संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| * पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५६३ |
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चाहिये। यह व्रत विशेष कल्याणकारी है। यदि यह सप्तमी हस्त नक्षत्रसे युक्त हो तो पापनाशिनी कही गयी है। इसमें किया हुआ दान, जप और होम सब अक्षय होता है। भाद्रपद शुक्ला सप्तमीको ‘आमुक्ताभरणव्रत’ बतलाया गया है। इसमें उमासहित भगवान् महेश्वरकी पूजाका विधान है। गङ्गाजल आदि षोडशोपचारसे भगवान्का पूजन, प्रार्थना और नमस्कार करके सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये उनका विसर्जन करना चाहिये। इसीको ‘फलसप्तमी’ भी कहते हैं। नारियल, बैगन, नारंगी, बिजौरा नीबू, कुम्हड़ा, बनभंटा और सुपारी—इन सात फलोंको महादेवजीके आगे रखकर सात तन्तुओं और सात गाँठोंसे युक्त एक डोरा भी चढ़ावे। फिर पराभक्तिसे उनका पूजन करके उस डोरेको स्त्री बायें हाथमें बाँध ले और पुरुष दाहिने हाथमें। जबतक वर्ष पूरा न हो जाय तबतक उसे धारण किये रहे। सात ब्राह्मणोंको खीर भोजन कराकर उन्हें विदा करे। उसके बाद बुद्धिमान् पुरुष व्रतकी पूर्णताके लिये स्वयं भी भोजन करे। पहले बताये हुए सातों फल सात ब्राह्मणोंको देने चाहिये। विप्रवर! इस प्रकार सात वर्षोंतक व्रतका पालन करके विधिवत् उपासना करनेपर व्रतधारी मनुष्य महादेवजीका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। आश्विनके शुक्ल पक्षमें जो सप्तमी आती है, उसे ‘शुभ सप्तमी’ जानना चाहिये। उसमें स्नान और पूजा करके तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी आज्ञा ले व्रतका आरम्भ करके कपिला गायका पूजन एवं प्रार्थना करे—
त्वामहं दद्मि कल्याणि प्रीयतामर्यमा स्वयम्।
<p align="right">(ना० पूर्व० १।१६। ४१-४२)</p>
पालय त्वं जगत्कृत्स्नं यतोऽसि धर्मसम्भवा॥
‘कल्याणी! मैं तुम्हारा दान करता हूँ, इससे साक्षात् भगवान् सूर्य प्रसन्न हों। तुम सम्पूर्ण जगत्का पालन करो; क्योंकि धर्मसे उत्पन्न हुई हो।’
ऐसा कहकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको नमस्कार करके उसे गाय और दक्षिणा दे। ब्रह्मन्! फिर स्वयं पञ्चगव्य पान करके रहे। इस प्रकार व्रत करके दूसरे दिन उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उनसे शेष बचे हुए प्रसादस्वरूप अन्नको स्वयं भोजन करे। जिसने श्रद्धापूर्वक इस शुभ सप्तमी नामक व्रतको किया है, वह देवदेव महादेवजीके प्रसादसे भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
कार्तिकके शुक्ल पक्षमें ‘शाकसप्तमी’ नामक व्रत करना चाहिये। उस दिन स्वर्णकमलसहित सात प्रकारके शाक सात ब्राह्मणोंको दान करे और स्वयं शाक भोजन करके ही रहे। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भोजन-दक्षिणा दे और स्वयं भी मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमीको ‘मित्र-व्रत’ बताया गया है। भगवान् विष्णुका जो दाहिना नेत्र है, वही साकार होकर कश्यपके तेज और अदितिके गर्भसे ‘मित्र’ नामधारी दिवाकरके रूपमें प्रकट हुआ है। अतः ब्रह्मन्! इस तिथिमें शास्त्रोक्त विधिसे उन्हींका पूजन करना चाहिये। पूजन करके मधुर आदि सामग्रियोंसे सात ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें सुवर्ण-दक्षिणा देकर विदा करे। तत्पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। विधिपूर्वक इस व्रतका पालन करके मनुष्य निश्चय ही सूर्यके लोकमें जाता है। पौष शुक्ला सप्तमीको ‘अभयव्रत’ होता है। उस दिन उपवास करके पृथ्वीपर खड़ा हो तीनों समय सूर्यदेवकी पूजा करे। तत्पश्चात् दूधमिश्रित अन्नसे बँधा हुआ एक सेर मोदक ब्राह्मणको दान करके सात ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें सुवर्णकी दक्षिणा दे विदा करके स्वयं भी भोजन करे। यह सबको अभय देनेवाला माना गया है। दूसरे ब्राह्मण उसी दिन ‘मार्तण्डव्रत’का उपदेश करते हैं। दोनों एक ही देवता होनेके कारण विद्वानोंने
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उन्हें एक ही व्रत कहा है। माघ मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको 'सर्वाप्ति' नामक व्रत होता है। उस दिन उपवास करके सुवर्णके बने हुए सूर्यविम्बकी गन्ध, पुष्प आदिसे पूजा करे तथा रात्रिमें जागरण करके दूसरे दिन सात ब्राह्मणोंको खीर भोजन करावे। उन ब्राह्मणोंको दक्षिणा, नारियल और अगुरु अर्पण करके दूसरी दक्षिणाके साथ सुवर्णमय सूर्यविम्ब आचार्यको समर्पित करे। फिर विशेष प्रार्थनापूर्वक उन्हें विदा करके स्वयं भोजन करे। यह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला कहा गया है। इस व्रतके प्रभावसे सर्वथा अद्वैतज्ञान सिद्ध होता है।
माघ शुक्ला सप्तमीको 'अचलाव्रत' बताया गया है। यह 'त्रिलोचनजयन्ती' है। इसे सर्वपापहारिणी माना गया है। इसीको 'रथसप्तमी' भी कहते हैं, जो 'चक्रवर्ती' पद प्रदान करनेवाली है। उस दिन सूर्यकी सुवर्णमयी प्रतिमाको सुवर्णमय घोड़े जुते हुए सुवर्णके ही रथपर बिठाकर जो सुवर्ण दक्षिणाके साथ भावभक्तिपूर्वक उसका दान करता है, वह भगवान् शङ्करके लोकमें जाकर आनन्द भोगता है। यही 'भास्करसप्तमी' भी कहलाती है, जो करोड़ों सूर्य-ग्रहणोंके समान है। इसमें अरुणोदयके समय स्नान किया जाता है। आक और बेरके सात-सात पत्ते सिरपर रखकर स्नान करना चाहिये। इससे सात जन्मोंके पापोंका नाश होता है। इसी सप्तमीको 'पुत्रदायक' व्रत भी बताया गया है। स्वयं भगवान् सूर्यने कहा है—'जो माघ शुक्ला सप्तमीको विधिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, उसपर अधिक सन्तुष्ट होकर मैं अपने अंशसे उसका पुत्र होऊँगा।' इसलिये उस दिन इन्द्रियसंयमपूर्वक दिन-रात उपवास करे और दूसरे दिन होम करके ब्राह्मणोंको दही, भात, दूध और खीर आदि भोजन करावे। फाल्गुन शुक्ला सप्तमीको 'अर्कपुट' नामक व्रतका आचरण करे। अर्कके पत्तोंसे अर्क (सूर्य)- का पूजन करे और अर्कके पत्ते ही खाय तथा 'अर्क' नामका सदा जप करे। इस प्रकार किया हुआ यह 'अर्कपुटव्रत' धन और पुत्र देनेवाला तथा सब पापोंका नाश करनेवाला है। कोई-कोई विधिपूर्वक होम करनेसे इसे 'यज्ञव्रत' मानते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! सब मासोंकी सम्पूर्ण सप्तमी तिथियोंमें भगवान् सूर्यकी आराधना समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली बतायी गयी है।
बारह महीनोंके अष्टमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा
सनातनजी कहते हैं—नारद! चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीको भवानीका जन्म बताया जाता है। उस दिन सौ परिक्रमा करके उनकी यात्राका महान् उत्सव मनाना चाहिये। उस दिन जगदम्बाका दर्शन मनुष्योंके लिये सर्वथा आनन्द देनेवाला है। उसी दिन अशोककलिका खानेका विधान है। जो लोग चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीको पुनर्वसु नक्षत्रमें अशोककी आठ कलिकाओंका पान करते हैं, वे कभी शोक नहीं पाते। उस दिन रातमें देवीकी पूजाका विधान होनेसे वह तिथि 'महाष्टमी' भी कही गयी है। वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास करके स्वयं जलसे स्नान करे और अपराजिता-देवीको जटामाँसी तथा उशीर (खस)-मिश्रित जलसे स्नान कराकर गन्ध आदिसे उनकी पूजा करे। फिर शर्करासे तैयार किया हुआ नैवेद्य भोग लगावे। दूसरे दिन नवमीको पारणासे पहले कुमारी कन्याओंको देवीका शर्करामय प्रसाद भोजन करावे। ब्रह्मन्! ऐसा करनेवाला मनुष्य देवीके प्रसादसे ज्योतिर्मय विमानमें बैठकर प्रकाशमान सूर्यकी भाँति दिव्य लोकोंमें विचरता है।
