पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३७२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
करनेवाली और मङ्गलमय पदार्थोंके लिये भी मङ्गलकारिणी हैं।*
राजन् ! पुनः प्रयागका माहात्म्य सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे निःसंदेह मुक्त हो जाता है। गङ्गाके उत्तर-तटपर मानस नामक तीर्थ है। वहाँ तीन रात उपवास करनेसे समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। मनुष्य गौ, भूमि और सुवर्णका दान करनेसे जिस फलको पाता है, वह उस तीर्थका बारंबार स्मरण करनेसे ही मिल जाता है। जो गङ्गामें मृत्युको प्राप्त होता है, वह मृत व्यक्ति स्वर्गमें जाता है। उसे नरक नहीं देखना पड़ता। माघ मासमें गङ्गा और यमुनाके संगमपर छाछठ हजार तीर्थोंका समागम होता है। विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करनेसे जो फल मिलता है, वह माघ मासमें प्रयागके भीतर तीन दिन स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो गङ्गा-यमुनाके बीचमें पञ्चाग्निस सेवनकी साधना करता है, वह किसी अङ्गसे हीन नहीं होता; उसका रोग दूर हो जाता है तथा उसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ सबल रहती हैं। इतना ही नहीं, उस मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यमुनाके उत्तर-तटपर और प्रयागके दक्षिण भागमें ऋणप्रमोचन नामक तीर्थ है, जो अत्यन्त श्रेष्ठ माना गया है। वहाँ एक रात निवास करनेसे मनुष्य समस्त ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। उसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है तथा वह सदाके लिये ऋणसे छूट जाता है। प्रयागका मण्डल पाँच योजन विस्तृत है, उसमें प्रवेश करनेवाले पुरुषको पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। जिस मनुष्यकी वहाँ मृत्यु होती है, वह अपनी पिछली सात पीढ़ियोंको और आगे आनेवाली चौदह पीढ़ियोंको तार देता है। महाराज ! यह जानकर प्रयागके प्रति सदा श्रद्धा रखनी चाहिये। जिनका चित्त पापसे दूषित है, वे अश्रद्धालु पुरुष उस स्थानको—देवनिर्मित प्रयागको नहीं पा सकते।
राजन् ! अब मैं अत्यन्त गोपनीय रहस्यकी बात बताता हूँ, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है; सुनो। जो प्रयागमें इन्द्रिय-संयमपूर्वक एक मासतक निवास करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। वहाँ रहनेसे मनुष्य पवित्र, जितेन्द्रिय, अहिंसक और श्रद्धालु होकर सब पापोंसे छूट जाता और परमपदको प्राप्त होता है। वहाँ तीनों काल स्नान और भिक्षाका आहार करना चाहिये; इस प्रकार तीन महीनोंतक प्रयागका सेवन करनेसे वे मुक्त हो जाते हैं—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। तत्त्वके ज्ञाता युधिष्ठिर ! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मैंने इस धर्मानुसारी सनातन गुह्य रहस्यका वर्णन किया है।
युधिष्ठिर बोले— धर्मात्मन् ! आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरा कुल कृतार्थ हो गया। आज आपके दर्शनसे मैं प्रसन्न हूँ, अनुगृहीत हूँ तथा सब पातकोंसे मुक्त हो गया हूँ। महामुने ! यमुनामें स्नान करनेसे क्या पुण्य होता है, कौन-सा फल मिलता है? ये सब बातें आप अपने प्रत्यक्ष अनुभव एवं श्रवणके आधारपर बताइये।
मार्कण्डेयजीने कहा— राजन् ! सूर्य-कन्या यमुना देवी तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। जिस हिमालयसे गङ्गा प्रकट हुई हैं, उसीसे यमुनाका भी आगमन हुआ है। सहस्रों योजन दूरसे भी नामोच्चारण करनेपर वे पापोंका नाश कर देती हैं। युधिष्ठिर ! यमुनामें नहाने, जल पीने और उनके नामका कीर्तन करनेसे मनुष्य पुण्यका भागी होकर कल्याणका दर्शन करता है।
* यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति तस्य देहिनः। तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥
तीर्थानां तु परं तीर्थं नदीनामुत्तमा नदी। मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि ॥
सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा। गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे ॥
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः।
सर्वेषां चैव भूतानां पापोपहतचेतसाम्। गतिरन्यत्र मर्त्यानां नास्ति गङ्गासमा गतिः ॥
पवित्राणां पवित्रं या मङ्गलानां च मङ्गलम्। महेश्वरशिरोभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा॥ (४३। ५२—५६)
स्वर्गखण्ड ] * मार्कण्डेयजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको प्रयागकी महिमा सुनाना * *************************************************************************
यमुनामें गोता लगाने और उनका जल पीनेसे कुलकी सात पीढ़ियाँ पवित्र हो जाती हैं। जिसकी वहाँ मृत्यु होती है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। यमुनाके दक्षिण किनारे विख्यात अग्नितीर्थ है; उसके पश्चिम धर्मराजका तीर्थ है, जिसे हरवरतीर्थ भी कहते हैं। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं तथा जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे फिर जन्म नहीं लेते।
इसी प्रकार यमुनाके दक्षिण-तटपर हजारों तीर्थ हैं। अब मैं उत्तर-तटके तीर्थोंका वर्णन करता हूँ। युधिष्ठिर ! उत्तरमें महात्मा सूर्यका विरज नामक तीर्थ है, जहाँ इन्द्र आदि देवता प्रतिदिन सन्ध्योपासन करते हैं। देवता तथा विद्वान् पुरुष उस तीर्थका सेवन करते हैं। तुम भी श्रद्धापूर्वक दानमें प्रवृत्त होकर उस तीर्थमें स्नान करो। वहाँ और भी बहुत-से तीर्थ हैं, जो सब पापोंको हरनेवाले और शुभ हैं। उनमें स्नान करके मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं तथा जिनकी वहाँ मृत्यु होती है, वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। गङ्गा और यमुना—दोनों ही समान फल देनेवाली मानी गयी हैं; केवल श्रेष्ठताके कारण गङ्गा सर्वत्र पूजित होती हैं। कुन्तीनन्दन ! तुम भी इसी प्रकार सब तीर्थोंमें स्नान करो, इससे जीवनभरका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य सबेरे उठकर इस प्रसङ्गका पाठ या श्रवण करता है, वह भी सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकको जाता है।
युधिष्ठिर बोले— मुने ! मैंने ब्रह्माजीके कहे हुए पुण्यमय पुराणका श्रवण किया है; उसमें सैकड़ों, हजारों और लाखों तीर्थोंका वर्णन आया है। सभी तीर्थ पुण्यजनक और पवित्र बताये गये हैं तथा सबके द्वारा उत्तम गतिकी प्राप्ति बतायी गयी है। पृथ्वीपर नैमिषारण्य और आकाशमें पुष्करतीर्थ पवित्र है। लोकमें प्रयाग और कुरुक्षेत्र दोनोंको ही विशेष स्थान दिया गया है। आप उन सबको छोड़कर केवल एककी ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं ? आप प्रयागसे परम दिव्य गति तथा मनोवाञ्छित भोगोंकी प्राप्ति बताते हैं। थोड़े-से अनुष्ठानके द्वारा अधिक धर्मकी प्राप्ति बताते हुए प्रयागकी ही अधिक प्रशंसा क्यों कर रहे हैं ? यह मेरा संशय है। इस सम्बन्धमें आपने जैसा देखा और सुना हो, उसके अनुसार इस संशयका निवारण कीजिये।
