भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

हो, यदि मैं आगामी जन्ममें इस वृन्दावनकी लता, ओषधि या झाड़ियोंमेंसे कोई होऊँ, जिनपर इन गोपियोंकी चरणधूलि पड़ती है।' मथुराकी कुलांगनाओंने गोपियोंकी दशाका वर्णन करके उनके जीवनको धन्य बताते हुए कहा है— या दोहनेऽवहने मथनोपलेप- प्रेङ्खेङ्खनार्भयरुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।४४।१५) 'जो गोपियाँ गायोंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको झुलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें छिड़काव करते तथा झाडू देते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे, आँखोंमें आँसू भरे, गद्गद वाणीसे श्रीकृष्णके गुणगान किया करती हैं, उन श्रीकृष्णमें चित्त निवेशित करनेवाली गोपरमणियोंको धन्य है!' इन गोपियोंकी जितनी महिमा गायी जाय, उतनी ही थोड़ी है। सर्वत्यागी व्रजवासी भक्तोंने तो गोपीपद-पंकजपराग ही बनना चाहा है। सत्य ही कहा है— गोपी प्रेमकी धुजा। जिन घनस्याम किये बस अपने उर धरि स्यामभुजा॥ महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव-सदृश महान् त्यागी महापुरुषोंने तो गोपियोंको प्रेममार्गका गुरु माना है। महान् भक्त श्रीनागरीदासजी कहते हैं— जयति ललितादि देवीय व्रज श्रुतिरिचा, कृष्ण प्रिय केलि आधीर अंगी। जुगल-रस-मत्त आनंदमय रूपनिधि, सकल सुख समयकी छाँह संगी॥

४८ प्रेम-दर्शन गौरमुख हिमकरनकी जु किरनावली, स्रवत मधु गान हिय पिय तरंगी। 'नागरी' सकल संकेत आकारिनी, गनत गुनगननि मति होति पंगी॥ एक व्रजभक्तने कहा है— ये हरिरस ओपी गोपी सब तियतें न्यारी। कमलनयन गोविंदचंदकी प्रानपियारी॥ निरमत्सर जे संत तिनहिं चूड़ामनि गोपी। निरमल प्रेम प्रबाह सकल मरजादा लोपी॥ जे ऐसे मरजाद मेटि मोहन गुन गावैं। क्यों नहिं परमानंद प्रेमभगती सुख पावैं॥ गोपियोंकी महिमा तभी कुछ समझमें आ सकती है, जब साधक विषयोंसे परम वैराग्य धारणकर प्रेमपथपर कुछ अग्रसर होता है। तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः ॥ २२॥ २२-इस अवस्थामें भी (गोपियोंमें) माहात्म्यज्ञानकी विस्मृतिका अपवाद नहीं। अर्थात् गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्णके प्रभाव, रहस्य और गुणोंको जानती थीं। कुछ लोगोंका कहना है कि प्रेममें माहात्म्यज्ञान नहीं रहता। माहात्म्यज्ञान होगा तो प्रेम नहीं रहेगा, परन्तु गोपियोंमें ऐसी बात नहीं थी। गोपियाँ श्रीकृष्णको साक्षात् पुरुषोत्तमभगवान् जानती हुई ही अपना प्रियतम समझती थीं। लौकिक प्रेम और भगवत्प्रेममें यही खास भेद है। भगवत्प्रेममें वस्तुतः ऐसा ही होता है। जो लोग कहते हैं कि गोपियाँ श्रीकृष्णको भगवान् नहीं जानती थीं, वे श्रीमद्भागवतके नीचे लिखे श्लोकोंका मनन करें— मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं संत्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम्।

प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४९ भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान् देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून्॥ यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरंग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम्। अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा॥ यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य। अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमंग स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः॥ श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (१०।२९।३१-३२, ३६-३७) व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता। (१०।२९।४१) न खलु गोपिकानन्दनो भवा- नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले॥ (१०।३१।४) 'हे विभो! आप ऐसे कठोर शब्द (वापस जानेकी बात) न कहिये। हमने अन्य सम्पूर्ण विषयोंको छोड़कर एकमात्र आपके ही चरणकमलोंका आश्रय लिया है। हे स्वच्छन्द! जिस प्रकार

