प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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लगा। उस समय प्रेमावेशसे मेरी आँखोंमें आनन्दके आँसू भर आये और मैंने देखा, मेरे हृदयमें भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गये। भगवान्के दर्शन पाते ही प्रेमकी बाढ़-सी आ गयी। मेरे रोम खड़े हो गये। मैं आनन्दके समुद्रमें डूब गया और संसारसहित अपने- आपको भूल गया। सहसा भगवान्का वह मनमोहन परम सुन्दर रूप अन्तर्हित हो गया। तब मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैं पुनः दर्शनार्थ चेष्टा करने लगा, तब मैंने आकाशवाणीसे सुना कि 'हे बालक! इस जन्ममें तुझको मेरे दर्शन नहीं होंगे, प्रेम बढ़ानेके लिये मैंने एक बार तुझे दर्शन दिये हैं। अल्पकालके सत्संगके प्रतापसे तेरी मुझमें दृढ़ भक्ति हुई है। तू इस शरीरको छोड़कर मेरा निजजन होगा, मुझमें तेरी अचल बुद्धि होगी और मेरी कृपासे कल्पान्तमें भी तुझे इस जन्मकी बातें याद रहेंगी।' तब मैंने अपनेको भगवान्का कृपापात्र जाना और झुककर प्रणाम किया और लज्जा छोड़कर भगवान्के परम गुप्त कल्याणमय नाम और गुणोंका कीर्तन और स्मरण करता हुआ सन्तोषके साथ अहंकार और ईर्ष्या त्यागकर निरीह हुआ संसारमें विचरने लगा। मैंने श्रीकृष्णमें मन लगाकर संसारका संग त्याग दिया। यथासमय मेरा वह शरीर नष्ट हो गया और मुझे शुद्ध दिव्य पार्षददेहकी प्राप्ति हुई। तदनन्तर कल्पके अन्तमें संसारको अपनेमें लीन करके प्रलयसमुद्रमें शयन करनेवाले ब्रह्माजीके हृदयमें श्वासके साथ मैंने प्रवेश किया। सहस्र युगके उपरान्त जब ब्रह्माजी जगत्की रचना करने लगे, तब मरीचि आदि ऋषियोंके साथ उनके श्वाससे मैं उत्पन्न हो गया। तबसे अखण्ड ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करके मैं तीनों लोकोंमें बाहर-भीतर चाहे जहाँ विचरता हूँ। भगवान्की कृपासे मेरे लिये
१. प्रथम प्रकरण: पराभक्ति स्वरूप, लक्षण एवं अमृतत्व प्राप्ति (सूत्र १-२४)
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कहीं भी रुकावट नहीं है। स्वयं भगवान्की दी हुई इस स्वरमय ब्रह्मसे विभूषित वीणाको बजाकर हरिगुण गाता हुआ मैं सर्वत्र विचरता हूँ। भगवान्की मुझपर इतनी अपार कृपा है कि जब मैं प्रेमसे गद्गद होकर भगवान्की लीला गाता हूँ, तभी मंगलकीर्ति पूज्यचरण भगवान् उसी क्षण प्रकट होकर मुझे ऐसे दर्शन देते हैं, जैसे कोई किसीके पुकारते ही शीघ्र आ जाता है। जो लोग भोगोंकी इच्छासे बार-बार व्यग्रचित्त होकर संसारके विषय-भोगोंमें आसक्त हैं, उनके संसारसागरसे तरनेके लिये केवल श्रीहरिचर्चा ही दृढ़ नौका है। इसीलिये मैं अपने और लोगोंके कल्याणके लिये सदा-सर्वदा हरिगुणगान करता हुआ विचरण करता हूँ। 'भगवान् श्रीहरिके भजनसे विषयी पुरुषोंका चित्त जितना शीघ्र शान्त होता है उतना योगादिके द्वारा नहीं होता।' इतना कहकर हरिगुण गाते हुए श्रीनारदजी वहाँसे चल दिये। महाभारतमें कहा है कि देवर्षि नारदजी समस्त वेदोंके तत्त्वज्ञ, देवताओंके पूज्य, इतिहास-पुराणोंके विशेषज्ञ, अतीत कल्पोंकी बातोंको जाननेवाले, धर्म-तत्त्वके ज्ञाता, शिक्षा-कल्प- व्याकरणके असाधारण पण्डित, संगीतविशारद, परस्पर-विरुद्ध विधिवाक्योंकी मीमांसा जाननेवाले, वाक्योंका पृथक्करण करनेमें पूर्ण योग्य, प्रभावशाली, व्याख्यानदाता, मेधावी, स्मृतिवान्, नीतिशील, कवि, ज्ञानी, समस्त प्रमाणोंद्वारा वस्तुका विचार करनेमें समर्थ, बृहस्पति-जैसे विद्वानोंकी शंकाओंका समाधान करनेवाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले, योगबलसे समस्त दिशाओंसे परिपूर्ण भूमण्डलके प्रत्यक्षदर्शी, मोक्षाधिकारके ज्ञाता, कल्याणके लिये विवाद खड़ा कर देनेवाले, सन्धि और विग्रहके सिद्धान्तोंके ज्ञाता, अनुमानसे ही कार्यका तत्त्व जाननेवाले,
