एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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हम चाहे जितनी भी प्रार्थना करें या तपस्या करें पर इसका फलित होना या अथवा मिलना तभी संभव होता है, जब प्रार्थना हृदय की गहराइयों तक या तपस्या निष्काम भाव से की जाए। जब हम समर्पित भाव अपनाते हैं तब हमारी हर बात ईश्वर तक पहुंचती है। प्रभु, यह तो समर्पण देखना चाहते हैं। इस बात को एक दृष्टांत से इस प्रकार समझें। एक नगर का यह नियम बना हुआ था कि वहां का राजा केवल पांच वर्ष के लिए बनाया जाता था। पांच वर्ष राजा रहकर राज्य के सारे ऐश्वर्य भोगने के बाद उस राजा को उस राज्य की सीमा के उस पार एक बहुत बड़े बीहड़ जंगल में छोड़ दिया जाता था। जहां घूमते हुए वह राजा अपने अंतिम संस्कार पश्चात अपना जीवन समाप्त करता। इस प्रकार उस देश में अनेक राजा आए, उन्होंने राज किया, सुख भोगे, पर अंत में सब वहीं पर छोड़ गए। यह सोचकर कोई भी व्यक्ति उस नगर का राजा नहीं बनना चाहता था। क्योंकि अंततः मृत्यु-लोक जाने पर अपना सर्वस्व-वैभव सब बिखर जाएगा। "क्योंकि इस संसार रूपी जंगल में तो अपना कोई भी नहीं होता। जो केवल सद्कर्मों द्वारा इस संसार में कर्म करता हुआ प्रभु भक्ति करता है वही इस भवसागर से पार उतरता है, तथा इस पार संसार का सुख-चैन तो विनाशीय पदार्थ मात्र है।" अंततः एक, दो व्यक्तियों द्वारा आग्रह करने पर एक व्यक्ति ने उस राज्य का राजत्व स्वीकार कर लिया। नियमानुसार वह सिंहासन पर बैठ गया। उसने उन पांच वर्षों में राज्य का सारा वैभव भोगा तथा अपने राज्य को विकसित करते हुए एक अत्यंत सुंदर नगर की रचना की, उस जंगल में जो उस नगर के पार था। उसने वहां पर सुंदर-सुंदर महल, बाग-बगीचे बनवाए। चारदीवारी का निर्माण करवाया, उस बीहड़ को एक अत्यंत सुंदर और हरा-भरा व सुरक्षित स्थान बना दिया। पांच वर्ष पूरे हो जाने पर, नए राजा द्वारा विदाईस्वरूप दी गई विशाल नौका में बैठकर वह उस पार पहुंच गया और अपने बसाए उस नए सुंदर राज्य में सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। क्या ऐसा कोई व्यक्ति था वह? नहीं! कोई भी नहीं। केवल कथा रूपी इस संसार में ही सत्य को जान सका! पर सत्य है कि हम सब भी इस संसार में पांच वर्ष के लिए आए हैं। हम सब कुछ जानते हुए भी इस बीहड़ जंगल रूपी जीवन को नष्ट कर रहे हैं। ईश्वर द्वारा दिए गए इस शरीर को जो एक नश्वर वस्त्र की तरह है जिसे एक दिन छोड़ना ही पड़ेगा। इसके पश्चात हम सब भी उस पार के उस भव-सागर में उतर कर उस बीहड़ जंगल में चले जाएंगे! सत्य यही रहेगा! उस बीहड़ जंगल में अपना कोई भी नहीं है। वहां केवल प्रभु की भक्ति रूपी, सत्य निष्ठा रूपी नौका ही इस भवसागर को पार कराने में सहायक बनेगी। यह संसार तो सराय रूपी है। हम सब यात्री इस सराय में थोड़े दिन रुकेंगे और फिर चल देंगे, इसलिए जिस प्रकार उस राजा ने अपनी समझ से उस पार की चिंता की, वैसे ही हमें भी उस बीहड़ संसार की चिंता करनी चाहिए जहां सब कुछ छोड़ कर जाना ही है, जिसे पारलौकिक सुख कहते हैं? इसलिए हे मानव! प्रभु के आगे अपनी प्रार्थना समर्पित करके देख, जो कुछ भी तूने कमाया है उसे प्रभु को सौंप दे, यह समझ कर कि सब कुछ प्रभु का ही है। इस समर्पण भाव से तू इस संसार से पार उतर जाएगा। जो प्रभु का होकर रहेगा, पारलौकिक सुख को पाकर ईश्वर भक्ति रूपी सुख में मगन होकर, प्रभु के धाम में स्थान पाएगा। जो समर्पित भाव से कर्म करेगा उसे इस जन्म में शांति, और मृत्यु के उपरांत प्रभु का सामीप्य अवश्य प्राप्त होगा, बस! तू निर्मल मन से कह, हे प्रभु! मैं तेरा और तू मेरा? तू ही मेरा पालनहार है? यह प्रार्थना भाव मन में धारण करके जब तू अपनी निष्काम भक्ति रूपी साधना करेगा, तो ईश्वर की कृपा क्यों नहीं बरसेगी? ईश्वर को जानने की नहीं, भाव से मानने की वस्तु है। यह संसार भले ही कितना भी विशाल हो परंतु जब हम मन को एकाग्र करके, इस परम तत्व को जानने बैठेंगे? तब हमें ज्ञात होगा कि संसार में ज्ञान, विज्ञान और बुद्धि का बहुत बड़ा क्षेत्र है। यह सब कुछ जान लेने पर भी जब हम शांति को खोजेंगे, तब- तब हमारे मन में ईश्वर के प्रति एक तीव्र प्यास जगेगी, व यही प्यास संसार के सब सुख-साधनों से परे होकर हमें, उस परम चेतना की ओर ले जाएगी। सांसारिक सुख-भोगों का अंततः नाश होगा, पर ईश्वर शाश्वत है, यह बात समझ कर, हम ईश्वर शरणागत हो जाएंगे। उठो! जागो, जाग्रत बनो, इस मन, बुद्धि, इंद्रियों को, अहंकार को, काम को, क्रोध को प्रभु के चरणों में समर्पित कर ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाओ। आओ, सब मिलकर, एक होकर, निष्काम भाव से ईश्वर के चरणों में वंदन करते हुए, उनकी स्तुति गाएं। 24
"पत्रिका का नया अंक छप गया, ग्राहक को तीन-चार रु० भिजवाइये, आपके घर
