मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
| ४१० | मुद्राराक्षसम् |
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षड्गुण + ष्यञ् स्वार्थे चतुर्वर्णादित्वात् = षाड्गुण्यम् तद्धितार्थे समासः । अत्र 'क्वचित् स्वार्थिका प्रकृतिंतो लिङ्गवचनान्यतिवर्तन्ते' इति कारिकावचनात् नपुंसकत्वम् । छह गुण ये हैं—'संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव' । षाड्गुण्यस्य चिन्ता चिन्तनम् तस्याम् । जगत —अत्र शेषे षष्ठी । इसका सम्बन्ध 'किम्' से है । इस श्लोक मे तुल्ययोगितालंकार, समुच्चयालंकार, वाक्यार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार और अर्थापत्ति अलंकार की स्थिति परस्पर निरपेक्ष होने से संसृष्टि अलंकार है । इसमें भी अनुष्टुप् छन्द है ॥ १३ ॥
राक्षस —[ स्वगतम् ] स्पृशति मां भृत्यभावेन कौटिल्यशिष्यः । अथवा विनय एवैष चन्द्रगुप्तस्य । महत्परन्तु मे विस्मयो जनयति । सर्वथा स्थाने यशस्वी चाणक्यः । कुतः —
द्रव्यं जिगीषुमधिगम्य जडात्मनोऽपि नेतुर्यशस्विनि पदे नियता प्रतिष्ठा । अद्रव्यमेत्य भुवि शुद्धनयोऽपि मन्त्री शीर्णाश्रयः पतति कूलजवृक्षवृत्त्या ॥ १४ ॥
अन्वय — द्रव्यं जिगीषुम् अधिगम्य जडात्मनोऽपि नेतुः यशस्विनि पदे प्रतिष्ठा नियता ( भवति ) । अद्रव्यम् एत्य शुद्धनयः अपि मन्त्री शीर्णाश्रयः ( सन् ) कूलजवृक्षवृत्त्या भुवि पतति ॥ १४ ॥
व्याख्या — द्रव्यम् — पात्र योग्यमिति यावत् जिगीषूम् — जयोद्योगिनम् नृप-मिति शेषः, अधिगम्य — लब्ध्वा, जडात्मनोऽपि — मन्दबुद्धेरपि, नेतुः — नायकस्य मन्त्रिणः, यशस्विनि — कीर्तिविशिष्टे, पदे — स्थाने, प्रतिष्ठा — स्थितिः, नियता — निश्चिता, ( भवति ) । अद्रव्यम् — अपात्रम् अयोग्यमिति यावत्, एत्य — प्राप्य, शुद्धनयः अपि — विशुद्धनीतिशाल्यपि, मन्त्री — अमात्यः, शीर्णाश्रयः — उच्छिन्नावलम्बनः, ( सन् ) कूलजवृक्षवृत्त्या — कूलजस्य नदीतट-जातस्य वृक्षस्य पादपस्य वृत्त्या व्यवहारेण तीरजस्तरुरिवेदित्यर्थः भुवि — पृथिव्या, पतति — पतनं प्राप्नोति ॥ १४ ॥
हिन्दी अनुवाद — राक्षस —[ मन में ] चाणक्य का शिष्य मुझे सेवक भाव से छू रहा है (अर्थात् व्यवहार कर रहा है) अथवा यह चन्द्रगुप्त का
सप्तमोऽङ्कः ४११
विनय ही है। किन्तु डाह मुझे इसके उलटे दिखाती रही है। चाणक्य सब प्रकार से उचित (ही) यशस्वी है। क्योंकि—
योग्य विजयेच्छुक (राजा) को पाकर मंदबुद्धि मंत्री की भी स्थिति यशस्वी पद पर निश्चित रूप से होती है। किन्तु अयोग्य (राजा) को पाकर अनवद्यनीतिशाली मंत्री भी विनष्ट आश्रय वाला होता हुआ तटवर्ती वृक्ष के नियम से (अर्थात् किनारे के कटते किनारे खडे पेड की भाँति) धराशायी हो जाता है ॥ १४ ॥