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ज्येष्ठ मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीको भगवान् त्रिलोचनकी पूजा करके मनुष्य सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित हो एक कल्पतक शिवलोकमें निवास करता है। जो मनुष्य ज्येष्ठ शुक्ला अष्टमीको देवीकी पूजा करता है, वह गन्धर्वों और अप्सराओंके साथ विमानपर विचरण करता है। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीको हल्दीमिश्रित जलसे स्नान करके वैसे ही जलसे देवीको भी स्नान करावे और विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। तदनन्तर शुद्ध जलसे स्नान कराकर कपूर और चन्दनका लेप लगावे। तत्पश्चात् शर्करायुक्त नैवेद्य अर्पण करके आचमन करावे। फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें सुवर्ण और दक्षिणा दे। तदनन्तर उन्हें विदा करके स्वयं मौन होकर भोजन करे। इस व्रतका पालन करके मनुष्य देवीलोकमें जाता है। श्रावण शुक्ला अष्टमीको विधिपूर्वक देवीका यजन करके दूधसे उन्हें नहलावे और मिष्टान्न निवेदन करे, तत्पश्चात् दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करके व्रत समाप्त करे। यह संतान बढ़ानेवाला व्रत है। श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीको ‘दशाफल’ नामका व्रत होता है*। उस दिन उपवास-व्रतका संकल्प लेकर स्नान और नित्यकर्म करके काली तुलसीके दस पत्तोंसे ‘कृष्णाय नमः’, ‘विष्णवे नमः’, ‘अनन्ताय नमः’, ‘गोविन्दाय नमः’, ‘गरुडध्वजाय नमः’, ‘दामोदराय नमः’, ‘हृषीकेशाय नमः’, ‘पद्मनाभाय नमः’, ‘हरये नमः’, ‘प्रभवे नमः’—इन दस नामोंका उच्चारण करके प्रतिदिन भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करे। तदनन्तर परिक्रमापूर्वक नमस्कार करे। इस प्रकार इस उत्तम व्रतको दस दिनतक करता रहे। इसके आदि, मध्य और अन्तमें श्रीकृष्ण-मन्त्रद्वारा चरुसे एक सौ आठ बार विधिपूर्वक होम करे। होमके अन्तमें विद्वान् पुरुष विधिके अनुसार भलीभाँति आचार्यकी पूजा करे। सोने, ताँबे, मिट्टी अथवा बाँसके पात्रमें सोनेका सुन्दर तुलसीदल बनवाकर रखे। साथ ही भगवान् श्रीकृष्णकी सुवर्णमयी प्रतिमा भी स्थापित करके उसकी विधिपूर्वक पूजा करे और वस्त्र तथा आभूषणोंसे विभूषित बछड़ेसहित गौका दान भी करे। दस दिनोंतक प्रतिदिन भगवान् श्रीकृष्णको दस-दस पूरी अर्पण करे। उन पूरियोंको व्रती पुरुष विधिज्ञ ब्राह्मणको दे डाले अथवा स्वयं भोजन करे। द्विजोत्तम! दसवें दिन यथाशक्ति शय्यादान करे। तत्पश्चात् द्रव्यसहित सुवर्णमयी मूर्ति आचार्यको समर्पित करे। व्रतके अन्तमें दस ब्राह्मणोंको प्रत्येकके लिये दस-दस पूरियाँ देवे। इस प्रकार दस वर्षांतक उत्तम व्रतका पालन करके विधिपूर्वक उपवासका निर्वाह कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है और अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
यही ‘कृष्ण-जन्माष्टमी’ तिथि है, जो मनुष्योंके सब पापोंको हर लेनेवाली कही गयी है। श्रीकृष्णके जन्मके दिन केवल उपवास करनेमात्रसे मनुष्य सात जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है। विद्वान् पुरुष उपवास करके नदी आदिके निर्मल जलमें तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। फिर उत्तम स्थानमें बने हुए मण्डपके भीतर मण्डल बनावे। मण्डलके मध्यभागमें ताँबे या मिट्टीका कलश स्थापित करे। उसके ऊपर ताँबेका पात्र रखे। उस पात्रके ऊपर दो वस्त्रोंसे ढकी हुई श्रीकृष्णकी सुवर्णमयी सुन्दर प्रतिमा स्थापित करे। फिर वाद्य आदि उपचारोंद्वारा स्नेहपूर्ण हृदयसे उसकी पूजा करे। कलशके सब ओर पूर्व आदि क्रमसे देवकी, वसुदेव, यशोदा, नन्द, व्रज, गोपगण,
* अमावास्यान्तक मास माननेवालोंकी दृष्टिसे यह श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी कही गयी है। जो पूर्णिमान्तक ही मास मानते हैं उनकी दृष्टिसे यह अष्टमी भाद्रपद कृष्ण पक्षमें पड़ती है।
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गोपीवृन्द तथा गोसमुदायकी पूजा करे। तत्पश्चात् आरती करके अपराध क्षमा कराते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। उसके बाद आधी राततक वहीं रहे। आधी रातमें पुनः श्रीहरिको पञ्चामृत तथा शुद्ध जलसे स्नान कराये और गन्ध-पुष्प आदिसे पुनः उनकी पूजा करे। नारद! धनिया, अजवाइन, सोंठ, खाँड़ और घीके मेलसे नैवेद्य तैयार करके उसे चाँदीके पात्रमें रखकर भगवान्को अर्पण करे। फिर दशावतारधारी श्रीहरिका चिन्तन करते हुए पुनः आरती करके चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रमाको अर्घ्य दे। उसके बाद देवेश्वर श्रीकृष्णसे क्षमा-प्रार्थना करके व्रती पुरुष पौराणिक स्तोत्र-पाठ और गीत-वाद्य आदि अनेक कार्यक्रमोंद्वारा रात्रिका शेष भाग व्यतीत करे। तदनन्तर प्रातःकाल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और उन्हें प्रसन्नतापूर्वक दक्षिणा देकर विदा करे। तत्पश्चात् भगवान्की सुवर्णमयी प्रतिमाको स्वर्ण, धेनु और भूमिसहित आचार्यको दान करे। फिर और भी दक्षिणा देकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी स्त्री, पुत्र, सुहृद् तथा भृत्यवर्गके साथ भोजन करे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य श्रेष्ठ विमानपर बैठकर साक्षात् गोलोकमें जाता है। इस जन्माष्टमीके समान दूसरा कोई व्रत तीनों लोकोंमें नहीं है, जिसके करनेसे करोड़ों एकादशियोंका फल प्राप्त हो जाता है। भाद्रपद शुक्ला अष्टमीको मनुष्य 'राधाव्रत' करे। इसमें भी पूर्ववत् कलशके ऊपर स्थापित श्रीराधाकी स्वर्णमयी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। मध्याह्नकालमें श्रीराधाजीका पूजन करके एकभुक्त व्रत करे। यदि शक्ति हो तो भक्त पुरुष पूरा उपवास करे। फिर दूसरे दिन भक्तिपूर्वक सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन कराकर आचार्यको प्रतिमा दान करे। तत्पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार इस व्रतको समाप्त करना चाहिये। ब्रह्मर्षे! व्रती पुरुष विधिपूर्वक इस 'राधाष्टमीव्रत'के करनेसे व्रजका रहस्य जान लेता तथा राधापरिकरोंमें निवास करता है।
इसी तिथिको 'दूर्वाष्टमीव्रत' भी बताया गया है। पवित्र स्थानमें उगी हुई दूबपर शिवलिङ्गकी स्थापना करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, दही, अक्षत और फल आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करे। पूजाके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर अर्घ्य दे। अर्घ्य देनेके पश्चात् परिक्रमा
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करके वहीं ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा, उत्तम फल तथा सुगन्धित मिष्टान्न देकर विदा करे; फिर स्वयं भी भोजन करके अपने घर जाय। विप्रवर! इस प्रकार यह 'दूर्वाष्टमी' मनुष्योंके लिये पुण्यदायिनी तथा उनका पाप हर लेनेवाली है। यह चारों वर्णों और विशेषतः स्त्रियोंके लिये अवश्यकर्तव्य व्रत है। ब्रह्मन्! जब वह अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्रसे संयुक्त हो तो उसे 'ज्येष्ठा अष्टमी'के नामसे जानना चाहिये। वह पूजित होनेपर सब पापोंका नाश करनेवाली है। इस तिथिसे लेकर सोलह दिनोंतक महालक्ष्मीका व्रत बताया गया है। पहले इस प्रकार संकल्प करे—
करिष्येऽहं महालक्ष्मीव्रतं ते तत्परायणः।
<p align="right">(ना० पूर्व० ११०। ५५)</p>
तदविघ्नेन मे यातु समाप्तिं त्वत्प्रसादतः॥
'देवि! मैं आपकी सेवामें तत्पर होकर आपके इस महालक्ष्मीव्रतका पालन करूँगा। आपकी कृपासे यह व्रत बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण हो।'
ऐसा कहकर दाहिने हाथमें सोलह तन्तु और सोलह गाँठोंसे युक्त डोरा बाँध ले। तबसे व्रती पुरुष प्रतिदिन गन्ध आदि उपचारोंद्वारा महालक्ष्मीकी पूजा करे। पूजाका यह क्रम आश्विन कृष्णा अष्टमीतक चलाता रहे। व्रत पूरा हो जानेपर विद्वान् पुरुष उसका उद्यापन करे। वस्त्र घेरकर एक मण्डप बना ले। उसके भीतर सर्वतोभद्रमण्डलकी रचना करे और उस मण्डलमें कलशकी प्रतिष्ठा करके दीपक जला दे। फिर अपनी बाँहसे डोरा उतारकर कलशके नीचे रख दे। इसके बाद सोनेकी चार प्रतिमाएँ बनवावे, वे सब-की-सब महालक्ष्मीस्वरूपा हों। फिर पञ्चामृत और जलसे उन सबको स्नान करावे तथा षोडशोपचारसे विधिपूर्वक पूजा करके वहाँ जागरण करे। तदनन्तर आधी रातके समय चन्द्रोदय होनेपर श्रीखण्ड आदि द्रव्योंसे विधिपूर्वक अर्घ्य अर्पण करे। यह अर्घ्य चन्द्रमण्डलमें स्थित महालक्ष्मीके उद्देश्यसे देना चाहिये। अर्घ्य देनेके पश्चात् महालक्ष्मीकी प्रार्थना करे और फिर व्रत करनेवाली स्त्री श्रोत्रिय ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका रोली, महावर और काजल आदि सौभाग्यसूचक द्रव्योंद्वारा भलीभाँति पूजन करके उन्हें भोजन करावे। तत्पश्चात् बिल्व, कमल और खीरसे अग्निमें आहुति दे। ब्रह्मन्! उक्त वस्तुओंके अभावमें केवल घीकी आहुति दे। ग्रहोंके लिये समिधा और तिलका हवन करे। सब रोगोंकी शान्तिके उद्देश्यसे भगवान् मृत्युञ्जयके लिये भी आहुति देनी चाहिये। चन्दन, तालपत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ—सबको नये सूपेमें रखे। प्रत्येक वस्तु सोलहकी संख्यामें हो। उन सब वस्तुओंको दूसरे सूपसे ढक दे। तदनन्तर व्रती पुरुष निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़ते हुए उपर्युक्त सब वस्तुएँ महालक्ष्मीको समर्पित करे—
क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्रसहोदरा।
<p align="right">(ना० पूर्व० ११०। ७०-७१)</p>
व्रतेनानेन संतुष्टा भवताद्विष्णुवल्लभा॥
'क्षीरसागरसे प्रकट हुई चन्द्रमाकी सहोदर भगिनी श्रीविष्णुवल्लभा महालक्ष्मी इस व्रतसे सन्तुष्ट हों।'
पूर्वोक्त चार प्रतिमाएँ श्रोत्रिय ब्राह्मणको अर्पित करे। इसके बाद चार ब्राह्मणों और सोलह सुवासिनी स्त्रियोंको मिष्टान्न भोजन कराकर दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे। फिर नियम समाप्त करके इष्ट भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। विप्रवर! यह महालक्ष्मीका व्रत है। इसका विधिपूर्वक पालन करके मनुष्य इहलोकके इष्ट भोगोंका उपभोग करनेके बाद चिरकालतक लक्ष्मीलोकमें निवास करता है।