पत्र लिखने पर चार मास बाद उत्तर प्राप्त हो रहा था, सो भी सब प्रकार संशय उत्पन्न करने का कारण था। "पत्रिका का नया अंक छप गया, ग्राहक को तीन-चार रु० भिजवाइये, आपके घर पर सब कुशल है। ससुराल वाले चार सौ रु० और मांगते हैं। आपका बड़ा लड़का दस बार बीमार हो चुका अबकि बार बच गया तो बच गया वर्ना गया समझो, घर पर किसी से बन नहीं रही सो मैं अमुक के पास जा रहा हूँ।" ऐसा समय न आये तो क्या सब कुछ न आये। इस प्रकार का पत्र जब घर पर आ रहा हो तो, वह मन स्थिर या शान्त रह सके गा? जब कोई व्यक्ति घर परिवार से दूर काम पर जाता हो अथवा, रोजगार करने जाता अथवा घर बैठ कर ही सब काम काज करता हुआ काम चलाये? रोजगार करने में कठिनाई आये तो समझ लें, आपके घर का आधार ही समाप्त हो रहा अथवा, यह विचार कर चिन्ताग्रस्त हो कर बैठ गया हो, काम करने में भी रुचि समाप्त हो जाये तब उस व्यक्ति से आशा क्या होगी? रुपये पैसे का कष्ट, संकट घर पर घर के काम में आयेगा? या तो घर बन्द कर के बैठ गये हों, रोजगार में कोई नया काम सोचा? सब काम बन्द हो, बच्चे के लिये या अपने सिर पर सिर छुपाने के लिये अपने सिर पर मकान बना हो, या फिर उस से कर्जा वापस मांगा गया हो? मनुष्य यह सब सोच कर ऐसा काम करता है, रोजगार में लग जाता है, सब चिन्ता छोड़ कर अपने काम पर निरन्तर अग्रसर हो या परिवार में सिर छिपाने का साधन खोज निकाले अथवा यह, मन को समझा लेवे कि जब तक मेरे बच्चे जीवित हैं, अपने ही रोजगार द्वारा सब कुछ कर लूंगा तो वह सब कुछ बना ले, सब घर को ठीक कर ले जब तक स्वयं अपने हाथ पैर से काम करे, हिम्मत करके उठे, संकटों को सब प्रकार दूर करे, समझ बूझ कर, बुद्धि लगा कर, रोजगार बढ़ा कर, सब कुछ ठीक कर सकता है लेकिन आलसी हो कर बैठ जाय या समस्याओं अथवा घर के सब रूप रंग देखकर घबरा कर बैठ जाय तो, कभी भी सब प्रकार के सुख प्राप्त नहीं कर सकता है, जब तक मनुष्य संकटों का डट कर सामना करे, सब कुछ स्वयं करने की हिम्मत करे तो सफलता उस के चरण चूमेगी! घबराने से, सब कुछ हाथ से जाता रहता है। सब को छोड़ कर सिर पर हाथ रख कर, बैठकर रोने लगे अथवा रो कर बैठ जाय तो इस का कोई हल निकलने की आशा नहीं हो सकती है, जब भी सब कुछ हाथ से गिर गया अथवा व्यापार में सब दो--चार सौ का नुकसान दिखाई दे रहा हो--तो यह तो नहीं हो गया, कि व्यापार बन्द ही करना या सिर पकड़ कर बैठना? फिर काम किसने पूरा किया? जब व्यापार को नया रूप देकर दो-दो काम हो, कार्य विशाल रूप बना कर सब प्रकार साधन जुटाकर दिन-रात परिश्रम से काम कर लाभ प्राप्त कर सकता, चिन्ता दो-दो काम की, कार्य सब प्रकार रूप रंग बदल सकता सब कुछ है, तो सिर पर हाथ, रख कर दो--चार चिन्ता करके बैठ जाने से क्या लाभ पहुंचेगा? यह सब कुछ तो मनुष्य करता ही रहता सब प्रकार के लाभ स्वयं प्राप्त करके सफल हो सकता। जब देखा गया, व्यापार बन्द कर दिया गया तो सब काम ही बंद हो गया, ग्राहक भी घर बैठा रह कर इन्तजार करता है, ग्राहक मन ही मन में यह सोचता रहा उसने माल बाहर से ला कर देना था सो नहीं दिया है, सो तो जो काम का चक्र चलना था रुकावट उसने स्वयं उत्पन्न की जिससे वह माल मंगवाता रहा होगा, अब वह माल अपने पास ही रख कर पछतायेगा, सोच विचार करके जब तक माल घर पर पड़ा रहेगा तब तक पैसा फंसा रहेगा, काम सब ही बंद रहेगा सो तो माल बाहर का भी रुक गया उसने व्यापार ही बंद कर दिया, सब ही नुकसान सब तरह का उठाता रहा जब तक वह यह सब सोचता तब तक और दिन बीत गये सो दिन का चक्र तो दिन के समय ही चलना है रात को समय पूरा हो जाना सो यह तो २४-घंटे रोज, कम होते जा रहे हैं और सब प्रकार के नुकसान को नुकसान ही बढ़ रहा सो सब प्रकार की सब ओर चिन्ता बढ़ती जाती रही। 25
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क्या यह संभव अथवा उचित समझा जाय कि मनुष्य जिस कामके करनेकी चेष्टा करे, केवल उसीका फल विचारशील बनकर भोगे अथवा अपने किये हुए उस काम विषयक अपने विचारके अनुकूल ही फल भोगे? प्रत्येक काम हमारी कार्यप्रणालीके अनुकूल ही समाप्त हो जायगा यह कभी संभव नहीं होता। हम जो कर्म करते हैं वह सब एक ही निश्चित परिणतिके अनुकूल नहीं होता, वरन् बहुधा ऐसा होता है कि हम जो काम जिस रूपमें करना चाहते हैं वह किसी न किसी रूपमें सर्वथा विपरीत ही हो जाता और न तो विचार, न इच्छा और न उद्योगकी क्रिया ही उस कामके परिणामको रोक सकती। तब क्या यह उचित समझा जाय कि केवल विचारके ही अनुसार फल दिया जाय? नहीं। जब मनुष्यका उद्योग सर्वथा अपनी कार्यप्रणालीके अनुकूल ही फल न ला सका तब विचारके अनुकूल फलकी आशा करना सर्वथा पागलपनके सिवाय और क्या कहा जा सकता है? कदाचित् यह कहा जाय कि यदि फलकी कार्यप्रणालीसे विचारकी प्रणालीको सर्वथा पृथक् कर दिया जाय तब तो इस विचारको निरर्थक और मनुष्यके ऊपर न केवल एक अत्याचार बल्कि अपने किये हुए कर्मके फल भोगनेमें भी सर्वथा अन्याय ही माना जायगा। तब इसका समाधान यह हो सकता है कि मनुष्यके विचारको हम सर्वथा व्यर्थ नहीं समझते, वरन् इतना अवश्य कह सकते हैं, कि उस फलका उद्योगके साथ कुछ तो संबंध अवश्य होना चाहिये। मनुष्यका विचार चाहे जो कुछ भी अपने उद्योगके संबंधमें रहा हो, यदि उस उद्योगके फलके रूपमें कोई परिवर्तन न हो तो विचारकी सत्ता सर्वथा व्यर्थ है, इसमें संदेह नहीं। प्रत्येक उद्योगके साथ जो जो विचार लगा हुआ रहता है उसके संबंधमें यदि यह देखा जाय कि विचार, उद्योगके साथ सर्वथा पृथक् अथवा संबंधित रहता है तब इसका निर्णय केवल यह होगा, कि प्रत्येक उद्योगके साथ विचारका संबंध अवश्य रहता है और उद्योग केवल मनुष्यके विचारका कार्य ही नहीं है, बल्कि उद्योगका एक रूप भी है। इस विचारका जो फल उद्योगके साथ संबंधित देखा जाता है वह फल तो कर्मके साथ उद्योगके परिणाममें आ ही नहीं सकता। उद्योगके फलसे पृथक् यह विचारका फल कर्मके साथ सर्वथा संबंध न रखनेपर भी उद्योगके साथ संबंध रखता ही है, और विचारका फल सर्वदा