५० प्रेम-दर्शन आदिपुरुष श्रीनारायण मुमुक्षुओंको भजते हैं, (उनके इच्छानुसार उन्हें स्वीकार करते हैं) उसी प्रकार आप हमें अंगीकार कीजिये, त्यागिये नहीं। हे हरि! आप धर्मको जाननेवाले हैं (फिर आप कैसे कहते हैं कि तुमलोग लौट जाओ, आपकी शरण आनेपर भी क्या कोई कभी वापस लौटता है)। आपने जो कहा कि पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंकी सेवा करना ही स्त्रियोंका परम धर्म है, सो यह उपदेश उपदेशके स्थान आप ईश्वरके विषयमें ही रहे; क्योंकि समस्त देहधारियोंके प्रियतम बन्धु और आत्मा तो आप ही हैं। हे कमललोचन! जिस समय श्रीलक्ष्मीजीको (श्रीविष्णुरूपमें) कभी-कभी आनन्दित करनेवाले आपके चरण- कमलोंको हमने स्पर्श किया था और वनवासी तपस्वियोंके प्रिय आपने हमें आनन्दित किया था, तभीसे हमारे लिये अन्यत्र कहीं ठहरना असम्भव हो गया है। जिनकी कृपादृष्टि पानेके लिये देवगण अत्यन्त प्रयास करते हैं, वे लक्ष्मीजी बिना किसी प्रतिद्वन्द्वीके आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी तुलसीजीके सहित अन्य भक्तोंसे सेवित आपकी चरणरजकी इच्छा करती हैं, हम भी निस्सन्देह आपकी उसी चरणरजकी ही शरणमें आयी हैं। क्योंकि देवताओंकी रक्षा करनेवाले आप आदिपुरुष परमात्मा ही व्रजमण्डलका भय और दुःख दूर करनेके लिये प्रकट होकर अवतीर्ण हुए हैं। यह निश्चय है कि आप केवल यशोदाके ही पुत्र नहीं हैं, वरं समस्त देहधारियोंके अन्तरात्माके साक्षी हैं। हे सखे! ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही आपने सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करनेके लिये यदुकुलमें अवतार लिया है।' ऐसे अनेकों प्रमाणोंसे तथा युक्तियोंसे यह सर्वथा सिद्ध है कि गोपियोंने श्रीकृष्णको साक्षात् सच्चिदानन्दघन भगवान् समझकर ही उन्हें आत्मसमर्पण किया था।

प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ५१ तद्विहीनं जाराणामिव ॥ २३ ॥ २३-उसके बिना ( भगवान्‌को भगवान् जाने बिना किया जानेवाला ऐसा प्रेम ) जारोंके ( प्रेमके ) समान है। माहात्म्यज्ञान बिना स्त्रियोंके द्वारा किसी पुरुषके प्रति किया जानेवाला ऐसा प्रेम जारोंका-सा प्रेम होता है। जिस प्रेममें सर्वार्पण है, जिसमें लौकिक स्वार्थकी तनिक-सी गन्ध भी नहीं है, ऐसा प्रेम केवल भगवान्‌के प्रति ही हो सकता है। यद्यपि जाने-अनजाने किसी प्रकार भी भगवान्‌के प्रति किया हुआ प्रेम निष्फल नहीं होता, परन्तु जानकर होनेवाले प्रेममें विशेषता होती है। भगवान् हमारे प्रियतम हैं, इस कल्पनामें ही कितना अपार आनन्द है। फिर जिनको वे भगवान् परम प्रियतमरूपमें प्राप्त हो जायँ, उनके सुखका तो कहना ही क्या है ? गोपियाँ इसी परम पवित्र दिव्य सुखकी भागिनी थीं। इसीसे जीवन्मुक्त महात्मा शुकदेव मुनिने मृत्युके लिये तैयार हुए राजा परीक्षित्‌को यह पवित्र प्रेमलीला सुनायी थी। अतएव यह प्रेम भगवत्-माहात्म्यके ज्ञानसे युक्त परम पवित्र था। नास्त्येव तस्मिंस्तत्सुखसुखित्वम् ॥ २४ ॥ २४-उसमें ( जारके प्रेममें ) प्रियतमके सुखसे सुखी होना नहीं है। व्यभिचारी मनुष्य कामवश होकर केवल अपने सुखके लिये, अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये प्रीति किया करते हैं; वे अपने प्रेमास्पदके सुखसे सुखी नहीं होते। गोपियोंके प्रेममें यह भाव नहीं था। लौकिक कामजनित प्रीतिमें प्रेमास्पद पुरुष जार होता है और उसके अंग-संगकी इच्छा होती है। यहाँ प्रेमास्पद साक्षात् विश्वात्मा भगवान् थे और गोपियोंके मनोंमें अंग-संगकी कामना नहीं थी। गोपियाँ केवल श्रीकृष्ण-सुखकी अभिलाषिणी थीं। उन्होंने अपना तन, मन, बुद्धि, रूप, यौवन, धन, प्राण आदि सम्पूर्ण वस्तुओंको प्रियतम श्रीकृष्णकी पूजन-सामग्री बना दिया था। अपना सर्वस्व

