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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

२८ नीतिवाक्यामृतम् रहती है उनको ऐहलौकिक और पारलौकिक कोई भी सुख नहीं प्राप्त होते । कुत्सित पुरुष का लक्षण— स किंपुरुषो यस्य महाभियोगे सुवंश धनुष इव नाधिकं जायते बलम् ॥ २५ ॥ अच्छी किस्म के बांस से बनाये गये धनुष पर बाण चढ़ाते समय जिस प्रकार अधिक दृढ़ता प्रतीत होती है उसी प्रकार महान् आपत्ति आने पर जिस पुरुष में दृढ़ता न उत्पन्न हो, स्थिरता और गम्भीरता न हो वह पुरुष कुत्सित पुरुष है । इच्छा का लक्षण— आगामिक्रियाहेतुरभिलाषो वेच्छा ॥ २६ ॥ भविष्य में होने वाली क्रिया का जो कारण है वही अभिलाष अथवा इच्छा है । आत्मनो प्रत्यवायेभ्यः प्रत्यावर्त्तनहेतुर्द्वेषोऽनभिलाषो वा ॥ २७ ॥ दोषों से बचने के उपाय— अपने को प्रत्यवाय अर्थात् दोषों से बचाये रखने के लिये दो उपाय हैं । प्रथम उन दोषों और बुराइयों से घृणा करना दूसरा उन दोषों को करने की इच्छा ही न करना । उत्साह का लक्षण— हिताहितप्राप्तिपरिहारहेतुरुत्साहः ॥ २८ ॥ जिस भाव के कारण मनुष्य की भलाई हो और बुराई दूर हो उसका नाम उत्साह है । प्रयत्न की परिभाषा— प्रयत्नपरिनिमित्तको भावः ॥ २९ ॥ मनुष्य के हृदय में कार्य करने के निमित्त जो भाव उत्पन्न होता है उसी का नाम प्रयत्न है । संस्कार की दो परिभाषाएं— सातिशयलाभः संस्कारः ॥ ३० ॥ राजा अथवा जनता से अतिशय आदर आदि की प्राप्ति संस्कार हैं । अनेकजन्मकर्माभ्यासवासनावशात् सद्योजातादीनां स्तन्यपिपासा- दिकं येन क्रियते इति संस्कारः । अनेक जन्म में किये गये कर्मों के अभ्यास की वासना के वश होकर तुरन्त उत्पन्न हुए प्राणी के मन में जो दूध पीने आदि की प्रवृत्ति होती है— वह संस्कार है ।

आन्वीक्षिकीसमुद्देशः २६ शरीर का स्वरूप— भोगायतनं शरीरम् ॥ ३१ ॥ भले-बुरे भोगों का घर ही शरीर है। लोकायतिक का लक्षण— ऐहिकव्यवहारप्रसाधनपरं लोकायतिकम् ॥ ३२ ॥ यह लोक ही सब कुछ है, ऐसा मानकर समस्त व्यवहारों में प्रवृत्त कराने वाला दर्शन लोकायतिक अथवा नास्तिक दर्शन है। राजा को लोकायत जानना श्रेयस्कर है— लोकायतज्ञो हि राजा राष्ट्रकण्टकानुच्छेदयति ॥ ३३ ॥ लोकायत अर्थात् नास्तिक दर्शन को जाननेवाला राजा राष्ट्र की बुराइयों को नष्ट कर देता है। कोई क्रिया सर्वथा निर्दोष नहीं है— न खल्वेकान्ततो यतीनामप्यनवद्यास्ति क्रिया ॥ ३४ ॥ सन्न्यासियों के भी कर्म-सत्य अहिंसा आदि सर्वथा निर्दोष नहीं होते। अत्यन्त दयालुता के दोष— एकान्तेन कारुण्यपरः करतलगतमप्यर्थं रक्षितुं न क्षमः ॥ ३५ ॥ केवल करुणा में तत्पर मनुष्य अर्थात् अत्यन्त दयालु हथेली में भी रखे हुए अर्थ की रक्षा नहीं कर सकता। प्रशमैकचित्तं को नाम न परिभवति ॥ ३६ ॥ सर्वथा शान्त चित्त रहने वाले मनुष्य का कौन नहीं अनादर करता। अपराधी को दण्ड देना राजा का कर्त्तव्य है— अपराधकारिषु प्रशमो यतीनां भूषणं न महीपतीनाम् ॥ ३७ ॥ अपराध करने वाले को दण्डित न करना सन्न्यासियों को ही शोभा दे सकता है राजा को नहीं। परिणाम शून्य क्रोध और कृपा व्यर्थ है— धिक् तं पुरुषं यस्यात्मशक्त्या नस्तः कोपप्रसादौ ॥ ३८ ॥ जो पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध और प्रसन्नता न प्रदर्शित कर सके वह धिक्कार के योग्य है। विशेषार्थ—जिसके क्रोध से न कोई डर हो और प्रसन्नता से न कोई लाभ ही हो वह पुरुष निन्दनीय है। जीवित मृत का लक्षण— स जीवन्नपि मृत एव यो न विक्रामति प्रतिकूलेषु ॥ ३९ ॥ वह पुरुष जीते हुए भी मरा है जो अपने विरुद्ध आचरण करने वालों पर किसी प्रकार के पराक्रम का प्रदर्शन न कर सके।

३० नीतिवाक्यामृतम् भस्मनीव निस्तेजसि को नाम निःशङ्कः पदं न कुर्यात् ॥ ४० ॥ बिना आग की भस्म पर कौन नहीं निडर होकर पैर रखेगा । पाप के लिये अपवाद— तत्पापमपि न पापं यत्र महान् धर्मानुबन्धः ॥ ४१ ॥ वह पाप पाप नहीं है जिसके करने से महान् धर्म होता है । विशेषार्थ—किसी एक दुष्ट का वध कर देने से हजारों-लाखों की यदि सुरक्षा होती हो तो उसका वध पाप कर्म नहीं होगा । अन्यथा पुनर्नरकाय राज्यम् ॥ ४२ ॥ अन्यथा अर्थात् उपर्युक्त रीति-नीति से दुष्ट दमन न करने पर राजा का राज्य उसके लिये नरक के समान ही दुःखकारक हो जाता है । अधिकार प्राप्ति से दोष— बन्धनान्तो नियोगः ॥ ४३ ॥ अधिकार बन्धन है । विशेषार्थ—मनुष्य को अधिकार मिलने पर अनेक प्रकार के कर्त्तव्यों के बन्धन में बंध जाना पड़ता है । दुष्टों की मित्रता का परिणाम— विपदन्ता खलमैत्री ॥ ४४ ॥ दुष्टों की मित्रता का अन्त विपत्ति में होता है । स्त्रियों पर विश्वास करने का फल— मरणान्तः स्त्रीषु विश्वासः ॥ ४५ ॥ स्त्रियों पर विश्वास करना अन्त में मृत्यु का कारण होता है । इत्यान्वीक्षिकी समुद्देशः । ७. त्रयीसमुद्देशः त्रयी का अर्थ— चत्वारो वेदाः, शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोज्योतिषमिति षडङ्गानीतिहास-पुराण मीमांसा-न्याय-धर्मशास्त्रमिति चतुर्दश विद्यास्था- नानि त्रयी ॥ १ ॥ चार वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छन्द, ज्योतिष, ये षडङ्ग और इतिहास-पुराण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र इन चौदह विद्या स्थानों को त्रयी कहते हैं ।

