मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
चौथा अध्याय। १५१
चौथा अध्याय। १५१ अभिशस्तस्य षण्ढस्य पुंश्चल्या दाम्भिकस्य च । शुक्लं पर्युषितं चैव शूद्रस्योच्छिष्टमेव च ॥ २११ ॥ चिकित्सकस्य मृगयोः क्रूरस्योच्छिष्टभोजिनः । उग्रान्नं सूतिकान्नं च पर्याचान्तमनिर्देशम् ॥ २१२ ॥ चोर, गवैया, बढ़ई, व्याजखोर, अग्नीसोमीय यज्ञ न करके यज्ञ में दीक्षित, कृपण और क़ैदी का अन्न न खाना। महापातकी, नपुंसक, व्यभिचारिणी स्त्री, कपटब्रह्मचारी का अन्न, खट्टा, बासी और शूद्र का जूॅठा अन्न न खाना। वैद्य का, शिकारी का, क्रूर का, जूठन खाने वाले का, क्रूर कर्म करनेवाले का, दश दिन तक सूतक का और पर्याचान्त * इन सब अन्नों को न खाना चाहिए ॥ २१०-२१२ ॥ अनर्चितं वृथामांसमवीरायाश्च योषितः । द्विषदन्नं नगर्य्यन्नं पतितान्नमवक्षुतम् ॥ २१३ ॥ पिशुनानृतिनोश्चान्नं क्रतुविक्रयिणस्तथा । शैलूषतुन्नवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ॥ २१४ ॥ कर्म्मारस्य निषादस्य रङ्गावतारकस्य च । सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ॥ २१५ ॥ श्ववतां शौण्डिकानाञ्च चैलनिर्णेजकस्य च । रजकस्य नृशंसस्य यस्य चोपपतिर्गृहे ॥ २१६ ॥ अपमान से दिया अन्न, वृथामांस, पति-पुत्र हीन स्त्री का, शत्रु के नगर का, पतित मनुष्य का और जिसके ऊपर छींक भई हो वह अन्न न खाना। चुगल, झूठा, यज्ञ फल बेचनेवालों का अन्न, नट, दर्जी और कृतघ्न का अन्न त्याग देना। लोहार, भील, बहुरू-
- एक पंक्ति में भोजन करते हों तभी दूसरी पंक्ति में यदि कोई भोजन विश्राम करके आचमन करले तो उसको 'पर्याचान्त' कहते हैं। ऐसा होजाने पर भोजन बंद कर देना चाहिए ।
१५२ मनुस्मृति।
पिया, सोनार, घरकाट और अस्त्र बेंचनेवाले का अन्न न खाना। कुत्तावाला, मद्यवाला, धोवी, रंगरेज़, निर्दयी और जिस के यहां उपपति हो, इन सबका अन्न न लेना चाहिए ॥ २१३-२१६ ॥ मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितानां च सर्वशः । अनिर्दशं च प्रेतान्नमतुष्टिकरणेव च ॥ २१७ ॥ राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्। आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मविकर्तिनः ॥ २१८ ॥ कारुकान्नं प्रजां हन्ति बलं निर्णेजकस्य च । गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृन्तति ॥ २१९ ॥ पूयं चिकित्सकस्यान्नं पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम् । विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं शस्त्रविक्रयिणो मलम् ॥ २२०॥ जो स्त्री के जार को स्वीकृत किये हों, जो स्त्री के अधीन हों, दश दिन तक मरण शौच का और जो सन्तोष न दे, इन अन्नों को न खाना चाहिए। राजा का अन्न तेज, शूद्र का ब्रह्मतेज, सोनार का आयु, मोची का यश, रसोईदार का प्रजा, धोवी का बल हर लेता है। और समूह का अन्न, वेश्या का अन्न परलोक को बिगाड़ता है। वैद्य का अन्न पीब के समान, व्यभिचारिणी का इन्द्रिय के समान, व्याजखोर का विष्ठा के समान और हथियार बेंचनेवाले का मैल के समान होता है। इन सब कुधान्यों को जहां तक बन पड़े बचाना चाहिए ॥ २१७-२२० ॥ य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्त्तिताः । तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ २२१ ॥ भुक्त्वातोऽन्यतमस्यान्नममत्याक्षपणं त्र्यहम् । मत्या भुक्त्वा चरेत्कृच्छ्रं रेतोविण्मूत्रमेव च ॥ २२२ ॥
चौथा अध्याय। १५३