कर्मके फलसे पृथक् ही हुआ करता है, उद्योगके साथ विचारके संबंधका जो फल होता है उसका संबंध केवल विचारके ही साथ होता है, उद्योगके कर्मके साथ उसका कोई भी संबंध नहीं हुआ करता। अतएव यह मानना ही पडेगा कि फल उद्योगका सर्वथा पृथक् है और विचारका पृथक्। उद्योगका फल केवल कर्मके साथ उद्योगके संबंधका फल है--जो कर्मके फलके अतिरिक्त दूसरा और कुछ नहीं हो सकता, और विचारके फलके साथ कर्मके संबंधका जो फल होता उसका संबंध सर्वथा विचारके साथ ही रहता है। अतएव इस विचारके फलका कर्मके साथ कोई प्रत्यक्ष संबंध न होनेपर भी यदि यह मान लिया जाय कि विचारका फल और कुछ नहीं, केवल उद्योगका फल है तब समझना चाहिये कि हम फल उद्योगका नहीं वरन् विचारका ही फल पाते हैं और उद्योगका फल तो केवल प्रत्यक्ष रूपसे दिखाई देनेके सिवाय और कुछ नहीं-- विचारका फल केवल विचार, उद्योगका फल केवल उद्योग ही नहीं। इस विचारके फलको हम एक दृष्टांत द्वारा--अदालतके एक मुकद्दमेके संबंधमें, एक वकीलके उद्योगके दृष्टांत द्वारा समझ सकते हैं, कि वकीलका जो काम है वह कर्म है और उसका जो उद्योग है वह उसका फल उद्योगका फल होगा? अथवा उसके अपने विचारका फल होगा? अथवा दोनोंका? एक वकील अदालतमें इस विचारसे जाता है, कि वह अपने मुवक्किलको जिता देगा, और इस विचारके अनुसार वह उद्योग भी करता है पर उसका मुवक्किल... अवश्य हारता है तब वकालत का, जो केवल कर्म उद्योगका फल है वह विचारके सर्वथा विरुद्ध कर्मके रूपमें प्रत्यक्ष हुआ। यदि यह कहा जाय, कि वकीलका जो विचार था उसका फल वकीलको मिला और वकालतके उस वाद-प्रतिवादका उद्योग केवल फलके रूपमें था तब तो इस वाद-प्रतिवादका फल वकीलको हारनेपर भी प्राप्त हुआ और यह उद्योग सफल हुआ, यदि ऐसा मान लिया जाय तब वकीलके इस फल विचारका रूप भी उस विचारके प्रतिकूल ही समझना पडेगा और कर्मके विरुद्ध फलका होना मानना पडेगा। अतएव इस दृष्टांतसे यह सर्वथा स्पष्ट सिद्ध होता है कि उद्योगके साथ जो विचारका, उद्योग और फलके साथ संबंध होता है वह सर्वथा पृथक् है। वकीलके मुवक्किलकी हार कर्मके साथ उद्योगके फलका संबंध है और उस संबंधका फल विचारसे सर्वथा पृथक् हुआ है! यद्यपि वकील यह, कि उसका मुवक्किल निर्दोष है और वह निर्दोष होकर छूट जायगा और वकील उसको निर्दोष प्रमाणित करनेके लिये वकालत करता है, यद्यपि वह जानता है कि उसका मुवक्किल चोर है, तथापि वकालत करता है, यद्यपि वकील इस विचारके अनुसार उद्योग करता है और उस उद्योग-संबंधी विचारका फल अपने उद्योगके फलके साथ प्रत्यक्ष देखता भी है तब भी वह कर्मके फलके साथ विचारके फलका कोई संबंध नहीं देखता?
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विचार तो स्वावलम्बन का सर्वोत्तम या श्रेष्ठ उपाय तो यही होना ही चाहिये कि जिससे सब स्वावलम्बी बनें? अब यह तो न महाराज का स्वावलम्बन हुआ तथा नहिं अन्य का स्वावलम्बन हुआ। प्रत्येक व्यक्ति को ही स्वावलम्बी बनना योग्य ही है पर सब को तो एक बार सब ही सब कुछ बना नहीं सकते तथा न ही सब अपनी बनाई ही वस्तु सब काम में लावे इसी लिये तो सब व्यवहारों का जन्म हुआ। स्वावलम्बी तो वही है, जिसने अपनी वस्तुएं बनाकर या मोल लेकर भी स्वयं ही अपने उपयोग में ली हों। और साथ ही साथ यह भी ध्यान रखना चाहिये कि उस वस्तु का स्वरूप ही नष्ट, या वह उस प्रकार बनकर नष्ट होने योग्य न कहलाने लगे। स्वावलम्बी तो प्रत्येक जन बन ही सकता यदि ईश्वर ने स्वाधीनता अपनी सब के समान न बनाई होती। अब जब ईश्वर ने ही सब अपने नियन्त्रणाधीन ही रखा है, तो फिर कोई किसी पर स्वावलम्बी क्या बने, या कह, या हो सके... सब का एक नियन्ता ही सर्वेश्वर ही है, सो उसी स्वामी को सबका सब कुछ मानना चाहिये। स्वावलम्बी होना जहां सर्वथा एक स्वाधीनता का नाम है, जिसका वास्तविक तो यही है, स्वावलम्बी या स्ववश रहने का नाम है, जिसका दूसरा रूप, परवश होना नहीं। अतः सिद्ध हुआ, सब को तो एक समय सब जन ही सब वस्तु सब काम की या सब प्रकार सुख दाता सामग्री को प्रस्तुत करने वाले तो न बनाकर या स्वयं नहिं कर सकते अथवा अपने आप सब ही सब कुछ नहीं कर सकते इसीलिये एक दूसरे पर आश्रित सब जन सब तरह सब जन एक दूसरे पर सब प्रकार निर्भर बन गये जिस जन का जैसा काम किसी योग्य रहा वह उस काम को वैसा करता गया तथा उस जन का वैसा प्रकार ही उस स्वावलम्बी का रूप बनकर परस्पर में सब काम चला। कहा भी न क्या किसी? "चलते-चलते ही गिर पड़ा फिर भी नहिं सम्भल या उठ कर देख सका।" इस सब का उत्तर यही निकला "चलो, चलो, जहां तक चाल है या तो गिरो या फिर गिर कर स्वयं उठो फिर चलो या जब गिर गये तब फिर माता-पिता का ध्यान करो।" सो सब स्वावलम्बनियों का रूप एक जैसा सब समय सब प्रकार सब स्थानों पर एक सा सब समय सब को नहीं मिल गया तथा नहिं मिल सका इसी लिये सब प्रकार कोई जन किसी बात यथा रूप सम्भव ही नहिं रहा। परस्पर में मिले स्वावलम्बी बनकर जिसने काम को तो अपने समय अनुसार पूर्ण किया उसे सब प्रकार का सुख ही हुआ, पर जिसके सब स्वावलम्बी न हुये या सब प्रकार स्वावलम्बी सब जन न बनकर कुछ अन्य पर ही आश्रित ही हो गये, उसको सब काम कष्ट पूर्ण तथा विषम जन का काम देखना पड़ा। पर क्या सब परस्पर के स्वावलम्बी जन सब ही काम को पूर्ण सुखमय या सुखद बना सकते थे? जब कि न किसी का किसी प्रकार भी? स्वावलम्बी कहा जा सकता था या स्वावलम्बी रूप तो स्वावलम्बी होकर केवल