त्रयीसमुद्देशः ३१ त्रयी विद्या से लाभ— त्रयीतः खलु वर्णाश्रमाणां धर्माधर्मव्यवस्था ॥ २ ॥ इस त्रयी विद्या के आधार से चारों वर्ण और चारों आश्रम के लोगों की धर्म और अधर्म की व्यवस्था होती है। स्वपक्षानुरागप्रवृत्त्या सर्वे समवायिनो लोकव्यवहारेष्वधिक्रि- यन्ते ॥ ३ ॥ इस त्रयी विद्या के द्वारा समस्त सम्प्रदाय के मनुष्य अपने-अपने मतों में सानुराग प्रवृत्त होकर लौकिक व्यवहार के अधिकारी बनते हैं। धर्मशास्त्र और वेद की समानता— धर्मशास्त्राणि स्मृतयो वेदार्थसंग्रहाद् वेदा एव ॥ ४ ॥ धर्मशास्त्र और स्मृति ग्रन्थों में वेदों में प्रतिपादित अर्थ का ही संग्रह हुआ है, अतः ये वेद ही हैं। अर्थात् इनके वचन वेद के तुल्य मान्य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समानधर्म — अध्ययनं यजनं दानञ्च विप्रक्षत्रियवैश्यानां समानो धर्मः ॥ ५ ॥ अध्ययन, यज्ञ और दान ये तीन ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य के लिये समानरूप से पालन करने योग्य धर्म हैं। द्विजाति का अर्थ— त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ ६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णों की द्विजाति संज्ञा है। ब्राह्मणों के नियत कर्म— अध्यापनयाजनं प्रतिग्रहश्च ब्राह्मणानामेव ॥ ७ ॥ पढ़ाना, यज्ञ आदि कराना और दान लेना यह ब्राह्मणों का ही कर्म है। क्षत्रियों के नियत कर्म— भूतसंरक्षणं शस्त्राजीवनं सत्पुरुषोपकारो दीनोद्धरणं रणेऽपलायनं चेति क्षत्रियाणाम् ॥ ८ ॥ जीवों की रक्षा, शस्त्र विद्या द्वारा जीविका चलाना, सत्पुरुषों का उप- कार करना, दीनों का दुख से उद्धार करना और संग्राम से विमुख न होना, क्षत्रियों के कर्म हैं। वैश्यों के नियत कर्म— वार्त्ताजीवनमावेशिकपूजनं सत्रप्रपापुण्यारामदयादानादिनिर्माणं च विशाम् ॥ ६ ॥ वार्त्ता अर्थात् कृषि, पशु रक्षा और वाणिज्य, अतिथिसेवा, अन्नसत्र, प्याऊ, पुण्यार्थ गृह धर्मशाला तथा उद्यान आदि की स्थापना एवं निर्माण दया और दान आदि कर्मों में प्रवृत्त रहना वैश्यों के कर्तव्य हैं।

३२ नीतिवाक्यामृतम् शूद्रों के नियत कर्म— त्रिवर्णोपजीवनं कारुकुशीलवकर्म शकटोपवाहनं च शूद्राणाम् ॥१०॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा, शिल्पकार्य, कथक अथवा चारण कार्य और गाड़ी ढोना यह सब शूद्र के कर्त्तव्य हैं । सच्छूद्र के लक्षण— सकृत्परिणयनव्यवहाराः सच्छूद्राः ॥ ११ ॥ कन्याओं का एक बार ही विवाह करने की मर्यादा का पालन करनेवाले शूद्रों को सत् शूद्र कहते हैं । शूद्र भी देवपूजा आदि के अधिकारी होते हैं— आचारानवद्यत्वं शुचिरुपस्कारः शारीरी च विशुद्धिः करोति शूद्रमपि देवद्विजतपस्विपरिकर्मसु योग्यम् ॥ १२ ॥ अनिन्द्य, आचार-व्यवहार घर के सामानों को साफ सुथरा रखना, तथा शरीर की शुद्धि स्नानादि के द्वारा करने से शूद्र भी देवता, ब्राह्मण और तप- स्वियों की पूजा-परिचर्या के योग्य होते हैं । सर्वसाधारण के द्वारा पालन योग्य धर्म— आनृशंस्यममृषाभाषित्त्वं, परस्वनिवृत्तिः, इच्छा नियमः प्रति- लोमाविवाहो निषिद्धासु च स्त्रीषु ब्रह्मचर्यमिति सर्वेषां समानो धर्मः ॥ १३ ॥ मृदुता, असत्य भाषण न करना, पराये धन को न लेने की प्रवृत्ति, इच्छाओं पर नियन्त्रण स्वजाति में ही शास्त्रानुमोदित विवाह करना, निषिद्ध स्त्रियों के साथ समागम न करना, सब वर्ण और आश्रम वालों के लिये समानरूप से पालन करने योग्य धर्म हैं । साधारण धर्म की विशेषता— आदित्यालोकनवत् धर्मः खलु सर्व साधारणो विशेषानुष्ठाने तु नियमः ॥ १४ ॥ जिस प्रकार सूर्य का दर्शन करने का ब्राह्मण और चाण्डाल को समान अधिकार प्राप्त है उसी प्रकार मृदुता सत्यभाषिता आदि उपर्युक्त धर्म सबके लिये समान हैं । विशेष प्रकार के धर्मानुष्ठान के लिये ही विशेष नियम हैं । यतियों का स्वधर्म— निजागमोक्तमनुष्ठानं यतीनां स्वोधर्मः ॥ १५ ॥ अपने सम्प्रदाय के अनुकूल शास्त्रों में वर्णित आचार-विचार का परिपालन यतियों का स्वधर्म है ।