चौथा अध्याय। १५३ नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्राद्धिनो द्विजः । आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम् ॥ २२३ ॥ श्रोत्रियस्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्धुषेः । मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् ॥ २२४ ॥ तान्प्रजापतिराहैत्य मा कृध्वं विषमं समम् । श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् ॥ २२५ ॥ इसप्रकार जो अन्न कहे गये हैं और ऐसेही दूसरे प्रकार के अन्न को त्वचा, हड्डी और रोम की भांति विद्वानोंने कहा है । इन सब अन्नों को अज्ञान से खा लेवे तो तीन दिन व्रत करे और जान- कर खाया हो तो भी कृच्छ्र व्रत करे । विद्वान् ब्राह्मण श्रद्धाहीन शूद्र के घर पक्वान्न न खाय, यदि अन्न न हो तो एक दिन के लिए कच्चा सीधा उससे ले लेना चाहिए । वेद पढ़कर भी कृपण हो, दाता भी व्याजखोर हो, इन दोनोंके अन्न को देवताओं ने एक भांति कहा हैं । पर ब्रह्माजी ने देवताओं के पास जाकर कहा कि-विषम को सम न करना, व्याजखोर होने परभी दाता का अन्न श्रद्धासे पवित्र होता है । और वेद पढ़कर भी कृपण का श्रद्धारहित अन्न अपवित्र होता है ॥ २२१-२२५ ॥ श्रद्धयेष्टं च पूतं च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्द्धनैः ॥ २२६ ॥ दानधर्मं निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्त्तिकम् । परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ॥ २२७ ॥ यत्किञ्चिदपि दातव्यं याचितेनानसूयया । उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत्तारयति सर्वतः ॥ २२८ ॥ द्विज को श्रद्धा से यज्ञ, कूप, धर्मशाला आदि बनवाना चाहिए । सुमार्ग से मिले धन से यह काम करने से बड़ा फल होता है । २०
१५४ मनुस्मृति । गृहस्थ को यज्ञ आदि कर्मों में सुपात्र को दान देना चाहिए। गृहस्थ के यहां कोई मांगने आवे तो उसको शान्तभाव से जो हो सके देना चाहिए। क्योंकि कभी कोई ऐसा पात्र मिल जाता है, जो दाता को सब पापों से तार देता है ॥ २२६-२२८ ॥ वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः । तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदेश्चक्षुरुत्तमम् ॥ २२९ ॥ भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः । गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् ॥ २३० ॥ वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः । अनडुहः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य विष्टपम् ॥ २३१ ॥ विविध-विषय । जल पिलानेवाला तृप्ति, अन्नदाता अक्षय सुख, तिलदाता अभीष्ट संतान और दीपक का दान करनेवाला उत्तम नेत्र पाता है। भूमिदाता भूमि, सुवर्णदाता उमर, गृहदाता उत्तम गृह, चांदी- दाता उत्तम रूप को पाता है। वस्त्रदाता चन्द्रलोक पाता है, घोड़ा देनेवाला अश्विनीकुमार का लोक, वृषभदाता पूर्णलक्ष्मी और गो- दान करनेवाला सूर्यलोक पाता है ॥ २२९-२३१ ॥ यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः । धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्ममार्ष्टिताम् ॥ २३२ ॥ सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते । वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम् ॥ २३३ ॥ येन येन तु भावेन यद्यद्दानं प्रयच्छति । तत्तत्तेनैव भावेन प्राप्नोति प्रतिपूजितः ॥ २३४ ॥ योऽर्चितं प्रतिगृह्णाति ददात्यर्चितमेव च ।
चौथा अध्याय । १५५
चौथा अध्याय । १५५ तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं तु विपर्यये ॥ २३५ ॥ न विस्मयेन तपसा वदेदिष्ट्वा च नानृतम् । नार्त्तोऽप्यपवदेद्विप्रान्न दत्त्वा परिकीर्त्तयेत् ॥ २३६ ॥ सवारी और शय्या देनेवाला अभयदाता ऐश्वर्य, धान्यदाता अक्षय सुख और वेदाध्यापक ब्रह्मलोक को पाता है। इन सब दानों में वेद का दान सब से उत्तम माना जाता है। जिस सात्त्विक, राजस आदि भावों से दान दिया जाता है उस भाव का फल दाता को मिलता है। जो आदर से दान देता है और जो आदरसे लेता है उन दोनों को स्वर्गफल मिलता है। नहीं तो उलटा फल मिलता है। तप करके अभिमान न करना, यज्ञ करके झूठ न बोलना, ब्राह्मणों से दुःख पाकर भी उनको दुर्वचन न कहना और दान देकर न कहना, यह सत्पुरुषों का कार्य है ॥ २३२-२३६ ॥ यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् । आयुर्विप्रापवादेन दानं च परिकीर्त्तनात् ॥ २३७॥ धर्मं शनैः संचिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ २३८॥ नामुत्र हि सहायार्थं पिता माता च तिष्ठतः । न पुत्रदारा न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः ॥ २३६ ॥ एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते । एकोऽनुभुंक्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ॥ २४० ॥ मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ । विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥ २४१॥ असत्य से यज्ञ निष्फल होजाता है, गर्व से तप क्षीण होजाता है। ब्राह्मणों की निन्दा से आयु घटती है। दान करके खुद बड़ाई
