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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

एक पाद भी श्रवण कराता है, उसके पितृगण अक्षय अन्नपानको प्राप्त करते हैं ।। इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ।। स नरः सर्वकामांश्च कीर्तिं प्राप्येह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशयः ।। हे शौनक! जो मनुष्य व्यासजीके द्वारा कथित महान् अर्थमय और वेदतुल्य इस पवित्र इतिहासका श्रेष्ठ ब्राह्मणके द्वारा श्रवण करता है, वह इस लोकमें सब मनोरथोंको और कीर्तिको प्राप्त करता है और अन्तमें परमसिद्धि मोक्षको प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं है। श्रावयेद् ब्राह्मणान् श्राद्धे यश्चैनं पादमन्ततः । अक्षय्यं तस्य तत् श्राद्धमुपावर्तेत् पितॄनिह ।। भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः । भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परमं पदम् ।। जो मनुष्य श्राद्धके अन्तमें इसका कम-से-कम एक पाद भी ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसका श्राद्ध उसके पितृगणको अक्षय होकर प्राप्त होता है। महाभारत परमपुण्यदायक है, इसमें विविध कथाएँ हैं, देवता भी महाभारतका सेवन करते हैं; क्योंकि महाभारतसे परम-पदकी प्राप्ति होती है ।। भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ । भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि तत् ।। एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा । श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम ।। हे भरतश्रेष्ठ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि महाभारत सभी शास्त्रोंमें उत्तम है, और उसके श्रवण-कीर्तनसे मोक्षकी प्राप्ति होती है—यह मैं तुमसे यथार्थ कहता हूँ। हे महाराज! मैंने जो कुछ कहा है, वह ऐसा ही है; यहाँ कोई विचार-वितर्क नहीं करना है। मेरे गुरुने भी मुझसे यही कहा है कि महाभारतपर मनुष्यको श्रद्धावान् होना चाहिये ।। वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।। भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम । सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ।। हे भरतर्षभ! वेद, रामायण और पवित्र महाभारत—इन सबमें आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका ही कीर्तन किया गया है। अतः हे नृपश्रेष्ठ! उत्तम श्रेय—मोक्षकी इच्छा रखनेवाले प्रत्येक पुरुषको महाभारतका श्रवण और पारायण करनेमें सदा प्रयत्नवान् रहना चाहिये ।।

सम्पूर्ण महाभारतकी श्लोकसंख्या (अनुष्टुप् छन्दके अनुसार)

उत्तरभारतीय पाठदाक्षिणात्य पाठउवाचकुल
आदिपर्व८८९०७३६ ।।१०६०१०६८६ ।।
सभापर्व२८१३=१२४३ ।=३८४४४४० ।।
वनपर्व१२१८८ ।।॥-८७ ।।६८७१२९६३ ।=
विराटपर्व२४०८ ।।२८२ ।।३२४३०१५
उद्योगपर्व७०५६ ।।॥=७६-५७४७७०७
भीष्मपर्व६०२२ ।-७७ ।।=२६७६३६७
द्रोणपर्व९७८० ।-१३६ ।।॥-४४८१०३६५=
कर्णपर्व५३४० ।-१६४२२९५७३३ ।-
शल्यपर्व३६८९=४८ ।।॥=१६६३९०४
सौप्तिकपर्व८०९ ।।॥४४८५४ ।।॥
स्त्रीपर्व८२८ ।।॥-६०८८९ ।।॥-
शान्तिपर्व१४२७१ ।।=४५३ ।।॥=११३९१५८६४ ।।-
अनुशासनपर्व७८४० ।=१९७० ।।११२११०९३१ ।।॥=
आश्वमेधिकपर्व२९१७ ।।॥=१२९९ ।=४०३४६२० ।-
आश्रमवासिकपर्व११०७ ।।॥१ ।।७८११८७ ।
मौसलपर्व३०१ ।३ ।।१६३२० ।।॥
महाप्रस्थानिकपर्व११४ ।।॥×२२१३६ ।।॥
स्वर्गारोहणपर्व२१८ ।।=×११२२९ ।।=
कुल संख्या८६६०० ।।-६५८४=७०३३१००२१७ ।।=
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