५२ प्रेम-दर्शन देकर वे श्रीकृष्णको सुख पहुँचाना चाहती थीं। जिस बातमें श्रीकृष्णकी प्रसन्नता होती, वही करना उनका धर्म था। उसीमें उन्हें परम सुखकी अनुभूति होती थी। इसके अतिरिक्त उनके मनमें अन्य प्रकारसे होनेवाले सुखकी कामना तो दूर रही, कल्पना भी नहीं थी। यही तो काम और प्रेमका अन्तर है। काम चाहता है दूसरेके द्वारा अपने सुखी होना, और प्रेम चाहता है अपने द्वारा प्रियतमको सुखी करना और उसे सुखी देखकर ही सुखी होना। श्रीचैतन्यचरितामृतमें गोपियोंके प्रेमका वर्णन करते हुए बहुत ही ठीक कहा गया है— आत्मेन्द्रिय प्रीति-इच्छा, तार नाम काम। कृष्णेन्द्रिय प्रीति-इच्छा धरे प्रेम नाम॥ कामेर तात्पर्य निज संभोग केवल। कृष्ण-सुख तात्पर्य प्रेम तो प्रबल॥ आत्म-सुख-दुःख गोपी ना करे विचार। कृष्ण-सुख-हेतु करे सब व्यवहार॥ लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म कर्म। लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख मर्म॥ सर्व त्याग करये करे कृष्णेर भजन। कृष्णसुख हेतु करे प्रेमेर सेवन॥ इहाके कहिये कृष्णे दृढ़ अनुराग। स्वच्छ धौत वस्त्र जैसे नाहिं कोन दाग॥ अतएव काम प्रेमे बहुत अंतर। काम अंधतम प्रेम निर्मल भास्कर॥ अतएव गोपीगणे नाहि कामगंध। कृष्णसुख हेतु मात्र कृष्णेर संबंध॥ भगवान् श्रीकृष्णको सर्वस्व अर्पण, पलभरके लिये भूल जानेमें परम व्याकुलता, श्रीकृष्णके प्रभाव और माहात्म्यका सम्यक् ज्ञान और श्रीकृष्णके सुखमें ही सुखी होना, यही चार बातें गोपी-प्रेममें मुख्य हैं। यह गोपी-प्रेम परम पवित्र और अलौकिक है। इसमें जो पाप या व्यभिचार देखते हैं, उनपर श्रीकृष्ण दया करें। ☐ ☐

प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा ॥ २५ ॥ २५-वह (प्रेमरूपा भक्ति) तो कर्म, ज्ञान और योगसे भी श्रेष्ठतर है। कर्म, ज्ञान और योग तीनों ही भगवत्प्राप्तिके साधन हैं, परन्तु भक्ति इन तीनोंमें सबसे श्रेष्ठ है। उनमें वर्ण, आश्रम, अधिकार आदिका विचार है; साथ ही गिरनेका भय भी है, परन्तु सच्ची भक्तिमें भगवान्‌की पूरी सहायता रहनेके कारण कोई भी भय नहीं है तथा इसमें स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभीका अधिकार है। गोसाईं तुलसीदासजी महाराज कहते हैं— जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥ सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥ ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥ उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम। राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम॥ पन्नगारि सुनु प्रेम सम भजन न दूसर आन। यह बिचारि मुनि पुनि पुनि करत राम गुन गान॥ स्वयं श्रीभगवान् कहते हैं— न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥ भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्। भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।२०-२१) 'जिस प्रकार मेरी दृढ़भक्ति मुझे वश करती है, उस प्रकार

५४ प्रेम-दर्शन मुझको योग, ज्ञान, धर्म, स्वाध्याय, तप और त्याग वशमें नहीं कर सकते। सन्तोंका प्रिय आत्मारूप मैं केवल श्रद्धायुक्त भक्तिके द्वारा वशमें हो सकता हूँ, मेरी भक्ति चाण्डाल आदिको भी पवित्रहृदय बनानेमें समर्थ है।' इसी प्रकार श्रीभगवान्ने गीतामें भी कहा है— नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥ (११।५३-५४) 'हे अर्जुन! जैसा तुमने मुझको देखा है, ऐसा वेद, तप, दान, यज्ञ आदिसे मैं नहीं देखनेमें आता। हे परंतप अर्जुन! अनन्यभक्तिके द्वारा ही इस प्रकार मेरा देखा जाना, मुझे तत्त्वसे जानना और मुझमें प्रवेश पाना सम्भव है।' फलरूपत्वात् ॥ २६ ॥ २६-क्योंकि (वह भक्ति) फलरूपा है। वस्तुतः यह भक्ति फलरूपा है, साधन नहीं है। जो भक्ति ज्ञानका साधन मानी जाती है, वह गौणी भक्ति साधारण उपासना है, प्रेमरूपा भक्ति नहीं है। प्रेमरूपा भक्ति तो समस्त साधनोंका फल है। तीर्थाटन साधन समुदाई जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥ नाना कर्म धर्म ब्रत दाना संजम दम जप तप मख नाना॥ भूत दया द्विज गुर सेवकाई बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥ जहाँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥ ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च ॥ २७ ॥ २७-ईश्वरको भी अभिमानसे द्वेषभाव है और दैन्यसे प्रियभाव है।

