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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

चोर से सत्य उगलवाने के लिए निम्नोक्त रूप से प्रश्न पूछने चाहिए—

  1. चोरी के समय तुम कहां थे ?
  2. चोरी का स्थान तुम्हारे निवास से कितनी दूर है ?
  3. क्या चोरी के समय तुम चोरी के स्थान की दिशा में थे अथवा किसी अन्य दिशा में थे ?
  4. तुम्हारा वास्तविक नाम क्या है ? क्या तुम सभी स्थानों पर इसी नाम से जाने जाते हो ?
  5. तुम्हारी जाति क्या है ?
  6. तुम्हें आश्रय देने वाले कौन-कौन से लोग हैं और तुम्हारा उनसे क्या सम्बन्ध है ?
  7. तुम्हारे नौकर-चाकर कौन-कौन से हैं और कहां हैं ? इसके अतिरिक्त चोर पर दबाव बनाये रखने के लिए उसके बन्धु-बान्धवों तथा नौकर-चाकरों को बांधकर रखना चाहिए। वर्णस्वराकारभेदात् संसदि त्वनिवेदनात्। अदेशकालदृष्टत्वाद्वासस्याप्यविशोधनात् ॥ 10 ॥ असद्व्ययात् पूर्वचौर्यादसत्संसर्गकारणात्। लेख्यैरप्यवगन्तव्या न होढेनैव केवलम् ॥ 11 ॥ चोरी के सामान के मिलने के अतिरिक्त निम्नोक्त अन्य लक्षणों से व्यक्ति के चोरी में लिप्त होने का अनुमान लगाना चाहिए—
  8. चेहरे के रंग का उड़ना, फीका व पीला पड़ना।
  9. स्वर का बदलना, कांपना, घबराहट होना।
  10. चेहरे का ऊपर न उठा पाना, अर्थात् अपराध-बोध से ग्रस्त होना।
  11. सभा में बोल न पाना, जिह्वा का लड़खड़ाना, वाणी का अवरुद्ध हो जाना।
  12. ग़लत स्थान—सुनसान, खण्डहर, जंगल, बाग़, क़िला, श्मशान आदि में ग़लत समय—गरमी की दोपहरी या रात के अंधेरे में घूमता-भटकता दीखना।
  13. भद्दी हंसी हंसना।
  14. अनाप-शनाप और बेकार की वस्तुओं पर ख़र्च करना।
  15. व्यसनों—जुआ, शराब, वेश्यागमन—में ग्रस्त होना।
  16. कलंकित (बदनाम) चोरों के साथ सम्बन्ध रखना तथा
  17. चोरी से सम्बद्ध किसी लेख का मिल जाना। दस्युवृत्ते यदि नरे शङ्का स्यात्तस्करेऽपि वा। यदि स्पृशेत् लेशेन कार्यः स्याच्छपथं ततः ॥ 12 ॥ राजा को समाज के किसी भी व्यक्ति से चोरी-डाके से सम्बन्धित व्यक्ति के नारदस्मृति / 265

विरुद्ध उपलब्ध किसी भी साक्ष्य अथवा प्रमाण को अत्यन्त गम्भीरता से लेना चाहिए तथा सन्दिग्ध व्यक्ति से शपथपूर्वक गहरी पूछताछ करनी चाहिए। चौराणां भक्तदा ये स्युस्तथाप्युदकदायकाः । आवासदा देशिकाश्च तथैवोत्तरदायकाः ॥ 13 ॥ क्रेतारश्चैव भाण्डानां प्रतिग्राहिण एव च। समदण्डाः स्मृतास्ते तु ये च प्रच्छादयन्ति तान् ॥ 14 ॥

  1. चोरों को अन्न, जल तथा आवास जुटाने वालों।
  2. चोर से पूछे प्रश्नों का उसकी ओर से उत्तर देने वालों।
  3. चोरी के सामान का क्रय-विक्रय करने वालों।
  4. चोरों अथवा चोरी के समान को छिपाने वालों तथा
  5. चोरों को उसकी खोज के लिए सरकार द्वारा उठाये जा रहे पगों की सूचना देने वालों को भी चोर समझना तथा चोरों के लिए निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए। राष्ट्रेषु राष्ट्राधिकृताः सामन्ताश्चैव चोदिताः। अभ्याघाते तु मध्यस्था यथा चौरास्तथैव तेः ॥ 15 ॥ राजा द्वारा चोरों को पकड़ने के लिए नियुक्त तथा सूचना मिलने पर त्वरित कार्यवाही न करने वाले सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को, चोरी की जानकारी रखने वाले चोरों के पड़ोसियों को तथा चोरी का पता चलने पर 'बचाओ' की गुहार सुनने पर वहां से भाग खड़े होने वालों को भी चोर समझना और चोर के लिए निर्धारित दण्ड देना चाहिए। गोचरे यस्य मुष्येत तेन चौराः प्रयत्नतः । मृग्या दाप्योऽप्यथवा मोषं पदं यदि न निर्गतम् ॥ 16 ॥ गोचारण क्षेत्र में हुई चोरी के लिए उस क्षेत्र की नाकाबन्दी कर देनी चाहिए, अर्थात् चोर को बाहर निकलने-भागने ही नहीं देना चाहिए। यदि चोर भागने की चेष्टा नहीं करता है, चोरी का सामान स्वामी को लौटा देता है और अपने अपराध के लिए क्षमा-याचना करता है, तो उसकी प्रताड़ना करने के पश्चात् उसे छोड़ देना चाहिए। निर्गते तु यदा यस्मिन्नष्टेऽन्यत्र न पातयेत्। सामन्तान्मार्गपालांश्च दिक्पालांश्चैव दापयेत् ॥ 17 ॥ चोर के गोचारण क्षेत्र से बाहर निकलकर भाग जाने पर आस-पास चारों ओर नियुक्त रक्षकों को चोर को ढूंढ़ने का दायित्व सौंपना चाहिए। रक्षकों के विफल होने पर उनसे ही चोरी के सामान की भरपाई करानी चाहिए। 266 / नारदस्मृति

गृहे वै मुषिते राजा चौरग्राहकांस्तु दापयेत्। आरक्षकान् राष्ट्रिकांश्च यदि चौरो न लभ्यते ॥ 18 ॥ घर में हुई किसी चोरी के अपराधी चोर के न पकड़े जाने पर गृहस्वामी को चोर को पकड़ने के लिए व चोरी न होने देने के लिए नियुक्त सिपाहियों— चौकीदारों, सीमा पर नियुक्त प्रहरियों तथा राज्य-रक्षा के लिए नियुक्त अधिकारियों— से चोरी के सामान की भरपाई करनी चाहिए। यदि वा दोषकर्तैष तस्मिन्मोषे तु संशयः। मुषितः शपथं दाप्यो मोषे वै शुद्धिकारणात् ॥ 19 ॥ चोरी की रिपोर्ट के झूठा होने का सन्देह उत्पन्न होने पर रिपोर्ट लिखाने वाले को आड़े हाथों लेना चाहिए और सत्य की गहरी छानबीन करनी तथा सम्बद्ध व्यक्ति से शपथपत्र (ऐफ़िडेविट) लिखवाना चाहिए। रिपोर्ट के झूठा सिद्ध होने पर सम्बद्ध व्यक्ति को अभियुक्त मानकर दण्डित करना चाहिए। अचौरै बोधितो मोषं चौरो वै शुद्धकारणात्। चौरे लब्धे लभेयुस्ते द्विगुणं प्रतिपादिताः ॥ 20 ॥ चोर न होने पर, सन्देह के कारण चोरी के आरोप में पकड़े गये व्यक्ति को अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए प्रमाण जुटाना पड़ता है। वास्तविक चोर के पकड़े जाने पर सन्देह में पकड़े गये व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के रूप में चुराये द्रव्य के मूल्य का दुगुना दिया जाता है। चौरहृतं प्रपद्यैव स्वरूपं प्रतिपादयेत्। तदभावे तु मूल्यं स्याद्दण्डं दाप्यश्च तत्समम् ॥ 21 ॥ चोरी का माल जिस रूप में पकड़ा जाता है, उसी रूप में सरकार के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। चोर के पकड़े जाने पर, परन्तु चोरी के माल के न मिलने पर चोर से चोरी के माल का दाम और उतना ही जुर्माना वसूल करना चाहिए। काष्ठकाण्ड तृणादीनां मृण्मयानां तथैव च। वेणुवैणवभाण्डानां वेतसस्यास्थिचर्मणोः ॥ 22 ॥ शाकहरितमूलानां हारणे तृणपुष्पयोः। गोरसेक्षुविकाराणां तथा लवणतैलयोः ॥ 23 ॥ पक्वान्नानां कृतान्नानां मद्यानामामिषस्य च। सर्वेषामल्पमूल्यानां मूल्यात् पञ्चगुणो दमः ॥ 24 ॥ निम्नोक्त अल्पमूल्य वस्तुओं की चोरी करने वालों के पकड़े जाने पर उनको चुरायी वस्तु के दाम का पांच गुना अर्थ-दण्ड (जुर्माना) के रूप में चुकाना पड़ता है—