टिप्पणी—स्पृशति माम्—राक्षस सोचता है कि अभी न तो मैंने इसका अमात्यपद स्वीकार किया है और न इसने मुझे इसके लिए आमन्त्रित ही किया है। तो भी यह मुझे अपना सेवक समझ रहा है। अथवा विनय एवैष चन्द्रगुप्तस्य—फिर राक्षस सोचता है कि नहीं, यह इसकी विनयशीलता ही है। मैं डाह के कारण इसको गलत समझ रहा था। स्थाने—युक्त, ठीक ही। द्रव्यम्—भव्य, योग्य। द्रवति ऊर्ध्वं गच्छति इति √द्रु (गतौ) + डु कर्तरि = द्रुः = वृक्षः। द्रुरिव इति द्रु + यत् इवार्थे = द्रव्यम्। यह 'जिगीषुम्' का विशेषण है, जिसका संकेत 'चन्द्रगुप्त' से है। अधिगम्य—यहाँ शंका हो सकती है कि 'अधिगम्य' और 'भवति' दोनों क्रियाओं के भिन्न-भिन्न कर्ता होने से क्त्वा प्रत्यय नहीं होना चाहिए, किन्तु 'जिगीषुमधिगम्य स्थितस्य नेतुः प्रतिष्ठा भवति' ऐसी विवक्षा करने से क्त्वा प्रत्यय हो सकता है। नेतुः प्रतिष्ठा नियता—इसका संकेत चाणक्य से है। अद्रव्यम्—इसका संकेत मलयकेतु से है। शुद्धनयः—शुद्धः अनवद्यः नयः नीतिप्रयोगः यस्य तादृशः। इसका संकेत स्वयं (राक्षस) से है। शीर्णाश्रयः—आश्रीयते इति आ√श्रि + अच् कर्मणि = आश्रयः = अवलम्बः। शीर्णः उत्खातः आश्रयः यस्य तादृशः। पतति—वृक्षपक्षे भुवि = पृथिव्यां पतति। मन्त्रिपक्षे भुवि = जगति लोकसमाजे पतति = न्यग्भवति। इस श्लोक में अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार, तन्मूलक अर्थान्तरन्यास अलंकार, अर्थापत्ति अलंकार और निदर्शनालंकार का सांकर्य है। इसमें वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥ १४ ॥
चाणक्यः—अमात्य राक्षस ! अपीष्यते चन्दनदासस्य जीवितम् ?
राक्षसः—भो विष्णुगुप्त ! कुतः सन्देहः ?
४१२ मुद्राराक्षसम्
चाणक्य —अमात्य राक्षस ! अगृहीतशस्त्रेण भवताऽनुगृह्यत वृषल इत्यत सन्देह । तद्यदि सत्यमेव चन्दनदासस्य जीवितमिष्यते, ततो गृह्यतामिदं शस्त्रम् ।
राक्षस —भो विष्णुगुप्त ! मा मैवम् । अयोग्या वयमेतस्य ग्रहणे, विशेषतस्त्वया गृहीतस्य शस्त्रस्य ।
चाणक्य —अमात्यराक्षस ! योग्योऽहमयोग्यो भवान् इति कथमेतत् ? पश्य—
अश्वैः सार्द्धमजस्रदत्तकविकाक्षामैरशून्यासनैः स्नानाहारविहारपानशयनस्वेच्छासुखैर्वर्जितान् । माहात्म्यादतिपौरुषस्य भवतो दृप्तारिदर्पच्छिद पश्यैतान् परिकल्पनाव्यतिकरप्रोच्छूनवशान् गजान् ॥१५॥
अन्वय —दृप्तारिदर्पच्छिद अतिपौरुषस्य भवतः माहात्म्यात् अशून्यासनैः अजस्रदत्तकविकाक्षामैः अश्वैः सार्द्धम् स्नानाहारविहारपानशयनस्वेच्छासुखैः वर्जितान् परिकल्पनाव्यतिकरप्रोच्छूनवशान् एतान् गजान् पश्य ॥१५॥
व्याख्या—दृप्तारिदर्पच्छिद—दृप्तानाम् गर्वितानाम् अरीणाम् शत्रूणाम् दर्पच्छिद गर्वहारिण , अतिपौरुषस्य—अतिशयपराक्रमशालिनः, भवत —तव, माहात्म्यात्—प्रभावात्, अशून्यासने —अशून्यानि अनपनीतानि आसनानि पल्याणांनि येषां तादृशैः, अजस्रदत्तकविकाक्षामै —अजस्रम् अनवरतम् दत्ता मुखे अर्पिता कविका खलीन येषा ते तथाविधे अतएव क्षामैः कृशैः, अश्वैः—घोटकैः, सार्द्धम्—सह, स्नानाहारविहारपानशयनस्वेच्छासुखै —स्नानं च निमज्जनं च आहारश्च भोजनं च विहारश्च भ्रमणं च पानं च तृषावारणं च शयनं च स्वापश्च तानि स्वेच्छासुखानि यथेच्छाव्यापारास्तैः, वर्जितान्—रहितान, परिकल्पनाव्यतिकरप्रोच्छूनवशान्—परिकल्पनायाः पल्याणास्य व्यतिकरात् नित्यसम्पर्कात् प्रोच्छूनाः जातशोफाः वशाः पृष्ठास्थीनि येषां तादृशान्, एतान्—अमून, गजान्—हस्तिनः, पश्य—अवलोकय ॥१५॥
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—अमात्य राक्षस ! क्या ( आप ) चन्दनदास का जीवन चाहते हैं ?
