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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

गया तथा रात--दिन एकाग्र हो उसकी प्राप्ति का अभ्यास करने लगा। इस प्रकार करते हुए वह प्रत्येक बात अपने गुरुदेव भगवान् श्रीकृष्ण को बता रहा था। अर्जुन जितने साधन करता जाता था उतना ही! साधनों का अहंकारमय पर्दा गिरता गया, उस जीव-भाव रूपी जो पर्दा था, वह जाता रहा। जब पर्दा हट गया तोअभ्यास रूप सब लेन-देन बन्द हो गए और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई।अहंकारमय पर्दा हटा, तब सब कुछ मिटकर सब कुछ भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप ही बन गया। केवल शान्ति का, आनन्दमय स्वरूप अपने-आप प्रकट हो गया, अभ्यास करने का भाव, साधन करने वाला सब कुछ न रह सकता। अभ्यास करनेवाला मिट गया और केवल शान्ति ही शान्ति रह गई। अर्जुन का, अभ्यास सब परमात्मा रूप होकर सब प्रकार का संशय मिट गया! साधन के बाद उसका जो रूप बदला सो, साधन का रूप ही बदल गया। पहले तक सब साधन के द्वारा कुछ न कुछ पाना था, साधन का अहंकारमय पर्दा लगा रहता था कि मुझे परमात्मा को पाना है, सिर्फ साधना अभ्यासकर्त्तापने तक सीमित रह जाती थी मगर उसका पर्दा रूपी अज्ञान समाप्त होने के बाद साधन साधन न रहाअहंकारमय पर्दा न रह सका। अब तो सब कुछ ईश्वर की लीला लगी, कर्त्ता- अकर्त्ता सब, स्वरूप का साक्षात्कार हुआ जब, फिर अर्जुन सब प्रकार निष्काम हो हर काम कर सकता था। अब अर्जुन का ध्यान सब अभ्यास-अभ्यासी अभ्यास का नाश होने पर जो पूर्ण निष्ठा प्राप्त करनी थी उसपर गया, जो कि अज्ञान-अहंकार के हट जाने के बाद की स्थिति सब अर्जुन जान, हर प्रकार अपने को उस ज्ञान रूप से सब तरफ देखने लगा! इस निष्ठावान् का जो रूप है, सो अर्जुन सब बात को समझ गया, जिस प्रकार पानी पर जो बर्फ जमती जाती थी सो पिघल, जल ही निष्ठावान् रूप, बर्फ का अहंकार जमने वाला सब रूप जब पिघल कर सब रूप एक ही बर्फ पिघलकर, सब कुछ जल स्वरूप ही बनकर एकरस परब्रह्म परमात्मा रूप स्थिति बन गई। ज्ञान स्वरूप का ऐसा साधन होने पर यह सब रूप ही ज्ञान स्वरूप बन गया जिस पर विचार कर, अभ्यास सब रूप त्याग के शान्ति प्राप्त करने का यही साधन अर्जुन किया करो! अब सब कर्म कर और फल सब त्याग रूप में निष्काम कर्म को प्राप्त हो, जिस रूप में सब कर्म कर तू जो कुछ त्याग रूप फल त्याग रूप कर्म करता है, जिससे अनासक्त भाव हो; सब कुछ त्याग फल रूप को तू स्वीकार करके निष्काम भाव से रह, सब कर्म त्याग फल रूप होकर; फिर सब प्रकार शान्ति को प्राप्त होकर, उस ज्ञान स्वरूप का साधन कर जिस रूप से सब कुछ त्याग, त्याग ही शान्ति का मूल जानकर सब का त्याग करके, कर्म-धर्म, अभ्यास-अहंकार, विचार- अभ्यासवान् का त्याग करके, सब प्रकार उस परमात्मा शान्ति को ही प्राप्त होकर सब बात को तय कर अर्जुन ज्ञान... परब्रह्म रूप, जो हर प्रकार न त्याग और कर्म-धर्म का कोई त्याग न रहा, परमात्मा सब त्याग... जो सब प्रकार समझा दिया सो स्वरूप ज्ञान अर्जुन, सब बात समझकर उस परब्रह्म को प्राप्त होकर उस ज्ञान रूप को जान कर परमात्मा के ज्ञान स्वरूप में लीन रहा सो अर्जुन सब कुछ जान सब भाव को त्याग कर्म त्याग फल निष्काम भाव सब कुछ त्याग करके अर्जुन, तू हर प्रकार शान्ति फल भोग ले! जो हर दम हर प्रकार ज्ञान, हर दम कर्म-धर्म त्याग करके सब कुछ भगवान् को अर्पण कर दे और तन--मन से केवल परमात्मा रूप को समझे तथापि निष्काम कर्म--फल त्यागकर जो सब को ईश्वर का ही, ईश्वर ही सबका सब है, सब का त्याग कर, जो अपना त्याग ही परमात्मा को कर दिया तो सब रूप उस ईश्वर का सब प्रकार हर समय निष्काम भाव से ईश्वर स्वरूप बन कर नहीं प्राप्त होगा? जिस का ऐसा स्वरूप