प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप ९९ ५५-इस प्रेमको पाकर प्रेमी इस प्रेमको ही देखता है, प्रेमको ही सुनता है, प्रेमका ही वर्णन करता है और प्रेमका ही चिन्तन करता है। परम प्रेमके दिव्य रसमें डूबा हुआ प्रेमानन्दमय प्रेमी सर्वत्र अपने प्रेममय, रसमय प्रियतमको ही देखता है। उसे कहीं दूसरी वस्तु दीखती ही नहीं। ऐसी ही स्थितिमें एक गोपी कहती है— जित देखौं तित स्याममई है। स्याम कुंज बन जमुना स्यामा, स्याम गगन घनघटा छई है॥ सब रंगनमें स्याम भरो है, लोग कहत यह बात नई है। मैं बौरी, की लोगन ही की स्याम पुतरिया बदल गई है॥ चंद्रसार रबिसार स्याम है, मृगमद स्याम काम बिजई है। नीलकंठको कंठ स्याम है, मनो स्यामता बेल बई है॥ श्रुतिको अच्छर स्याम देखियत, दीपसिखापर स्यामतई है। नर देवनकी कौन कथा है, अलख ब्रह्म छबि स्याममई है॥ दूसरा भक्त कहता है— बाटनमें घाटनमें बीथिनमें बागनमें, बृच्छनमें बेलिनमें बाटिकामें बनमें। दरनमें दीवारनमें देहरी दरीचनमें, हीरनमें हारनमें भूषनमें तनमें॥ काननमें कुंजनमें गोपिनमें गायनमें, गोकुलमें गोधनमें दामिनमें घनमें। जहाँ-जहाँ देखौं तहाँ स्याम ही दिखाई देत, सालिग्राम छाइ रह्यो नैननमें मनमें॥ कहि न जाय मुखसों कछू स्याम-प्रेमकी बात। नभ जल थल चर अचर सब स्यामहि स्याम दिखात ॥
१०० प्रेम-दर्शन ब्रह्म नहीं, माया नहीं, नहीं जीव, नहिं काल। अपनीहू सुधि ना रही, रह्यौ एक नँदलाल॥ को कासों केहि बिधि कहा, कहै हृदैकी बात। हरि हेरत हिय हरि गयो हरि सर्वत्र लखात॥ ऐसी अवस्थामें उसके कानमें जो कुछ भी आवाज आती है, वह केवल प्रेममयके प्रेमसंगीतकी स्वरलहरी ही होती है; वह सर्वदा उसकी मुरलीकी मीठी तानमें मस्त रहता है। इसी प्रकार उसके मुखसे भी प्रेममयको छोड़कर दूसरा शब्द नहीं निकलता। वह प्रेममयका गुण गाते-गाते कभी थकता ही नहीं, बात-बातमें उसे केवल दिव्य प्रेमरसामृतका ही अनुपम स्वाद मिलता रहता है और वह अतृप्त रसनासे सदा उसी अमृतरसपानमें मत्त रहता है। उसके चित्तमें तो दूसरेके लिये स्थान ही नहीं रह गया। वहाँ एकमात्र प्रियतमका ही अखण्ड साम्राज्य और पूर्ण अधिकार है। ऐसा जरा-सा भी स्थान नहीं, जहाँ किसी दूसरेकी कल्पनाकी स्मृति छायारूपसे भी आ सके। चित्त साक्षात् प्रियतमके प्रेमका स्वरूप ही बन जाता है; इस अवस्थाका अनुमान करते हुए कवि कहता है— कानन दूसरो नाम सुनै, नहिं एकहि रंग रँगो यह डोरो। धोखेहुँ दूसरो नाम कढ़ै, रसना मुख बाँधि हलाहल बोरो॥ ठाकुर चित्तकी वृत्ति यहै, हम कैसेहुँ टेक तजैं नहिं भोरो। बावरी वे अँखियाँ जरि जायँ जो साँवरो छाँड़ि निहारति गोरो॥ समस्त अंग केवल उसीका अनुभव कर रहे हैं। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उसीको विषय करती हैं। आँखें अहर्निश सम्पूर्ण विश्वको श्याममय देखती हैं। कान सदा उसीकी मधुरातिमधुर शब्द-ब्रह्ममयी वेणुध्वनि सुनते हैं। नासिका नित्य-निरन्तर
प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप १०१ उसी नटवरके अंगसौरभको ही सूंघती है। जिह्वा अविच्छिन्नरूपसे उसी प्रेसुधाका आस्वादन करती है और शरीर सर्वदा उसी अखिल सौन्दर्यमाधुर्य-रसाम्बुधि रसराज परम सुखस्पर्श आनन्दकन्द श्रीनन्दनन्दनके अनुपम स्पर्श-सुखका अनुभव करता है। आकाशमें वही शब्द है, वायुमें वही स्पर्श है, अग्निमें वही ज्योति है, जलमें वही रस है और पृथ्वीमें वही गन्ध बना हुआ है। सबमें वही भरा है। सबमें वही अनोखी रूपमाधुरीकी झाँकी दिखा रहा है। सर्वत्र प्रेम-ही-प्रेम, आनन्द-ही-आनन्द है। समस्त विश्व प्रेममय, आनन्दमय, रसमय या श्रीकृष्णमय है। सब कुछ आनन्दसे और सौन्दर्य-माधुर्यसे भरा है। दृश्य, द्रष्टा सभी मधुर हैं; हम-तुम सभी मधुर हैं; उस परमानन्द- रस-सुधामय मधुराधिपतिक सब कुछ मधुर है। 'मधु वाता ऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः, माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः, मधुमत् पार्थिवं रजः' सर्वत्र मधु-ही-मधु। इस प्रकार प्रेमी भक्तकी दृष्टिमें सर्वत्र प्रेममय भगवान् हैं और भगवान्की दृष्टिमें भक्त। भगवान्ने कहा ही है— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ (गीता ६।३०) 'जो मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, न कभी मैं उसकी आँखोंसे ओझल होता हूँ और न वह मेरी आँखोंसे ओझल होता है।' इस अवस्थामें प्रेमी भक्त जिस नित्य महान् दिव्य प्रेमामृत- रससागरमें मग्न रहता है, वह सर्वथा अनिर्वचनीय है। यही प्रेमाभक्ति या पराभक्तिका स्वरूप है। यही महान् भूमानन्द है,