मार्कण्डेयजीने कहा— राजन् ! मैंने जैसा देखा और सुना है, उसके अनुसार प्रयागका माहात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। प्रत्यक्षरूपसे, परोक्ष तथा और जिस प्रकार सम्भव होगा, मैं उसका वर्णन करूँगा। शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्माका परमात्माके साथ जो योग किया जाता है, उस योगकी प्रशंसा की जाती है। हजारों जन्मोंके पश्चात् मनुष्योंको उस योगकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार सहस्रों युगोंमें योगकी उपलब्धि होती है। ब्राह्मणोंको सब प्रकारके रत्न दान करनेसे मानवोंको योगकी उपलब्धि होती है। प्रयागमें मृत्यु होनेपर यह सब कुछ स्वतः सुलभ हो जाता है। जैसे सम्पूर्ण भूतोंमें व्यापक ब्रह्मकी सर्वत्र पूजा होती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण लोकोंमें विद्वानोंद्वारा प्रयाग पूजित होता है। नैमिषारण्य, पुष्कर, गोतीर्थ, सिन्धु-सागर संगम, कुरुक्षेत्र, गया और गङ्गासागर तथा और भी बहुत-से तीर्थ एवं पवित्र पर्वत—कुल मिलाकर तीस करोड़ दस हजार तीर्थ प्रयागमें सदा निवास करते हैं। ऐसा विद्वानोंका कथन है। वहाँ तीन अग्निकुण्ड हैं, जिनके बीच होकर गङ्गा प्रयागसे निकलती हैं। वे सब तीर्थोंसे युक्त हैं। वायु देवताने देवलोक, भूलोक तथा अन्तरिक्षमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ बतलाये हैं। गङ्गाको उन सबका स्वरूप माना गया है।* प्रयाग, प्रतिष्ठानपुर (झूसी), कम्बल और अश्वतर नागोंके स्थान तथा भोगवती—ये प्रजापतिकी वेदियाँ हैं। युधिष्ठिर ! वहाँ देवता, मूर्तिमान् यज्ञ तथा तपस्वी ऋषि रहते और प्रयागकी पूजा करते हैं। प्रयागका यह माहात्म्य धन्य है, यही स्वर्ग प्रदान करनेवाला है, यही सेवन करनेयोग्य है, यही सुखरूप है, यही पुण्यमय है, यही सुन्दर है और यही परम उत्तम, धर्मानुकूल एवं पावन है। यह महर्षियोंका गोपनीय
* तिस्रः कोट्यर्द्धकोटीश्च तीर्थानां वायुरब्रवीत्। दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तत्सर्वं जाह्नवी स्मृता ॥ (४७।७)
३७४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
रहस्य है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। इस प्रसङ्गका पाठ करनेवाला द्विज सब प्रकारके पापोंसे रहित हो जाता है। कुरुनन्दन ! तुम प्रयागके तीर्थोंमें स्नान करो। राजन् ! तुमने विधिपूर्वक प्रश्न किया था, इसलिये मैंने तुमसे प्रयाग-माहात्म्यका वर्णन किया है। इसे सुनकर तुमने अपने समस्त पितरों और पितामहोंका उद्धार कर दिया।
युधिष्ठिर बोले— महामुने ! आपने प्रयाग-माहात्म्यकी यह सारी कथा सुनायी; इसी प्रकार और सब बातें भी बताइये, जिससे मेरा उद्धार हो सके।
मार्कण्डेयजीने कहा— राजन् ! सुनो, बताता हूँ। ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजी—ये तीनों देवता सबके प्रभु और अविनाशी हैं। ब्रह्मा इस सम्पूर्ण जगत्की, यहाँके चराचर प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं और परमेश्वर विष्णु उन सबका, समस्त प्रजाओंका पालन करते हैं। फिर जब कल्पका अन्त उपस्थित होता है, तब भगवान् रुद्र सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं। ये ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी प्रयागमें सदा निवास करते हैं। प्रयागमण्डलका विस्तार पाँच योजन (बीस कोस) है। उपर्युक्त देवता पापकर्मोंका निवारण करते हुए उस मण्डलकी रक्षाके लिये वहाँ मौजूद रहते हैं। अतः प्रयागमें किया हुआ थोड़ा-सा भी पाप नरकमें गिरानेवाला होता है।