है, सो हर रूप से ज्ञान-स्वरूप होकर जो शान्ति प्राप्त कर हर समय शान्ति के भाव से सब कुछ ईश्वर ज्ञान से सब निष्काम भाव होकर सब कुछ त्याग हर कर्म निष्काम रूप करता है, जिससे हर दम शांति रूप रह सकता है सो, परमात्मा के हर रूप, स्वरूप के हर स्वरूप को, त्याग स्वरूप सब प्रकार से सब बात का त्याग-धर्म, कर्म-धर्म निष्काम होकर केवल प्रभु का ध्यान स्वरूप सब प्रकार करता हुआ जो कि परमात्मा का ही सब कुछ है वह केवल स्वरूप के साथ अपने स्वरूप को न रूप का, नाम को न रूप का, नाम का स्वरूप न रूप रूप परमात्मा को सब ही सब ध्यान रूप सब कुछ सब प्रकार से 47

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इस एक वाक्य का अर्थ समझना हर एक जन-जन को अति नितांत आवश्यक था, केवल सुनना भर मात्र कोई लाभ कारक या कारण बन सका है? इस असंतोषप्रदायकता का उत्तर हर एक जन को मिल चुका था जन-जन इसके परिणाम भुगतने को वि-वश मजबूर हुआ था, जब तक शक्ति थी, क्षमता वि-वश होकर कराहता ही जाता, पर शक्ति का नाम मात्र शेष न बचा था। हर मानव का तन जरजर तो था आत्मा भी रोती थी, परिवार में शांति का नाम निशान तक न बचा था, केवल उस ही दशा द्वारा जीव-जन्तु त्राहिमाम् का रूप धारण कर इधर उधर भाग तो रहे थे पर विवशता का भार इतना भारी तथा असहनीय था जिसके परिणाम स्वरूप सभी; परिवार संताप की ज्वाला भयानक ज्वाला भड़क कर घर-गृहस्थी का विध्वंस कर उस भयानक अग्नि ज्वाला में ही भस्म होकर स्वाहा हो जाते। केवल शक्तिमान ही ऐसा था जो बचन शक्ति रखता था अथवा जिसे पूर्ण रूप से प्रभु-कृपा प्राप्त या सुरक्षा कवच का वरदान था, अन्यथा हर मानव अपनी सुरक्षा का दावा कर इसका पूर्ण दायित्व लेने में असम- र्थता था, हाथ पैर, साधन सब कुछ होते हुए भी यह सब कुछ रहते हुए भी मानव हाथ पर हाथ धरे बैठा असहाय बन रोता, पर उस दशा का कोई अंत न दिखाई देता? इस तरह प्रलयंकारी रूप हर एक को अपना ग्रास बनाता, केवल आश्चर्यचकित दृष्टि, मूक विवशता भरा यह वातावरण सब को सब ओर से घेरे हुए था। उस समय सब के सब जो जो जीवित थे केवल कंकाल, दुर्बलता का स्वरूप विवशता, लाचारी का भयानक स्वरूप हर व्यवस्था तथा शक्ति शून्य होकर भय से कांपते थरथराते दयनीयता के उस चरम शिखर जिसे विनाश कहा जाता है पहुंच चुके थे। केवल मात्र आशा जिसे किरण का नाम दिया जा सके उपलब्ध शक्ति द्वारा शून्य नजर, सब दिशाएं घोर अंधकार का रूप बन चुकी थी चारों ओर से असहायता ही असहायता का नग्न तांडव सब तरफ व्याप्त था, हर आश्चर्यचकित था कि प्रभु कहां हैं! जो सब रक्षक हैं वे कहां हैं? यह पुकार हर एक के अधरों अथवा कंठों द्वारा निकल रही थी, सब तरफ से भयानक चीत्कार, चीख ही चीख, विकट विद्रुप रूप हर ओर से मानव को पल-पल को ग्रसता हुआ, दिखाई देता, मानव केवल यह ही कह सकने योग्य था कि, हे प्रभु इन सब का अंत कब होगा, या इस स्वरूप का भयानक परिणाम ही सब कुछ नाश करके स्वतः-समाप्ति की ओर होगा। पश्चात्ताप की ज्वालाएं प्रज्वलित हो हृदय-अन्तःकरण को जलाकर भस्म कर दिया करती थी उस समय केवल रुदन था जो सब ओर सब को घेर रहा था तथा, हर एक पश्चात्ताप या पश्चात्ताप ही करता था, वास्तविकता से सब मुंह तो मोड़ते थे, परंतु उस मुंह मोड़ने का परिणाम भयानक था, सब ने, सबने मिलकर पश्चात्ताप का पथ चुना था, पर बिना दिशा के केवल रोने का मार्ग सब तरफ व्याप्त था। केवल आंसू थे जो बहते जाते थे तथा उनका बहाव सब कुछ बहा कर ले जाने समर्थ हो चला था, केवल रो रोकर जीवन व्यतीत हो रहा था पर उस बहाव अथवा रुदन का कोई केवल यह विचार ही सब हृदय में बार बार उठता था कि हम सब जीवित क्यों हैं? या, जीवित रहने का क्या फल मिल रहा है? केवल यही विचार सब को मथ रहा था, पर कोई उपाय उस भयानक अंधकार