विप्रवर! आश्विन मासके शुक्लपक्षमें जो अष्टमी आती है, उसे 'महाष्टमी' कहा गया है। उसमें सभी उपचारोंसे दुर्गाजीके पूजनका विधान
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है। जो 'महाष्टमी' को उपवास अथवा एकभुक्त व्रत करता है, वह सब ओरसे वैभव पाकर देवताकी भाँति चिरकालतक आनन्दमग्न रहता है। कार्तिक कृष्णपक्षमें अष्टमीको 'कर्कष्टमी' नामक व्रत कहा गया है। उसमें यत्नपूर्वक उमासहित भगवान् शङ्करकी पूजा करनी चाहिये। जो सर्वगुणसम्पन्न पुत्र और नाना प्रकारके सुखकी अभिलाषा रखते हैं, उन व्रती पुरुषोंको चन्द्रोदय होनेपर सदा चन्द्रमाके लिये अर्घ्यदान करना चाहिये। कार्तिकके शुक्लपक्षमें गोपाष्टमीका व्रत बताया गया है। उसमें गौओंकी पूजा करना, गोग्रास देना, गौओंकी परिक्रमा करना, गौओंके पीछे-पीछे चलना और गोदान करना आदि कर्तव्य है। जो समस्त सम्पत्तियोंकी इच्छा रखता हो, उसे उपर्युक्त कार्य अवश्य करने चाहिये। मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको 'अनघाष्टमी-व्रत' कहा गया है। उसमें अनेक पुत्रोंसे युक्त अनघ और अनघा—इन दोनों पति-पत्नीकी कुशमयी प्रतिमा बनायी जाती है। उस युगल जोड़ीको गोबरसे लीपे हुए शुभ स्थानमें स्थापित करके गन्ध-पुष्प आदि विविध उपचारोंसे उनकी पूजा करे। फिर ब्राह्मण पति-पत्नीको भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करे। स्त्री हो या पुरुष विधिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करके उत्तम लक्षणोंसे युक्त पुत्र पाता है।
मार्गशीर्ष शुक्ला अष्टमीको कालभैरवके समीप उपवासपूर्वक जागरण करके मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। पौष शुक्ल अष्टमीको अष्टकासंज्ञक श्राद्ध पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति देनेवाला और कुल-संततिको बढ़ानेवाला है। उस दिन भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करके केवल भक्तिका आचरण करते हुए मनुष्य भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है। माघ मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली भद्रकाली देवीकी भक्तिभावसे पूजा करे। जो अविच्छिन्न संतति और विजय चाहता हो, वह माघ मासके शुक्लपक्षकी अष्टमीको भीष्मजीका तर्पण करे। ब्रह्मन्! फाल्गुन मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको व्रतपरायण पुरुष समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये भीमादेवीकी आराधना करे। फाल्गुन शुक्ला अष्टमीको गन्ध आदि उपचारोंसे शिव और शिवाकी भलीभाँति पूजा करके मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियोंका अधीश्वर हो जाता है। सभी मासोंके दोनों पक्षोंमें अष्टमीके दिन विधिपूर्वक शिव और पार्वतीकी पूजा करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लेता है।
नवमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा
सनातनजी कहते हैं— विप्रेन्द्र! अब मैं तुमसे नवमीके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, लोकमें जिनका पालन करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाते हैं। चैत्रके शुक्लपक्षमें नवमीको 'श्रीरामनवमी' का व्रत होता है। उसमें भक्तियुक्त पुरुष यदि शक्ति हो तो विधिपूर्वक उपवास करे। जो अशक्त हो, वह मध्याह्नकालीन जन्मोत्सवके बाद एक समय भोजन करके रहे। ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराकर भगवान् श्रीरामको प्रसन्न करे। गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदिके दानसे भी श्रीरामप्रीतिका सम्पादन करे। जो मनुष्य इस प्रकार भक्तिपूर्वक 'श्रीरामनवमीव्रत' का पालन करता है, वह सम्पूर्ण पापोंका नाश करके भगवान् विष्णुके परम धामको जाता है। वैशाखमें दोनों पक्षोंकी नवमीको जो विधिपूर्वक चण्डिका-पूजन करता है, वह विमानसे विचरण करता हुआ देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। ज्येष्ठ शुक्ला नवमीको श्रेष्ठ मनुष्य उपवासपूर्वक उमादेवीका
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५६१
नवमीको रातमें ऐरावतपर विराजमान शुक्लवर्णा इन्द्राणीका भलीभाँति पूजन करता है, वह देवलोकमें दिव्य विमानपर विचरता हुआ दिव्य भोगोंका उपभोग करता है। विप्रवर ! जो श्रावण मासके दोनों पक्षोंकी नवमीको उपवास अथवा केवल रातमें भोजन करता और 'कौमारी चण्डिका' की आराधना करता है, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, भाँति-भाँतिके नैवेद्य अर्पण करके और कुमारी कन्याओंको भोजन कराकर जो उस पापहारिणी देवीकी परिचर्यामें तत्पर रहता है तथा इस प्रकार भक्तिपूर्वक उस उत्तम 'कौमारीव्रत' का पालन करता है, वह विमानद्वारा सनातन देवीलोकमें जाता है।
भाद्रपद शुक्ला नवमीको 'नन्दानवमी' कहते हैं। उस दिन जो नाना प्रकारके उपचारोंद्वारा दुर्गादेवीकी विधिवत् पूजा करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें जो नवमी आती है, उसे 'अक्षयनवमी' कहते हैं। उस दिन पीपलवृक्षकी जड़के समीप देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करे और सूर्यदेवताको अर्घ्य दे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे और स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक 'अक्षयनवमी' को जप, दान, ब्राह्मणपूजन और होम करता है, उसका वह सब कुछ अक्षय होता है, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। मार्गशीर्ष शुक्ला नवमीको 'नन्दिनीनवमी' कहते हैं। जो उस दिन उपवास करके गन्ध आदिसे विधिवत् पूजन करके कुमारी कन्याओं तथा ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा देकर अगहनीके चावलका भात दूधके साथ खाय। जो मनुष्य इस 'उमाव्रत' का विधिपूर्वक पालन करता है, वह इस लोकमें श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर अन्तमें स्वर्गलोकमें स्थान पाता है। विप्रेन्द्र ! जो आषाढ़ मासके दोनों पक्षोंमें जगदम्बाका पूजन करता है, वह निश्चय ही अश्वमेध-यज्ञके फलका भागी होता है। विप्रवर ! पौष मासके शुक्लपक्षकी नवमीको एक समय भोजनके व्रतका पालन करते हुए महामायाका पूजन करे। इससे वाजपेय यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। माघ शुक्ला नवमी लोकपूजित 'महानन्दा' के नामसे विख्यात है, जो मानवोंके लिये सदा आनन्ददायिनी
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- संक्षिप्त नारदपुराण *
होती है। उस दिन किया हुआ स्नान, दान, जप, होम और उपवास सब अक्षय होता है। द्विजोत्तम! फाल्गुन मासके शुक्लपक्षकी जो नवमी तिथि है, वह परम पुण्यमयी 'आनन्द नवमी' कहलाती है। वह सब पापोंका नाश करनेवाली मानी गयी है। जो उस दिन उपवास करके 'आनन्दा'का पूजन करता है, वह मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
बारह महीनोंके दशमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा
**सनातनजी कहते हैं—**नारद! अब मैं तुम्हें दशमीके व्रत बतलाता हूँ, जिनका भक्तिपूर्वक पालन करके मनुष्य धर्मराजका प्रिय होता है। चैत्र शुक्ला दशमीको सामयिक फल, फूल और गन्ध आदिसे धर्मराजका पूजन करना चाहिये। उस दिन पूरा उपवास या एक समय भोजन करके रहे। व्रतके अन्तमें चौदह ब्राह्मणोंको भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे। विप्रवर! जो इस प्रकार धर्मराजकी पूजा करता है, वह धर्मकी आज्ञासे देवताओंकी समता प्राप्त कर लेता है और फिर उससे च्युत नहीं होता। जो मानव वैशाख शुक्ला दशमीको गन्ध आदि उपचारों तथा श्वेत और सुगन्धित पुष्पोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करके उनकी सौ परिक्रमा करता और यत्नपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें स्थान पाता है। सरिताओंमें श्रेष्ठ जह्नुपुत्री गङ्गा ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको स्वर्गसे इस पृथ्वीपर उतरी थीं, इसलिये वह तिथि पुण्यदायिनी मानी गयी है। ज्येष्ठ मास, शुक्लपक्ष, हस्त नक्षत्र, बुध दिन, दशमी तिथि, गर करण, आनन्द योग, व्यतीपात, कन्याराशिके चन्द्रमा और वृषराशिके सूर्य—इन दसोंका योग महान् पुण्यमय बताया गया है। इन दस योगोंसे युक्त दशमी तिथि दस पाप हर लेती है। इसलिये उसे 'दशहरा' कहते हैं। जो इस 'दशहरा'में गङ्गाजीके पास पहुँचकर प्रसन्नचित्त हो विधिपूर्वक गङ्गाजीके जलमें स्नान करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। मनु आदि स्मृतिकारोंने आषाढ़ शुक्ला दशमीको पुण्य-तिथि कहा है, अतः उसमें किये जानेवाले स्नान, जप, दान और होम स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाले हैं।
श्रावण शुक्ला दशमी सम्पूर्ण आशाओंकी पूर्ति करनेवाली है। इसमें गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान् शङ्करकी पूजा उत्तम मानी गयी है। उस दिन किया हुआ उपवास या नक्तव्रत, ब्राह्मणभोजन, जप, सुवर्णदान तथा धेनु आदिका दान सब पापोंका नाशक बताया गया है।
