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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

ध्रुवं पश्यति रूपाणि दीपाद दीपशतं यथा । जैसे एक दीपसे सैकड़ों दीप जला लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा यत्र-तत्र अनेक रूपोंमें उपलब्ध होता है। ऐसा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष निःसन्देह सब रूपोंको एकसे ही उत्पन्न देखता है ॥ ६० १/२ ॥

स वै विष्णुश्च मित्रश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ॥ ६१ ॥ स हि धाता विधाता च स प्रभुः सर्वतोमुखः । हृदयं सर्वभूतानां महानात्मा प्रकाशते ॥ ६२ ॥ वास्तवमें वही परमात्मा विष्णु, मित्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति, धाता, विधाता, प्रभु, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण प्राणियोंका हृदय तथा महान् आत्माके रूपमें प्रकाशित है ॥ ६१-६२ ॥

तं विप्रसंघाश्च सुरासुराश्च यक्षाः पिशाचाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे महर्षयश्चैव सदा स्तुवन्ति ॥ ६३ ॥ ब्राह्मणसमुदाय, देवता, असुर, यक्ष, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षस, भूत और सम्पूर्ण महर्षि भी सदा उस परमात्माकी स्तुति करते हैं ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता

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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता

ब्रह्मोवाच

मनुष्याणां तु राजन्यः क्षत्रियो मध्यमो गुणः ।
कुञ्जरो वाहनानां च सिंहश्चारण्यवासिनाम् ॥ १ ॥
अविः पशूनां सर्वेषामहिस्तु बिलवासिनाम् ।
गवां गोवृषभश्चैव स्त्रीणां पुरुष एव च ॥ २ ॥

ब्रह्माजीने कहा—महर्षियो! मनुष्योंका राजा तो रजोगुणसे युक्त क्षत्रिय है। सवारियोंमें हाथी, बनवासियोंमें सिंह, समस्त पशुओंमें भेड़ और बिलमें रहनेवालोंमें सर्प, गौओंमें बैल एवं स्त्रियोंमें पुरुष प्रधान है ॥ १-२ ॥

न्यग्रोधो जम्बुवृक्षश्च पिप्पलः शाल्मलिस्तथा ।
शिंशपा मेषशृङ्गश्च तथा कीचकवेणवः ॥ ३ ॥
एते द्रुमाणां राजानो लोकेऽस्मिन् नात्र संशयः ।

बरगद, जामुन, पीपल, सेमल, शीशम, मेषशृंग (मेढ़ासिंगी) और पोले बाँस—ये इस लोकमें वृक्षोंके राजा हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३ १/२ ॥

हिमवान् पारियात्रश्च सह्यो विन्ध्यस्त्रिकूटवान् ॥ ४ ॥
श्वेतो नीलश्च भासश्च कोष्ठवांश्चैव पर्वतः ।
गुरुस्कन्धो महेन्द्रश्च माल्यवान् पर्वतस्तथा ॥ ५ ॥
एते पर्वतराजानो गणानां मरुतस्तथा ।
सूर्यो ग्रहाणामधिपो नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ॥ ६ ॥

हिमवान्, पारियात्र, सह्य, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान् पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान् पर्वत—ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं ॥ ४—६ ॥

यमः पितॄणामधिपः सरितामथ सागरः ।
अम्भसां वरुणो राजा मरुतामिन्द्र उच्यते ॥ ७ ॥

यमराज पितरोंके और समुद्र सरिताओंके स्वामी हैं। वरुण जलके और इन्द्र मरुद्गणोंके स्वामी कहे जाते हैं ॥ ७ ॥

अर्कोऽधिपतिरुष्णानां ज्योतिषामिन्दुरुच्यते ।

अग्निर्भूतपतिर्नित्यं ब्राह्मणानां बृहस्पतिः ॥ ८ ॥
उष्णप्रभाके अधिपति सूर्य हैं और ताराओंके स्वामी चन्द्रमा कहे गये हैं। भूतोंके नित्य अधीश्वर अग्निदेव हैं तथा ब्राह्मणोंके स्वामी बृहस्पति हैं ॥ ८ ॥
ओषधीनां पतिः सोमो विष्णुर्बलवतां वरः ।
त्वष्टाधिराजो रूपाणां पशूनामीश्वरः शिवः ॥ ९ ॥

ओषधियोंके स्वामी सोम हैं तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णु हैं। रूपोंके अधिपति सूर्य और पशुओंके ईश्वर भगवान् शिव हैं ॥ ९ ॥
दीक्षितानां तथा यज्ञो देवानां मघवा तथा ।
दिशामुदीची विप्राणां सोमो राजा प्रतापवान् ॥ १० ॥

दीक्षा ग्रहण करनेवालोंके यज्ञ और देवताओंके इन्द्र अधिपति हैं। दिशाओंकी स्वामिनी उत्तर दिशा है एवं ब्राह्मणोंके राजा प्रतापी सोम हैं ॥ १० ॥
कुबेरः सर्वरत्नानां देवतानां पुरंदरः ।
एव भूताधिपः सर्गः प्रजानां च प्रजापतिः ॥ ११ ॥

सब प्रकारके रत्नोंके स्वामी कुबेर, देवताओंके स्वामी इन्द्र और प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। यह भूतोंके अधिपतियोंका सर्ग है ॥ ११ ॥
सर्वेषामेव भूतानामहं ब्रह्ममयो महान् ।
भूतं परतरं मत्तो विष्णोर्वापि न विद्यते ॥ १२ ॥

मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका महान् अधीश्वर और ब्रह्ममय हूँ। मुझसे अथवा विष्णुसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ १२ ॥
राजाधिराजः सर्वेषां विष्णुर्ब्रह्ममयो महान् ।
ईश्वरत्वं विजानीध्वं कर्तारमकृतं हरिम ॥ १३ ॥

ब्रह्ममय महाविष्णु ही सबके राजाधिराज हैं, उन्हींको ईश्वर समझना चाहिये। वे श्रीहरि सबके कर्ता हैं, किंतु उनका कोई कर्ता नहीं है ॥ १३ ॥
नरकिन्नरयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
देवदानवनागानां सर्वेषामीश्वरो हि सः ॥ १४ ॥

वे विष्णु ही मनुष्य, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, देव, दानव और नाग सबके अधीश्वर हैं ॥ १४ ॥
भगदेवानुयातानां सर्वासां वामलोचना ।
माहेश्वरी महादेवी प्रोच्यते पार्वती हि सा ॥ १५ ॥

उमां देवीं विजानीध्वं नारीणामुत्तमां शुभाम् ।
रतीनां वसुमत्यस्तु स्त्रीणामप्सरसस्तथा ॥ १६ ॥