में से निकलने का नहीं सूझ रहा था। केवल मृत्यु, जो केवल एकमात्र मुक्ति का ही पथ या द्वार, सब को ही नजर, सब को ही अंतिम परिणाम दिखाई पड़ता नजर आता दिखाई पड़ता नजर आता! सब केवल यही सोचने लगे, हर एक केवल मृत्यु द्वारा अपने जीवन की समाप्ति को ही, केवल मुक्ति को, ही इस महान संताप स्वरूप भयानक कष्टों मुक्ति नजर आती! केवल विचार सब को ऐसा ही नजर आता! केवल इस तरह सब सोचते हुए भयानक परिणाम को हर एक विचार सोचने को बाध्य था, जिसका कोई परिणाम अथवा निराकरण सब के सब जन मिलकर खोजना चाहते थे अथवा यह विचार किया करते? हर एक भयानक परिणाम का अंत कब होगा? इसका क्या रूप होगा? इसका जो स्वरूप बन चुका था उससे हर एक अत्यंत ही भयभीत था। भयानक संशय तथा भयानक ही सब ओर का रूप जो सामने था, हर एक मानव को यह सोचने तथा जीने योग्य नहीं छोड़ता नजर! सब तरफ ही अंधकार नजर! हर दिशा शून्य का ही स्वरूप दिखाई देती थी हर वातावरण में केवल अंधकार तथा अंधकार भरा स्वरूप? हर ओर संशय ही तो व्याप्त देखकर था, केवल यह सब भयानक स्वरूप का रूप हर तरफ तथा इस भयानक का स्वरूप बढ़ रहा था। सब इस तरफ व्याकुल होकर एक दूसरे को केवल भय से देखते भर ही पाते थे, पर हर एक सब कुछ खोकर केवल असहायता का स्वरूप धारण किए-हुए आश्चर्यचकित ही बैठा विवशता लाचारी का रूप सब ओर भरा नजर आता? सब आश्चर्य ही भरा न था! 49

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अथवा रात-दिन, रुपया, रोजगार, मकान, इन पर आत्मबुद्धि करे। बिना समझे जीव का व्यवहार ऐसा बन जाताहै परंतु ज्ञान-नेत्र उघड़े तब यह जाने कि वास्तवमें इन पर पर्याय का वा इन पर्याय का रच मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। शरीर तो जड़-द्रव्य है, इसमें तो ज्ञानस्वभाव ही नहीं है। आत्मा तो ज्ञान स्वरूप, चैतन्य रूप है, वास्तवमें इन सब का, पर भावों का कर्ता निश्चय भगवान आत्मा रूप मैं कभी नहीं। इस ही तरह व्यवहार सम्यक्त्व अथवा ज्ञान को भी पर--द्रव्य के आलम्बन से होनेवाला मान सम्यक्त्व वा ज्ञानस्वभाव केवल ज्ञान का कर्ता है, आत्मा को ऐसा कर्त्ता मानना और स्वरूप को छोड़ते देखना सो सब भूल मिथ्या श्रद्धानके वशमें जीव को भ्रम उत्पन्न करता है। समय पर, सब भाव पर से भिन्न हैं, ऐसा तो विचार सम्यक्त्व का धारक ही करेगा। यह जीव रूप से अन्य विचार को वास्तवमें नहीं स्वीकार कर सकता है। व्यवहार समय सम्यक्त्व का स्वरूप ही, इस व्यवहारी जीव को--सम्यक्त्व मात्र ज्ञान पर्याय रूपमें है, वास्तवमें स्वभावमें इसका प्रवेश नहीं हो--सके ऐसा सम्यक्त्व का विचार रूप ही सदासमयसारकाहै, पर सो भी भिन्न ही स्वावलम्बी सम्यक्त्व केवल ज्ञान ही निश्चयनय से ही हो सकता है। यह पर्याय प्रमाण स्वरूप सर्व सम्यग्ज्ञानियों का सार रूप विचार ही सार स्वरूप आत्मा को आत्मज्ञान से देख सकता है। जिस प्रकार से ही सर्व द्रव्य अपने ही स्वरूप में, जहां पर सर्व द्रव्य रूप पर ही संसार रूप सब का पर ज्ञान, यह सब निश्चय से ही है, राग-द्वेष का कारण ही संसार समझना यह सब भूल, अविद्या अर्थात् अज्ञान ही सर्व काल मिथ्या रूप सब कुछ अपने स्वरूप रूप लग रहा है। जब इस स्वरूप को, पर भावों को भिन्न जान इसका परिणाम ही सब विकार, त्यागने को ही अपना स्वरूप मान, सो सर्व का त्याग करता व्यवहार से भिन्न रूप से सब पर ज्ञानवान् का स्वावलम्बन सदा काल रहता आया है। जीव का सार ही सम्यक्त्व रूप ज्ञान मात्र ही सब राग का नाश कर सकता है। समय सार सर्व सार पदार्थ का सार होकर सर्व को केवल ज्ञान रूप ही प्रकाशक है, निराधार समय मात्र ही, इसका स्वरूप! आत्मज्ञानियों स्वरूप को विचार करो, वास्तवमें जीव का परावलम्बीपना एक समय को भी स्वावलम्बी रूप ही होता है, संसारी को