प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है ५५ कर्म, ज्ञान और योगके साधकोंको अपने बलका और साधनका अभिमान हो सकता है। भगवान्‌का तो नाम ही दर्पहारी है। यद्यपि वस्तुतः भगवान्‌का न किसीमें द्वेष है, न राग है। उनके लिये सभी समान हैं। वे सभीका उद्धार करते हैं। हाँ, उद्धारके साधन भिन्न-भिन्न हैं। अभिमानीका उद्धार उसे दण्ड देकर करते हैं और दीन सेवकका उसे प्रेमसे गले लगाकर। इसीसे भगवान्‌के क्रोधको भी वरके तुल्य बतलाया गया है। अभिमानीके प्रति भगवान् द्वेषीकी-सी लीला करते हैं और दीनके साथ प्रेमीकी- सी। इसीसे दीनबन्धु, अशरण-शरण और ‘कंगालके धन’ आदि उनके नाम हैं। यथार्थमें तो अभिमानीके प्रति भी उनके हृदयमें प्रेम ही होता है, इसीलिये तो वे उसका अभिमान नष्ट करते हैं। सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥ ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी॥ इतना होनेपर भी दण्डमें द्वेष दीखता ही है, परन्तु दीन अमानी गरीबको तो आप हृदयसे लगा लेते हैं। उसका छोटे- से-छोटा काम करनेमें भी नहीं सकुचाते। भक्तजन तो स्वाभाविक ही अपनेको किंकर समझते हैं, वे कहते हैं— सर्वसाधनहीनस्य पराधीनस्य सर्वथा। पापपीनस्य दीनस्य कृष्ण एव गतिर्मम॥ ‘हे प्रभो! मुझ समस्त साधनोंसे हीन, मायाके सर्वथा पराधीन हुए, पापोंसे लदे हुए दीनकी तो केवल तुम ही गति हो।’ जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतितपावन जग, केहि अति दीन पियारे॥ यह दीनता उस अभावकी स्थितिका नाम नहीं है, जिसमें मनुष्य धन, मान, वैभव आदिके अभावसे ग्रस्त होकर उनकी प्राप्तिके

५६ प्रेम-दर्शन लिये व्याकुल रहा करता है। यह दीनता तो उस निरभिमानता और अहंकारशून्यताका नाम है, जो बड़े-से-बड़े वैभवशाली सम्राट्‌को भी भगवत्कृपासे प्राप्त हो सकती है। इस दीनताका अर्थ है अभिमान और कर्तृत्व-अहंकारका नाश हो जाना। यह समझना कि मैं और मेरा कुछ भी नहीं है, जो कुछ है सो सब भगवान् है और सब भगवान्‌का है, सब कुछ उन्हींकी शक्ति और प्रेरणासे होता है, करने- करानेवाले वे ही हैं। परन्तु भगवान्‌की प्यारी यह सच्ची दीनता सहज ही नहीं प्राप्त होती। अभिमानका सारा भूत उतरे बिना दीनता नहीं आती। वर्ण, जाति, धन, मान, विद्या, साधन, स्वास्थ्य आदिका अभिमान और कर्तापनका अहंकार मनुष्यमें ऐसी दीनता उत्पन्न नहीं होने देता; ऊपरसे मनुष्य दम्भपूर्वक दीन बनता है, भगवान्‌के सामने अपनेको दीन कहता है, रोनेका स्वाँग भरता है; परन्तु उसकी दीनताकी परीक्षा तो तभी होती है, जब बड़े-से-बड़े सांसारिक पदार्थों और साधनोंकी प्राप्तिमें भी स्वाभाविक दीनता ज्यों-की-त्यों बनी रहे। जो सब लोगोंके सामने अपनेसे हीन स्थितिके दूसरे मनुष्योंद्वारा दीन और पापी कहा जाना केवल सह ही नहीं लेता, वरं उसे सत्य समझकर प्रसन्न होता है और प्रभु-प्राप्तिके लिये सदैव जिसका चित्त खिन्न रहा करता है, ऐसे ही खिन्न-दीन भगवान्‌को प्यारे होते हैं। सच्ची भक्तिमें अपने पुरुषार्थ या साधनका अभिमान आ ही नहीं सकता, इसीलिये भक्ति श्रेष्ठ है। तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके ॥ २८ ॥ २८-उसका (भक्तिका) साधन ज्ञान ही है, किन्हीं (आचार्यों)-का यह मत है। यद्यपि भक्तिमें इस ज्ञानकी तो परम आवश्यकता है कि मैं जिसकी भक्ति करता हूँ वे ही सबके स्वामी, सबके आधार,