[ २० ] समस्त शास्त्रोंके पूर्ण पण्डित, विधिका उपदेश करनेवाले, समस्त सद्गुणोंके आधार और अपार तेजस्वी थे। वे ज्ञानके स्वरूप, विद्याके भण्डार, आनन्दके समूह, सदाचारके आधार, सब भूतोंके अकारण प्रेमी, विश्वके सहज ही हितकारी, भक्तिके महान् स्वरूप और आचार्य थे। ऐसे देवर्षि नारदजीने सब कुछ उपदेश करनेके बाद ‘अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः’ कहकर अन्तमें भक्तितत्त्वका उपदेश किया। इससे सिद्ध होता है कि भक्तिका दर्जा बहुत ही ऊँचा है। इस प्रकार लोगोंपर अकारण कृपाके कारण हरिगुण गाते हुए त्रिलोकीमें घूमनेवाले देवर्षि नारदजीके चरणोंमें प्रणामकर हमलोगोंको उनके परम प्रिय भक्तिके अनुपम उपदेशोंको ध्यानसे पढ़कर तदनुसार जीवन बनानेकी चेष्टा करनी चाहिये।
॥ श्रीहरिः ॥ प्रेम-दर्शन (देवर्षि नारदरचित भक्तिसूत्र) प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ १-अब हम भक्तिकी व्याख्या करेंगे। इस सूत्रके 'अथ' और 'अतः' शब्दसे यह प्रतीत होता है कि भक्तिमार्गके आचार्य परम भक्तशिरोमणि, सर्वभूतहितमें रत, दयानिधि देवर्षि नारदजी अन्यान्य सिद्धान्तोंकी व्याख्या तो कर चुके; अब जीवोंके कल्याणार्थ परम कल्याणमयी भक्तिके स्वरूप और साधनोंकी व्याख्या आरम्भ करते हैं। नारदजी कहते हैं— सा त्वस्मिन्* परमप्रेमरूपा ॥ २ ॥ २-वह ( भक्ति ) ईश्वरके प्रति परम प्रेमरूपा है। भक्तिके अनेक प्रकार बतलाये गये हैं, परंतु नारदजी जिस भक्तिकी व्याख्या करते हैं वह प्रेमस्वरूपा है। भगवान्में अनन्य प्रेम हो जाना ही भक्ति है। ज्ञान, कर्म आदि साधनोंके आश्रयसे रहित और सब ओरसे स्पृहाशून्य होकर चित्तवृत्ति अनन्य भावसे जब केवल भगवान्में ही लग जाती है; जगत्के समस्त पदार्थोंसे तथा परलोककी समस्त सुखसामग्रियोंसे, यहाँतक कि मोक्ष- सुखसे भी चित्त हटकर एकमात्र अपने परम प्रेमास्पद भगवान्में लगा रहता है; सारी ममता और आसक्ति सब पदार्थोंसे सर्वथा निकलकर एकमात्र प्रियतम भगवान्के प्रति हो जाती है, तब उस स्थितिको 'अनन्य प्रेम' कहते हैं।
- पाठभेद "कस्मै"।
२२ प्रेम-दर्शन अमृतस्वरूपा च ॥ ३ ॥ ३-और अमृतस्वरूपा ( भी ) है। भगवान्में अनन्य प्रेम ही वास्तवमें अमृत है; वह सबसे अधिक मधुर है और जिसको यह प्रेमामृत मिल जाता है वह उसे पानकर अमर हो जाता है। लौकिक वासना ही मृत्यु है। अनन्य प्रेमी भक्तके हृदयमें भगवत्प्रेमकी एक नित्य नवीन, पवित्र वासनाके अतिरिक्त दूसरी कोई वासना रह ही नहीं जाती। इसी परम दुर्लभ वासनाके कारण वह भगवान्की मुनिमनहारिणी लीलाका एक साधन बनकर कर्मबन्धनयुक्त जन्म-मृत्युके चक्करसे सर्वथा छूट जाता है। वह सदा भगवान्के समीप निवास करता है और भगवान् उसके समीप। प्रेमीभक्त और प्रेमास्पद भगवान्का यह नित्य अटल संयोग ही वास्तविक अमरत्व है। इसीसे भक्तजन मुक्ति न चाहकरभक्ति चाहते हैं। अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति ॥ ४ ॥ ४-जिसको ( परम प्रेमरूपा और अमृतरूपा भक्तिको ) पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, ( और ) तृप्त हो जाता है। जिसने भगवत्-प्रेमामृतका पान कर लिया, वही सिद्ध है। 'सिद्ध' शब्दसे यहाँ अणिमादि सिद्धियोंसे अभिप्राय नहीं है। प्रेमी भक्त, इन सिद्धियोंकी तो बात ही क्या, मोक्षरूप सिद्धि भी नहीं चाहता। ये सिद्धियाँ तो ऐसे प्रेमी भक्तकी सेवाके लिये अवसर ढूँढ़ा करती हैं, परन्तु वह भगवत्प्रेमके सामने अत्यन्त तुच्छ समझकर इनको स्वीकार ही नहीं करता। स्वयं भगवान् कहते हैं—