त्रयीसमुद्देशः ३३ स्वधर्म का पालन न करने का प्रायश्चित्त— स्वधर्मव्यतिक्रमेण यतीनां स्वागमोक्तं प्रायश्चित्तम् ॥ १६ ॥ यदि यति या सन्यासी स्वधर्म पालन से च्युत हो जाय तो उनको अपने आगम में वर्णित प्रायश्चित्त करने चाहिएं। श्रद्धा के अनुरूप उपासना करनी चाहिए— यो यस्य देवस्य भवेच्छ्रद्धावान् स तं देवं प्रतिष्ठापयेत् ॥ १७ ॥ जो जिस देवता विशेष के प्रति श्रद्धालु हो वह उसी की उपासना या प्रतिष्ठा करें। भक्तिहीन पूजन से दोष— अभक्त्या पूजोपचारः सद्यः शापाय ॥ १८ ॥ बिना भक्ति की पूजा तत्काल शापदायक होती है। आचार से च्युत होने पर शुद्धि का उपाय— वर्णाश्रमाणां स्वाचारप्रच्यवने त्रयीतो विशुद्धिः ॥ १९ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी, ये जब अपने आचार से च्युत हों तो उनकी शुद्धि 'त्रयी' अर्थात् पूर्वोक्त चतुर्दश विद्या स्थानों में वर्णित विधानों के अनुसार होती है। राजा के लिये त्रिवर्ग प्राप्ति का उपाय— स्वधर्मासङ्करः प्रजानां राजानं त्रिवर्गेणोपसंघत्ते ॥ २० ॥ प्रजा में यदि राजा की शासन कुशलता से धर्म-सांकर्य, वर्ण-संकरता आदि दोष नहीं उत्पन्न हो पाते तो राजा को धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है, अर्थात् राजा सुखी रहता है। प्रजा की रक्षा राजा का प्रमुख कर्त्तव्य— स किंराजा यो न रक्षति प्रजाः ॥ २१ ॥ वह राजा राजा नहीं है अर्थात् निन्दनीय है जो अपनी प्रजा की रक्षा नहीं करता। राजा की आवश्यकता— स्वधर्ममतिक्रामतां सर्वेषां पार्थिवो गुरुः ॥ २२ ॥ अपने धर्म का उल्लङ्घन करने वाले समस्त व्यक्तियों का अनुशासक राजा ही है। प्रजापालक राजा को प्रजा के धर्मपालन का छठा भाग प्राप्त होना— परिपालको हि राजा सर्वेषा धर्मषष्ठांशमवाप्नोति ॥ २३ ॥ लोग अपने अपने धर्म का परिपालन करते रहें, इस प्रकार का रक्षक ३ नी०

३४ नीतिवाक्यामृतम् राजा समस्त वर्ण और आश्रम वालों द्वारा किये गये धर्मानुष्ठान के छठे अंश का भागी होता है । तपस्वियों द्वारा भी राजा का सम्मान— उञ्छषड्भागप्रदानेन तपस्विनोऽपि राजानं संभावयन्ति ॥ २४ ॥ कण-कण बटोर कर अन्न इकट्ठा कर जीवन निर्वाह करना उञ्छवृत्ति है । उञ्छ का छठा हिस्सा देकर तपस्वी भी राजा का समादर करते हैं । तस्यैतद् भूयाद् योऽस्मान् रक्षति ॥ २५ ॥ तपस्वी कहते हैं यह षष्ठांश उस राजा को प्राप्त हो जो हमारी रक्षा करता है । मङ्गल और अमङ्गल की मान्यता— तदमङ्गलमपि नामङ्गलँ यत्रास्यात्मनो भक्तिः ॥ २६ ॥ जिस पर अपनी श्रद्धा-भक्ति हो वह वस्तु या व्यक्ति अमंगलकारक होने पर भी अमंगलकारक नहीं होता । पुरुष के कर्त्तव्य— संन्यस्ताग्निपरिग्रहानुपासीत ॥ २७ ॥ संन्यासी और याज्ञिकों की उपासना करनी चाहिए । स्नान के अनन्तर आवश्यक कर्त्तव्य— स्नात्वा प्राग्देवोपासनान्न कंचन स्पृशेत् ॥ २८ ॥ स्नान के अनन्तर जब तक देवोपासना न कर ले तब तक किसी का स्पर्श न करे । देवमन्दिर में जाने पर गृहस्थ का कर्त्तव्य— देवागारे गतः सर्वान् यतीन् आत्मसंबन्धिनीर्जरतीः पश्येत् ॥ २९ ॥ देवालय में पहुँच कर समस्त यतियों और कुलवृद्धाओं से शिष्टाचार करे । राजा और साधु का सत्कार आवश्यक है— देवाकारोपेतः पाषाणोऽपि नावमन्येत तत्किं पुनर्मनुष्यः । राजशास- नस्य मृत्तिकायामिव लिंगिषु को नाम विचारो यतः स्वयं मलिनो खलः प्रवर्धयत्येव क्षीरं धेनूनाम् । न खलु परेषामाचारः स्वस्य पुण्यमारभते किन्तु मनोविशुद्धिः ॥ ३० ॥ देवाकार को प्राप्त पाषाण का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिये मनुष्य तो दूर रहा । राज्यशासन की मुहर मिट्टी पर भी महत्त्वपूर्ण होती है । रूप या वेषधारी वस्तु का विचार नहीं किया जाता । क्योंकि स्वयं मलिन भी खली, गायों का दूध ही बढ़ाती है । दूसरों के आचार से अपना पुण्य नहीं बढ़ता, वह तो मन की निर्मलता पर निर्भर है ।

त्रयीसमुद्देशः ३५ ब्राह्मण आदि के स्वाभाविक धर्मों का वर्णन — दीना प्रकृतिः प्रायेण ब्राह्मणानाम् ॥ ३१ ॥ ब्राह्मणों का स्वभाव प्रायः दीन-अर्थात् विनम्र होता है। बलात्कारस्वभावः क्षत्रियाणाम् ॥ ३२ ॥ क्षत्रियों का स्वभाव बलात्कार-बल प्रदर्शन होता है। निसर्गतः शाठ्यं किरातानाम् ॥ ३३ ॥ कोल, भील आदि स्वभावतः शठ होते हैं। ऋजुवक्रशीलता सहजा कृषीवलानाम् ॥ ३४ ॥ किसानों में स्वाभाविक नम्रता और स्वाभाविक कठोरता भी होती है। दानावसानः कोपो ब्राह्मणानाम् ॥ ३५ ॥ ब्राह्मणों के क्रोध का अन्त दान में होता है अर्थात् दान पाने से ब्राह्मण सन्तुष्ट हो जाता है। प्रणामावसानः कोपो गुरूणाम् ॥ ३६ ॥ गुरुओं के क्रोध का अन्त प्रणाम करने से होता है। प्राणावसानः कोपः क्षत्रियाणाम् ॥ ३७ ॥ क्षत्रियों के क्रोध का अन्त प्राण लेकर ही होता है। प्रियवचनावसानः कोपो वणिग् जनानाम् ॥ ३८ ॥ वैश्यों के क्रोध की शान्ति मीठे वचनों से होती है। वैश्यानां समुद्धारप्रदानेन कोपोपशमः ॥ ३६ ॥ वैश्यों के क्रोध की शान्ति उनका कर्ज चुका देने से हो जाती है। निश्चितैः परिचितैश्च सह व्यवहारो वणिजां निधिः ॥ ४० ॥ जो स्थायी रूप से एक जगह रहते हों और भली भांति परिचित हों उन के संग लेन-देन का व्यवहार करना वैश्यों के लिये 'निधि' रूप है। क्योंकि इनको दिये गये ऋण के न वसूल हो सकने का भय नहीं रहता और वैश्यों की ऐश्वर्य-वृद्धि होती हैं। दण्डभयोपधिभिर्वशीकरणं नीचजात्यानाम् ॥ ४१ ॥ दण्ड-भय और छल-छद्म पूर्ण व्यवहार नीच जाति के लोगों को वश में करने का उपाय है। इति त्रयी समुद्देशः ॥

