मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
[ १६ ] किया। यह वही समय था जब परम करुणामयी श्रुति वृद्धा माता के समान करुणा मात्र की पात्र बन गई थी। आपात-मधुर पर्यन्त-परिताप-फलक शरीर को ही सर्वस्व मानने वाली सन्तान-कल्याण-राशि-सम्पादक माता की सेवा से विमुख थी। लोक प्रतिष्ठा की अभिलाषा से सेवा भले ही किसी ने की, किन्तु यह सेवा नहीं थी, इस सेवा मात्र से जननी की रक्षा नहीं वरन् क्षयमार्ग की प्रशस्ति थी। छन्दः-'पदा, कल्पहस्ता', ज्योतिर्नयना, निरुक्तश्रवणा, शिक्षाघ्राणा व्याकरणमुखा त्रयीमातृका की लोकप्रदर्शन सेवा श्रद्धा, भक्ति, आस्तिक्य एवं आन्तरिकताशून्य होने पर धर्मबुद्धि और कर्त्तव्यता-बोध-शून्य होने पर स्वच्छन्द पदबन्ध में जननी को भग्नपदा करता है, कोई अनेक प्रकार के विकल्पों को लाकर उसका कर कम्पन करता है, तो कोई विज्ञान संवाद में जननी के तिमिर को हटाने में जननी के नेत्र को ज्योति- विहीन करना चाहता है, तो कोई अपनी उत्प्रेक्षा के आधार पर रुचि-विरुद्ध प्राचीन अर्थ में अपरिदृप्त होकर सार्वत्रिक भक्ति योग अर्थात् रूपक के साहाय्य से पद पदार्थ की निरुक्ति के द्वारा माता की श्रवणशून्यता का ही सम्पादन करता है। कोई नवीन तन्त्र की इच्छा से और दीक्षा की उत्कट गन्ध से बद्धनासिका कर जननी को शिक्षा से सत्कविराजश्रवणा करता है, कोई व्याकरण को अकारण कर चिर अनवद्य जननी के मुख पर सुधामती का प्रक्षेप करता है। यही समय की मातृ परिचर्या है। आज के युग में ऐहिक स्वार्थ की प्रधानता है, लोक प्रतिष्ठा ही प्रयोजन है, धर्माचरणशून्य स्थल की यही मातृ सेवा हो सकती है, वस्तुतः मातृ सेवा रूप में मातृसेवा है। इन्हीं कारणों से 'बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरेदिति' । किसी समय 'ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च, अर्थात् किसो पार्थिव उपलब्धि की अभिसन्धि से शून्य होकर षडङ्ग वेद ब्राह्मणों के लिए अध्येतव्य एवं तदर्थं धर्म ज्ञातव्य था। यही कारण था कि सम्प्रदायशून्य अनादिगुरुशिष्यपरम्परा- विहीन अर्थ से वेद को कुत्सित अर्थ सम्पन्न नहीं करते थे। वेदमूलकशास्त्र की किसी प्रकार की अर्थ कल्पना जो वेदमूलक नहीं थी, उसके द्वारा उसको म्लान करने की चेष्टा नहीं करते थे, क्योंकि 'लवादपि त्रुट्यति चापलात्किल' अतः यह शास्त्रार्थ ऋषि एवं प्राचीन मत के अनुगत नहीं है, इससे बिना कारण ही शब्द शास्त्र की मर्यादा का लङ्घन ही है, इस प्रकार शब्द के मुख्य अर्थ का उच्छेद होता है। भिन्न-भिन्न ब्राह्मण ग्रन्थों की पर्यालोचना करने पर महर्षि कात्यायन बौधायन आदि कल्पतरुकारगण वेद मन्त्रों का जिस रूप में विनियोग किया है, उसके अनुसार ही भाष्यकार ने वेद के मन्त्रों का अर्थ लिखा है। वेद की मीमांसा में किसी प्रकार का स्वातन्त्र्य नहीं है। यदि ये लोग चाहते तो अपनी प्रतिभा के बल पर लोकमनोरञ्जन की दृष्टि से वेद के अर्थ निरूपण में सर्वथा समर्थ थे। किन्तु, ऋषियों की दृष्टि का उल्लङ्घन करना स्वधर्म एवं कर्त्तव्य के ध्वंस का साधक होता है, अतः इस मार्ग के
[ १७ ] अवलम्बन में सर्वथा संकुचित रहे । हठक की कल्पना कर अर्थ करना शास्त्र का पालन नहीं शास्त्र का ध्वंस करना ही मानना होगा । इस प्रकार वेद पुरुष के छ अवयवों को यथा स्थान रखते हुए वेदार्थ का निरूपण ही कर्तव्य है । इतिहास पुराण आदि वेद के उपाङ्ग होने से अर्थ के स्फुरण में ये सहायक हैं । सायणाचार्य ने भी ऋग्वेदभाष्यभूमिका में अपने कथन के समर्थन में इस भारत के वाक्य की अवतारणा की है । 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेद' । अपनी प्रज्ञा पर विश्वास करने वाले कतिपय पाखण्डियों ने युक्ताभास के आधार पर वेद को द्विधा विभक्त कर ब्राह्मणभाग को अवेद कहते सङ्कुचित नहीं होते हैं । किन्तु मन्त्रं मे गोपाय, एतद्ब्राह्मणानि एव पञ्चहवींषि इत्यादि आपस्तम्ब सूत्र की यज्ञ परिभाषा के अनुसार मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों भागों को मिलाकर ही वेद है । इसका व्याख्यान अग्रिम मीमांसा सूत्रों के द्वारा किया गया है—तच्चोदकेषु मन्त्राख्या' (२।१।३२), 'शेषे ब्राह्मणशब्दः' (२।१।३३) । ब्राह्मण एवं मन्त्र प्रातः प्रबोध से आरम्भ कर श्राद्धीय कर्मों के निरूपण के लिए प्रवृत्त है । इनमें वेद मन्त्र के अर्थ के अभिधायक- वाक्य के रूप में और ब्राह्मण विधायक-वाक्य के रूप में प्रयुक्त है । मन्त्र यथा अनुष्ठित कार्य में स्वर आदि के ज्ञान के साथ ऋषि, छन्द, देवता के अर्थ के ज्ञान के साथ यथाविधि विनियुक्त होकर अपने विवक्षित अर्थ का प्रकाशन करता हुआ दृष्ट और अदृष्ट दोनों फलों का साधक है, वे ही अनुष्ठित कर्म कब, किस देश में, किस स्थान में ये कर्तव्य हैं—इस सन्देह में ब्राह्मण के द्वारा विधि के रूप में प्रतिपादित होते हैं । ब्राह्मण वाक्य द्विधा विभक्त है, एक विधिभाग और दूसरा अर्थवाद । पूर्व मीमांसा में महर्षि जैमिनि भो अज्ञात ज्ञापक के रूप में अर्थवाद वाक्य और विधि वाक्य को स्थिर करते हैं । इस प्रकार ब्राह्मण एवं संहिता में आधान से लेकर पुरुषमेध्यान्त कर्मों का विधि स्वरूप एवं अनुष्ठान के समय उच्चारण के द्वारा गृहस्थाश्रम के उपयोगी मन्त्रों का निर्देश है । अतः वेद में उदात्त जीवन के लिए उपयोगी कर्तव्यों का साक्षात्कार के आधार पर निर्देश है । यज्ञादि कर्मों की उपयोगिता के अनुसार एक ही वेद का चतुर्द्धा विभाग है । दर्शपूर्णमास आदि विशेष यज्ञों में चार से सोलह ऋत्विजों की आवश्यकता होती है । इनमें अध्वर्यु, होता, उद्गाता एवं ब्रह्मा इन चार व्यक्तियों की ही विशेष आवश्यकता होती है । इन चारों के तीन जन सहकारी होते हैं । 'उक्त्वा च यजमानत्वं तेषां दीक्षाविधानात्' (३।७।३७) सूत्र में कहा है कि जो ऋत्विज हैं, वे यजमान हैं, 'ये ऋत्विजस्ते यजमानाः । अध्वर्युंगृहपतिं दीक्षयित्वा ब्रह्माणं दीक्षयति, तत उद्गातारं ततो होतारम् । अर्थात् अध्वर्यु गृहपति को दीक्षित कर इसके बाद ब्रह्मा को दीक्षित, अनन्तर होता को और इसके बाद उद्गाता को दीक्षित किया जाता है । इस वचन के अनुसार यज्ञ में जो ऋत्विक् वही यजमान एवं उनकी दीक्षा अर्थात् याग से पूर्व अनुष्ठेय यजमान की शुद्धता