  1. लकड़ी, 2. घास-फूस, 3. कुश और काना—लेखनी के रूप में प्रयोग में नारदस्मृति / 267

आने वाला मजबूत तिनका, 4. मिट्टी के बरतन, मूर्तियां, खिलौना आदि, 5. बांस अथवा बांस से बनी टोकरी, पिटारी, कुर्सी आदि, 6. बेंत, 7. चमड़ा अथवा चमड़े से बना सामान—जूता, मशक आदि, 8. शाक तथा हरी सब्जियां-गाजर, आलू, मूली, शकरकन्दी आदि, 9. फल-फूल, 10. दूध, 11. गन्ना तथा उसके रस से बना गुड़ आदि, 12. नमक, 13. तेल, 14. पका भोजन, 15. गेहूं, 16. मदिरा तथा 17. मांस आदि। तुलाधरिम्मेयानां गणिमानां च सर्वतः। एभ्यस्तूत्कृष्टमूल्यानां मूल्यादष्टगुणो दमः ॥ 25 ॥ उपर्युक्त अल्पमूल्य के सत्रह पदार्थों से अपेक्षाकृत अधिक मूल्य वाले निम्नोक्त पदार्थों को चुराने वाले चोर से सामान के मूल्य का आठ गुना दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिए— तराजू, पलड़े, बाट, मापने का फ़ीता, गज़ आदि तथा गिनने का सामान- कौड़ियां आदि। धान्य दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः। न्यूनं वैकादशगुणं दण्डं दाप्योऽब्रवीन्मनुः ॥ 26 ॥ मनु के अनुसार दस मटकों से अधिक परिमाण में धान्य चुराने वाले को शारीरिक दण्ड देना चाहिए। इससे कम परिमाण के धान्य की चोरी के लिए चुराये गये अन्न के मूल्य का ग्यारह गुना जुर्माने के रूप में वसूल करना चाहिए। सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम्। रत्नानां चैव मुख्यानां शतादभ्यधिके वधः ॥ 27 ॥ सुवर्ण, रजत, उत्तम वस्त्रों, मुख्य रत्नों—हीरा, पन्ना, पुखराज—आदि की चोरी करने वाले से इन मूल्यवान् पदार्थों के दाम का सौगुना अर्थ-दण्ड वसूल करना चाहिए। पुरुषं हरतः पात्यो दण्ड उत्तमसाहसः । सर्वस्वं स्त्रीं तु हरतः कन्यां तु हरतो वधः ॥ 28 ॥ पुरुष के अपहरण का दण्ड उत्तम साहस, स्त्री (विवाहिता) के अपहरण का दण्ड अपहर्ता के सर्वस्व पर अधिकार तथा कन्या के अपहरण के लिए मृत्यु-दण्ड देना चाहिए। महापशूंस्तु नयतो दण्ड उत्तमसाहसः । मध्यमो मध्यमपशून् पूर्वः क्षुद्रपशुं हरन् ॥ 29 ॥ गधा, भेड़, बकरी आदि छोटे पशुओं, गाय, बैल और भैंस आदि मध्यम स्तर के पशुओं तथा अश्व, ऊंट और हाथी आदि बड़े पशुओं को चुराने का क्रमशः पूर्व साहस, मध्यम साहस तथा उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए। 268 / नारदस्मृति

चतुर्विंशावरः पूर्वः परं षण्णवतिर्भवेत्। चतुःशतपरो यश्च मध्यमो द्विशतावरः ॥ ३० ॥ सहस्त्रं तूत्तमो ज्ञेयः परः पञ्चशतावरः। त्रिविधः साहसेष्वेवं दण्डः प्रोक्तः स्वयम्भुवा ॥ ३१ ॥ महर्षि मनु द्वारा अपनी स्मृति में किये गये निर्देश-उल्लेख के अनुसार- नक़द 24-96 पणों (रुपयों) की (सौ पणों तक की), 200-400 पणों की तथा 500-1000 पणों की चोरी करने वाले को क्रमशः पूर्व साहस, मध्यम साहस तथा उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए। प्रथमे ग्रन्थिभेदानामङ्गुल्यङ्गुष्ठयोर्वधः। द्वितीये चैव तज्ज्ञेयं दण्डः पूर्वस्तु साहसः ॥ ३२ ॥ पहली बार जेब काटने का दण्ड चोर की अंगुलि और उसके अंगूठे को काट देना है। इस अपराध को दुहराने वाले, अर्थात् दूसरी बार जेब काटने वाले को पूर्व साहस दण्ड देना चाहिए। गोषु ब्राह्मणसंस्थासु स्थूरायाश्छेदनं भवेत्। दासीं तु हरतो नित्यमर्धपादविकर्तनम् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली गायों के हरण करने का दण्ड चोर के दोनों घुटनों को नकारा कर देना है तथा ब्राह्मणों के स्वामित्व वाली दासी के अपहरण का दण्ड चोर के पैरों को अधकटा बना देना है। येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते। तत्तदेवावच्छेत्तव्यं तन्मनोरनुशासनम् ॥ ३४ ॥ चोर अपने जिस-जिस अंग से चोरी करता है, उसके उस-उस अंग को काट देना ही उसके अपराध का दण्ड है। यही मनु की भी व्यवस्था है। गरीयसि गरीयांसमगरीयसि वा पुनः। स्तेने निपातयेद्दण्डं न यथा प्रथमे तथा ॥ ३५ ॥ देश-काल के अनुसार अपराध की गुरुता और लघुता के अनुरूप ही राजा को गुरु तथा लघु दण्ड का विधान करना चाहिए। उदाहरणार्थ, सुभिक्ष में अन्न की चोरी के लिए जिस दण्ड का विधान है, दुर्भिक्ष में उसी अपराध के लिए वही दण्ड न्यायोचित नहीं है। दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत्। त्रिषु वर्णेषु यानि स्युर्ब्राह्मणस्त्वक्षतः सदा ॥ ३६ ॥ मनु ने तीन-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-वर्णों के लोगों के द्वारा चौर्यादि के लिए दण्ड का विधान किया है। ब्राह्मण को तो सर्वथा अदण्ड्य माना है। तीनों वर्णों के अपराधियों के निम्नोक्त दस अंगों पर प्रहार किया जाना चाहिए। नारदस्मृति / 269

उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम्।

उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम्। चक्षुर्नासा च कर्णौ च धनं देहस्तथैव च॥ 37॥ दस प्रहरणीय अंग है—1. लिंग (जननेन्द्रिय), 2. उदर, 3. जिह्वा, 4. दोनों हाथ, 5. दोनों पैर, 6. चक्षु, 7. नासिका, 8. दोनों कान, 9. धन तथा देह। टिप्पणी—यहां चूतड़ों, टांगों और पीठ का उल्लेख नहीं हुआ। प्रायः बेतों का प्रहार इन्हीं तीन अंगों पर किया जाता है। 'देह' से स्मृतिकार का अभीष्ट स्पष्ट नहीं है। लिंग, आंख, नाक, कान तथा नासिका आदि कोमल अंगों पर तो प्रहार वर्जित होना चाहिए। अपराधं परिज्ञाय देशकालौ च तत्त्वतः। सारानुबन्धावालोक्य दण्डानेतान् प्रकल्पयेत्॥ 38॥ देश और काल के सन्दर्भ में अपराधी की मानसिकता तथा उसके चरित्र आदि की समीक्षा करने के उपरान्त ही उपर्युक्त दस स्थानों पर दण्ड देने का आदेश देना चाहिए। उदाहरणार्थ, सुशिक्षित एवं सच्चरित्र व्यक्ति द्वारा प्रयत्न करने पर भी नौकरी न पाने से निराश तथा अपने भूखे बच्चे को बिलखता न देख सकने के कारण चोरी करने को विवश होने पर उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण ही अपनाना चाहिए। आंख मींचकर दण्ड संहिता का पालन करना उचित नहीं। न मित्रकारणाद्राज्ञा विपुलाद्वा धनागमात्। उत्सृष्टव्यः साहसिकस्त्यक्तात्मा मनुरब्रवीत्॥ 39॥ मनु महाराज का यह भी स्पष्ट कथन है कि पकड़े गये चोर-डाकू के राजा का सम्बन्धी होने पर अथवा उसके द्वारा भारी घूस का प्रस्ताव किये जाने पर, उसे किसी भी स्थिति में छोड़ नहीं देना चाहिए। पक्षपात करने वाला राजा अथवा राज्यकर्मचारी नरकगामी होते हैं। यावानबध्यस्य वधे तावान् बध्यस्य मोक्षणे। भवत्यधर्मो नृपतेर्धर्मस्तु विनियच्छतः॥ 40॥ जिस प्रकार अवध्य का वध करना और वध्य का वध न करके उसे छोड़ देने से राजा को महापाप लगता है, उसी प्रकार विचारपूर्वक घोषित अपराधी मनोवृत्ति के चोर डाकू के प्रति पक्षपात करने, उसके प्रति अनुग्रह दिखाने पर भी राजा पाप का भागी होता है। जिस प्रकार निरपराध को दण्ड देना पाप है, उसी प्रकार अपराधी को दण्ड न देना भी पाप है। न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम्। निर्वास्यं कारयेत् काममिति धर्मो व्यवस्थितः॥ 41॥ राजा को किसी भी प्रकार के छोटे-बड़े अपराध करने पर ब्राह्मण को कभी 270 / नारदस्मृति

दण्ड नहीं देना चाहिए। राजा को अधिक-से-अधिक किल्विषी (पापकर्मा) ब्राह्मण को अपने देश से निर्वासित कर देना चाहिए। सर्वस्वं वा हरेद्राजा चतुर्थं वाऽवशेषयेत्। एतेभ्योऽनुस्मरन्धर्मं प्राजापत्यमिति स्थितिः॥ 42 ॥ राजा को प्रयत्न करने पर भी न सुधरने वाले और देश से निकलने को असहमत ब्राह्मण की सम्पत्ति छीन लेनी चाहिए अथवा उसकी सम्पत्ति का चौथा भाग उसके निर्वाह के लिए छोड़कर शेष पर अपना अधिकार कर लेना चाहिए। ऐसा करते समय राजा को दुखी मन से यह कहना चाहिए कि प्रजापति द्वारा विहित धर्म की रक्षा के लिए, उसे न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ रहा है-देवता उसे क्षमा करें। ब्राह्मणस्यापराधेसु चतुर्ध्वङ्को विधीयते। गुरुतल्पे सुरापाने स्तेयं ब्राह्मणहिंसने ॥ 43 ॥ ब्राह्मण द्वारा सुरापान, गुरुपत्नी-गमन, स्तेय तथा ब्रह्महत्या आदि निकृष्ट एवं जघन्य कार्यों के किये जाने पर भी उसके शरीर पर इन अपराधों के सूचक चार प्रकार के चिह्नों को अंकित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे अन्य किसी प्रकार का आर्थिक अथवा शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिए। गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने ध्वजः स्मृतः। स्तेये तु श्वपदं कृत्वा शिशिपितेन पूरयेत्॥ 44 ॥ सुरापान करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर ध्वजा का, गुरुपत्नी-गमन करने वाले के मस्तक पर भग का तथा चोरी करने पर कुत्ते के पद का चिह्न बनाना चाहिए। कुरेदे हुए चिह्न के भीतर मोरपित्त-मोरपंख की राख-भर देनी चाहिए, जिससे ऐसा चिह्न कभी मिट अथवा लुप्त न हो सके, अपितु स्थायी रूप से सबको दीखता रहे, ताकि लोग उसका बहिष्कार करने में भूल-चूक न कर सकें। अशिरः पुरुषः कार्यो ललाटे ब्रह्मघातिनः। असम्भाष्यश्च कर्त्तव्यस्तन्मनोरनुशासनम् ॥ 45 ॥ ब्रह्महत्या करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर उसके इस पाप के सूचक मस्तकविहीन (सिरकटे) पुरुष का चिह्न अंकित किया जाता है। महाराज मनु का स्पष्ट निर्देश है कि इन चारों प्रकार के अपराधी ब्राह्मणों का सामाजिक बहिष्कार कर देना चाहिए। यहां तक कि उनके साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिए। राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता। आचक्षाणेन तत्स्तेयमेवंकर्मास्मि शाधि माम् ॥ 46 ॥ अनेना भवति स्तेनः स्वकर्मप्रतिपादनात्। राजा तत्स्पृशेदेनमुत्सृजेत्तु ह्यकिल्बिषम् ॥ 47 ॥ नारदस्मृति / 271

यदि चोरी करने पर चोर पश्चात्ताप की आग में जलता हुआ व मुक्तकेश अवस्था में चारों ओर दौड़ता हुआ, उच्च स्वर में अपने पाप को सार्वजनिक रूप से घोषित करता है और रुदन करता हुआ राजा के पास जाता है तथा दण्ड के लिए अपने आपको प्रस्तुत करता है, तो ऐसे चोर को सुधरने का अवसर देना चाहिए। अपने मुख से ही अपने पाप को स्वीकार करने, अपने कृत्य पर लज्जित होने, दण्ड के लिए अपने को प्रस्तुत करने वाले के प्रति राजा को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए उसे क्षमा कर देना चाहिए तथा अपने हाथ के स्पर्श से उसे पवित्र बना देना चाहिए। टिप्पणी—राजा के हाथ का स्पर्श पतित को पवित्र बनाने वाला माना गया है। राजाभिर्धृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः। निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥ 48॥ यदि पापाचारी व्यक्ति अपने पापों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं, राजा के समक्ष अपने आपको दण्ड के लिए प्रस्तुत करते हैं तथा राजा द्वारा प्रदत्त दण्ड को सहर्ष स्वीकार करते हैं, तो वे भी पापमुक्त एवं शुद्ध होकर सन्तों के समान मरणोपरान्त स्वर्गलोक में जाने के अधिकारी बन जाते हैं। शासनाद्वा विमोक्षाद्वास्तेनो मुच्यति किल्बिषात्। अशासनात्तु तद्राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥ 49॥ राजा द्वारा अपने सामने उपस्थित चोर पर अनुग्रह करने, अर्थात् बिना दण्ड दिये मुक्त करने अथवा समुचित दण्ड देने पर चोर पाप-मुक्त हो जाता है। राजा को यह नहीं भूलना चाहिए कि चोर को दण्ड दिये बिना छोड़ देने पर, अर्थात् किसी प्रकार का पश्चात्ताप करने पर चोर के पाप का फल स्वयं राजा को भुगतना पड़ता है। गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम्। अतः प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः॥ 50॥ विवेकहीन सज्जनों के शासक तो उनके गुरुजन होते हैं और दुष्ट आततायियों पर राजा का ही शासन रहता है। अभिप्राय यह है कि बुद्धिमान् व्यक्तियों द्वारा अपराध हो जाने अथवा किये जाने पर गुरुओं द्वारा उन्हें समझाना पर्याप्त होता है। वे प्रबोधन से ही अपराधवृत्ति का त्याग कर सन्मार्ग ग्रहण कर लेते हैं, परन्तु दुष्ट व्यक्ति समझाने-बुझाने की भाषा को नहीं समझते—‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’—उन्हें सन्मार्ग पर लाने का एकमात्र उपाय दण्ड ही है और यह कार्य राजा ही कर सकता है। इन दोनों—प्रकट सज्जनों और प्रकट दुर्जनों—के अतिरिक्त, भीतर से दुर्जन, 272 / नारदस्मृति

अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।

परन्तु ऊपर से सज्जन बने, अर्थात् प्रच्छन्न धूर्तों को सुधारने का दायित्व तो विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र यमराज ही करते हैं, अर्थात् वे ही ऐसे दुष्ट-कपटी जनों को अनेक प्रकार की नरक यातनाएं देकर उन्हें सचेत करते रहते हैं। अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। द्विराष्टापाद्यं वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य तु॥ 51 ॥ ब्राह्मणस्य चतुःषष्टीत्येवं स्वायम्भुवोऽब्रवीत्। विद्यापि च विशेषेण विद्वत्स्वभ्यधिकं भवत्॥ 52 ॥ महर्षि मनु के अनुसार मूर्खों द्वारा किये गये अपराध का दण्ड समझदारों द्वारा किये जाने वाले अपराध के दण्ड की तुलना में कम होता है। मूर्ख तो मूर्ख है। उसके द्वारा किया अपराध मूर्खता है। उसे तो अच्छे-बुरे की परख ही नहीं, परन्तु विवेकशील व्यक्ति भी मूर्खों के समान आचरण अथवा उनका अनुसरण करता है, तो निश्चित है कि उसे अधिक दण्ड मिलना चाहिए। मूर्खों द्वारा किये अपराध का तो कोई समर्थन नहीं करता, परन्तु विवेकशील व बुद्धिमानों द्वारा किया ग़लत-सही कार्य तो दूसरों के लिए उदाहरण बन जाता है। यही कारण है कि मनु महाराज ने एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न दण्ड की व्यवस्था दी है। उदाहरणार्थ, चोरी के लिए शूद्र से चोरी के सामान का आठ गुणा, वैश्य से सोलह गुणा, क्षत्रिय से बत्तीस गुणा और ब्राह्मण से चौंसठ गुणा दाम दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिए; क्योंकि विद्या-विवेकसम्पन्न बुद्धिमानों का अपराध और दण्ड अधिक ही होता है। शारीरश्चार्थदण्डश्च दण्डस्तु द्विविधः स्मृतः। शारीरं दशधा प्रोक्तमर्थदण्डस्त्वनेकधा ॥ 53 ॥ अपराध के लिए दिये जाने वाले दण्ड के दो रूप हैं- 1. शारीरिक तथा 2. आर्थिक। शारीरिक दण्ड के दस और आर्थिक दण्ड के अनेक रूप-भेद हैं। काकिण्यादिस्त्वर्थदण्डः सर्वस्वान्तस्तथैव च। शारीरः सन्निरोधादिर्जीवितान्तस्तथैव च॥ 54 ॥ बन्दी बनाने से लेकर मृत्यु-दण्ड देने तक मारना-पीटना आदि यातनाएं शारीरिक दण्ड के अन्तर्गत आती हैं तथा कौड़ी से लेकर सर्वस्व (सारी सम्पत्ति) का हरण आर्थिक दण्ड है। काकिण्यादिस्तु यो दण्डः स तु भाषावरः स्मृतः। भाषावराद् योऽयं प्रोक्तः कार्षापणपरस्तु सः॥ 55 ॥ उत्तर भारत में लेन-देन में काकिणी अथवा वराटिका (कौड़ियों) का प्रचलन है, परन्तु दक्षिण भारत में लेन-देन के रूप में प्रचलित मुद्रा कार्षापण (लोहे का सिक्का) कहलाती है। वैसे काकिणी से अधिक मूल्य की मुद्रा माष और माष से नारदस्मृति / 273

भी अधिक मूल्य की मुद्रा कार्षापण है। एक प्रकार से कार्षापण का मूल्य साठ अथवा अस्सी काकिणी है। कार्षापणावराद् यस्तु चतुः कार्षापणावरः। द्व्यवरोऽष्टापरश्चान्यस्त्र्यवरो द्वादशोत्तरः॥५६॥ इस प्रकार विभिन्न अपराधों के लिए निर्दिष्ट एक, दो, तीन तथा चार कार्षापणों से क्रमशः बीस, चालीस, अस्सी तथा एक सौ साठ काकिणी समझना चाहिए। कार्षापण के मूल्य में न्यूनाधिकता मान्य होने के कारण अपराध विशेष के लिए निर्दिष्ट दण्ड कार्षापण का सवाया अथवा ड्योढ़े, 2 का 2½, 3, 4 का 5, 6 तथा 8 का 12 किया जा सकता है, इससे अधिक नहीं। कार्षापणो दक्षिणस्यां दिशि रौप्यः प्रवर्तते । पणैर्निबद्धः पूर्वस्यां विंशतिस्तु पणाः स तु ॥ ५७ ॥ दक्षिण भारत (आन्ध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल) में कार्षापण का मूल्य चांदी का एक रुपया है। पूर्व भारत (बिहार, बंगाल, उड़ीसा तथा असम) में सवा रुपया (बीस आने) को (बीस-पच्चीस वर्ष पूर्णदशमलव पद्धति नहीं अपनाये जाने पर रुपये के सोलह आने और तौल में सेर की सोलह छटांकें मान्य एवं प्रचलित थीं) कार्षापण माना जाता है। माषो विंशतिभागस्तु ज्ञेयः कार्षापणस्य तु। काकिणी तु चतुर्थांगी माषस्य च पणस्य च ॥ ५८ ॥ कार्षापण का बीस आना मूल्य मानने पर उसके बीसवें भाग को माष (आना) कहा जाता है और एक माष की चार काकिणी (पैसे) होते हैं। पञ्चनद्याः प्रदेशे तु संज्ञा या व्यावहारिकी । कार्षापणप्रमाणं तु निबद्धमिह नेतया ॥ ५९ ॥ पञ्चनद प्रदेश-आज तो पूर्वी पंजाब के पाकिस्तान में चले जाने से पांच नदियों का प्रदेश तीन नदियों वाला रह गया है। इसके अतिरिक्त उसके भी तीन भागों-पंजाब, हरियाणा तथा हिमाचल हो गये हैं- में तो सोलह आने मूल्य के कार्षापण का लोकव्यवहार में पर्याप्त प्रचलन है। इसलिए उसे लिपिबद्ध करना आवश्यक नहीं समझा गया। कार्षापणोऽन्तिका ज्ञेया ताश्चतस्त्रस्तु धानकः । तद्द्वादश सुवर्णस्तु दीनारण्यः स एव च ॥ ६०॥ सबसे बड़ा सिक्का कार्षापण है, चार कार्षापणों के योग का नाम धानक है। बारह धानकों का योग सुवर्ण कहलाता है और इसी सुवर्ण का नाम दीनार है। वार्तां तु यां चाप्यथ दण्डनीतिम् राजाऽनुवर्त्तेत सदाऽप्रमत्तः । 274 / नारदस्मृति

