भारतकोश
संग्रह पर लौटें

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

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किया तो "आप ने कहा ऐसा ही होता रहा तो मैं रुकने वाला नहीं हूँ। मैं अपनी बात करने आया हूँ और चौराहें पर खड़ा होकर भी बोलूंगा, हमें भय नहीं है।'"

जो भी चीज़ विकास करती है तो उसका विरोध भी होता है। जैसे कोई अच्छा होता है तो दूसरे ईर्ष्या करने लगते हैं। मानव-तन में ये दोष हैं।

तो पाखण्डी भी आपसे ईर्ष्या करते हैं; वे रुकावटें डालते हैं। कहीं भी ओपन प्रोग्राम होता है तो वहाँ रुकावट डालने की कोशिश करते हैं। पाखण्डियों की कलयुग में चलती भी बहुत है। एक तो निरंजन की दुनिया, फिर ऊपर से महाकलयुग। ऐसे में निरंजन के चेलों ने सत्य का विरोध तो करना ही है।

आपका अधिक विकास देख व्यवधान डालने की कोशिश करें तो यह उनकी मजबूरी है। भाइयों के प्रति भी ईर्ष्या होती है। कभी-कभी अपने प्रति भी यह ईर्ष्या हो जाती है। अपने लिए भी यह ईर्ष्या स्वाभाविक हो जाती है।

जब साहिब-बंदगी पंथ छोटा था, तो कुछ बात नहीं थी, पर जैसे ही विकास हुआ तो दूसरे पंथों को परेशानी हुई। उन्होंने सतवारी, परेड ग्राउण्ड, गाँधी नगर (दशहरा ग्राउण्ड), हर जगह रुकावटें देनी शुरू की। वहाँ प्रोग्राम नहीं होने दिया। आपने किसी के सत्संग में रुकावट नहीं दी। कहीं उन्होंने आपके बड़े-बड़े पोस्टर फाड़ दिये। ये हरकतें कभी भी अच्छे लोगों की नहीं हो सकती हैं। यानी आदि निरंजन, निराकार की भक्ति के बड़े-बड़े पंथ ही हमारे देश में छाए हुए हैं, इसी निराकार, निरंजन को सन्तों ने काल पुरुष कहा। आज उन्हीं की चलती है। असल बात यह है कि वे केवल हाथी की तरह बड़े हैं, पर अंदर से खाली हैं, इसलिए उन्हें डर है कि साहिब-बंदगी पंथ के विकसित हो जाने से उनका वजूद समास हो जायेगा। पर आख़र झूठ की हार ही होती है।

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दुनिया समझेगी इन बातों को। आख़िर आप जो कहते हैं कि जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है। इसमें वज़न है। अन्य बड़े-बड़े पंथ वाले जानते हैं कि उनके पास कुछ नहीं है, केवल किताबी बातें हैं, इसलिए साहिब बन्दगी का विरोध उनकी मजबूरी है। जो ऐसा नहीं करते, वे अच्छे हैं। भक्तों की यही निशानी होती है कि खुद भी आगे बढ़ो और दूसरों को भी आगे बढ़ने दो। अपना भी कल्याण करो, दूसरों का भी कल्याण करो। जो केवल अपने कल्याण तक सीमित है, वो भक्त नहीं हो सकता है। इसलिए जो पंथ विरोध करने वाले हैं, उनमें से किसी का लक्ष्य पैसा है, किसी का लक्ष्य इज्जत है, किसी का लक्ष्य रोमांस है, किसी का लक्ष्य राजाओं की तरह रहना है।

आप इन चीज़ों से परेशान नहीं होते, पर समाज को समझना होगा कि क्या ऐसी हरकतें कभी कोई भक्त कर सकता है! यानी भारत के बड़े-बड़े धार्मिक पंथों में भक्त नहीं रह रहे! इस रहस्य को समझना होगा। सत्य है, ये लोग भक्त नहीं हैं। एक भक्त दूसरे भक्त को कष्ट नहीं दे सकता, क्योंकि वो सबमें एक आत्मा देखता है। उसकी दृष्टि विश्व व्यापक होती है। आपने अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ भी कोई कार्यवाही क्यों नहीं की, इसका एक ही कारण है और वो यह कि आप कहते हैं कि वो भी हमारे ही हैं। कितनी प्यारी सोच है आपकी! दुनिया कब सच्चे संत को पहचानेगी!

यदि आप किसी पेड़ पर बैठकर सत्संग करेंगे तो भी आपकी संगत आपके पास आयेगी। पेड़ों पर बैठकर किसी जंगल में सत्संग सुनना पड़ेगा तो भी सुनेगी। आपने जो रंग दिया है, वो उतरने वाला नहीं है; फिर बाकी किसी का रंग नहीं चढ़ सकता है, सब फीका लगता है।

पाखण्डियों के इन गंदे कामों से आपकी संगत और अधिक मजबूत होती है। इसलिए सच में ये निंदक आपकी संगत का भला करने वाले हैं, उन्हें भक्ति में अधिक मजबूत करने वाले हैं। फिर इसी से संगत

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बढ़ती भी है। बेचारे पाखण्डियों पर तरस भी आता है कि कितनी मेहनत करते हैं, पर उसका रिजल्ट उलटा ही होता है। बाद में खुद बेचारे यह देख परेशान हो जाते हैं कि साहिब-बंदगी वाले तो भी हार नहीं मान रहे हैं; एक जगह सत्संग नहीं होने दो तो दूसरी जगह पहुँच जाते हैं; वहाँ अपनी गंदी हरकत का परिचय दो तो तीसरी जगह पहुँच जाते हैं; पर रुकते नहीं हैं; कहीं न कहीं रास्ता ढूँढ़ ही निकालते हैं और संगत भी ऐसी है कि कहीं भी प्रोग्राम हो, पहुँच जाती है। संगत पर आपका इतना रंग देख वे आखिर खुद परेशान हो जाते हैं और कुछ देर के लिए शांत हो जाते हैं। पर आपका सिलसिला नहीं रुकता। उन पंथों की पोल को समझ लोग टूटकर आपके पास आते रहते हैं। जब बड़े-बड़े टूटते हैं तो आमदनी कम होते देख उनके पेट का दर्द फिर बढ़ जाता है और वे फिर अपनी गंदी हरकतें दिखाना शुरू कर देते हैं। जैसे किसी को प्रेम का रोग हो जाता है तो किसी डॉ० की कोई दवा काम नहीं आती है। ऐसे ही इनके पेट का दर्द किसी गोली से नहीं जाता है। उसका हल ही निंदा है, उसका हल ही गंदी हरकतें है, सत्संग में रुकावट डालना है।