का सम्पादक संस्कार विशेष कर्तव्य के रूप में उपदिष्ट है। इस श्रुतिवचन में जो सोलह मनुष्यों की दीक्षा के विषय में उपदिष्ट किया है वे ही ऋत्विक् हैं। ये सोलह व्यक्ति निम्नलिखित हैं—अध्वर्यु, प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा, उन्नेता-ये चार अध्वर्यु हैं, ये यजुर्वेद में कथित कर्मों का सम्पादन करते हैं। ब्रह्मा, ब्राह्मणाच्छंसी, अग्नीत् और पोता हैं। उद्गाता, प्रस्तोता, प्रतिहर्त्ता और सुब्रह्मण्य ये चार उद्गाता है, ये चार सामवेद में कथित सामगान आदि करते हैं। होता, मैत्रावरुण, अच्छावाक और ग्रावस्तुत ये चार होता हैं, ये ऋग्वेद में कथित कर्म ऋङ् मन्त्र का पाठ करते हुए देवताओं का आह्वान आदि करते हैं। इनमें चार अध्वर्यु, ब्रह्मा होता और उद्गाता ये प्रधान होते हैं अतिरिक्त तीन इनके सहकारी होते हैं। यजुर्वेद में प्रधान रूप से ऋत्विजों के कर्म- कलाप एवं उनके पाठ्य मन्त्र कहे गये हैं, ऋग्वेद में होता के विषय के मन्त्र एवं क्रियाकलाप, सामवेद में उद्गाता विषयक मन्त्र, स्तोत्र एवं कर्मकलाप एवं अथर्ववेद में ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध ऋत्विजों का मन्त्र और कर्मकलाप एवं उसके साथ शान्तिक पौष्टिक आदि क्रियाओं का तथा मन्त्रराशि पठित हैं। इसलिए चार वेदों के यथाक्रम में अध्वर्युवेद, होतृवेद, उद्गातृवेद एवं ब्रह्मवेद भी कहा जाता है। इनमें ब्राह्मणांश में कर्म की विधि एवं मन्त्रांश में विहित कर्म का अर्थ या क्रम अथवा द्रव्यदेवता आदि के स्वरूप प्रकाशित होते हैं, वे ही मन्त्र वहाँ पढ़े गये हैं। ब्राह्मणांश में प्रधान रूप से विधि एवं साधारणतः उपनिषद् होने से मीमांसा एवं वेदान्तदर्शन में ब्राह्मणांश की ही सर्वाधिक आवश्यकता होती है। यह ब्राह्मणांश यदि वेद नहीं रहता तो मीमांसा को 'वेदार्थविचार' एवं वेदान्त को 'श्रुतिशिर:' कथन व्याहतार्थक होगा। अनेक विद्याओं से समन्वित यह वेद वृक्ष की सुशीतल छाया में तापदग्ध जीव शान्ति लाभ करते हैं, इसका अर्थ विचार ही मीमांसा है, कर्म और ज्ञानरूप भेद की दृष्टि से ही मीमांसा और उत्तरमीमांसा या कर्ममीमांसा और ज्ञानमीमांसा के रूप में परवर्ती काल में दो भेद किया गया है। यह सत्य है कि उपासना काण्ड जो श्रद्धा और आवेग पर प्रतिष्ठित है, उसने ज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड के मध्य अपना अस्तित्व समाप्त कर दिया है, किन्तु वैदिककाल की ओर दृष्टिपात करने पर उपासना में ही कर्म और ज्ञान अपनी भेद भूमि को समाप्त कर उसके अङ्ग के रूप में अवस्थित थे। यह उपासना गृही संन्यासी एवं किसी वर्ण विशेष से आबद्ध न थी। इतना सत्य है कि कर्म और ज्ञान तीन वर्णों के साथ एवं आश्रम की दृष्टि से भिन्न थे। परम कल्याणमयी श्रुति उषती जननी के समान धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चतुर्विध पुरुषार्थ स्वरूप स्तन्य धारा के पान कराने में सतत उद्यत थी। पूर्व कर्म की बाध्यता के अनुसार सबके लिए सब सुलभ न था, किन्तु इस जन्म के अधिकृत कर्मों के आचरण से भावी जन्म के सुधार का मार्ग प्रशस्त था। इनमें तीन तो सर्वथा पूर्वमीमांसा ज्ञान सापेक्ष था और इसी से अन्तःकरण की विशुद्धि से मोक्ष मार्ग भी प्रशस्त था। किन्तु यह मोक्ष जो मोचनार्थक
[ १९ ]
मुञ्च्लृ धातु से निष्पन्न है या अवातातार्थक निर्वाण ये सापेक्ष शब्द है । किसका त्याग एवं किससे निर्वाण ? इस जिज्ञासा में पूर्व प्रकृत से ही मोक्ष या निर्वाण यह सहज अवगत होता है । ऐसी स्थिति में खण्ड सत्य के आधार पर शरीर एवं तत्सम्बद्ध वस्तु को ही सत्य मान कर निकृष्ट स्वार्थ से उठकर सम्पूर्ण विश्व को भगवद्रूप या आत्म रूप मानकर मन वाणी और कर्म को समन्वित रूप में सकल जनहित की प्रवृत्ति की भूमि की प्रशस्ति के अनुरूप ज्ञानधारा का प्रवाह ही खण्ड सत्य का त्याग ही मुक्ति है । इस कर्म से अनादि काल सञ्चित पापपङ्क का प्रक्षालन पूर्वक चित्त का नैर्मल्य सम्पादित होता है, और विश्व कल्याण कामना रूपी निष्काम भाव से शास्त्रीय कर्म का यथाविधि अनुष्ठान सम्भव होता है; जिससे ब्रह्माद्वैत ज्ञान सम्भव होता है । चित्तविशुद्ध के लिए सर्वज्ञात्म मुनि ने कहा है- एक ही से अदृष्टविविधविहितानेककर्मानुभावध्वस्तस्वान्तोपरोधाः कथमपि पुरुषाश्चिद्वि- दृक्षां लभन्ते ॥ (संक्षेप० १।६४) इसी लिए तैत्तिरीयोपनिषद् में धर्म से पाप नष्ट होता है 'धर्मेण पापमपनुदति' (तैत्तिरीयारण्यक १०।६३।६) अनाशक यज्ञ दान तप से चित्त की विशुद्धि होती है तब सार्वभौम अखण्ड दीप्तिरूप तेज की अभिव्यक्ति होती है । 'विविदिषन्त यज्ञेन दानेन तपसा अनाशकेन' (बृ० उ० ।४।२२) । यदि धर्म उपासना का सार्वभौम अखण्ड सत्यज्ञान की प्राप्ति में उपयोग न होता तो वर्णाश्रम व्यवस्था एवं मन्दिर आदि की सुव्यवस्था, बदरिकाश्रम आदि में देवोपासना तथा स्वयं श्रीसाधना में लोक की प्रवृत्ति के लिए मठों की स्थापना की आवश्यकता नहीं होती, वरन् शङ्कराचार्य की स्थिति कर्ममार्ग के लोप, धर्म के ध्वंस, वर्णाश्रम धर्म के उच्छेद या विपर्यय के साधन के लिए ही माननी पड़ती, किन्तु उनके आचार एवं कर्म मार्ग के प्रवर्तन वर्णाश्रम धर्म की प्रतिष्ठा से यही सिद्ध होता है कि सकल लोक के उपकार के लिए इसी धर्म की जागृति चाहिए । 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (१।१।