हन्यादुपायैर्निपुणैर्गृहीतान् तथैव शास्तावन्निगृह्य पापान् ॥ 61 ॥ राजा को विवेक से कार्य लेते हुए प्रयोगों और अनुभवों से सुपरीक्षित एवं व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी सिद्ध दण्डात्मक उपायों से पापियों तथा अपराधियों को पकड़कर व बन्धन में डालकर रखना चाहिए तथा देश में वार्ता- कृषि, वाणिज्य और पशुपालन--के विकास के अवसर जुटाकर प्रजा को समृद्ध बनाना चाहिए। देश की समृद्धि एवं सम्पन्नता में सहायक सिद्ध होने वाली दण्ड नीति का प्रयोक्ता राजा ही प्रजा का अनुराग तथा सम्मान, यश एवं प्रतिष्ठा पाने में सफल होता है। ॥ नारदस्मृति समाप्त ॥ नारदस्मृति / 275

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श्लोकानुक्रमणिका

श्लोकानुक्रमणिका

[अ]

अदण्ड्या हस्तिनोऽश्वाश्च 4/11/32 अदत्तं तु भयक्रोध 4/4/9 अदुष्ट्यकदारस्य 4/12/61 अकन्येति तु यः कन्यां 4/12/34 अदुष्टार्थमश्रुतार्थं 4/1/141 अक्षवध्रशलाकाद्यैः 4/16/1 अदेयमथ देयं च 4/4/2 अक्षित्सोमयोबीजाभ्यां 4/12/16 अधनस्य ह्यपुत्रस्य 4/1/22 अगम्यागामिनश्चास्ति 4/12/77 अधनास्त्रय एवोक्ताः 4/5/41 अग्निवर्णमयः पिण्डं 4/1/289 अधिक्रियतं इत्यादिः 4/1/124 अग्रं नवभ्यः सप्तभ्यः 4/17/34 अनन्तरः स्मृतः पुत्रः 4/12/103 अचौरै बोधितो मोषं 4/18/20 अनयन् भाटयित्वा तु 4/6/7 अच्छलेनैव चान्विच्छेत् 4/2/11 अनयन्वाहकोऽप्येवं 4/6/8 अजडश्चेदपोगण्डो 4/1/80 अनर्थशीलां सततं 4/12/93 अजाविके तथा रुद्धे 4/6/15 अनाकालभृतो दास्यात् 4/5/31 अज्ञातदोषेषोढा या 4/12/96 अनागमं तु यो भुंक्ते 4/1/87 अज्ञातपितृको यश्च 4/13/18 अनावेद्य तु यो राज्ञे 1/46 अतोऽन्यथा क्लेशभाक् स्यात् 4/11/22 अनियुक्तो नियुक्तो वा 3/2 अतोऽन्यथा वर्तमानः 4/12/88 अनिर्दिष्टस्तु यो राज्ञा 4/16/7 अतोऽप्रवृत्ते रजसि कन्यां 4/12/27 अनिर्दिष्टस्तु साक्षित्वे 4/1/161 अतः परं प्रवक्षामि 4/1/285 अनिर्देश्यावनिन्दौ 4/17/12 अतः परं प्रवक्षामि 4/1/304 अनुकूलामवाग्दुष्टा 4/12/95 अतः परं प्रवक्षामि 4/1/327 अनुत्पन्नप्रजायास्तु 4/12/80 अतः परं प्रवक्षामि 4/1/318 अनुभूय च तास्तीव्राः 4/1/219 अतः परं प्रवक्षामि 4/1/343 अनुशास्यश्च गुरुणा 4/5/13 अतः परीक्ष्यमुभयं 1/70 अनेन विधिना कार्यः 4/1/300 अतः पारशवश्चैव 4/12/104 अनेन सर्वपालानां 4/6/17 अत्र शक्तिविहीनः स्यात् 4/1/131 अनेना भवति स्तेनः 4/18/47 अथ चेदनृतं ब्रूयुः 4/11/7 अनेनायमिदं प्रोक्तः 4/1/293 अथवा कालनियमः 4/1/170 अन्तिमा स्वैरिणीनां या 4/1/24 अथवा कितवा राज्ञे 4/16/8 अन्धो मत्स्यानिवाश्नाति 3/14

नारदस्मृति / 277

अन्यक्षेत्रोपजातानां 4/11/14 अर्थिनां संनियुक्तो वा 2/22 अन्यत्र ब्राह्मणेभ्यः स्यात् 4/13/52 अर्थेष्वधिकृतो यः स्यात् 4/5/24 अन्यत्र रजकव्याध 4/1/19 अर्धक्षयात्तु परतः 4/9/9 अन्यथा न विशुद्धः स्यात् 4/1/312 अर्धश्छेदपचीयेत 4/8/5 अन्यद्रव्यव्यवहितं 4/2/5 अवनिष्ठीवतो दर्पात् 4/15/27 अन्यप्रकारादुचितात् 4/17/48 अवस्करस्थलश्वभ्र 4/11/15 अन्यवादी क्रियाद्वेषी 2/33 अविक्रेयाणि विक्रीणन् 4/1/67 अन्यस्या यो मनुष्यः स्यात् 4/12/18 अविद्यमाने पित्र्यर्थे 4/13/34 अन्याक्षरनिवेशन 2/17 अविशेषेण सर्वेषां 4/14/9 अन्यायेनापि यद्भुक्तं 4/1/91 अव्यायच्छन्न विक्रोशन् 4/6/13 अन्यार्थमर्थहीनं च 2/8 अशक्तप्रेतनेष्टेषु 4/11/23 अन्योन्यं त्यजतो रागं 4/12/90 अशक्तौ भेषजस्यार्थे 4/1/66 अन्वाहितं याचितकं 4/4/4 अशास्त्रोक्तेषु चान्येषु 4/17/7 अन्वाहितं हृत न्यस्त 4/1/92 अशिरः पुरुषः कार्यः 4/18/45 अपत्यमुत्पादयितुः 4/12/54 अशिरांस्यपि दिव्यानि 4/1/270 अपत्यार्थं स्त्रियः सृष्टाः 4/12/19 अशुचिर्वचनाद्यस्य 4/17/52 अपराधं परिज्ञाय 4/18/38 अशुद्धः कितवो नान्यत् 4/16/5 अपात्रे पात्रमित्युक्ते 4/4/11 अश्वमेध सहस्रं च 4/1/211 अप्रकाशाश्च विज्ञेयाः 4/18/4 अष्टभिर्मण्डलैरेवं 4/1/286 अप्रवृत्तौ तु भूतानां 4/12/101 अष्टाङ्गोऽष्टादशपदः 1/9 अप्राप्तव्यवहारश्च 1/54 अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य 4/18/51 अप्राप्तव्यवहारश्चेत् 4/1/31 अष्टौ वर्षाण्युदीक्षेत 4/12/98 अभावे तु दुहितॄणां 4/13/51 अष्टौ विवाहा वर्णानां 4/12/38 अभिज्ञातैश्च वल्मीक 4/11/5 असत्याः सत्यशंशाकाः 1/71 अभियुक्तोऽभियोगस्य 2/26 असत्सु देवरेषु स्त्री 4/12/48 अभीक्ष्णं चोद्यमानो यः 4/1/237 असद्व्ययात् पूर्वचौर्यात् 4/18/11 अभूतमप्यभिहितं 1/64 असाक्षिणो ये निर्दिष्टा 4/1/188 अभ्युपेत्य च शुश्रूषां 4/5/1 असाक्षिप्रत्ययास्त्वन्ये 4/1/172 अमुमर्थं च पत्रस्थं 4/1/295 असाक्ष्यपि हि शास्त्रेऽस्मिन् 4/1/157 अम्बष्ठोग्रौ तथा पुत्रौ 4/12/107 असामान्यतमां गत्वा 4/12/75 अयुक्तं साहसं कृत्वा 4/1/245 अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः 4/1/33 अयोनौ वा समाक्रामेत् 4/6/19 अस्वतन्त्राः स्त्रियः पुत्राः 4/1/34 अरण्ये निर्जने रात्रौ 2/30 अस्वामिकमदायादं 4/3/18 अरण्ये निर्जने रात्रौ 4/1/241 अस्वाम्यनुमताद्दासात् 4/7/3 अर्थानां सार्वभौमोऽयं 4/1/105 अहोढान्विमृशेच्चौरान् 4/18/8 अर्थिनां भूरिभावाच्च 4/17/41 अहोरात्रोषिते स्नाते 4/1/268 278 / नारदस्मृति