द्विजश्रेष्ठ! भाद्रपद शुक्ला दशमीको 'दशावतार-व्रत' किया जाता है। उस दिन जलाशयमें स्नान करके सन्ध्यावन्दन तथा देवता, ऋषि और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त हो दशावतार
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५७१
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७१
विग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, त्रिविक्रम (वामन), परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि—इन दसोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक पूजा करे और दस ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें उन मूर्तियोंका दान कर दे। नारद! उस दिन उपवास या एक समय भोजनका व्रत करके ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें विदा करके एकाग्रचित्त हो स्वयं इष्टजनोंके साथ भोजन करे। जो भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर अन्तमें विमानद्वारा सनातन विष्णुलोकको जाता है। आश्विन शुक्ला दशमीको ‘विजयादशमी' कहते हैं। उस दिन प्रातःकाल घरके आँगनमें गोबरके चार पिण्ड मण्डलाकार रखे। उनके भीतर श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न—इन चारोंकी पूजा करे। गोबरके ही बने हुए चार ढक्कनदार पात्रोंमें भीगा हुआ धान और चाँदी रखकर उसे धुले हुए वस्त्रसे ढक देना चाहिये। फिर पिता, माता, भाई, पुत्र, स्त्री और भृत्यसहित गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे उस धान्यकी विधिपूर्वक पूजा करके नमस्कार करे। फिर पूजित ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकारकी विधिका पालन करके मनुष्य निश्चय ही एक वर्षतक सुखी और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। नारद! कार्तिक शुक्ला दशमीको ‘सार्वभौम-व्रत’का पालन करे। उस दिन उपवास या एक समय भोजनका व्रत करके आधी रातके समय घर अथवा गाँवसे बाहर पूए आदिके द्वारा दसों दिशाओंमें बलि दे। गोबरसे लिपी हुई भूमिपर मण्डल बनाकर उसमें अष्टदल कमल अङ्कित करे और उसमें गणेश आदि देवताओंकी पूजा करे।
मार्गशीर्ष शुक्ला दशमीको ‘आरोग्यव्रत'का आचरण करे। दस ब्राह्मणोंका गन्ध आदिसे पूजन करे और उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। स्वयं उस दिन एक समय भोजन करके रहे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य इस भूतलपर आरोग्य पाता और धर्मराजके प्रसादसे देवलोकमें देवताकी भाँति आनन्दका अनुभव करता है। पौष शुक्ला दशमीको विश्वेदेवोंकी पूजा करनी चाहिये। विश्वेदेव दस हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, मुनि, गुरु, विप्र और राम। इन सबमें भगवान् विष्णु भलीभाँति विराजमान हैं। विश्वेदेवोंकी कुशमयी प्रतिमाएँ बनाकर उन्हें कुशके ही आसनोंपर स्थापित करे। आसनोंपर स्थित हो जानेपर उनमेंसे प्रत्येकका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिके द्वारा पूजन करे। प्रत्येकको दक्षिणा देकर प्रणाम करनेके अनन्तर उन सबका विसर्जन करे। उनपर चढ़ी हुई दक्षिणाको श्रेष्ठ द्विजों अथवा गुरुको समर्पित करे। विप्रर्षे! इस प्रकार एक समय भोजनका व्रत करके जो व्रती पुरुष उक्त विधिका पालन करता है, वह उभय लोकके उत्तम भोगोंका अधिकारी होता है। नारद! माघ शुक्ला दशमीको इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास करके अङ्गिरा नामवाले दस देवताओंकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनाकर गन्ध आदि उपचारोंसे उनकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। आत्मा, आयु, मन, दक्ष, मद, प्राण, बर्हिष्मान्, गविष्ठ, दत्त और सत्य—ये दस अङ्गिरा हैं। उनकी पूजा करके दस ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और उक्त स्वर्णमयी मूर्तियाँ उन्हींको अर्पित कर दे। इससे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है। फाल्गुन शुक्ला दशमीको चौदह यमोंकी पूजा करे। यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दघ्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त—ये चौदह यम हैं। गन्ध आदि उपचारोंसे इनकी भलीभाँति पूजा करके कुशसहित तिलमिश्रित जलकी तीन-तीन अञ्जलियोंसे प्रत्येकका तर्पण करे। तदनन्तर ताँबेके पात्रमें लाल चन्दन, तिल, अक्षत, जौ और जल रखकर उन सबके द्वारा सूर्यको अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
५७२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भक्त्या मामनुकम्पय॥
(ना० पूर्व० ११९। ६३)
'सहस्रों किरणोंसे सुशोभित तेजोराशि जगदीश्वर सूर्यदेव! आइये, भक्तिपूर्वक मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार कीजिये। साथ ही मुझे अपनी सहज कृपासे अपनाइये।'
इस मन्त्रसे अर्घ्य देकर चौदह ब्राह्मणोंको भोजन करावे तथा रजतमयी दक्षिणा दे। उन्हें विदा करके स्वयं भी भोजन करे। ब्रह्मन्! इस प्रकार विधिका पालन करके मनुष्य धर्मराजकी कृपासे इहलोकके धन, पुत्र आदि देवदुर्लभ भोगोंको भोगता है और देहावसान होनेपर श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकका भागी होता है।
द्वादश मासके एकादशी-व्रतोंकी विधि और महिमा तथा दशमी आदि तीन दिनोंके पालनीय विशेष नियम
सनातनजी कहते हैं—मुने! दोनों पक्षोंकी एकादशीको मनुष्य निराहार रहे और एकाग्रचित्त हो नाना प्रकारके पुष्पोंसे शुभ एवं विचित्र मण्डप बनावे। फिर शास्त्रोक्त विधिसे भलीभाँति स्नान करके उपवास और इन्द्रियसंयमपूर्वक श्रद्धा और एकाग्रताके साथ नाना प्रकारके उपचार जप, होम, प्रदक्षिणा, स्तोत्रपाठ, दण्डवत्-प्रणाम तथा मनको प्रिय लगनेवाले जय-जयकारके शब्दोंसे विधिवत् श्रीविष्णुकी पूजा करे तथा रात्रिमें जागरण करे। ऐसा करनेसे मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। चैत्र शुक्ला एकादशीको उपवास करके श्रेष्ठ मनुष्य तीन दिनके लिये आगे बताये जानेवाले सभी नियमोंका पालन करनेके पश्चात् द्वादशीको भक्तिपूर्वक सनातन वासुदेवकी षोडशोपचारसे पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे और उनको विदा करके स्वयं भी भोजन करे। यह 'कामदा' नामक एकादशी है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। यदि भक्तिपूर्वक इस तिथिको उपवास किया जाय तो यह भोग और मोक्ष देनेवाली होती है। वैशाख कृष्णा एकादशीको 'वरूथिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके दूसरे दिन भगवान् मधुसूदनकी पूजा करनी चाहिये। इसमें सुवर्ण, अन्न, कन्या और धेनुका दान उत्तम माना गया है। वरूथिनीका व्रत करके नियमपरायण मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है। वैशाख शुक्ला एकादशीको 'मोहिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके दूसरे दिन स्नानके पश्चात् गन्ध आदिसे भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणभोजन कराकर वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
ज्येष्ठ कृष्णा एकादशीको 'अपरा' कहते हैं। उस दिन नियमपूर्वक उपवास करके द्वादशीको प्रातः-काल नित्यकर्मसे निवृत्त हो भगवान् त्रिविक्रमकी विधिवत् पूजा करे। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। ऐसा करनेवाला मानव सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। ज्येष्ठ शुक्ला एकादशीको 'निर्जला' एकादशी कहते हैं। द्विजोत्तम! सूर्योदयसे लेकर सूर्योदयतक निर्जल उपवास करके दूसरे दिन द्वादशीके प्रातः-काल नित्यकर्म करनेके अनन्तर विविध उपचारोंसे भगवान् हृषीकेशका पूजन करे। तदनन्तर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य चौबीस एकादशियोंका फल प्राप्त कर लेता है। आषाढ़ कृष्ण एकादशीको 'योगिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको नित्यकर्मके पश्चात् भगवान् नारायणकी पूजा करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे।
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५७३
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७३
ऐसा करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दानोंका फल पाकर भगवान् विष्णुके धाममें आनन्दका अनुभव करता है। मुने! आषाढ़ शुक्ला एकादशीको उपवास करके सुन्दर मण्डप बनाकर उसमें विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी प्रतिमा स्थापित करे। वह प्रतिमा सोने या चाँदीकी बनी हुई अत्यन्त सुन्दर हो। उसकी चारों भुजाएँ शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मसे सुशोभित हों। उसे पीताम्बर धारण कराया गया हो और वह अच्छी तरह बिछे हुए सुन्दर पलंगपर विराज रही हो। तदनन्तर मन्त्रपाठपूर्वक पञ्चामृत एवं शुद्ध जलसे स्नान कराकर पुरुषसूक्तके सोलह मन्त्रोंसे षोडशोपचार पूजन करे। पाद्यसमर्पणसे लेकर आरती उतारनेतक सोलह उपचार होते हैं। तत्पश्चात् श्रीहरिकी इस प्रकार प्रार्थना करे—