प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है ५७ सबके महेश्वर, जगत्के उत्पन्न, पालन और संहार करनेवाले, मायाके पति, अज, अविनाशी, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वात्मा, निर्गुण, निर्विकार, निराकार, सगुण, साकार भगवान् हैं, उनसे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं। क्योंकि इतना ज्ञान भी यदि न होगा तो श्रद्धा नहीं होगी; श्रद्धा बिना प्रीति नहीं होगी और प्रीति बिना भक्ति दृढ़ नहीं होगी। जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥ प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥ परन्तु इसमें अद्वैतज्ञानके साधनकी आवश्यकता नहीं होती। केवल श्रद्धा और भावसे ही परमात्माकी भक्ति प्राप्त हो जाती है। गृध्रराज, गजेन्द्र, ध्रुव, शबरी आदिने केवल भगवान्‌की ऐसी ही भक्तिसे भगवान्‌को प्राप्त किया था। अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये ॥ २९ ॥ २९-दूसरे (आचार्यों)-का मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक-दूसरेके आश्रित हैं। ऐसा भी होता है। गौणी भक्तिसे भगवान्‌के तत्त्वका ज्ञान होता है और तत्त्वके जाननेसे भगवान्‌में अत्यन्त प्रेम उत्पन्न होता है। परन्तु केवल भक्तिके प्रेमीजन इस मतकी परवा नहीं करते। क्योंकि वे इस बातको जानते हैं कि जब निर्मल प्रेमस्वरूपा भक्तिका पूर्ण उदय होता है तब किसीका ज्ञान अलग रह ही नहीं जाता। प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों एक हो जाते हैं। फिर किसका ज्ञान किसको होगा ? स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः * ॥ ३० ॥ ३०-ब्रह्मकुमारोंके (सनत्कुमारादि और नारदके) मतसे भक्ति स्वयं फलरूपा है।

  • पाठभेद 'ब्रह्मकुमारः'।

अतएव यह भक्ति ही साधन है और भक्ति ही साध्य है। मूल भी वही और फल भी वही। भक्तगण भक्तिके लिये ही भक्ति करते हैं। क्योंकि भक्ति स्वयं फलरूपा है। वह न किसी साधनसे मिलती है और न कोई उससे श्रेष्ठ वस्तु है जिसकी प्राप्तिका वह साधन हो। सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥ राजगृहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात् ॥ ३१ ॥ ३१-राजगृह और भोजनादिमें ऐसा ही देखा जाता है। यह पूर्वकथित भक्तिकी फलरूपताको समझनेके लिये उदाहरण है। न तेन राजपरितोषः क्षुधाशान्तिर्वा ॥ ३२ ॥ ३२-न उससे (जान लेनेमात्रसे) राजाकी प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी। केवल राजमहलका वर्णन सुनने और जान लेनेसे काम नहीं चलता। राजा धर्मात्मा है, शक्तिशाली है, प्रजाहितैषी है, रूपगुणसम्पन्न है, यह बात भी जान ली; परन्तु इससे क्या हुआ, इस जाननेमात्रसे राजा प्रसन्न थोड़े ही हो गया। इसी प्रकार जान लिया कि हलवा मीठा होता है, घी और शक्करसे बनता है, बड़ा स्वादिष्ट है; परन्तु इससे भूख तो नहीं मिटती। इसी तरह केवल शब्दज्ञानसे न तो भगवान्‌की प्रसन्नता होती है और न हमें शान्ति ही मिलती है। यद्यपि भगवान्‌के लिये सभी समान हैं तथापि उनकी प्रसन्नता तो भक्तिसे ही मिलती है। वे स्वयं कहते हैं— समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ (गीता ९।२९)

प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है ५९ 'मैं सब भूतोंमें सम हूँ, न कोई मेरा द्वेष्य है और न प्रिय है; परन्तु जो मुझको भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।' तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः ॥ ३३ ॥ ३३-अतएव (संसारके बन्धनसे) मुक्त होनेकी इच्छा रखनेवालोंको भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिये। भक्तिसे भवबन्धन तो अनायास कट ही जाता है, साक्षात् भगवान् उसके प्रेमास्पद बनकर उसके साथ दिव्य लीला करते हैं। अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥ राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआई॥ अन्यान्य बड़े-बड़े साधनोंसे भी सहजमें न मिलनेवाली अति दुर्लभ मुक्ति बिना ही माँगे बलात् आती है, परन्तु वह भक्त तो— मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ मुक्तिकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखता। ऐसी सुलभ और सर्वोपरि स्थितिरूप भक्तिको छोड़कर दूसरे साधनको कोई क्यों करे? श्रद्धालु और बुद्धिमान् पुरुषोंको केवल भक्ति ही करनी चाहिये। ☐ ☐