कामी पुरुष जिनके पीछे फिरते हैं, उन सबमें सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्री प्रधान है। एवं जो माहेश्वरी, महादेवी और पार्वती नामसे कही जाती हैं, उन मंगलमयी उमादेवीको स्त्रियोंमें

सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियोंमें स्वर्णविभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं ।। १५-१६ ।।
धर्मकामाश्च राजानो ब्राह्मणा धर्मसेतवः ।
तस्माद् राजा द्विजातीनां प्रयतेत स्म रक्षणे ।। १७ ।।
राजा धर्म-पालनके इच्छुक होते हैं और ब्राह्मण धर्मके सेतु हैं। अतः राजाको चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणोंकी रक्षाका प्रयत्न करे ।। १७ ।।
राज्ञां हि विषये येषामवसीदन्ति साधवः ।
हीनास्ते स्वगुणैः सर्वैः प्रेत्य चोन्मार्गगामिनः ।। १८ ।।
जिन राजाओंके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंको कष्ट होता है, वे अपने समस्त राजोचित गुणोंसे हीन हो जाते और मरनेके बाद नीच गतिको प्राप्त होते हैं ।। १८ ।।
राज्ञां हि विषये येषां साधवः परिरक्षिताः ।
तेऽस्मिँल्लोके प्रमोदमन्ते सुखं प्रेत्य च भुञ्जते ।। १९ ।।
प्राप्नुवन्ति महात्मान इति वित्त द्विजर्षभाः ।
द्विजवरो! जिनके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंकी सब प्रकारसे रक्षा की जाती है, वे महामना नरेश इस लोकमें आनन्दके भागी होते हैं और परलोकमें अक्षय सुख प्राप्त करते हैं, ऐसा समझो ।। १९½ ।।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नियतं धर्मलक्षणम् ।। २० ।।
अहिंसा परमो धर्मो हिंसा चाधर्मलक्षणा ।
प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्याः कर्मलक्षणाः ।। २१ ।।
अब मैं सबके नियत धर्मके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्मका लक्षण (स्वरूप) है। प्रकाश देवताओंका और यज्ञ आदि कर्म मनुष्योंका लक्षण है ।। २०-२१ ।।
शब्दलक्षणमाकाशं वायुस्तु स्पर्शलक्षणः ।
ज्योतिषां लक्षणं रूपमापश्च रसलक्षणाः ।। २२ ।।
शब्द आकाशका, वायु स्पर्शका, रूप तेजका और रस जलका लक्षण है ।। २२ ।।
धारिणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा ।
स्वरव्यञ्जनसंस्कारा भारती शब्दलक्षणा ।। २३ ।।
गन्ध सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथिवीका लक्षण है तथा स्वर-व्यंजनकी शुद्धिसे युक्त वाणीका लक्षण शब्द है ।। २३ ।।
मनसो लक्षणं चिन्ता चिन्तोक्ता बुद्धिलक्षणा ।
मनसा चिन्तितानर्थान् बुद्ध्या चेह व्यवस्यति ।। २४ ।।
बुद्धिर्हि व्यवसायेन लक्ष्यते नात्र संशयः ।

चिन्तन मनका और निश्चय बुद्धिका लक्षण है; क्योंकि मनुष्य इस जगत्‌में मनके द्वारा चिन्तन की हुई वस्तुओंका बुद्धिसे ही निश्चय करते हैं, निश्चयके द्वारा ही बुद्धि जाननेमें आती है, इसमें संदेह नहीं है ॥ २४ १/२ ॥ लक्षणं मनसो ध्यानमव्यक्तं साधुलक्षणम् ॥ २५ ॥ प्रवृत्तिलक्षणो योगो ज्ञानं संन्यासलक्षणम् । तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान् ॥ २६ ॥ मनका लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण बाहरसे व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है)। योगका लक्षण प्रवृत्ति और संन्यासका लक्षण ज्ञान है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ज्ञानका आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे ॥ २५-२६ ॥ संन्यासी ज्ञानसंयुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम् । अतीतो द्वन्द्वमभ्येति तमोमृत्युजरातिगः ॥ २७ ॥ ज्ञानयुक्त संन्यासी मौत और बुढ़ापाको लाँघकर सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे परे हो अज्ञानान्धकारके पार पहुँचकर परमगतिको प्राप्त होता है ॥ २७ ॥ धर्मलक्षणसंयुक्तमुक्तं वो विधिवन्मया । गुणानां ग्रहणं सम्यग् वक्ष्याम्यहमतः परम् ॥ २८ ॥ महर्षियो! यह मैंने तुमलोगोंसे लक्षणोंसहित धर्मका विधिवत् वर्णन किया। अब यह बतला रहा हूँ कि किस गुणको किस इन्द्रियसे ठीक-ठीक ग्रहण किया जाता है ॥ २८ ॥ पार्थिवो यस्तु गन्धो वै घ्राणेन हि स गृह्यते । घ्राणस्थश्च तथा वायुर्गन्धज्ञाने विधीयते ॥ २९ ॥ पृथ्वीका जो गन्ध नामक गुण है, उसका नासिकाके द्वारा ग्रहण होता है और नासिकामें स्थित वायु उस गन्धका अनुभव करानेमें सहायक होती है ॥ २९ ॥ अपां धातू रसो नित्यं जिह्वया स तु गृह्यते । जिह्वास्थश्च तथा सोमो रसज्ञाने विधीयते ॥ ३० ॥ जलका स्वाभाविक गुण रस है, जिसको जिह्वाके द्वारा ग्रहण किया जाता है और जिह्वामें स्थित चन्द्रमा उस रसके आस्वादनमें सहायक होता है ॥ ३० ॥ ज्योतिषश्च गुणो रूपं चक्षुषा तच्च गृह्यते । चक्षुःस्थश्च सदाऽऽदित्यो रूपज्ञाने विधीयते ॥ ३१ ॥ तेजका गुण रूप है और वह नेत्रमें स्थित सूर्यदेवताकी सहायतासे नेत्रके द्वारा सदा देखा जाता है ॥ ३१ ॥ वायव्यस्तु सदा स्पर्शस्त्वचा प्रज्ञायते च सः । त्वक्स्थश्चैव सदा वायुः स्पर्शने स विधीयते ॥ ३२ ॥