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम्॥
(ना० पूर्व १२०। २३)
'जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सम्पूर्ण जगत् सो जाता है और आपके जाग्रत् होनेपर यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भी जाग्रत् रहता है।'
इस प्रकार प्रार्थना करके भक्त पुरुष चातुर्मास्यके लिये शास्त्रविहित नियमोंको यथाशक्ति ग्रहण करे। तदनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल षोडशोपचारद्वारा भगवान् शेषशायीकी पूजा करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणासे संतुष्ट करे। फिर स्वयं भी मौनभावसे भोजन करे। इस विधिसे भगवान्की 'शयनी' एकादशीका व्रत करके मनुष्य भगवान् विष्णुकी कृपासे भोग एवं मोक्षका भागी होता है। द्विजश्रेष्ठ ! श्रावणके कृष्णपक्षमें एकादशीको 'कामिका' व्रत होता है। उस दिन श्रेष्ठ मनुष्य नियमपूर्वक उपवास करके द्वादशीको नित्यकर्मका सम्पादन करनेके अनन्तर षोडशोपचारसे भगवान् श्रीधरका पूजन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। जो इस प्रकार उत्तम 'कामिकव्रत' करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्तकर भगवान् विष्णुके परम धाममें जाता है। श्रावण शुक्ला एकादशीको 'पुत्रदा' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको नियमपूर्वक रहकर षोडशोपचारसे भगवान् जनार्दनकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणभोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार करनेवाला इहलोकमें उनसे सद्गुणसम्पन्न पुत्र पाकर सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित हो साक्षात् भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
भाद्रपद कृष्णा एकादशीको 'अजा' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीके दिन विभिन्न उपचारोंसे भगवान् उपेन्द्रकी पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराकर दक्षिणा दे विदा करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक एकाग्रभावसे 'अजा' एकादशीका व्रत करके मनुष्य इहलोकमें सम्पूर्ण उत्तम भोगोंको भोगता और अन्तमें वैष्णवधामको जाता है। भाद्रपद शुक्ला एकादशीका नाम 'पद्मा' है। उस दिन उपवास करके नित्य पूजन करनेके अनन्तर ब्राह्मणको जलसे भरा घट
| ५७४ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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दान करे। द्विजोत्तम! पहलेसे स्थापित प्रतिमाका उत्सव करके उसे जलाशयके निकट ले जाय और जलसे स्पर्श कराकर उसकी विधिपूर्वक पूजा करे। फिर उसे घरमें लाकर बायीं करवटसे सुला दे। तदनन्तर प्रातःकाल द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंद्वारा भगवान् वामनकी पूजा करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे विदा करे। जो इस प्रकार 'पद्मा'का परम उत्तम व्रत करता है, वह इस लोकमें भोग पाकर अन्तमें इस प्रपञ्चसे मुक्त हो जाता है। आश्विन कृष्णा एकादशीको 'इन्दिरा' कहते हैं। उस दिन उपवास करके शालग्राम शिलाके सम्मुख मध्याह्नकालमें श्राद्ध करे। ब्रह्मन्! यह भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला होता है। तदनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल भगवान् पद्मनाभकी पूजा करके विद्वान् पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन करावे और दक्षिणा देकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार 'इन्दिरा एकादशी'का व्रत करनेवाला मनुष्य इस लोकमें मनोवाञ्छित भोगोंको भोगकर करोड़ों पितरोंका उद्धार करके अन्तमें भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। विप्रवर! आश्विन शुक्ला एकादशीको 'पापांकुशा' कहते हैं। उस दिन विधिपूर्वक उपवास करके द्वादशीके दिन भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा दे भक्तिभावसे प्रणाम करके विदा करे। फिर स्वयं भी भोजन करे। जो मनुष्य इस प्रकार भक्तिपूर्वक पापांकुशा एकादशीका व्रत करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोगोंको भोगकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
द्विजश्रेष्ठ! कार्तिक कृष्णपक्षमें 'रमा' नामकी एकादशीको विधिवत् स्नान करके द्वादशीको प्रातः-काल केशी दैत्यका वध करनेवाले, देवताओंके भी देवता सनातन भगवान् केशवकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य इस लोकमें मनोवाञ्छित भोग भोगनेके पश्चात् विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर भगवान् लक्ष्मीपतिका सामीप्य लाभ करता है। कार्तिक शुक्ला एकादशीको 'प्रबोधिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके रातमें सोये हुए भगवान्को गीत आदि माङ्गलिक उत्सवोंद्वारा जगाये। उस समय ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके विविध मन्त्रों और नाना प्रकारके वाद्योंके द्वारा भगवान्को जगाना चाहिये। द्राक्षा, ईख, अनार, केला और सिंघाड़ा आदि वस्तुएँ भगवान्को अर्पित करनी चाहिये। तत्पश्चात् रात बीतनेपर दूसरे दिन सबेरे स्नान और नित्यकर्म करके पुरुषसूक्तके मन्त्रोंद्वारा भगवान् गदादामोदरकी षोडशोपचारसे पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणासे संतुष्ट करके विदा करे। इसके बाद आचार्यको भगवान्की स्वर्णमयी प्रतिमा और धेनुका दान करना चाहिये। इस प्रकार जो भक्ति और आदरपूर्वक 'प्रबोधिनी एकादशी'का व्रत करता है, वह इस लोकमें श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करके अन्तमें वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है।
मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षकी एकादशीको 'उत्पन्ना' एकादशी कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा दे विदा करके स्वयं भी इष्टजनोंके साथ एकाग्र होकर भोजन करे। इस प्रकार जो भक्तिभावसे 'उत्पन्ना'का व्रत करता है, वह अन्तकालमें श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है। मार्गशीर्ष शुक्ला एकादशीको 'मोक्षा' (मोक्षदा) एकादशी कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल सम्पूर्ण उपचारोंसे विश्वरूपधारी भगवान् अनन्तकी पूजा करे। फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और दक्षिणा देकर विदा करनेके पश्चात् स्वयं भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। इस प्रकार व्रत
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५७५ ---|---:
करके मनुष्य इहलोकमें मनोवाञ्छित भोगोंको भोगकर पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार करके भगवान् श्रीहरिके धाममें जाता है। पौष मासके कृष्णपक्षकी एकादशीको 'सफला' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको सभी उपचारोंसे भगवान् अच्युतकी पूजा करे। फिर ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और दक्षिणा देकर विदा करे। ब्रह्मन्! इस प्रकार 'सफला' एकादशीका विधिपूर्वक व्रत करके मनुष्य इहलोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें वैष्णवपदको प्राप्त होता है। पौष शुक्ला एकादशीको 'पुत्रदा' कहा गया है। उस दिन उपवास करके द्वादशीके दिन अर्घ्य आदि उपचारोंसे भगवान् चक्रधारी विष्णुकी पूजा करे। फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करा दक्षिणा दे विदा करके अपने इष्ट भाई-बन्धुओंके साथ शेष अन्न स्वयं भोजन करे। विप्रवर! इस प्रकार व्रत करनेवाला मनुष्य इहलोकमें मनोवाञ्छित भोग भोगकर अन्तमें श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