प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः ॥ ३४ ॥ ३४-आचार्यगण उस भक्तिके साधन बतलाते हैं। कर्म और ज्ञानकी अपेक्षा भक्तिकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करके अब देवर्षि नारद भक्तिशास्त्रके प्रधान प्रवर्तक और भक्ति- तत्त्वके अनुभवी आचार्यों एवं सन्त-भक्तोंद्वारा गान किये हुए उस श्रेष्ठतम भक्तिके साधनोंका वर्णन करते हैं। तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च ॥ ३५ ॥ ३५-वह ( भक्ति-साधन ) विषयत्याग और संगत्यागसे सम्पन्न होता है। जीवके मनमें स्वाभाविक ही प्रेमका स्रोत है, क्योंकि जीव परमानन्दस्वरूप परमप्रेमरूप भगवान्‌का ही सनातन चिदंश है। परन्तु विषयोंके प्रति प्रवाहित होनेसे उसके प्रेमकी धारा दूषित हो गयी है और इसीसे वह प्रेम दुःख उत्पन्न करनेवाले कामके रूपमें परिणत हो रहा है और इसी कारण उसके परमात्ममुखी दिव्य स्वरूपका प्रकाश नहीं होता। प्रेमके दिव्य स्वरूपके प्रकाशके लिये उसकी विषयाभिमुखी गतिको पलटकर ईश्वराभिमुखी करनेकी आवश्यकता है। इसके लिये दो उपाय हैं—१-विषयोंका स्वरूपसे त्याग और २-विषयोंकी आसक्तिका त्याग। जो लोग यह मानते हैं कि विषयोंमें आसक्त रहते और यथेच्छ अमर्यादित विषयोंका संग्रह एवं उपभोग करते हुए ही भगवान्‌की भक्ति प्राप्त हो जायगी अथवा भगवद्भक्तिके मार्गमें विषय और विषयासक्तिके त्यागकी कोई आवश्यकता ही नहीं है, वे बहुत बड़ी भूलमें हैं। भक्तिमें तो अपने भोगके लिये कोई

प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६१


वस्तु रह ही नहीं जाती; जब भोक्ता ही कोई नहीं रहता, तब भोग्य वस्तु कहाँसे रहे? वहाँ तो एकमात्र प्राणाधार भगवान् ही सर्वभोक्ता हैं और हम अपने समस्त अंगों एवं समस्त सामग्रियोंसहित भगवान्के भोग्य हैं। एकमात्र वे ही पुरुष हैं और सब उनकी भोग्या प्रकृति हैं। ऐसी अवस्थामें भक्तका अपना कोई भोग्य विषय रह ही नहीं जाता। इसको यदि ऊँची स्थिति कहकर कोई इससे बचना चाहे तो उसे भी साधनकालमें विषयोंका और विषयासक्तिका यथासाध्य उत्तरोत्तर त्याग करना ही पड़ता है। शरीर विषयभोगमें लगा होगा और मन विषयोंमें आसक्त रहेगा, तो फिर प्रियतम भगवान्की सेवा किस तन-मनसे होगी? अतएव विषय-त्यागकी बड़ी भारी आवश्यकता है। बाह्य भोग तो क्या, मनसे भी विषयोंका चिन्तन छोड़ना पड़ेगा; क्योंकि यह नियम है कि मन जिस वस्तुका चिन्तन करेगा, उसीमें उसकी आसक्ति होगी। भगवान्ने श्रीमद्भागवतमें कहा है— विषयान् ध्यायताश्चित्तं विषयेषु विषज्जते। मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥ अर्थात् 'विषयोंका चिन्तन करनेसे मन विषयोंमें आसक्त होता है और मेरा बार-बार स्मरण करनेसे वह मुझमें लीन हो जाता है।' मनको जहाँ लगाओ वहीं लग जाता है और वह लगाना होता है इन्द्रियोंके द्वारा ही; हम बार-बार जिस प्रकारके दृश्योंको देखेंगे, जैसी बात सुनेंगे, जैसी चीज खायेंगे, जो कुछ सूँघेंगे, जैसी वस्तुका स्पर्श करेंगे, उन्हींका मनमें बार-बार चिन्तन होगा और जिस वस्तुका अधिक चिन्तन होगा, उसीमें आसक्ति होगी। नाटक देखेंगे, वेश्याका गाना सुनेंगे, उनमें आसक्ति होगी; भक्त- लीला देखेंगे, कीर्तन सुनेंगे तो उनमें आसक्ति होगी। अतएव भक्तिकी अभिलाषा रखनेवालोंको भगवान्के प्रतिकूल तमाम