१) सूत्र के भाष्य में अधिकारी के लिए शास्त्रीय कर्मकलापों का श्रद्धाभक्तिपूर्वक अनुष्ठान की आवश्यकता को अनिवार्य माना है । देहात्म बुद्धि एवं तत्प्रयुक्त कर्म जिस प्रकार प्रमाण के रूप में कल्पित है, वैसे ही आत्मनिश्चय या आत्मसाक्षात्कार जब तक नहीं होता है, तब तक लौकिक पदार्थ प्रामाणिक, ग्राह्य एवं व्यवहारणीय है । देहात्मप्रत्ययो यद्वत् प्रमाणत्वेन कल्पितः । लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वात्मनिश्चयात् ॥ विहित कर्मों के अनुष्ठान के बिना आध्यात्मिक उत्कर्ष सम्भव ही नहीं है । कर्म की सार्थकता होने से पूर्वमीमांसा ज्ञान अनिवार्य रूप से अपेक्षित है । मीमांसा में तीन प्रस्थान प्रसिद्ध है—प्रभाकर, कुमारिल और मुरारि मिश्र । इनमें प्रभाकर ने जिस मीमांसा सिद्धान्त का समर्थन किया है, वह अतिशय प्राचीन है । इस सिद्धान्त की प्राचीनता प्रभाकर मिश्र की प्राचीनता की साधक नहीं है । यह भी सत्य है कि प्रभाकर ने कर्म प्रतिपादक वेद भाग की ही मीमांसा की है, किन्तु ज्ञान काण्ड की
[ २० ] भी प्रासङ्गिक व्याख्या प्रस्तुत की है । इनके मत में कर्मकाण्ड की मीमांसा भिन्न रूप की नहीं है । जैमिनि के सूत्रों से वेद के उभय मत की व्याख्या होती है । उनके द्वारा प्रणीत बृहती ग्रन्थ में भी निष्प्रपञ्च आत्मस्वरूप को माना है, किन्तु निष्प्रपञ्च आत्मस्वरूप का परिज्ञान कर्म मीमांसा में अपेक्षित न होने से इस विषय की विशेष आलोचना नहीं की है, किन्तु कर्मकाण्ड का परिपन्थी इसे नहीं माना है । इस प्रसङ्ग में प्रभाकर मिश्र का जो गुरु नाम से प्रख्यात है। शाबरभाष्य की व्याख्या बृहती में लिखा है—अहं (मैं) यह कहने पर आत्मा का कर्तृत्व और स्वामित्व रूप में ज्ञान होने पर मम (मेरा) यह कहने पर आत्मा किसी पदार्थ का स्वामी है—यह अवगत होता है—इसी के आधार पर आत्मा का कर्तृत्व और भोक्तृत्व सिद्ध होता है । आत्मा के कर्तृत्व और भोक्तृत्व के आधार पर ही वेद के कर्मकाण्ड का विचार प्रस्तुत होता है । अहं बुद्धि और मम बुद्धि अर्थात् अहङ्कार और ममकार यदि अनात्मा में आत्माभिमान मात्र माना जाय तो आत्मा का कर्तृत्व और भोक्तृत्व सिद्ध नहीं हो सकता है । कर्तृत्व और भोक्तृत्व की सिद्धि के बिना कर्मकाण्ड और पूर्वमीमांसा का विचार व्यर्थ होगा । किन्तु अध्यात्म शास्त्र में आत्मा को अकर्ता और अभोक्ता ही माना है— यह आशङ्का कर, उत्तर दिया है, अहङ्कार और ममकार अनात्मा में आत्माभिमान है, यह मैं जानता हूँ, किन्तु, यह वैराग्य सम्पन्न व्यक्तियों के लिए कहा है—वे ही इसके अधिकारी हैं, किन्तु, जो कर्म- तत्पर हैं, उनके लिए यह विषय नहीं है । भगवान् द्वैपायन ने भी कहा है कर्मसङ्गी अज्ञों के लिए यह बुद्धि भेद नहीं देना चाहिए, वेदान्ताधिकारी के लिए अर्थात् वेद- रहस्यवेत्ता ही इसके अधिकारी हैं । यही कारण है कि शबर स्वामी ने उस आत्मस्वरूप का विवेचन नहीं किया है¹ । शालिकनाथ ने भी पञ्चिका टीका में इसी रूप में विवेचन किया है । 'येषां काषायो रागः, मृदितः तेषामेवैतत्कथयन्ति' (पृ० १।१।५) छान्दोग्योपनिषद् में भी कहा है—भगवान् सनत्कुमार ने मृदितकषाय नारद को अज्ञान के परे वस्तु का प्रदर्शन किया था । 'तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति सनत्कुमारः' सिद्धान्तबिन्दु की टीका न्यायरत्नावली में गौडब्रह्मानन्द ने भी स्पष्ट किया है कि भट्टपाद और प्रभाकर वेदान्तदर्शन के विरोधी नहीं है । 'प्रभाकरभट्टयोस्तु वेदान्तदर्शने विद्वेषाभावः........... आत्मा निष्प्रपञ्चब्रह्मैव । तथापि कर्मप्रसङ्गे न तथा वाच्यम्, उक्तं हि कृष्णेन न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् (न्यार० पृ० ३५४) । १. यदुक्तं अहङ्कारममकारावनात्मन्यात्माभिमानौ इति मृदितकषायाणामेवैतत् कथनीयम, न कर्मसङ्गिनामभ्युपरम्यते, आहु च भगवान् द्वैपायनः न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् इति रहस्याधिकारे । तस्मान्न विवृतमत्र भाष्यकारेण भगवता वचनानु- रोधात्, नाज्ञानादिति । (मीमांसासूत्रभाष्यटीका बृहती १।१।५) ।
[ २१ ] इस विवरण से स्पष्ट है कि कर्म और ज्ञान की प्राचीर वैदिक काल में नहीं था । यह भी प्रभाकर मत से स्पष्ट है कि श्रद्धा-मूलक आत्मतत्त्व-विषयक शाब्दज्ञान की धारा ही चिन्ता है, यह शाब्दज्ञान धारा ही ध्यान नाम से कही जातो है । यह ध्यान ही आत्मतत्त्व साक्षात्कार का साधन है । फल का साधन होने से इसमें विधि है । यह जिज्ञास्य है कि कर्ममीमांसा का क्या प्रयोजन है ? क्योंकि मीमांसा शास्त्र से प्रतिपादित कर्म वर्तमान युग के अनुरूप नहीं है, अतः मीमांसा शास्त्र की आलोचना भी व्यर्थ ही है ? श्रौत कर्म अनुष्ठान के योग्य न होने पर भी मीमांसादर्शन अनालोच्य नहीं है । उपनिषद् विषय की आलोचना का प्रचार होने से उसके उपकारक के रूप में यह शास्त्र भी आलोचनीय है । क्योंकि मीमांसाशास्त्र में एक एक अधिकरण में कर्म- विषयक श्रुति वाक्य को लेकर जिस पद्धति और जिस युक्ति के आधार पर सिद्धान्त स्थिर किया जाता है, उपनिषद् विचारात्मक वेदान्तदर्शन में, धर्म विचारात्मक स्मृति- शास्त्र में एवं व्यवहारशास्त्र आदि में भी तत्त्वार्थ की अवगति के लिए उसी सरणि का अवलम्बन करना होगा । धर्म और व्यवहार शास्त्र की पद्धति से अनुशीलन करने पर ही वेदान्त के सिद्धान्तों की सार्वभौम आलोचना के आधार पर सत्यता और असत्यता के निर्धारण से लोक हित की दृष्टि से ज्ञानकाण्ड का इच्छा क्रिया और चेष्टा के क्रम से उपयोग कर सकता है । प्रकृति और प्रत्यय के निरूपण के साधन के रूप में व्याकरण पदशास्त्र है, उसी प्रकार वाक्यार्थ के निर्णय की दृष्टि से उसके साधन के रूप में इसे वाक्यशास्त्र माना गया है । लोक में सभी कर्म वाक्यात्मक श्रुति-स्मृति-सापेक्ष होने से मीमांसात्मक वाक्यशास्त्र के बिना यथार्थ वाक्यार्थ का अवधारण सम्भव नहीं है । यह सत्य है कि तर्कादि शास्त्र इसके परिपोषक हो सकते हैं, किन्तु वाक्यार्थ की यथार्थ अवधारणा के लिए एकमात्र इसी शास्त्र का अनुशीलन अपेक्षित है । यही कारण है कि इसे न्याय नाम से भी कहा जाता है । 