द्विजश्रेष्ठ! माघके कृष्णपक्षमें 'षट्तिला' एकादशीको उपवास करके तिलोंसे ही स्नान, दान, तर्पण, हवन, भोजन एवं पूजनका काम ले। फिर द्वादशीको प्रातःकाल सब उपचारोंसे भगवान् वैकुण्ठकी पूजा करे। फिर ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। इस प्रकार एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक व्रत करके मनुष्य इहलोकमें मनोवाञ्छित भोग भोगकर अन्तमें विष्णुपद प्राप्त कर लेता है। माघ शुक्ला एकादशीका नाम 'जया' है। उस दिन उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल परम पुरुष भगवान् श्रीपतिकी अर्चना करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन करा दक्षिणा दे विदा करके शेष अन्न अपने भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं एकाग्रचित्त होकर भोजन करे। विप्रवर! जो इस प्रकार भगवान् केशवको संतुष्ट करनेवाला व्रत करता है, वह इहलोकमें श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर अन्तमें भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। फाल्गुन कृष्णा एकादशीका नाम 'विजया' है। उस दिन उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान् योगीश्वरकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन करा दक्षिणासे संतुष्ट करके उन्हें विदा करनेके पश्चात् स्वयं मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। इस प्रकार व्रत करनेवाला मानव इहलोकमें अभीष्ट भोगोंको भोगकर देहान्त होनेके बाद देवताओंसे सम्मानित हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। द्विजोत्तम! फाल्गुनके शुक्लपक्षमें 'आमलकी' एकादशीको उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल सम्पूर्ण उपचारोंसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका भक्तिपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको उत्तम अन्न भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार फाल्गुनके शुक्लपक्षमें 'आमलकी' नामवाली एकादशीको विधिपूर्वक पूजन आदि करके मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। ब्रह्मन्! चैत्रके कृष्णपक्षमें 'पापमोचनी' नामवाली एकादशीको उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल षोडशोपचारसे भगवान् गोविन्दकी पूजा करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन करा दक्षिणा दे उन्हें विदा करके स्वयं भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। जो इस प्रकार इस 'पापमोचनी'का व्रत करता है, वह तेजस्वी विमानद्वारा भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
ब्रह्मन्! इस प्रकार कृष्ण तथा शुक्लपक्षमें एकादशीका व्रत मोक्षदायक कहा गया है। एकादशी व्रत तीन दिनमें साध्य होनेवाला बताया गया है। वह सब व्रतोंमें उत्तम और पापोंका नाशक है, अतः उसका महान् फल जानना चाहिये। नारद! इन तीन दिनके भीतर चार समयका भोजन त्याग देना चाहिये। प्रथम और अन्तिम दिनमें एक-एक बारका और बिचले दिनमें दोनों समयका भोजन त्याज्य है। अब मैं तुम्हें इस तीन दिनके व्रतमें पालन करने योग्य नियम बतलाता हूँ। काँसका
५७६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
बर्तन, मांस, मसूर, चना, कोदो, शाक, मधु, पराया अन्न, पुनर्भाजन (दो बार भोजन) और मैथुन—दशमीके दिन इन दस वस्तुओंसे वैष्णव पुरुष दूर रहे। जुआ खेलना, नींद लेना, पान खाना, दाँतुन करना, दूसरेकी निन्दा करना, चुगली खाना, चोरी करना, हिंसा करना, मैथुन करना, क्रोध करना और झूठ बोलना—एकादशीको ये ग्यारह बातें न करे। काँस, मांस, मदिरा, मधु, तेल, झूठ बोलना, व्यायाम करना, परदेशमें जाना, दुबारा भोजन, मैथुन, जो स्पर्श करने योग्य नहीं है उनका स्पर्श करना और मसूर खाना—द्वादशीको इन बारह वस्तुओंको न करे*। विप्रवर! इस प्रकार नियम करनेवाला पुरुष यदि शक्ति हो तो उपवास करे। यदि शक्ति न हो तो बुद्धिमान् पुरुष एक समय भोजन करके रहे, किंतु रातमें भोजन न करे। अथवा अयाचित वस्तु (बिना माँगे मिली हुई चीज)—को उपयोग करे, किंतु ऐसे महत्त्वपूर्ण व्रतका त्याग न करे।
बारह महीनोंके द्वादशी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा तथा आठ महाद्वादशियोंका निरूपण
सनातनजी कहते हैं—अनघ! अब मैं तुमसे द्वादशीके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, जिनका पालन करके मनुष्य भगवान् विष्णुका अत्यन्त प्रिय होता है। चैत्र शुक्ला द्वादशीको 'मदनव्रत'का आचरण करे। सफेद चावलसे भरे हुए एक नूतन कलशकी स्थापना करे, जिसमें कोई छेद न हो। वह अनेक प्रकारके फलोंसे युक्त इक्षुदण्डसंयुक्त दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित, श्वेत चन्दनसे चर्चित, नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंसे सम्पन्न तथा अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुशोभित हो। उसके ऊपर गुड़सहित ताँबेका पात्र रखे। उस पात्रमें कामस्वरूप भगवान् अच्युतका गन्ध आदि उपचारोंसे पूजन करे। द्वादशीको उपवास करके दूसरे दिन प्रातः-काल पुनः भगवान्की पूजा करे। वहाँ चढ़ी हुई वस्तुएँ ब्राह्मणको दे दे। फिर ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक द्वादशीको यह व्रत करके आचार्यको घृत-धेनुसहित सब सामग्रियोंसे युक्त शय्यादान दे। तदनन्तर वस्त्र आदिसे ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करके उन्हें सुवर्णमय कामदेव तथा दूध देनेवाली श्वेत गौ दान करे। दान करते समय यह कहे कि 'कामरूपी श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों।' जो इस विधिसे 'मदनद्वादशीव्रत'-का पालन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुकी समता प्राप्त कर लेता है। इसी तिथिको 'भर्तृद्वादशी'का व्रत बताया गया है। इसमें सुन्दर शय्या बिछाकर उसपर लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको स्थापित करके उनके ऊपर फूलोंसे मण्डप बनावे। तत्पश्चात् व्रती पुरुष गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान्की पूजा करे। माङ्गलिक गीत, वाद्य आदिके द्वारा रातमें जागरण करे, फिर दूसरे दिन प्रातःकाल शय्यासहित भगवान् विष्णुकी
* अथ ते नियमान् वच्मि व्रते ह्यस्मिन् दिनत्रये। कांस्यं मांसं मसूरात्रं चणकान् कोद्रवांस्तथा ॥
शाकं मधु परान्नं च पुनर्भाजनमैथुने। दशम्यां दश वस्तूनि वर्जयेद्वैष्णवः सदा ॥
द्यूतक्रीडां च निद्रां च ताम्बूलं दन्तधावनम्। परापवादं पैशुन्यं स्तेयं हिंसां तथा रतिम् ॥
कोपं ह्यनृतवाक्यं च एकादश्यां विवर्जयेत्। कांस्यं मांसं सुरां क्षौद्रं तैलं वितथभाषणम् ॥
व्यायामं च प्रवासं च पुनर्भाजनमैथुने। अस्पृश्यस्पर्शमासूरे द्वादश्यां द्वादश त्यजेत् ॥
(ना० पूर्व० १२०। ८६-९०)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५७७
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७७
सुवर्णमयी प्रतिमाका श्रेष्ठ ब्राह्मणको दान करे। ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणाद्वारा उन्हें संतुष्ट करके विदा करे। इस तरह व्रत करनेवाले पुरुषका दाम्पत्यसुख चिरस्थायी होता है और वह सात जन्मोंतक इहलोक और परलोकके अभीष्ट भोगोंको भोगता रहता है।
वैशाख शुक्ला द्वादशीको उपवास और इन्द्रियसयंमपूर्वक गन्ध आदि उपचारोंद्वारा भक्तिभावसे भगवान् माधवकी पूजा करे। फिर तृप्तिजनक मधुर पकवान और एक घड़ा जल ब्राह्मणको विधिपूर्वक देवे। 'भगवान् माधव मुझपर प्रसन्न हों', यही उसका उद्देश्य होना चाहिये। ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंके द्वारा भगवान् त्रिविक्रमकी पूजा करके व्रती पुरुष ब्राह्मणको मिष्ठान्नसे भरा हुआ करवा निवेदन करे। तत्पश्चात् एक समय भोजनका व्रत करे। इस व्रतसे संतुष्ट होकर देवदेव भगवान् त्रिविक्रम जीवनमें विपुल भोग और अन्तमें मोक्ष भी देते हैं। आषाढ़ शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदिसे पृथक्-पृथक् बारह ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें मिष्ठान्न भोजन करावे। फिर उनके लिये वस्त्र छड़ी, यज्ञोपवीत, अँगूठी और जलपात्र—इन वस्तुओंको भक्तिपूर्वक दान करे। 'भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों'—यही उस दानका उद्देश्य होना चाहिये। श्रावण शुक्ला द्वादशीको व्रती पुरुष भगवत्परायण हो गन्ध आदि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीधरकी पूजा करे। फिर उत्तम ब्राह्मणोंको दही-भात भोजन कराकर चाँदीकी दक्षिणा दे, उन्हें नमस्कार करके विदा करे। मन-ही-मन यह भावना करे कि 'मेरे इस व्रतसे देवेश्वर भगवान् श्रीधर प्रसन्न हों।' भाद्रपद शुक्ला द्वादशीको व्रती पुरुष भगवान् वामनकी पूजा करके उनके आगे बारह ब्राह्मणोंको खीर भोजन करावे। तत्पश्चात् स्वर्णमयी दक्षिणा दे। वह भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताको करनेवाला होता है। आश्विन शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान् पद्मनाभकी पूजा करे और उनके आगे ब्राह्मणोंको मिष्ठान्न भोजन करावे। साथ ही वस्त्र और सुवर्ण-दक्षिणा दे। द्विजोत्तम! इस व्रतसे संतुष्ट होकर भगवान् पद्मनाभ श्वेतद्वीपकी प्राप्ति कराते हैं और इहलोकमें भी मनोवाञ्छित भोग प्रदान करते हैं। कार्तिक मासके कृष्णपक्षमें 'गोवत्सद्वादशी' का व्रत होता है। उसमें बछड़ेसहित गौकी आकृति लिखकर सुगन्धित चन्दन आदिके द्वारा तथा पुष्पमालाओंसे उसकी पूजा करे। फिर ताम्रपात्रमें फूल, अक्षत और तिल रखकर उन सबके द्वारा विधिपूर्वक अर्घ्य दान करे। नारद! निम्नाङ्कित मन्त्रसे उसके चरणोंमें अर्घ्य देना चाहिये—
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते।
सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते॥
मातर्मातर्गवां मातर्गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व० १२१। ३०-३१)
'क्षीरसागरसे प्रकट हुई, सर्वदेवभूषिता, देव-