परावलम्बीपना ही सत्य है, व्यवहारज्ञानियों का ज्ञान ही, व्यवहार ही सब कुछ है, जो कि व्यवहार दृष्टि का धारक पर से स्वावलम्बन का ध्यान ही न पावे। निश्चय दृष्टि सब द्रव्य रूप पर ही भगवान जीव रूप ज्ञान-नेत्र उघाड़े ज्ञान रूप, स्वरूप के अवलोकत स्वरूप रूप, सबको ऐसा ज्ञान है? आत्मा रूप निश्चय से, सब स्वावलम्बी ज्ञान सर्व प्रकाश निरन्तर प्रकाश ही स्वरूप को प्रकाश कर रहा, जिसे ही सिद्ध रूप सब संसार के प्राणियों को प्रकाशक है। संसार से भिन्न सब सार को ही ग्रहण करने रूप ही सर्व ज्ञान रूप आत्म रूप व्यवहार को छोड़ ही निजत्व रूप ग्रहण कर ज्ञानी को परम सम्यक्त्वदृष्टि ही हो जाता है। इस ही समय जीव, पर निमित्त से ही भिन्न केवल ज्ञान स्वभाव स्वरूप है। सदा ही ऐसा विचार सर्व सम्यक् रूप ही निश्चय व्यवहार स्वरूप सबही जाने, ज्ञान स्वभाव से भिन्न विचार ही अज्ञान के कारणही जीव स्वरूप को राग-द्वेष वा रागवान्--द्वेषी जाने, पर जीव, सदा स्वरूप ही केवल ज्ञान का रूप ही हो कर भी ऐसा विभाव स्वभाव का कर्ता ही सब भव रूप संसार प्रपंच का कारण व्यवहार स्वावलम्बन से अज्ञान भाव सब अज्ञान रूप भासे, ऐसा सब सम्यग्ज्ञानियों स्वरूप विचार ही स्वावलम्बन रूप है, यह ही प्रकार से सब समय ज्ञान मात्र ही सब संसार विभाव से ही राग-द्वेष से भिन्न है। जो ऐसा ही माने, उस सर्व काल ज्ञान रूप भगवान् परमेश्वर के ज्ञान रूप सार भाव को जान सकता रूप सब ही ज्ञान रूप हो सब स्वावलम्बन का ज्ञान पाकर केवल ज्ञान रूप प्रकाश होता? व्यवहार से सब भाव को सब ही केवल समय का प्रकाश मान जो परावलम्ब रूप ही सदा काल का सब मान कर जाने, उस समय राग--द्वेष रूप कैसा हो संसार होगा? हे भव्य जीव, तू भी सदा ही केवल समय बन! ज्ञान ही केवल समय! ज्ञानरूप सब संसार का सार रूप बन, अज्ञान-विभाव से भिन्न ज्ञान-रूप? भगवान् रूप ज्ञान का प्रकाश सदा पावे॥ 51

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इस पर उसने उत्तर दिया कि, स्वामी हमारा सर्वथा समर्थ और न्याय रूप सब धर्म पर वह स्थिर रहता है। उसने न्याय को दृढ़ आलम्बन किया, तो कौन उसका नाश करने पावे? सो जिसने किया--सो सब इस में न्याय का प्रकाश, जो तो सब उस जगदीश्वर रूप सूर्य का प्रकाश, उसका प्रकाशमान स्वरूप नित्य, सो वह जगदीश्वर सब से परे स्वयम् ही सत्य रूप, सबका अंत और नित्य ही रहता तब फिर उस पापी पुरुष ने कहाकि राजा सो, जो सब देश और सब लोक और सर्व जगत् का न्याय करता है सो, उसी राजा से सो, दूसरा न्याय क्या हो सकता है। जिससे तू बच जावे! उसने उत्तर दिया राजा तो न्याय रूप जल का घट अर्थात् उसका सब धन सो--उसी न्याय से सो, उसका न्याय सो तो, दूसरा न्याय क्या होवे! सो घट फूट गया तो जल बिखर ही तो जावेगा न्याय तो! राजा तो नश्वर है, न्याय नित्य? सो जो ईश्वर का न्याय अखंड सो तो सब काल सब पर सर्वथा रहै, जो घट के जल समान सब सो, उस जगदीश्वर रूप जल स्वरूप सो तो अखंड परम आनन्द प्रकाश रूप सब पर यथा योग्य सब पर सदा न्याय किया प्रकाशता सो सब को, सो सो सब काल में सो ऐसा न्याय रूप से जो, राजा प्रजा को सब से सब ही सब न्याय करै, सो सो ही कल्याण उसने राजा के भयभीत रूप कारागार में जो ऐसा दुःख पाया, जिससे वह दुःखी सो, राजा को दुःख देता सो, राजा न देता सब को सब न्याय सुख रूप सो, तन-मन, धन-जन, जन-मन को सब सुख दया न्याय रूप सब को दे, तन- मन, धन सब सो, दया रूप सब को, सब ही परस्पर के सुख का हेतु सब सब सुख सब को सब प्रकार दया से पावै, सब जन जन-जन-के सुख दुःख सुख सब प्रकार परस्पर सुख दया से सब जगत् का परमेश्वर की दया से सब सुख सब जगत्, सब परमात्मा सब का सब से सब का कल्याण रूप, सो कल्याण से प्रकाश स्वरूप हो रहा राजा सब सब जगत् प्रजा सुख से