क्या ऐसे लोगों को यह नहीं पता है कि उनका आख़िर क्या हाल होगा ! एक शेर होता है; हिरण उसके सामने बड़ी कलाबाजी दिखाता है, बड़ी तेज़ भागकर दिखाता है। शेर चाहे तो उसे जल्दी पकड़ ले, पर वो ऐसा नहीं करता; वो उसे भागने देता है। जब भागते-भागते वो थक जाता है, उसका खून गर्म हो जाता है, तब शेर उससे एक फीट लंबी 28 फीट छलांग लगाता है और उसे पकड़ लेता है। ऐसे ही अभी आप इन पाखण्डियों को अपने खेल दिखाने दे रहे हैं, पर जब आप अपना खेल दिखायेंगे तो इनका वजूद ही मिट जायेगा।

पाखण्डियों के पास आपकी प्रोग्राम लिस्ट रहती है। उन्हें ठीक-ठीक मालूम रहता है कि आप कब और कहाँ प्रोग्राम देने वाले हैं। जब

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भी आपका ओपन प्रोग्राम परेड ग्राउण्ड, जम्मू में होता है तो वे रुकावट देने की सोचते हैं। कई बार उन्हें इसमें सफलता भी मिल जाती है। वे उन्हें अधिक पैसा खिलाकर पहले से आपके सत्संग के लिए बुक हुई ग्राउण्ड को भी अपने पाखण्ड और स्वार्थ के लिए बुक करवा लेते हैं। दुनिया तो ऐसी है ही। चाहे वे नाचें-गायें, कुछ भी करें, लोग पहुँचते-ही-पहुँचते हैं। खैर, दुनिया को तो सच्चाई का पता नहीं होता कि बाबा जी कैसा है, उनका लक्ष्य क्या है! पर जो बाबा जी के साथी होते हैं, वे कैसे भक्त हुए! वे भक्त हो ही नहीं सकते हैं। वे भी पाखण्डी ही हुए। क्या वे धूर्त नहीं हुए! पक्का हुए। बाबा जी खुद तो छल-कपट करके नरक में जा ही रहे हैं, पर साथ-ही-साथ चेलों को भी पकड़कर ले जा रहा है। चेले बेचारों का क्या कसूर! उन्हें तो माँ के गर्भ में 9-10 महीने वाला कष्ट भूल गया है न, इसलिए दोबारा अब नरकों की मार का स्वाद चखना चाहते हैं।

आप इसके बावजूद शांत रहते हैं; उनकी तरह ऐसे धूर्त वाले काम नहीं करते। यही तो आपमें और उनमें बाहरी दृष्टि से मुख्य अन्तर नज़र आता है। यह किसी एक बाबा की बात नहीं समझ लेना। इस जहाँ में आप सबसे निराले हैं। इसलिए सबका मुकाबला ही आप के साथ है।

कुछ स्त्रियों को, छोटे-छोटे बच्चों को जानबूझकर आगे कर देते हैं। दुनिया एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए बड़े तमाशे कर रही है। सब एक तरफ हैं और आप एक तरफ। फिर भी वे आपके हौसले को दबा नहीं पाते हैं। जितनी रुकावटें वे देते जाते हैं, आप उतना अधिक परिश्रम करके उन्हें शिष्ट तरीके से जबाब देते जाते हैं और आखिर में वे हारकर थक जाते हैं और कुछ देर शांत पड़े रहकर पुनः अपनी घिनौनी हरकतें शुरू कर देते हैं। उन्हें क्या मालूम कि आप थकने वालों में हैं ही नहीं। आप तो कई-कई रातें बिना सोए भी गुज़ार लेते हैं; कई-कई दिन बिना कुछ खाए भी रह लेते हैं। पर बाकी महात्मा यह सब तो कर नहीं सकते हैं। साहिब जी के

सेवा है आपका लक्ष्य

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चेले भी आखिरकार थक ही जाते हैं। पर आप खुद कभी नहीं थकते हैं और जब चाहते हैं तो अपनी सुरति देकर अपनी संगत को भी चेतन कर देते हैं। यह चीज़ें लालची लोग कभी समझ नहीं पायेंगे, क्योंकि आखिर उनका दिमाग़ है ही शैतानी। वे शैतानी बातें ही सोच-समझ सकते हैं। वो आरामपरस्त हैं, स्वार्थ के लिए, पैसे के लिए प्रोग्राम देते हैं जबकि आप परिश्रमी हैं, परमार्थ के लिए, जीवों को चेतन करने के लिए यह काम कर रहे हैं।

यदि आप एक इच्छा करें तो उन्हें नानी-परनानी भी याद आ जाए, पर आप यह काम नहीं करना चाहते हैं। जब निरंजन आपसे भयभीत रहता है, फिर वे बेचारे किस खेत की मूली हैं! पर अन्तर यह है कि निरंजन को आपकी शक्तियों की पूरी जानकारी है; आप क्या कर सकते हैं, वो समझता है। इसलिए सीधे-सीधे आपसे कोई पंगा न लेकर अपने उपासकों के द्वारा यह काम करता है।

जब 21 ब्रह्माण्डों पर कब्जा करने वाले, प्रलय करने वाले निरंजन का आपके आगे कुछ बस नहीं चलता है तो इन बाबों की क्या बात करनी! ये बेचारे तो हैं ही नहीं। इनका तो होना या न होना एक समान है। इनमें रूहानियत का कोई जलवा ही नहीं है, इसलिए बाहरी रुकावटें देने में लगे हुए हैं। जब रूहानियत का कोई लक्षण ही नहीं है तो फिर छल-कपट करना तो इनकी मजबूरी हो जाती है। इन्हें डर है कि धूर्तों वाला काम नहीं किया तो सारी पब्लिक ‘साहिब-बंदगी’ पंथ में चली जायेगी। उन्हें इस बात का भय है।