वायुका स्वाभाविक गुण स्पर्श है, जिसका त्वचाके द्वारा ज्ञान होता है और त्वचामें स्थित वायुदेव उस स्पर्शका अनुभव करानेमें सहायक होता है ॥ ३२ ॥ आकाशस्य गुणो ह्येष श्रोत्रेण च स गृह्यते ।
श्रोत्रस्थाश्च दिशः सर्वाः शब्दज्ञाने प्रकीर्तिताः ॥ ३३ ॥
आकाशके गुण शब्दका कानोंके द्वारा ग्रहण होता है और कानमें स्थित सम्पूर्ण दिशाएँ शब्दके श्रवणमें सहायक बतायी गयी हैं ॥ ३३ ॥
मनसश्च गुणश्चिन्ता प्रज्ञया स तु गृह्यते ।
हृदिस्थश्चेतनो धातुर्मनोज्ञाने विधीयते ॥ ३४ ॥
मनका गुण चिन्तन है, जिसका बुद्धिके द्वारा ग्रहण किया जाता है और हृदयमें स्थित चेतन (आत्मा) मनके चिन्तन-कार्यमें सहायता देता है ॥ ३४ ॥
बुद्धिरध्यवसायेन ज्ञानेन च महांस्तथा ।
निश्चित्य ग्रहणाद् व्यक्तमव्यक्तं नात्र संशयः ॥ ३५ ॥
निश्चयके द्वारा बुद्धिका और ज्ञानके द्वारा महत्तत्त्वका ग्रहण होता है। इनके कार्योंसे ही इनकी सत्ताका निश्चय होता है और इसीसे इन्हें व्यक्त माना जाता है, किंतु वास्तवमें तो अतीन्द्रिय होनेके कारण ये बुद्धि आदि अव्यक्त ही हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३५ ॥
अलिङ्गग्रहणो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ।
तस्मादलिङ्गः क्षेत्रज्ञः केवलं ज्ञानलक्षणः ॥ ३६ ॥
नित्य क्षेत्रज्ञ आत्माका कोई ज्ञापक लिंग नहीं है; क्योंकि वह (स्वयंप्रकाश और) निर्गुण है। अतः क्षेत्रज्ञ अलिंग (किसी विशेष लक्षणसे रहित) है; अतः केवल ज्ञान ही उसका लक्षण (स्वरूप) माना गया है ॥ ३६ ॥
अव्यक्तं क्षेत्रमुद्दिष्टं गुणानां प्रभवाप्ययम् ।
सदा पश्याम्यहं लीनो विजानामि शृणोमि च ॥ ३७ ॥
गुणोंकी उत्पत्ति और लयके कारणभूत अव्यक्त प्रकृतिको क्षेत्र कहते हैं। मैं उसमें संलग्न होकर सदा उसे जानता और सुनता हूँ ॥ ३७ ॥
पुरुषस्तद् विजानीते तस्मात् क्षेत्रज्ञ उच्यते ।
गुणवृत्तं तथा वृत्तं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ॥ ३८ ॥
आदिमध्यावसानान्तं सृज्यमानमचेतनम् ।
न गुणा विदुरात्मानं सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ ३९ ॥
आत्मा क्षेत्रको जानता है, इसलिये वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। क्षेत्रज्ञ आदि, मध्य और अन्तसे युक्त समस्त उत्पत्तिशील अचेतन गुणोंके कार्यको और उनकी क्रियाको भी भलीभाँति जानता है, किंतु बारंबार उत्पन्न होनेवाले गुण आत्माको नहीं जान पाते ॥ ३८-३९ ॥
न सत्यं विन्दते कश्चित् क्षेत्रज्ञस्त्वेव विन्दति ।

गुणानां गुणभूतानां यत् परं परमं महत् ॥ ४० ॥
जो गुणों और गुणोंके कार्योंसे अत्यन्त परे है, उस परम महान् सत्यस्वरूप क्षेत्रज्ञको कोई नहीं जानता, परंतु वह सबको जानता है ॥ ४० ॥
तस्माद् गुणांश्च सत्त्वं च परित्यज्येह धर्मवित् ।
क्षीणदोषो गुणातीतः क्षेत्रज्ञं प्रविशत्यथ ॥ ४१ ॥
अतः इस लोकमें जिसके दोषोंका क्षय हो गया है, वह गुणातीत धर्मज्ञ पुरुष सत्त्व (बुद्धि) और गुणोंका परित्याग करके क्षेत्रज्ञके शुद्ध स्वरूप परमात्मामें प्रवेश कर जाता है ॥ ४१ ॥
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वाहाकार एव च ।
अचलश्चानिकेतश्च क्षेत्रज्ञः स परो विभुः ॥ ४२ ॥
क्षेत्रज्ञ सुख-दुखादि द्वन्द्वोंसे रहित, किसीको नमस्कार न करनेवाला, स्वाहाकाररूप यज्ञादि कर्म न करनेवाला, अचल और अनिकेत है। वही महान् विभु है ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

सब पदार्थोंके आदि-अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन

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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

सब पदार्थोंके आदि-अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन

ब्रह्मोवाच
यदादिमध्यपर्यन्तं ग्रहणोपायमेव च ।
नामलक्षणसंयुक्तं सर्वं वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा— महर्षिगण! अब मैं सम्पूर्ण पदार्थोंके नाम-लक्षणोंसहित आदि, मध्य और अन्तका तथा उनके ग्रहणके उपायका यथार्थ वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥

अहः पूर्वं ततो रात्रिर्मासाः शुक्लादयः स्मृताः ।
श्रवणादीनि ऋक्षाणि ऋतवः शिशिरादयः ॥ २ ॥
पहले दिन है फिर रात्रि; (अतः दिन रात्रिका आदि है। इसी प्रकार) शुक्लपक्ष महीनेका, श्रवण नक्षत्रोंका और शिशिर ऋतुओंका आदि है ॥ २ ॥

भूमिरादिस्तु गन्धानां रसानामाप एव च ।
रूपाणां ज्योतिरादित्यः स्पर्शानां वायुरुच्यते ॥ ३ ॥
शब्दस्यादिस्तथाऽऽकाशमेष भूतकृतो गुणः ।
गन्धोंका आदि कारण भूमि है। रसोंका जल, रूपोंका ज्योतिर्मय आदित्य, स्पर्शोंका वायु और शब्दका आदिकारण आकाश है। ये गन्ध आदि पञ्चभूतोंसे उत्पन्न गुण हैं ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि भूतानामादिमुत्तमम् ॥ ४ ॥
आदित्यो ज्योतिषामादिरग्निर्भूतादिरुच्यते ।
सावित्री सर्वविद्यानां देवतानां प्रजापतिः ॥ ५ ॥
अब मैं भूतोंके उत्तम आदिका वर्णन करता हूँ। सूर्य समस्त ग्रहोंका और जठरानल सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि बतलाया जाता है। सावित्री सब विद्याओंकी और प्रजापति देवताओंके आदि हैं ॥ ४-५ ॥