सप्तमोऽङ्कः | ४१९
राक्षस—हे चाणक्य ! ( इसमें ) सन्देह क्यों ?
चाणक्य—अमात्य राक्षस ! बिना शस्त्र धारण किये आप चन्द्रगुप्त पर अनुग्रह कर रहे हैं, इसलिये सन्देह है। अतः यदि सचमुच ही चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो यह शस्त्र धारण कीजिए।
राक्षस—हे चाणक्य ! नही, ऐसा नही। इसके ग्रहण करने में हम अयोग्य हैं, विशेष करके आपके द्वारा ग्रहण किये हुए शस्त्र के (ग्रहण करने में)।
चाणक्य—अमात्य राक्षस ! मैं योग्य हूँ और आप अयोग्य हैं, यह कैसे ? देखिए—
मर्दीले शत्रु के गर्व को चूर करने वाले तथा अत्यन्त पराक्रमी आपके प्रभाव से पलान से रहित न होने वाले और निरन्तर लगाम के धारण करने से क्षीण घोड़ों के साथ नहाने, खाने, घूमने, पीने और सोने के यथेच्छ उपभोगों से वंचित तथा हौदे के सदा कसे रहने से सूजे हुए पृष्ठ भाग वाले इन हाथियों को देखिए ॥१५॥
टिप्पणी—अपि—यहाँ प्रश्नवाचक अव्यय है। अगृहीतशस्त्रेण—अगदत्तायुधेन। यह शस्त्र अमात्य-पद का प्रतीक है। अजस्र—न जस्यति मुञ्चतीति अजस्रम् नञ् √ जस् + र कर्तरि। अजस्रं दत्ता इति अजस्रदत्ता सुप्सुपा स०। स्नानाहारविहारपानशयन—इसमें द्वन्द्व समास है। परिकल्पना—हौदा। व्यतिकर—नित्य सम्पर्क या संलग्नता। वि—अति √ कृ + घ करणे वा अप् भावे = व्यतिकरः। प्रोच्छून—सूजी हुई ( पीठ की हड्डी )। प्र—उद् √ श्वि + क्त कर्तरि। इस श्लोक में तुल्ययोगिता अलंकार है और शार्दूल-विक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥१५॥
अथवा किमनेन न खलु भवतः शस्त्रग्रहणमन्तरेण चन्दनदासस्य जीवितमस्ति।
राक्षसः—[ स्वगतम् ]
नन्दस्नेहकणाः स्पृशन्ति हृदयं भृत्योऽस्मि तद्विद्विषां ये सिक्ताः स्वयमेव पाणिपयसा च्छेद्यास्त एव द्रुमाः ? ।
४१८ मुद्राराक्षसम्
चाणक्य— हे राजन् चन्द्रगुप्त ! फिर तुम्हारा क्या प्रिय उपकार करूँ ?
राजा— इससे बढकर क्या प्रिय है ?