सेवा है आपका लक्ष्य

आपका सारा समय परमार्थ में, सेवा में व्यतीत होता है। अपने लिए आपके पास कोई समय नहीं है। सबसे बड़ी बात है कि सेवा के लिए आप सही पात्र को चुनते हैं।

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एक समय आप अखनूर जा रहे थे तो नेर्शानल हाइवे पर आपको एक पागल मिला। वो केवल कमीज़ पहने था, नीचे कुछ नहीं पहने था; बिलकुल नंगा था। वो सड़क पर से पत्थर उठा-उठा कर साइड पर रख रहा था। आपने सोचा कि कोई रात के समय उस पर गाड़ी चढ़ा सकता है। आपके दिल में उसके प्रति दया की भावना उमड़ आई। आपने उसी समय फैसला किया कि आप पागलों के लिए अलग से एक आश्रम बनवाकर वहाँ उनकी सेवा करेंगे।

आप ऐसे लोगों की तलाश करते हैं। आपको ऐसे लोगों की ज़रूरत है, जिन्हें दुनिया ने ठुकरा दिया हो। दुनिया जिन्हें बेघर कर देती है, आप उन्हें शरण देने की ठान लेते हैं। आप सभी पागलों को इकट्ठा करना चाहते हैं। तभी तो आप इनके लिए एक अलग आश्रम बनाना चाहते हैं जहाँ ऐसे लोगों की जमकर सेवा की जा सके। आप कहते हैं कि यही मेरा काम है, क्योंकि इन्हें कोई नहीं पूछ रहा है, इन्हें कोई नहला नहीं रहा है, कोई खिला नहीं रहा है, घर वालों ने इन्हें घर से बाहर कर दिया है। आपका धर्म ही सेवा है तो इससे बेहतर पात्र नहीं मिलेंगे। आप अपने लोगों को ऐसे लोगों को ढूँढ़ने में लगाएँगें। जहाँ भी दया का कोई ऐसा पात्र मिल जाए, उसे आश्रम में लाया जायेगा और फिर उसकी सेवा की जायेगी। फेरी वाला वहीं जाता है, जहाँ ग्राहक हों। आपका काम ही परमार्थ है, इसलिए आप उन्हें लाना चाहते हैं, आश्रम में रखकर उन्हें नहलाना चाहते हैं, पूरी ड्यूटी के साथ उनकी सेवा करना चाहते हैं। आप अपना काम खुद करते हैं, किसी से अपनी सेवा नहीं करवाते, इसलिए आप अपने लोगों को इनकी सेवा में लगाना चाहते हैं। आप कहते हैं कि यही मेरी सेवा होगी।

आप सबमें एक आत्मा देखते हैं, इसलिए आप पहले उन लोगों को चुनते हैं, जिन्हें सेवा की ज़रूरत है। जब कभी भण्डारा होता है तो

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कुछ बागड़ियों के बच्चे भी खाने के लिए आ जाते हैं। कभी आपके लोग उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं, पर आप कहते हैं कि इन्हें भगाओ नहीं, बल्कि पहले इन्हें खिलाओ; इनको ज़्यादा ज़रूरत है इसकी, आपको नहीं।

भोपाल में एक भण्डारा हुआ तो बागड़ियों को सेवादारों ने भगाना चाहा। आपने कहा कि मैंने यह इंतज़ाम अमीरों के लिए नहीं किया है, बड़े लोगों के लिए नहीं किया है, अच्छे कपड़े वालों के लिए नहीं किया है। ये अधिक ज़रूरतमंद हैं, पहले इन्हें खिलाओ। वो कहने लगे कि ये माँस खाते हैं, हम इन्हें इन थालियों में नहीं खिला सकते हैं। आपने कहा कि फिर इनके लिए पत्तलों का इंतज़ाम करो। क्योंकि आप ऐसे ही लोगों की सच्चे दिल से सेवा करना चाहते हैं। यही सेवा के सच्चे हक़दार हैं। जब आपका लक्ष्य ही सेवा है तो इससे बेहतर पात्र कहाँ मिलेंगे! आप तो उन बूढ़ों के लिए भी आश्रम बनवा रहे हैं, जिन्हें घर से बेघर कर दिया गया है। आप उनकी भी सेवा करना चाहते हैं। यह मनुष्य तो स्वार्थी है, दुनिया में रहने वाला हर इंसान स्वार्थी है, पर आप दुनिया में नहीं रहते हैं, हर समय अपने में ही रहते हैं, इसलिए आप परमार्थी हैं, हर समय परमार्थ में ही लगे रहते हैं। यही आपका लक्ष्य है।

दुनिया के लोग तेरा-मेरा करते हैं, पर आपके लिए सब अपने हैं। अपनापन होने से ही दूसरों से मनुष्य घृणा करता है, अपनो से नहीं। आपको हर प्राणी अपना लगता है। संपूर्ण विश्व को आप अपना मानते हैं। आपको सबकी पीड़ा अपनी लगती है।

आपकी जीभ थक जाती है। आप कहते हैं कि ख़ामोश! तुझे बोलना ही बोलना है। आँखें थक जाती हैं। आप कहते हैं कि देखो; तुम्हें देखना-ही-देखना है। आप आत्मनिष्ठ होकर जीते हैं। आप मानते हैं कि

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आदमी ही बूढ़ा होता है, अन्य कोई जीव नहीं। आदमी मतलबी है, साठ साल का होता है तो बच्चों को कहता है कि शर्म करो, मैंने आपको खिलाया, पढ़ाया, बड़ा किया; अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मुझे खिलाओ, मेरी सेवा करो। यह मतलब। कोई गाय का बछड़ा गाय के लिए कभी घास नहीं लाया कि ले माँ खा, अब तू बूढ़ी हो गयी है, मैं तेरी सेवा करता हूँ। कोई कौवे का बच्चा अपनी माँ को नहीं खिलाता। वे खुद करते हैं।