३६ नीतिवाक्यामृतम् ८. वार्त्तासमुद्देशः वैश्यों की आजीविका का वर्णन— कृषिः पशुपालनं वणिज्या च वार्त्ता वैश्यानाम् ॥ १ ॥ खेती, पशुपालन और व्यापार ये वैश्यों की आजीविकायें हैं । 'वार्त्ता' की समृद्धि से राजा की समृद्धि— वार्त्तासमृद्धौ सर्वाः समृद्धयो राज्ञः ॥ २ ॥ राज्य में वार्त्ता की समृद्धि से राजा की सब प्रकार की समृद्धि होती है । कृषि, पशुपालन और व्यापार का सङ्क्षिप्त नाम 'वार्त्ता' है । सांसारिक दृष्टि से कौन सुखी है— तस्य खलु संसारसुखं यस्य कृषिर्धेनवः शाकवाटः सद्मन्युद- पानं च ॥ ३ ॥ उसको संसार का समस्त सुख भोग प्राप्त है जिस को खेती हो, गाय-बैल हों, शाक आदि के लिये बाड़ी या बगीचे हों और घर में ही पेय जल का प्रबन्ध हो । अपव्ययी राजा की हानि का वर्णन -- विसाध्यराज्ञास्तन्त्रपोषणे नियोगिनामुत्सवो महान् कोशक्षयश्च ॥४॥ तंत्र-पोषण में व्यर्थ विशेष व्यय करने वाले राजा के अधिकारियों के यहाँ तो उत्सव मचता है पर राजा के कोष की महती क्षति होती है । नित्यं हिरण्यव्ययेन मेरुरपि क्षीयते ॥ ५ ॥ सदा स्वर्ण-व्यय करने से सुमेरु जैसी विशाल धन-राशि भी विनष्ट हो जाती है ! तत्र सदैव दुर्भिक्षं यत्र राजा विसाधयति ॥ ६ ॥ जहां राजा फिजूलखर्ची होता है वहां सदा ही दुर्भिक्ष की स्थिति बनी रहती है । समुद्रस्य पिपासायां कुतो जगति जलानि ॥ ७ ॥ समुद्र ही यदि प्यासा हो जाय तो उस अनन्त जल-राशि को पूर्ण करने के लिये संसार में और कहां जल मिलेगा । स्वयं जीवधनमपश्यतो महती हानिर्मनस्तापश्च क्षुत्-पिपासाऽप्रति- कारात् पापं च ॥ ८ ॥ पशुधन की स्वयं देखभाल न करने से बड़ी हानि होती है मन को संताप भी होता है तथा मूक पशुओं के भूखे-प्यासे बंधे रहने पर पाप भी होता है ।

वार्तासमुद्देशः ३७ राजा के लिये बन्धुओं की भांति पोष्यवर्ग— वृद्धबालव्याधितक्षीणाम् पशून् बान्धवानिव पोषयेत् ॥ ९ ॥ बूढ़े, बच्चे, रोगी और जर्जर पशुओं का पोषण अपने बान्धवों की तरह करे। पशुओं की अकाल मृत्यु का कारण— अतिभारो महान् मार्गश्च पशूनामकाले मरणकारणम् ॥ १० ॥ बहुत अधिक बोझ ढोना, बहुत मार्ग चलना पशुओं की अकाल मृत्यु का कारण होता है। राज्य में बाहरी माल न आने के कारण— शुल्कवृद्धिर्बलात् पण्यग्रहणञ्च देशान्तरभाण्डानाम्प्रवेशे हेतुः ॥११॥ कर वृद्धि और विक्रय योग्य वस्तुओं का अधिकारियों आदि के द्वारा बलात् ले लिये जानेसे देशान्तर से बिक्री की चीजें आना बंद हो जाता है। बेईमानी सदा नहीं सफल हो सकती— काष्ठपात्र्यामेकदैव पदार्थो रध्यते ॥ १२ ॥ काठ की हांड़ी में एक ही बार भोजन पकाया जा सकता है। अर्थात् बेईमानी एक ही बार चल सकती है। मापों की शुद्धता की आवश्यकता— तुलामानयोरव्यवस्था व्यवहारं दूषयति ॥ १३ ॥ तराजू और बांट की गड़बड़ी से व्यापार बिगड़ता है। कृत्रिम मंहगाई के दुष्परिणाम— वणिग्जनकॢप्तोऽर्घः स्थितानागन्तुकांश्च पीडयति ॥ १४ ॥ जब वनिये वस्तुओं का मूल्य अपने मन से बढ़ा देते हैं तो उस से वहां के रहने वालों को और बाहर से आने वालों को कष्ट होता है। वस्तुओं का मूल्य निश्चित करने में आवश्यक विचार— देशकालभाण्डापेक्षया वा सर्वार्घो भवेत् ॥ १५ ॥ समय देश और विक्रय की वस्तुओं का विचार कर के वस्तुओं का मूल्य स्थिर करना चाहिए। बाजार के विषयमें राजा को स्वयं सतर्क रहना चाहिए— पण्यतुलामानवृद्धौ राजा स्वयं जागृयात् ॥ १६ ॥ बाजार की चीजें नकली और मिलावट की न हों तराजू की तोल में घट बढ़ न हो और बटखरे कम ज्यादा नाप के न हों इन बातों की जांच पड़ताल राजा को स्वयं करते रहना चाहिए।