'नीयते प्राप्यते विवक्षितार्थसिद्धिरनेन' इस व्युत्पत्ति के आधार पर मीमांसा न्याय है । यही कारण है कि मीमांसा के प्राचीन ग्रन्थ न्यायकर्णिका, न्यायमाला, इत्यादि न्यायपद घटित है । इसीलिए अधिकरण को 'न्याय' के नाम से कहा जाता है । 'संयोगपृथक्त्वन्याय', योगसिद्धि न्याय इत्यादि । यह सत्य है कि श्रुति का विशेष विचार इस शास्त्र में किया गया है, किन्तु लोक के लिए अपेक्षित स्मृति, शिष्टाचार आदि का भी विचार है, क्योंकि भारतीयता के लिए ही उनका विचार भी एकान्त रूप से अपेक्षित है । लोक और स्मृति के सिद्धान्तों की प्रामाणिकता और व्यावहारिकता का निर्णय मीमांसा से ही होता है । पुराण का भी काल्पनिकत्व-निराकरण इसी शास्त्र के आधार पर होता है । 'इतिहास-पुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्' इस महाभारत का कथन ही वेदार्थ प्रकाशक के रूप में पुराण की चर्चा की है । हे मुनि, आपने साक्षात् श्रुत्यर्थ मूलक के सुदुष्कर
अष्टादश महापुराण की रचना की है, किन्तु, साधारण सुधीगण के दो सुसङ्गत अर्थ विशिष्ट पद्यों की रचना भी कठिन है - 'मुने पुराणानि दशाष्ट साक्षात् श्रुत्यर्थगर्भाणि सुदुष्कराणि । कृतानि पद्यद्वयमत्र कर्तुं को नाम शक्नोति सुसङ्गतार्थम् ॥' (शङ्करदिग्विजय । २४) जिसका समर्थन आचार्य शङ्कर ने देवताधिकरण में 'तस्मात् समूलम् इतिहासपुराणम्' यह कहते हुए किया तथा आचार्य सायण ने भी भाष्योपक्रमणिका में आपात दृष्टि से विरुद्ध रूप में परिलक्षित विषय का मीमांसा शास्त्रोक्त पद्धति के अनुसार प्रामाण्य स्थापित किया है। अतः - यह मानना ही होगा कि विज्ञानदृप्त-सत्यता-शिखरिणी-समारूढ़-समाज के लिए वर्तमान युग में यह उपकारक है। अग्निकुण्ड एवं यज्ञमण्डप आदि की निर्माण- प्रक्रिया ही आज के गृह निर्माण एवं चित्रकला आदि का मूलाधार है। दक्षिण और बङ्गाल में आज नारियाँ इसी परम्परा से दक्ष प्रातः गृहद्वार पर अनायास श्रुति सम्मत चित्र का निर्माण कर कल्याण की कामना करती हुई अनायास ही चित्रकला की प्राथमिक शिक्षा देती हैं। मीमांसा हजारों अधिकरण के सहस्रधा विचार करने पर हजारों न्याय स्थापित होते हैं, उसी के समान भौतिक वाक्यों का यथार्थ ज्ञान सम्भव होता है। यदि आधुनिक न्यायाधीश इस न्याय की पद्धति से न्याय निर्णय की दिशा प्रशस्त करें तो निश्चित ही निर्णय में विपर्यय की सम्भावना नहीं होगी । मीमांसादर्शन के सूत्रों के आधार पर दर्शनशास्त्र के आलोच्य सृष्टितत्त्व, आत्म- तत्त्व एवं ईश्वरतत्त्व आदि के विषय में स्पष्टतः निर्देश नहीं है, किन्तु वट-बीज के समान अवस्थित इन तत्त्वों का उद्घाटन परवर्ती आचार्यों ने किया है—संसार अनादि होने से सृष्टि और प्रलय नहीं है। आत्मा वेद विहित कर्म का कर्त्ता एवं उसका फल भोक्ता होने से व्यावहारिक जीव ही आत्मा है अर्थात् शरीरातिरिक्त अहङ्कार ही आत्मा है और वह जन्म, मरण, स्वर्ग और नरक आदि के साथ सम्बन्धयुक्त है। चिरविनष्ट फल की उपपत्ति के लिए अपूर्व नामक पदार्थ माना है, ईश्वर फलप्रद नहीं है। अपौरुषेय वेद का स्वतः प्रामाण्य है। इसीलिए शङ्कर-दिग्विजय ने कहा है—'निरास्यमीशं श्रुतिलोकसिद्धं श्रुतेः स्वतो मातृत्वमुदाहरिष्यन्' (६।८९) मीमांसा-सिद्धान्त में अतीन्द्रिय सुख नहीं है, वेद क्रिया का प्रतिपादक है। भाट्टमत में विपरीत ख्याति और प्रभाकरमत में अख्याति ही भ्रम में भासमान होती है। प्रभाकरमत में क्रियान्वित शब्द में शक्ति है एवं अन्विताभिधानवाद माना गया है। भाट्टमत में सिद्धवस्तु में शक्ति है एवं अभिहितान्वयवाद है। याग, दान होमादि वैध कर्म है एवं ब्रह्महत्या, कलञ्जभक्षण आदि निषिद्ध कर्म है। मीमांसा के सिद्धान्त में शास्त्रोक्त चतुर्थी विभक्तियुक्त शब्द से त्यज्यमान द्रव्य का उद्देशीभूत ही देवता है। तात्त्विक दृष्टि से जिस नाम से जिस शब्द में जिस भाव में जो भी देवता शास्त्र उद्देशीभूत हो किन्तु वैदिक दृष्टि से जैसा पूर्व
[ २३ ] विवरण प्रस्तुत किया है 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः' (ऋग्वेद १।१६४।४६) इत्यादि श्रुति के आधार पर सनातन एक परमेश्वर से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । पञ्चमहायज्ञ एवं इष्टि सोमादि यज्ञ के द्वारा ही इस महापाप-पंकिल शरीर को ब्राह्मी किया जाता है (महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः) । इसलिए अवश्य कर्तव्य नित्य नैमित्तिक और का कर्म काम्य अनुष्ठान करना चाहिए । द्रव्य देवता एवं देवता के उद्देश्य से द्रव्य त्याग ही प्रधान कर्म है। इस प्रधान कर्म के निर्वाह के लिए अनेक अन्य अङ्ग कर्म भी किये जाते हैं, मन्त्र सभी जगह अनुस्यूत हैं। मननात् मन्त्रः इस वेदवचनानुसार यज्ञीय द्रव्य देवता आदि के ध्यान या चिन्तन से प्रापित है उन्ही का नाम मन्त्र है। (विधायकं ब्राह्मणम्) कर्तव्यता का प्रतिपादन करने वाला ही ब्राह्मण है। विधि तीन प्रकार की है---(१) अपूर्व विधि, (२) नियम विधि, (३) परिसंख्या विधि । इनका पुनः चार भेद है--(१) उत्पत्ति विधि, (२) विनि- योग विधि, (३) प्रयोग विधि, (४) अधिकार विधि । अतिदेश और उपदेश के आधार दो प्रकार के हैं। इन्हीं विधियों के द्वारा धर्म प्रवृत्त होता है । मीमांसा द्वादश लक्षण है, अर्थात् १२ अध्याय है। इन १२ अध्यायों में बारह पदार्थ विचारित है और उसी में धर्म का स्वरूप मीमांसित होता है । प्रथम अध्याय प्रमाण लक्षण है, इसमें धर्म के प्रमाण सम्बन्ध में आलोचना की गई है। वेद की विधि ही साक्षात् धर्म में प्रमाण है । अर्थवाद विधि का आनुगुण्य संपादन करता है, अतः वह भी धर्म में