६२ प्रेम-दर्शन विषयोंका त्याग करना चाहिये। वास्तवमें इस सूत्रमें विषयत्यागमें उन्हीं विषयोंका त्याग समझना चाहिये जो हमारे मनको भगवान्‌से हटाकर भोगोंमें—जगत्-प्रपंचमें लगा देते हैं। ध्यान, चिन्तन, कीर्तन, भगवत्सेवा, साधुसत्कार, सत्संग आदि जो भगवदनुकूल विषय हैं, उनमें तो तन-मनको चाह करके लगाना चाहिये और जिन विषयोंके संग्रह और सेवनकी शरीरयात्रा या कुटुम्बपोषणके लिये नितान्त आवश्यकता हो, उनका भी यथासम्भव बहुत ही थोड़े परिमाणमें संग्रह और सेवन करना चाहिये और वह भी शास्त्रानुकूल तथा ईश्वरकी आज्ञा समझकर अन्य किसी भी फल-कामनाको मनमें स्थान न देते हुए केवल ईश्वर-प्रीत्यर्थ ही। इस प्रकारसे किया हुआ विषय-सेवन भी विषयत्यागके ही तुल्य समझा जाता है। केवल बाहरसे किसी विषयका त्याग कर दिया जाय और मनमें उसका स्मरण बना रहे, तो वह यथार्थ त्याग नहीं है; इसीलिये सूत्रमें विषयत्यागके साथ-ही-साथ आसक्तित्यागकी भी आवश्यकता बतलायी गयी है। महाभारतमें कहा है— त्यागः स्नेहस्य यत्त्यागो विषयाणां तथैव च। (शान्तिपर्व १९२। १७) 'विषयासक्ति और विषय दोनोंके त्यागका नाम ही त्याग है।' इसीसे विषयानुरागका त्याग होगा और विषयानुरागसे रहित हृदय ही भगवत्प्रेमका दिव्य धाम बन सकता है। भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होनेपर तो विषयका त्याग स्वाभाविक ही रहता है। श्रीरामचरितमानसमें कहा है— रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥ अमृतके स्वादको चख लेने और उसके गुणसे लाभ उठा लेनेपर फिर विषकी ओर किसीकी नजर ही क्यों जाने लगी!

प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६३ परन्तु उस अमृतकी प्राप्तिके लिये भी—उसकी ओर गति होनेके लिये भी विषयविषके त्यागकी आवश्यकता है। विषयासक्तिका त्याग करके भगवान्‌में आसक्त होनेमें ही परम सुख है। भगवान् कहते हैं— मय्यर्पितात्मनः सभ्य निरपेक्षस्य सर्वतः। मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत्कुतः स्याद्विषयात्मनाम्॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१२) ‘मुझमें चित्त लगानेवाले और समस्त विषयोंकी अपेक्षा छोड़नेवाले भक्तको आत्मस्वरूप मुझसे जो परम सुख मिलता है, वह सुख विषयासक्तचित्त लोगोंको कहाँसे मिल सकता है?’ अव्यावृत्तभजनात् ॥ ३६ ॥ ३६–अखण्ड भजनसे (भक्तिका साधन सम्पन्न होता है)। भजन भक्तिका प्रधान अंग है, यह साध्य और साधन दोनों है। जो भगवत्प्रेमको प्राप्त कर चुके हैं, उनके लिये अखण्ड भजन स्वाभाविक हो जाता है और जिनको भगवत्प्रेमकी प्राप्ति करनी है उनको अखण्ड भजनका अभ्यास करना चाहिये। जो मनुष्य भजन बिना मुक्ति और भगवत्प्रेमकी प्राप्ति चाहता है वह भूलता है। गोसाईं श्रीतुलसीदासजी महाराज कहते हैं— बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥ ‘जलके मन्थनसे चाहे घी निकल आवे, बालूसे चाहे तेल निकले; परन्तु भगवान्‌के भजन बिना भवसागरसे मनुष्य नहीं तर सकता, यह सिद्धान्त अकाट्य है।’ अतएव भजन तो अनिवार्य साधन है। फिर भक्तिके साधकके लिये तो यही एक खास वस्तु है। विषयसे मन हटाकर यदि भगवान्‌में न लगाया जाय तो वह वापस दौड़कर वहीं चला जायगा। विषयत्याग वैराग्य है और भगवत्-भजन अभ्यास।

२. द्वितीय प्रकरण: भक्ति के साधन, अहंकार-त्याग एवं सत्संग महिमा (सूत्र २५-५०)

६४ प्रेम-दर्शन इन्हीं अभ्यास-वैराग्यसे विशुद्ध भगवत्प्रेमकी प्राप्ति होती है। परन्तु जो भजन अभी होता है, घड़ीभर बाद नहीं होता; आज किया, कल नहीं—वह प्रेम और आदरयुक्त अखण्ड भजन नहीं है। भजनरूपी अभ्यास तो वही सिद्ध होता है जो सदा होता रहे। सतत होता रहे और सत्कारपूर्वक हो। योगदर्शनमें महर्षि पतंजलि कहते हैं— स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः। (१।१४) 'दीर्घकालपर्यन्त निरन्तर सत्कारके साथ करनेपर ही अभ्यास दृढ़ होता है।' इस नित्य-निरन्तरके अखण्ड स्मरणसे भगवान्‌की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। स्वयं भगवान्‌ने भी गीतामें कहा है— अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ (८।१४) 'हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मुझको स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।' अतएव अखण्डरूपसे भगवान्‌का प्रेमपूर्वक चिन्तन करते हुए ही स्नान, भोजन, व्यापार आदि सब काम करने चाहिये। भगवत्-स्मरणयुक्त होनेसे प्रत्येक कार्य ही भजन हो जायगा। इस प्रकार भजनका ताँता क्षणभर भी नहीं टूटना चाहिये। स्वरूपका चिन्तन न हो सके तो निरन्तर भगवान्‌का नामस्मरण ही करना चाहिये। भगवान्‌के नामस्मरणसे मन और प्राण पवित्र हो जायँगे और भगवान्‌के पावन पदकमलोंमें अनन्य प्रेम उत्पन्न हो जायगा। नाम-जपकी सहज विधि यह है कि अपने श्वास- प्रश्वासके आने-जानेकी ओर ध्यान रखकर श्वास-प्रश्वासके