३८ नीतिवाक्यामृतम् वणिक्-स्वभाव का वर्णन— न वणिग्भ्यः सन्ति परे पश्यतोहराः ॥ १७ ॥ बनियों से बढ़कर दूसरा कोई पश्यतोहर (प्रत्यक्ष चोर) नहीं है। कृत्रिम मूल्यवृद्धि के विषय में राजा का कर्तव्य— स्पर्द्धया मूल्यवृद्धिर्भाण्डेषुराज्ञो, यथोचितं मूल्यं विक्रेतुः ॥ १८ ॥ आपस की लागडांट करके चीजों का मूल्य व्यापारी बढ़ा दें तो बढ़ा हुआ मूल्य राजा लेले और यथोचित मूल्य मात्र बेंचने वाले को दे । बहुमूल्य वस्तु को अल्पमूल्य में खरीदने वाले के प्रति राजा का कर्तव्य— अल्पद्रव्येण महाभाण्डं गृह्णतो मूल्याविनाशेन तद्भाण्डं राज्ञः ॥१९॥ थोड़ा ही पैसा देकर बहुमूल्य वस्तु खरीदने वाले बनिये को मूल्य मात्र देकर बिक्री की बहुमूल्य चीज राजा ले ले । अन्याय की उपेक्षा से राजा को हानि— अन्यायोपेक्षा सर्वं विनाशयति ॥ २० ॥ अन्याय की उपेक्षा सब कुछ नाश कर देती है । राष्ट्र के लिये दण्ड के तुल्य व्यक्ति— चौरचरचाटभटराजवल्लभाटविकतलाराक्षशालिकनियोगिग्रामकूट- वार्धुषिका हि राष्ट्रस्य कण्टकाः ॥ २१ ॥ चोर गुप्तदूत चारण और भाट आदि, राजा के प्रेमपात्र, जंगलात विभाग के कर्मचारीगण तलार अर्थात् छोटे छोटे स्थानों की रक्षा के निमित्त नियुक्त अधिकारी व्यक्ति जैसे ग्राम चौकीदार-हल्का जमादार आदि अक्षशालिक अर्थात् जुआ खिलाकर अपनी जीविका चलाने वाले व्यक्ति, नियोगी अर्थात् अधिकारी गण, ग्रामकूट अर्थात् पटव री और वार्धुषिक ब्याजखोर ये ग्यारह राष्ट्रके लिये कण्टक स्वरूप हैं । प्रतापवति राज्ञि निष्ठुरे सति न भवन्ति राष्ट्रकण्टकाः ॥ २२ ॥ राजा प्रतापशाली हो और शासन में कठोर हो तो ये राष्ट्र कण्टक विघ्न नहीं कर सकते । ब्याज से जीवन निर्वाह करने वालों से राष्ट्र की क्षति और उसके सुझाव— अन्यायवृद्धितोवार्धुषिकास्तन्त्रं देशं च नाशयन्ति ॥ २३ ॥ अन्याय की वृद्धि करके वार्धुषिक राष्ट्र और देश का विनाश करते हैं ! कार्याकार्ययोर्नास्ति दाक्षिण्यं वार्धुषिकानाम् ॥ २४ ॥ वार्धुषिकोंको कर्तव्य अकर्तव्य का विवेक नहीं होता । अप्रियमप्यौषधं पीयते ॥ २५ ॥ शरीर को स्वस्थ रखने के लिये औषध कड़वी हो तब भी पी जाती हैं ।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri दण्डनीतिसमुद्देशः ३६ विशेषार्थ—प्रासङ्गिक अर्थ यह होगा कि इन राष्ट्रकण्टकों को नष्ट करने के लिये अप्रिय भी दमन-नीति अपनानी चाहिए। अहिदष्टा स्वाङ्गुलिरपि छिद्यते ॥ २६ ॥ सर्पं से डसी गई अपनी अङ्गुलि भी समस्त शरीर की रक्षा की दृष्टि से काट डाली जाती है। [ इति वार्त्ता समुद्देशः ] ९. दण्डनीतिसमुद्देशः दण्ड की आवश्यकता— चिकित्सागम इव दोषविशुद्धिहेतुर्दण्डः ॥ १ ॥ शारीरिक वात-पित्त-कफ आदि के दोषों को दूर करने के लिये जिस प्रकार चिकित्सा शास्त्र है उसी प्रकार राष्ट्र के दोषों को दूर करने के लिये दण्डनीति है । दण्डनीति का स्वरूप— यथादोषं दण्डप्रणयनं दण्डनीतिः ॥ २० ॥ दोष की न्यूनाधिकता के अनुसार ही दण्डविधान करना दण्डनीति है । प्रजापालन दण्डविधान का उद्देश्य— प्रजापालनाय राज्ञा दण्डः प्रणीयते न धनार्थम् ॥ ३ ॥ प्रजापालन के लिये राजा दण्ड का विधान करता है अर्थसंग्रह के लिये नहीं । धनसंग्रहार्थं दण्ड-विधान की निन्दा— स किं राजा वैद्यो वा यः स्वजीवनाय प्रजासु दोषमन्वेषयति ॥ ४ ॥ अपने जीवन निर्वाह के लिये लोगों को झूठ-मूठ रोगो बताने वाला वैद्य जैसे बुरा है उसी प्रकार वह राजा भी कुत्सित राजा है जो अपने निमित्त धन संग्रह के लिये प्रजा में दोषों को निकाल कर अर्थदण्ड करता है । राजा द्वारा स्वयं अनुपभोग्य धन— दण्डद्युताहवमृतविस्मृतचौरपारदारिकप्रजाविप्लवजानि द्रव्याणि न राजा स्वयमुपयुञ्जीत ॥ ५ ॥ जुर्माना करने से प्राप्त धन, जुए से प्राप्त, संग्राम में किसी के मर जाने से प्राप्त, किसी का भूला हुआ धन, चोरों का धन परस्त्रीगमन आदि से संबंध रखने वाला धन, प्रजा में विप्लव हो जाने पर लूट-पाट से आया हुआ धन इतने प्रकार के धनों को राजा स्वयम् उपयोग में न लावे । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

४० नीतिवाक्यामृतम् अविवेकपूर्ण दण्डनीति से राज्य की क्षति— दुष्प्रणीतो हि दण्डः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वा सर्वविद्वेषं करोति ॥६॥ काम-क्रोध के वशीभूत होकर अथवा अज्ञानवश दिये गये दण्ड से राजा से समस्त प्रजा विद्वेष करने लगती है। अप्रणीतो हि दण्डो मात्स्यन्यायमुत्पादयति ॥ ७ ॥ यथा दोष दण्ड न देने से राज्य में 'मात्स्य-न्याय' की प्रवृत्ति होती है। मात्स्य न्याय क्या है— बलीयानबलं ग्रसति इति मात्स्यन्यायः ॥ ८ ॥ जिस प्रकार जल में बड़ी मछली छोटी मछलियों को खा जाती है उसी प्रकार दण्ड का डर न होने पर बलवान् निर्बल को सताते हैं। यही मात्स्य न्याय है। इति दण्डनीतिसमुद्देशः। १०. मन्त्रिसमुद्देशः अहार्यबुद्धि राजा का लक्षण— मन्त्रिपुरोहितसेनापतीनां यो युक्तमुक्तं करोति स अहार्यबुद्धिः ॥१॥ मन्त्री, पुरोहित और सेनापति इनकी युक्तियुक्त बात को जो राजा मानता है वह 'अहार्य बुद्धि होता है। अर्थात् शत्रुओं द्वारा वह बुद्धिबल में परास्त नहीं होता। सत्सङ्गति का माहात्म्य— असुगन्धमपि सूत्रं कुसुमसंयोगात् किन्नारोहति देवशिरसि ॥ २ ॥ डोरे में यद्यपि सुगन्ध नहीं होता तथापि क्या वह फूल के सम्पर्क से देव- ताओं के शिर पर नहीं चढ़ता। महद्भिः पुरुषैः प्रतिष्ठितोऽश्मापि भर्वात देवः कि पुनर्मनुष्यः ॥ ३ ॥ महान् पुरुषों से प्रतिष्ठित पाषाण भी देवत्व को प्राप्त होता है तो फिर मनुष्य का क्या कहना है। अर्थात् क्षुद्र मनुष्य भी महत् पुरुषों के संयोग से महत्त्व को प्राप्त होता है। तथा चानुभूयते विष्णुगुप्तानुग्रहादनधिकृतोपि किल चन्द्रगुप्तः साम्राज्यपदमवापेति ॥ ४ ॥ जैसा कि इतिहास बताता है कि चंद्रगुप्त राज्य पद के लिये अनधिकारी होते हुए भी विष्णुगुप्त की कृपा से साम्राज्य पद को प्राप्त कर सका। मन्त्रिपद के लिये अपेक्षित योग्यता— ब्राह्मणक्षत्रियविशामेकतमं स्वदेशजमाचाराभिजनविशुद्धमव्यसनिन-

