।।
मुनिरुवाच
अदर्शयन्निमं दोषमेकैकं दुर्बलीकुरु ।
ततः कारणमाज्ञाय पुरुषं पुरुषं जहि ।। ६१ ।।
मुनिने कहा—राजन्! पहले तो कौएको मारनेका जो अपराध है, इसे प्रकट किये बिना ही एक-एक मन्त्रीको उसका अधिकार छीनकर दुर्बल कर दीजिये। उसके बाद अपराधके कारणका पूरा-पूरा पता लगाकर क्रमशः एक-एक व्यक्तिका वध कर डालिये ॥ ६१ ॥
एकदोषा हि बहवो मृद्नीयुरपि कण्टकान् ।
मन्त्रभेदभयाद् राजंस्तस्मादेतद् ब्रवीमि ते ॥ ६२ ॥
नरेश्वर! जब बहुत-से लोगोंपर एक ही तरहका दोष लगाया जाता है तो वे सब मिलकर एक हो जाते हैं और उस दशामें वे बड़े-बड़े कण्टकोंको भी मसल डालते हैं, अतः यह गुप्त विचार दूसरोंपर प्रकट न हो जाय, इसी भयसे मैं तुम्हें इस प्रकार एक-एक करके विरोधियोंके वधकी सलाह दे रहा हूँ ॥ ६२ ॥
वयं तु ब्राह्मणा नाम मृदुदण्डाः कृपालवः ।
स्वस्ति चेच्छाम भवतः परेषां च यथाऽऽत्मनः ॥ ६३ ॥
महाराज! हमलोग ब्राह्मण हैं। हमारा दण्ड भी बहुत कोमल होता है। हम स्वभावसे ही दयालु होते हैं; अतः अपने ही समान आपका और दूसरोंका भी भला चाहते हैं ॥ ६३ ॥
राजन्नात्मानमाचक्षे सम्बन्धी भवतो ह्यहम् ।
मुनिः कालकवृक्षीय इत्येवमभिसंज्ञितः ॥ ६४ ॥
राजन्! अब मैं आपको अपना परिचय देता हूँ। मैं आपका सम्बन्धी हूँ। मेरा नाम है कालकवृक्षीय मुनि ॥
पितुः सखा च भवतः सम्मतः सत्यसङ्गरः ।
व्यापन्ने भवतो राज्ये राजन् पितरि संस्थिते ॥ ६५ ॥
सर्वकामान् परित्यज्य तपस्तप्तं तदा मया ।
स्नेहात् त्वां तु ब्रवीम्येतन्मा भूयो विभ्रमेदिति ॥ ६६ ॥
मैं आपके पिताका आदरणीय एव सत्यप्रतिज्ञ मित्र हूँ। नरेश्वर! आपके पिताके स्वर्गवास हो जानेके पश्चात् जब आपके राज्यपर भारी संकट आ गया था, तब अपनी समस्त कामनाओंका परित्याग करके मैंने (आपके हितके लिये) तपस्या की थी। आपके प्रति स्नेह होनेके कारण मैं फिर यहाँ आया हूँ और आपको ये सब बातें इसलिये बता रहा हूँ कि आप फिर किसीके चक्करमें न पड़ जायँ ॥ ६५-६६ ॥
उभे दृष्ट्वा दुःखसुखे राज्यं प्राप्य यदृच्छया ।
राज्येनामात्यसंस्थेन कथं राजन् प्रमाद्यसि ॥ ६७ ॥
महाराज! आपने सुख और दुःख दोनों देखे हैं। यह राज्य आपको दैवेच्छासे प्राप्त हुआ है तो भी आप इसे केवल मन्त्रियोंपर छोड़कर क्यों भूल कर रहे हैं? ॥
ततो राजकुले नान्दी संजज्ञे भूयसा पुनः ।
पुरोहितकुले चैव सम्प्राप्ते ब्राह्मणर्षभे ॥ ६८ ॥
तदनन्तर पुरोहितके कुलमें उत्पन्न विप्रवर कालकवृक्षीय मुनिके पुनः आ जानेसे राजपरिवारमें मंगलपाठ एवं आनन्दोत्सव होने लगा ।। ६८ ।।
एकच्छत्रां महीं कृत्वा कौसल्याय यशस्विने ।
मुनिः कालकवृक्षीय ईजे क्रतुभिरुत्तमैः ।। ६९ ।।
कालकवृक्षीय मुनिने अपने बुद्धिबलसे यशस्वी कोसलनरेशको भूमण्डलका एकच्छत्र सम्राट् बनाकर अनेक उत्तम यज्ञोंद्वारा यजन किया ।। ६९ ।।
हितं तद्वचनं श्रुत्वा कौसल्योऽप्यजयन्महीम् ।
तथा च कृतवान् राजा यथोक्तं तेन भारत ।। ७० ।।
भारत! कोसलराजने भी पुरोहितका हितकारी वचन सुना और उन्होंने जैसा कहा, वैसा ही किया। इससे उन्होंने समस्त भूमण्डलपर विजय प्राप्त कर ली ।। ७० ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अमात्यपरीक्षायां कालकवृक्षीयोपाख्याने द्वयशीतितमोऽध्यायः ।। ८२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें मन्त्रियोंकी परीक्षाके प्रसङ्गमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यानविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८२ ।।