प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २३ न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्। न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा मय्यर्पितात्मेच्छति मद्बिनान्यत् ॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१४) 'मुझमें चित्त लगाये रखनेवाले मेरे प्रेमी भक्त मुझको छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रासन, चक्रवर्ती राज्य, लोकान्तरोंका आधिपत्य, योगकी सब सिद्धियाँ और सायुज्य मोक्ष आदि कुछ भी नहीं चाहते।' एक भक्त कहते हैं— रोमांचेन चमत्कृता तनुरियं भक्त्या मनो नन्दितं प्रेमाश्रूणि विभूषयन्ति वदनं कण्ठं गिरो गद्गदाः। नास्माकं क्षणमात्रमप्यवसरः कृष्णार्चनं कुर्वतां मुक्तिर्द्वारि चतुर्विधापि किमियं दास्याय लोलायते ॥ (बोधसार) 'प्रियतम श्रीकृष्णकी पूजा करते समय शरीर पुलकित हो गया, भक्तिसे मन प्रफुल्लित हो गया। प्रेमके आँसुओंने मुखको और गद्गद वाणीने कण्ठको सुशोभित कर दिया। अब तो हमें एक क्षणके लिये भी फुरसत नहीं है कि हम किसी दूसरे विषयको स्वीकार करें। इतनेपर भी सायुज्य आदि चारों प्रकारकी मुक्तियाँ न जाने क्यों हमारे दरवाजेपर खड़ी हमारी दासी बननेके लिये आतुर हो रही हैं।' भक्त यदि भुक्ति और मुक्तिको स्वीकार कर ले तो वे अपना परम सौभाग्य मानती हैं, परन्तु भक्त ऐसा नहीं करते। हरिभक्तिमहादेव्याः सर्वा मुक्त्यादिसिद्धयः। भुक्तयश्चाद्भुतास्तस्याश्चेटिकावदनुव्रताः ॥ (नारदपांचरात्र)
२४ प्रेम-दर्शन 'मुक्ति आदि सिद्धियाँ और अनेक प्रकारकी विलक्षण भुक्तियाँ (भोग) दासीकी भाँति हरिभक्ति महादेवीकी सेवामें लगी रहती हैं।' काकभुशुण्डिजी महाराज कहते हैं— जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥ तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥ इसलिये यहाँ सिद्धिका अर्थ 'कृतकृत्यता' लेना चाहिये। भक्तको किसी वस्तुके अभावका बोध नहीं रहता। वह प्रियतम भगवान्के प्रेमको पाकर सर्वथा पूर्णकाम हो जाता है। यह पूर्णकामता ही उसका अमर होना है। जबतक मनुष्य कृतकृत्य या पूर्णकाम नहीं होता, तबतक उसे बारम्बार कर्मवश आना-जाना पड़ता है। पूर्णकाम भक्त सृष्टि और संहार दोनोंमें भगवान्की लीलाका प्रत्यक्ष अनुभव कर मृत्युको खेल समझता है। वास्तवमें उसके लिये मृत्युकी ही मृत्यु हो जाती है। प्रभु-लीलाके सिवा मृत्युसंज्ञक कोई भयावनी वस्तु उसके ज्ञानमें रह ही नहीं जाती और इसलिये वह तृप्त हो जाता है। जबतक जगत्के पदार्थोंकी ईश्वर-लीलासे अलग कोई सत्ता रहती है तभीतक उनको सुखद या दुःखप्रद समझकर मनुष्य निरन्तर नये-नये सुखप्रद पदार्थोंकी इच्छा करता हुआ अतृप्त रहता है। जब सबका मूल स्रोत, सबका यथार्थ पूर्ण स्वरूप उसे मिल जाता है तब उन खण्ड और अपूर्ण पदार्थोंकी ओर उसका मन ही नहीं जाता। वह पूर्णको पाकर तृप्त हो जाता है। यत्प्राप्य न किंचिद्वाञ्छति न शोचति न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति ॥ ५ ॥ ५-जिसके (प्रेमस्वरूपा भक्तिके) प्राप्त होनेपर मनुष्य न किसी भी वस्तुकी इच्छा करता है, न शोक करता है, न द्वेष करता है, न किसी वस्तुमें आसक्त होता है और न उसे (विषयभोगोंकी प्राप्तिमें) उत्साह होता है।
प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २५ वह प्रेमी भक्त उस परम महान् वस्तुको पा लेता है, जिसके पानेपर सारी इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं। जगत्के प्रेम, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, बल, यश, ज्ञान, वैराग्य आदि समस्त पदार्थ, जिनके लिये भोगी और त्यागी सभी मनुष्य अपनी-अपनी रुचिके अनुसार सदा ललचाते रहते हैं, भगवत्प्रेमरूपी दुर्लभ पदार्थके सामने अत्यन्त तुच्छ हैं। विश्वभरमें फैले हुए उपर्युक्त समस्त पदार्थोंको एक स्थानपर एकत्रित किया जाय तो भी वे सब मिलकर जिस भगवान्रूपी समुद्रके एक जलकणके समान ही होते हैं, वे भगवान् स्वयं जिस प्रेमके आकर्षणसे सदा खिंचे रहते हैं, उस प्रेमके सामने संसारके पदार्थ किस गिनतीमें हैं? श्रीशुकदेव मुनि कहते हैं— यस्य भक्तिर्भगवति हरौ निःश्रेयसेश्वरे। विक्रीडतोऽमृताम्भोधौ किं क्षुद्रैः खातकोदकैः॥ (श्रीमद्भा० ६।१२।२२) 'जो परम कल्याणके स्वामी भगवान् श्रीहरिकी भक्ति करता है वह अमृतके समुद्रमें क्रीड़ा करता है। गढैयामें भरे हुए मामूली गन्दे जलके सदृश किसी भी भोगमें या स्वर्गादिमें उसका मन चलायमान नहीं होता।' प्रेमामृतसमुद्रमें डूबा हुआ भक्त क्यों अन्य पदार्थोंकी इच्छा करने लगा? जैसे भक्त भोग, मोक्ष आदिकी इच्छा नहीं करता; वैसे ही इनके नष्ट हो जानेका शोक भी नहीं करता। भोगोंके नाशको वह परमात्माकी लीला समझता है, इससे सदा—हर हालतमें आनन्दमें ही रहता है। परन्तु भगवत्प्रेमके सेवनमें यदि सायुज्य मोक्षके साधनमें कमी आती है तो वह उसके लिये भी शोक नहीं करता; वरं सदा यही चाहता है कि मेरा भगवत्प्रेम बढ़ता रहे, चाहे जन्म कितने ही क्यों न धारण करने पड़ें।
२६ प्रेम-दर्शन चहौं न सुगति सुमति संपति कछु रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई। हेतुरहित अनुरागु रामपद बढ़ु अनुदिन अधिकाई॥ इसी प्रकार वह किसी जीवसे या लौकिक दृष्टिसे प्रतिकूल माने जानेवाले पदार्थ या स्थितिसे कभी द्वेष नहीं करता। वह सब जीवोंमें अपने प्रभुको और सब पदार्थों और स्थितिमें प्रभुकी लीलाको देख-देखकर क्षण-क्षणमें आनन्दित होता है। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥ भक्तका मन सदा प्रभु-प्रेममें ऐसा तल्लीन हो जाता है कि आधे क्षणभरके लिये भी अन्य किसी पदार्थमें नहीं रमता। गोपियाँ उद्धवजीसे कहती हैं— ऊधौ, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयो स्याम सँग, को आराधै ईस॥ मन अपने पास रहता ही नहीं, तब वह दूसरेमें कैसे रमे? इसीलिये तो प्रेमियोंके भगवान्का नाम ‘मनचोर’ है— मधुकर स्याम हमारे चोर। मन हर लियो माधुरी मूरति, निरख नयनकी कोर॥ वे प्रेमी भक्तके चित्तको ऐसी चतुरीसे चुराकर अपनी सम्पत्ति बना लेते हैं कि उसपर दूसरेकी कभी नजर भी नहीं पड़ सकती। दूसरा कोई दीखे तब न कहीं उसमें आसक्ति या प्रीति हो, परन्तु जहाँ मनमें दूसरेकी कल्पनातकको स्थान नहीं मिलता, वहाँ किसमें कैसे आसक्ति या रति हो। प्रेममयी गोपियोंने कहा है— स्याम तन स्याम मन स्याम है हमारो धन, आठों जाम ऊधौ हमें स्याम ही सों काम है॥ स्याम हिये स्याम जिये स्याम बिनु नाहिं तिये, आँधेकी-सी लाकरी अधार स्याम नाम है॥
प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २७ स्याम गति स्याम मति स्याम ही है प्रानपति, स्याम सुखदाई सों भलाई सोभाधाम है॥ ऊधौ तुम भए बौरे पाती लैके आए दौरे, जोग कहाँ राखैं यहाँ रोम-रोम स्याम है॥ जब एक प्रियतम श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरेका मनमें प्रवेश ही निषिद्ध है तब दूसरे किसीकी प्राप्तिके लिये उत्साह तो हो ही कैसे ? कोई किसीको देखे, सुने, उसके लिये मनमें इच्छा उत्पन्न हो, तब न उसके लिये प्रयत्न किया जाय ? मन किसीमें रमे, तब न उसे पानेके लिये उत्साह हो। मन तो पहलेसे ही किसी एकका हो गया; उसने मनपर अपना पूरा अधिकार जमा लिया और स्वयं उसमें आकर सदाके लिये बस गया। दूसरे किसीके लिये कोई गुंजाइश ही नहीं रह गयी; यदि कोई आता भी है तो उसे दूरसे ही लौट जाना पड़ता है! क्या करे, जगह ही नहीं रही। रोम रोम हरि रमि रहे, रही न तनिकौ ठौर। नेत्र बेचारे मनकी अनुमति बिना किसको देखें ? जब कोई कहीं दीखता ही नहीं, तब उसको पानेके लिये उत्साहकी बात ही नहीं रह जाती। दूसरी बात यह है कि उत्साह होता है मनुष्यको किसी सुखकी इच्छासे। जब समस्त सुखोंका खजाना ही अपने पास है तब क्षुद्र सुखके लिये उत्साह कैसे हो ? इसलिये प्रेमोत्साहके पुतले भगवत्प्रेमी पुरुषोंमें लौकिक कार्योंके प्रति—विषयोंके प्रति कोई भी उत्साह नहीं देखा जाता। भगवान्ने स्वयं कहा है— यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १२।१७)
