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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

धर्त्ता सिन्धुरपः समुद्रियः । विश्वे देवासः शृणवन् वचांसि मे सरस्वती सह धीभिः पुरन्ध्या ॥ ” [ऋ० सं० ८, २, ११, ३] ॥ 'पविः' शल्यो भवति । यद् विपुनाति कायम् तद्वत्- 'पवीरम्' आयुधम् । तद्वान् इन्द्रः - 'पवीरवान्' । “अति तस्थौ पवीरवान् ” [ऋ० सं० ८, १, २४, ३) । इत्यपि निगमो भवति । तद्देवता वाक् 'पावीरवी' पावीरवी च दिव्या वाक्, 'तन्यतुः' तनित्री वाचः अन्यस्याः अजश्च एकपाद् दिवो धारयिता च सिन्धुश्च आपश्च समुद्रियाः च सर्वे च देवाः सरस्वती च सह पुर- न्ध्या स्तुत्या प्रयुक्तानि धीभिः कर्मभिः युक्तानि शृण्वन्तु वचनानि इमानि- इति ॥ 'पृथिवी' व्याख्याता । तस्या एष निपातो भवति ऐन्द्र्याम् ऋचि।११,३०। अर्थः- “पावीरवी तन्यतुः” इस ऋचा का वणुकर्ण ऋषि और वैश्वदेव शस्त्र में विनियोग है । 'पावीरवी' मध्यम लोक की वाक्- 'तन्यतु' अन्यस्याः वाचः तनित्री जो अन्यमनुष्य आदिकों की बातोंको विस्तार

हिन्दी निरुक्त (५२०) १२ अ० ३ पा० ११ खं० करनेवाली या उत्पन्न करनेवाली है, वह और 'दिवः' 'द्युलोक का 'धर्त्ता' धारण करनेवाला 'अजः च' एकपाद्' अज एक- पाद् 'सिन्धुः' (च नदः) और सिन्धु नद् 'आपः' [च] और जल 'समुद्रियः' [समुद्रियाश्च] और समुद्र के जल "विश्वे देवासः” (सर्वे च देवाः) और सब देवता 'सरस्वती च) और सरस्वती (ये सब देवता] 'धीभिःसह" (कर्मभिःयुक्तानि) कर्मों से युक्त 'पुरन्ध्या' (स्तुत्या प्रयुक्तानि) स्तुति से प्रेरित 'वचांसि' (इमानि वचनानि) इन वचनों को 'शृणवन्' (शृण्व- न्तु) सुने [इति] यह हम चाहते हैं 'पवि' क्या ? शल्य (लोहे का धार वाला फल जो बाण आदि अस्त्र शस्त्रों के अग्र में रोपा जाता है) होता है । क्यों ? 'विपुनाति कायम्' शरीर को विदारण कर देता है । 'तद्वत् पवीरम्' वह (पवि) जिसमें लगा हुआ होता है, वह 'आयुध' 'पवीर' होता है । 'तद्वान् इन्द्रः पवीरवान्' उस [पवीर] का रखने वाला इन्द्र 'पवीरवान्' होता है क्यों कि- “अतितस्थौ पवीरवान्” [ऋ० सं० ८,१,२४,३] अर्थात् पवीरवान् इन्द्र शत्रुओं को दबा कर खड़ा हुआ था या है । यह भी निगम है । 'तद्देवता वाक् पावीरवी' वह इन्द्र जिसका देवता है, सो पावीरवी है । क्या ? 'दिव्या वाक् द्युलोक की वाणी ॥ “दिवो धर्त्ता” द्युलोक का धारण करने वाला । 'अज एक पाद्' देवता का यह (दिवोधर्त्ता) विशेषण होने से यह द्युलोक स्थान का देवता है, यह मन्त्राक्षरों से ही निश्चित होता है ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४२१ ) १२ अ० २ पा० १२ खं० 'पृथिवी' (१६) का व्याख्यान होचुका [ १, ४, ३ ] “तस्याः०” उस पृथिवी ) का इन्द्र की ऋचा में यह निपात है-॥११(३०)॥ ( खं० १२ ) निरु०-“यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यम- स्यामवमस्यामुतस्थः । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥” [ ऋ० सं० १, ७, २७, ३ ] ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ 'समुद्रः' व्याख्यातः । तस्य एष निपातो भवति पावमान्याम् ऋचि ॥ १२ ( ३१ ) ॥ अर्थः-“यदिन्द्राग्नी०” यह ऋचा कुत्स ऋषिकी है। हे 'इन्द्राग्नी!’ इन्द्र अग्नि देवो ! हे 'वृषणौ!’ काम- नाओं को बरसाने वाले ! 'यत्' (यदि) जो (युवाम्) तुम दोनों “परमस्यां पृथिव्याम्” द्युलोक रूप पृथिवी में ‘उत’ अथवा ‘मध्यमस्याम्’ [ मध्यमायाम् अन्तरिक्षे ] मध्यम लोक की पृथिवी = अन्तरिक्ष में अथवा ‘अवमस्याम्’ ( अस्यामेव भूम्याम् ) इसी भूमि में 'स्थः' हो, ( अतः ) तथापि ‘आ- यातम्’ हमारे प्रति आओ ‘अथ’ और ‘सुतस्य’ निचोड़े हुए ‘सोमस्य’ सोम को ‘पिबतम्’ पान करो ॥