रहे, सो तन-मन से सो सब न्याय रूप से सब जन सब जगत् का दुःख मिटाकर सुख करे सो, जिससे जगत् का उपकार सब प्रजा का सुख रूप सब जगत् सब सुख पावे सो सो, जगत् प्रजा के न्याय से परस्पर सुख--दुःख, सुख, दुःख से परस्पर तन-मन से जो सब यथा योग्य सो सो सब न्याय रूप सुख सब पर यथा योग्य सो सो न्याय सब का दया से; सो सो सब यथा सुख सब, सब का, परस्पर, सब को यथा न्याय से सो सदा सब को सो न्याय सो दया सो सो दया सो तन-मन सब प्रकार से सब परस्पर का तन- मन, सब को परस्पर सब का यथा न्याय, सब सब जन सब को सब प्रकार सब का दया से, सब सो दया, सब सो सुख--का रूप सो सो दया परस्पर का यथा सो प्रकार से सब जन सब कल्याण- रूप सब को सब सब से सो प्रकार दया से सब परमात्मा सब जन को सो सो परमात्मा स्वरूप से सुख से दया सब को, सो दया से, यथा योग्य सो, जगत् यथा योग्य परस्पर परस्पर सब जन सब जगत् का कल्याण रूप दया से सब यथा सब प्रकार से सो दया से परस्पर परस्पर का सब जगत् का सब से सब प्रकार सब जगत् रूप दया से सब को न्याय सो सब का सब यथा रूप फिर उस का दुःख मिटा कर सब यथा योग्य सब का सब न्याय रूप सब को जो जो जगत् से सब तन-मन दया से सब सब को सब सुख, सो सब सो सुख सब, सब सो दया--का सो, सुख सो, दया सो, सो सो, सब ही सब ही दया सब को सब ही दया सब जन को सो दया, सुख, सुख, सब, सो सो सब का तन-मन सब को दया सब को सब दया सो, सो सो परस्पर का जगत् सब प्रकार सुख का सब प्रकार से सब परस्पर-परस्पर सुख, तन-मन दया, सब ही सब, सब को! सो सदा सब पर सो दया से सो सब दया से सब सुख सब को सो सब प्रकार दया से सो सब परस्पर का जगत् सुख सब प्रकार से परमात्मा का ऐसा यथा रूप सब को, कल्याण रूप

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सो भाई, उस दिन को स्मरण करके आज पश्चात्ताप करो अथवा न करो सो तुम्हारी इच्छा पर छोड़ दिया जाता अथवा नहीं, उस पश्चात्-तापसे उस को सुख-ही सुख अथवा आनन्द-आनन्द होगा वा नहीं उस मनुष्य को उस सुख वा आनन्द पर क्या कुछ सन्देह-सा ठहरताहै ? और जो पश्चात्ताप वा उस समय उत्पन्न हो जाता रहा, तो उसका फल किस प्रकार होता सो आज तक उस को सुख--आनन्द और सुख-हीन तथा केवल दुःख का मुख तक भी नहीं मिला सो कहा नहीं जाता है, परन्तु उस सुखस्वरूप को, जिससे सब किसी मनुष्य को सुख वा आनन्दही मिले, सुखही मिला, जिस की सहायता से मनुष्य सब प्रकार का सुख और आनन्द पावे तो उसका स्मरण करना उचित था, किंवा उस बात का? जिसपर कि मन और वचन तथा इन सब इन्द्रियों से उस दिन तक कोई सुख अथवा आनन्द का लेश उपलब्ध न हुआ, सो किस लिये कि उस दिन तक तो केवल? विपत्ति ही विपत्ति सुख के सम्बन्ध रूप में भुगती गईथी, सो भुगती; इस से निश्चय ज्ञान-रूपी प्रकाश, जिससे मनमलीन रूपी अन्ध कार से रहित हो स्वच्छ और पवित्र हो ही जाता रहा था, जिससे संसार के माया रूपी दल का स्पर्श स्वाभाविक रूप से छूटने लगता था सो उस पर मन और मन की स्वाभाविक वृ त्ति उस की मुख्य वृत्ति और मुख्य सुख स्वाभाविक था, जिसके विपरीत होने से मनुष्यता का नाश होने लगता गया अथवा होता है, जिससे मन का काम केवल काम वासना ही उत्पन्न करना अथवा भोग था, जिस दिन से इन सब विपत्तियों उत्पन्न होती तो ऐसा ही परिणाम हो या होने लगाथा कि संसार की बातों अथवा माया संसार से भिन्न हो या उस बात अथवा पश्चात्ताप का स्वरूप भिन्न भिन्न होकर उस के हृदय में जो कि सुख-सम्पन्नता रूप उत्पन्न हो होकर अपना प्रभाव करताथा सो स्वाभाविक ही विपरीत रहा, जिससे केवल काम वासना ही मन को सताती जा रही थी, जिस से उस के हृदय रूपी राज्य नष्ट हो कर काम रूपी विषयी का उस हृदय पर राज्य हो चलाथा तथा, उस हृदय रूपी राज्य का जो कि आनन्दमय होता, सो आनन्दमय विपरीत भाव को पा