मन्त्रिसमुद्देशः ४१ मव्यभिचारिणमधीताखिलव्यवहारतन्त्रमखङ्गमशेषोपधिविशुद्धं च मन्त्रिणं कुर्वीत ॥ ५ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से किसी एक को जो अपने देश का हो, आचार व्यवहार और वंश से विशुद्ध हो, व्यसनी न हो, व्यभिचारी न हो, समस्त व्यवहार शास्त्र अर्थात् नीति और धर्मशास्त्र को पढ़ा हुआ हो, अस्त्र-शस्त्र जानने वाला हो और समस्त छल-छद्म से रहित हो, ऐसे व्यक्ति को मन्त्री बनाना चाहिये । स्वदेश प्रेम का गौरव — समस्तपक्षपातेषु स्वदेशपक्षपातो महान् ॥ ६ ॥ समस्त पक्षपातों में अपने देशका पक्षपात् महान् है। अर्थात् मन्त्री अपने देश का हो इसका सर्वप्रथम ध्यान रखना चाहिये । दुराचार निन्दा— विषनिषेक इव दुराचारः सर्वान् गुणान् दूषयति ॥ ७ ॥ विष सिञ्चन की भांति दुराचार सब गुणों को दूषित कर देता है। अकुलीन मन्त्री का दोष — दुष्परिजनो मोहेन कुतोऽप्यपकृत्य न जुगुप्सते ॥ ८ ॥ अकुलीन मन्त्री राजा का घृणित अपराध करके मूर्खता वश लज्जा का अनुभव नहीं करता, (परिजन का अर्थ यहां नौकर चाकर न करके प्रसङ्ग वश कुल किया गया है) । व्यसनी मन्त्री से राजा की क्षति— सव्यसनसचिवो राजा आरूढव्यालगज इव नासुलभोऽपायः ॥ ६ ॥ व्यसन शील मन्त्री वाले राजा का नाश दुष्ट हाथी पर चढ़ने वाले की तरह दुर्लभ नहीं होता अर्थात् शीघ्र ही संभव होता है । किं तेन केनापि यो विपदि नोपतिष्ठते ॥ १० ॥ जो विपत्ति में सहायक नहीं होता उससे क्या लाभ । भोज्येऽसम्मतोऽपि हि सुलभो लोकः ॥ ११ ॥ भोजन के लिये तो अनिमन्त्रित लोग भी सुलभ हो जाते हैं। अर्थात् सुख के साथी बिना ढूंढ़े भी मिल जाते हैं, पर दुःख के साथी नहीं होते। किं तस्य भक्त्या यो न वेत्ति स्वामिनो हितोपायमहितप्रती- कारं वा ॥ १२ ॥ जो मन्त्री राजा की भलाई का और बुराई को दूर करने का उपाय न जानता हो उसकी भक्ति से क्या लाभ ।

४२ नीतिवाक्यामृतम् असमर्थ अस्त्रवेत्ता की अनुपयोगिता— किं तेन सहायेनास्त्रज्ञेन मन्त्रिणा यस्यात्मरक्षणेऽप्यङ्गं न प्रभ- वति ॥ १३ ॥ उस अस्त्र वेत्ता सहायक मन्त्री से क्या लाभ जिसका अङ्ग आत्मरक्षा में भी समर्थ न हो । उपधा का लक्षण— धर्मार्थकामभयेषु व्याजेन परचित्तपरीक्षणमुपधा ॥ १४ ॥ धर्म, अर्थ, काम और भय के विषय में गुप्तचर के द्वारा किसी व्याज से शत्रु राजा के चित्त की परीक्षा 'उपधा' है ( 'उपधा' राजा के मन्त्री के लिये गुण है ) । सोदाहरण अकुलीन मन्त्री के दोष— अकुलीनेषु नास्त्यपवादाद् भयम् ॥ १५ ॥ जो मन्त्री कुलीन नहीं है उसे लोक निन्दा का भय नहीं होता अतः वह राजा का कोई भी अहित कर सकता है । अलर्कविषवत् कालं प्राप्य विकुर्वते विजातयः ॥ १६ ॥ पागल कुत्ते के विष के समान विजातीय मन्त्री समय पाकर विरोध करते हैं । विशेषार्थ—जिस प्रकार पागल कुत्ते का विष कुछ समय बाद वर्षाकाल में अपना विकृत रूप प्रदर्शित करता है उसी प्रकार दूसरी जाति का मन्त्री कुछ समय तक राजा के अनुकूल चलकर बाद में प्रतिकूल हो सकता है । कुलीनता का गुण— तदमृतस्य विषत्वं यः कुलीनेषु दोषसंभवः ॥ १७ ॥ कुलीन पुरुष अथवा मन्त्री में विश्वासघात आदि दोषों का होना अमृत के विष हो जाने के समान है । अर्थात् असंभव है । ज्ञानी होने पर भी मन्त्री के ज्ञान की व्यर्थता— घटप्रदीपवत्तज्ज्ञानं मन्त्रिणो यत्र न परप्रतिबोधः ॥ १८ ॥ जिस प्रकार घड़े के भीतर जलाया गया दीपक बाहर अपना प्रकाश नहीं प्रसारित कर सकता, अतः व्यर्थ होता है उसी प्रकार मन्त्री अथवा किसी विद्वान् का वह ज्ञान व्यर्थ है जो राजा अथवा अन्य व्यक्ति का प्रतिबोध न कर सके अर्थात् अपनी बात दूसरों को समझा सकने की कला यदि मनुष्य में नहीं है तो उसका ज्ञानी होना व्यर्थ है । सभीत मन्त्री की व्यर्थता— तेषां शस्त्रमिव शास्त्रमपि निष्फलं येषां प्रतिपक्षदर्शनाद् भयमन्व- यन्ति चेतांसि ॥ १६ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ४३ शस्त्र की तरह उन लोगों का वह शास्त्र ज्ञान भी व्यर्थ है जिन लोगों का चित्त प्रतिपक्षी अथवा प्रतिद्वन्द्वी को देखने से भयाकुल हो जाता है । तच्छस्त्रं शास्त्रं वात्मपरिभवाय यन्न हन्ति परेषां प्रसरम् ॥ २० ॥ जो शस्त्र अथवा शास्त्र दूसरे के आक्रमण को न रोक सके वह अपने ही अनादर का कारण होता है । नहि गली बलीवर्दो भारकर्मणि केनापि युज्यते ॥ २१ ॥ बोझा ढोने के लिये सुस्त बैल को कोई नहीं उपयोग में लाता । विशेषार्थ—प्रसंगानुकूल यहां यह अर्थ है कि स्वस्थ सबल तथा अन्य बातों से युक्त मन्त्री यदि उत्साह सम्पन्न और स्फूर्ति से युक्त नहीं है, कार्यों में विलम्ब करता है तो राजा को उसे नहीं रखना चाहिए । राजा के लिये मन्त्रणा की आवश्यकता— मन्त्रपूर्वः सर्वोऽप्यारम्भः क्षितिपतीनाम् ॥ २२ ॥ राजाओं को अपना समस्त कार्य मन्त्रियों से परामर्श पूर्वक ही प्रारम्भ करना चाहिए । मन्त्र-बल की उपयोगिता— अनुपलब्धस्य ज्ञानम् , उपलब्धस्य निश्चयः, निश्चितस्य बलाधानम् , अर्थस्य द्वैधस्य संशयच्छेदनम् , एकदेशलब्धस्याशेषोपलब्धिरिति मन्त्र- साध्यमेतत् ॥ २३ ॥ अप्राप्त वस्तु, भूमि, देश कोष आदि का अनुसन्धान, उपलब्ध के विषय में पूर्ण निश्चयात्मक ज्ञान, निश्चित के विषय में भी प्रमाणान्तरों से पुष्टि करना, संशयात्मक विषय में संशय दूर करना; किसी वस्तु, भूमि, देश आदि का एक भाग प्राप्त हो जाने पर पूर्ण की प्राप्ति करना यह सब काम मन्त्रणा से सिद्ध होते हैं । योग्य मन्त्री का लक्षण— अकृतारम्भस्यारम्भमारब्धस्याप्यनुष्ठानमनुष्ठितस्य विशेषविनियोग- सम्पदं च ये कुर्युस्ते मन्त्रिणः ॥ २४ ॥ बिना किये हुए अर्थात् नये-नये कार्यों का प्रारम्भ करना, प्रारम्भ किये गये कार्यों का चालू रखना, और किये हुए अर्थात् पूर्ण कार्यों में उस के उपयोग की और व्यवहार की विशेषता बतलाना-इतना जो कर सकें वे मन्त्री होने योग्य हैं । मन्त्रणा के अङ्ग— कर्मणामारम्भोपायः, पुरुषद्रव्यसम्पद्, देशकालविभागोविनिपात- प्रतीकारः कार्यसिद्धिश्चेति पञ्चाङ्गो मन्त्रः २५ ॥