१०२ प्रेम-दर्शन इसी सर्वव्यापी भूमानन्दके साथ अल्प सुखका तारतम्य दिखलाती हुई श्रुति कहती है— यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्, यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। (छान्दोग्योपनिषद् ७।२४।१) 'जहाँ दूसरेको नहीं देखता, दूसरेको नहीं सुनता, दूसरेको नहीं जानता वही भूमा है और जहाँ दूसरेको देखता है, दूसरेको सुनता है, दूसरेको जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वह अमृत है और जो अल्प है वह मरा हुआ है।' इसीलिये प्रेम सदा मधुर, अविनाशी, सनातन और सत्य है। गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा ॥ ५६ ॥ ५६-गौणी भक्ति गुणभेदसे अथवा आर्तादिभेदसे तीन प्रकारकी होती है। पिछले सूत्रतक उस परा या मुख्या भक्तिका विवेचन हुआ जिसमें प्रेमी भक्त उस प्रेमाभक्तिसे अपने प्रियतम भगवान्के प्रेममय स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीको श्रीमद्भागवतमें अहैतुकी—निर्गुण भक्ति तथा गीतामें ज्ञानीकी भक्ति कहा है। अहैतुकी भक्तिमें भक्तकी चित्तवृत्ति और कर्मगतिका प्रवाह अविच्छिन्नरूपसे स्वाभाविक ही भगवान्की ओर बहता रहता है अर्थात् उसका चित्त निरन्तर निष्काम अनन्य प्रेमभावसे भगवान्में लगा रहता है और उसकी समस्त क्रियाएँ श्रीभगवान्के लिये ही होती हैं (भागवत ३।२९।११-१२) और गीतोक्त दुर्लभ तत्त्वज्ञानी महात्मा भक्त भी सब कुछ वासुदेव ही देखता है (अध्याय ७। १७)। ये दोनों तो भगवत्स्वरूप ही हैं। अब यहाँ
प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप १०३ इस भक्तिकी अपेक्षा निम्न श्रेणीकी गौणी भक्तिका वर्णन किया जाता है। यह गौणी भक्ति सात्त्विकी, राजसी और तामसी-भेदसे अथवा आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी-भेदसे तीन प्रकारकी है। जो भक्ति पापनाशके उद्देश्यसे सब कर्मफलोंको भगवान्में समर्पण करनेके रूपमें अथवा जिसमें पूजन करना कर्तव्य है यह समझकर भेद-दृष्टिसे पूजा की जाती है, वह सात्त्विकी है (श्रीमद्भागवत ३।२९।१०)। जो भक्ति विषय, यश और ऐश्वर्यकी कामनासे भेददृष्टिपूर्वक केवल प्रतिमादिके पूजनके रूपमें ही की जाती है वह राजसी है (श्रीमद्भागवत ३।२९।९)। जो भक्ति क्रोधसे हिंसा, दम्भ और मत्सरताको लेकर भेद-दृष्टिसे की जाती है वह तामसी है (श्रीमद्भागवत ३। २९।८)। इसी तरह आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी पुरुष त्रिविध उपासनासे तीन प्रकारकी भक्ति करते हैं; अर्थात् भक्तोंके भावभेदसे गौणी भक्तिके तीन भेद होते हैं। गौणी भक्तिके साधनोंसे यद्यपि साक्षात् भगवत्-प्राप्ति नहीं होती, तथापि इस गौणी भक्तिके साधक भी सुकृती ही होते हैं और उन्हें भी भगवत्कृपासे इसका अनुष्ठान करते-करते अन्तमें भगवत्-प्राप्तिकी मुख्य साधनस्वरूपा या साक्षात् भगवत्- स्वरूपा प्रेमा भक्तिकी प्राप्ति होती है। भगवान्की भक्तिमें यही विशेषता है कि इसका अन्तिम फल दुर्लभ भगवत्प्रेमकी प्राप्ति ही है। इसीसे गौणी भक्तिको भी श्रेष्ठ और पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा ही होनेवाली माना गया है; क्योंकि भक्तिमात्रमें ही भगवान्का भजन, भगवान्का आश्रय, भगवान्का ध्यान किसी-