ओङ्कारः सर्ववेदानां वचसां प्राण एव च ।
यदस्मिन् नियतं लोके सर्वं सावित्रिरुच्यते ॥ ६ ॥
ॐकार सम्पूर्ण वेदोंका और प्राण वाणीका आदि है। इस संसारमें जो नियत उच्चारण है, वह सब गायत्री कहलाता है ॥ ६ ॥

गायत्री छन्दसामादिः प्रजानां सर्ग उच्यते ।
गावश्चतुष्पदामादिर्मनुष्याणां द्विजातयः ॥ ७ ॥

छन्दोंका आदि गायत्री और प्रजाका आदि सृष्टिका प्रारम्भ काल है। गौएँ चौपायोंकी और ब्राह्मण मनुष्योंके आदि हैं ।। ७ ।। श्येनः पतत्रिणामादिर्यज्ञानां हुतमुत्तमम् । सरीसृपाणां सर्वेषां ज्येष्ठः सर्पो द्विजोत्तमाः ।। ८ ।। द्विजवरो! पक्षियोंमें बाज, यज्ञोंमें उत्तम आहुति और सम्पूर्ण रेंगकर चलनेवाले जीवोंमें साँप श्रेष्ठ है ।। कृतमादिर्युगानां च सर्वेषां नात्र संशयः । हिरण्यं सर्वरत्नानामोषधीनां यवास्तथा ।। ९ ।। सत्ययुग सम्पूर्ण युगोंका आदि है, इसमें संशय नहीं है। समस्त रत्नोंमें सुवर्ण और अन्नोंमें जौ श्रेष्ठ है ।। ९ ।। सर्वेषां भक्ष्यभोज्यानामन्नं परममुच्यते । द्रवाणां चैव सर्वेषां पेयानामाप उत्तमाः ।। १० ।। सम्पूर्ण भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंमें अन्न श्रेष्ठ कहा जाता है। बहनेवाले और सभी पीनेयोग्य पदार्थोंमें जल उत्तम है ।। स्थावराणां तु भूतानां सर्वेषामविशेषतः । ब्रह्मक्षेत्रं सदा पुण्यं प्लक्षः प्रथमतः स्मृतः ।। ११ ।। समस्त स्थावर भूतोंमें सामान्यतः ब्रह्मक्षेत्र—पाकर नामवाला वृक्ष श्रेष्ठ एवं पवित्र माना गया है ।। ११ ।। अहं प्रजापतीनां च सर्वेषां नात्र संशयः । मम विष्णुरचिन्त्यात्मा स्वयम्भूरिति स स्मृतः ।। १२ ।। सम्पूर्ण प्रजापतियोंका आदि मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है। मेरे आदि अचिन्त्यात्मा भगवान् विष्णु हैं। उन्हींको स्वयम्भू कहते हैं ।। १२ ।। पर्वतानां महामेरुः सर्वेषामग्रजः स्मृतः । दिशां च प्रदिशां चोर्ध्वं दिक्पूर्वा प्रथमा तथा ।। १३ ।। समस्त पर्वतोंमें सबसे पहले महामेरुगिरिकी उत्पत्ति हुई है। दिशा और विदिशाओंमें पूर्व दिशा उत्तम और आदि मानी गयी है ।। १३ ।। तथा त्रिपथगा गङ्गा नदीनामग्रजा स्मृता । तथा सरोदपानानां सर्वेषां सागरोऽग्रजः ।। १४ ।। सब नदियोंमें त्रिपथगा गंगा ज्येष्ठ मानी गयी है। सरोवरोंमें सर्वप्रथम समुद्रका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १४ ।। देवदानवभूतानां पिशाचोरगरक्षसाम् । नरकिन्नरयक्षाणां सर्वेषामीश्वरः प्रभुः ।। १५ ।।

देव, दानव, भूत, पिशाच, सर्प, राक्षस, मनुष्य, किन्नर और समस्त यक्षोंके स्वामी भगवान् शंकर हैं ॥ १५ ॥

आदिर्विश्वस्य जगतो विष्णुर्ब्रह्ममयो महान् ।
भूतं परतरं यस्मात् त्रैलोक्ये नेह विद्यते ॥ १६ ॥
सम्पूर्ण जगत्‌के आदिकारण ब्रह्मस्वरूप महाविष्णु हैं। तीनों लोकोंमें उनसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ १६ ॥

आश्रमाणां च सर्वेषां गार्हस्थ्यं नात्र संशयः ।
लोकानामादिरव्यक्तं सर्वस्यान्तस्तदेव च ॥ १७ ॥
सब आश्रमोंका आदि गृहस्थ आश्रम है, इसमें संदेह नहीं है। समस्त जगत्‌का आदि और अन्त अव्यक्त प्रकृति ही है ॥ १७ ॥

अहान्यस्तमयान्तानि उदयान्ता च शर्वरी ।
सुखस्यान्तं सदा दुःखं दुःखस्यान्तं सदा सुखम् ॥ १८ ॥
दिनका अन्त है सूर्यास्त और रात्रिका अन्त है सूर्योदय। सुखका अन्त सदा दुःख है और दुःखका अन्त सदा सुख है ॥ १८ ॥

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।
संयोगाश्च वियोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ १९ ॥
समस्त संग्रहका अन्त है विनाश, उत्थानका अन्त है पतन, संयोगका अन्त है वियोग और जीवनका अन्त है मृत्यु ॥ १९ ॥

सर्वं कृतं विनाशान्तं जातस्य मरणं ध्रुवम् ।
अशाश्वतं हि लोकेऽस्मिन् सदा स्थावरजङ्गमम् ॥ २० ॥
जिन-जिन वस्तुओंका निर्माण हुआ है, उनका नाश अवश्यम्भावी है। जो जन्म ले चुका है उसकी मृत्यु निश्चित है। इस जगत्‌में स्थावर या जंगम कोई भी सदा रहनेवाला नहीं है ॥ २० ॥

इष्टं दत्तं तपोऽधीतं व्रतानि नियमाश्च ये ।
सर्वमेतद् विनाशान्तं ज्ञानस्यान्तो न विद्यते ॥ २१ ॥
जितने भी यज्ञ, दान, तप, अध्ययन, व्रत और नियम हैं, उन सबका अन्तमें विनाश होता है, केवल ज्ञानका अन्त नहीं होता ॥ २१ ॥

तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ।
निर्ममो निरहंकारो मुच्यते सर्वपाप्मभिः ॥ २२ ॥
इसलिये विशुद्ध ज्ञानके द्वारा जिसका चित्त शान्त हो गया है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हो चुकी हैं तथा जो ममता और अहंकारसे रहित हो गया है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४४ ।।

देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्राह्मणके धर्मका कथन

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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्राह्मणके धर्मका कथन