प्रमाण हैं। ये विधियां एवं मन्त्रार्थवाद मूलक मनु आदि स्मृतियां भी वेदमूलक होने से धर्म में प्रमाण हैं। अतः वेदमूलक न होने पर वे प्रमाण नहीं है । शिष्टाचार यह वेद विरुद्ध न होने पर धर्म में प्रमाण है । किन्तु वेद विरुद्ध या शास्त्र विरुद्ध शिष्टाचार ग्रहण योग्य नहीं है । यथाविधि वेदादि शास्त्र का ग्रहण कर उसके अनुसार आचरण एवं उसी का ग्रहण और आचरण पुत्र शिष्य आदि में संक्रमण करना शिष्ट पदवाच्य है । इसलिए इससे विपरीत कोई भी शिष्ट नहीं हो सकता है, इस अध्याय में चार पाद हैं । मीमांसा के द्वितीय अध्याय का नाम भेद लक्षण है । उत्पत्ति विधि के द्वारा बोधित धर्म इस द्वितीय अध्याय के चारों पाद में आलोचित है। अतः द्वितीय अध्याय में उत्पत्ति विधि की आलोचना ही प्रधान है तृतीय अध्याय का नाम शेष लक्षण है। शेष का अर्थ अङ्ग या उपकारक होता है, जो अङ्गी का अर्थात् प्रधान का उपकारक होता है। इनकी ही आलोचना तृतीय अध्याय के आठ पादों में की गई है। इसके द्वारा विनियोग विधि के स्वरूपादि की भी आलोचना होती हैं। विनियोग विधि के द्वारा श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या- रूप छः प्रमाणों की सहायता से अङ्गत्व बोधित होता है ।
अध्याय में वर्णित हैं।
[ २४ ] चतुर्थ अध्याय का नाम प्रयोग लक्षण है। कौन कर्म किसके द्वारा प्रयुक्त अपूर्व होता है, वह कर्म का प्रयोजक है या नहीं। इस रूप में प्रयोग सम्बन्धीय विषय में इस अध्याय में वर्णित हैं। पंचम अध्याय का नाम क्रमलक्षण है। श्रुति, अर्थ, पाठ, स्थान, मुख्य एवं प्रवृत्ति के अनुसार कर्म का परम्पराक्रम में विचार इस अध्याय के चार पाद के द्वारा वर्णित है। चतुर्थ और पंचम अध्याय में प्रयोग विधि विषय की आलोचना है। छठा अध्याय अधिकार लक्षण है। किस कर्म में किसका अधिकार है ? यह छः अध्याय के आठ पाद में वर्णित है। अतः छठें अध्याय में अधिकार विधि की आलोचना है। इन छः अध्यायों में उपदेश विधि का प्राधान्य है। सप्तम और अष्टम अध्याय के चार पादों में सामान्यातिदेश एवं विशेषातिदेश का निरूपण है। अतः इसे सामान्यतः अतिदेश लक्षण कहा गया है। नवम अध्याय के चार पादों में ऊह विषय का विचार किया गया है। इसलिए इसका नाम ऊह लक्षण है। दशम अध्याय के आठ पाद में बाध विषयक विचार है, इसीलिए इसे बाध लक्षण कहा जाता है। इसीलिए इसे बाध लक्षण भी कहा जाता है। एकादश अध्याय में तन्त्रों के सम्बन्ध में विचार है—इसलिए इसे तन्त्र लक्षण कहा जाता है। इसमें चार पाद हैं। बारहवें अध्याय में प्रसंग विषय का विचार है। अतः इसे प्रसंग लक्षण कहा जाता है। इसमें चार पाद हैं। मीमांसक आचार्य मीमांसा वेद के समान ही अनादि है। किन्तु जैमिनि के सूत्रकाल से संबद्ध मीमांसा विचार उपलब्ध होने से ऐतिहासिक दृष्टि से इन्हें ही पूर्वाचार्य माना जा सकता है। यह सत्य है कि उन्होंने अपने सूत्रों में अनेक मीमांसक आचार्यों का उल्लेख किया है। पाश्चात्य दृष्टिकोण से ऐतिहासिक तथ्यों के साक्ष्य पर जैमिनि का समय ईसा पूर्व तृतीय से चतुर्थ शतक तक माना गया है। यह वादरायण के समकालीन है, क्योंकि ब्रह्म सूत्र में जैमिनि का नाम मिलता है। साथ ही पूर्व मीमांसा सूत्र में भी वादरायण का नाम उल्लिखित है¹। जैमिनि को बादरायण शिष्य माना गया है। इन्हें सामवेद का १. जैमिनि सूत्रों में उपलब्ध कतिपय आचार्य :—आत्रेय (मी० ६।१।२६) ऐतिशायन (मी० ३।२।४३), कामुकायिन (११।१।५०) कार्ष्णाजिनि (६।७।३२), बादरायण (मी० १।१।५) बादरि (मी० ३।१।३), लावुकायन (६।७।३७) आदि। अतः, इसे वेद के समान प्राचीन मानना अनुचित नहीं है। कुमारिल ने ही कहा है— ‘इतिकर्तव्यता मात्रं मीमांसा पूरयिष्यति’
अध्याय पर भाष्य की रचना की थी । भवदास भट्ट ने भी संक्षिप्त व्याख्या की थी । ये
[ २५ ] भार प्राप्त था—कुमारिल भट्ट के तन्त्रवार्तिक से यह अवगत होता है कि जैमिनि ने छान्दोग्यानुवादादि ग्रन्थों की रचना की थी । किन्तु यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है । मीमांसा शास्त्रों के संकर्षं काण्ड की रचना जो चार अध्याय में थी वह भी जैमिनि ने की थी । उसमें उपासनातत्त्व का विश्लेषण था । इसी संकर्षं काण्ड का दूसरा नाम देवता काण्ड था । प्रपञ्च हृदय में चार अध्याय में इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में वर्णित विषय देवता तत्त्व का वर्णन है । द्वितीय अध्याय में विधि, अर्थवाद, नामधेय देवता का विशेषत्व आदि वर्णित हैं । तृतीय अध्याय में देवता एक ही साथ में अनेक शरीर को धारण कर सकते हैं, अनेक स्थान में व्यक्त हो सकते हैं और अपनी इच्छानुसार तिरोहित हो सकते हैं । चतुर्थ अध्याय में सत्कर्म के फलस्वरूप देवत्व लाभ अपवर्ग या क्रममुक्ति का निर्देशन है । देवता तत्त्व का प्रतिपादन होने के कारण ही यह उपासना काण्ड के नाम से विख्यात है । महामुनि बोधायन ईसा से पूर्व का माना गया है । इन्होंने द्वादशलक्षणी मीमांसा के चार अध्यायात्मक संकर्षं काण्ड एवं उत्तर मीमांसा के ऊपर कृतकोटिभाष्य नामक विशाल भाष्य की रचना की थी । वृत्तिकार उपवर्ष ने बीस अध्याय के ऊपर वृत्ति की रचना की थी । अनन्तर देवस्वामी ने उत्तर कांड के चार अध्यायों को छोड़कर सोलह अध्याय पर भाष्य की रचना की थी । भवदास भट्ट ने भी संक्षिप्त व्याख्या की थी । ये नाम प्राचीन उक्ति से ही ज्ञातव्य है । कालक्रम ने भगवान् शबर स्वामी ने सिद्धान्त बोधोपयोगी संक्षिप्त भाष्य की रचना की जो आज प्राचीनतम आदर्श स्थानीय है । भाष्य का लक्षण लिखते हुए कहा गया है जिसमें श्रुतगत पदों का ग्रहण कर स्वनिबद्ध सूत्रा- नुकारी पदों की व्याख्या की है उसी को भाष्य कहा जाता है । सूत्रस्थं पदमादाय पदैः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥ भाष्य लक्षण की ओर विशेष दृष्टिपात न करने के कारण न देवानां देवतातन्त्रा- भावाद् इत्यादि अनेक भाष्य वचत्रिमिश्रिक भ्रान्ति क्रम में परिगणित हो गया है । इस प्रकार के वर्णन की सार्थकता प्रदर्शन प्रसंग में यह कहा जा सकता है, शिष्टों का ऐसा व्यवहार रहा है कि विद्वान् संक्षेपोक्ति पूर्वक विस्तृत विषय में प्रस्तुत करते हैं, यही विद्वानों की शैली है । 