१०४ प्रेम-दर्शन न-किसी रूपमें रहता है और भगवद्भजन, भगवदाश्रय तथा भगवान्के ध्यानका फल सीधा भगवत्प्राप्ति ही होता है। अतएव किसी प्रकारसे भी हो, भगवान्की भक्ति मनुष्यको अवश्य ही करनी चाहिये। परन्तु जहाँतक हो सके सात्त्विकी भक्ति अथवा त्रिभुवनके वैभवको भी अनर्थ एवं भगवान्को ही परम अर्थ—परम धन मानकर उसीके प्रेमकी प्राप्तिके लिये सच्चे अर्थार्थीके भावसे भक्ति करनी चाहिये। उत्तरस्मादुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति ॥ ५७॥ ५७-(उनमें) उत्तर-उत्तर क्रमसे पूर्व-पूर्व क्रमकी भक्ति कल्याणकारिणी होती है। तामसीकी अपेक्षा राजसी और राजसीकी अपेक्षा सात्त्विकी भक्ति उत्तम है। इसी प्रकार अर्थार्थी भक्तकी अपेक्षा जिज्ञासुकी और इन दोनोंकी अपेक्षा आर्तकी भक्ति विशेष कल्याणकारिणी होती है।
भक्तिकी सुलभता और महत्ता
अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ ॥ ५८ ॥ ५८-अन्य सबकी अपेक्षा भक्ति सुलभ है। इससे पहले भक्तिकी महिमा और कर्म, योग तथा ज्ञानादिकी अपेक्षा उसकी श्रेष्ठताका वर्णन किया गया है। अब सूत्रकार यह दिखलाते हैं कि इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ होनेपर भी भक्तिकी प्राप्ति अन्यान्य फलोंकी अपेक्षा सहज और सुलभ है। भक्तिकी प्राप्तिमें न विद्याकी आवश्यकता है न धनकी, न श्रेष्ठ कुल प्रयोजनीय है और न उच्च वर्णाश्रम, न वेदाध्ययनकी आवश्यकता है न कठोर तपकी, न विवेककी जरूरत है न कठिन वैराग्यकी, आवश्यकता है केवल सरल भावसे भगवान्की अपार कृपापर विश्वास करके उनका सतत प्रेमभावसे स्मरण करनेकी। फिर सुलभता तो प्रत्यक्ष ही दीखने लगती है। भगवत्कृपा सबपर सदा-सर्वदा है। मनुष्य विश्वास नहीं करता, इसीसे वह वंचित रह जाता है। भगवान्ने तो गीतामें डंकेकी चोट कहा है कि ‘मैं सब प्राणियोंका सुहृद् हूँ, और जो मुझे सुहृद् जान लेता है वह उसी क्षण शान्ति पा जाता है’— सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति। (गीता ५।२९) मनुष्यको चाहिये कि वह भगवत्कृपापर विश्वास करके यह मान ले कि मैं भगवत्कृपाके समुद्रमें डूब रहा हूँ। मेरे ऊपर- नीचे, इर्द-गिर्द, भूत-भविष्यत्, सब स्थानों और सब कालमें भगवत्कृपा भरपूर है। ऐसा मानते ही वह उस भगवत्कृपाके प्रतापसे तुरन्त पाप-तापसे मुक्त होकर भगवान्की भक्तिका अधिकारी हो जाता है। भगवत्कृपापर इस प्रकार विश्वास और
१०६ प्रेम-दर्शन निश्चय करके भगवान्के अनन्य स्मरणका अभ्यास किसी भी अवस्थामें बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र कोई भी कर सकता है। इसमें न कुछ छोड़ना है और न ग्रहण करना है। सदा सबपर भगवत्कृपा होनेपर भी हमें जो विश्वास नहीं है, बस, उस विश्वासको स्थिर कर लेना है। फिर भक्तिकी प्राप्तिके सभी साधन अपने-आप सहज ही सिद्ध हो जायेंगे—(‘तस्याहं सुलभः पार्थ’—गीता ८।१४)। भक्ति किसी और साधनसे नहीं मिलती, यह भजनसे ही मिलती है। प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात् ॥ ५९ ॥ ५९-क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाणरूप है, इसके लिये अन्य प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। भक्तिके मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंको भक्तिसुखका प्रमाण अपने-आप ही मिलता रहता है। उन्हें स्वयमेव अनुभव होता रहता है, दूसरे किसी प्रमाणकी इसमें आवश्यकता नहीं है। पतिसुखके आनन्दका अनुभव भार्या बननेपर ही मिल सकता है; यह कुमारी कन्याको समझानेकी बात नहीं है। इसी प्रकार भक्तिसुखका अनुभव भक्तोंको ही होता है, यह कहकर बतलानेकी बात नहीं है। जो पुण्यात्मा महानुभाव सब कामनाओंका त्याग कर एकमात्र भगवत्प्रेमकी कामनासे ही भगवत्कृपाका आश्रय लेकर भगवान्का सदा-सर्वदा प्रेमपूर्वक पुलकित चित्तसे भजन करते हैं वे ही भक्तिसुखका अनुभव करते हैं। शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च ॥ ६० ॥ ६०-भक्ति शान्तिरूपा और परमानन्दरूपा है। शान्ति और परम आनन्द साक्षात् भगवान्का स्वरूप है। अपने प्रेमरूपमें स्वयं भगवान् ही अवतीर्ण होते हैं, इसलिये यह भगवत्प्रेम भी शान्ति और परमानन्दस्वरूप ही है। आनन्दमय भगवान् स्वयं ही