text [ आ ] इत्यादि कृतश्रावणं 4/1/282 इत्येते शपथाः प्रोक्ता 4/1/250 इष्टतः स्वामिनश्चाङ्गैः 4/5/7 [ ई ] आगतश्च शरग्राही 4/1/311 आगमवर्जितं दोषं 2/12 ईर्ष्याषण्ढश्च सेव्यश्च 4/12/13 आगमः प्रथमं कार्यः 1/36 ईर्ष्याषण्ढादयो येऽन्ये 4/12/15 आगमेन विशुद्धेन 4/1/85 ईर्ष्यासूयसमुत्थे तु 4/12/89 आचार्यः शिक्षयेदेनं 4/5/17 [ उ ] आज्ञालेखः पट्टकः शासनं वा 2/38 आतृतीयात्तथा वर्षात् 4/1/169 उत्कृष्टं चापकृष्टं च 4/1/58 आध्यं पूर्वपक्षस्य 4/1/164 उत्कोचद्यूतदौत्यार्ति 4/1/47 आधिस्तु द्विविधः प्रोक्तः 4/1/139 उत्क्रम्य तु वृत्तिं यत्र 4/11/28 आधिः सीमा बालधनं 4/1/81 उत्क्रोशातां जनानां च 4/14/20 आनुलोम्येन तत्रैका 4/12/105 उत्तमस्त्वायुधीयोऽत्र 4/5/23 आनुलोम्येन वर्णानां 4/12/102 उत्तमे साहसे दण्डः 4/14/8 आनुलोम्येन वर्णानां 4/12/109 उन्मत्तः पतितः क्लीबः 4/12/37 आ पञ्चमात्तथा 4/1/168 उपकारक्रियाकेलिः 4/12/66 आपत्स्वनन्तरावृत्तिः 4/1/56 उपकृश्य तु राजानं 4/15/30 आपत्स्वपि हि कष्टासु 4/4/5 उपस्थमुदरं जिह्वा 4/18/37 आपदं निस्तरेद्वैश्यः 4/1/111 उपस्थानाय दानाय 4/1/118 आपदं ब्राह्मणस्तीर्त्वा 4/1/59 उपहन्येत वा द्रव्यं 4/8/6 आयुधान्यायुधीयानां 4/17/10 उपानयेद् गां गोपाय 4/6/11 आर्षश्चैव हि दैवश्च 4/12/39 उपायैर्विविधैः सर्वैः 4/14/17 आविद्याग्रहणाच्छिष्यः 4/5/8 उभयानुमतो यः स्यात् 4/1/192 आष्टमाद् वत्सरात् सिद्धिः 4/1/168 उल्काहस्तस्तोऽग्निदो ज्ञेयः 4/1/173 आसप्तमात्पञ्चमाद्वा 4/12/7 [ ऊ ] आसामन्यतां गत्वा 4/12/75 आसेधकाल आसिद्ध 1/51 ऊनं वाप्यधिकं वार्थं 4/1/234 आस्वेव तु भुजिष्यासु 4/12/79 ऊर्ध्वं यस्य द्विसप्ताहात् 4/1/331 आहर्तैर्वाभियुक्तः स्यात् 4/1/90 ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु 4/13/44 आहितोऽपि धनं दत्वा 4/5/32 [ ऋ ] आहूय साक्षिणः पृच्छेत् 4/1/198 [ इ ] इच्छन्ति पितरः पुत्रान् 4/1/5 ऋज्वी घटतुलाकार्या 4/1/263 इच्छन्तीमिच्छतः प्राहुः 4/12/42 नारदस्मृति / 279

ऋणं तु सोदयं दत्वा 4/5/33 ऋणं देयमदेयं च 4/1/1 ऋणादानं पञ्चविंशतिः 1/21 ऋणादानं ह्युपनिधिः 1/16 ऋणिकः सधनो यस्तु 4/1/132 ऋणिष्वप्रतिकुर्वत्सु 4/1/119 ऋत्विक्तु त्रिविधो दृष्टः 4/3/10 ऋत्विग्याज्यमदुष्टं 4/3/9 ऋत्विनां व्यसनेऽप्येवं 4/3/8 ┌───┐ │ ए │ └───┘ एकजाति द्विजातींस्तु 4/15/22 एकमेवाद्वितीयं तत् 4/1/210 एकश्चेदुन्नयेत् सीमां 4/11/10 एकस्य चेत्स्याद्व्यसनं 4/3/7 एकादशविधः साक्षी 4/1/149 एतानि सततं पश्येत् 4/17/55 एतान्येव प्रमाणानि 4/1/27 एतेनैव गृहोद्यान 4/11/12 एवं पश्यन् सदा राजा 1/74 एवं विधानि काष्ठानि 4/1/265 एवं सम्बन्धनात्तस्मात् 4/1/206 एष एव विधिर्दृष्टः 4/2/14 एष धारयते च त्वां 4/1/294 एष वृद्धिविधिः प्रोक्तः 4/1/110 एषामेव प्रभेदोऽन्यः 1/20 एषां तु धर्म्याश्चत्वारः 4/12/44 एषां षड्बन्धदायादाः 4/13/47 ┌───┐ │ ओ │ └───┘ ओघवाताहतं बीजं 4/12/56 ┌───┐ │ औ │ └───┘ औरसः क्षेत्रजश्चैव 4/13/45 ┌───┐ │ क │ └───┘ कक्षाछेदे तुलाभङ्गे 4/1/284 कन्या नर्तुमपेक्षेत 4/12/25 कन्यायाममकामायां 4/12/71 कन्यायां दत्तशुल्कायां 4/12/30 कन्यैवाक्षतायोनिर्या 4/12/46 कर्तृनथो साक्षिणश्च 1/13 कर्माकुर्वन् प्रतिश्रुत्य 4/6/5 कर्मापि द्विविधं ज्ञेयं 4/5/5 कश्चिच्चेत् संचरन् देशान् 4/3/16 कश्चित्कृत्वोऽमनः चिह्नं 4/1/166 काकिण्यादिस्तु यो दण्डः 4/18/55 काकिण्यादिस्त्वर्थ दण्डः 4/18/54 काणमप्यथवा खञ्जं 4/15/18 कानीनश्च सहोढश्च 4/13/17 कामक्रोधाभिभूतार्तं 4/1/40 कामात् क्रोधाच्चलोभाच्च 1/26 कायाविरोधिनी शश्वद् 4/1/104 कारणप्रतिपत्या च 2/31 कारणादनिमित्तं वा 4/17/27 कार्येष्वभ्यन्तरो यः स्यात् 4/1/152 कार्षापणावराद्यस्तु 4/18/56 कार्षापणोऽन्तिका ज्ञेया 4/18/60 कार्षापणो दक्षिणस्यां 4/18/57 कालिका कारिता चैवं 4/1/102 काष्ठकाण्डतृणादीनां 4/18/22 कितवेष्वेव तिष्ठेरन् 4/16/4 किन्तु राज्ञा विशेषेण 1/68 कुटुम्बं विभृयाद्भ्रातुः 4/13/10 कुटुम्बभरणाद्द्रव्यं 4/4/6 कुटुम्बार्थेषु यश्चोक्तः 4/13/35 कुद्दालपाणिर्विज्ञेयः 4/1/174 कुनखी श्यामदन्तश्च 4/1/184 कुलजे वृत्तसम्पन्ने 4/2/2 कुलानि श्रेणयश्चैव 1/7 280 / नारदस्मृति