करने से वह निष्फल होजाता है। जिस प्रकार चींटी धीरे धीरे मिट्टी का ढेर लगा देती है उसी भांति गृहस्थ को धीरे धीरे पर- लोक की सहायता के लिए धर्म का संग्रह करना चाहिए। परलोक में मदद के लिए पिता, माता, पुत्र, स्त्री और सम्बन्धी नहीं रहते किन्तु वहां केवल धर्म ही साथ में रहता है। प्राणी अकेला जन्म लेता है, अकेला मरता है और अकेला ही पुण्य-पाप को भोगता है। काठ मिट्टी के समान मृत शरीर को ज़मीन में छोड़कर, स- म्बन्धी लोग मुँह फेरकर, घर चले जाते हैं। एक धर्म ही उसके साथ जाता है ॥ २३७-२४१ ॥ तस्माद्धर्मं सहायार्थं नित्यं संचिनुयाच्छनैः । धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥ २४२ ॥ धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हन्ति किल्विषम् । परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम् ॥ २४३ ॥ उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत् सह । निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमांस्त्यजेत् ॥ २४४ ॥ इस लिए परलोक में सहायता के लिए नित्य धीरे धीरे धर्म का संग्रह करना उचित है। क्योंकि धर्म सहायक होने से प्राणी दुस्तर नरक को तर जाता है। धर्म प्राण, निष्पाप पुरुष को धर्म तत्काल परलोक को लेजाता है। पुरुष को सदा उत्तम पुरुषों से सम्बन्ध करना चाहिए। अधमों को त्यागना चाहिए। इससे कुल की उन्नति होती है ॥ २४२-२४४ ॥ उत्तमानुत्तमान्गच्छन् हीनान्हीनांश्च वर्जयन् । ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्यवायेन शूद्रताम् ॥ २४५ ॥ दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् । अहिंस्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गं तथा व्रतः ॥ २४६ ॥ एधोदकं मूलफलमन्नमभ्युद्यतं च यत् ।
चौथा अध्याय । १५७
चौथा अध्याय । १५७ सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्मध्वथामयदक्षिणाम् ॥ २४७ ॥ आहृतामभ्युद्यतां भिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् । मेने प्रजापतिर्ग्राह्यामपि दुष्कृतकर्मणः ॥ २४८ ॥ नाश्नन्ति पितरस्तस्य दश वर्षाणि पञ्च च । न च हव्यं वहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ २४६ ॥ अच्छे पुरुषों के साथ सम्बन्ध करना और नीचों से सम्बन्ध छोड़ता हुआ पुरुष श्रेष्ठता पाता है, नहीं तो शूद्र के समान होजाता है। कर्तव्यमें अचल, कोमल स्वभाव, इन्द्रियोंको वश रखकर, दुराचार से बचकर, हिंसा न करके पुरुष स्वर्ग को जीत लेता है। समिधा, जल, कन्द, फल, पक्वान्न, कच्चा अन्न, मधु और अभयदान इन पदार्थों में कोई भी वस्तु विना मांगे आजाय तो उसको स्वीकार करलेना चाहिए। विना प्रेरणा के यदि दुराचारी भी भिक्षा ले आवे तो उसे ग्रहण करलेना चाहिए यह प्रजापति की आज्ञा है। जो उस भिक्षा का अपमान करता है, उसके पितर पन्द्रह वर्ष तक उसकी श्राद्ध नहीं लेते और अग्नि हव्य नहीं ग्रहण करता ॥ २४५-२४६ ॥ शय्यागृहान्कुशान्गन्धानपः पुष्पं मणीन्दधि । धाना मत्स्यान्पयो मांसं शाकं चैव न निर्णुदेत् ॥ २५० ॥ गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन् देवतातिथीन् । सर्वतःप्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत् स्वयं ततः ॥ २५१ ॥ गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वातैर्गृहे वसन् । आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ॥ २५२॥ पलँग, घर, कुश, सुगंध की चीज़, जल, फूल, मणि, दही, भुना अन्न, मछली, दूध, मांस और शाक यह कोई देने आवे तो लौटाना न चाहिए। अतिथि देवता गुरु आदि के सत्कार की सामग्री न होय तो उसे मांग भी लेवे, पर अपने काम में न लगाना चाहिए।
