महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अठारह पुराणोंके श्रवणसे जो फल होता है, वही फल महाभारतके श्रवणसे वैष्णवोंको प्राप्त होता है—इसमें संदेह नहीं है। स्त्री और पुरुष इस महाभारतके श्रवणसे वैष्णव पदको प्राप्त कर सकते हैं। पुत्रकी इच्छावाली स्त्रियोंको तो भगवान् विष्णुकी कीर्तिरूप महाभारत अवश्य सुनना चाहिये ।।
नरेण धर्मकामेन सर्वः श्रोतव्य इत्यपि ।
निखिलेनेतिहासोऽयं ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ।।
शृण्वन् श्राद्धः पुण्यशीलः श्रावयँश्चेदमद्भुतम् ।
नरः फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ।।
धर्मकी कामनावाले मनुष्यको यह सम्पूर्ण इतिहास सुनना चाहिये, इससे सिद्धिकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य श्रद्धालुयुक्त और पुण्यस्वभाव होकर इस अद्भुत इतिहासका श्रवण करता है या कराता है, वह राजसूय और अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है ।।
त्रिभिर्वर्षैर्लब्धकामः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।
नित्योत्थितः शुचिः शक्तो महाभारतमादितः ।।
तपो नियममास्थाय कृतमेतन्महर्षिणा ।
तस्मान्नियमसंयुक्तैः श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम् ।।
शक्तिशाली श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासदेव पवित्रताके साथ तीन वर्ष लगातार लगे रहकर इसकी प्रारम्भसे रचना करके पूर्णमनोरथ हुए थे। महर्षि व्यासने तप और नियम धारण करके इसकी रचना की थी। अतएव ब्राह्मणोंको भी नियमयुक्त होकर ही इसका श्रवण-कीर्तन करना चाहिये ।।
महीं विजयते राजा शत्रूंश्चापि पराजयेत् ।
इदं पुंसवनं श्रेष्ठमिदं स्वस्त्ययनं महत् ।।
महिषीयुवराजाभ्यां श्रोतव्यं बहुशस्तथा ।
वीरं जनयते पुत्रं कन्यां वा राज्यभागिनीम् ।।
इस इतिहासके सुननेसे राजा पृथ्वीपर विजय प्राप्त करता तथा शत्रुओंको पराजित करता है। उसे श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्ति और महान् कल्याण होता है। यह इतिहास राजरानियोंको अपने युवराजके साथ बार-बार सुनना चाहिये। इससे वीर पुत्रका जन्म होता है अथवा राज्यभागिनी कन्या होती है ।।
यश्चेदं श्रावयेद् विद्वान् सदा पर्वणि पर्वणि ।
धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।
यश्चेदं श्रावयेत् श्राद्धे ब्राह्मणान् पादमन्ततः ।
अक्षय्यमन्नपानं वै पितृंस्तस्योपतिष्ठते ।।
जो विद्वान् पुरुष सदा प्रत्येक पर्वपर इसका श्रवण कराता है, वह पापरहित और स्वर्गविजयी होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है। जो पुरुष श्राद्धके अवसरपर ब्राह्मणोंको इसका
एक पाद भी श्रवण कराता है, उसके पितृगण अक्षय अन्नपानको प्राप्त करते हैं ।। इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ।। स नरः सर्वकामांश्च कीर्तिं प्राप्येह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशयः ।। हे शौनक! जो मनुष्य व्यासजीके द्वारा कथित महान् अर्थमय और वेदतुल्य इस पवित्र इतिहासका श्रेष्ठ ब्राह्मणके द्वारा श्रवण करता है, वह इस लोकमें सब मनोरथोंको और कीर्तिको प्राप्त करता है और अन्तमें परमसिद्धि मोक्षको प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं है। श्रावयेद् ब्राह्मणान् श्राद्धे यश्चैनं पादमन्ततः । अक्षय्यं तस्य तत् श्राद्धमुपावर्तेत् पितॄनिह ।। भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः । भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परमं पदम् ।। जो मनुष्य श्राद्धके अन्तमें इसका कम-से-कम एक पाद भी ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसका श्राद्ध उसके पितृगणको अक्षय होकर प्राप्त होता है। महाभारत परमपुण्यदायक है, इसमें विविध कथाएँ हैं, देवता भी महाभारतका सेवन करते हैं; क्योंकि महाभारतसे परम-पदकी प्राप्ति होती है ।। भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ । भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि तत् ।। एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा । श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम ।। हे भरतश्रेष्ठ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि महाभारत सभी शास्त्रोंमें उत्तम है, और उसके श्रवण-कीर्तनसे मोक्षकी प्राप्ति होती है—यह मैं तुमसे यथार्थ कहता हूँ। हे महाराज! मैंने जो कुछ कहा है, वह ऐसा ही है; यहाँ कोई विचार-वितर्क नहीं करना है। मेरे गुरुने भी मुझसे यही कहा है कि महाभारतपर मनुष्यको श्रद्धावान् होना चाहिये ।। वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।। भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम । सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ।। हे भरतर्षभ! वेद, रामायण और पवित्र महाभारत—इन सबमें आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका ही कीर्तन किया गया है। अतः हे नृपश्रेष्ठ! उत्तम श्रेय—मोक्षकी इच्छा रखनेवाले प्रत्येक पुरुषको महाभारतका श्रवण और पारायण करनेमें सदा प्रयत्नवान् रहना चाहिये ।।
सम्पूर्ण महाभारतकी श्लोकसंख्या (अनुष्टुप् छन्दके अनुसार)
| उत्तरभारतीय पाठ | दाक्षिणात्य पाठ | उवाच | कुल | |
|---|---|---|---|---|
| आदिपर्व | ८८९० | ७३६ ।। | १०६० | १०६८६ ।। |
| सभापर्व | २८१३= | १२४३ ।= | ३८४ | ४४४० ।। |
| वनपर्व | १२१८८ ।।॥- | ८७ ।। | ६८७ | १२९६३ ।= |
| विराटपर्व | २४०८ ।। | २८२ ।। | ३२४ | ३०१५ |
| उद्योगपर्व | ७०५६ ।।॥= | ७६- | ५७४ | ७७०७ |
| भीष्मपर्व | ६०२२ ।- | ७७ ।।= | २६७ | ६३६७ |
| द्रोणपर्व | ९७८० ।- | १३६ ।।॥- | ४४८ | १०३६५= |
| कर्णपर्व | ५३४० ।- | १६४ | २२९ | ५७३३ ।- |
| शल्यपर्व | ३६८९= | ४८ ।।॥= | १६६ | ३९०४ |
| सौप्तिकपर्व | ८०९ ।।॥ | १ | ४४ | ८५४ ।।॥ |
| स्त्रीपर्व | ८२८ ।।॥- | १ | ६० | ८८९ ।।॥- |
| शान्तिपर्व | १४२७१ ।।= | ४५३ ।।॥= | ११३९ | १५८६४ ।।- |
| अनुशासनपर्व | ७८४० ।= | १९७० ।। | ११२१ | १०९३१ ।।॥= |
| आश्वमेधिकपर्व | २९१७ ।।॥= | १२९९ ।= | ४०३ | ४६२० ।- |
| आश्रमवासिकपर्व | ११०७ ।।॥ | १ ।। | ७८ | ११८७ । |
| मौसलपर्व | ३०१ । | ३ ।। | १६ | ३२० ।।॥ |
| महाप्रस्थानिकपर्व | ११४ ।।॥ | × | २२ | १३६ ।।॥ |
| स्वर्गारोहणपर्व | २१८ ।।= | × | ११ | २२९ ।।= |
| कुल संख्या | ८६६०० ।।- | ६५८४= | ७०३३ | १००२१७ ।।= |
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