२८ प्रेम-दर्शन 'जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ, अशुभ सबका त्यागी है, वह भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है।' यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति ॥ ६ ॥ ६-जिसको (परम प्रेमरूपा भक्तिको) जान (प्राप्त) कर मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध (शान्त) हो जाता है, (और) आत्माराम बन जाता है। भगवत्प्रेम प्रकट होते ही मनुष्यको पागल कर देता है; अतः प्रेमी भक्त सदा प्रेमके नशेमें चूर हुआ दिन-रात प्रभुके ही गुण गाता, सुनता और चिन्तन करता रहता है। बाहरकी दूसरी बातोंका उसे होश ही नहीं रहता। जैसे पागल मनमानी बकता और करता है, इसी प्रकार वह प्रेमोन्मत्त भी प्रभुकी चर्चामें ही तल्लीन रहता है; क्योंकि उसके मनको यही अच्छा लगता है। भागवतमें कहा है— शृण्वन् सुभद्राणि रथांगपाणे- र्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके। गीतानि नामानि तदर्थकानि गायन् विलज्जो विचरेदसंगः ॥ एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ (११।२।३९-४०) 'भक्त चक्रपाणिभगवान्के कल्याणकारक एवं लोकप्रसिद्ध जन्मों और कर्मोंको सुनता हुआ, उनके अनुसार रखे गये नामोंको
प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २९ लज्जा छोड़कर गान करता हुआ संसारमें अनासक्त होकर विचरता है। इस प्रकारका व्रत धारणकर वह अपने प्रियतम प्रभुके नाम-संकीर्तनमें प्रेम हो जानेके कारण द्रवितचित्त हुआ उन्मत्तके समान कभी अलौकिक भावसे खिलखिलाकर हँसता है, कभी रोता है, कभी चिल्लाता है, कभी ऊँचे स्वरसे गाने लगता है और कभी नाच उठता है।' यों उन्मत्तकी तरह आचरण करता हुआ प्रेमी आनन्दमें भरकर कभी चुप हो जाता है, शान्त होकर बैठ जाता है। यह स्तब्धता उसकी पूर्णकामताका परिचय देती है। प्रभुकी मूर्ति हृदयमें प्रकट हो गयी, रूपमाधुरीमें आनन्दमत्त होकर भक्त ध्यानमग्न हो गया। सुतीक्ष्णकी दशा बताते हुए गोसाईंजी कहते हैं— मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥ नृत्य करते-करते प्रभुमय बन जानेपर ऐसी ही अवस्था हुआ करती है। उसका चित्त और शरीर सर्वथा स्तब्ध—शान्त हो जाता है। आत्मा आनन्दमय बन जाता है। इसीको आत्माराम कहते हैं। इस आत्मारामस्थितिमें विषयतृष्णा तो कहीं रह ही नहीं जाती— नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति॥ अन्य किसीका भी ज्ञान नहीं रहता। यही प्रेमाद्वैत या रसाद्वैत है। प्रियतमके साथ मिलकर प्रेमीका पृथक् अस्तित्व ही लोप हो जाता है।
प्रेममें अनन्यता सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात् ॥ ७ ॥ ७-वह (प्रेमाभक्ति) कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधस्वरूपा है। यह प्रेमाभक्ति सर्वथा त्यागरूप है। इसमें धन, सन्तान, कीर्ति, स्वर्ग आदिकी तो बात ही क्या, मोक्षकी भी कामना नहीं रह सकती। जिस भक्तिके बदलेमें कुछ माँगा जाता है या कुछ प्राप्त होनेकी आशा या आकांक्षा है, वह भक्ति कामनायुक्त है, वह स्वार्थका व्यापार है। प्रेमाभक्तिमें तो भक्त अपने प्रियतम भगवान् और उनकी सेवाको छोड़कर और कुछ चाहता ही नहीं। श्रीमद्भागवतमें भगवान् कपिलदेव कहते हैं कि 'मेरे प्रेमी भक्तगण मेरी सेवा छोड़कर सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य (इन पाँच प्रकारकी*) मुक्तियोंको देनेपर भी नहीं लेते।' यथार्थ भक्तिके उदय होनेपर कामनाएँ नष्ट हो ही जाती हैं। क्योंकि वह भक्ति निरोधस्वरूपा यानी त्यागमयी है। वह निरोध क्या है? निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः ॥ ८ ॥ ८-लौकिक और वैदिक (समस्त) कर्मोंके त्यागको निरोध कहते हैं।