१५८ मनुस्मृति । माता, पिता, गुरु न वर्तमान हों या उनसे जुदा रहता हो तो ब्राह्मण अपनी जीविका के लिए सत्पुरुषों से दान ले लेवे ॥ २५०-२५२ ॥ आर्धिकः कुलमित्रं च गोपालो दासनापितौ । एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत् ॥ २५३॥ यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशश्च चिकीर्षितम् । यथा चोपचरेदेनं तथात्मानं निवेदयेत् ॥ २५४ ॥ योऽन्यथासन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते । स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥ २५५ ॥ वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तां तु यःस्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २५६ ॥ अपना साथी, कुलपरम्परा का मित्र, अहीर, दास, नापित और अपने को अर्पण करनेवाले शूद्र का अन्न ग्रहण करना चाहिए । आत्मसमर्पण करनेवाला अपना कुल, देश, जो काम करके पास रहना चाहे और जैसे सेवा करना चाहे-सब निवेदन करे । जो अपनी असलियत छिपाकर सज्जनों के सामने दूसरे ढंग का बनता है वह महापापी, चोर, अपने को छिपानेवाला माना जाता है, सब अर्थ वाणी में रहते हैं, उनका मूल भी वाणी ही है और वाणी में से निकले हैं, ऐसी वाणी को जो चुराता है अर्थात् झूठ बोलता है वह सब वस्तुओं की चोरी करता है ॥ २५३-२५६ ॥ महर्षिपितृदेवानां गत्वानृण्यं यथाविधि । पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यमाश्रितः ॥ २५७॥ एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनः । एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ २५८ ॥ एषोदिता गृहस्थस्य वृत्तिर्विप्रस्य शाश्वती ।
चौथा अध्याय । १५६
चौथा अध्याय । १५६ स्नातकव्रतकल्पश्च सत्त्ववृद्धिकरः शुभः ॥ २५६ ॥ अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन् वेदशास्त्रवित् । व्यपेत कल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६० ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ महर्षि, पितर और देवताओं के ऋण से गृहस्थ को छुटकारा लेकर और पुत्र के ऊपर घर का भार छोड़कर उदासीन वृत्ति से जीवन बिताना चाहिए । एकान्त में अकेला बैठकर, अपना हित चिन्तन करना। एकान्त में विचार करने से पुरुष मोक्ष पाता है। इस प्रकार गृहस्थ ब्राह्मण की जीवननिर्वाह की रीति कही है और स्नातक के आचरण का हाल भी कहा गया है । इस प्रकार के आचरण को करता हुआ ब्राह्मण, निष्पाप होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥ २५७-२६० ॥ चौथा अध्याय पूरा हुआ।
अथ पञ्चमोऽध्यायः । श्रुत्वैतादृषयो धर्मान् स्नातकस्य यथोदितान् । इदमूचुर्महात्मानमनलप्रभवं भृगुम् ॥ १ ॥ एवं यथोक्तं विप्राणां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् । कथं मृत्युः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो ॥ २ ॥ स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः । श्रूयतां येन दोषेण मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ३ ॥ अनभ्यासेन वेदानांमाचारस्य च वर्जनात् । आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ॥ ४ ॥ पांचवां अध्याय । भक्ष्याभक्ष्य-व्यवस्था । इस प्रकार स्नातक ब्राह्मणों के धर्मों को सुनकर, अग्नि से उत्पन्न * महात्मा भृगु से ऋषियों ने कहा—हे प्रभो ! इन विधियों से धर्माचरण करनेवाले ब्राह्मणों को मृत्यु कैसे मार सकता है । यह सुनकर, मनुपुत्र भृगु ने कहा—वेदाभ्यास न करना, सदाचार को छोड़ना सदा आलसी रहना और अपवित्र भोजन से मृत्यु मार लेता है ॥ १-४ ॥
- पहले अध्याय में, दश प्रजापतियों की सृष्टि में मनु से भृगुसृष्टि कही है । यहाँ कल्पभेद से, अग्नि से उत्पन्न भृगु को लिखा है । मनु का अग्नि भी नाम कहीं लिखा मिलता है । कहीं प्रजापति नाम से भी लेख है ।
पांचवां अध्याय । १६१