राक्षस के साथ मित्रता ( करवा दी ), हमे राज्य में प्रतिष्ठित कर दिया और सभी नन्दो का विनाश कर दिया । इससे अधिक क्या ( प्रिय ) करना है ? ॥१७॥
टिप्पणी—प्रतिमानयितव्य— सम्माननीय, स्वीकर्तव्य इत्यर्थः । प्रति√मन् + णिच् वा √मान् ( चुरादि ) + तव्य कर्मणि । प्रणय— प्रार्थना । प्रणीयते अनेन इति प्र√नी + अच् करणे । पित्र्यम्— पितुरागत इति पितृ + यत् = पित्र्यः, तम् । यह 'विषयम्' का विशेषण है । विषयम्— देश, राज्य को । भो राजन् चन्द्रगुप्त— यही चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को राजा कहकर सम्बोधित किया है, नही तो इसके पूर्व सभी जगह 'वृषल' ही कहा है । इसका कारण यह है कि राक्षस के अमात्य बन जाने से चन्द्रगुप्त का राज्य स्थिर हो गया है, इसलिए अब यह वस्तुत राजा है । इससे पूर्व तो इसका राजपद डावाडोल था । इसी कारण चाणक्य ने राजा नहीं कहा । श्लोक १७ में सम नामक अलकार है और अनुष्टुप् छन्द है । अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिए ॥१७॥
चाणक्य— विजये ! उच्यता दुगं rush/दुर्गपालो विजयपालश्च, अमात्यराक्षसपरिग्रहेण प्रीतो देवश्चन्द्रगुप्त समाज्ञापयति—विना हस्त्यश्व क्रियता सर्वबन्धनमोक्ष इति । अथवा अमात्यराक्षसे नेतरि किं हस्त्यश्वेन प्रयोजनम् ? तदिदानीम्—
सह वाहनहस्तिभ्या मुच्यता सर्वबन्धनम् ।
मया पूर्णप्रतिज्ञेन केवल बध्यते शिखा ॥१८॥
[ इति शिखा बध्नाति ]
प्रतीहारी— ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )
[ इति निष्क्रान्ता । ]
अन्वय— वाहनहस्तिभ्यां सह सर्वबन्धनम् मुच्यताम् । पूर्णप्रतिज्ञेन मया केवलं शिखा बध्यते ॥१८॥
सप्तमोऽङ्कः ४१६
व्याख्या—वाहनहस्तिभ्यां—अश्वगजाभ्यां, सह—साकं, सर्वबन्धनम्—सर्वेषां समेषां बन्धनं संयमनं, मुच्यताम्—अपनीयताम्। पूर्णप्रतिज्ञेन—पूर्णा सफला प्रतिज्ञा प्रतिश्रुतिः यस्य तथाविधेन, मया—चाणक्येन, केवलं—मात्रं, शिखा—चूडा, बध्यते—संयम्यते ॥१८॥
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—विजये ! दुर्गपाल और विजयपाल कहो कि अमात्य राक्षस के मिल जाने से प्रसन्न महाराज चन्द्रगुप्त आज्ञा देते हैं कि हाथियों और घोड़ो को छोड़कर सब के बन्धन खोल दिये जायं। अथवा अमात्य राक्षस के मंत्री होने पर हाथी-घोड़े का क्या काम ? इसलिए अब—
हाथियों और घोड़ों के साथ सब का बन्धन खोल दिया जाय। पूर्ण प्रतिज्ञा वाला मैं केवल शिखा बांधता हूँ ॥१८॥
[ शिखा बाँधता है। ]
प्रतिहारी—जो आर्य की आज्ञा।
[ बाहर चली जाती है। ]
टिप्पणी—हस्त्यश्वम्—हस्तिनश्च अश्वाश्च इति हस्त्यश्वम् द्वन्द्वसमासे कृते 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इति सूत्रेण एकवद्भावः। प्रयोजनम्—प्रयोज्यते अनेन इति प्र√युज्+णिच्+ल्युट् करणे = प्रयोजनम्। वाहन—उह्यते अनेन इति √वह्+ल्युट् करणे, निपातनात् वृद्धिः = वाहनम् = अश्वः। पूर्णप्रतिज्ञेन—जिसकी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी है। नन्दवंशोन्मूलन के बाद चाणक्य की प्रतिज्ञा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त से मिलाकर मौर्य की लक्ष्मी को स्थिर करना। वह अब पूरी हो चुकी है। इसलिए वह अपने को पूर्णप्रतिज्ञ कहता है और शिखा भी बांध लेता है। इस श्लोक में एक ही शिखा में विरूप बन्धन और मोचन की संघटना होने से विषमालंकार है। इसमें भी अनुष्टुप् छन्द है ॥१८॥
चाणक्यः—अमात्यराक्षस ! तदुच्यतां, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ?