कुलीना ऋजवः शुद्धाः 4/1/153 कुले ज्येष्ठास्तथाश्रेष्ठ 4/1/42 कुले तदवशेषे हि 4/12/83 कुसीदकृषिवाणिज्य 4/1/46 कूटाक्षदेविनः पापात् 4/16/6 केशेषु गृह्णतो हस्तौ 4/15/28 कोटिशते तु सम्पूर्णे 4/1/8 कोशान्तानि तुलादीनि 4/1/336 कौमरं पतिमुत्सृज्य 4/12/47 क्रमागतं प्रीतिदायः 4/1/51 क्रमागतेष्वेष धर्मः 4/3/11 क्रमाद्व्याहतं प्राप्तं 4/1/4 क्रमाद्धोते प्रपद्येरन् 5/13/49 क्रासत्यन्निभृतोऽकस्मात् 4/1/194 क्रियते धर्मतत्त्वज्ञैः 4/1/317 क्रियापि द्विविधा प्रोक्ता 2/28 क्रियोपकरणं चैषां 4/6/4 क्रीत्वा नानुशयं कुर्यात् 4/9/16 क्रीत्वा मुक्तं चतुर्भेदम् 1/23 क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं 4/9/1 क्रीत्वा मूल्येन यः पण्यं 4/9/2 क्रूरं धनुः सप्तेशतं 4/1/307 क्रेता पण्यं परीक्षेत 4/9/4 क्रेतारश्चैव भाण्डानां 4/18/14 क्लान्तसाहसिक श्रान्त 4/1/182 क्षत्तारं क्षत्रिया शूद्रात् 4/12/112 क्षत्रिया षट् समास्तिष्ठेत् 4/12/99 क्षेत्रं त्रिपुरुषं यत्स्यात् 4/11/27 क्षेत्रजेष्वपि पुत्रेषु 4/13/14 क्षेत्रसीमाविवादेषु 4/11/2 क्षेत्रिकस्य यदज्ञातं 4/12/55 क्षेत्रिकानुमते बीजं 4/12/58

┌──────┐ │ ख │ └──────┘ खादिर कारयेत्तं च 4/1/264

┌──────┐ │ ग │ └──────┘ गणवृद्धायस्त्वन्ये 4/11/8 गन्धमादनसंस्थस्य 2/16 गन्धमाल्यमदत्तं तु 2/35 गरीयसि गरीयांसम् 4/18/35 गर्भस्थसदृशो ज्ञेयः 4/1/35 गवां प्रचारे गोपालाः 1/53 गवां शताद्भवत्सतरी 4/6/10 गवादिषु प्रणष्टेषु 4/14/22 गहनत्वाद्दिवादानां 1/44 गावस्तु गोभिना देयाः 4/11/39 गुरुतल्पे भगः कार्यः 4/18/44 गुरुरात्मवतां शास्ता 4/18/50 गृह्यमानस्तुवैचित्यात् 4/1/246 गृहक्षेत्रं च दृष्टे 4/11/42 गृहद्वाराशुचिस्थाने 4/5/6 गृहीत शिल्पः समये 4/5/20 गृहीत्वापि स्थले द्रव्यं 4/1/72 गृहीत्वोपगतं दद्यात् 4/1/114 गृहे जातस्तथा क्रीतः 4/5/26 गृहे वै मुषिते राजा 4/18/18 गृह्णात्यदत्तं यो लोभात् 4/4/12 गोचरे यस्य मुष्येत 4/18/16 गोभिस्तु भक्षितं धान्यं 4/11/38 गोभूहिरणयस्त्रीस्तेय 1/45 गोषु ब्राह्मणसंस्थासु 4/18/33 गौः प्रसूता दशाहे च 4/11/30 ग्रहीतुः सह योऽर्थेन 4/2/9 ग्रामसीमासु च बहिः 4/11/3 ग्रामे व्रजे विविक्ते वा 4/14/23 ग्रीमेष्वन्वेषणं कुर्युः 4/14/26 ग्रामोपान्ते च यत् क्षेत्रं 4/11/40 ग्राहको यदि नष्टः स्यात् 4/1/13 ग्रीष्मे तु सलिलं प्रोक्तं 4/1/334

नारदस्मृति / 281

घटोऽग्निरुदकं चैव ४/१/२५२ घृतेनाभ्यर्च्य गात्राणि ४/१२/८२ चतुर्दशविधः शास्त्रे ४/१२/११ चतुर्विंशावरः पूर्वः ४/१८/३० चतुर्हस्ता घटतुला ४/१/२६२ चाण्डालो जायते शूद्रात् ४/१२/११३ चैलकौशेयचर्मास्थि ४/१/६३ चोदना प्रतिकालं च ४/१/२३६ चोदना प्रतिघाते तु ४/१/२३८ चौरहृतं प्रपद्यैव ४/१८/२१ चौरैर्हृतं जले मग्नम् ४/२/१२ चौराणां भक्तदा ये स्युः ४/१८/१३ चौरापहृतविक्रीता ४/५/३८ च्युतः सर्वधर्मात् कुलिकाः ४/१/१८७ छायानिवेशिसतो रक्ष्यः ४/१/३२६ छिन्नभागे गृह क्षेत्रे ४/१३/४८ छिन्नभिन्नहतोन्मृष्ट ४/१/१४६ जाता ये तु नियुक्तायां ४/१३/१९ जात्यैव लोहकारो यः ४/१/२८८ जारजातमरिक्थीयं ४/१२/८५ ज्ञात्वैताननृते दोषां ४/१/२२० ज्येष्ठायांशोऽधिको देयः ४/१३/१३ तण्डुलानां प्रवक्ष्यामि ४/१/३३७ तण्डुलान् कारयेच्छुक्लान् ४/१/३३८ तण्डुलान् भक्षयित्वा तु ४/१/३४१ तत्पुनर्द्वादशविधं ४/१/५० तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं ४/१४/३ तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं ४/१/४४ तत्रातिष्ठः स्मृतो धर्मः ३/६ तत्प्राज्ञेन विनीतेन ४/१/२५८ तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः ४/५/२९ तत्र शिष्टं छलं राजा १/३१ तत्र सत्ये स्थितो धर्मः १/११ तत्राद्यावप्रतिकारौ ४/१२/१४ तत्रेष्टावदेयानि ४/४/३ तत्सत्यं वद कल्याणि ४/१/२८० तथान्यस्मै तु विक्रीतं ४/८/८ तथारूढविवादस्य ४/१/९३ तदपि त्रिविधं प्रोक्तं ४/१४/१३ तदष्टभागापचयात् ४/११/२५ तदेतत्त्रिविधं ज्ञेयं ४/१/७४ तदा तु न सकुल्याः ४/१/११३ तपः क्रीताः प्रजा राज्ञा ४/१७/२५ तपस्वी चाग्निहोत्री च ४/१/९ तयोरनियतं प्रोक्तं ४/१२/३ तयोरपि पिता श्रेयान् ४/१/३७ तलवद्दृश्यते व्योम १/७२ तवाह्मितिचात्मानं ४/५/४० तवाह्मित्युपगतः ४/५/३४ तस्मात्तं नावजानीयात् ४/१७/३२ तस्मात्प्रत्यक्षदृष्टोऽपि १/७३ तस्मात्सभ्यः सभां प्राप्य ३/१५ तस्माद्देशे च काले च ४/८/१२ तस्माद्धर्मासनं प्रप्य १/३४ तस्मिन्नेव समारूढे ४/१/२७७ तस्य दण्डः क्रियापेक्षः ४/१४/७ तस्य धर्मः प्रजारक्षा ४/१७/३३ तस्य वर्षशते पूर्णे ४/१/२०५ तस्यापि दृष्टं त्रैविध्यं ४/१५/५ 282 / नारदस्मृति