४४ नीतिवाक्यामृतम् विविध कार्यों को प्रारम्भ करने के साधन और युक्तियों को जानना, पुरुष अर्थात् सैन्यबल और द्रव्य अर्थात् कोष बल को रखना, देश और काल विभाग अर्थात् अनुकूल और प्रतिकूल समय तथा स्थान का ध्यान रखना, आनेवाली आपत्ति को दूर करने के उपाय कर लेना और कार्य सिद्धि को परमलक्ष्य बनाना यह पांच मन्त्रणा के अङ्ग हैं । मन्त्रणा के योग्य स्थान— आकाशप्रतिशब्दवति चाश्रये मन्त्रं न कुर्यात् ॥ २६ ॥ चारों ओर से खुले हुये स्थान में तथा जहां प्रतिध्वनि होती हो ऐसे स्थानों पर मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए । मुखविकारकराभिनयाभ्यां प्रतिध्वानेन वा मनःस्थमप्यर्थमभ्यूहन्ति विचक्षणाः ॥ २७ ॥ मुख की चेष्टाओं और हाथ के अभिनयअर्थात् घुमाने फिराने से तथा प्रतिध्वनि अर्थात् शब्दों की गूंज से भी चतुर पुरुष मन की बात जान लिया करते हैं । मन्त्रणा को गुप्त रखने की अवधि— आकार्यसिद्धेरक्षितव्यो मन्त्रः ॥ २८ ॥ जब तक कार्य सिद्ध न हो जाय तब तक अपनी मन्त्रणा (सलाह- मशविरा ) को गुप्त रखना चाहिए । मन्त्रणा के लिये आवश्यक विचार— दिवानक्तं चाऽपरीक्ष्य मन्त्रयमाणस्याभिमतः प्रच्छन्नोवा भिनत्ति मन्त्रम् ॥ २९ ॥ रात और दिन का विचार न करके मन्त्रणा करने वाले की गुप्त मन्त्रणा का रहस्य अपने अनुकूल व्यक्ति अथवा इधर उधर छिपे हुए व्यक्ति प्रकट कर देते हैं । श्रूयते किल रजन्यां वटवृक्षे प्रच्छन्नो वररुचिः—अ-प्र-शि-ख-इति पिशाचेभ्यो वृत्तान्तमुपश्रुत्य चतुरक्षराद्यैः पादैः श्लोकमेकं चकारेति ॥३०॥ ऐसा सुना जाता है कि रात्रि के समय वट-वृक्ष के ऊपर छिपकर बैठे हुए वररुचि ने पिशाचों के द्वारा "अ-प्र-शि-ख" इन चार अक्षरों से सम्बन्धित वृत्तान्त सुनकर इन चार अक्षरों से प्रारम्भ होने वाले चार पादों के एक श्लोक की रचना की, अनेन तव पुत्रेण प्रसुप्तस्य वनान्तरे । शिखामाक्रम्य पादेन, खड्गेनोपहृतं शिरः ॥ अन्तर्गत कथा :

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri मन्त्रिसमुद्देशः ४५ नन्द राजा का पुत्र हिरण्यगुप्त शिकार खेलते खेलते वनमें दूर निकल गया और रात को घर न लौट सका। उसने वहां सोते हुए अपने एक मित्र को खड्ग से मार डाला। मरते समय उस मित्रने 'अप्रशिख' इन चार अक्षरों का उच्चारण किया और उसकी मृत्यु हो जाने पर राजकुमार को पश्चात्ताप हुआ और वह पागल हो गया। राजदूत जब उसे महल में लाये तो उसका पिता नन्द उसकी विक्षिप्तावस्था देखकर बड़ा दुःखी हुआ। उसके द्वारा प्रतिक्षण उच्चारित अ-प्र-शि-ख इन चार अक्षरों को सुनकर उसका अर्थ जानने के लिये वह चिन्तित रहने लगा। अनन्तर उसके मन्त्री वररुचि ने वन में जाकर प्रच्छन्न रूप से बरगद के वृक्ष पर बैठकर पिशाचों द्वारा आपस की वार्ता में इस प्रसङ्ग को पूर्ण रूपसे जान लिया और उपर्युक्त श्लोक बनाकर राजा को सुनाया और अर्थ समझाया कि तुम्हारे इस पुत्र ने वन में सोए हुए मित्र की शिखा पैर से दबाकर तलवार से उसका सिर काट डाला। मन्त्रणा के अयोग्य व्यक्ति— न तैः सह मन्त्रं कुर्यात् येषां पक्षीयेष्वपकुर्यात् ॥ ३१ ॥ जिनके पक्ष के लोगों के साथ कोई अहित कार्य किया हो उनके साथ परामर्श न करे। अनायुक्तो मन्त्रकाले न तिष्ठेत् ॥ ३२ ॥ मन्त्रणा के समय ऐसा कोई भी व्यक्ति वहां न रहे जिसको बुलाया न गया हो। तथा च श्रूयते शुक·सारिकाभ्यामन्यैश्च तिर्यग्भिर्मन्त्रभेदः कृतः ॥ ३३ ॥ सुना जाता है कि तोता, मैना तथा अन्य पशु-पक्षियों ने भी मन्त्रणा का रहस्य प्रकट कर दिया। मन्त्र-भेद से उत्पन्न दोष की कठिनाई— मन्त्रभेदादुत्पन्नं व्यसनं दुष्प्रतिविधेयं स्यात् ॥ ३४ ॥ मन्त्रणा का रहस्य प्रकट हो जाने से उत्पन्न संकट बहुत कठिनाई से दूर होता है। मन्त्र-भेद के कारण— इङ्गितमाकारो मदः प्रमादो निद्रा च मन्त्रभेदकारणानि ॥ ३५ ॥ इङ्गित (हाथ, आँख आदि का इशारा) मुख और शरीर की आकृति, मदपान, असावधानी और निद्रा ये पाँच मन्त्रभेद के मुख्य कारण हैं। मन्त्रभेद के कारणों के लक्षण— इङ्गितमन्यथावृत्तिः ॥ ३६ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