अध्याय (पृष्ठ 567)
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त-मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश
युधिष्ठिर उवाच
सभासदः सहायाश्च सुहृदश्च विशाम्पते ।
परिच्छदास्तथामात्याः कीदृशाः स्युः पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**प्रजापालक पितामह! राजाके सभासद्, सहायक, सुहृद्, परिच्छद (सेनापति आदि) तथा मन्त्री कैसे होने चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
ह्रीनिषेवास्तथा दान्ताः सत्यार्जवसमन्विताः ।
शक्ताः कथयितुं सम्यक् ते तव स्युः सभासदः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! जो लज्जाशील, जितेन्द्रिय, सत्यवादी, सरल और किसी विषयपर अच्छी तरह प्रवचन करनेमें समर्थ हों, ऐसे ही लोग तुम्हारे सभासद् होने चाहिये ॥ २ ॥
अमात्यांश्चातिशूरांश्च ब्राह्मणांश्च परिश्रुतान् ।
सुसंतुष्टांश्च कौन्तेय महोत्साहांश्च कर्मसु ॥ ३ ॥
एतान् सहायाँल्लिप्सेथाः सर्वास्वापत्सु भारत ।
भरतनन्दन युधिष्ठिर! मन्त्रियोंको, अत्यन्त शूरवीर पुरुषोंको, विद्वान् ब्राह्मणोंको, पूर्णतया संतुष्ट रहनेवालोंको और सभी कार्योंके लिये उत्साह रखनेवालोंको—इन सब लोगोंको तुम सभी आपत्तियोंके समय सहायक बनानेकी इच्छा करना ॥ ३ ½ ॥
कुलीनः पूजितो नित्यं न हि शक्तिं निगूहति ॥ ४ ॥
प्रसन्नमप्रसन्नं वा पीडितं हतमेव वा ।
आवर्तयति भूयिष्ठं तदेव ह्यनुपालितम् ॥ ५ ॥
जो कुलीन हो, जिसका सदा सम्मान किया जाय, जो अपनी शक्तिको छिपावे नहीं तथा राजा प्रसन्न हो या अप्रसन्न हो, पीड़ित हो अथवा हताहत हो, प्रत्येक अवस्थामें जो बारंबार उसका अनुसरण करता हो, वही सुहृद् होने योग्य है ॥ ४-५ ॥
कुलीना देशजाः प्राज्ञा रूपवन्तो बहुश्रुताः ।
प्रगल्भाश्चानुरक्ताश्च ते तव स्युः परिच्छदाः ॥ ६ ॥
जो उत्तम कुल और अपने ही देशमें उत्पन्न हुए हों, बुद्धिमान्, रूपवान्, बहुज्ञ, निर्भय और अनुरक्त हों, वे ही तुम्हारे परिच्छद (सेनापति आदि) होने चाहिये ॥ ६ ॥
दौष्कुलेयाश्च लुब्धाश्च नृशंसा निरपत्रपाः ।
ते त्वां तात निषेवेयुर्यावदार्द्रकपाणयः ॥ ७ ॥
तात! जो निन्दित कुलमें उत्पन्न, लोभी, क्रूर और निर्लज्ज हैं, वे तभीतक तुम्हारी सेवा करेंगे, जबतक उनके हाथ गीले रहेंगे ॥ ७ ॥
कुलीनात् शीलसम्पन्नानिङ्गितज्ञाननिष्ठुरान् ।
देशकालविधानज्ञान् भर्तृकार्यहितैषिणः ॥ ८ ॥
नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजा कुर्वीत मन्त्रिणः ।
अच्छे कुलमें उत्पन्न, शीलवान्, इशारे समझनेवाले, निष्ठुरतारहित (दयालु), देशकालके विधानको समझनेवाले और स्वामीके अभीष्ट कार्यकी सिद्धि तथा हित चाहनेवाले मनुष्योंको राजा सदा सभी कार्योंके लिये अपना मन्त्री बनावे ॥ ८ १/२ ॥
अर्थमानार्घ्यसत्कारैर्भोगैरुच्चावचैः प्रियान् ॥ ९ ॥
यानर्थभाजो मन्येथास्ते ते स्युः सुखभागिनः ।
तुम जिन्हें अपना प्रिय मानते हो, उन्हें धन, सम्मान, अर्घ्य, सत्कार तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके भोगोंद्वारा संतुष्ट करो, जिससे वे तुम्हारे प्रियजन धन और सुखके भागी हों ॥ ९ १/२ ॥
अभिन्नवृत्ता विद्वांसः सद्वृत्ताश्चरितव्रताः ।
न त्वां नित्यार्थिनो जह्युरक्षुद्राः सत्यवादिनः ॥ १० ॥