ब्रह्मोवाच

बुद्धिसारं मनःस्तम्भमिन्द्रियग्रामबन्धनम् ।
महाभूतपरिस्कन्धं निवेशपरिवेशनम् ॥ १ ॥
जराशोकसमाविष्टं व्याधिव्यसनसम्भवम् ।
देशकालविचारीदं श्रमव्यायामनिःस्वनम् ॥ २ ॥
अहोरात्रपरिक्षेपं शीतोष्णपरिमण्डलम् ।
सुखदुःखान्तसंश्लेषं क्षुत्पिपासावकीलकम् ॥ ३ ॥
छायातपविलेखं च निमेषोन्मेषविह्वलम् ।
घोरमोहजलाकीर्णं वर्तमानमचेतनम् ॥ ४ ॥
मासार्धमासगणितं विषमं लोकसंचरम् ।
तमोनियमपङ्कं च रजोवेगप्रवर्तकम् ॥ ५ ॥
महाहंकारदीप्तं च गुणसंजातवर्तनम् ।
अरतिग्रहणाणीकं शोकसंहारवर्तनम् ॥ ६ ॥
क्रियाकारणसंयुक्तं रागविस्तारमायतम् ।
लोभेप्सापरिविक्षोभं विचित्राज्ञानसम्भवम् ॥ ७ ॥
भयमोहपरीवारं भूतसम्मोहकारकम् ।
आनन्दप्रीतिचारं च कामक्रोधपरिग्रहम् ॥ ८ ॥
महदादिविशेषान्तमसक्तं प्रभवाव्ययम् ।
मनोजवं मनःकान्तं कालचक्रं प्रवर्तते ॥ ९ ॥

ब्रह्माजीने कहा— महर्षियो! मनके समान वेगवाला (देहरूपी) मनोरम कालचक्र निरन्तर चल रहा है। यह महत्तत्त्वसे लेकर स्थूल भूतोंतक चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ है। इसकी गति कहीं भी नहीं रुकती। यह संसार-बन्धनका अनिवार्य कारण है। बुढ़ापा और शोक इसे घेरे हुए हैं। यह रोग और दुर्व्यसनोंकी उत्पत्तिका स्थान है। यह देश और कालके अनुसार विचरण करता रहता है। बुद्धि इस काल-चक्रका सार, मन खम्भा और इन्द्रियसमुदाय बन्धन हैं। पञ्चमहाभूत इसका तना है। अज्ञान ही इसका आवरण है। श्रम तथा व्यायाम इसके शब्द हैं। रात और दिन इस चक्रका संचालन करते हैं। सर्दी और गर्मी इसका घेरा है। सुख और दुःख इसकी सन्धियाँ (जोड़) हैं। भूख और प्यास इसके कीलक

तथा धूप और छाया इसकी रेखा हैं। आँखोंके खोलने और मीचनेसे इसकी व्याकुलता (चंचलता) प्रकट होती है। घोर मोहरूपी जल (शोकाश्रु)-से यह व्याप्त रहता है। यह सदा ही गतिशील और अचेतन है। मास और पक्ष आदिके द्वारा इसकी आयुकी गणना की जाती है। यह कभी भी एक-सी अवस्थामें नहीं रहता। ऊपर-नीचे और मध्यवर्ती लोकोंमें सदा चक्कर लगाता रहता है। तमोगुणके वशमें होनेपर इसकी पापपङ्कमें प्रवृत्ति होती है और रजोगुणका वेग इसे भिन्न-भिन्न कर्मोंमें लगाया करता है। यह महान् दर्पसे उद्दीप्त रहता है। तीनों गुणोंके अनुसार इसकी प्रवृत्ति देखी जाती है। मानसिक चिन्ता ही इस चक्रकी बन्धनपट्टिका है। यह सदा शोक और मृत्युके वशीभूत रहनेवाला तथा क्रिया और कारणसे युक्त है। आसक्ति ही उसका दीर्घ विस्तार (लंबाई-चौड़ाई) है। लोभ और तृष्णा ही इस चक्रको ऊँचे-नीचे स्थानोंमें गिरानेके हेतु हैं। अद्भुत अज्ञान (माया) इसकी उत्पत्तिका कारण है। भय और मोह इसे सब ओरसे घेरे हुए हैं। यह प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला, आनन्द और प्रीतिके लिये विचरनेवाला तथा काम और क्रोधका संग्रह करनेवाला है ॥ १—९ ॥

एतद् द्वन्द्वसमायुक्तं कालचक्रमचेतनम् । विसृजेत् संक्षिपेच्चापि बोधयेत् सामरं जगत् ॥ १० ॥

यह राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे युक्त जड देहरूपी कालचक्र ही देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि और संहारका कारण है। तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिका भी यही साधन है ॥ १० ॥

कालचक्रप्रवृत्तिं च निवृत्तिं चैव तत्त्वतः । यस्तु वेद नरो नित्यं न स भूतेषु मुह्यति ॥ ११ ॥

जो मनुष्य इस देहमय कालचक्रकी प्रवृत्ति और निवृत्तिको सदा अच्छी तरह जानता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ११ ॥

विमुक्तः सर्वसंस्कारैः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १२ ॥

वह सम्पूर्ण वासनाओं, सब प्रकारके द्वन्द्वों और समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः । चत्वार आश्रमाः प्रोक्ताः सर्वे गार्हस्थ्यमूलकाः ॥ १३ ॥

ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास—ये चार आश्रम शास्त्रोंमें बताये गये हैं। गृहस्थ आश्रम ही इन सबका मूल है ॥ १३ ॥

यः कश्चिदिह लोकेऽस्मिन्नागमः परिकीर्तितः । तस्यान्तगमनं श्रेयः कीर्तिरेषा सनातनी ॥ १४ ॥

इस संसारमें जो कोई भी विधि-निषेधरूप शास्त्र कहा गया है, उसमें पारंगत विद्वान् होना गृहस्थ द्विजोंके लिये उत्तम बात है। इसीसे सनातन यशकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥

संस्कारैः संस्कृतः पूर्वं यथावच्चरितव्रतः।
जातौ गुणविशिष्टायां समावर्तेत तत्त्ववित्॥ १५॥
पहले सब प्रकारके संस्कारोंसे सम्पन्न होकर वेदोक्त विधिसे अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करना चाहिये। तत्पश्चात् तत्त्ववेत्ताको उचित है कि वह समावर्तन-संस्कार करके उत्तम गुणोंसे युक्त कुलमें विवाह करे॥ १५॥
स्वदारनिरतो नित्यं शिष्टाचारो जितेन्द्रियः।
पञ्चभिश्च महायज्ञैः श्रद्दधानो यजेदिह॥ १६॥
अपनी ही स्त्रीपर प्रेम रखना, सदा सत्पुरुषोंके आचारका पालन करना और जितेन्द्रिय होना गृहस्थके लिये परम आवश्यक है। इस आश्रममें उसे श्रद्धापूर्वक पञ्चमहायज्ञोंके द्वारा देवता आदिका यजन करना चाहिये॥ १६॥
देवतातिथिशिष्टाशी निरतो वेदकर्मसु।
इज्याप्रदानयुक्तश्च यथाशक्ति यथासुखम्॥ १७॥
गृहस्थको उचित है कि वह देवता और अतिथियोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नका स्वयं आहार करे। वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ करे और दान दे॥ १७॥
न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो मुनिः।
न च वागङ्गचपल इति शिष्टस्य गोचरः॥ १८॥
मननशील गृहस्थको चाहिये कि हाथ, पैर, नेत्र, वाणी तथा शरीरके द्वारा होनेवाली चपलताका परित्याग करे अर्थात् इनके द्वारा कोई अनुचित कार्य न होने दे। यही सत्पुरुषोंका बर्ताव (शिष्टाचार) है॥ १८॥
नित्यं यज्ञोपवीती स्याच्छुक्लवासाः शुचिव्रतः।
नियतो यमदानाभ्यां सदा शिष्टैश्च संविशेत्॥ १९॥
सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहे, स्वच्छ वस्त्र पहने, उत्तम व्रतका पालन करे, शौच-संतोष आदि नियमों और सत्य-अहिंसा आदि यमोंके पालनपूर्वक यथाशक्ति दान करता रहे तथा सदा शिष्ट पुरुषोंके साथ निवास करे॥ १९॥
जितशिश्नोदरो मैत्रः शिष्टाचारसमन्वितः।
वैणवीं धारयेद् यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम्॥ २०॥
शिष्टाचारका पालन करते हुए जिह्वा और उपस्थको काबूमें रखे। सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे। बाँसकी छड़ी और जलसे भरा हुआ कमण्डलु सदा साथ रखे॥ २०॥
(त्रीणि धारयते नित्यं कमण्डलुमतन्द्रितः।
एकमाचमनार्थाय एकं वै पादधावनम्।
एकं शौचविधानार्थमित्येतत् त्रितयं तथा॥)

वह आलस्य छोड़कर सदा तीन कमण्डलु धारण करे। एक आचमनके लिये, दूसरा पैर धोनेके लिये और तीसरा शौच-सम्पादनके लिये। इस प्रकार कमण्डलु धारणके ये तीन प्रयोजन हैं।।

अधीत्याध्यापनं कुर्यात् तथा यजनयाजने ।
दानं प्रतिग्रहं वापि षड्गुणां वृत्तिमाचरेत् ॥ २१ ॥
ब्राह्मणको अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन और दान तथा प्रतिग्रह—इन छह वृत्तियोंका आश्रय लेना चाहिये ॥ २१ ॥

त्रीणि कर्माणि जानीत ब्राह्मणानां तु जीविका ।
याजनाध्यापने चोभे शुद्धाच्चापि प्रतिग्रहः ॥ २२ ॥
इनमेंसे तीन कर्म—याजन (यज्ञ कराना), अध्यापन (पढ़ाना) और श्रेष्ठ पुरुषोंसे दान लेना—ये ब्राह्मणकी जीविकाके साधन हैं ॥ २२ ॥

अथ शेषाणि चान्यानि त्रीणि कर्माणि यानि तु ।
दानमध्ययनं यज्ञो धर्मयुक्तानि तानि तु ॥ २३ ॥
शेष तीन कर्म—दान, अध्ययन तथा यज्ञानुष्ठान करना—ये धर्मोपार्जनके लिये हैं ॥ २३ ॥

तेष्वप्रमादं कुर्वीत त्रिषु कर्मसु धर्मवित् ।
दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः सर्वभूतसमो मुनिः ॥ २४ ॥
सर्वमेतद् यथाशक्ति विप्रो निर्वर्तयन् शुचिः ।
एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं गृहस्थः संशितव्रतः ॥ २५ ॥
धर्मज्ञ ब्राह्मणको इनके पालनमें कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये। इन्द्रियसंयमी, मित्रभावसे युक्त, क्षमावान्, सब प्राणियोंके प्रति समानभाव रखनेवाला, मननशील, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला और पवित्रतासे रहनेवाला गृहस्थ ब्राह्मण सदा सावधान रहकर अपनी शक्तिके अनुसार यदि उपर्युक्त नियमोंका पालन करता है तो वह स्वर्गलोकको जीत लेता है ॥ २४-२५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन

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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन

ब्रह्मोवाच

एवमेतेन मार्गेण पूर्वोक्तेन यथाविधि ।
अधीतवान् यथाशक्ति तथैव ब्रह्मचर्यवान् ॥ १ ॥
स्वधर्मनिरतो विद्वान् सर्वेन्द्रिययतो मुनिः ।
गुरोः प्रियहिते युक्तः सत्यधर्मपरः शुचिः ॥ २ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**महर्षिगण! इस प्रकार इस पूर्वोक्त मार्गके अनुसार गृहस्थको यथावत् आचरण करना चाहिये एवं यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान् बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनि-व्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे ॥ १-२ ॥

गुरुणा समनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् ।
हविष्यभैक्ष्यभुक् चापि स्थानासनविहारवान् ॥ ३ ॥
गुरुकी आज्ञा लेकर भोजन करे। भोजनके समय अन्नकी निन्दा न करे। भिक्षाके अन्नको हविष्य मानकर ग्रहण करे। एक स्थानपर रहे। एक आसनसे बैठे और नियत समयमें भ्रमण करे ॥ ३ ॥

द्विकालमग्निं जुह्वानः शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
धारयीत सदा दण्डं बैल्वं पालाशमेव वा ॥ ४ ॥
पवित्र और एकाग्रचित्त होकर दोनों समय अग्निमें हवन करे। सदा बेल या पलाशका दण्ड लिये रहे ॥ ४ ॥

क्षौमं कार्पासिकं चापि मृगाजिनमथापि वा ।
सर्वं काषायरक्तं वा वासो वापि द्विजस्य ह ॥ ५ ॥
रेशमी अथवा सूती वस्त्र या मृगचर्म धारण करे। अथवा ब्राह्मणके लिये सारा वस्त्र गेरुए रंगका होना चाहिये ॥ ५ ॥

मेखला च भवेन्मौञ्जी जटी नित्योदकस्तथा ।
यज्ञोपवीती स्वाध्यायी अलुब्धो नियतव्रतः ॥ ६ ॥
ब्रह्मचारी मूँजकी मेखला पहने, जटा धारण करे, प्रतिदिन स्नान करे, यज्ञोपवीत पहने, वेदके स्वाध्यायमें लगा रहे तथा लोभहीन होकर नियमपूर्वक व्रतका पालन करे ॥ ६ ॥