आपने फैसला किया कि कभी बूढ़ा नहीं होना है। सबका अपना-अपना लक्ष्य होता है। आपका लक्ष्य ही परमार्थ है, इसके लिए आपने दुनिया का मज़ा भी नहीं लिया।

दुनिया मतलब की क्यों है? किसी ने नहीं सोचा। किसी के पास माकूल जवाब नहीं है। क्योंकि दिमाग़ शातिर है, मतलब का है, हमेशा अपना सोचता है यह। दुनिया के लोग इसी के कहे अनुसार काम करते हैं। इसे बनाया ही इसलिए गया है कि अपने लिए ही सोचना है। आप अपने लिए नहीं सोचते हैं। प्रोग्राम देते-देते रात के 12-1 बज जाते हैं। 7-7 घण्टे का सफ़र करके दूर-दूर प्रोग्राम देने जाते हैं, फिर उसी समय प्रोग्राम देकर वापिस भी आते हैं। आपका दिमाग़ कभी हताश नहीं होता। क्योंकि आप स्वार्थी नहीं हैं। दुनिया का हरेक आदमी स्वार्थी है। आप इस दुनिया में दिखते हुए भी इसमें नहीं हैं, इसलिए आप स्वार्थी नहीं हैं।

अमर लोक के स्वामी साहिब, सेवक बनकर आए हैं।
ढूँढ़-2 कर दीन जनों को, प्रेम मलहम लगाए हैं॥
स्वामीपन का मान न कोई, हंसन दिल को भाए हैं।
मधुमय कर भक्तजनों को, अमर लोक पठाए हैं॥

बचपन से ही परिश्रमी रहे आप

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बचपन से ही परिश्रमी रहे आप

आप सात भाई थे। आपके पिताजी कई साल खटिया पर पड़े रहे। 9 जीवों का पेट पालना था, कैसे होता ! इतने में बड़े भाई की शादी हुई। बीबी आई तो उसने कहा कि हम इतने लोगों को नहीं पाल सकते। वो अलग हो गये। आपकी उम्र तब 10 साल की थी। आपने इतनी छोटी उम्र में ही कड़ी मेहनत करके पूरे परिवार को पालने में सहयोग किया। आपके पिताजी बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने अपनी बहन की लड़कियों की शादी करवाई थी। पर अब घर की हालत ठीक नहीं थी। लड़कियों की शादी अच्छे घर में हुई थी। एक बार वो आईं और आपको 500 रूपये के नोट दे गयी। जब पिता जी को पता चला तो कहा कि तूने क्यों लिए पैसे? तब उन्होंने आपको उसी समय भेजा, कहा कि अभी वे रास्ते में ही होंगी, जा वापिस कर आ। आप तभी गये। यानी आपके पिता जी हिम्मत हारने वालों में से नहीं थे। ...तो तब 10 साल की उम्र से आपने जो कड़ी मेहनत शुरू की, उसके बाद आपने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आराम क्या होता है, इसका आपको पता न चला। 7 साल आपने परिवार की कड़ी मेहनत करके सेवा की; फिर 17 साल की उम्र में आपने फौज की नौकरी की। तब गुरु के सान्निध्य में आ चुके थे। फिर गुरु की जमकर सेवा की। गुरु जी कहते थे कि तू निराली चीज़ है।

भूत भी भाग जायेगा

दिन में 21 घण्टे आप काम करते हैं और इन 21 घण्टों में जितना काम आप करते हैं, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। किसी महात्मा की बात तो छोड़ो, कोई भी इंसान चाहे बहुत बड़ा धावक हो या पहलवान या अन्य मेहनती ही क्यों न होगा, नहीं कर पायेगा। यदि कोई भूत आपके साथ काम करने लगे तो वो भी भाग जायेगा, कहेगा कि यह

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क्या चीज़ है! उसको तो शरीर भी नहीं है, फिर शरीर वाले किसी इंसान की बात क्या करनी! कहने का मतलब है कि आप कभी थकते नहीं हैं। और 10 घण्टे का काम 3-4 घण्टे में ही कर लेते हैं। शरीर और दिमाग़ दोनों से आप बेहिसाब काम लेते हैं। इस शरीर को तो आप घोड़ा बनाकर कार्य लेते हैं। शरीर होकर आप कभी नहीं जीते।

राँजड़ी में सुबह आपको 400-500 लोगों की कहानियाँ सुननी पड़ती हैं और उन्हें सुनते-सुनते सैकड़ों काम भी करने होते हैं। क्योंकि कई आश्रमों का काम चल रहा होता है तो वहाँ का सामान पहुँचाना, सब व्यवस्था ठीक करना भी आपके जिम्मे है। फिर जहाँ-2 रोज़ का सत्संग होता है, वहाँ-2 जो-जो सामान भेजना है, वो भी आपके जिम्मे है। कोई भी इन कार्यों को करने के लिए नहीं है। हर काम में आप स्वयं ही शामिल हैं। फिर कई बार संगत के लिए खाना भी खुद बनाते हैं, खुद ही परोसते हैं। यह सब देखते ही बनता है।

कई बार आप अपने व्यायाम का समय भी नहीं निकाल पाते हैं, योगासन का समय भी नहीं निकाल पाते हैं। आश्रम के सब काम खुद करवाने, लोगों को काम में लगाना और कई बार खुद भी जुट जाना। खुद ही गैंती पकड़कर कुछ तोड़ने लगना, कभी खड्डा खोदने लगना आदि यह सब राँजड़ी जाने वाला ही समझ सकता है। ऐसा काम कोई महात्मा नहीं करेगा। कर ही नहीं पायेगा।

जितने कर्मठ आप हैं, कोई नहीं हो सकता है। अन्य महात्माओं की बात छोड़ो; वो तो राजाओं का जीवन जीते हैं, पर अन्य कर्मठ लोगों में भी कोई नहीं होगा। आपका मुकाबला नहीं है।

कई बार आपको राँजड़ी में काम करते-करते दो-ढाई तक बज जाते हैं। कई बार आप बिना नाश्ता किए ही वहाँ से सत्संग के लिए रवाना हो जाते हैं, क्योंकि नाश्ते का समय ही आपको नहीं मिल पाता है। सच

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तो यह है कि आपको कई बार कुछ ख़बर ही नहीं होती है। आपको बताना पड़ता है कि आपने नाश्ता नहीं किया है।