- पाँच प्रकारकी मुक्तियाँ ये हैं— सालोक्य—भगवान्के समान लोकप्राप्ति। सार्ष्टि—भगवान्के समान ऐश्वर्यप्राप्ति। सामीप्य—भगवान्के समीप स्थानप्राप्ति। सारूप्य—भगवान्के समान स्वरूपप्राप्ति। सायुज्य—भगवान्में लयप्राप्ति।
प्रेममें अनन्यता ३१ प्रेमा-भक्तिमें यह कर्मत्याग अपने-आप ही हो जाता है। प्रेममें मतवाला भक्त अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर अन्य किसी बातको जानता नहीं; उसका मन सदा श्रीकृष्णाकार बना रहता है, उसकी आँखोंके सामने सदा सर्वत्र प्रियतम भगवान्की छबि ही रहती है। दूसरी वस्तुमें उसका मन ही नहीं जाता। श्रीगोपियोंने भगवान्से कहा था— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) ‘हे प्रियतम! हमारा चित्त आनन्दसे घरके कामोंमें आसक्त हो रहा था, उसे तुमने चुरा लिया। हमारे हाथ घरके कामोंमें लगे थे, वे भी चेष्टाहीन हो गये और हमारे पैर भी तुम्हारे पाद- पद्मोंको छोड़कर एक पग भी हटना नहीं चाहते। अब हम घर कैसे जायँ और जाकर करें भी क्या?’ जगत्का चित्र चित्तसे मिट जानेके कारण वह भक्त किसी भी लौकिक (स्मार्त) अथवा वैदिक (श्रौत) कार्यके करने लायक नहीं रह जाता। इससे वे सब स्वयमेव छूट जाते हैं। सुन्दरदासजी ऐसे प्रेमी भक्तकी दशाका वर्णन करते हुए कहते हैं— न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै। न संक भूत-प्रेतकी, न देव-जच्छते डरै॥ सुनै न कान और की, द्रसै न और इच्छना। कहै न बात और की, सुभक्ति प्रेमलच्छना॥ कबहुँक हँसि उठि नृत्य करै रोवन फिर लागे। कबहुँक गदगद कंठ सबद निकसें नहिं आगे॥
३२ प्रेम-दर्शन कबहुँक हृदै उमंग बहुत ऊँचे सुर गावै। कबहुँक है मुख मौन गगन जैसो रहि जावै॥ चित्त बित्त हरिसों लग्यो सावधान कैसे रहै। यह प्रेमलच्छना भक्ति है, शिष्य सुनो 'सुन्दर' कहै॥ तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता च ॥ ९ ॥ ९-उस प्रियतम भगवान्में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनताको भी निरोध कहते हैं। बाहरी ज्ञान बना रहनेकी स्थितिमें भी प्रेमी भक्त अपने प्रियतमके प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उसके प्रतिकूल कार्योंसे सर्वथा उदासीन रहता है। इस प्रकार सावधानीसे होनेवाले कर्म भी निरोध कहलाते हैं। प्रेमी भक्तके द्वारा होनेवाली प्रत्येक चेष्टा अपने प्रियतमके अनुकूल होती है और अनन्य भावसे उसीकी सेवाके लिये होती है। प्रतिकूल चेष्टा तो उसके द्वारा वैसे ही नहीं होती जैसे सूर्यके द्वारा कहीं अँधेरा नहीं होता या अमृतके द्वारा मृत्यु नहीं हो सकती। अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ॥ १० ॥ १०-(अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर) दूसरे आश्रयोंके त्यागका नाम अनन्यता है। प्रेमी भक्तके मनमें अपने प्रियतम भगवान्के सिवा अन्य किसीके होनेकी ही कल्पना नहीं होती, तब वह दूसरेका भजन कैसे करे? वह तो चराचर विश्वको अपने प्रियतमका शरीर जानता है, उसे कहीं दूसरा दीखता ही नहीं— उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥ रहीम कहते हैं कि आँखोंमें प्यारेकी मधुर छबि ऐसी समा रही है कि दूसरी किसी छबिके लिये स्थान ही नहीं रह गया— प्रीतम-छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय। भरी सराय 'रहीम' लखि, आप पथिक फिरि जाय॥