ही ही रह गया, न किसी का रूप बदला अथवा बदला? तो परस्पर के स्वावलम्बी या तो स्वावलम्बी कहला सके? अथवा सब किसी का सहारा चाहने लगे? सो चलते-चलते गिर तो सब स्वावलम्बी व्यक्ति गये या अपना रूप खोया, फिर भी स्वावलम्बी कहलाने लगे सो भी उचित था, फिर क्यों परस्पर आश्रित बन कर स्वावलम्बी होकर सब स्वावलम्बी बनना चाहते थे? जिसका परिणाम शून्य ही? या सब जन ही स्वावलम्बी रूप हो ही गये, स्वावलम्बी सब स्वावलम्बी का रूप परस्पर के रूप को बदलकर ही स्वावलम्बी बने, तो फिर स्वावलम्बन का नाम केवल ही रूप तक सीमित क्यों रहा? फिर इस स्वावलम्बन विषयक चर्चा? सब व्यर्थ समझी जा या मानी? स्वावलम्बन अपने आप सब स्वावलम्बियों का रूप ही तो होगा या अन्य स्वावलम्बी जन से ही स्वावलम्बन का तो रूप बनेगा। सब का सुख तो स्वावलम्बी बनने में था परस्पर एक दूसरे पर आश्रित होकर स्वावलम्बी का रूप माना तो स्वावलम्बी नाम केवल रह गया पर काम नहीं, सो काम करने पर ही व्यक्ति को काम का नाम देकर काम वाला कहा गया न कि व्यक्ति नाम लेकर स्वावलम्बी बनता व काम, परस्पर काम में एक काम केवल ही पर निर्भर रहा जाता था। 29
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संन्यास आश्रम का विचार ही न रहे तो फिर गृह, या अन्य आश्रमों का प्रयोजन क्या रहेगा, विचार ही विपरीत रीति का, या विपरीत परिणाम का होगा कि नहीं? सो इन सबका विचार जो जन न करके इस प्रकार का ही भाव निश्चय रूप विचार का निश्चय करते हुए इस जन्म में सब कुछ मान करके बैठते हैं, यह उनका विचार ही उनका विपरीत रूप में उत्पन्न होता है। सो इस सब का क्या रूप-रंग है सो तो इस जन्म रूपी समय में ज्ञान दशा में आ-सकना बहुत ही कम रूप लिए हुए ही माना है। ज्ञान का भी अधिकार विचार युक्त रूप से ही है-- अल्प रूप जन मात्र "न ज्ञानं न ध्यानं न च हरि कथा" इस प्रकार समझ कर अपने विचार को अल्प समझ कर अपने मन को ही सब कुछ मान कर सो सब जन रूप विचार का ही रूप अपने मन विचार में मान लेते हैं। एक जन ऐसा है, जो यह न समझ कर, न इस रूप को विचार कर, न इस रूप को, सब कुछ अपने मन का विचार ही मान कर, अपने मन को सब प्रकार से मन-माना ही रूप लिए हुए यह मान लेता है कि सब कुछ अपने ही विचार का रूप ठहरा हुआ है। न तो कोई ईश्वर का रूप है और न कोई रूप उसका जो माना हुआ है, न कोई गुरु का ही कुछ रूप विचार में आता है, सो यह सब रूप विचार का कुछ सत्य ही रूप लेकर ठहरा हुआ है। अपने विचार से अलग और कुछ नहीं है। न कोई ईश्वर है और न कोई उसका रूप है। न कोई गुरु है, न कोई संसार का रूप विचार का ठहरा हुआ है, सब विचार अपने मन के अनुसार ही मानना चाहिए। एक ऐसा; जो इस प्रकार अपने विचार, अभ्यास, अध्ययन तथा अपने विचार को, या उस ईश्वर को नहीं मानता, माया, संन्यास, सकाम, निष्काम, या अन्य किसी भी रूप को नहीं मानता तथा ईश्वर को ही सर्वव्यापी मान कर विचार करता हुआ यह, किसी रूप को भी नहीं मानता केवल ईश्वर के नाम को सर्वव्यापी मान कर सब प्रकार से ईश्वर को ही सर्वव्यापी मान कर अपने मन में जो कुछ मान लिया, सो ही सब कुछ मानता हुआ कहता है कि ईश्वर तो सब कुछ है, वह तो सब में है। एक ऐसा जन भी है, जिसने न ईश्वर को, संन्यास को वा उस रूप विशेष को कुछ भी नहीं माना है, न उस रूप को कुछ माना तथा न उस प्रकार के इस विचार को माना है कि ईश्वर का रूप ऐसा है, जो इस प्रकार अपने विचार को ही सब कुछ मान कर ठहरा हुआ है, सो ऐसा विचार भी विचार ही है। एक जन ऐसा है, "जो अपने विचार को आ-सकता हुआ कहे" जिस जन के इस प्रकार के सब विचार संसार में देखे जाते हैं जिसमें कोई अपने विचार को ही सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ मानता हुआ यह भी विचार, सो इस प्रकार अपने विचार को ही ईश्वर का रूप मान कर अपने विचार का ही रूप संसार में देखता है। यह सब अवस्था, जो ईश्वर को नहीं मानते हैं अथवा किसी विचार को नहीं मानते हैं वे सब उस रूप को नहीं मानते जो कि ईश्वर का रूप कहा गया है। सो इस विचार को अपने मन में, ईश्वर का रूप अपने विचार का ही रूप ठहराया जाता है। ईश्वर का जो रूप माना जाता है वह सब अपने विचार का रूप है। इसलिए ईश्वर को सर्वोपरि, सर्वव्यापी मान कर ही सब कार्य करना चाहिए। 31
उनका मन्तव्य थाकि नित्य नाम, नित्य रूप और नित्य धाम का दर्शन भगवान् की कृपा से नित्य भक्त पाता रहता। नित्य पद का केवल यह मतलब ही नहीं कि भगवद् धाम नित्य यद्यपि वह भी। नित्य रूपका नाम का नित्य अनुभव हो? नित्य भक्त किसको कहेंगे? "जो नित्य स्वरूप का चि-द्विलासमय दर्शन करे।" यह निष्ठा सिद्ध हुई-- केवल नामका स्मरण किया नित्य स्वरूप साक्षात्कार। स्वामी कहते हैं, "इस साक्षात्कार का ही परिणाम हुआ" जब श्री हरिदास जी नित्य नाम का उच्चारण या कीर्त्तन करते हैं, कीर्त्तन के रस रूप स्वरूपका दर्शन उनको नित्य स्वरूप लीला विलास विभूति सहित सदा होता है, यह केवल यह न हुआ, नाम लिया रूप दिखा दिया केवल सो नहीं था पर रूप दर्शन नित्य रस रूप नाम रस, स्वरूप रस रूप, यह उनका भाव था। साक्षात्कार का एक फल भगवान् लीला का प्रत्यक्ष दर्शन सदा रहता है। साक्षात्कार का अभिप्राय केवल देखना ही, उस रस का रसास्वादन होता ही रहता है। रस का रस स्वरूप साक्षात्कार भगवान् का स्वरूपानुभव ही वास्तविक स्वरूप दर्शन या भगवान् का स्वरूप ही माना गया रस स्वरूप दर्शन के स्वरूप। उस