text तस्यामेव तु यो वृत्तौ 4/1/60 दाप्यः पणमेकोऽपि 4/1/15 तस्यैव भेदः स्तेयं स्यात् 4/14/12 दायभागे तु एकोना 1/24 तान्तवस्य च संस्कारे 4/9/13 दायादेऽसति बन्धुभ्यः 4/3/17 ताम्रे पञ्चपलं विद्यात् 4/9/12 दासनैकृतिकाश्राद्ध 4/1/178 तिष्ठतिष्ठेति वा ब्रूयात् 4/12/67 दिवाकृते कार्यविधौ 2/29 तीरितं चानुशिष्टं च 1/65 दिव्यान्द्यप्यप्रमाणानि 1/30 तुलयित्वा नरं पूर्वं 4/1/275 दीयमानं न गृह्णाति 4/8/9 तुलाधरिममेयानां 4/18/25 दीर्घकुत्सितरोगार्त्ता 4/12/36 तुलिता यदि वर्धेत 4/1/283 दीर्घतीव्रामयग्रस्ताः 4/13/22 तृतीयतापप्तं तं 4/1/290 दुर्द्दष्टे व्यवहारे तु 1/66 तेन क्रयोविक्रयश्च 4/1/48 दुहिताचार्यभार्या च 4/12/74 तेषामपि न बालः स्यात् 4/1/190 दूतीप्रस्थापनैर्वापि 4/12/64 त्रयःस्वतन्त्रा लोकेऽस्मिन् 4/1/32 दृश्यते शोणितं यस्य 4/1/342 त्रिंशांशो रोमबद्धस्य 4/9/15 देवासुरमनुष्याणां 4/1/279 त्रिविधं क्षत्रियस्यापि 4/1/53 देशकालं दिशं जातिं 4/18/9 त्रिविधस्यास्य दृष्टस्य 4/1/76 देशकाल फल द्रव्य 4/1/71 त्र्यहाद्दोहं परीक्षेत 4/9/5 देशकालवयोद्रव्य 4/1/233 त्वक्छेदकः शतं दण्ड्यः 4/15/29 देशग्रामगृहघ्नांश्च 4/18/5 स्वमग्ने सर्वदेवानां 4/1/291 देशजातिकुलादीनां 4/15/1 त्वरमाण इवाकस्मात् 4/1/196 देशधर्मों निरपेक्ष्य स्त्री 5/12/52 त्वं विषं ब्रह्मणः पुत्रः 4/1/325 देशाचाराविरुद्धं यत् 4/1/136 त्वं वेत्सि सर्वभूतानां 4/1/278 देवतस्करराजभ्यः 4/3/6 दोषवत् कारणं यत् स्यात् 4/10/7 द्यूताह्वयं चैकभेदं 1/27 द द्रव्यप्रमाणहीनं यत् 2/11 दत्तमूल्यस्य पण्यस्य 4/8/10 द्रव्यमस्वामिविक्रीतं 4/7/2 दत्त्वा द्रव्यमसम्प्यग् यः 4/4/1 द्वयभियोगस्तु विज्ञेयः 1/27 दत्त्वा न्यायेन यः कन्यां 4/12/32 द्वयोरापन्नयोस्तुल्यं 4/15/10 दद्यात्पुत्रविधवा 4/1/17 द्वयोर्विवदतोर्थे 4/1/163 दद्युस्ते बीजिनो पिण्डं 4/13/20 द्वावंशौ प्रतिपद्येत 4/13/12 दर्पाद्वा यदि वा मोहात् 4/12/169 द्विकं त्रिकं चतुष्कं च 4/1/100 दर्शितं प्रतिकालं यत् 4/11/140 द्विकं शतं वा गृहीत 4/1/101 दशस्थानानि दण्डस्य 4/18/36 द्विगुणं त्रिगुणं वापि 4/1/106 दस्युवृत्ते यदि नरे 4/18/12 द्वितीयेऽह्नि ददत्क्रेता 4/9/3 दानग्रहणपश्वन्न 4/13/38 द्विपदामर्धर्धमासः स्यात् 4/9/6 दानमध्ययनं यज्ञः 4/17/50 द्विरभ्यस्ताः पतन्त्यक्षाः 4/16/3 नारदस्मृति / 283

द्विरामुष्यायणादद्युः 4/13/23 न त्वेवाधो सोपकारे 4/1/129 द्विविधास्तस्करा ज्ञेयाः 4/18/1 नदीनां संगमे तीर्थेषु 4/12/63 द्वे भार्ये क्षत्रियस्यान्थे 4/12/6 नदीषु नातिवेगासु 4/1/305 नदीष्वेवेतनस्तारः 4/17/38 [ध] नदीसन्तारकान्तार 1/49 न परेण समुद्दिष्टं 4/1/165 धनमूलाः क्रियाः सर्वाः 4/1/43 न पुत्रणं पिता दद्यात् 4/1/10 धनस्त्रीहारिपुत्राणां 4/1/23 न बान्धवा न सुहृदः 4/1/211 धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य 4/17/43 न भोक्तव्यो बलादाधिः 4/1/127 धर्मशास्त्रं पुरस्कृत्य 1/35 न मज्जनीयं स्त्रीबालं 4/1/313 धर्मशास्त्रविरोधे तु 1/40 न मित्रकारणाद्राज्ञा 4/11/3 धर्मज्ञास्त्रार्थकुशलाः 3/5 नरकेषु च ते शश्वत् 4/1/217 धर्मशास्त्राथंशास्त्राभ्यां 1/37 न लिप्यते यथा वह्निः 4/17/18 धर्मश्च व्यवहारश्च 1/10 नवभेदा अश्रुश्रूषा 1/22 धर्मश्चार्थश्च कीर्तिश्च 1/33 न वृद्धिः प्रीतिदत्तानां 4/1/108 धर्मस्यार्थस्य यशसो 1/14 न शीते तोयशुद्धिः स्यात् 4/1/259 धर्मासनगतः श्रीमान् 4/17/30 न शूद्रायाः स्मृतः कालाः 4/12/100 धर्मेण व्यवहारेण 4/1/122 नष्टंविनष्टं कृमिभिः 4/6/14 धर्मेणोद्धरतोराज्ञो 1/32 नष्टा भग्ना च लग्ना च 4/11/33 धर्मैकतानाः पुरुषाः 1/1 नष्टे धर्मे मनुष्याणाम् 1/2 धर्मोपदेशं दर्पेण 4/15/24 नष्टे मृते प्रव्रजिते 4/12/97 धान्य दशभ्यः कुम्भेभ्यः 4/18/26 न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः 3/18 धारयेदुत्तरे पार्श्वे 4/1/272 न स्त्री पतिकृतं दद्यात् 4/1/16 न स्यात् क्षेत्रं बिना सस्यं 4/12/59 [न] न स्याद्द्रव्य परीमाणं 4/1/134 न कथञ्चन कुर्वीत 4/1/57 न हि प्रत्यर्थिनि प्रेते 4/1/95 न किल्विषेणापवदेत् 4/15/19 नाकरिष्यद्यदिस्रष्टा 4/1/70 न गच्छेदगर्भिणीं निन्द्यां 4/12/84 नातिक्रूरेण धनुषा 4/1/306 न गृहीतागमं क्रेता 4/7/4 नादुष्टां दूषयेत् कन्यां 4/12/31 नग्नो मुण्डः कपालेन 4/1/201 नानियुक्तेन वक्तव्यं 3/1 नग्नो मुण्डः कपालेन 4/1/202 नानुकूलं यद्राज्ञा 4/10/4 न च भार्याकृतमृणं 4/1/18 नान्तरेणोदकं सस्यं 4/11/19 न च मिथ्याभियुञ्जीत 1/57 नान्यपत्यं परगृहे 4/12/60 न चेद्दद्यात्तु निक्षेप्तुः 4/2/4 नापराह्ने न सन्ध्यायां 4/1/320 न जातु ब्राह्मणं हन्यात् 4/18/41 नाभिमात्रे जलेस्थाप्य 4/1/308 न त्वेहोढान्विताश्चौराः 4/18/6 नाभियुक्तोऽभियुञ्जीत 1/55 284 / नारदस्मृति