भक्तिकी सुलभता और महत्ता १०७ अपनी ह्लादिनी नाम्नी आनन्दशक्तिको निमित्त बनाकर प्रेम और प्रेमिकाके रूपमें प्रकट होते हैं और स्वयं ही प्रेमास्पद बनकर अपने आनन्दका आप ही उपभोग करते हैं। यही उनकी आनन्दलीला है। यहाँपर यह समझ लेना चाहिये कि जिन भगवान्की भक्ति या प्रेम शान्तिरूप और परमानन्दरूप है, वे भगवान् निर्गुणवादियोंद्वारा माने हुए प्रकृतिसम्भव सत्त्व, रज, तमरूप त्रिगुणोंसे युक्त ‘सगुण ब्रह्म’ नहीं हैं। भगवान्का दिव्य तनु उनके अपने आनन्दांश, अपनी योगमायाके निमित्तसे नित्य ही प्रकट है। इसीलिये आत्माराम, मुनि, जीवन्मुक्त महापुरुष, व्यास, नारद, शुकदेव, जनक, सनकादि महात्मा उनके एक-एक दिव्य गुण, दिव्य आभूषण, दिव्य गन्ध, दिव्य मुरली- ध्वनि और दिव्य सौन्दर्यपर मुग्ध हो जाते हैं। यदि भगवान्में इस जगत्-प्रसविनी, आवरण करनेवाली मलिना मायाके ही गुणोंका विकास होता, या इसीसे निर्मित उनका शरीर होता तो मायाकी ग्रन्थिको काटे हुए ब्रह्मस्वरूप महात्माओंका उनकी ओर इतना आकर्षण कभी नहीं होता। निर्गुणवादी जिस भगवत्स्वरूपको शुद्ध सच्चिदानन्दघन ब्रह्म कहते हैं और वेद जिसे ‘नेति-नेति’ कहकर संकेतसे समझाना चाहते हैं, वही मायातीत विज्ञानानन्दघन परमात्मा भक्तोंके प्रियतम भगवान् हैं। उनको शान्ति और आनन्दके समुद्र कहनेसे भी उनका यथार्थ वर्णन नहीं होता। उनका जो प्रेम है, वही परम शान्ति और परमानन्दस्वरूप है। इसी प्रेमका वर्णन देवर्षि नारदजी इस सूत्रमें कर रहे हैं। ☐ ☐
भक्तिके साधन और अन्तराय लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्१ ॥ ६१ ॥ ६१-लोकहानिकी चिन्ता ( भक्तको ) नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह ( भक्त ) अपने-आपको और लौकिक, वैदिक ( सब प्रकारके ) कर्मोंको भगवान्के अर्पण कर चुका है। भक्त सब कुछ भगवान्के अर्पण कर चुकता है, इसलिये उनके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी चिन्ता करनेकी उसे क्या आवश्यकता है ? उसको तो केवल एक प्रियतम भगवान्के चिन्तनकी ही चिन्ता रहनी चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, जन, मानादि पदार्थ रहें या चले जायँ, उसे इनकी कोई परवा नहीं; क्योंकि वह तो इन्हें पहले ही भगवान्के समर्पण करके सर्वथा अकिंचन हो चुका है। फिर उसके पास इनकी चिन्ता करनेके लिये समय और चिन्ता करनेवाला चित्त भी कहाँ है ? उसके चित्तको तो एकमात्र चिन्ताहरण चिन्तामणिकी चिन्ताने चुरा लिया है। वे चतुर चौरचूडामणि कभी उसके चित्तको वापस देना ही नहीं चाहते, फिर वह चित्तके अभावमें किसी हानिकी चिन्ता ही कैसे करे ? अतएव इस पथके पथिकको लोकहानिकी कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। उसे तो सबके सार अर्थ श्रीभगवान्का ही चिन्तन करना चाहिये। और भक्तके हृदयमें ऐसा ही होता भी है। न तदसिद्धौ२ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्- साधनं च कार्यमेव ॥ ६२ ॥ १. पाठभेद 'लोकवेदशीलत्वात्' । २. पाठभेद 'तत्सद्धौ' है।
३. तृतीय प्रकरण: प्रेमाभक्ति की अनिर्वचनीयता एवं गौणी-मुख्या भेद (सूत्र ५१-७३)
भक्तिके साधन और अन्तराय १०९ ६२-(परन्तु) जबतक भक्तिमें सिद्धि न मिले तबतक लोकव्यवहारका त्याग नहीं करना चाहिये, किन्तु फल त्यागकर ( निष्कामभावसे ) उस भक्तिका साधन करना चाहिये। प्रेमकी प्राप्ति होनेपर लौकिक (और वैदिक) कर्म छूट जाते हैं, जान-बूझकर उनका स्वरूपसे त्याग नहीं करना पड़ता। समर्पणका अर्थ उनका मनसे समर्पण ही है। फिर जब प्रेमकी उच्च दशा प्राप्त होती है तब विधि-निषेधके परे पहुँच जानेके कारण ये सब कर्म स्वतः ही उसे विधिके बन्धनसे मुक्त कर अलग हो जाते हैं। उस स्थितिका यही नियम है। परन्तु जो जान-बूझकर प्रेमके नामपर शास्त्रविधिका त्याग करता है, उसे भक्तिकी सिद्धि सहजमें नहीं होती। इसलिये सूत्रकार कहते हैं कि लोकव्यवहारका त्याग जान- बूझकर मत करो। फलकी कामना छोड़कर कर्म करते रहो। निष्काम कर्म करनेवाला स्वयमेव ही लोकहानिकी चिन्तासे छूट जाता है और उसके वे भगवत्प्रीत्यर्थ निष्कामभावसे किये हुए लौकिक कर्म भक्तिकी प्राप्तिमें साधक बन जाते हैं। स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं* न श्रवणीयम् ॥ ६३ ॥ ६३-स्त्री, धन, नास्तिक और वैरीका चरित्र नहीं सुनना चाहिये। ६२ वें सूत्रमें लोकव्यवहारका त्याग नहीं करनेकी आज्ञा दी गयी है, अतएव लोकव्यवहार तो करना चाहिये; परन्तु प्रेमपथके पथिकको लोकव्यवहारमें भी स्त्री, धन, नास्तिक और शत्रुके चरित्र-श्रवणसे तो बचना ही चाहिये।