पांचवां अध्याय । १६१ लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च । अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवानि च ॥ ५ ॥ लोहितान्वृक्षनिर्यासान् व्रश्चनप्रभवांस्तथा । शेलुं गव्यं च पेयूषं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ६ ॥ वृथा कृसरसंयावं पायसापूपमेव च । अनुपाकृतमांसानि देवान्नानि हवींषि च ॥ ७ ॥ लहसुन, प्याज़, भूपुष्प-कुकुरमुत्ता और दूसरे अपवित्र खाद से पैदा होनेवाले पदार्थ द्विजों को न खाना चाहिए । वृक्षों से आप ही निकला, या काटने से निकला लाल गोंद, गूलर, लह- सोड़ा और दश दिन के भीतर में गौ के दूध का पाक इन पदार्थों को ज़रूर छोड़ना चाहिए । तिल, चावल की खिचड़ी, दूध, गुड़, आटा की लपसी, दूध का पाक, मालपुआ, बिना संस्कार का मांस, देवनििमत्त बना अन्न, यज्ञ का हविष्य इन पदार्थों को देवार्पण बिना किये खाना न चाहिए ॥ ५-७ ॥ अनिर्दशाया गोः क्षीरमौष्ट्रमैकशफं तथा । आाविकं सन्धिनीक्षीरं विवत्सायाश्च गोःपयः ॥ ८ ॥ आरण्यानां च सर्वेषां मृगाणां माहिषं विना । स्त्रीक्षीरं चैव वर्ज्यानि सर्वशुक्तानि चैव हि ॥ ९ ॥ दधि भक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वं च दधिसम्भवम् । यानि चैवाभिषूयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः ॥ १० ॥ क्रव्यादाञ्छकुनान्सर्वांस्तथा ग्रामनिवासिनः । अनिर्दिष्टांश्चैकशफांटिट्टिभं च विवर्जयेत् ॥ ११ ॥ कलविंकं प्लवं हंसं चक्राङ्गं ग्रामकुक्कुटम् । २१
प्रतुदाञ्जालपादांश्च कोयष्टिनखविष्किरान् ।
१६२ मनुस्मृति । सारसं रज्जुवालं च दात्यूहं शुकसारिके ॥ १२ ॥ प्रतुदाञ्जालपादांश्च कोयष्टिनखविष्किरान् । निमज्जतश्च मत्स्यादान् शौनं वल्लूरमेव च ॥ १३ ॥ बकं चैव बलाकां च काकोलं खंजरीटकम् । मत्स्यादान् विड्वराहांश्च मत्स्यानेव च सर्वशः ॥१४॥ यो यस्य मांसमश्नाति स तन्मांसाद उच्यते । मत्स्यादःसर्वमांसादस्तस्मान्मत्स्यान्विवर्जयेत्॥१५॥ दश दिन के भीतर ब्याई गौ का दूध, ऊंटनी का दूध, एक खुर वाली गधी, घोड़ी आदि का दूध, भेंड़ का दूध, गर्भवती गौका दूध और जिसका बच्चा मरगया हो उस गौ का दूध न पीना चा- हिए। भैंस को छोड़कर, सब जंगली पशुओं का दूध और स्त्री का दूध और बिगड़कर खट्टा हुआ पदार्थ न खाना। खट्टे पदार्थों में दही, मट्ठा, अच्छे फूल फल के अर्क गुलाब, केवड़ा आदि खाना पीना चाहिए। कच्चा मांस खानेवाले पक्षी, शकुनवाले पक्षी, गांव- वासी पक्षी, अभक्ष्य पक्षी, एक खुरवाले ऊंट, घोड़ा और टिड्डी ये सब अभक्ष्य हैं। बतक, हंस, चकवा, गांव का मुरग़ा, सारस, जल- काक, पपीहा, तोता और मैना ये सब अभक्ष्य हैं। चोंच से मार कर खानेवाले, पैरों में जालवाले (बाज़ वगैरह) कोयल, नखसे फाड़कर खानेवाले, जल में गोता लगाकर मछली खानेवाले, कसाईखाने का मांस और सूखा मांस ये सब अभक्ष्य हैं। बगला, बतक, काला कौआ, खंजन, मछली खानेवाले पक्षी, सुअर और सब भांति की मछली ये सब अभक्ष्य हैं। जो जिसका मांस खाता है वह उस मांस का खानेवाला कहलाता है। पर मछली खाने वाला सब का मांस खानेवाला कहा जाता है। इस लिए मछली न खाना चाहिए। क्योंकि मछली सबका मांस खाती है ॥८-१५॥ पाठीनरोहितावाद्यौ नियुक्तौ हव्यकव्ययोः ।
पाँचवां अध्याय । १६३
पाँचवां अध्याय । १६३ राजीवान् सिंहतुण्डांश्च सशल्कांश्चैव सर्वशः ॥१६॥ न भक्षयेदेकचरानज्ञातांश्च मृगद्विजान् । भक्ष्येष्वपि समुद्दिष्टान्सर्वान्पञ्चनखांस्तथा ॥ १७॥ श्वाविधं शल्यकं गोधां खड्गकूर्मशशांस्तथा । भक्ष्यान्पञ्चनखेष्वाहुरनुष्ट्रांश्चैकतोदतः ॥ १८ ॥ छत्राकं विड्वराहं च लशुनं ग्रामकुक्कुटम् । पलाण्डुं गृञ्जनं चैव मत्या जग्ध्वा पतेद्विजः ॥ १९ ॥ अमत्यैतानि षड् जग्ध्वा कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् । यतिचान्द्रायणं वापि शेषेषूपवसेदहः ॥ २० ॥ पढ़न, रोहू आदि सब मछलियां हव्य-कव्य में ग्रहण के लायक होती हैं। राजीव सिंहतुण्ड और मोटी खाल की मछली भी ग्राह्य हैं। अकेले घूमनेवाले और अनजान पक्षी, मृग अभक्ष्य हैं और जो भक्ष्य पांच नखवाले पशु हैं उनमें भी सब भक्ष्य नहीं हैं । साही, शल्यक, गोधा, गैंडा, कछुआ, खरगोश ये पांच नखवालों में भक्ष्य हैं। और ऊंट को छोड़ कर, एक दांतवाले दूसरे पांच नखवाले भी भक्ष्य हैं। धरती का फूल, गांव का सुअर, लहसुन, गांव का मुरगा, शलगम, प्याज़ इनको जानकर खानेवाला द्विज पतित होजाता है। और ये छ पदार्थ अनजान में खालेय तो सान्तपननामक वा यतिचान्द्रायणनामक प्रायश्चित्त करे । और लाल गोंद आदि खा- लेय तो एक दिन उपवास करे ॥ १६-२० ॥ संवत्सरस्यैकमपि चरेत्कृच्छ्रं द्विजोत्तमः । अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थं ज्ञातस्य तु विशेषतः ॥ २१ ॥ यज्ञार्थं ब्राह्मणैर्वध्याः प्रशस्ता मृगपक्षिणः । भृत्यानां चैव वृत्त्यर्थमगस्त्यो ह्यचरत्पुरा ॥ २२ ॥
१६४ मनुस्मृति । विना जाने कोई अभक्ष्य पदार्थ खालेय तो उसकी शुद्धि के लिए ब्राह्मण को एक वर्ष में एक कृच्छ्रव्रत अवश्य करना चाहिए। और जानकर खालिया हो तो विशेष प्रायश्चित्त करना उचित है। आपत्ति, दुर्भिक्ष के समय में अपने कर्म की पूर्णता के लिए ब्राह्मणों को उत्तम मृग—पक्षियों का वध करना चाहिए। या जिनका पालन भार अपने ऊपर हो उनकी तृप्ति के लिए मृग- पक्षियों को मारना चाहिए क्योंकि पूर्व समय में अगस्त्य मुनि ने ऐसा काम किया था ॥ २१-२२ ॥ बभूवुर्हि पुरोडाशा भक्ष्याणां मृगपक्षिणाम् । पुराणेष्वपि यज्ञेषु ब्रह्मक्षत्रसवेषु च ॥ २३ ॥ यत्किञ्चित्स्नेहसंयुक्तं भक्ष्यं भोज्यमगर्हितम् । तत्पर्युषितमप्याद्यं हविःशेषं च यद्भवेत् ॥ २४ ॥ चिरस्थितमपि त्वाद्यमस्नेहाक्तं द्विजातिभिः । यवगोधूमजं सर्वं पयसश्चैव विक्रियाः ॥ २५ ॥ एतदुक्तं द्विजातीनां भक्ष्याभक्ष्यमशेषतः । मांसस्यातः प्रवक्ष्यामि विधिं भक्षणवर्जने ॥ २६ ॥ प्राचीन काल में ऋषि, ब्राह्मण और क्षत्रियों के यज्ञ में भक्ष्य मृग पक्षियों के पुरोडाश हुआ करते थे। जो भक्ष्य, भोज्य पदार्थ निन्दित नहीं हैं, वे बासी होने पर भी घी आदि मिला हो तो खाने लायक हैं और जो हवन शेष है वह भी खाने योग्य होता है। जौ, गेहूं के पदार्थ, दूध के पदार्थ अधिक दिन के बने हों पर घी से तर न हों तो उनको भी न खाना चाहिए। इस प्रकार द्विजों के भक्ष्य और अभक्ष्य सब पदार्थ कहे गये हैं अब मांसभक्षण और उसके त्याग की विधि कहते हैं ॥ २३-२६ ॥ प्रोक्षितं भक्षयेन्मांसं ब्राह्मणानां च काम्यया । यथाविधि नियुक्तस्तु प्राणानामेव चात्यये ॥ २७ ॥
पांचवां अध्याय । १६५
पांचवां अध्याय । १६५ प्राणस्यान्नमिदं सर्वं प्रजापतिरकल्पयत् । स्थावरं जङ्गमं चैव सर्वं प्राणस्य भोजनम् ॥ २८ ॥ चराणामन्नमचरा दंष्ट्रिणामप्यदंष्ट्रिणः । अहस्ताश्च सहस्तानां शूराणां चैव भीरवः ॥ २६ ॥ मांसभक्षण-व्यवस्था। यज्ञ में वेदमन्त्रों से प्रोक्षण किया मांस खाना और ब्राह्मणों की इच्छा से हुआ हो तो खाना। देवकार्य और पितृकार्य में, निमन्त्रण होने पर या प्राण जाने का भय हो तो खाना उचित है । ब्रह्मा ने इस जगत् के प्राण को अन्नरूप से बनाया है। इसलिए चराचर जगत् सब प्राण का भोजन है। स्थावर, घास आदि जङ्गमों का भोजन है, विना दाढ़वाले दाढ़वालों का भोजन है। विना हाथवाले, हाथवालों का जैसे मनुष्यों का मछली भोजन है और मृग आदि सिंहादि के भोजन हैं ॥ २७-२६ ॥ नात्तादुष्यत्यदन्नद्यान्प्राणिनोऽहन्यहन्यपि । धात्रैव सृष्टा ह्याद्याश्च प्राणिनोऽत्तार एव च ॥ ३० ॥ यज्ञाय जग्धिर्मांसस्येत्येष दैवो विधिः स्मृतः । अतोऽन्यथा प्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधिरुच्यते ॥ ३१ ॥ क्रीत्वा स्वयं वाप्युत्पाद्य परोपकृतमेव वा । देवान् पितॄंश्चार्चयित्वा खादन्मांसं न दोषभाक् ॥३२॥ नाद्यादविधिना मांसं विधिज्ञोऽनापदि द्विजः । जग्ध्वा ह्यविधिना मांसं प्रेत्य तैरद्यतेऽवशः ॥ ३३ ॥ न तादृशं भवत्येनो मृगहन्तुर्धनार्थिनः । यादृशं भवति प्रेत्य वृथा मांसानि खादतः ॥ ३४ ॥