सूतजी कहते हैं— तदनन्तर, धर्मपर विश्वास करनेवाले समस्त पाण्डवोंने भाइयोंसहित ब्राह्मणोंको नमस्कार करके गुरुजनों और देवताओंको तृप्त किया। उसी समय भगवान् वासुदेव भी वहाँ आ पहुँचे। फिर समस्त पाण्डवोंने मिलकर भगवान् श्रीकृष्णका पूजन किया। तत्पश्चात् कृष्णसहित सब महात्माओंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको स्वराज्यपर अभिषिक्त किया। इसके बाद भाइयोंसहित धर्मात्मा युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिये। जो सबेरे उठकर इस प्रसङ्गका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें जाता है।
तत्पश्चात् भगवान् वासुदेव बोले— राजा युधिष्ठिर ! मैं आपके स्नेहवश कुछ निवेदन करता हूँ, आपको मेरी बात माननी चाहिये। महाराज ! आप प्रतिदिन हमारे साथ प्रयागका स्मरण करनेसे स्वयं सनातन लोकको प्राप्त होंगे। जो मनुष्य प्रयागको जाता अथवा वहाँ निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर दिव्यलोकको जाता है। जो किसीका दिया हुआ दान नहीं लेता, संतुष्ट रहता, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखता, पवित्र रहता और अहङ्कारका त्याग कर देता है, उसीको तीर्थका पूरा फल मिलता है। राजेन्द्र ! जो क्रोधहीन, सत्यवादी, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला तथा सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मभाव रखनेवाला है, वही तीर्थके फलका उपभोग करता है।* ऋषियों और देवताओंने भी क्रमशः यज्ञोंका वर्णन किया है, किन्तु
* प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो नियतः शुचिः। अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥
अकोपनश्च राजेन्द्र सत्यवादी दृढव्रतः। आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ॥ (स्वर्ग० ४९ । १०-११)
८७-भगवान्के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा
स्वर्गखण्ड ] * भगवान्के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा * ३
महाराज ! दरिद्र मनुष्य यज्ञ नहीं कर सकते। यज्ञमें बहुत सामग्रीकी आवश्यकता होती है। नाना प्रकारकी तैयारियाँ और समारोह करने पड़ते हैं। कहीं कोई धनवान् मनुष्य ही भाँति-भाँतिके द्रव्योंका उपयोग करके यज्ञ कर सकता है। नरेश्वर ! जिसे विद्वान् पुरुष दरिद्र होनेपर भी कर सकें तथा जो पुण्य और फलमें यज्ञकी समानता करता हो, वह उपाय बताता हूँ; सुनिये। भरतश्रेष्ठ ! यह ऋषियोंका गोपनीय रहस्य है; तीर्थयात्राका पुण्य यज्ञोंसे भी बढ़कर होता है। एक खरब, तीस करोड़से भी अधिक तीर्थ माघमासमें गङ्गाजीके भीतर आकर स्थित होते हैं [अतः माघमें गङ्गा-स्नान परम पुण्यका साधक होता है]* महाराज ! अब आप निश्चिन्त होकर अकण्टक राज्य भोगिये। अब फिर अश्वमेध यज्ञके समय मुझसे आपकी भेंट होगी।
भगवान्के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा
ऋषय ऊचुः
भवता कथितं सर्वं यत्किञ्चित् पृष्टमेव च।
इदानीमपि पृच्छाम एकं वद महामते ॥ १॥
**ऋषियोंने कहा—**महामते ! हमलोगोंने जो कुछ पूछा था, वह सब आपने कह सुनाया। अब भी आपसे एक प्रश्न करते हैं, उसका उत्तर दीजिये।
एतेषां खलु तीर्थानां सेवनाद्यत् फलं भवेत्।
सर्वेषां किल कृत्वैकं कर्म केन च लभ्यते।
एतन्नो ब्रूहि सर्वज्ञ कर्मैवं यदि वर्तते ॥ २॥
इन सभी तीर्थोंके सेवनसे जो फल होता है, वही कौन-सा एक कर्म करनेसे प्राप्त हो सकता है ? सर्वज्ञ सूतजी ! यदि ऐसा कोई कर्म हो तो उसे हमें बताइये।
सूत उवाच
कर्मयोगः किल प्रोक्तो वर्णानां द्विजपूर्वशः।
नानाविधो महाभागास्तत्र चैकं विशिष्यते ॥ ३॥
महाभाग महर्षिगण ! [शास्त्रोंमें] ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये निश्चय ही नाना प्रकारके कर्मयोगका वर्णन किया गया है, परन्तु उसमें एक ही बात सबसे बढ़कर है।
हरिभक्तिः कृता येन मनसा कर्मणा गिरा।
जितं तेन जितं तेन जितमेव न संशयः ॥ ४॥