जिनका सदाचार नष्ट नहीं हुआ है, जो विद्वान्, सदाचारी और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं; जिन्हें सदा तुमसे अभीष्ट वस्तुके लिये प्रार्थना करनेकी आवश्यकता पड़ती है तथा जो श्रेष्ठ और सत्यवादी हैं, वे कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ सकते ॥ १० ॥
अनार्या ये न जानन्ति समयं मन्दचेतसः ।
तेभ्यः परिजुगुप्सेथा ये चापि समयच्युताः ॥ ११ ॥
जो अनार्य और मन्दबुद्धि हैं, जिन्हें की हुई प्रतिज्ञाके पालनका ध्यान नहीं रहता तथा जो कई बार अपनी प्रतिज्ञासे गिर चुके हैं, उनसे अपनेको सुरक्षित रखनेके लिये तुम्हें सदा सावधान रहना चाहिये ॥ ११ ॥
नैकमिच्छेद गणं हित्वा स्वाच्छेदन्तरग्रहः ।
यस्त्वेको बहुभिः श्रेयान् कामं तेन गणं त्यजेत् ॥ १२ ॥
एक ओर एक व्यक्ति हो और दूसरी ओर एक समूह हो तो समूहको छोड़कर एक व्यक्तिको ग्रहण करनेकी इच्छा न करे। परंतु जो एक मनुष्य बहुत मनुष्योंकी अपेक्षा गुणोंमें श्रेष्ठ हो और इन दोनोंमेंसे एकको ही ग्रहण करना पड़े तो ऐसी परिस्थितिमें कल्याण चाहनेवाले पुरुषको उस एकके लिये समूहको त्याग देना चाहिये ॥ १२ ॥
श्रेयसो लक्षणं चैतद् विक्रमो यस्य दृश्यते । कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात् समये यश्च तिष्ठति ॥ १३ ॥ समर्थान् पूजयेद् यश्च नास्पर्धैः स्पर्धते च यः । न च कामाद् भयात् क्रोधाल्लोभाद् वा धर्ममुत्सृजेत् ॥ १४ ॥ अमानी सत्यवान् क्षान्तो जितात्मा मानसंवृतः । स ते मन्त्रसहायः स्यात् सर्वावस्थापरीक्षितः ॥ १५ ॥ श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण इस प्रकार है—जिसका पराक्रम देखा जाता हो, जिसके जीवनमें कीर्तिकी प्रधानता हो, जो अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहता हो, सामर्थ्यशाली पुरुषोंका सम्मान करता हो, जो स्पर्धाके अयोग्य पुरुषोंसे ईर्ष्या न रखता हो, कामना, भय, क्रोध अथवा लोभसे भी धर्मका उल्लंघन न करता हो, जिसमें अभिमानका अभाव हो, जो सत्यवान्, क्षमाशील, जितात्मा तथा सम्मानित हो और जिसकी सभी अवस्थाओंमें परीक्षा कर ली गयी हो, ऐसा पुरुष ही तुम्हारी गुप्त मन्त्रणामें सहायक होना चाहिये ॥ १३—१५ ॥
कुलीनः कुलसम्पन्नस्तितिक्षुर्दक्ष आत्मवान् । शूरः कृतज्ञः सत्यश्च श्रेयसः पार्थ लक्षणम् ॥ १६ ॥ कुन्तीनन्दन! उत्तम कुलमें जन्म होना, सदा श्रेष्ठ कुलके सम्पर्कमें रहना, सहनशीलता, कार्यदक्षता, मनस्विता, शूरता, कृतज्ञता और सत्यभाषण—ये ही श्रेष्ठ पुरुषके लक्षण हैं ॥ १६ ॥
तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्य विजानतः । अमित्राः सम्प्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि ॥ १७ ॥ ऐसा बर्ताव करनेवाले विज्ञ पुरुषके शत्रु भी प्रसन्न हो जाते हैं और उसके साथ मैत्री स्थापित कर लेते हैं ॥ १७ ॥
अत ऊर्ध्वममात्यानां परीक्षेत गुणागुणम् । संयतात्मा कृतप्रज्ञो भूतिकामश्च भूमिपः ॥ १८ ॥ इसके बाद मनको वशमें रखनेवाला शुद्धबुद्धि और ऐश्वर्यकामी भूपाल अपने मन्त्रियोंके गुण और अवगुणकी परीक्षा करे ॥ १८ ॥
सम्बन्धिपुरुषैराप्तैरभिजातैः स्वदेशजैः । अहार्यैरव्यभीचारैः सर्वशः सुपरीक्षितैः ॥ १९ ॥ यौनाः श्रौतास्तथा मौलास्तथैवाप्यनहंकृताः । कर्तव्या भूतिकामेन पुरुषेण बुभूषता ॥ २० ॥ जिनके साथ कोई-न-कोई सम्बन्ध हो, जो अच्छे कुलमें उत्पन्न, विश्वासपात्र, स्वदेशीय, घूस न खानेवाले तथा व्यभिचार-दोषसे रहित हों, जिनकी सब प्रकारसे भलीभाँति परीक्षा ले ली गयी हो, जो उत्तम जातिवाले, वेदके मार्गपर चलनेवाले, कई पीढ़ियोंसे राजकीय