राक्षसः—किमतः परमपि प्रियमस्ति ? यदि न परितोषस्तदिदमस्तु—
[ भरत-वाक्यम् ]
वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिं प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री।
४२० सप्तमोऽङ्कः
म्लेच्छैरुद्वेज्यमाना भुजयुगमधुना संश्रिता राजमूर्ते स श्रीमद्वन्धुभृत्यश्चिरमवतु मही पार्थिवश्चन्द्रगुप्त ॥ १९ ॥
[ इति निष्क्रान्ता सर्वे । ]
॥ इति मुद्राराक्षसे सप्तमोऽङ्कः ॥
अन्वयः—प्रलयपरिगता भूतधात्री प्राक् अतनुबलाम् अनुरुपा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य यस्य आत्मयोनेः दन्तकोटिं शिश्रिये, अधुना म्लेच्छै उद्वेज्यमना (सती) राजमूर्ते (यस्य) भुजयुगम् संश्रिता स श्रीमद्वन्धुभृत्यः पार्थिवः चन्द्रगुप्तः महीं चिरम् अवतु ॥१९॥
व्याख्या—प्रलयपरिगता—प्रलयेन कल्पक्षयेण परिगता अभिभूता, भूतधात्री—पृथिवी, प्राक्—पूर्वम् कल्पादौ इति यावत्, अतनुबलाम्—प्रचुरबलवतीम्, अनुरूपा—योग्या, वाराहीं—शौकरी, तनु—शरीरम्, आस्थितस्य—अधितिष्ठतः, यस्य, आत्मयोने—स्वयम्भुवः श्रीविष्णो, दन्तकोटिं—दशनाग्र, शिश्रिये—आश्रिता, अधुना—सम्प्रति, म्लेच्छै—यवने, उद्वेज्यमाना—पीड्यमाना, (सती) राजमूर्ते—पार्थिवदेहस्य (यस्य आत्मयोनेः), भुजयुगम्—बाहुयुगलम्, संश्रिता—समवलम्बिता, स, श्रीमद्वन्धुभृत्य—श्रीमन्तः समृद्धा बान्धवाः स्वजना भृत्या सेवकाश्च यस्य तादृश, पार्थिव—राजा, चन्द्रगुप्त—मौर्य, महीं—पृथिवीम् चिरम्—दीर्घकाल यावत्, अवतु—रक्षतु ॥१९॥
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—अमात्य राक्षस ! तो कहिये, और क्या आपका प्रिय उपकार करूं ?
राक्षस—क्या इससे बढकर भी कोई प्रिय है ? यदि सन्तोष न होतो यह रहे—
[ भरत-वाक्य ]
प्रलय से व्याप्त (होती हुई) पृथिवी ने पहले (कल्प के आरम्भ में) प्रचुरबलशाली तथा (रक्षा करने में) समर्थ शूकर-शरीर को धारण किये हुए जिस स्वयम्भू विष्णु के दांतों के अग्रभाग का अवलम्ब किया था और इस समय म्लेच्छों से पीडित होती हुई (उसने जिस) राजमूर्ति (अर्थात् राजा का शरीर
सप्तमोऽङ्कः
४२१
धारण किये हुए विष्णु ) की दोनों भुजाओं का आश्रय लिया है, वह श्री-सम्पन्न बन्धुओं एवम् अनुचरों वाला राजा चन्द्रगुप्त चिरकाल तक पृथिवी की रक्षा करे ॥१६॥
[ सभी ( पात्र रंगमंच से ) चले जाते हैं । ]
॥ मुद्राराक्षस ( नामक नाटक ) में सातवाँ अंक समाप्त ॥
टिप्पणी—भरतवाक्यम्—नाटक के अन्त में आशीर्वाद रूप में गाया जाने वाला पद्य । भूतधात्री—भूतानां प्राणिनां धात्री जननी = पृथिवी । वाराहीम्—वराहः शूकरः तस्य इयम् इति वराह + अण् + ङीप् = वाराही, ताम् । आत्मयोनेः—आत्मा स्वयमेव योनिः कारणमस्य इति आत्मयोनिः, तस्य । शिश्रिये—√श्रिधातुः उभयपदी । अत्र कर्त्रभिप्राये क्रियाफले आत्मनेपदम् । उद्वेज्यमाना—उद् √विज् + णिच् + शानच् कर्मणि । कई पुस्तकों में 'उद्विज्यमाना' पाठ है । वह अशुद्ध है; कारण विज् धातु अकर्मक है । उससे कर्म में शानच् कैसे हो सकता है ? अतएव णिजन्त से कर्म में शानच् करना चाहिए । राजमूर्तेः—पुरा वाराहीं तनुम् आस्थितस्य अधुना राजमूर्तेः । संश्रिता—सम् √श्रि + क्त कर्तरि वर्तमाने । 'ग्रन्थादौ ग्रन्थमध्ये ग्रन्थान्ते च मङ्गलमाचरेत्' इस शिष्टाचार के अनुसार इस ग्रन्थ के आदि में 'धन्या केयम्' श्लोक से, मध्य में 'आकाशं काशपुष्पम्' श्लोक से और अन्त में 'वाराहीम्' इस प्रकृत श्लोक से कवि ने मंगलाचरण किया है ॥१६॥
एषा मदीया सरला सुबोधा व्याख्या प्रिया मन्दधियामपि स्यात् ।
विभाव्य पूर्णेयमिति श्रमेण प्रीत्यै कृता प्रीतिमतोः स्वपित्रोः ॥ १ ॥
गृहीता पूर्वटीकाभ्यो बह्वीभ्यो हि सहायता ।
तासां कृतज्ञताञ्जलिं निर्मातॄणां करोम्यहम् ॥२॥
* श्रीसाम्बसदाशिवार्पणम् *