४६ नीतिवाक्यामृतम् हृदय के आशय को प्रकट करनेवाली चेष्टा इङ्गित है । कोपप्रसादजनिता शारीरी विकृतिराकारः ॥ ३७ ॥ क्रोध अथवा हर्ष के कारण उत्पन्न शारीरिक विकार का नाम आकार है। पानस्त्रीसंगादिजनितो हर्षो मदः ॥ ३८ ॥ मदपान और स्त्रीसंभोग आदि से उत्पन्न हर्ष मद है। प्रमादो गोत्रस्खलनादिहेतुः ॥ ३९ ॥ नाम आदि के कहने में अक्षरों का उल्टा सीधा हो जाना प्रमाद है। अन्यथा चिकीर्षतोऽन्यथावृत्तिर्वा प्रमादः ॥ ४० ॥ अथवा कुछ करना चाहते हुए कुछ दूसरा करना प्रमाद है। निद्रान्तरितो निद्रितः ॥ ४१ ॥ निद्रा के अधीन हो जाना निद्रितावस्था है। मन्त्रणा के पश्चात् अविलम्ब कार्य की आवश्यकता— उद्धृतमन्त्रो न दीर्घसूत्रः स्यात् ॥ ४२ ॥ मन्त्रणा कर लेने के अनन्तर उसके आचरण में विलम्ब न करे । प्रयोग के बिना मन्त्र व्यर्थ है— अनुष्ठानेच्छां विना केवलेन किं मन्त्रेण ॥ ४३ ॥ प्रयोग में लाने की इच्छा के बिना केवल मन्त्रणा से कोई लाभ नहीं होता । न ह्यौषधपरिज्ञानादेव व्याधिप्रशमः ॥ ४४ ॥ केवल औषध जान लेने मात्र से व्याधि की शान्ति नहीं हो जाती । अविवेक की निन्दा— नास्त्यविवेकात् परः प्राणिनां शत्रुः ॥ ४५ ॥ अविवेक से बढ़कर प्राणियों का शत्रु दूसरा नहीं है। स्वयं कार्य करने की आवश्यकता— आत्मसाध्यमन्येन कारयन्नौषधमूल्यांदेव व्याधिं चिकित्सति ॥४६॥ अपने से किया जा सकने योग्य कार्य दूसरों से कराना औषध के मूल्य मात्र के द्वारा रोग को दूर करने की इच्छा के समान व्यर्थ है। सहयोगी के हानिलाभ का अपने ऊपर प्रभाव— यो यत्प्रतिबद्धः स तेन सहोदयव्ययी ॥ ४७ ॥ जो जिससे सम्बद्ध है, उसका उसीके साथ वृद्धि और ह्रास होता है। स्वामी की शक्ति ही सेवक को सबल निर्बल बनाती है— स्वामिनाधिष्ठितो मेषोऽपि सिंहायते ॥ ४८ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ४७ स्वामी के द्वारा सुप्रतिष्ठित भेड़ा भी सिंह के समान बली हो जाता है । मन्त्रणा के समय ध्यान देने योग्य बातें— मन्त्रकाले विगृह्य विवादः स्वैरालापश्च न कर्त्तव्यः ॥ ४९ ॥ मन्त्रणा के समय मन्त्रियों को परस्पर झगड़कर विवाद और मनमानी बातचीत न करनी चाहिए । मन्त्रणा के योग्य व्यक्ति— अविरुद्धैरस्वैरैर्विहितो मन्त्रो, लघुनोपायेन महतः कार्यस्य सिद्धि- र्मन्त्रफलम् ॥ ५० ॥ जो परस्पर विरोधी और ईर्ष्या-द्वेष वाले न हों तथा बहुत स्वच्छन्द आचरणवाले न हों उनके साथ परामर्श मन्त्रणा है और लघु साधनों से भी महान् कार्य सिद्धि मन्त्रणा का फल है । न खलु तथा हस्तेनोत्थाप्यते ग्रावा यथा दारुणा ॥ ५१ ॥ पत्थर हाथ से उस प्रकार नहीं उठाया जा सकता जैसा कि लकड़ी के सहारे से । राजा की इच्छा मात्र का अनुसरण करना मन्त्री का दोष है— स मन्त्री शत्रुर्यो नृपेच्छयाऽकार्यमपि कार्यरूपतयाऽनुशास्ति ॥५२॥ वह मन्त्री नहीं शत्रु है जो राजा की इच्छा देखकर अकार्य को भी कार्य बतलाता है । वरं स्वामिनो दुःखं न पुनरकार्योपदेशेन तद्विनाशः ॥ ५३ ॥ इच्छा के विघात से स्वामी को दुःख होना अच्छा है, किन्तु न करने योग्य काम का उपदेश देकर उसका विनाश करना उचित नहीं है । पीयूषमपिबतो बालस्य किं न क्रियते कपोलहननम् ॥ ५४ ॥ अमृत अथवा अमृत के समान हितकारी औषध आदि को पीना न चाहने वाले बच्चे को क्या माता गाल में थप्पड़ लगाकर नहीं पिलाती । मन्त्री की किसी से घनिष्ठता अनुचित है— मन्त्रिणो राजद्वितीयहृदयत्वान्न केनचित् सह संसर्गं कुर्युः ॥ ५५ ॥ मन्त्रिगण राजा के दूसरे हृदय-रूप होते हैं अतः उनको किसी के साथ घनिष्ठ स्नेह आदि नहीं रखना चाहिए । राजा और मन्त्री का एकचित्त होना— राज्ञोऽनुग्रहविग्रहावेव मन्त्रिणामनुग्रहविग्रहौ ॥ ५६ ॥ राजा की ही अनुकूलता और प्रतिकूलता मन्त्रियों की अनुकूलता प्रतिकू- लता है अर्थात् राजा जिस पर कृपा करे अथवा जिससे द्वेष करे मन्त्रियों के लिये भी वे ही ग्राह्य और अग्राह्य होने चाहिएं ।