आप शरीर की थकान को मंजूर नहीं करते हैं। एक वो भी समय था, जब आप छः-छः महीने तक सोते नहीं थे। पर तब आप इतना कठिन परिश्रम नहीं कर रहे थे। अब जब आपकी संगत दिनो दिन बढ़ रही है तो कई बार आपको 10-10, 12-12 दिन तक सोने का अवसर नहीं मिल पाता है। कभी आप बीच में दिन को आराम करने की सोचते हैं तो वो भी नहीं हो पाता है। ऐसे में आपका शरीर अत्यंत ही थका हुआ लगता है। पर आपके वजूद को कभी थका हुआ नहीं पाया जा सकता है। आपकी वाणी की वही लय रहती है। आपके सफ़रनामे को सुनकर हर कोई हैरान रह जायेगा। उसे मंजूर करना ही पड़ेगा कि आप इंसान नहीं हैं। यदि वो ऐसा नहीं कर रहा है तो यह उसकी भूल है। जैसा काम आप कर रहे हैं, कोई इंसान के बस की बात नहीं है। कोई भूत भी इतना काम नहीं कर सकता है। वो भी थक जायेगा, पर आप थकने वालों में से नहीं हैं। आपका शरीर भी तौबा करता होगा कि किसके पल्ले पड़ गया हूँ। जितना परिश्रम आप करते हैं, कोई नहीं कर सकता है। कई-कई बार आपको भोजन करने का समय भी नहीं मिलता है। जो कठिन परिश्रम आप करते हैं, आज के महात्मा तो आपके साथ दो दिन रहकर ही तौबा कर देगा। क्योंकि अपने हक़ की कमाई से खाने की बात तो सुनने को मिलती है, परिश्रम करने की बात भी मिलती है, पर जितना परिश्रम आप करते हैं, इतना परिश्रम करने की बात किसी संत के बारे में पढ़ने-सुनने को नहीं मिलती है। फिर उस बीच आपकी चाल भी इतनी तेज़ रहती है कि जो काम एक घण्टे में करने वाला होता है, आप आधे घण्टे में कर लेते हैं। फिर आपका अपनी संगत पर होल्ड भी बड़ा प्यारा है। एक सच्चे कमाण्डर की तरह आप सबको चलाते हैं। फिर खुद भी उस काम में जुट जाते हैं। जितने भी आश्रम हैं, उनके जितने भी काम हैं, उन सबकी ख़बर आपको ही लेनी है। यह काम कोई भी दो दिन

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करेगा तो बीमार पड़ जायेगा। पर आप हैं कि फिर सत्संग भी 5-5 करने हैं दिन में। आराम कब करना है, कोई ख़बर नहीं है।

सर्दी हो या गर्मी, बारिश हो या तूफान, पर आपको कभी किसी ने रुकते नहीं देखा, कभी आपका कोई सत्संग स्थगित नहीं हुआ। यदि कोई हुआ भी तो उसका कोई अन्य ही कारण रहा। फिर इतना ही नहीं, कभी आपको बुख़ार हुआ तो भी आपने सत्संग नहीं छोड़ा। 104° बुख़ार होने पर भी आप सत्संग में हाज़िर नज़र आए और मुस्कराते हुए नज़र आए।

फिर दिन में 4-5 सत्संग करने, जिनमें से हरेक डेढ़ से दो घण्टे तक होता है। यानी दिन-भर बोलते ही रहना है। बोलने में भी आप कभी नहीं थकते हैं। कोई प्रोफेसर, कोई अध्यापक इतना नहीं बोल पायेगा। फिर यह नहीं कि हफ्ते में एक छुट्टी। कोई भी छुट्टी नहीं है। हफ्ते की बात नहीं है, पूरे साल में एक भी छुट्टी नहीं। आराम की चिंता ही नहीं है। हर दिन काम करना ही है। दिन हो रात हो, लगे ही रहना है। चाहे कड़कती धूप हो या फिर कड़ाके की ठंड पड़ रही हो, आप नहीं रुकते हैं। तूफान आए या फिर बरसात हो रही हो, आपको रुकते नहीं देखा जा सकता है। आपकी गाड़ी सड़कों पर हर हाल में दौड़ती ही नज़र आयेगी। आपको सत्संग के लिए निकलना ही है, चाहे सब लोग मौसम के कारण घरों में छिपकर क्यों न बैठे हों।

....फिर सत्संग करके कभी-कभी राँजड़ी पहुँचते-2 रात के 12 या एक भी बज जाते हैं। और वहाँ भी समय नहीं होता है। वहाँ भी आपके इंतज़ार में कई श्रद्धालु अपनी समस्याओं को लेकर पहुँचे होते हैं और सुबह तक का इंतज़ार करने वाले नहीं होते हैं। आपको उनसे भी निबटना है, सबकी बात सुनकर फिर कभी 1 तो कभी 2 बजे आप आराम करने जाते हैं। अब वो आराम भी हमारे देखने के लिए है। सच तो यह है कि तब ही तो आप अपने अध्यात्म खेल शुरू करते हैं। तब

वो समय भी था............

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आपको अलौकिक दुनिया में जाकर वहाँ के लोगों को चेतन करना होता है।

सुबह पुनः 4 बजे उठकर आप नित्य-कर्म करके कठिन परिश्रम में लग जाते हैं और कभी बोर नहीं होते।

वो समय भी था....