- पाठभेद 'स्त्रीधननास्तिकचरित्रं'।
११० प्रेम-दर्शन (१) जिसका मन स्त्रीकी चिन्तामें लग गया, वह भगवान्की चिन्ता किसी प्रकार नहीं कर सकता। स्त्रीकी चिन्तासे कामकी उत्पत्ति होती है और काम प्रेममार्गमें सबसे बड़ा बाधक है। स्त्रीसम्बन्धी बातोंके सुनने, पढ़ने और देखनेसे ही स्त्रीचिन्तन होता है। अतएव साधकको चाहिये कि स्त्रीसम्बन्धी बातचीत न करे, स्त्रीसम्बन्धी बात या गान न सुने, स्त्रीसम्बन्धी चित्र न देखे, स्त्रीसम्बन्धी पुस्तक या अन्य साहित्य न पढ़े, नाटक, सिनेमा आदि न देखे, स्त्रीचरित्रपर कुछ भी आलोचना न करे, स्त्रियोंके सम्बन्धमें लेखादि न लिखे, स्त्रियोंमें रहे नहीं और स्त्रियोंसे अनावश्यक मिले नहीं। जो साधक गृहस्थ हों, उन्हें अपनी विवाहिता पत्नीके सिवा यथासाध्य अन्य स्त्रियोंसे मिलनेसे बचना चाहिये। स्त्रीसम्बन्धी चर्चा करना- सुनना, चित्रादि देखना तो सभीके लिये हानिकारक है। श्रीमद्भागवतमें तो कहा है— न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसंगतः। योषित्संगाद्यथा पुंसो यथा तत्संगिसंगतः॥ (३।३१।३५) 'स्त्रियोंके संगसे और स्त्रियोंका संग करनेवालोंके संगसे मनुष्यको जैसा मोह और बन्धन प्राप्त होता है वैसा अन्य किसीके भी संगसे नहीं होता।' आगे चलकर पंचम स्कन्धमें स्त्रियासक्त पुरुषोंकी संगतिको 'नरकका द्वार' बतलाया है। जैसे पुरुषोंके लिये स्त्रीका संग त्याज्य है, इसी प्रकार स्त्रियोंके लिये भी पुरुषोंका संग सर्वथा त्याज्य है। (२) धनके चिन्तनसे लोभकी उत्पत्ति होती है। जहाँ चित्तमें धनका लोभ जागृत हुआ, वहीं न्यायान्यायकी बुद्धि मारी जाती है और मनुष्य सत्पथको त्यागकर अन्यायके मार्गपर चलने लगता
भक्तिके साधन और अन्तराय १११ है। अतएव धन और धनियोंकी भोग और गर्वभरी बातें नहीं सुननी-देखनी चाहिये। (३) जिनका ईश्वर और शास्त्रोंपर विश्वास नहीं है, वे ही नास्तिक हैं। ईश्वरका अस्तित्व न माननेवाले नास्तिकोंके समान जगत्के जीवोंका शत्रु शायद ही कोई है। 'इसमें क्या रखा है? उसमें क्या है? ईश्वर केवल ढोंग है, किसने ईश्वरको देखा है? आत्मा तो कल्पनामात्र है।' ऐसी बातें बकनेवाले और ईश्वर तथा शास्त्रोंकी निन्दा करनेवाले कुतर्कियोंका संग करने तथा उनके चरित्र सुननेसे ईश्वरमें अश्रद्धा पैदा होती है और ईश्वरमें अश्रद्धाके समान पतनका साधन और कोई-सा भी नहीं है। अतएव नास्तिकोंसे सदा बचना चाहिये। (४) वास्तवमें भक्तके मन उसका कोई भी शत्रु नहीं है। जो सब जगत्में अपने प्राणाराम परमात्माको व्याप्त देखता है, जो जगत्को श्रीकृष्णमय देखता है, वह कैसे किसको अपना वैरी मान सकता है। देवदेव श्रीमहादेवजीने कहा है— उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥ परन्तु जबतक भक्तिकी सिद्धि न हो, तबतक साधकको ऐसी भावना करनी चाहिये और मन-ही-मन यह निश्चय करना चाहिये कि सब कुछ मेरे प्रभुका ही स्वरूप है। ऐसी अवस्थामें यदि कोई दूसरा मनुष्य भ्रमवश साधकसे द्वेष या वैर रखे तो उसकी उन वैरसम्बन्धी बातोंको, जहाँतक हो, सुनना ही नहीं चाहिये। क्योंकि उनके सुननेसे क्रोध उत्पन्न होनेकी सम्भावना रहती है। अतएव अपनी ओरसे तो अपने न जीते हुए मनके सिवा किसीको शत्रु माने ही नहीं और दूसरा कोई शत्रुता रखता हो तो उसपर भी विचार न करे।