'इष्टं विदुषां लोके समासव्याससाधारणम्' भाष्यकार की प्रामाणिकता और श्रेष्ठता तो इसी से सिद्ध है कि ज्ञानमूर्ति शंकर ने भी अपने भाष्य में यद्यपि 'शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्' इत्यादि अंश में पूजार्थक बहुवचन का प्रयोग किया है । यह सत्य है कि आचार्य शंकर ने शास्त्रतात्पर्यवेत्ता कहते हुए भी उनका खण्डन किया है, क्योंकि शबरस्वामी कर्मवादी थे और आचार्य शंकर ज्ञाना- त्मक अद्वैतवादी थे । शबरस्वामी ने यागयज्ञ की प्रधानता क्रम में देव-देवी के विग्रहवत्त्व का खण्डन किया है, और आचार्य शंकर ने आसमुद्र हिमाचल भारत के सभी देवी-
[ २६ ] देवताओं की स्तुति कर उनकी पूजा और प्रतिष्ठा के साथ विग्रहवती पंचदेवता की उपासना के साथ उनकी प्रतिष्ठा की है । अतः दोनों का कार्य विरुद्ध है । वस्तुतः शंकर के विषय में पंचदेवों की उपासना को वेद विरुद्ध व्यवहार सिद्ध करना भी आपात-रमणीय है, क्योंकि कृष्णयजुर्वेद के मैत्रायणी शाखा में रुद्र महादेव, गौरी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु एवं सूर्य की उपासना के लिए उनकी गायत्री पठित है । अग्नि चयन कार्य विषय कह कर उस चित् अग्नि में पूजा के लिए महादेव शिव का आवाहन करने के लिए मन्त्र में कहा गया है । देवानां च ऋषीणां चासुराणां च पूवजंम् । महादेवं सहस्राक्षं शिवमावाहयाम्यहम् ॥ शिव के सम्बन्ध में श्रुति कहती है— तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् । शक्ति के सम्बन्ध में कहा गया है— उदगाङ्गो चयाय विद्महे गिरिसुताय धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् । गणपति के सम्बन्ध में कहा गया है — तत् कराटाय च विद्महे हस्ति मुखाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोयात् । विष्णु के सम्बन्ध में कहा गया है — तत्केशवाय विद्महे नारायणाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् । सूर्य के सम्बन्ध में कथित है— तद् भास्कराय विद्महे प्रभाकराय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात् । कार्तिकेय के सम्बन्ध में कथित है— तत्कुमाराय विद्महे कार्तिकेयाय धीमहि तन्नो स्कन्दः प्रचोदयात् । ब्रह्मा के विषय में— तच्चतुर्मुखाय विद्महे पद्मासनाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् । (र्बलिनप्रकाशित मैत्रायणी संहिता अग्निचिति प्रकरण ११९-१२०) अतः, पञ्च देवो उपासना अश्रौत नहीं है । अतः इस अंश में दोनों भाष्यकारों का सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है । कर्मवाद के सम्बन्ध में भी पारमार्थिक दृष्टि से विरोध नहीं है । अशुद्ध चित्त कामना वशीकृत जीव ज्ञानमार्ग का पथिक नहीं हो सकता है वह कर्म मार्ग का ही अधिकारी है । चित्त शुद्धि के लिए याज्ञदान तप कर्म अवश्य ही अनुष्ठेय है । यह ज्ञानमार्गी भी मानते हैं । मीमांसा दर्शन में 'यजति चोदना द्रव्यदेवता- क्रियं समुदाये कृतार्थत्वात् । (४।२।२७) ।
[ २७ ] कल्पसूत्रकार कात्यायन ने भी 'यज्ञं व्याख्यास्यामः द्रव्यं देवतात्यागः' (१।२।१।२) यही कहा है। इसी विषय को श्रुति भी कहती है 'यस्यै देवतायै हविगृंहीतनस्ततां ध्यायेत वषट् करिष्यन्'। ऐतरेय ब्राह्मण (३।१।८) इत्यादि वेद वचन से देवता का ध्यान कर हविष्य का त्याग करना चाहिए। यह भी दोनों पक्ष में स्मरणीय हैं। शबरस्वामी ने मीमांसा दर्शन के (९।१।९) देवताधिकरण भाष्य में कहा है वह प्रौढ़िवाद मात्र है। क्योंकि खण्डदेव ने अपने भाट्टकौस्तुभ में इस विषय का सिद्धान्त उपस्थापित किया है। भाष्यकार ने छठे अध्याय के प्रथम पाद के पंचम सूत्र के तिर्यगधिकरण भाष्य में 'न देवानां देवतातन्तरा- भावाद्' इस वचन से सामञ्जस्य भी नहीं होता है। वहाँ टीका में कुमारिल भट्ट ने कहा है येषां शब्द एव देवता तेषां अप्युक्तो ग्रन्थः अर्थात् जिसके मत में विग्रहवान् देव नहीं हैं अपि तु शब्दमयी देवता है उस मत में यह युक्ति संगत नहीं होता है। अतः यदि यह माना जाय कि देवता का विग्रहवत्त्व का आलाप सामञ्जस्य की दृष्टि से शास्त्रीय सिद्धान्त नहीं है। अन्यथा संकर्षकाण्ड की देवततत्त्वालोचना व्यर्थ हो जायगी। इसी- लिए उत्तर मीमांसा के देवताधिकरण में पाँच विग्रह प्रदर्शित किया गया है। विग्रहो हविषां भोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता। फलप्रदानमित्येतद् पञ्चकं विग्रहादिकम् ॥ इच्छानुसार शरीर धारण यज्ञ में प्रदत्त हविः का भक्षण, सभी पर प्रभुत्व, हविः की प्राप्ति से तृप्ति, फलदातृत्व ये पाँच विग्रहादि कहे गये हैं। अतः कर्म-प्रतिपादनपरक- मीमांसा शास्त्र में कर्म का प्राधान्य स्वाभाविक है। इस विषय में एवं विस्तृत विश्लेषण आगे के खण्डों में प्रस्तुत करने जा रहा हूँ एवं आचार्यों का इतिहास भी अन्य खण्ड में प्रस्तुत करूँगा। इस प्रसङ्ग में इतना ही कहना उचित होगा कि कर्म और ज्ञान का प्राचीन शास्त्रीय विषय विशेष में शास्त्रीय तात्पर्य न होने के कारण परवर्तीकाल की देन है। आर्यभावना दीहि की उपासना है और स्वर्गचिन्मयभूमि मुक्ति और प्रस्तुत प्रकाशन में एक ही है। जैमिनि प्रणीत मीमांसा सूत्र शबरस्वामि प्रणीत शाबरभाष्य कुमारिलभट्टकृत तन्त्रवार्तिक, गोविन्द स्वामिकृत भाष्य विवरण जिसे युधिष्ठिर मीमांसक ने सर्वथा दुर्लभ माना है उसका प्रथम प्रकाशन एवं तंत्रवार्तिक की श्री सोमे- श्वरभट्ट विरचित सर्वानवद्यकारिणी न्यायसुधा एवं अन्त में भाष्य का सार संकलन 'भाष्यभावप्रकाशिका' प्रस्तुत किया गया है। मैं अपने पूज्य गुरुदेव विद्यावाचस्पति, श्री ब्रह्मदत्तद्विवेदी का आभार वहन करता हूँ एवं दार्शनिकसार्वभौम न्यायरत्न तर्करत्न स्व० दामोदरलाल गोस्वामी जिनके द्वारा मुझे इन ग्रन्थों के लेखन की शक्ति प्राप्त हुई। पंडितप्रवर मीमांसारत्न श्री यस० सुब्रह्मण्य शास्त्री ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन में पूर्ण सहयोग एवं अनेक शास्त्रीय समस्याओं के