जिसने मन, वाणी और क्रियाद्वारा श्रीहरिकी भक्ति की है, उसने बाजी मार ली, उसने विजय प्राप्त कर ली, उसकी निश्चय ही जीत हो गयी—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
हरिरेव समाराध्यः सर्वदेवेश्वरेश्वरः।
हरिनाममहामन्त्रैर्नश्येत् पापपिशाचकम् ॥ ५॥
सम्पूर्ण देवेश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् श्रीहरिकी ही भलीभाँति आराधना करनी चाहिये। हरिनामरूपी महामन्त्रोंके द्वारा पापरूपी पिशाचोंका समुदाय नष्ट हो जाता है।
हरेः प्रदक्षिणां कृत्वा सकृदप्यमलाशयाः।
सर्वतीर्थसमागाहं लभन्ते यन्न संशयः ॥ ६॥
एक बार भी श्रीहरिकी प्रदक्षिणा करके मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका जो फल होता है, उसे प्राप्त कर लेते हैं—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
प्रतिमां च हरेर्दृष्ट्वा सर्वतीर्थफलं लभेत्।
विष्णुनाम परं जप्त्वा सर्वमन्त्रफलं लभेत् ॥ ७॥
मनुष्य श्रीहरिकी प्रतिमाका दर्शन करके सब तीर्थोंका फल प्राप्त करता है तथा विष्णुके उत्तम नामका जप करके सम्पूर्ण मन्त्रोंके जपका फल पा लेता है।
विष्णुप्रसादतुलसीमाघ्राय द्विजसत्तमाः।
प्रचण्डं विकरालं तद् यमस्यास्यं न पश्यति ॥ ८॥
* ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम। तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते॥
दशकोटिसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथापरे। माघमासे तु गङ्गायां गमिष्यन्ति नरर्षभ॥ (स्वर्ग० ४९। १५-१६)
३७६ * अर्चयध्वं हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
द्विजवरो ! भगवान् विष्णुके प्रसादस्वरूप तुलसीदलको सूँघकर मनुष्य यमराजके प्रचण्ड एवं विकराल मुखका दर्शन नहीं करता।
सकृत्प्रणामी कृष्णस्य मातुः स्तन्यं पिबेन्न हि।
हरिपादे मनो येषां तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥ ९॥
एक बार भी श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला मनुष्य पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता—उसका दूसरा जन्म नहीं होता। जिन पुरुषोंका चित्त श्रीहरिके चरणोंमें लगा है, उन्हें प्रतिदिन मेरा बारंबार नमस्कार है।
पुल्कसः श्वपचो वापि ये चान्ये म्लेच्छजातयः ।
तेऽपि वन्द्या महाभागा हरिपादैकसेवकाः ॥ १० ॥
पुल्कस, श्वपच (चाण्डाल) तथा और भी जो म्लेच्छ जातिके मनुष्य हैं, वे भी यदि एकमात्र श्रीहरिके चरणोंकी सेवामें लगे हों तो वन्दनीय और परम सौभाग्यशाली हैं।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
हरौ भक्तिं विधायैव गर्भवासं न पश्यति ॥ ११ ॥
फिर जो पुण्यात्मा ब्राह्मण और राजर्षि भगवान्के भक्त हों, उनकी तो बात ही क्या है। भगवान् श्रीहरिकी भक्ति करके ही मनुष्य गर्भवासका दुःख नहीं देखता।
हरेरग्रे स्वनैरुच्चैर्नृत्यंस्तन्नामकृन्नरः ।
पुनाति भुवनं विप्रा गङ्गादि सलिलं यथा ॥ १२ ॥
ब्राह्मणो ! भगवान्के सामने उच्चस्वरसे उनके नामोंका कीर्तन करते हुए नृत्य करनेवाला मनुष्य गङ्गा आदि नदियोंके जलकी भाँति समस्त संसारको पवित्र कर देता है।
दर्शनात् स्पर्शनात्तस्य आलापादपि भक्तितः ।
ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १३ ॥
उस भक्तके दर्शन और स्पर्शसे, उसके साथ वार्तालाप करनेसे तथा उसके प्रति भक्तिभाव रखनेसे मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
हरेः प्रदक्षिणं कुर्वन्नुच्चैस्तन्नामकृन्नरः ।
करतालादिसंधानं सुस्वरं कलशब्दितम् ।
ब्रह्महत्यादिकं पापं तेनैव करतालितम् ॥ १४ ॥
जो श्रीहरिकी प्रदक्षिणा करते हुए करताल आदि बजाकर मधुर स्वर तथा मनोहर शब्दोंमें उनके नामोंका कीर्तन करता है, उसने ब्रह्महत्या आदि पापोंको मानो ताली बजाकर भगा दिया।