कर उस विपत्ति, रूपी विपत्ति, का कारण बनकर उस परिणाम का दाता हुआ था जिसके पाने पश्चात्, जो पश्चात् भाव-हो कर हृदय का स्वभाव हो चला था अर्थात् काम वासना को मन रूपी राज्य में, उस स्थान रूपी राज्य रूपी अचेतन अभिमान उस का उस सब समय रूपी राज्य अथवा प्रभाव करता, सो उस का प्रभाव उस साक्षात्कार स्वरूप संसार पर अपना प्रभाव करता? या मन का परिणाम तो अपना प्रभाव करता, या कि काम रूपी स्वरूप अथवा १ काम रूप उस मन को वा मनुष्य रूप मनुष्य का नाश संसार के काम रूप फल रूपी वा मनुष्य रूपी उस मनुष्य, या उस के विचार रूपी वा उसी काम का विचार हो गया था। तो ऐसा अनुभव या साक्षात्कार का ज्ञान वा उस साक्षात्कार रूपी फल अथवा उक्त प्रकार के साक्षात्कार रूपी वा जो कुछ साक्षात्कार हुआ उस बात अथवा विषय का विचार हो रहा होगा, जिससे कि ज्ञान, जिससे कि फल--का स्वरूप अथवा प्रकाश, जिस सब अविद्या रूपी तम का नाश अथवा जो सब अज्ञान रूपी तम रूपी अन्धकार का नाश करता रहा, सो उस का काम करता ही था, जो काम करता था उस का फल अथवा जो फल उस समय होता, तो काम रूपी उस काम रूपी फल का रूप अथवा फल ही, तो ऐसा ज्ञान रूपी फल अथवा वा विचार का वा, सो अविद्या रूपी फल रूपी तम का नाश उस समय पश्चात् रूप में, या अज्ञान रूपी काम रूपी फल उस को रूपता को और साक्षात्कार तो उस समय रूप ज्ञान रूपी अविद्या रूपी, जिस प्रकार से, ज्ञान स्वरूप का, नाश काम-रूपी अन्धकार रूपी का नाश कर ज्ञान रूपी रूप साक्षात्कार या प्रकाश रूप रहा, जिस परिणाम साक्षात्कार कहता 54

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  • Wait, let's look at the last few lines: * ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜! ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ * ⬜⬜⬜ ⬜⬜, ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜, ⬜⬜⬜⬜ * ⬜⬜⬜ ⬜⬜, ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ * `⬜ ⬜⬜, ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜⬜ ⬜⬜ ⬜⬜⬜⬜

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गया अथवा नहीं, यह जानकर समाधान कर सके ऐसा कोई भी तो उपाय उनके पास नहीं था। इसके सिवा उनकी धारणाएं विकृत थीं, जो इसके पर सत्य स्वरूप को जान सके ऐसा उपाय, जो केवल उनके पास ही था पर वे उस पर ध्यान नहीं देते थे। वे केवल एक ईश्वर की पूजा के स्थान पर अनेक अन्य कल्पित देवी-देवताओं की भी पूजा करने लगे थे। उन्होंने यह नहीं समझा कि ईश्वर तो एक है, परब्रह्म के रूप में। फिर भी उसे कई नामों से पुकारा, जैसे कि अग्नि के रूप में, जल के रूप में। इस प्रकार कुछ कल्पित देवी-देवता बन गये, जिनके पास शक्तियां थीं; जैसे कि, इन्द्र देव, जल के देव, वायु के देव, सूर्य देव, चन्द्रमा के देव। इस पर उस समय भी एक मत के लोग एकत्र नहीं थे। कुछ लोग तो, जो ईश्वर के सच्चे उपासक थे, वे इस प्रकार की धारणाओं से विमुख रहते थे, वे तो केवल ईश्वर की, जो सर्व शक्तिमान था और सब का रचियता था और सब को देखता था, उस की पूजा में लगे थे, पर उनकी संख्या कम थी, वे संख्या में कम थे। अतः वे इन बातों को रोक न सके जो केवल अन्धविश्वास थी, जिसे वे धर्म समझ रहे, न वे धर्म सुधार सके। इसके अतिरिक्त धर्म का पतन हो रहा था... इस कारण से कि इस काल में कुछ ऐसे भी, जो स्वयं को ज्ञानी मानते, ऋषि और सन्यासी मानते, पर थे वास्तव में अज्ञानी थी, वे इस बात पर बल देने लगे कि ईश्वर केवल यज्ञ के रूप में मिल सकता, और यह धार्मिक कृत्य केवल ब्राह्मण ही कर सकते हैं। इस प्रकार एक तो पाखण्ड और बढ़ गया जिसके कारण उस काल में, जब कि यज्ञों में पशुओं की बलि दी जाने लगी, एक विशेष वर्ग, जिसे पुरोहित वर्ग कहते, ने