[ २८ ] समाधान में अनवरत योगदान किया है । अतः मैं इनके प्रति कृतज्ञता वहन करता हूँ, पूज्यपाद डॉ० एस० बागची का निर्देशन ही इन शास्त्रीय गवेषणा का एकमात्र सम्बल है । आचार्य प्रवर विद्यामार्तण्ड श्रीबदरीनाथ शुक्ल का आशीर्वाद ही मेरे इस कठिन कार्य के लिए सदा सेतु का काम करता है । पण्डितप्रवर सतकारी मुखर्जी का आशीर्वाद ही इस कृति का उपादान है । श्री प्रेमशङ्कर शर्मा एम० ए० एवं आजाद चन्द्रशेखर चौरसिया ने इसके श्लोक सूची आदि में अतिशय सहयोग प्रदान किया है अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं । स्व० भूतनाथ सहतीर्थ का मीमांसादर्शन से इस ग्रन्थ लेखन में सहयोग रहा है, अतः उनका मैं कृतज्ञ हूँ। अन्य जिन आचार्यों की कृतियों से मुझे सहयोग प्राप्त हुआ है उन सभी का मैं आभारी हूँ । इस ग्रन्थ के लेखन एवं सम्पादन में श्रीमती कुसुमलता गोस्वामी का धैर्य एवं सहयोग अविस्मरणीय है । तारा प्रकाशन के अधिकारी उत्साहसम्पन्न विद्याप्रेमी श्री रमाशङ्कर पाण्ड्या एवं उदीयमान विद्याप्रेमी रविशङ्कर पाण्ड्या के उत्साह एवं कार्य दक्षता की प्रशंसा के साथ उन्हें ईश्वर इनके कार्यों में अतिशय साफल्य प्रदान करे इस आशा के साथ मैं प्रथम भाग को विद्वज्जनों के सम्मुख उपस्थापित कर रहा हूँ। यदि पाण्ड्या जी की प्रेरणा से बाध्य न होता तो इस जटिलतम कार्य का भार वाहन नहीं करता । पद्मविभूषण पट्टाभिराम शास्त्री जी ने अपनी प्रस्तावना के द्वारा इस ग्रन्थ में वैशिष्ट्याधान किया है। अतः मैं उनकी कृतज्ञता वहन करता हूँ । —महाप्रभुलाल गोस्वामी ।
मीमांसादर्शन-विषय-सूची
विषयाः पृष्ठ-संख्या अर्थवाद-प्रामाण्ये पूर्वपक्षः ३-१८ शा० भा० ३-४, भा० वि० ४-७, त० वा० ७-९, न्या० सु० ९-१४, भा० प्र० १४-१८। अप्रामाण्ये शास्त्रदृष्ट-विरोध-प्रदर्शनम् १८-२९ शा० भा० १८-१९, भा० वि० १९-२०, त० वा० २०-२२, न्या० सु० २२-२९, भा० प्र० २९। फलाभावहेतुनाऽर्थवादस्याप्रामाण्यम् २९-३२ शा० भा० २९-३०, भा० वि० ३०, त० वा० ३०-३१, न्या० सु० ३१, भा० प्र० ३१-३२। अविध्यनर्थक्यादप्यप्रामाण्यम् ३२-३५ शा० भा०, ३२, भा० वि० ३२-३३, त० वा० ३३, न्या० सु० ३३-३४, भा० प्र० ३४-३५। अप्राप्तविषयनिषेधादप्यप्रामाण्यम् ३५-३७ शा० भा० ३५, भा० वि० ३५-३६, त० वा० ३६, न्या० सु० ३६-३७, भा० प्र० ३७। अनित्यत्वं विषयसंयोगादप्यप्रामाण्यम् ३७-४० शा० भा० ३७, भा० वि० ३८, त० वा० ३८, न्या० सु० ३८-४०, भा० प्र० ४०। विध्येकवाक्यत्वादर्थवादप्रामाण्यप्रदर्शनम् ४०-८३ शा० भा० ४०-४१, भा० वि० ४१-४६। केषाञ्चिन्मतप्रदर्शनम् तत्खण्डनं त० वा० ४१-४६ यत्तु मतोद्भावनं तत्खण्डनम् त० वा० ४६-५१ विध्युत्खातिपूर्वपक्षप्रदर्शनम् त० वा० ४७-४८ विध्युत्खातिपक्षनिरासः त० वा० ४८-५१
( ३० ) अर्थवादस्यार्थवत्त्वप्रदर्शनम् त० वा० ५३-५५ विध्येकवाक्यत्वादर्थवादप्रामाण्यप्रदर्शनम् न्या० सु० ५५-६० स्वमतेनार्थवादप्रामाण्यसमर्थनार्थं पूर्वपक्षः न्या० सु० ६०-६२ प्राभाकरसम्मतविध्यर्थनिरूपणम् न्या० सु० ६२ फलस्य प्रवर्त्तकत्वनिरासः न्या० सु० ६२-६४ स्वमतेन विध्यर्थनिरूपणम् न्या० सु० ६४-६५ अर्थवादस्य श्रेयःसाधनत्वाक्षेपस्तन्निरासश्च न्या० सु० ६५-७८ विध्युक्तख्यातिपक्षनिरासः न्या० सु० ७८-८० वार्त्तिककारमतव्याख्यानम् न्या० सु० ८०-८३ विध्येकवाक्यतयाऽर्थवादानामप्यर्थवत्त्वसमर्थनम् भा० प्र० ८३-८७ अर्थवादवाक्यानां प्रामाण्ये युक्त्यन्तरप्रदर्शनम् ८८-९२ शा० भा० ८८, भा० वि० ८८-८९, त० वा० ८९-९०, न्या० सु० ९०-९२, भा० प्र० ९२ । शास्त्रदृष्टविरोधार्थमुद्धृतश्रुतिपरिहारप्रदर्शनम् ९२-९५ शा० भा० ९२, भा० वि० ९२-९३, त० वा० ९३-९४, न्या० सु० ९४, भा० प्र० ९४-९५ । अर्थवादवाक्यानां प्रामाण्ये युक्त्यन्तरसमर्थनम् ९५-११० शा० भा० ९५ ९६, भा० वि० ९६-१०१, त० वा० १०१-१०२ । व्याख्यानत्रयप्रदर्शनं तन्निरासश्च त० वा० १०२-१०३ अर्थवादवाक्यानां प्रामाण्ये युक्त्यन्तरप्रदर्शनम् न्या० सु० १०३-१०६ व्याख्यात्रयप्रदर्शनम् तन्निरासः, स्वमतेन व्याख्यानम् न्या० सु० १०६-१०८ अर्थवादक्यानां प्रामाण्ये युक्त्यन्तरप्रदर्शनम् भा० प्र० १०८-११० । शास्त्रदृष्टविरोधोद्धृतश्रुतिविरोधपरिहारे युक्त्यन्तरप्रदर्शनम् ११०-११२ शा० भा० ११०, भा० वि० ११०, त० वा० १११, न्या० सु० १११, भा० प्र० १११-११२ । दृष्टविरोधोद्धृतश्रुतिविरोधपरिहारप्रदर्शनम् ११२-११५ शा० भा० ११२-११३, भा० वि० ११३, त० वा० ११३, न्या० सु० ११३-११४, भा० प्र० ११४-११५ ।
( ३१ ) दृष्टविरोधोद्धृतश्रुतिविरोधपरिहारः ११५-११८ शा० भा० ११५, भा० वि० ११५, त० वा० ११५, न्या० सु० ११६, भा० प्र० ११६-११८ । ब्राह्मणत्वादिजातेः जन्मनिमित्तकत्वं न गुणकर्मनिमित्तकत्वम् ११७ शास्त्रदृष्टविरोधोद्धृतश्रुतिविरोधपरिहारः ११८-१२० शा० भा० ११८, भा० वि० ११८-११९, त० वा० ११९, न्या० सु० ११९-१२०, ब्राह्मणत्वादिजातेर्जन्मनिमित्तकत्वम् भा० प्र० १२० । अर्थवादफलाभावार्थमुद्धृतशोभतेऽस्यमुखमितिश्रुतिवाक्यविरोधपहारः १२०-१२२ शा० भा० १२०-१२१, भा० वि० १२१, त० वा० १२१, न्या० सु० १२२, भा० प्र० १२२ । अन्यश्रुत्यानर्थक्यपरिहारः १२३-१२४ शा० भा० १२३, भा० वि० १२३, त० वा० १२३, न्या सु० १२३-१२४, भा० प्र० १२४ । परिणामतः सारतश्च फलविशेषसमर्थनम् १२४-१२७ शा० भा० १२४, भा० वि० १२५, त० वा० १२५-१२६, न्या० सु० १२६, भा० प्र० १२६-१२७ । अभागिप्रतिषेधपरिहारप्रदर्शनम् १२७-१२९ शा० भा० १२७, भा० वि० १२७-१२८, त० वा० १२८, न्या० सु० १२८-१२९, भा० प्र० १२९ । औदुम्बराधिकरणम् कथञ्चिदर्थवादश्रुतीनां विधिरूपेण प्रतीतानामर्थवादत्वव्यवस्थापनम् १२९-१४१ शा० भा० १२९, भा० वि० ११९-१३०, त० वा० १३०-१३१ केचिन्मतोत्थापनं तत्समाधानञ्च त० वा० १३१ अपरे तु इत्यनेन पक्षान्तोत्थापनं तत्समाधानञ्च त० वा० १३१ केचिन्मतस्य पुनरुत्थापनं तत्समाधानञ्च त० वा० १३१ उदाहरणान्तरप्रदर्शनेन स्वमतोत्थापनम् त० वा० १३१ तन्त्रवार्तिककारमतम् त० वा० १३१