एक समय वो भी आया जब बढ़ते हुए विरोध के डर के कारण आपको सबने छोड़ दिया। विरोध के कारण लोग अपने घर में फोटो रखने में भी डरने लगे, साहिब बंदगी बोलना भी छोड़ दिया। पर आपने हिम्मत नहीं हारी, अपनी लय बरकरार रखी। न ही आपने अपनी वाणी में बदलाव लाया, न ही किसी से डरे। आप दुनिया को समझाते रहे। सी.बी.आई., आई. बी. की जाँच हुई। जाँच में कुछ नहीं आया, सुप्रीम कोर्ट ने भी आपको सत्संग वगैरह की छूट दे दी। सुर्पीम कोर्ट ने कहा कि आप सच्चे महात्मा है, आपको बेकार में तंग किया गया, आप अपना काम आज़ादी से कीजिए। आप लगे रहे; सत्संग करते रहे। आपने पुनः संगत को जोड़ा।

एक ही धुन में रहते हैं आप

आप जो दिन-रात इतनी मेहनत कर रहे हैं, उसमें एक ही धुन नज़र आती है। आप जो इतने आश्रम बनवा रहे हैं, उसमें भी एक ही धुन दिखाई देती है। ज़ालिम दुनिया द्वारा इतने कष्ट सहते हुए भी आप उन्हें क्षमा कर रहे हैं तो उसमें भी एक ही धुन दिखाई पड़ती है। आप इस संसार में आए हैं तो उसमें भी वही एक धुन नज़र आती है। आपमें यही धुन है कि सत्संग द्वारा जितने हो सकें, उतने लोगों को समझा सत्य-भक्ति में लगाकर अमर लोक ले जाएँ। आप इसी धुन में रहते हैं।

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पैसे से आपको कोई मतलब नहीं है। आप किसी से कुछ नहीं माँगते हैं। यह काम आप एक भिखारी का मानते हैं। आप भोजन भी अपनी ही पैंशन से खाते हैं।

भोपाल में एक डॉ० साहब ने आपको 1 करोड़ दान में दिया। आपने उसे कोई शाबाशी नहीं दी, बल्कि यह कहा कि मेरा एहसान मानना कि मैंने ये पैसे आपसे लिए; फूल जाना कि आपने दिये। जिस काम के लिए आपने दिए, मैं उसी में लगाऊँगा।

आप जो आश्रम पर आश्रम बनवाते जा रहे हैं, उन सबके पीछे एक ही धुन है। आपको किसी आश्रम से कोई मतलब नहीं है। आप जगह-जगह आश्रम बनवाकर वहाँ के लोगों को बुलाना चाहते हैं कि आओ, सुनो हमें और सत्य-भक्ति को पाकर अपने देश को चलो। हर समय आप इसी धुन में रहते हैं। पर दुनिया के लोग काल की कष्टमय दुनिया में ही खो जाने से आपको आसानी से समझ नहीं पाते हैं और काल की ही भक्ति करके उससे मिल रहे कष्टों से छूटने का प्रयास करते रहते हैं। पर दुनिया आपको धीरे-धीरे समझेगी। वो काल से मिलने वाले कष्टों को भी समझेगी और आपकी शरण में आयेगी। यह होगा। यह ज़रूर होगा। आने वाला इंसान बुद्धिमान होगा। वो आपकी बात को समझेगा। उसे साहिब की बात समझ आयेगी। उसे समझना होगा।

आ जा रे…… आ जा रे…….आ जा रे॥
छोड़ दे सब तू काम जगत के, दर्श साहिब का पा ले रे।
सत्संग में तू आकर बंदे, रस अमृत को पा ले रे॥ आ जा रे…
काल की दुनिया भटक रहा तू, पग-पग कष्ट तू सहता रे।
साहिब लेने आए तुझको, समझ तू क्यों न पाए रे॥ आ जा रे….
भवसागर की धार कठिन है, बिन गुरु क्यों तू बहता रे।
शरण में आजा तू साहिब की, काहे जन्म गँवाये रे॥ आ जा रे…

अंत में ऐसे साथ देते हैं आप

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अंत में ऐसे साथ देते हैं आप

रिहाड़ी (जम्मू) में रहने वाला विद्यासागर जब आपके पास एक दिन राँजड़ी में आया तो आपने कहा कि अब चलने की तैयारी कर लो, समय आ गया है, अब सुरति साहिब में ही रखना। बस, फिर क्या था! जैसे ही वो दिन आया, उसे अंदर से इशारा हो गया कि आज चलना है। उसने अपनी पत्नी को बता दिया कि आज साहिब मुझे लेने आ रहे हैं। जब आपने उसकी सुरति को खींचना शुरू किया तो उसने अपना सिर पत्नी की गोद में रख लिया और सब हाल बताने लगा। वो बताने लगा कि ऐसे-ऐसे साहिब मुझे ले जा रहे हैं। अब एक स्थान पर निरंजन से सामना भी हुआ। वो बताने लगा कि अब निरंजन का साहिब से युद्ध हो रहा है। साहिब के हाथ में मेरे नाम की ज्योति है जिसे निरंजन बुझाए जा रहा है जबकि साहिब उसे बार-बार जलाए जा रहे हैं। उसने बताया कि घोर तूफान चल रहा है, जहाँ यह युद्ध चल रहा है। आधा घण्टा इस युद्ध का विवरण देने के बाद उसने बताया कि अब निरंजन हार गया है और साहिब मुझे जिताकर ले चले हैं। इतने में उसका शरीर से जो तार जुड़ा हुआ था, वो टूट गया और आप उसे अमर लोक ले गये।

जब भी किसी नामी का अंतिम समय आता है तो आप उसका ऐसे ही साथ देकर निरंजन से बचाकर अमर-लोक ले जाते हैं। जब भी कोई आपको पुकार करता है, आप पहुँच जाते हैं। यह पुकार तभी हो पाती है, यदि पूरा विश्वास हो। इसलिए आप केवल विश्वास की ही माँग करते हैं। नाम तो है ही है। जिसके पास नाम है, उसका निरंजन कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। पर सद्गुरु के बिना अमर-लोक नहीं जाया जा सकता है। इसलिए सद्गुरु का भरोसा चाहिए। नाम पाने के बाद भी यदि भरोसा नहीं किया तो अटक जाते हैं। यदि सद्गुरु का पूरा भरोसा हो तो आप ऐसे ही साथ देते हैं।

करता जो परतीत आपकी, लाता चरणों प्रीत।
काल निरंजन रोक न पाता, चलता भवजल जीत ॥

सबके दुख को समझते हैं आप

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सबके दुख को समझते हैं आप

आपके पशु बड़े चेतन हैं। आपका मानना है कि आदमी तो फ़ालतू बोलता है, बेकार काम करता रहता है, कहीं तिनके तोड़ता है, कहीं कुछ, पर पशु नहीं। आप कहते हैं कि बच्चा क्यों रोता है, क्योंकि उसके पास भाषा नहीं है। वो अपने भाव रोकर व्यक्त करता है। सभी तो रोते हैं। क्यों? क्योंकि भाषा नहीं है।