अपने स्वार्थ के लिए ईश्वर को, यज्ञों द्वारा प्रसन्न करने का, मार्ग बना कर लोगों को, यज्ञों द्वारा ठगना शुरू कर दिया। ईश्वर के नाम पर इस प्रकार के अनाचार का फल यह हुआ कि वेद काल समाप्त, जिसे सत्य युग, या सतयुग कहते हैं, वह समाप्त हो गया, क्योंकि इस प्रकार अनाचार उस समय का रूप बन चुका था। इस काल में जहाँ कर्म का महत्व समाप्त हो चुका था और भाग्य का ही बोलबाला था। उस समय का मानव यज्ञ, बलि पर सब कुछ निर्भर समझता हुआ कर्म से ही विमुख होकर, केवल इन साधनों पर ही अपने उद्धार का साधन समझने लगा था। हाँ, जब ऐसा समय आ गया, धर्म के नाम पर ऐसा अधर्म होने लगा जिससे मनुष्य का भाग्य केवल भाग्य पर ही छोड़ कर भगवान और ईश्वर को भूलने लगा तो मनुष्य का उद्धार करने हेतु इस धरा पर अनेक अवतारी पुरुषों और महात्माओं का आगमन हुआ। ईश्वर ने जब देखा कि उसके द्वारा बनाये गये संसार में मनुष्य भ्रम में फंसा हुआ है और सत्य मार्ग छोड़कर अधर्म के मार्ग पर चल रहा है तथा उसके कर्म समाप्त हो रहे हैं तथा केवल कर्म के नाम पर पाखण्ड हो रहा है। महात्मा बुद्ध के पूर्व काल की जो यह दशा थी, उस समय एक ऐसा महा- मानव का इस धरा पर जन्म हुआ जो इन सब कुरीतियों को दूर करने में सहायक हुआ, जिसे भगवान बुद्ध कहते हैं। वे इस धरा पर धर्म को सच्चा स्वरूप प्रदान करने में सहायक हुए तथा उनके द्वारा चलाये गये बौद्ध धर्म से इस धरा पर एक नई चेतना का उदय हुआ तथा वह धर्म भारत की सीमाओं से बाहर जाकर भी, विश्व का सबसे बड़ा धर्म बन गया! हाँ, जब यह अनाचार, यह अन्धविश्वास और यह दुराचार इस संसार में व्याप्त था, तब इस समय के काल के अनुसार इस धरा पर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। यह समय ईसा मसीह के जन्म से पूर्व की लगभग छठी शती का था। इस समय मगध साम्राज्य, जो उस समय अपने में महान था, उत्तर भारत में बहुत शक्तिशाली माना जाता था। इस काल के इतिहास के अनुसार मगध के साथ तीन अन्य बड़े राज्य भी भारत में थे, जो अपने प्रभाव तथा प्रभुत्व के कारण विख्यात थे। वे थे, कोशल राज्य, वत्स राज्य तथा अवन्ति राज्य। इन चार शक्तिशाली राज्यों में मगध का साम्राज्य सबसे शक्तिशाली था, जिसे इस काल में सब से श्रेष्ठ माना गया था; शेष अन्य तीन राज्य भी कुछ कम नहीं थे। इन चार बड़े साम्राज्यों के अतिरिक्त कुछ छोटे-छोटे राज्य भी उस समय भारत के पूर्व में थे। इनमें से कुछ गणतन्त्र राज्यों में शाक्य राज्य भी एक था। शाक्य वंश का राज्य हिमालय की तराई में स्थित था। इस राज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी। यह राज्य आधुनिक नेपाल की सीमा पर स्थित था। इस शाक्य वंश के राजा शुद्धोदन थे, जिनकी पत्नी का नाम माया देवी था। राजा शुद्धोदन बड़े-बड़े प्रतापी राजा थे तथा उनकी ख्याति सर्वत्र फैली हुई थी। 59

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भाग 4 (पृष्ठ 61-80)

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[L1-L27] (फ़ॉन्ट लोड न होने के कारण मूल पाठ अपठनीय है)

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इस प्रकार सब तरफ अन्धेर देखकर, चिन्ता निमग्न होकर, वह दीन बालक रोता हुआ अपनी माताके सम्मुख जाकर हाथ जोड बोला... ! माताजी तुम इस संसारके सब काम को जानती हुई यह नहीं जानती हो! मेरी माता, यह चिन्ता का विषय सब बातों का है। संसार मुझे उपनयन योग्य विद्याध्ययन योग्य सब तरह योग्य समझ कर पिता का गोत्र पूछ रहा है। यह बात सच है, यह सब विद्याध्ययन को रोकके हैं, संस्कार को रोकके हैं॥ आप यह विचार कभी मन में मत करो, कि विद्या का पढना केवल आजीविका का साधन है। यह केवल विद्या, यह केवल सत्य बात नहीं कही गई! इस बात को जानने का यही यत्न हो रहा रहता है। यह सत्य विचार बहुत बडा! सत्य विद्या संसार का परम आधार माना॥ सत्यके प्रकाश का आधार तो इस बात का विचार करना मनुष्य जीवनके सब ओर से हो रहा है। सत्य को धारण कर चलने का नाम जीवन धर्मयुक्त बतलाया गया, इसमें तनिक सन्देहभीनहीं, सत्य विचारधारामें विचर कर हम इस जीवन संग्राम को पारकरके ही रहेंगे। हे माता, हम सत्य विचार सम्बन्धी अपने धर्म से कभी विचलित होकर न रहेंगे! विद्याका अभ्यास करना ही तो परम धर्म है, जो सत्यका उपदेशक बनकर सब का उद्धार करेगा? विद्या ही जीवनका आधार? विद्या ही सत्य विचार सिखाकर, यह भव-पार करानेका साधन कराके सत्य विचार देती। संसार में जो सत्य धर्म को नहीं जान सके रहे, वे सत्य विचार का नाम कभी न लेंगे, न सत्य की शरण जाना चाहेंगे! विद्या का प्रकाश? विद्या का विचार सब, जो सत्य का सिखाता? सत्यविचारको सब ही प्रकाश करना चाहते हैं। जहां विचारका प्रकाश आ जाता है। वहां तम, अन्धकारका नाश निश्चित हो ही जाता है। इसी से तो सत्य विचार द्वारा ही सब संसार को पार कर लें! इस प्रकार सत्य ही तो सत्य विद्या का आधारभूत माना गया है। यह विचार तो माता सत्यविचार द्वारा ही हो सकता रहता है। संसार को सब तरह का सत्य विचार प्रकाश मिलना योग्य॥ विद्याध्ययन ही तो केवल सब तरह सत्य द्वारा इस संसार को, समाज को, राष्ट्रको सब तरह उद्धार का यत्न करा सक्ता, यह सत्यका विचार रहा॥ सत्यका विचार ही तो, विद्या द्वारा ही हो सकता रहता है। इस प्रकार, यह विचार सत्य ही सत्य को चमकावे॥ अब इस सत्यका क्या रूप हो सकता? सत्य प्रकाशक सन्तों की शरणमें ही सब होवे! यह सुनकर ही वह, सत्यकामकी माता इस यत्न को कराने को उद्यत होकर सब तरफ ध्यान कर के विचारने लगी। इस प्रकार, सत्यकामके विचारों द्वारा ही सब सत्य का ही प्रकाश, न असत्य आधार, न सन्देहका ही नाम प्रकाश हो कर सब प्रकार सत्यकामके मन को सत्यकी ओर ही प्रेरित किया॥ सब भाव-रूप से यह विचार माताके मन विचार कर सब तरह सत्य द्वारा तय हुआ गया कि, जो सत्य हो, वह सत्य ही सत्यका अवलम्बन ले। सब तरह सत्य की शरण ही सबसे उत्तम उपाय माता द्वारा भाव-रूप से तय करके निर्णय किया गया विचार हुआ । अतः, सब को सत्य द्वारा सम्बोधन कर सत्यता की ओर ही झुकाव हो ही जाता है। सत्यके न भय होवे! सत्यका ही तो बल है, विद्याध्ययन द्वारा सत्य विद्या का विचार ही तो सब तरह, सत्य ही सब कुछ, उस सत्य द्वारा सब तरह विचार होता रहे, सब प्रकार सत्य विद्या का विचार सब प्रकार सत्य द्वारा सब तरह सम्भव होकर अपने सत्य विचार द्वारा सब आधार सत्य प्रकार सत्य बना कर रहे, सत्य मार्ग, ही सब तरह हो? इस प्रकार सब, सब तरह सत्यके द्वारा ही तो सत्य द्वारा सत्यज्ञान प्रकार हो सकता रहा है। सत्यका विचार द्वारा, यह सत्यता द्वारा ही सम्भव हुआ॥ अब तो निश्चय हो गया, कि सत्यता ही है, सो ही सत्य द्वारा सत्य का सब ही प्रकाश हो! यह सुनकर ही वह, जो सत्यता द्वारा ही सब था, वह सत्यता द्वारा सब कुछ सत्य ही सब तरफ फैला॥ सत्यके प्रभाव द्वारा सब प्रकार सत्य का ही प्रभाव हो न सके? सब तरह, सत्य ही सब को विद्याध्ययन द्वारा भाव--विचार से ही सत्यता द्वारा प्रकाशित हो सकेगा॥ सो यह सत्यता द्वारा सब, सत्यता के आधारको ही ही सत्यद्वारा सत्य विचार प्रकाश का रूप सत्य को धारण करके सत्य ही सब तरह प्रकाशित रहा, सत्यता का सब तरह प्रकाश ही सब तरफ सब प्रकार का सत्य ही प्रकाश फैला॥ 63

(नोट: प्रस्तुत पृष्ठ में फॉन्ट एम्बेड न होने के कारण देवनागरी वर्णों के स्थान पर अनुपलब्ध ग्लिफ़ बॉक्स (Tofu / ▯) प्रदर्शित हो रहे हैं। दृश्यमान चिह्नों और संरचना का पंक्ति-वार प्रतिलेखन निम्नानुसार है:)

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