( ५२ ) अथ वेत्यनेन व्याख्यान्तराणामुदाहरणम् त० वा० १३२ अपराचार्यमतोत्थापनम् त० वा० १३२ कासाञ्चिदर्थवादश्रुतीनां विधिरूपेण प्रतीतानामर्थवादत्वव्यवस्थापनम् न्या० सु० १३४ वार्तिकमतेन पौनरुक्त्यपरिहारः न्या० सु० १३५ यद्वेत्यनेनाक्षेपस्तत्परिहारश्च न्या० सु० १४० विधिरूपेण प्रतीतानामर्थवादश्रुतीनामर्थवादरूपत्वेन प्रामाण्यव्य स्थापनम् न्या० सु० १४०-१४१ पूर्वोक्तपूर्वपक्षे युक्तिप्रदर्शनम् १४१ शा० भा० १४१, भा० वि० १४१-१४२, त० वा० १४२, न्या० सु० १४२, भा० प्र० १४२ । प्रदर्शितपूर्वपक्षयुक्तिखण्डनम् १४२-१४५ शा० भा० १४२, भा० वि० १४३, त० वा० १४३-१४४, न्या० सु० १४४, भा० प्र० १४४-१४५ । विध्येकवाक्यत्वात् विधेयविषयप्रशंसयाऽर्थवादवाक्यसार्थकयप्रदर्शनम् १४५-१५० शा० भा० १४५, भा० वि० १४५-१४६, त० वा० १४६-१४७ । यत्तु इत्यनेन पक्षान्तरोत्थापनम् त० वा० १४७ विध्येकवाक्यत्वात् विधेयविषयप्रशंसाऽर्थवादवाक्यसार्थवयप्रदर्शनम् न्या० सु० १४७, भा० प्र० १५० अर्थवादस्य विधित्वाभावे युक्त्यन्तरप्रदर्शनम् १५१-१५४ शा० भा० १५१, भा० वि० १५१, त० वा १५२, न्या० सु० १५२-१५३, भा० प्र० १५३-१५४ । अर्थवादवाक्यस्य विधित्वाभावे युक्त्यन्तरप्रदर्शनम् १५१-१५४ शा० भा० १५१, भा० वि० १५१, त० वा० १५२, न्या० सु० १५२-१५३, भा० प्र० १५३-१५४ । अर्थवादवाक्यस्य विधित्वाभावे युक्त्यन्तरप्रदर्शनम् १५४-१५७ शा० भा० १५४-१५५, भा० वि० १५५, त० वा० १५५, न्या० सुं० १५६, भा० प्र० १५६-१५७ ।
( ३३ ) स्तुत्यर्थकार्थवादवाक्यानां स्वतन्त्रविधित्वे १५७-१५८ वाक्यभेदे दोषापत्तिप्रदर्शनमधिकरणोपसंहारश्च । शा० भा० १५७ भा० वि० १५०, त० वा० १५७, न्या० सु० १५७-१५८, भा० प्र० १५८ । वाक्यभेदस्वरूपनिरूपणम् भा० प्र० १५८-१५९ इति द्वितीयमौदुम्बराधिकरणम् अथ तृतीयं हेतुवन्निगदाधिकरणम् हेतुसदृशकथितवाक्यानामर्थवादत्वस्थापनार्थं पूर्वपक्षस्तत्समाधानञ्च । १५९-१६७ शा० भा० १५९, भा० वि० १५९-१६० विभिन्नाभिप्रायप्रदर्शनपूर्वकं पूर्वोक्तविषयविवेचनम्, त० वा० १६०-१६१, न्या० सु० १६१-१६६, भा० प्र० १६६-१६७ । पूर्वोक्तश्रुतीनां युक्त्या समर्थनम् १६७-१७१ शा० भा० १६७, भा० वि० १६७-१६९, त० वा० १६९, न्या० सु० १६९-१७०, भा० प्र० १६०-१७१, शा० भा० १७१, भा० वि० १७१, त० वा० १७१, न्या० सु० १७१, भा० प्र० १७१ । शूर्पश्रुतेरन्नसाधनत्वाभावे स्तुतित्वमनुचितमितिपूर्वपक्षस्तन्निरासश्च १७१-१७५ शा० भा० १७१-१७२, भा० वि० १७२, त० वा० १७३, न्या० सु० १७४-१७५, भा० प्र० '७५ । निगदाधिकरणसिद्धान्तप्रदर्शनम् १७५-१७९ शा० भा० १७५, भा० वि० १७६, त० वा० १७७, न्या० सु० १७७-१७८, भा० प्र० १७८-१७९ । इति निगदाधिकरणम्
( ३४ ) अथ मन्त्राधिकरणम् मन्त्रार्थानामविवक्षितार्थमितिपूर्वपक्षः १७९-२०४ शा० भा० १७९-१८१, भा० वि० १८२-१८७, त० वा० १८७-१९१, न्या० सु० १९१-१९९, भा० प्र० १९९-२०४। अदृष्टार्थत्वसमर्थनेन प्रतीयमानार्थविवक्षितत्वसिद्धिः २०४-२०९ शा० भा० २०४, भा० वि० २०४-२०६, त० वा०२०६, न्या० सु० २०६-२०८, भा० प्र० २०८-२०९। मन्त्रानर्थकत्वपूर्वपक्षनिरासः २०९-२१० शा० भा० २०९, भा० वि २०९, त० वा० २०९-२१०, भा० वि० २०९ । न्या० सु० २१०, भा० प्र० २१०। आनर्थक्यनिवारणे परिसंख्याप्रदर्शनम् २१०-२१७ शा० भा० २१०-२११, भा० वि २११ अपूर्वनियमपरिसंख्याविधीनां निरूपणम् त० वा० २११-२१२, त० वा० २१२-२१३, न्या० सु० २१३-२१५, भा० प्र० २१५- २१६। अर्थवादपरतया मन्त्राणां विवक्षितार्थत्वसमर्थनम् २१७-२२१ शा० भा० २१६, भा० वि० २१६-२१८, त० वा० २१८-२२०, न्या० सु० २२०-२२१, भा० प्र० २२१। मन्त्राणां विवक्षितार्थत्वे उद्भावितदोषनिरासः २२२-२२३ शा० भा० २२२, भा० वि० २२२, त० वा० २२२, न्या० सु० २२२, भा० प्र० २२२-२२३। बुद्धशास्त्रोद्भावितविवक्षितार्थपक्षदोषनिरासः २२३-२२४ शा० भा० २२३, भा० वि० २२३, त० वा० २२३, न्या० सु० २२३-२२४, भा० प्र० २२४। अविद्यमानवचनादितिदोषनिरासः २२४-२२८ शा० भा० २२४, भा० वि० २२४-२२५, त० वा० २२५, न्या० सु० २२६, भा० प्र० २२६-२२८।
( ३५ ) गौणप्रयोगान्मन्त्रार्थविरोधसमाधानम् २२८-२३१ शा० भा० २२८, भा० वि० २२८, त० वा० २२९, न्या० सु० २२९, भा० प्र० २२९-२३१ । मन्त्राणां दुर्विज्ञेयत्वेनाविवक्षितार्थत्वनिरासः २३१-२३६ शा० भा० २३१, भा० वि० २३१-२३२, त० वा० २३२-२३४, न्या० सु० २३४-२३५, भा० प्र० २३५-२३६ । अनित्यसंयोगादिति सूत्रोत्थापितपूर्वपक्षनिरासः २३६-२३८ शा० भा० २३६, भा० वि० २३६-२३७, त० वा० २३७, न्या० सु० २३७, भा० प्र० २३७-२३८ । मन्त्राणां विवक्षितार्थकत्वे युक्तिप्रदर्शनम् २३८-२३९ शा० भा० २३८, भा० वि० २३८, त० वा० २३८, न्या० सु० २३८, भा० प्र० २३८-२३९ । अविद्यमानवचनत्वादिति हेतुनोत्थापितापत्तीनामर्थवादपरतया समाधानम् २३९-२४१ शा० भा० २३९, भा० वि० २३९, त० वा० २३९, न्या० सु० २४०, भा० प्र० २४१ । मन्त्राणां विवक्षितार्थत्वसमर्थनम् २४१-२४२ शा० भा० २४१, भा० वि० २४१, त० वा० २४२, न्या० सु० २४२, भा० प्र० २४२ । इति मन्त्राधिकरणम् स्मृत्यधिकरणम् स्मृतेः आचारस्य च प्रामाण्ये पूर्वपक्षः २४३-२५७ शा० भा० २४३, भा० वि० २४३, ता० वा० २४३-२४८, न्या० सु० २४८-२५१, भा० प्र० २५१-२५७ । स्मृत्याचारसिद्धान्तपक्षव्यवस्था २५८-२८० शा० भा० २५९, भा० वि० २५९, त० वा० २६५ केषाञ्चिच्छङ्का तत्समाधानञ्च त० वा० २५९-२६५ अलौकिकविषयाणां वेदमूलकत्वम् त० वा० २६७