५७८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
दानववन्दिता, सम्पूर्ण देवस्वरूपा देवि! तुम्हें नमस्कार है। मातः! गोमातः! यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।'
तदनन्तर उड़द आदिसे बने हुए बड़े निवेदन करे। इस प्रकार अपने वैभवके अनुसार दस, पाँच या एक बड़ा अर्पण करना चाहिये। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
सुरभे त्वं जगन्माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता।
सर्वदेवमयि ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस॥
सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते।
मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि॥
(ना० पूर्व० १२१। ३२–३४)
'सुरभि! तुम सम्पूर्ण जगत्की माता हो और सदा भगवान् विष्णुके धाममें निवास करती हो। सर्वदेवमयी देवि! मेरे दिये हुए इस ग्रासको ग्रहण करो। देवि! तुम सर्वदेवस्वरूपा हो। सम्पूर्ण देवता तुम्हें विभूषित करते हैं। माता नन्दिनी! मेरी अभिलाषा सफल करो।'
द्विजोत्तम! उस दिन तेलका पका हुआ और बटलोईका पका हुआ अन्न न खाय। गायका दूध, दही, घी और तक्र भी त्याग दे। ब्रह्मन्! कार्तिक शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंसे एकाग्रचित्त हो भगवान् दामोदरकी पूजा करे और उनके आगे बारह ब्राह्मणोंको पकवान भोजन करावे। तदनन्तर जलसे भरे हुए घड़ोंको वस्त्रसे आच्छादित और पूजित करके सुपारी, लड्डू और सुवर्णके साथ उन सबको प्रसन्नतापूर्वक अर्पण करे। ऐसा करनेपर मनुष्य भगवान् विष्णुका प्रिय भक्त और सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता होता है और शरीरका अन्त होनेपर वह भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
मार्गशीर्ष शुक्ला द्वादशीको परम उत्तम 'साध्य-व्रत' का अनुष्ठान करना चाहिये। मनोभाव, प्राण, नर, अपान, वीर्यवान्, चिति, हय, नय, हंस, नारायण, विभु और प्रभु—ये बारह साध्यगण कहे गये हैं¹। चावलोंपर इनका आवाहन करके गन्ध-पुष्प आदिके द्वारा पूजन करना चाहिये। तदनन्तर 'भगवान् नारायण प्रसन्न हों', इस भावनासे बारह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें उत्तम दक्षिणा दे विदा करे। उसी दिन 'द्वादशादित्य' नामक व्रत भी विख्यात है। उस दिन बुद्धिमान् पुरुष बारह आदित्योंकी पूजा करे। धाता, मित्र, अर्यमा, पूषा, शक्र, अंश, वरुण, भग, त्वष्टा, विवस्वान्, सविता और विष्णु—ये बारह आदित्य बताये गये हैं।² प्रत्येक मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको यत्नपूर्वक बारह आदित्योंकी पूजा करते हुए एक वर्ष व्यतीत करे। व्रतके अन्तमें सोनेकी बारह प्रतिमाएँ बनवाये और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके बारह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक मिष्टान्न भोजन करावे। तत्पश्चात् व्रती पुरुष प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक प्रतिमा दे। इस प्रकार द्वादशादित्य नामक व्रत करके मनुष्य सूर्यलोकमें जा वहाँके भोगोंका चिरकालतक उपभोग करनेके पश्चात् पृथ्वीपर धर्मात्मा मनुष्य होता है। मनुष्ययोनिमें उसे रोग नहीं होते। उस व्रतके पुण्यसे वह पुनः उसी व्रतको पाता है और पुनः उसके पुण्यसे सूर्यमण्डलको भेदकर निरञ्जन, निराकार एवं निर्द्वन्द्व ब्रह्मको प्राप्त होता है।
१. मनोभवस्तथा प्राणो नरोऽपानश्च वीर्यवान्। चितिर्हयो नयश्चैव हंसो नारायणस्तथा॥
विभुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः।
(ना० पूर्व० १२१। ५१-५२)
२. धाता मित्रोऽर्यमा पूषा शक्रोऽशो वरुणो भगः। त्वष्टा विवस्वान् सविता विष्णुर्द्वादश ईरिताः॥
(ना० पूर्व० १२१। ५५-५६)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५७९
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७९
द्विजोत्तम ! उक्त तिथिको ही 'अखण्ड' नामक व्रत कहा गया है। उसमें भगवान् जनार्दनकी सुवर्णमयी मूर्ति बनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे उसकी पूजा करके भगवान्के आगे बारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। प्रत्येक मासकी द्वादशीको ऐसा करके स्वयं रातमें भोजन करे और जितेन्द्रिय भावसे रहे। तत्पश्चात् वर्ष पूरा होनेपर उस स्वर्ण-मूर्तिका विधिपूर्वक पूजन करके दूध देनेवाली गायके साथ उसका आचार्यको दान करे। तदनन्तर बारह श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको खाँड और खीर भोजन कराकर उन्हें बारह सुवर्णखण्डकी दक्षिणा दे नमस्कार करे। इस प्रकार व्रत पूरा करके जो भगवान् जनार्दनको प्रसन्न करता है, वह सुवर्णमय विमानसे श्रीविष्णुके परम धाममें जाता है।
पौष मासके कृष्णपक्षकी द्वादशीको 'रूप-व्रत' बताया गया है। ब्रह्मन् ! व्रती पुरुषको चाहिये कि वह दशमीको विधिपूर्वक स्नान करके सफेद या किसी एक रंगवाली गायके गोबरको धरतीपर गिरनेसे पहले आकाशमेंसे ही ले ले। उस गोबरसे एक सौ आठ पिण्ड बनाकर उन्हें ताँबे या मिट्टीके पात्रमें रखकर धूपमें सुखा ले। फिर एकादशीको उपवास करके भगवान् विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाका विधिपूर्वक पूजन और रात्रिमें जागरण करे। सुन्दर मङ्गलमय गीतवाद्य, स्तोत्र-पाठ और जप आदिके द्वारा जागरणका कार्य सफल बनावे। तत्पश्चात् प्रातः-काल जलसे भरे हुए कलशपर तिलसे भरा पात्र रखकर उसके ऊपर उस स्वर्णमयी प्रतिमाको रखे और विभिन्न उपचारोंसे उसकी पूजा करे। इसके बाद दो काष्ठोंके रगड़ने आदिके द्वारा नूतन अग्नि उत्पन्न करके उसकी पूजा करे और विद्वान् पुरुष उस प्रज्वलित अग्निमें तिल और घीसहित एक-एक गोमय-पिण्डका विष्णुसम्बन्धी द्वादशाक्षर*-मन्त्रसे होम करे। तत्पश्चात् पूर्णाहुति करके प्रेमपूर्ण हृदयसे प्रसन्नतापूर्वक एक सौ आठ ब्राह्मणोंको खीर भोजन करावे। फिर कलशसहित वह प्रतिमा आचार्यको अर्पित करे। तदनन्तर दूसरे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। पुरुष हो या स्त्री, इस व्रतका आदरपूर्वक पालन करके वह रूप और सौभाग्य प्राप्त कर लेती है।
माघ शुक्ला द्वादशीको शालग्रामशिलाकी विधिपूर्वक भक्तिभावसे पूजा करके उसके मुख्यभागमें सुवर्ण रखे। फिर उसे चाँदीके पात्रमें रखकर दो श्वेत वस्त्रोंसे ढक दे। तत्पश्चात् वेदवेत्ता ब्राह्मणको उसका दान दे। दान देनेके पश्चात् उस ब्राह्मणको खाँड़ और घीके साथ हितकर खीरका भोजन करावे, यह करके स्वयं एक समय भोजनका व्रत करते हुए भगवान् विष्णुके चिन्तनमें लगा रहे। ऐसा करनेवाला पुरुष यहाँ मनोवाञ्छित भोग भोगनेके पश्चात् विष्णुधाम प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मन् ! फाल्गुन मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको श्रीहरिकी सुवर्णमयी प्रतिमाका गन्ध-पुष्प आदिसे पूजन करके उसे वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान कर दे। फिर बारह ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। उसके बाद स्वयं भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। त्रिस्पृशा, उन्मीलनी, पक्षवर्धिनी, वञ्जुली, जया, विजया, जयन्ती तथा अपराजिता—ये आठ प्रकारकी द्वादशी तिथियाँ सब पापोंका नाश करनेवाली हैं। इनमें सदा उपवासपूर्वक व्रत रहना चाहिये।
श्रीनारदजीने पूछा— ब्रह्मन् ! इन सब द्वादशियोंका लक्षण कैसा है? और उनका फल कैसा होता है, वह सब मुझे बताइये। इसके सिवा अन्य पुण्यदायक तिथियोंका भी परिचय दीजिये।
सूतजी कहते हैं— महर्षियो ! देवर्षि नारदने द्विजश्रेष्ठ सनातनजीसे जब इस प्रकार प्रश्न किया
* ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
५८० * संक्षिप्त नारदपुराण *
तो सनातन मुनिने अपने भाई महाभागवत नारदजीकी प्रशंसा करके कहा।