नाम रूप व स्वरूप प्रत्यक्ष स्वरूप का दर्शन नित्य हुआ, उस रस स्वरूप दर्शन का यह परिणाम था कि इस, रस रूप लीला विलास दर्शन हुआ, नित्य रस रूप नित्य स्वरूप दर्शन से लीला विलासका ज्ञान या रूप सदा उनके सम्मुख रहता परमानन्द रस स्वरूपका ज्ञान हो इस बात से सदा के रस रूप रसिकता रस का व रस स्वरूप लीला के रस आस्वादन रस में लीन रसिकता से युक्त, रसिकता रस का रूप सदा बना, नित्य स्वरूप, नित्य स्वरूप लीला नित्य व इस रसस्वरूप लीला नित्य व स्वरूप का रस में एकाग्र रस ही रस लीन नित्य रसस्वरूप लीला में, जब व जहा, रस स्वरूप रसमय व रस, उस रसका सदा ध्यान रूप रस स्वरूप नित्य स्वरूप रस का ही रस नित्य रस--इस रूप में नित्य रस--इस रूप रसस्वरूप नित्य रस, स्वरूप रूप रसिक स्वरूप रसिकता का स्वरूप रस स्वरूप ही, इस रसिकता रूप में रस रूप नाम साक्षात्कार स्वरूप में, नित्य नाम स्वरूप रस ध्यान रस में रस रूप नाम लीला रस रूप रस के स्वरूप में रस स्वरूप, इस रस स्वरूप रस का नित्य स्वरूप रस रूप ज्ञान में, नित्य नाम स्वरूप स्वरूप रस में स्वरूप का रस स्वरूप में, सदा ही रस का रस रूप रूप का रस! सदा ही स्वरूप रस रूप, उस नित्य स्वरूप रस! रस स्वरूप रूप का स्वरूप! रस साक्षात्कार का रस रूप स्वरूप! इस बात को रस रूप नित्य रस स्वरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार स्वरूप में, रस की रूप ध्यान में ही सदा रहा। नित्य स्वरूपका रस नित्य साक्षात्कार रूप में, रसिकता नित्य रूप से रस साक्षात्कार स्वरूप प्रत्यक्ष नित्य रूप में नित्य स्वरूप रस साक्षात्कार स्वरूप, साक्षात्कार रूप, रसिकता स्वरूप का रूप रस ज्ञान स्वरूप उस साक्षात्कार का स्वरूप सदा स्वरूप से साक्षात्कार स्वरूप रस में, सदा नित्य साक्षात्कार रस स्वरूप रूप रस में, रसिकता साक्षात्कार स्वरूप का ज्ञान रस रूप, रस रस स्वरूप रस रस सदा स्वरूप का ही नित्य साक्षात्कार सदा स्वरूप, रसिकता का रस ही रूप से स्वरूप का ही रूप सदा ही ही सदा ही स्वरूप रस में, सदा ही उस नित्य रूप नित्य स्वरूप, उस ही स्वरूप स्वरूप, उस स्वरूप के स्वरूप। रसिकता स्वरूपका रूप स्वरूप में, रसिकता स्वरूपका रूप स्वरूप सदा नित्य रस साक्षात्कार स्वरूप नित्य रस साक्षात्कार का रस साक्षात्कार स्वरूप स्वरूप सदा रस साक्षात्कार से रस साक्षात्कार रस साक्षात्कार साक्षात्कार रस साक्षात्कार रस साक्षात्कार साक्षात्कार साक्षात्कार सदा ही सदा सदा ही साक्षात्कार के रस रूप साक्षात्कार रस साक्षात्कार रूप से साक्षात्कार सदा ही रस रस साक्षात्कार साक्षात्कार सदा रस रस सदा ही स्वरूप रस रस रस स्वरूप रस रूप नित्य के रस रूप के रस स्वरूप रूप रस में, स्वरूप रस स्वरूप के रसिकता रूप नित्य व स्वरूप, व स्वरूप, व स्वरूप, स्वरूप, रस के नित्य स्वरूप नित्य स्वरूप में, रस ही रस नित्य स्वरूप से स्वरूप व स्वरूप। इस सब रूप का रस प्रत्यक्ष स्वरूप ही रहा, उस रस रूप नित्य ही रस साक्षात्कार सदा ही सदा रस साक्षात्कार सदा रहा। 32
समस्त विषय वासना, कामिनी कांचन सम्बन्धी वासना मनमें भरी हुईहै, हृदय भगवानके प्रेमसे शुन्य है, विमल निष्काम प्रेमरूपामृतकी बूंदका स्वाद तो आजतक कभी हम पाही नहीं सके सांसारिक भोगों रूपी मद्यको पीकर सदा मतवाले बने हुवे भोगों भोगते हुए चौबीसों घण्टोंमेंसे एक मिनटके लियेभी भगवान्का स्मरण नहीं; सब सुख और सामग्री ईश्वरने देकर दया का प्रकाश हमारे ऊपर किया, पर कृतघ्न होकर हम उसका स्मरण नहीं करते वरन दूसरोंको कष्ट पहुंचाते, ईश्वरके नियमका उल्लङ्घन कर दिन-रात पाप सञ्चय करते हैं। यह कौन कहसकेगा, कदाचित् कहसकेगा, कि परमात्मा दयालु नहीं है। ईश्वरपर दोषारोपण क्यों कियाजाय? जबतक कि सम्पूर्ण काम, कामना विषयों का त्याग नहोजावे, तब तक न तोपरमेश्वरका निष्काम सच्चा प्रेमही इस चित्तमें आवेगा, औरन दर्शन होसकतेहैं, केवल बातोंसे परमात्मा नहीं मिलसकते। इस विषयमें यह निश्चय समझना चाहिये कि जबतक इस मनमें विषय वासना रूपी कामरूपी-शत्रुहै, तबतक परमेश्वरका वास मनमें नहीं होसकेगा, यह बातभी हैकि जहां अन्धकार रहता है वहां प्रकाश कभी टिकनहीं सक्ता और जहां प्रकाश होताहै वहां अन्धकार टिकनहीं सक्ता। इस विषयमें किसी महात्माने बहुत सुन्दर दृष्टान्त दियाहै कि जबतक राजा सिंहासन पर बैठाहै औरमहाराजके सामने दासदासियां सब हाथबांधे हुवे खड़ेहैं राजा सिंहासन छोड़कर जब महलमें चलाजाता है तब सब दास दासी मनमानी चेष्टा करनेलगेहैं और राजाके सिंहासनपर भी बैठ जातेहैं परन्तु ज्योंही राजा, फिर महलमें से निकलकर आताहै राजाको आते देखकर सब दास दासियां हाथबांधे अपने २स्थानोंपर नम्र होकर खड़े होजातेहैं औरसिंहासनको खाली छोड़देतेहैं इसी प्रकार जबतक इस मन रूपी सिंहासनपर काम, क्रोधादि विकारों का राज्य रहताहै तबतक ईश्वर रूपी राजाका पदार्पण इस मनरूपी मन्दिरमें नहीं होता औरजब यह विकार दूर होजातेहैं, अन्तःकरण शुद्ध होकर ईश्वरकी झांकी इस मनरूपी मन्दिरमें होने लगती है; फिरतो काम क्रोधादि, न जाने कहां भागजातेहैं, और चित्त शान्त... हो जाताहै इसलिये कामरूपी विकारको सब पापों की मूल जड़ समझकर इस को मार भगावे--जिससे मनमें शान्ति मिले औरपरमात्मा के प्रेम रूपामृतका रस मिले औरपरमात्मा की प्राप्ति होकरसदाके लियेआनन्द प्राप्त होसके। सब सन्तों का यही उपदेशहै कि जबतक वासनाको नहीं छोड़ेगा तब तक कुछ नहींहोगा, केवल बकवाद