११२ प्रेम-दर्शन स्त्रीके चिन्तनसे काम, धनके चिन्तनसे लोभ, नास्तिकके चिन्तनसे ईश्वरमें अविश्वास और वैरीके चिन्तनसे क्रोध उत्पन्न होता है। अतएव इन चारोंके चरित्रोंको यथासाध्य सुनना ही नहीं चाहिये। अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम् ॥ ६४ ॥ ६४-अभिमान, दम्भ आदिका त्याग करना चाहिये। इससेके पहले सूत्रमें स्त्री, धन, नास्तिक, वैरीका चरित्र न सुननेका आदेश दिया गया है। परन्तु वैसा करके यह नहीं मान लेना चाहिये कि मैं कामिनी-कांचनका त्यागी हूँ, मैं परम आस्तिक हूँ, मैं अजातशत्रु हूँ। अभिमान सर्वथा पतनका हेतु है। सम्पत्ति, सन्तति, शक्ति, स्वास्थ्य, विद्या, बुद्धि, कुल, वर्ण, आश्रम, आचार, रूप, पद, पुरुषार्थ आदि किसी भी वस्तुका अभिमान नहीं होना चाहिये। जो कुछ सद्वस्तु या सद्गुण प्राप्त हों अथवा साधन ठीक चलता रहे तो उसमें भगवान्की कृपाको ही कारण समझना चाहिये। अभिमानसे बहुत बड़ी हानि होती है। अतएव अभिमानका सर्वथा त्याग करना चाहिये। यहाँतक कि निरभिमानताके अभिमानको भी छोड़ देना चाहिये। अभिमाननाशका एक उत्तम उपाय दीनता, विनय और नम्रता है। नमनभक्तिसे भी अभिमानका नाश होता है। इसी प्रकार दम्भका भी त्याग करना चाहिये। अपनेमें जो गुण न हों, धनमानके लोभसे या स्वभावदोषसे उन गुणोंको दिखानेकी चेष्टा करना; बाहरसे धर्मात्मा, भक्त, त्यागी बननेका ढोंग करना दम्भ कहलाता है। दाम्भिक पुरुषका साधनपथ बहुत बुरी तरहसे रुक जाता है। वह ऊपरसे अपना कपटवेश बनाये रखनेमें ही अपनी समस्त विद्या, बुद्धि और क्रियाकुशलताको समाप्त कर देता है। निरभिमानता और
सरलता ये दो भक्तिके साधनमें परम सहायकरूप हैं और अभिमान एवं दम्भ महान् बाधक। ये दोनों आसुरी सम्पदाके दुर्गुण हैं। इनके साथ 'आदि' शब्द जोड़कर सूत्रकारने आसुरी सम्पदाके* अन्यान्य दुर्गुणोंकी तरफ इशारा किया है। अतएव सभी आसुरी दुर्गुणोंका त्याग करना चाहिये।
- श्रीमद्भगवद्गीताके १६ वें अध्यायमें श्लोक ७ से २० तक श्रीभगवान्ने आसुरी सम्पत्तिका जो वर्णन किया है उसका भावार्थ इस प्रकार है— आसुरी मनुष्य धर्माधर्मविषयक प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते, इसलिये उनमें न पवित्रता है, न आचार है और न सत्य ही रहता है। वे आसुरी मनुष्य कहते हैं कि यह जगत् असत्य, अप्रतिष्ठ (धर्माधर्मव्यवस्थासे रहित), ईश्वररहित और अन्योन्यसम्भूत है अर्थात् स्त्री-पुरुष-मिथुनजनित है। इस जगत्का और कोई कारण नहीं, यह केवल स्त्री-पुरुषके कामजनित संयोगसे ही उत्पन्न है। वे सब अल्पबुद्धि मनुष्य इस प्रकारकी दृष्टिका आश्रय करके मलिनचित्त, उग्रकर्मा और अहितकारी होकर जगत्के विनाशके लिये ही जन्म ग्रहण करते हैं। वे दुष्पूरणीय (किसी प्रकारसे भी पूरी न हो ऐसी) कामनाओंका आश्रय करके दम्भ, अभिमान और मदके वशीभूत हो मोहवश असदाग्रह (इस षड्यन्त्रसे अमुक मनोरथ पूर्ण हो जायगा ऐसी वेदशास्त्रविरुद्ध दुराशा) स्वीकार कर अपवित्र व्रत (मद्यमांसादि तथा चोरी, झूठ, कपटादिद्वारा सम्पादित नरकादि-उत्पादक कुव्रतोंको) धारणकर शास्त्रविरुद्ध कर्मों—पापकर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं। अन्तिम श्वासतक अपार विषयचिन्ताओंसे घिरे हुए वे 'कामोपभोग' ही परम पुरुषार्थ है, इस प्रकार स्थिर निश्चय करके सैकड़ों प्रकारकी आशाओंकी फाँसियोंसे बँधे हुए कामक्रोधपरायण होकर कामभोगके लिये अन्यायपूर्वक (चोरी, विश्वासघात आदिके द्वारा) धन संचय करनेकी चेष्टा करते हैं। आज मैंने यह पाया, यह मनोरथ भी पूरा होगा; यह धन मेरा है, फिर वह धन भी प्राप्त होगा। मैंने अमुक शत्रुको मार डाला; अब उन शत्रुओंको भी मारूँगा। मैं ईश्वर (के समान सर्वशक्तिमान्)- हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं बलवान् हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं धनी हूँ, मैं बड़े कुलवाला हूँ, मेरे समान और कौन है, मैं यज्ञ करूँगा, मैं (नाम, यश या स्वार्थके लिये) दान करूँगा, मैं मौज करूँगा—इस प्रकार अज्ञानसे मोहित होकर वे अनेकों विषयोंके चिन्तनमें लगे हुए विभ्रान्त चित्तवाले, मोहजालसे ढके हुए कामभोगमें आसक्त होकर महान् क्लेशदायक अपवित्र नरकोंमें पड़ते हैं। वे अभिमानी स्वयं अपनेको श्रेष्ठ समझते हैं (अपनेमें पूज्यबुद्धि रखते हैं), अकड़े रहते हैं, धन, मान और मदके नशेमें चूर हुए वे केवल दम्भपूर्वक लोगोंको धर्मात्मापनका स्वाँग दिखानेके लिये (ईश्वरप्रीत्यर्थ श्रद्धा- विश्वासपूर्वक नहीं) अविधिपूर्वक नाममात्रका यज्ञ करते हैं। अहंकार, बल, घमण्ड,