आप अरनिया में सत्संग कर रहे थे तो एक भैंस चिल्ला रही थी। किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसे तो धूप में बाँध रखा था। वो परेशान थी। वो कह रही थी कि मैं छाया में नहीं जा पा रही हूँ, मुझे बाँध रखा है। आपने एक सत्संगी को धूप में खड़ा किया। एक मिनट बाद पूछा कि कैसा लग रहा है? उसने कहा कि बहुत कष्ट है। आपने उसी को वहाँ भेजा; कहा कि उस भैंस को खोलकर छाया में बाँधो; चाहे जिसकी भी भैंस हो। फिर आपने देखा कि उसे प्यास भी लगी थी। तो आपने एक को कहा कि बाल्टी लेकर जाओ और उसे पानी पिलाओ।

दुनिया के लोग तो तेरा-मेरा कर रहे हैं। यही बात है कि दूसरे से घृणा कर रहे हैं। अपनापन नहीं दिखा रहे हैं। आपको हर प्राणी अपना लगता है। संपूर्ण विश्व अपना लगता है। ये केवल कहने में ही नहीं; यही सत्य है। आपको सबकी पीड़ा अपनी लगती है। आपने यह फैसला भी किया है कि जो गाएँ बेघर हैं, उन्हें भी इकट्ठा करके उनकी सेवा करूँगा; किसी को लगा दूँगा उनकी सेवा में; कहूँगा कि यही मेरी सेवा मानना।

एक गाय गुरुद्वारे में थी, पर वो उनकी सेवा नहीं कर पा रहे थे। गाय गजब की थी। वो 20 किलो दूध देती थी। किसी ने कहा कि साहिब-बंदगी वालों को दे दो। 1993 में उन्होंने उसे 17 हज़ार में दिया। पैसे तो ज़्यादा थे, पर गाय अच्छी थी। उसने तीन बछड़ियाँ दीं; वो भी बड़ी ही प्यारी थीं, माँ की तरह थीं। बड़ी होकर वो भी बहुत दूध देने

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लगीं। जब वो गाय बूढ़ी हो गयी तो गर्भनी हुई। तब उसे बैठने में भी तक़लीफ़ होती थी। जब बैठती तो उठने में तक़लीफ़ होती थी। आपके कुछ लोगों ने कहा कि इसे बेच देते हैं। आपने कहा-नहीं, यह तो पाप है, धोखा है। अभी यह बूढ़ी है; हमारा धर्म तो इसकी सेवा करना है।

आप राँजड़ी में ज़्यादा पशु नहीं रखना चाहते हैं; जगह कम है, इसलिए वही रखते हैं, जो ज़्यादा दूध देते हैं। क्योंकि वहाँ रोज़ कोई 40 किलो दूध लगता है। बहुत लोग आते हैं; सबके लिए चाय बनाना; जो वहाँ रहते हैं, उनके लिए चाय। ...तो गाय ओखी हो गयी, परेशान हो गयी। एक ने कहा कि इसे रखबंधु में भेज देते हैं, दूध कम दे रही है, 3-4 किलो ही दे रही है। आपने कहा-नहीं। साल-भर आपने कहीं नहीं ले जाने दिया। एक दिन एक ने कहा कि यहाँ पक्का फर्श है, इसलिए यह दुखी है; इसे रखबंधु ले जाता हूँ; वहाँ कच्चा फर्श है, वहाँ यह आराम से रहेगी, ठीक हो जायेगी। आप उसकी बात में आ गये। वो उसे ले गया और उसे नया कर दिया। आप वहाँ गये तो वो हाँप रही थी। आप कहते हैं कि किसी भी पशु को परेशान करके दूध पिया तो यह ठीक नहीं है, किसी काम का नहीं है। आपने उसे डाँटा। उसने कहा कि गलती हो गयी। ....तो उस गाय ने बच्चा दिया और फिर 24 किलो दूध दिया।

आप कहते हैं कि जब गाय का बछड़ा मर जाए तो वो दूध नहीं देती है। फिर उसे इंजेक्शन लगाकर दूध नहीं लेना। कुछ तो भैंस के बछड़े के लिए पहले से ही खड्ढा खोदकर रखते हैं, पर आप इसे बहुत पाप मानते हैं, समझाते हैं कि ऐसा कभी न करना।

आपके पशु भी आपसे बहुत प्रेम करते हैं। आप उन्हें भी सुरति देते हैं। वे चेतन हैं सभी। जिस समय आप पहुँचते हैं तो वे जान जाते हैं कि आप आ गये। जिस दिन आप समय पर उन्हें खाना नहीं देते हैं तो वे नाराज़गी भी दिखाते हैं। वे आपको आवाज़ देकर बुलाते भी हैं कि अभी समय हो गया है, हमें खाना दो। तो आपने एक से कह रखा है कि

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जब भी आवाज़ दें तो इन्हें खिला देना। जब एक दिन वो गया तो एक गाय पंखे की तरफ देखने लगी। वो कह रही थी कि चलाओ, हमें गर्मी लग रही है।

हित अनहित पशु पक्षिन जाना। मानव तन गुण ज्ञान निदाना ॥

इसलिए आप सभी में एक आत्मा देखते हैं, उनके दुख को भी समझते हैं।

एक ने आपको कहा कि मैं आपको दो भैंसे दान में देना चाहता हूँ। आपने पूछा कि तुम्हारे पास कितनी भैंसे हैं? उसने कहा-दो। आपने कहा कि फिर एक ही दो। उसने कहा कि एक भैंस के दो ही थन हैं, पर वो अच्छी है, दूध बहुत देती है। 3-4 महीने बाद बच्चा देगी।