प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६५ साथ-ही-साथ मनसे और साथ ही धीमे स्वरसे वाणीसे भी भगवान्‌का नाम-जप करता रहे। यह साधन उठते-बैठते, चलते- फिरते, सोते, खड़े रहते, सब समय किया जा सकता है। अभ्यास दृढ़ हो जानेपर चित्त विक्षेपशून्य होकर निरन्तर भगवान्‌के चिन्तनमें अपने-आप ही लग जायगा। प्रायः सभी प्रसिद्ध भक्तों और सन्तोंने इस साधनका प्रयोग किया था। महात्मा चरणदासजी कहते हैं— स्वासा माहीं जपे तें दुबिधा रहे न कोय। इसी प्रकार कबीरजी कहते हैं— साँस साँस सुमिरन करौ, यह उपाय अति नीक। मतलब यह कि भगवान्‌के स्वरूप, प्रभाव, रहस्य, गुण, लीला अथवा नामका चिन्तन निरन्तर तैलधाराकी भाँति होते रहना चाहिये। यही अखण्ड भजन है। लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्त्तनात् ॥ ३७ ॥ ३७-लोकसमाजमें भी भगवत्-गुण-श्रवण और कीर्तनसे (भक्ति-साधन सम्पन्न होता है)। मनसे तो नित्य भगवान्‌का चिन्तन करना ही चाहिये, परन्तु कान और वाणीसे भी सदा-सर्वदा लोगोंके बीचमें भी भगवान्‌का गुण ही सुनना और कहना चाहिये। मनसे भगवत्-चिन्तनकी चेष्टा तभी सफल होती है, जब हमारी इन्द्रियाँ भी भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें ही लगी रहें। सभी कार्योंका प्रायः आधार होता है सुनना और बोलना। यदि कानोंमें सदा विषयोंकी चर्चा आती रहेगी और वाणीसे सदा विषयोंकी बातें की जायँगी तो मनसे भगवान्‌का चिन्तन होना असम्भव-सा ही समझना चाहिये। परन्तु यदि कान और जबान भगवान्‌में लगे रहेंगे—उन्हें दूसरे कार्यके लिये फुरसत ही नहीं मिलेगी, तो अन्यान्य इन्द्रियाँ और मन भी

६६ प्रेम-दर्शन स्वतः ही भगवत्परायण हो जायँगे। अतएव कान और जीभको भगवान्‌के नाम-गुण-लीलादिके सुनने और गानेमें ही निरन्तर लगाये रखना चाहिये। यही जीवनको सफल बनानेके साधन हैं। केवल जीवित रहने, श्वास लेने, खाने और मैथुन करने आदिमें ही जीवनकी सफलता मानी जाय तो क्या वृक्ष जीवित नहीं रहते ? क्या लोहारकी धोंकनी श्वास नहीं लेती और क्या पशु भोजन या मैथुन नहीं करते। इसीलिये श्रीमद्भागवतमें कहा गया है— श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः। न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः॥ बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य। जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः॥ (२।३।१९-२०) ‘जिसके कर्णपथमें भगवान्‌के नाम-गुणोंने कभी प्रवेश नहीं किया वह मनुष्यरूपी पशु कुत्ते, विष्ठाभोजी सूअर, ऊँट और गदहेकी अपेक्षा भी अधिक निन्दनीय है। हे सूतजी! जो कान भगवान्‌की लीलाका श्रवण नहीं करते, वे सर्पादिके बिलके समान हैं और जो दुष्टा जिह्वा भगवान्‌की लीला-कथाका गान नहीं करती वह मेंढककी जीभके समान व्यर्थ बकवाद करनेवाली है।' इसीका अनुवाद गोस्वामी तुलसीदासजीने किया है— जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहि भवन समाना॥ जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥ श्रीमद्भागवतके अन्तमें कहा गया है— मृषा गिरस्ता ह्यसतीरसत्कथा न कथ्यते यद् भगवानधोक्षजः।