११४ प्रेम-दर्शन तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम् ॥ ६५॥ ६५-सब आचार भगवान्के अर्पण कर चुकनेपर यदि काम, क्रोध, अभिमानादि हों तो उन्हें भी उस (भगवान्)-के प्रति ही करना चाहिये। जब सब कुछ भगवान्के अर्पण कर दिया तो फिर काम, क्रोधादिका अर्पण दूसरे किसको किया जाय। प्रियतम भगवान् जैसे अपने प्रेमी भक्तके प्रेमके पात्र हैं, वैसे ही उसके काम, क्रोधादिके पात्र भी वही हैं। दूसरा तो कोई उसके मन है ही नहीं, तब इनका पात्र और कौन हो? इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें भी विषयी पुरुषों-जैसे ही काम, क्रोध, अभिमान रहते हैं। आसुरी सम्पदाके दुर्गुणस्वरूप काम, क्रोध, अभिमानादिके त्यागकी बात तो पहले ही कही जा चुकी है। फिर प्रेमी भक्त महात्माओंमें यह दूषित काम कहाँ। उनमें विषयासक्ति, हिंसा, द्वेष और क्रोध कहाँ। उन अमानियोंमें मानकी गन्ध भी कहाँ। इनका तो उनमें बीज ही नहीं है। अपने सुखकी जब कोई वासना ही नहीं, तब ये दोष कहाँसे आवें ? उन भक्तोंके जीवनका उद्देश्य तो बस एक प्रियतमको सुखी करना ही है—‘कृष्णसुखैक- तात्पर्य गोपीभाववर्य।’ उनके चित्तमें जगत्का संस्कार ही नहीं
क्रोधका आश्रय लिये हुए वे अपने तथा दूसरोंके शरीरमें (आत्मारूपसे) स्थित मुझ- (भगवान्-) से द्वेष करते हैं और सत्यमार्गपर चलनेवाले साधुओंमें दोषारोपण करते हैं। मैं उन मेरे द्वेषी, क्रूर, नराधम और पापी मनुष्योंको संसारमें बार-बार आसुरी योनियोंमें ही पटकता हूँ। हे अर्जुन! वे मूर्ख इस प्रकार जन्म-जन्ममें बार-बार आसुरी योनिको प्राप्त होकर मुझको (भगवान्को) न पाकर (मुझको पाना तो दूर रहा, मेरी प्राप्तिके योग्य मनुष्य-शरीरको भी न पाकर) और भी नीची योनियोंको प्राप्त होते हैं।
भक्तिके साधन और अन्तराय ११५ है; वे तो लज्जा, घृणा, कुल, शील, मान, देह, गेह, भोग, मोक्ष सबकी सुधि भुलाकर केवल अपने प्रियतम भगवान्पर ही न्योछावर हो चुके हैं। अतएव जैसे ये भक्त स्वयं दिव्य भाववाले होते हैं, वैसे ही इनके काम, क्रोध, अभिमान भी दिव्य होते हैं। इसीलिये परम विरागी जीवन्मुक्त मुनियोंने इस प्रकारके भगवत्- रंग-रँगीले प्रेमियोंकी ऐसी लीलाएँ गाने और सुननेमें अपनेको कृतार्थ माना है। जिनका चित्त सब ओरसे हट गया है, एकमात्र भगवान् ही जिनकी कामनाकी वस्तु रह गये हैं, वे भक्त अपने उन भगवान्के दर्शनकी कामनाके वेगसे पीड़ित होकर रो- रोकर पुकारते हैं— हे देव हे दयित हे भुवनैकबन्धो हे कृष्ण हे चपल हे करुणैकसिन्धो। हे नाथ हे रमण हे नयनाभिराम हा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे ॥ ( श्रीकृष्णकर्णामृत) 'हे देव! हे प्रियतम! हे विश्वके एकमात्र बन्धु! हे हमारे मनोंको अपनी ओर बरबस खींचनेवाले! हे चपल! हे करुणाके एकमात्र सिन्धु! हे नाथ! हे रमण! हे नयनाभिराम! हा! हा! तुम कब हमारे दृष्टिगोचर होओगे?' श्रीकृष्णगतप्राणा श्रीरुक्मिणीजी कहती हैं— श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम् । रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥ का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप- विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम् ।
११६ प्रेम-दर्शन धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्॥ यस्याङ्घ्रिपंकजरजःस्नपनं महान्तो वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै । यर्ह्यम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात् ॥ (श्रीमद्भा० १०।५२।