१६६ मनुस्मृति । नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः । स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम् ॥ ३५ ॥ असंस्कृतान्पशून्मन्त्रैर्नाद्याद्विप्रः कदाचन । मन्त्रैस्तु संस्कृतानद्याच्छाश्वतं विधिमास्थितः ॥ ३६ ॥ कुर्याद्घृतपशुं सङ्गे कुर्यात् पिष्टपशुं तथा । न त्वेव तु वृथा हन्तुं पशुमिच्छेत्कदाचन ॥ ३७ ॥ जो भक्षण के योग्य प्राणी हैं उनको प्रतिदिन खाने से, खाने वाला दोषभागी नहीं होता । क्योंकि, भक्षण करने योग्य प्राणी और उनके भक्षकों को, परमात्मा ने ही रचा है । यज्ञ के निमित्त से मांसभक्षण दैवी विधि कहलाती है। लेकिन देवार्पण के बिना मांस खाना राक्षसविधि कही जाती है । मोल लेकर, या आप ही मारकर, या दूसरे ने लाकर दिया हो, ऐसे मांस को देवता और पितरों को अर्पण करके खाने से दोष नहीं होता । आपत्ति- काल न हो तो विधि को जाननेवाला द्विज कभी मांसभक्षण अविधि से न करे—क्योंकि बिना विधि से जो मांसभक्षण करता है, उसके मरने पर उसका मांस वे प्राणी खाते हैं । रोज़गार के लिए जो पशु मारते हैं उनको वैसा पाप नहीं होता जैसा बिना देवता और पितरों को चढ़ाये मांस खानेवाले को होता है। श्राद्ध आदि में विधि से जो मांसभक्षण नहीं करता, वह मरके इक्कीस वार पशुयोनि में जन्म लेता है। मन्त्रों से जिनका संस्कार नहीं हुआ उन पशुओं को ब्राह्मण कभी न खावे । पर सनातन वेद विधि के अनुसार संस्कार किया गया हो तो अवश्य खोवे । मांस खाने ही की इच्छा हो तो घृत का पशु या मैदा का पशु बनाकर विधि से मांस खावे । पर देव निमित्त के बिना पशु मारने की इच्छा कभी न करना चाहिए ॥ ३०-३७ ॥ यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो ह मारणम् । वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि ॥ ३८ ॥
पाँचवाँ अध्याय । १६७
पाँचवाँ अध्याय । १६७ यज्ञार्थं पशवः सृष्टाः स्वयमेव स्वयम्भुवा । यज्ञस्य भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः ॥ ३९ ॥ ओषध्यः पशवो वृक्षास्तिर्यञ्चः पक्षिणस्तथा । यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युत्सृतीः पुनः ॥ ४० ॥ मधुपर्के च यज्ञे च पितृदैवतकर्मणि । अत्रैव पशवो हिंस्या नान्यत्रेत्यब्रवीन्मनुः ॥ ४१ ॥ विना देवनििमित्त के जो वृथा पशुहिंसा करता है, वह मरने पर जितने पशुरोम हैं, उतने जन्मों तक उस पशु के हाथ से मारा जाता है । ब्रह्मा ने स्वयं ही यज्ञ के लिए पशुओं को बनाया है और सब यज्ञ जगत् के कल्याण के लिए हैं, इसलिए यज्ञ में जो पशुवध होता है वह वध नहीं है । ओषधि, पशु, वृक्ष, पक्षी आदि यज्ञ के अर्थ मारे जाने से उत्तम गति को पाते हैं । मधुपर्क, यज्ञ, श्राद्ध और दैवकर्म में पशुवध करना, दूसरे कामों में न करना यह मनु जी की आज्ञा है ॥ ३८-४१ ॥ एष्वर्थेषु पशून् हिंसन् वेदतत्त्वार्थविद्द्विजः । आत्मानं च पशुं चैव गमयत्युत्तमां गतिम् ॥ ४२ ॥ गृहे गुरावरण्ये वा निवसन्नातवान् द्विजः । नावेदविहितां हिंसामापद्यपि समाचरेत् ॥ ४३ ॥ या वेदविहिता हिंसा नियताऽस्मिंश्चराचरे । अहिंसामेव तां विद्याद्वेदाद्धर्मो हि निर्बभौ ॥ ४४ ॥ योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया । स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ॥ ४५ ॥ वेदविशारद् द्विज, मधुपर्क आदि में पशुवध करके अपनी आत्मा और पशु को उत्तम गति को पहुँचाता है । गृहस्थ, ब्रह्मचर्य
या वानप्रस्थ आश्रम में रहकर, द्विज को वेदविरुद्ध हिंसा कभी आपत्ति में भी न करनी चाहिए। इस जगत् में जो वेदानुसार हिंसा नियत है उसको हिंसा न माननी चाहिए। क्योंकि धर्म वेद से ही प्रकट हुआ है। जो पुरुष अहिंसक प्राणियों को अपने सुख की इच्छा से मारता है, वह जीता या मरा हुआ कहीं सुख नहीं पाता ॥ ४२-४५ ॥ यो बन्धनवधक्लेशान्प्राणिनां न चिकीर्षति । स सर्वस्य हितप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ४६ ॥ यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च । तदेवाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किंचन ॥ ४७ ॥ नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् । न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्॥ ४८ ॥ समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम् । प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात् ॥ ४९ ॥ जो पुरुष प्राणियों को बांधने या मारने का दुःख नहीं देना चाहता, वह सबका हित चाहनेवाला पुरुष अनन्त सुख पाता है। ऐसा पुरुष जो कुछ सोचता है, जो कुछ करता है और जिसमें अभिलाषा रखता है वह सब सहज में ही उसको प्राप्त होजाता है। प्राणियों की हिंसा बिना मांस उत्पन्न नहीं होता और प्राणियों के वध से स्वर्ग भी नहीं मिलता, इसलिए मांस खाना छोड़ देना चाहिए। मांस की उत्पत्ति और प्राणियों के वध आदि कर्मों को देखकर सब प्रकार के मांस भक्षण से चित्त को हटा लेना चाहिए ॥ ४६-४९ ॥ न भक्षयति यो मांसं विधिं हित्वा पिशाचवत् । स लोके प्रियतां याति व्याधिभिश्च न पीड्यते ॥५०॥
पांचवां अध्याय । १६६
पांचवां अध्याय । १६६ अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥ ५१ ॥ स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । अनभ्यर्च्यपितॄन्देवांस्ततोऽन्योनास्त्यपुण्यकृत्॥५२॥ जो विधि छोड़कर, पिशाच के भांति मांस भक्षण नहीं करता वह सबका प्रिय होजाता है। और रोगों से दुःखी नहीं होता है। जिसकी राय से मारा जाता है, अङ्गों को काटकर अलग अलग करनेवाला, मारनेवाला, खरीदनेवाला, बेचनेवाला, पकानेवाला, परोसनेवाला और खानेवाला ये सब घातक-मारनेवाले होते हैं । जो पुरुष, देवता और पितरों का पूजन बिना किये, दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर कोई पाप करने वाला नहीं है ॥ ४६-५२ ॥ वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः । मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥ ५३ ॥ फलमूलाशनैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नानां च भोजनैः । न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ॥ ५४ ॥ मांसभक्षयितामुत्र यस्य मांसमिहाद्मयहम् । एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५५ ॥ न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ ५६ ॥ जो सौ वर्ष तक प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ करता है और जो जन्म भर मांस भक्षण नहीं करता, इन दोनों को समान पुण्य फल मि- लता है। पवित्र फल, मूल और मुनि अन्नों के खाने से वह फल नहीं मिलता जो मांस छोड़ने से प्राप्त होता है। इस लोक में जिस २२
का मांस भक्षण मैं करता हूं 'सः' अर्थात् वह परलोक में 'मां' अर्थात् मेरा भक्षण करेगा। यही 'मांस' शब्द का अर्थ विद्वानों ने कहा है। मांस खाना, मद्य पीना और मैथुन इन कामों में मनुष्यों की प्रवृत्ति स्वाभाविक हुआ करती है, इस कारण इनमें दोष नहीं है। परन्तु इनको छोड़ देने से बड़ा पुण्य होता है ॥ ५३-५६ ॥ प्रेतशुद्धिं प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धिं तथैव च। चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ॥ ५७ ॥ दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूड़े च संस्थिते । अशुद्धा बान्धवाः सर्वे सूतके च तथोच्यते ॥ ५८ ॥ दशाशं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते । अर्वाक् संचयनादस्थ्नां त्र्यहमेकाहमेव च ॥ ५६ ॥ सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥ ६० ॥ आशौच-व्यवस्था । अब चारों वर्णों की सूतक व्यवस्था और धातु पात्रों की शुद्धि को क्रम से कहते हैं। दांत निकल आये हों, या दांत निकलने के बाद और चूड़ा कर्म होजाने पर मृत्यु होने से सब बान्धवों को अशुद्धि और सूतक लगता है। सपिण्ड अर्थात् सात पुस्त तक मरणाशौच दश दिन तक रहता है। किसी को अस्थि संचयन के पूर्व ॥५७-६०॥ यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते । जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणं शुद्धिमिच्छताम् ॥ ६१ ॥ सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोस्तु सूतकम्। सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥ ६२ ॥ निरस्य तु पुमान् शुक्रमुपस्पृश्यैव शुध्यति ।