आपने उसे अखनूर में रखा। 15 दिन में एक बार जब जाते तो टोकरी-भर रोटी खिलाते। वो आपसे बातें करती थी, अपने विचार रखती थी। जब कट्टा हुआ तो वो 10 किलो दूध देने लगी। भैंस का 1 किलो दूध गाय के 4 किलो दूध के बराबर होता है। कुछ समय बाद वो कम दूध देने लगी। उसकी देखभाल करने वाले बाबे ने कहा कि इसे ले जाओ; यह कभी दूध देती है, कभी नहीं। आपने कहा कि इसकी देखभाल करो अच्छी तरह। उसने कहा कि इसे राँजड़ी में भेज दो। पर जब उसे भेजने लगे तो वो जा ही नहीं रही थी। बड़ी मुश्किल से आपने उसे राँजड़ी भेजा। उसे पता था कि यहाँ सबकुछ अच्छा है, बड़ी सेवा होती है। वो आपसे सवाल कर रही थी कि इतने दिन दूध दिया, भूल गये। आपने कहा कि चिंता मत करो, वहाँ भी अच्छी सेवा होगी।

आपके पास एक आदमी आया; वो रो पड़ा, कहा कि यह तन आपका है, धन भी आपका है, मैं अपना कभी नहीं माना। आप कैसे हैं, यह भी मैं जानता हूँ। वो बोला कि आपके आश्रम के साथ मेरी ज़मीन है, उसे आपके लोगों ने कवर् किया है; जब मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि हमारी है। उन्होंने फिर आपसे शिकायत की और आप नाराज़ हुए;

मच्छर तक को नहीं मारते हैं आप

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आपने कहा कि सब कुछ गुरु जी का है, तो यह क्या किया! फिर आश्रम के लोगों ने 4-5 मरले और ले लिये। वो समर्पित था, पर वो दुखी था। उसने कहा कि गाँव के लोग और मेरा भाई कहता है कि कैसा है तेरा साहिब! तू तो कहता है कि कभी गलत नहीं करते हैं, फिर यह क्या है! मैं उनके आगे बात नहीं कर पाता हूँ। आपने कहा कि यदि तुझे भरोसा है कि तुम्हारी है तो चुपके से परिवार से नक्शा ले आओ। वहाँ की ज़मीन सस्ती थी, कोई 10-12 हज़ार की होगी। आपने कहा कि तू नक्शा ले आ, यहाँ तक तेरी ज़मीन होगी, वहाँ तक एक मिनट में छोड़ दूँगा। यदि वहाँ तक कुल्ला भी आयेगा तो उसे भी तोड़ दूँगा। आप सावधान हैं कि कहीं किसी के साथ नाइंसाफ़ी न हो। किसी की सूई भी नहीं लेना चाहते हैं आप।

आप लगातार आश्रम बनाते जाते हैं, किसी से माँगते भी नहीं। कभी पैसे नहीं होते तो उधार लेते हैं, और उसे अपनी डायरी में लिख देते हैं। कई जो अपनी इच्छा से दे देते हैं, कहते हैं कि होंगे तो वापिस दे देना। तो भी आप उन्हें वापिस कर देते हैं। चाहे कितना भी समय क्यों न हो जाए, आप किसी का कुछ नहीं रखते हैं। किसी को भी किसी तरह से आप दुख नहीं देना चाहते हैं। इसलिए यदि कोई आपकी निंदा कर रहा है, वो निहायत ही गंदा, बदतमीज और जानवर से भी नीचे होगा, जिसे कुछ भी सूझता नहीं है।

मच्छर तक को नहीं मारते हैं आप

जब मच्छर काटते हैं तो आप उन्हें मारना नहीं चाहते हैं। आप उन्हें मारना भी पाप ही मान रहे हैं। आपका मानना है कि इन्हें भी तो अपनी ख़ुराक चाहिए। पर ऐसा भी नहीं है कि आप मच्छरों के काटने के लिए अपने शरीर को रख दें। आप मच्छरदानी लगा लेते हैं या पंखा चला लेते हैं, पर कभी उन्हें मारते नहीं हैं। यदि कोई ज़्यादा तंग करे तो

आपके आगे मन का ज़ोर नहीं चलता है

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हाथ से या कपड़े से ज़मीन पर फेंक देते हैं, जिससे वो बेहोश हो जाता है और बाद में उड़कर चला जाता है। मच्छर ही नहीं, हरेक जीव के प्रति आप दया की भावना रखते हैं, उन्हें कोई भी कष्ट पहुँचाना नहीं चाहते हैं।

आपके आगे मन का ज़ोर नहीं चलता है

शरीर में रहकर आत्मिक व्यवहार करना बड़ा कठिन है। पर आप यह भी कर लेते हैं। एक समय था जब आप कभी भोजन नहीं खाते थे। मन कहता था कि खाओ, नहीं तो कमज़ोर हो जाओगे। आप कहते थे कि आत्मा कभी कमज़ोर होती है क्या! ओ मूर्ख मन! आत्मा को भोजन से क्या लेना! आप नहीं खाते थे। एक आदमी खा रहा था तो आपने सोचा कि इसे भी ज्ञान देता हूँ। आपने कहा कि यह तुम नहीं खा रहे हो, कोई और खा रहा है। तुझे इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। वो बड़ी ज़ोर से हँसा। वो बोला कि यह पागल हो गया है। आपने सोचा, अरे! गहराई में दुनिया वालों से बात नहीं करनी है।

आप इस शरीर में रहकर भी अपने में रहते हैं। एक ने आपका पाँव उठाया, कहा कि कितने गंदे हो; देखो, कितनी मैल जमी हुई है। यानी आप अपने शरीर को देखते भी नहीं थे। आप किसी से बात भी नहीं करते थे। पर शरीर में रहकर आत्मा का धर्म पालन करना बड़ा कठिन है।

आत्मा शरीर से छूटकर अमर-लोक गयी तो ठीक है। पर आपने शरीर में रहकर शरीर का धर्म पालन नहीं किया। स्वाँस भी नहीं लेते थे आप। एक पल भी नहीं सोते थे। सोना-जागना तो मन की वृत्ति है।

आपको मन भटका ही कैसे सकता है! यह किसी को भी भ्रमित कर देता है। जो भी इस संसार में आया, उसे भ्रमित कर देता है। धर्मदास जी को परम-पुरुष ने ही संसार में भेजा था ताकि जीवों का कल्याण हो। पर धर्मदास जी को भी काल ने अपने जाल में फँसा लिया। वे