सनातनजी बोले— भैया ! तुम तो साधु पुरुषोंके संशयका निवारण करनेवाले हो। तुमने यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है। मैं तुम्हें महाद्वादशियोंके पृथक्-पृथक् लक्षण और फल बतलाता हूँ। जिस दिन एकादशी सूर्योदयसे पहले—अरुणोदयकालमें ही निवृत्त हो गयी हो, (दिनभर द्वादशी हो और रातके अन्तिम भागमें त्रयोदशी आ गयी हो) उस दिन ‘त्रिस्पृशा’ नामवाली द्वादशी होती है। उसका महान् फल होता है। नारद ! जो मनुष्य उसमें उपवास करके भगवान् गोविन्दका पूजन करता है, वह निश्चय ही एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जब अरुणोदयकालमें एकादशी तिथि दशमीसे विद्ध हो (और एकादशी पूरे दिन रहकर दूसरे दिन भी कुछ कालतक विद्यमान हो) तो उस प्रथम दिनकी एकादशीको छोड़कर दूसरे दिन महाद्वादशीको उपवास करे (उसे ‘उन्मीलनी’ द्वादशी कहते हैं)। उस उन्मीलनी व्रतमें उत्तम पूजाकी विधिसे भगवान् वासुदेवका यजन करके मनुष्य एक सहस्र राजसूय-यज्ञका फल पाता है। जब सूर्योदयकालमें दशमी एकादशीका स्पर्श करती हो (और द्वादशीकी वृद्धि हुई हो) तो उस एकादशीको त्यागकर ‘वञ्जुली’ नामवाली उस महाद्वादशीको ही सदा उपवास करना चाहिये। उसमें सबको सदा अभयदान करनेवाले परम पुरुष संकर्षणदेवका गन्ध आदि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करे। यह महाद्वादशी सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाली, सब पापोंको हर लेनेवाली तथा समस्त सम्पदाओंको देनेवाली कही गयी है। विप्रवर ! जब पूर्णिमा अथवा अमावास्या नामकी तिथियाँ बढ़ जाती हैं, तो उस पक्षकी द्वादशीका नाम ‘पक्षवर्धिनी’ होता है, जो महान् फल देनेवाली है। उसमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले तथा पुत्र और पौत्रोंको बढ़ानेवाले जगदीश्वर भगवान् प्रद्युम्नका पूजन करना चाहिये। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी तिथि मघा नक्षत्रसे युक्त हो तो उसका नाम ‘जया’ होता है। वह सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाली है। उसमें समस्त कामनाओंके दाता और मनुष्योंको सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् अनिरुद्धकी आराधना करनी चाहिये। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी तिथि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो वह ‘विजया’ नामसे प्रसिद्ध होती है। उसमें सदा समस्त भोगोंके आश्रय तथा सम्पूर्ण सौख्य प्रदान करनेवाले भगवान् गदाधरकी पूजा करनी चाहिये। विप्रवर ! ‘विजया’ में उपवास करके मनुष्य सम्पूर्ण तीर्थोंका फल पाता है। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी रोहिणी नक्षत्रसे युक्त होती है, तब वह महापुण्यमयी ‘जयन्ती’ नामसे प्रसिद्ध होती है। उसमें मनुष्योंको सिद्धि देनेवाले भगवान् वामनकी अर्चना करनी चाहिये। यह तिथि उपवास करनेपर सम्पूर्ण व्रतोंका फल देती है, समस्त दानोंका फल प्रस्तुत करती है और भोग तथा मोक्ष देनेवाली होती है। जब शुक्लपक्षमें द्वादशी तिथि पुष्य नक्षत्रसे युक्त हो तो उसे ‘अपराजिता’ कहा गया है। वह सम्पूर्ण ज्ञान देनेवाली है। उसमें संसार-बन्धनका नाश करनेवाले, ज्ञानके समुद्र तथा रोग-शोकसे रहित भगवान् नारायणकी आराधना करनी चाहिये। उस तिथिको उपवास करके ब्राह्मणभोजन करानेवाला मनुष्य उस व्रतके पुण्यसे ही संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
जब आषाढ़ शुक्ला द्वादशीको अनुराधा नक्षत्र हो, तब दो व्रत करने चाहिये। यहाँ एक ही देवता है, इसलिये दो व्रत करनेमें दोष नहीं है। जब भाद्रपद शुक्ला द्वादशीको श्रवण नक्षत्रका योग हो और कार्तिक शुक्ला द्वादशीको रेवती
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५८१
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५८१
नक्षत्रका संयोग हो तो एकादशी और द्वादशी दोनों दिन व्रत रहने चाहिये। विप्रवर! इनके सिवा अन्यत्र द्वादशीको एक समय भोजन करके व्रत रहना चाहिये। यह व्रत स्वभावसे ही सब पातकोंका नाश करनेवाला बताया गया है। द्वादशीसहित एकादशीका व्रत नित्य माना गया है, अतः यहाँ उसका उद्यापन नहीं कहा गया। इसे जीवनपर्यन्त करते रहना चाहिये।
त्रयोदशी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा
सनातनजी कहते हैं—नारद! अब मैं तुम्हें त्रयोदशीके व्रत बतलाता हूँ, जिनका भक्तिपूर्वक पालन करके मनुष्य इस पृथ्वीपर सौभाग्यशाली होता है। चैत्र कृष्णपक्षकी त्रयोदशी शनिवारसे युक्त हो तो 'महावारुणी' मानी गयी है। यदि उसमें गङ्गा-स्नानका अवसर मिले तो वह कोटि सूर्यग्रहणोंसे अधिक फल देनेवाली है। चैत्रके कृष्णपक्षमें त्रयोदशीको शुभ योग, शतभिषा नक्षत्र और शनिवारका योग हो तो वह 'महामहावारुणी'—के नामसे विख्यात होती है। ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशीको 'सौभाग्यशमनव्रत' होता है। उस दिन नदीके जलमें स्नान करके पवित्र स्थानमें उत्पन्न हुए सफेद मदार, आक और लाल कनेरकी पूजा करे। उस समय आकाशमें सूर्यकी ओर देखकर निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रार्थना करे—
मन्दारकरवीराका भवन्तो भास्करांशजाः।
पूजिता मम सौभाग्यं नाशयन्तु नमोऽस्तु वः॥
(ना० पूर्व० १२२। २०-२१)
'मदार! कनेर! और आक! आप लोग भगवान् भास्करके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। अतः पूजित होकर मेरे दुर्भाग्यका नाश करें, आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक एक-एक वर्षतक इन तीनों वृक्षोंकी पूजा करता है, उसका दुर्भाग्य नष्ट हो जाता है। आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशीको एक समय भोजनका व्रत करे। भगवती पार्वती और भगवान् शङ्कर—इन दोनों जगदीश्वरोंकी यथाशक्ति सोने, चाँदी अथवा मिट्टीकी मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करे। भगवती उमा सिंहपर बैठी हों और भगवान् शङ्कर वृषभपर। नारद!
इन दोनों प्रतिमाओंको देवमन्दिर, गोशाला अथवा ब्राह्मणके घरमें वेदमन्त्रद्वारा स्थापित करके लगातार पाँच दिनतक नित्य पूजन तथा एक समय भोजनके व्रतका पालन करे। तदनन्तर अन्तिम दिन प्रातःकाल स्नान करके पुनः उन दोनों प्रतिमाओंकी पूजा करे। फिर वेद-वेदाङ्गके ज्ञानसे सुशोभित ब्राह्मणको वे दोनों विग्रह समर्पित कर दे। पाँच वर्षोंतक प्रतिवर्ष इसी प्रकार करना चाहिये। पाँचवाँ वर्ष बीतनेपर दूध देनेवाली दो गौओंके साथ उन दोनों प्रतिमाओंका
| ५८२ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
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दान करे। स्त्री हो या पुरुष—जो इस प्रकार इस शुभ व्रतका पालन करता है, वह सात जन्मोंतक दाम्पत्यसुखसे वञ्चित नहीं होता—उसका दाम्पत्य-सम्बन्ध बीचमें खण्डित नहीं होता।
भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशीको ‘गोत्रिरात्रव्रत’ बताया गया है। उस दिन भगवान् लक्ष्मीनारायणकी सोने या चाँदीकी प्रतिमा बनवाकर उसे पञ्चामृतसे स्नान करावे। तत्पश्चात् शुभ अष्टदल मण्डलमें पीठपर उस भगवद्विग्रहको स्थापित करके सुन्दर वस्त्र चढ़ाकर गन्ध आदिसे उसकी पूजा करे। तत्पश्चात् आरती करके अन्न और जलसहित घटदान करे। नारद! इस प्रकार तीन दिनतक सब विधिका पालन करके व्रतके अन्तमें गौका पूजन करे और भलीभाँति धनकी दक्षिणा देकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे गौको नमस्कारपूर्वक दान दे—
पञ्च गावः समुत्पन्ना मथ्यमाने महोदधौ।
तासां मध्ये तु या नन्दा तस्यै धेन्वौ नमो नमः॥
(ना० पूर्व० १२२। ३६-३७)
‘जब क्षीरसमुद्रका मन्थन होने लगा, उस समय उससे पाँच गौएँ उत्पन्न हुईं। उनके मध्यमें जो नन्दा नामवाली गौ है, उस धेनुको बारम्बार नमस्कार है।’
तदनन्तर नीचे लिखे मन्त्रसे गायकी प्रदक्षिणा करके उसे ब्राह्मणको दान दे। (मन्त्र इस प्रकार है—)
गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः।
गावो मे पार्श्वतः सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
(ना० पूर्व० १२२। ३८)
‘गौएँ मेरे आगे रहें, गौएँ मेरे पीछे रहें, गौएँ मेरे बगलमें रहें और मैं गौओंके बीचमें निवास करूँ।’
तत्पश्चात् ब्राह्मणदम्पतिका पूर्णतः सत्कार करके उन्हें भोजन करावे और उन्हें आदरपूर्वक लक्ष्मी-नारायणकी प्रतिमा दान करे। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय यज्ञोंका अनुष्ठान करके मनुष्य जिस फलको पाता है, उसीको वह ‘गोत्रिरात्रव्रत’ से पा लेता है। आश्विन शुक्ला त्रयोदशीको तीन राततक ‘अशोकव्रत’ करे। उस दिन नारी उपवासपरायण हो अशोककी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवाकर शास्त्रीय विधिसे उसकी प्रतिदिन पूजा और आदरपूर्वक एक सौ आठ परिक्रमा करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—
हरेण निर्मितः पूर्वं त्वमशोक कृपालुना।
लोकोपकारकरणस्तत्प्रसीद शिवप्रिय॥
(ना० पूर्व० १२२। ४३)
‘अशोक! तुम्हें पूर्वकालमें परम कृपालु भगवान् शङ्करने उत्पन्न किया है। तुम सम्पूर्ण जगत्का उपकार करनेवाले हो; अतः शिवप्रिय अशोक! तुम मुझपर प्रसन्न होओ।’
तदनन्तर तीसरे दिन, उस अशोकवृक्षमें भगवान् शङ्करकी विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणको भोजन करावे और उसे अशोक-प्रतिमाका दान करे। इस प्रकार व्रत करनेवाली नारी कभी वैधव्यका कष्ट नहीं पाती। वह पुत्र-पौत्र आदिके साथ रहकर अपने पतिकी अत्यन्त प्रियतमा होती है। कार्तिक कृष्णा त्रयोदशीको एकाग्रचित्त हो एक समय भोजनका व्रत करे। प्रदोषकालमें तेलका दीपक जलाकर उसकी यत्नपूर्वक पूजा करे और घरके द्वारपर बाहरके भागमें उस दीपकको इस उद्देश्यसे रखे कि इसके दानसे यमराज मुझपर प्रसन्न हों। विप्रेन्द्र! ऐसा करनेपर मनुष्यको यमराजकी पीड़ा नहीं प्राप्त होती। द्विजोत्तम! कार्तिक शुक्ला त्रयोदशीको मनुष्य एक समय भोजन करके व्रत रखे। प्रदोषकालमें पुनः स्नान करके मौन और एकाग्रचित्त हो बत्तीस दीपकोंकी पङ्क्तिसे भगवान् शिवको आलोकित करे। घीसे दीपकोंको जलाये और गन्ध आदिसे भगवान् शिवकी पूजा करे।