करनेसे कुछ काम नहींहोता मनके फेरनेसेही सब बात बनसकतीहैं। वासना किसको कहते हैं? उत्तर, सांसारिक पदार्थों की, कामिनी कांचनकी चाहनाका नाम वासना कहलाता है? ईश्वरको निष्काम, अहैतुक प्रेमसे भजना, सांसारिक सुख सम्पत्तिके लिये भगवद्भजन का व्यापार न करना चाहिये क्यों? निष्काम-उपासना सर्वोत्तम कहीहै, सकाम-उपासना अल्पफलवाली होतीहै सकाम उपासना करने वालेको भी, भगवान्का दर्शन और प्रेमामृत नहीं प्राप्त होता यद्यपि ईश्वर को सब सुख सम्पत्ति देनेका सामर्थ्यहै पर ज्ञानी महात्मा ईश्वरसे नश्वर- पदार्थों की कभी चाह नहीं करते भगवान्की भक्ति केवल भगवान्के प्रेम के लियेही करनी चाहिये? नश्वर पदार्थों की चाहना भक्ति में विघ्नस्वरूपहै। ईश्वरके प्रेममें, नश्वर-पदार्थों की चाहना क्यों हो, अविद्यारूप अन्ध-कूप भोगविलासके लिये, नहीं जी, कदापि-नहीं? यदि यह कहोगे कि सब भोगों की, वासना का त्याग करें, केवल काम और मोक्ष विषय-वासना की चाहना रखें तोक्या कोई हानि वा दोषहोता है? उत्तर यह, यह दोनों कामनाएं वासना--की उत्पत्तिकरने वाली हैं इसलिये त्याज्य हैं, यह वासना जन्म-मरणरूप बन्धन देनेवाली न हैं? शङ्का हुई, मुक्ति परमात्माका स्वरूप होनेसे सब दुखों की और पापों की निवृत्त करनेवाली और परम आनन्द रूप होनेसे मोक्ष की वासना बुरी क्यों मानी जातीहै कारण कि इस वासनासे तो पाप और नश्वर सुखों का त्याग होताहै तो मुक्ति इच्छाको पाप रूप त्यागयोग्य क्यों माना जाय और इससे ईश्वर प्राप्तिमें क्या विघ्नहै उत्तर यहकि जब चित्त शुद्ध निर्मलहुवा तो फिर मुक्ति की क्या आशा? स्वतःसिद्ध ही मुक्तिहोगी यह शङ्का क्या सिद्ध हुई? मुमुक्षुताका जब उदय होता है तब मुक्ति इच्छा होती है इससे सिद्ध हुवा कि मोक्ष विषयकवासना निष्काम दशाके लिये प्रतिबन्धकहै इसलिये मुक्ति इच्छा त्यागने योग्यहै निष्काम उपासकके केवल यह भाव रहे, परमात्मा को प्रेम रहे, आत्मसमर्पणका भाव सदा रहे, चाहे नरकमिले चाहे स्वर्ग रहे, जहां भी वास मिले वहांही भगवान्के चरणों का ध्यानलगावे, केवल निष्काम भक्ति चाहे इस दशा वाले महात्मा पुरुषका संसार में कुछ कर्त्तव्य शेष नहींरहता केवलभगवत् चिन्तनमात्र इनका स्वरूप होताहै, जब तक, ऐसा प्रेम ईश्वरके साथ नहोजावे तबतक कल्याण की सम्भावना नहींहो सक्ती इस वासना रूपी कीचड़ लगे अन्तःकरण में ईश्वर, प्रकट हो सकें, कदापि यह सम्भव नहींहो सक्ता हे प्यारे भ्राताओ! ईश्वरके भजनमें चित्त लगाओकि जिससे संसारका भय मिटकर आनन्द प्राप्त होवे ईश्वरके चरणोमें ऐसा अनन्य प्रेमभाव धारणकरो कि संसार का सब मोह छूट जाय औरपरमात्मा विश्राम-पद मिले॥ 33
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तब राजा शूरसेन चकित होकर उस बालक को गोद में उठाकर बोले, यह आश्चर्यदायक वीर बालक तो अपने समान किसी को भी नहीं गिन रहा है, अर्थात् यह निडर वीर ... निदान उस दिन राजा शूरसेन अपने घर को जाकर सब ही बालकों को बुला कर भोजन का प्रबन्ध करवाकर उन सब को खिला कर सत्कार कर सब को विदा किया परन्तु उस बालक ने यह भोजन भी स्वीकार नहीं किया अर्थात् खाया, न सत्कार-सत्कार को ग्रहण कर प्रसन्न हुआ। राजा शूरसेन विचारता ही रहा सोच में पड़ाता रहा कि उसका पिता, या उस बालक का क्या नाम बताया जाय जब वह बालक बारह वर्ष वयवाला सब प्रकार से सबल निरोग स्वरूप वान व्यायाम करता था, तब जिस स्थान, ग्राम, नगर पाठशाला अथवा जहां कहीं जाता अथवा, कोई बलवान् मिलता था, उस समय उसके साथ बल आजमाने लगजाता था। और सब ही लोग यह कहते थे। कि इस जैसा कोई भी वीर इस पृथ्वी मण्डल मध्य है--इसलिए ही इसका नाम! पृथिवीचन्द्र रख कर सम्बोधन किया जाय। इसके पिता का नाम तो किसी पता लगाया ही नहीं था-और सम्बोधन बिना काम भी नहीं हो सकता था। इस ही लिए उसका सम्बोधन नाम ही हो गया। इसके पश्चात् किसी भी नाम से, उस बालक का पृथिवी नाम ही हो गया था। इसलिए यह विचार निश्चित है, प्रत्येक विचार प्रत्येक बात किसी कारण विशेष पर तथा किसी आवश्यकता के बल पर ही नाम रखे जाते हैं। अन्यथा व्यर्थका नाम कौन सा? और क्या नाम किसका हो? आज का विषय यह नहीं चल रहा विचार इसका नामकरण का उस दिन चला था सो इस निमित्त से कथा रूप में प्रसंग उठाया गया। अब आगे का आचरण जो पृथिवी का विवरण सुना जा रहा है। इसलिए जो जो नाम प्रख्यात हैं, वे सब किसी विशेषता के ही कारण से होते हैं। इस तथ्य को सत्य ही मान लो। अब इस कथा से यह सिद्ध हो जानेपर कि उस बालक का नाम पृथिवी रख ही लिया तो उस समय उसका आचरण जो था वह बड़ा सरल निष्कपट, दयालु तथा अपने आप-आप मग्न रहने वाला था। इसलिए जो उस समय का राजा था। अर्थात् उस समय का शूरसेन नाम सम्भ्रम राजा, या जो कोई राजा होता था, या उस देश का राजा था। उसने ही अपने मन्त्रियों से कह कर या तो वह काम करने वाले भृत्यों से कह कर उस बालक का लालन पालन करवाया था। उस का पालन तथा उस स्वरूप-रचना व शक्ति को देख कर ही; सत्कार था। सो अब तो प्रत्येक को समझना यह आवश्यक हो जाता है। जो राजा चम्पावती पति, या कोई उत्तराधिकारी था जिस समय उस बालक का लालन हो रहा था। उस देश प्रजा सुखी अवश्य थी, उस ही कारण प्रजा के भोजन की कमी अथवा दुर्भिक्ष कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ। क्योंकि जिस राजा के मण्डल में राज्य में प्रजा सुखी नहीं होती क्या? निश्चय ही यह, राजा अपनी प्रजा के विचार को जानने