प्रेममें अनन्यता ३३ गोपियोंकी सर्वत्र श्याममयी चित्तवृत्तिका वर्णन करते हुए श्रीदेवकविने कहा है— औचक अगाध सिंधु स्याहीकौ उमड़ि आयो, तामें तीनों लोक बूडि गए एक संगमें। कारे-कारे आखर लिखे जु कारे कागद सु न्यारे करि बाँचै कौन जाँचै चितभंगमें॥ आँखिनमें तिमिर अमावसकी रैन जिमि, जंबूनद-बुंद जमुना-जल-तरंगमें। यों ही मन मेरो मेरे कामकौ न रह्यो माई, स्याम रंग ह्वै करि समानो स्याम रंगमें॥ यदि कोई उससे दूसरेकी बात कहता है तो वह उसे सुनना ही नहीं चाहता या उसे सुनायी ही नहीं पड़ती। यदि कहीं जबरदस्ती सुननी पड़ती भी है तो उसका मन उधर आकर्षित होता ही नहीं। शिवजीकी अनन्योपासिका पार्वतीजीको सप्तर्षियोंने महादेवजीके अनेक दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसद्गुणसम्पन्न भगवान् विष्णुमें मन लगानेको कहा, तब शिवप्रेमकी मूर्ति भगवतीने उत्तर दिया— जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ इसी तरह गोपियोंने भी उद्धवजीसे कहा था— ऊधौ! मन मानेकी बात। दाख छोहारा छोड़ि अमृतफल बिषकीरा बिष खात॥ जो चकोरको दै कपूर कोउ तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें बँधत कमलके पात॥ ज्यों पतंग हित जानि आपनो, दीपकसों लपटात। 'सूरदास' जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥
३४ प्रेम-दर्शन इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने प्रियतम भगवान्को ही जानकर, उसीको सर्वस्व मानकर, जैसे मछलीको केवल जलका आश्रय होता है, वैसे ही केवल भगवान्का ही आश्रय लेकर सारी चेष्टाएँ उसीके लिये करता है। एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास। एक राम घनस्याम हित चातक 'तुलसीदास'॥ वह चातककी टेककी भाँति केवल भगवान्में ही चित्त लगाये, सम्पूर्णरूपसे उसीपर निर्भर करता हुआ, उसीके लिये शरीर धारण करता है। उसका खाना-पीना, सोना-बैठना, चलना-फिरना, देना- लेना, दान-पुण्य करना, सब कुछ उसीके लिये होता है। अतएव उसके समस्त कर्म भगवान्के प्रति अनन्य प्रेमभावसे सम्पन्न होनेके कारण स्वाभाविक ही कल्याणमय होते हैं। लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता ॥ ११ ॥ ११-लौकिक और वैदिक कर्मोंमें भगवान्के अनुकूल कर्म करना ही उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनता है। अनन्य भावसे भगवदर्थ कर्म करनेवालेके लिये भगवान्के प्रतिकूल कर्मोंका अपने-आप ही त्याग हो जाता है। वैदिक या लौकिक (श्रौत या स्मार्त), कोई भी ऐसा कर्म वह नहीं कर सकता जो भगवान्के अनुकूल न हो, यानी जिससे प्रेमाभक्तिकी वृद्धिमें सहायता न पहुँचती हो। पुत्रके लिये माता-पिताकी, स्त्रीके लिये स्वामीकी और शिष्यके लिये गुरुकी आज्ञा मानना वेद और लोक-धर्मके अनुसार सर्वथा कर्तव्य है; परन्तु उनकी आज्ञा भी यदि भगवत्-प्रेमसे विरुद्ध है तो प्रेमी भक्त कष्ट सहकर भी उसका त्याग कर देता है, क्योंकि उसके द्वारा अपने प्यारेके प्रतिकूल आचरण होना असम्भव है। गोस्वामीजी महाराजने उदाहरण देते हुए कहा है—
प्रेममें अनन्यता ३५ जाके प्रिय न राम-बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥ तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥ प्रह्लादने भगवान्के प्रतिकूल पिताकी आज्ञा नहीं मानी, विभीषणने भाईका साथ छोड़ दिया, भरतजी माताकी आज्ञाको टाल गये, राजा बलिने गुरु शुक्राचार्यकी बात नहीं सुनी और ब्रजवनिताओेने पतियोंकी आज्ञापर ध्यान नहीं दिया और ये सभी जगत्के लिये कल्याणकारी हुए। कर्म चार प्रकारके होते हैं—नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध। इनमें मद्य-मांस-सेवन, चोरी, व्यभिचार आदि निषिद्ध कर्म तो