३७, ३८, ४३) 'हे अच्युत! हे त्रिभुवनसुन्दर! जो कानोंके द्वारा हृदयमें प्रवेश करके सुननेवालोंके अंगतापको हरण कर लेते हैं, वे आपके दिव्य गुण और जो नेत्रधारियोंकी दृष्टिका सबसे परम लाभ है वह आपका दिव्य रूप, इनकी प्रशंसा सुनकर मेरा चित्त सारी लोक-लाजको छोड़कर आपपर अत्यन्त आसक्त हो गया है। हे मुकुन्द! कुल, शील, रूप, विद्या, वय, द्रव्य और प्रभावमें आपके समान बस आप ही हैं। हे पुरुषोत्तम! आप नरलोकके मनको मोहनेवाले हैं। हे पुरुषसिंह! विवाहकाल (आपसे मिलनका अवसर) उपस्थित होनेपर ऐसी (कौन प्रेमी भक्तरूपी) कुलवती, गुणवती और बुद्धिमती कन्या है जो आपके साथ गँठजोड़ी करनेकी इच्छा न करेगी ? हे कमललोचन! उमापति शंकरके समान महान् देव अपने हृदयका तम दूर करनेके लिये आपकी जिस चरणधूलिमें स्नान करनेकी प्रार्थना करते रहते हैं, यदि वह चरणधूलि मुझे प्रसादरूपमें नहीं मिली तो यह निश्चय समझिये कि मैं व्रतादिके द्वारा शरीरको सुखाकर इन व्याकुल प्राणोंको त्याग दूँगी और ऐसे करते-करते कभी सौ जन्मोंमें तो आपका प्रसाद मुझको प्राप्त होगा ही।' भगवान् श्रीकृष्णकी पटरानियाँ द्रौपदीसे कहती हैं—
भक्तिके साधन और अन्तराय ११७ न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत। वैराज्यं पारमेष्ठ्यं च आनन्त्यं वा हरेः पदम्॥ कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरजः श्रियः। कुचकुंकुमगन्धाढ्यं मूर्ध्ना वोढुं गदाभृतः ॥ (श्रीमद्भागवत १०।८३।४१-४२) 'हे साध्वी! हमें पृथ्विके साम्राज्य, इन्द्रके राज्य, भौज्यपद, सिद्धियाँ, ब्रह्माके पद, मोक्ष या वैकुण्ठकी भी इच्छा नहीं है। हम तो केवल यही चाहती हैं कि भगवान् श्रीकृष्णकी कमलाकुच-कुंकुमकी सुगन्धसे युक्त चरणधूलिको ही सदा अपने मस्तकोंपर लगाती रहें।' मुक्ति तो ऐसे भक्तोंके चरणोंपर लोटा करती है— यदि भवति मुकुन्दे भक्तिरानन्दसान्द्रा विलुठति चरणाग्रे मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मीः ॥ 'जिसकी श्रीमुकुन्दके चरणोंमें परमानन्दरूपा भक्ति होती है, मोक्षसाम्राज्यश्री उसके चरणोंमें लोटती हैं।' आदर्श प्रेममयी भक्तशिरोमणि गोपियाँ प्रियतम भगवान्के आँखोंसे ओझल हो जानेपर विलाप करती हुई कहती हैं— विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्। करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥ व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित। भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥ प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि। चरणपंकजं शन्तमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥ (श्रीमद्भागवत १०।३१।५-६, १३) 'हे यदुकुलशिरोमणि! जो लोग संसारके भयसे तुम्हारे चरणोंकी शरण लेते हैं, तुम्हारे करसरोज उन्हें अभय देकर उनकी
११८ प्रेम-दर्शन अभिलाषाओंको पूर्ण करते हैं। हे प्रियतम ! अपने उन्हीं करकमलोंको, जिनसे आपने लक्ष्मीका हाथ पकड़ा है, हमारे सिरपर रखिये। हे व्रजवासियोंके दुःखोंको हरनेवाले वीर ! आपकी मन्द मधुर मुसकान भक्तोंके गर्वको हरनेवाली है। हे सखे ! हम आपकी किंकरी हैं, कृपा करके हमें स्वीकार कीजिये और अपना सुन्दर मुखकमल हमें दिखाइये। हे रमण ! हे आर्तिनाशन ! तुम्हारे चरणारविन्द प्रणत जनोंकी कामना पूरी करनेवाले हैं, लक्ष्मीजीके द्वारा सदा सेवित हैं, पृथ्वीके आभूषण हैं, विपत्तिकालमें ध्यान करनेसे कल्याण करनेवाले हैं, हे प्रियतम ! उन परम कल्याणमय सुशीतल चरणोंको हमारे तप्त हृदयपर स्थापित कीजिये।' इस प्रकार प्रेमी भक्त श्रीकृष्णके कामसे पीड़ित हुए सदा उन्हींके लिये रोया करते हैं और उन्हें पुकारा करते हैं; और आँखमिचौनीकी-सी लीला करनेवाले लीलाविहारी भगवान् जब उनकी प्रेम-पुकार सुनकर त्रिभुवन-कमनीय, योगिजनदुर्लभ, देवदेवप्रत्याशित, ऋषि-महर्षि-महापुरुषचित्ताकर्षक, निखिलसौन्दर्यमाधुर्य-रसामृतसारभूत, आनन्दकन्द मदनमोहन मन्मथमन्मथरूपमें मन्द-मन्द मुसकाते हुए और मुरलीमें अपना दिव्य मोहन सुर भरते हुए सहसा प्रकट होकर अपनी प्रेमानन्दरसमाधुरी चारों ओर बिखेर देते हैं, जब अपने सौन्दर्यमाधुर्यसुधासुशीतल वदनविधुकी शुभ्र ज्योत्स्ना चारों ओर छिटका देते हैं, तब वहाँ उन भाग्यवान् दिव्यचक्षु दिव्यभावापन्न भक्त महात्माओंके चित्तोंकी क्या अवस्था होती है, इसका वर्णन करनेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है। यह अनिर्वचनीय रहस्य है। उस समय भक्तका अपना सब कुछ उनके चरणोंमें स्वयमेव