पूताभिश्च तथैवाद्भिः सदा दैवततर्पणम् ।
भावेन नियतः कुर्वन् ब्रह्मचारी प्रशस्यते ॥ ७ ॥

जो ब्रह्मचारी सदा नियमपरायण होकर श्रद्धाके साथ शुद्ध जलसे नित्य देवताओंका तर्पण करता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है ॥ ७ ॥
एवं युक्तो जयेल्लोकान् वानप्रस्थो जितेन्द्रियः ।
न संसरति जातीषु परं स्थानमाश्रितः ॥ ८ ॥
इसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले उत्तम गुणोंसे युक्त जितेन्द्रिय वानप्रस्थी पुरुष भी उत्तम लोकोंपर विजय पाता है। वह उत्तम स्थानको पाकर फिर इस संसारमें जन्म धारण नहीं करता ॥ ८ ॥
संस्कृतः सर्वसंस्कारैस्तथैव ब्रह्मचर्यवान् ।
ग्रामान्निष्क्रम्य चारण्ये मुनिः प्रव्रजितो वसेत् ॥ ९ ॥
वानप्रस्थ मुनिको सब प्रकारके संस्कारोंके द्वारा शुद्ध होकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए घरकी ममता त्यागकर गाँवसे बाहर निकलकर वनमें निवास करना चाहिये ॥ ९ ॥
चर्मवल्कलसंवासी सायं प्रातरुपस्पृशेत् ।
अरण्यगोचरो नित्यं न ग्रामं प्रविशेत् पुनः ॥ १० ॥
वह मृगचर्म अथवा वल्कल-वस्त्र पहने। प्रातः और सायंकालके समय स्नान करे। सदा वनमें ही रहे। गाँवमें फिर कभी प्रवेश न करे ॥ १० ॥
अर्चयन्नतिथीन् काले दद्याच्चापि प्रतिश्रयम् ।
फलपत्रावरैर्मूलैः श्यामाकेन च वर्तयन् ॥ ११ ॥
अतिथिको आश्रय दे और समयपर उनका सत्कार करे। जंगली फल, मूल, पत्ता अथवा साँवाँ खाकर जीवन-निर्वाह करे ॥ ११ ॥
प्रवृत्तमुदकं वायुं सर्वं वानेयमाश्रयेत् ।
प्राश्नीयादानुपूर्व्येण यथादीक्षमतन्द्रितः ॥ १२ ॥
बहते हुए जल, वायु आदि सब वनकी वस्तुओंका ही सेवन करे। अपने व्रतके अनुसार सदा सावधान रहकर क्रमशः उपर्युक्त वस्तुओंका आहार करे ॥ १२ ॥
समूलफलभिक्षाभिर्चेदतिथीमागतम् ।
यद् भक्ष्यं स्यात् ततो दद्याद् भिक्षां नित्यमतन्द्रितः ॥ १३ ॥
यदि कोई अतिथि आ जाय तो फल-मूलकी भिक्षा देकर उसका सत्कार करे। कभी आलस्य न करे। जो कुछ भोजन अपने पास उपस्थित हो, उसीमेंसे अतिथिको भिक्षा दे ॥ १३ ॥
देवतातिथिपूर्वं च सदा प्राश्नीत् वाग्यतः ।
अस्पर्धितमनाश्चैव लघ्वाशी देवताश्रयः ॥ १४ ॥
नित्य प्रति पहले देवता और अतिथियोंको भोजन दे, उसके बाद मौन होकर स्वयं अन्न ग्रहण करे। मनमें किसीके साथ स्पर्धा न रखे, हल्का भोजन करे, देवताओंका सहारा

ले ।। १४ ।।

दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः केशान् श्मश्रु च धारयन् । जुह्वन् स्वाध्यायशीलश्च सत्यधर्मपरायणः ।। १५ ।। इन्द्रियोंका संयम करे, सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे, क्षमाशील बने और दाढ़ी-मूँछ तथा सिरके बालोंको धारण किये रहे। समयपर अग्निहोत्र और वेदोंका स्वाध्याय करे तथा सत्य-धर्मका पालन करे ।। १५ ।।

शुचिदेहः सदा दक्षो वननित्यः समाहितः । एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं वानप्रस्थो जितेन्द्रियः ।। १६ ।। शरीरको सदा पवित्र रखे। धर्म-पालनमें कुशलता प्राप्त करे। सदा वनमें रहकर चित्तको एकाग्र किये रहे। इस प्रकार उत्तम धर्मोंको पालन करनेवाला जितेन्द्रिय वानप्रस्थी स्वर्गपर विजय पाता है ।। १६ ।।

गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ वा पुनः । य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रयेत् ।। १७ ।। ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ कोई भी क्यों न हो, जो मोक्ष पाना चाहता हो, उसे उत्तम वृत्तिका आश्रय लेना चाहिये ।। १७ ।।

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् । सर्वभूतसुखो मैत्रः सर्वेन्द्रिययतो मुनिः ।। १८ ।। (वानप्रस्थकी अवधि पूरी करके) सम्पूर्ण भूतोंको अभय-दान देकर कर्म-त्यागरूप संन्यास-धर्मका पालन करे। सब प्राणियोंके सुखमें सुख माने। सबके साथ मित्रता रखे। समस्त इन्द्रियोंका संयम और मुनि-वृत्तिका पालन करे ।। १८ ।।

अयाचितमसंकॢप्तमुपपन्नं यदृच्छया । कृत्वा प्राह्णे चरेद् भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने ।। १९ ।। वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित् । बिना याचना किये, बिना संकल्पके दैवात् जो अन्न प्राप्त हो जाय, उस भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करे। प्रातःकालका नित्यकर्म करनेके बाद जब गृहस्थोंके यहाँ रसोई-घरसे धुआँ निकलना बंद हो जाय, घरके सब लोग खा-पी चुकें और बर्तन धो-माजकर रख दिये गये हों, उस समय मोक्षधर्मके ज्ञाता संन्यासीको भिक्षा लेनेकी इच्छा करनी चाहिये ।। १९ १/२ ।।

लाभेन च न हृष्येत नालाभे विमना भवेत् । न चातिभिक्षां भिक्षेत केवलं प्राणयात्रिकः ।। २० ।। भिक्षा मिल जानेपर हर्ष और न मिलनेपर विषाद न करे। (लोभवश) बहुत अधिक भिक्षाका संग्रह न करे। जितनेसे प्राण-यात्राका निर्वाह हो उतनी ही भिक्षा लेनी चाहिये ।। २० ।।