सभीके लिये त्याज्य हैं। शास्त्रीय काम्य (सकाम) कर्म बन्धनकारक तथा जन्म-मृत्युके चक्रमें डालनेवाले होनेके कारण ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ इस भगवत्-वचनानुसार त्याज्य हैं। रहे नित्य और नैमित्तिक कर्म, इनको लौकिक और वैदिक विधिके अनुसार फलासक्ति छोड़कर केवल भगवान्के आज्ञानुसार भगवत्-प्रीत्यर्थ करना चाहिये। भगवत्-प्रीत्यर्थ वही कर्म होते हैं जो भगवान्के प्रति प्रेम बढ़ानेवाले हों। गीताके अनुसार आसक्ति और फलाशा छोड़कर मन, वाणी और शरीरसे भगवान्के अनुकूल कर्म करना और प्रतिकूल कर्मोंका त्याग करना ही विरोधी कर्मोंमें उदासीनता है। प्रेमाभक्तिकी उन्मादमयी स्थिति प्राप्त न होनेतक ऐसे भगवदनुकूल कर्म प्रेमी भक्तके द्वारा स्वाभाविक हुआ ही करते हैं। भवतु निश्चयदाढ्र्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्॥ १२॥ १२- (विधिनिषेधसे अतीत अलौकिक प्रेमप्राप्ति करनेका मनमें) दृढ़ निश्चय हो जानेके बाद भी शास्त्रकी रक्षा करनी चाहिये। अर्थात् भगवदनुकूल शास्त्रोक्त कर्म करने चाहिये।
३६ प्रेम-दर्शन प्रेमकी बाह्यज्ञानशून्य, विधि-निषेधसे अतीत सिद्धावस्थामें लौकिक और वैदिक कर्मोंका त्याग अपने-आप ही हो जाता है, जान-बूझकर किया नहीं जाता। इसलिये जबतक प्रेमकी वैसी, सब कुछ भुला देनेवाली स्थिति प्राप्त न हो जाय तबतक प्रेमके नामपर शास्त्रविहित कर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। शास्त्रके अनुसार भगवान्के अर्पणबुद्धिसे भगवदनुकूल नित्य-नैमित्तिक कर्म और श्रवण-कीर्तनादिरूप भजन करते-करते ही भगवान्का वह परमोच्च प्रेम प्राप्त होता है। भगवान् स्वयं आज्ञा करते हैं— तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ (गीता १६। २४) अतः तुम्हारे लिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है, यह जानकर तुम्हें शास्त्रविधिके अनुसार ही कर्म करना चाहिये। अन्यथा पातित्याशंकया ॥ १३ ॥ १३-नहीं तो गिर जानेकी सम्भावना है। जो मनुष्य जान-बूझकर शास्त्रोंकी आज्ञाका पालन न करके शास्त्रके प्रतिकूल, अमर्यादित कार्य करता है और उसे प्रेमका नाम देकर दोषमुक्त होना चाहता है, वह अवश्य ही गिर जाता है। भगवान्ने स्वयं कहा है— यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ (गीता १६। २३) 'जो मनुष्य शास्त्रकी विधिको छोड़कर मनमाना स्वेच्छाचार करता है वह न सिद्धि पाता है, न परम गति पाता है और न उसे सुखकी ही प्राप्ति होती है।' जान-बूझकर शास्त्रविहित कर्मोंका
प्रेममें अनन्यता ३७
त्याग करना प्रेमका आदर्श नहीं है, मोह है, उच्छृंखलता और स्वेच्छाचार है। ऐसा करनेवाला परिणाममें आसुरी योनि, नरक और दुःखोंको ही प्राप्त होता है। लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीर- धारणावधि ॥ १४॥ १४-लौकिक कर्मोंको भी तबतक (बाह्यज्ञान रहनेतक विधिपूर्वक करना चाहिये।) पर भोजनादि कार्य जबतक शरीर रहेगा तबतक होते रहेंगे। वैदिक कर्मके साथ ही लौकिक जीविका, गृहस्थ-पालन आदिके कार्य भी सावधानीके साथ भगवदनुकूल विधिके अनुसार करने चाहिये। अवश्य ही एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें वैदिक, लौकिक कार्य अनायास ही छूट जाते हैं; परंतु उस स्थितिके प्राप्त होनेतक दोनों प्रकारके कर्म विधिवत् अवश्य करने चाहिये। फिर तो आप ही छूट जायँगे। परन्तु आहारादि कर्म उस अवस्थामें भी रहेंगे। कारण, वे शरीरके लिये आवश्यक हैं। यद्यपि प्रेमके नशेमें चूर भक्त आहारादिके लिये न तो कोई इच्छा करता है और न चेष्टा ही करता है, परन्तु आहारादि प्राप्त होनेपर अभ्यासवश अनायास ही उसके द्वारा आहार कर लिया जाता है। अवश्य ही वह भी भगवत्प्रसाद ही होता है। 🔲 🔲