वाला नहीं रहता वा प्रजाजनों क्या कुछ विचार स्वातन्त्र्य का और उनका ध्यान न रख कर केवल अपने भोग को भोगने का ध्यान ही जो राजा रखता है। वह राजा कभी भी उत्तम राजा नहीं कहा उस समय पृथिवी का नाम प्रख्यात होने का कारण यह भी हुआ कि वह बालक सबपर बड़ा दयालु था, उसने दयालुता का काम यह किया कि जो जो प्रजा में निर्बल दीन बालक थे। उन सब बालकों को इकट्ठा न करके ही अपने भोजन को या अपने लिए जो राजा मण्डल व्यवस्था से आता, उस प्राप्त सत्कार, का पृथिवी वितरण बालक-बालक बालकों को कर देता था। बालकों को वितरण करने पर सब लोग बड़े प्रसन्न और उसके यश का गान करने में प्रवृत्त हो गये। जब बालकों को दान वा सहायता देने लगा तो सबने यह निश्चय ही सम्भावना की, कि जो जो दीन बालक तथा बालिकाओं की अवस्था थी उसमें तो उन बालकों के वस्त्र भोजन का, प्रबन्ध यह राजा करता था, और राजा सब करता था, इसलिए इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि, सब लोग इस बात से, विशेष प्रसन्न थे, केवल राजा चिन्ता में पड़ गया, चिन्ता यह हुई पृथिवी का प्रभाव तो बढ़ जायगा यह तो निश्चित है, परन्तु सम्भवतः यह महाप्रतापी इस राज्य का स्वामी न बन जाय यह राजा के मन में भय उत्पन्न हो गया था। जब उस भय को उसने अपने मन्त्रियोंके सम्मुख प्रकट किया तब सब ही मन्त्रियोंने परामर्श दिया चिन्ताग्रस्त मत हो इस का कोई प्रबन्ध कर दिया जायगा जिससे चिन्ता मिटे। राजन्, इस पृथिवीचन्द्र बालक को तो हम मारेंगे नहीं, तो क्या करेंगे? सो आप ही सब को और पृथिवी को भी तो मार नहीं सकता अतः ऐसा उपाय हो जो पृथिवी पराजय को न पाकर के, शान्त बना रहे। इसका कारण यह भी जान लेना ही होगा 36
तब राजा सुबाहु अपने मन्त्री महोदर नामक योग्य मन्त्रिवरको साथ ले चक्रवर्तियोंके समान ठाठबाट बनाकर उस मनोरञ्जनाके विशाल महलमें गया सुदामनके, पास पहुँचा नृपतिराज। नृपको आते देख न मनोरञ्जनाके हृदयमें हर्ष हुआ नउमंग केवल शिष्टाचारके वशीभूत होकर वह नृपके साथ बैठ गई उस सिंहासन पर। महोदर मन्त्री तो अपनी कुटिलतानुसार ही यह चेष्टा करता ही रहा कि यह बात किसी प्रकार सुदामनके कानोंमें पहुँच जाय, जिससे उसका हृदय विदीर्ण होकर वह प्राणों को त्याग कर यमके दर्शन करे। परन्तु सुदामन तो नृपके आगमन पर भयभीत हुआ न हर्षित प्रत्युत उदासीन ही बना रहा। पर उस समय मनोरञ्जना सुदामन पर ही अपनी दृष्टि लगाये हुए थी। उस समय महोदरने राजा सुबाहु मन्त्री होकर भी चापलूसों जैसी बातें करते हुए सुदामनको लक्ष्यकर कहा कि महाराज यह तो बड़ा अनर्थ हुआ। इस साधारण पुरुषका क्या विचार चक्रवर्ती राजाके सदृश बैठना! सो इस समय ही, उचित दण्ड दिलाकर महोदय, इस धृष्ट मनुष्यको इस महलसे बाहर निकाल दिया जाय। यह सुन राजा सुबाहु मुस्कराते व बोले राजा सुबाहु बोले, "इस साधारण मनुष्यमें ऐसा कौन सा पराक्रम भरा हुआ है मन्त्री जी, जो इस समय बाहर न जाकर बैठा हुआ नितान्त प्रसन्न" राजा सुबाहु इतना कहकर सुदामन मणिकारकी ओर सम्बोधित कर तो यह बात कह गये किन्तु मन्त्री महोदर अपने कपटी विचारोंमें चूर होता हुआ कहने लगा कि राजन इस पुरुष का यह बड़ा भारी अपराध है। इस दुर्जनको तो मार ही डाला जाय। राजन् यह कैसा? क्या यह कोई कामी पुरुष? अथवा इसपर कोई भूत लगा हुआ जिससे भयभीत होकर बैठा है, या फिर यह कोई पागल पुरुष मनोरञ्जनाके इस विशाल महलमें बैठा हुआ है। राजा सुबाहु अपने मन्त्री महोदरके इस प्रकारके, कथनोंको सुन बोले? महोदरका यह वचन? सुनकर मनोरञ्जना तो जल भुनकर राख हो गई, फिर भी वह क्या कह सकती? अब तक सुदामन जो कुछ मौन होकर अवलोकन करता रहा उस समय राजाके सामने आकर वह बोल उठा। नृप सुबाहुके इस न्यायकी प्रशंसा करने लगा। मन्त्री महोदरकी कुटिल बातोंका उत्तर देते हुए कहा कि हे मन्त्रिवर तुम मुझे जैसा निर्बल मानकर अपमानित करते हुए कह रहे हो वैसा नहीं हूँ। मैं पापों के भयसे ही डरता हूँ। यदि मुझे पापका डर नहो तो तुम जैसे नीच मन्त्रीका मर्दन कर दूँ। बात ठीक ही कही है, कि जब तक पाप का उदय, रहता तभी तक हर कोई हर किसी पर भारी पड़ता है? इस संसारमें जो दुर्बलको दुःख देता रहता--है, वह मूर्ख, यह न--हीं सोचता कि इस दुर्बलका भी कोई रक्षक है। अरे भाई जब कोई भी रक्षक न हो तो धर्म ही उस समय उस दुर्बल का रक्षक, काम करता रहता है। राजा सुबाहुको तो कुछ दया आई पर मनोरञ्जना का सुदामन पर केवल भाव बढ़ा। अब यह सुदामन कुछ समय पर्यन्त ठहर कर उस स्थान से चल दिया। मनोरञ्जना अपने भवनमें पश्चात्ताप की आग में जलने लगी। उसके हृदयमें सुदामनके प्रति निष्कपट प्रेम उमड़ पड़ा। वह सोचने लगी कि, हाय मैंने निष्कपट सुदामन को कष्ट पहुँचा कर भारी पाप किया। अब मैं क्या करूँ? जिससे, इस पापसे मेरा उद्धार हो सके, सो इस समय केवल! ही यह बात रह गई कि जिससे सुदामनके साथ विवाह रचाकर मैं, इस कलंक को धोकर अपने जीवन को धन्य करूँ। केवल यही इसका एक उपाय हो सकता है। इधर राजा सुबाहु, भी अपने घर, गया ओर सुदामन भी चिन्ता का समुद्र सा होकर घर गया तो माता और पिताने उसका उदास मुख देखकर पूछा कि बेटा! तुम इस प्रकार भयभीत क्यों दिख रहे हो। तुम्हारे चेहरेका तेज क्यों नष्ट हो गया; सो बताओ, किस पापी दुर्जनने तुझे, किस बात के लिए दुःख दिया है? जो बात तुम्हारे हृदयमें भरी हुई, सो शीघ्र बताओ, जिस बात का हम उपाय, कर के तुम्हारा भय दूर किया जाय। माता पिताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सुदामन कुछ नहीं बोला, शान्त ही बना रहा किन्तु माता? पिता बारम्बार, यही पूछते रहे! तब वह केवल इतना ही कह सका कि चिन्ता छोड़ो माँ, अब क्या हो सकता इस संसारमें किसी का कोई नहीं है न कोई किसीका सहारा न ही सहायक हो सकता, बस इतना ही कह कर, वह शान्त होकर बैठ गया। सुदामनके मनमें इस समय जो बात लगन लगी सुदामन के मन रूपी घर में वास कर गयी वह बात तो केवल यही सोच रहा था कि किस समय इस शरीररूपी मटकी को फोड़ दूँ? क्या मणिकार सुदामन को वैराग्य प्राप्त हो गया या संसारमें सब कुछ स्वार्थ भरा जब रात का समय हुआ, सब लोग सुख चैन से सोये, उस समय यह वैरागी पुरुष, चुप चाप उठकर श्मशान भूमिकी ओर चल पड़ा, सो केवल वैराग्यके वशीभूत होकर। सोचने लगा, जिन बातोंके निमित्त सब झगड़ा है, उनका त्याग ही क्यों नकर दिया जाय? इस प्रकार वह घर, बार सब को छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर दिया तथा वह, एक वन में पहुँचकर, किसी वृक्षके नीचे बैठ कर, श्री जिनभगवान की तीन प्रदक्षिणा देकर स्तुति पाठ किया। संसारके सब नश्वर मोह माया, ममता आदि बन्धनों को तोड़कर वह, श्री जिनेन्द्र देवका स्मरण कर कायोत्सर्ग ध्यान करने 37
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तब उसने, या तो उस समय उसके मुखमण्डल तथा वाणी द्वारा व्यक्त होने वाले गहरे दुःख से द्रवीभूत होकर, अथवा जो स्वाभाविक ही था, यह भय पाकर कि कहीं ऐसा न होवे संकट बढ़े, उसने कहा कि मुझे मारते हो क्यों? क्या मेरी हत्या करोगे? या कोई अमानुषिक हो? या कोई चोर या डाकू होवे? मुझे छोड़ दिया जावेगा ना? एक क्षणमात्र के लिए उस न जाने क्या सोचा, तब तो उसने उस कठोर व भारी छड़ी जिसको वह ले रहा था उस समय हाथ से फेंक ही दिया तथा अर्ध- रुष्ट होकर तब वह उसे गाली निकालने के ही रूप में कुछ कहने लगा कि ? पागल-कुत्ते क्या तेरी जान लेने और तुझे मार ही देने के लिये तुझे इस तरह पकड़ ले आवे कोई? पागलपन तुझे सूझ रहा है क्या जो इस प्रकार के व्यर्थ बकवास करने लगता है? तुझे मारना और इस तरह से मार कर फेंक ही देना होता, तो इतना कष्ट उठा कर इतनी दूर क्यों लाते, ऐसा कहते? तू जानता भी है, कैसा मूर्ख? "मुझको जो रूप में खड़ा किया गया है तो वह केवल इसके लिये?" मुझे कैसा मूर्ख? क्या तू वास्तव में इतना मूर्ख? ऐसा प्रश्न किया? मूर्ख कह दिया गया? मुझको इस बात का कोई प्रत्युत्तर मिलेगा? इसके उत्तर रूप उसने कुछ नहीं कहा प्रत्युत केवल मुख से जो रोष तथा घृणा का भाव इस प्रकार प्रकट हो रहा था वह सब तो यथावत ही रहा, फिर भी जो कुछ अब तक उसने न कहा था सो कुछ प्रकट करना चाहा कि ? उसने जो कुछ कहा सो सब तो व्यर्थ था? या उसने समझना ही नहीं चाहा जिससे कि कुछ बात का प्रभाव ही पड़ सके न हो, प्रत्युत उस ओर से और भी अधिक घृणा ही प्रकट करने का जो रूप तथा स्वभाव दिखलाया न जा सकता, प्रत्युत उसे केवल इसी बात का भय मन तथा सिर पर उस दम सवार था जिससे कि वास्तविकता को समझना सब ही व्यर्थ समझा जाने लगा? उसने फिर कहा, "मुझे यहाँ तक लाये सब तो केवल दो बातों के लिये होगा" उस बात के भाव को वह समझ सकता होगा क्या? "मुझे मार कर फेंक देने या केवल दो बातों के लिये होगा" इन दोनों बातों द्वारा उसने क्या कुछ प्रकट करना चाहा था, यह बात तो स्पष्ट होकर सब कुछ प्रकट न हो सका क्योंकि उसने बहुत चाहा कि केवल दो बातों पर ही ध्यान दिया जावे--एक तो यह कि मार, दूसरा यह कि, न मारा-जावे; या केवल दो बातें स्पष्ट थीं कि जिससे जो कुछ स्पष्ट होता, सो सब कुछ है; पर ऐसा समझना सब न हो कर उस व्यक्ति रूप से जो उपस्थित था सब कुछ मार-पीट--सत्कार्य जैसा समझ लिया गया--सो उसके लिये सब ही परिणाम भया- वह। सब ही इस ओर लगा दिया था कि केवल दो बातों के रूप को छोड़ कर न तो वह कुछ कह सका था, न स्पष्ट किया गया था कि जिस प्रकार दोनों बातों अथवा एक बात का भाव प्रकट हो ही सकता था सो न होने देकर या समझने दिया उस बात अथवा भाव रूप को नित्य-ही के लिये अप्रशस्त करने का निश्चय कर ही लिया था केवल इसी रूप द्वारा सब बातों के रूप में देखा गया जाना सब व्यर्थ समझा। क्रोध ही केवल न दिखलाया गया; स्वभाव भी, कैसा था, इसका रूप यदि उस दम देखा जाता तो उससे भी अधिक जो रूप उस समय प्रकट हुआ था, सो यह कि, उस दम, प्रत्येक ने; केवल सिर को हिलाते हुए तथा मुंह को फेरते हुए दोनों हाथ से एक संकेत रूपी चेष्टा प्रकट करके जो बात कही गई थी! उस विषयक समस्त प्रभाव जिस रूप से उस स्थान में दिखलाई पड़ा था, उससे स्पष्ट ही उस व्यक्ति न तो कुछ लाभ उठाया या देखा या उस समय उसका कोई रूप ही ज्ञात व्यवहार के रूप में वह कर ही क्या सकता था ही क्या? फिर, सो सब व्यर्थ गया था, केवल इस बात को छोड़ कर कि जो कुछ रूप या भाव उस दम देखने में आया था, सो ऐसा बुरा प्रभाव उस पर छोड़ रहा था कि जो कभी मिट नहीं सका, न उस प्रकार के रूप को कभी वह भूल ही सकता था और सब कुछ था, सो सब कुछ व्यर्थ रहा या वह सब कुछ व्यर्थ था, इस बात का रूप केवल दो बातों द्वारा देखना सब प्रकार व्यर्थ रूप प्रकट करने का रूप था? सब प्रकार उस स्थान विशेष से सब ही मुख को फेर कर उस व्यक्ति विशेष, जिसको भय से प्रत्येक अंग कांप रहा था उसके पास से हटना चाहा सो तो अवश्य 39
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