यात्राऽर्थी कालमाकाङ्क्षंश्चरेद् भैक्ष्यं समाहितः ।
लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः ॥ २१ ॥
संन्यासी जीवन-निर्वाहके ही लिये भिक्षा माँगे। उचित समयतक उसके मिलनेकी बाट देखे। चित्तको एकाग्र किये रहे। साधारण वस्तुओंकी प्राप्तिकी भी इच्छा न करे। जहाँ अधिक सम्मान होता हो, वहाँ भोजन न करे ॥ २१ ॥

अभिपूजितलाभाद्धि विजुगुप्सेत भिक्षुकः ।
भुक्तान्यन्नानि तिक्तानि कषायकटुकानि च ॥ २२ ॥
मान-प्रतिष्ठाके लाभसे संन्यासीको घृणा करनी चाहिये। वह खाये हुए तिक्त, कसैले तथा कड़वे अन्नका स्वाद न ले ॥ २२ ॥

नास्वादयीत भुञ्जानो रसांश्च मधुरांस्तथा ।
यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणधारणम् ॥ २३ ॥
भोजन करते समय मधुर रसका भी आस्वादन न करे। केवल जीवन-निर्वाहके उद्देश्यसे प्राण-धारणमात्रके लिये उपयोगी अन्नका आहार करे ॥ २३ ॥

असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत मोक्षवित् ।
न चान्यमन्नं लिप्सेत भिक्षमाणः कथंचन ॥ २४ ॥
मोक्षके तत्त्वको जाननेवाला संन्यासी दूसरे प्राणियोंकी जीविकामें बाधा पहुँचाये बिना ही यदि भिक्षा मिल जाती हो तभी उसे स्वीकार करे। भिक्षा माँगते समय दाताके द्वारा दिये जानेवाले अन्नके सिवा दूसरा अन्न लेनेकी कदापि इच्छा न करे ॥ २४ ॥

न संनिकाशयेद् धर्मं विविक्ते चारजाश्चरेत् ।
शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा ॥ २५ ॥
प्रतिश्रयार्थं सेवेत पार्वतीं वा पुनर्गुहाम् ।
ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत् ॥ २६ ॥
उसे अपने धर्मका प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। रजोगुणसे रहित होकर निर्जन स्थानमें विचरते रहना चाहिये। रातको सोनेके लिये सूने घर, जंगल, वृक्षकी जड़, नदीके किनारे अथवा पर्वतकी गुफाका आश्रय लेना चाहिये। ग्रीष्मकालमें गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं रहना चाहिये, किंतु वर्षाकालमें किसी एक ही स्थानपर रहना उचित है ॥ २५-२६ ॥

अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवच्च चरेन्महीम् ।
दयार्थं चैव भूतानां समीक्ष्य पृथिवीं चरेत् ॥ २७ ॥
संचयांश्च न कुर्वीत स्नेहवासं च वर्जयेत् ।
जबतक सूर्यका प्रकाश रहे तभीतक संन्यासीके लिये रास्ता चलना उचित है। वह कीड़ेकी तरह धीरे-धीरे समूची पृथ्वीपर विचरता रहे और यात्राके समय जीवोंपर दया करके पृथिवीको अच्छी तरह देख-भालकर आगे पाँव रखे। किसी प्रकारका संग्रह न करे और कहीं भी आसक्तिपूर्वक निवास न करे ॥ २७ ½ ॥

पूताभिरद्भिर्नित्यं वै कार्यं कुर्वीत मोक्षवित् ॥ २८ ॥ उपस्पृशेदुद्धृताभिरद्भिश्च पुरुषः सदा । मोक्ष-धर्मके ज्ञाता संन्यासीको उचित है कि सदा पवित्र जलसे काम ले। प्रतिदिन तुरंत निकाले हुए जलसे स्नान करे (बहुत पहलेके भरे हुए जलसे नहीं) ॥ २८ ½ ॥

अहिंसा ब्रह्मचर्यं च सत्यमार्जवमेव च ॥ २९ ॥ अक्रोधश्चानसूया च दमो नित्यमपैशुनम् । अष्टस्वेतेषु युक्तः स्याद् व्रतेषु नियतेन्द्रियः ॥ ३० ॥ अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना—इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे। इन्द्रियोंको वशमें रखे ॥ २९-३० ॥

अपापमशठं वृत्तमजिह्मं नित्यमाचरेत् । जोषयेत सदा भोज्यं ग्रासमागतमस्पृहः ॥ ३१ ॥ उसे सदा पाप, शठता और कुटिलतासे रहित होकर बर्ताव करना चाहिये। नित्यप्रति जो अन्न अपने-आप प्राप्त हो जाय, उसको ग्रहण करना चाहिये, किंतु उसके लिये भी मनमें इच्छा नहीं रखनी चाहिये ॥ ३१ ॥

यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणयात्रिकम् । धर्मलब्धमथाश्रीयान्न काममनुवर्तयेत् ॥ ३२ ॥ प्राणयात्राका निर्वाह करनेके लिये जितना अन्न आवश्यक है, उतना ही ग्रहण करे। धर्मतः प्राप्त हुए अन्नका ही आहार करे। मनमाना भोजन न करे ॥ ३२ ॥

ग्रासादाच्छादनादन्यन्न गृह्णीयात् कथंचन । यावदाहारयेत् तावत् प्रतिगृह्णीत नाधिकम् ॥ ३३ ॥ खानेके लिये अन्न और शरीर ढकनेके लिये वस्त्रके सिवा और किसी वस्तुका संग्रह न करे। भिक्षा भी, जितनी भोजनके लिये आवश्यक हो, उतनी ही ग्रहण करे, उससे अधिक नहीं ॥ ३३ ॥

परेभ्यो न प्रतिग्राह्यं न च देयं कदाचन । दैन्यभावाच्च भूतानां संविभज्य सदा बुधः ॥ ३४ ॥ बुद्धिमान् संन्यासीको चाहिये कि दूसरोंके लिये भिक्षा न माँगे तथा सब प्राणियोंके लिये दयाभावसे संविभागपूर्वक कभी कुछ देनेकी इच्छा भी न करे ॥ ३४ ॥

नाददीत परस्वानि न गृह्णीयादयाचितः । न किंचिद् विषयं भुक्त्वा स्पृहयेत् तस्य वै पुनः ॥ ३५ ॥ दूसरोंके अधिकारका अपहरण न करे। बिना प्रार्थनाके किसीकी कोई वस्तु स्वीकार न करे। किसी अच्छी वस्तुका उपभोग करके फिर उसके लिये लालायित न रहे ॥ ३५ ॥

मृदमापस्तथान्नानि पत्रपुष्पफलानि च ।