हरिभक्तिकथामुक्ताख्यायिकां शृणुयाच्च यः ।
तस्य संदर्शनादेव पूतो भवति मानवः ॥ १५ ॥
जो हरिभक्ति-कथारूपी मुक्तामयी आख्यायिकाका श्रवण करता है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पवित्र हो जाता है।
किं पुनस्तस्य पापानामाशा मुनिपुङ्गवाः ।
तीर्थानां च परं तीर्थं कृष्णनाम महर्षयः ॥ १६ ॥
मुनिवरो ! फिर उसके विषयमें पापोंकी आशङ्का क्या रह सकती है। महर्षियो ! श्रीकृष्णका नाम सब तीर्थोंमें परम तीर्थ है।
तीर्थीकुर्वन्ति जगतीं गृहीतं कृष्णनाम यैः ।
तस्मान्मुनिवराः पुण्यं नातः परतरं विदुः ॥ १७ ॥
जिन्होंने श्रीकृष्ण-नामको अपनाया है, वे पृथ्वीको तीर्थ बना देते हैं। इसलिये श्रेष्ठ मुनिजन इससे बढ़कर पावन वस्तु और कुछ नहीं मानते।
विष्णुप्रसादमिनिर्माल्यं भुक्त्वा धृत्वा च मस्तके ।
विष्णुरेव भवेन्मर्त्यो यमशोकविनाशनः ।
अर्चनीयो नमस्कार्यो हरिरेव न संशयः ॥ १८ ॥
श्रीविष्णुके प्रसादभूत निर्माल्यको खाकर और मस्तकपर धारण करके मनुष्य साक्षात् विष्णु ही हो जाता है। वह यमराजसे होनेवाले शोकका नाश करनेवाला होता है; वह पूजन और नमस्कारके योग्य साक्षात् श्रीहरिका ही स्वरूप है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
ये हीमं विष्णुमव्यक्तं देवं वापि महेश्वरम् ।
एकीभावेन पश्यन्ति न तेषां पुनरुद्भवः ॥ १९ ॥
जो इन अव्यक्त विष्णु तथा भगवान् महेश्वरको एक भावसे देखते हैं, उनका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता।
तस्मादनादिनिधनं विष्णुमात्मानमव्ययम् ।
हरं चैकं प्रपद्यध्वं पूजयध्वं तथैव हि ॥ २० ॥
अतः महर्षियो ! आप आदि-अन्तसे रहित
स्वर्गखण्ड ]
*भगवान्के भजन एवं नाम-कीर्तनकी महिमा*
[ वाम स्तम्भ ]
अविनाशी परमात्मा विष्णु तथा महादेवजीको एक भावसे देखें तथा एक समझकर ही उनका पूजन करें।
येऽसमानं प्रपश्यन्ति हरिं वै देवतान्तरम्।
ते यान्ति नरकान् घोरान्न तांस्तु गणयेद्धरिः ॥ २१ ॥
जो 'हरि' और 'हर' को समान भावसे नहीं देखते, श्रीहरिको दूसरा देवता समझते हैं, वे घोर नरकमें पड़ते हैं; उन्हें श्रीहरि अपने भक्तोंमें नहीं गिनते।
मूर्खं वा पण्डितं वापि ब्राह्मणं केशवप्रियम्।
श्वपाकं वा मोचयति नारायणः स्वयं प्रभुः ॥ २२ ॥
पण्डित हो या मूर्ख, ब्राह्मण हो या चाण्डाल, यदि वह भगवान्का प्यारा भक्त है तो स्वयं भगवान् नारायण उसे संकटोंसे छुड़ाते हैं।
नारायणात्परो नास्ति पापराशिदवानलः।
कृत्वापि पातकं घोरं कृष्णनाम्ना विमुच्यते ॥ २३ ॥
भगवान् नारायणसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो पापपुञ्जरूपी वनको जलानेके लिये दावानलके समान हो। भयङ्कर पातक करके भी मनुष्य श्रीकृष्ण-नामके उच्चारणसे मुक्त हो जाता है।
स्वयं नारायणो देवः स्वनाम्नि जगतां गुरुः।
आत्मनोऽभ्यधिकां शक्तिं स्थापयामास सुव्रताः ॥ २४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षियो ! जगद्गुरु भगवान् नारायणने स्वयं ही अपने नाममें अपनेसे भी अधिक शक्ति स्थापित कर दी है।
अत्र ये विवदन्ते वा आयासलघुदर्शनात्।
फलानां गौरवाच्चापि ते यान्ति नरकं बहु ॥ २५ ॥
नाम-कीर्तनमें परिश्रम तो थोड़ा होता है, किन्तु फल भारी-से-भारी प्राप्त होता है—यह देखकर जो लोग इसकी महिमाके विषयमें तर्क उपस्थित करते हैं, वे अनेकों बार नरकमें पड़ते हैं।
तस्माद्धरौ भक्तिमान् स्याद्धरिनामपरायणः।
पूजकं पृष्ठतो रक्षेन्नामिनं वक्षसि प्रभु ॥ २६ ॥
इसलिये हरिनामकी शरण लेकर भगवान्की भक्ति करनी चाहिये। प्रभु अपने पुजारीको तो पीछे रखते हैं; किन्तु नाम-जप करनेवालेको छातीसे लगाये रहते हैं।
[ दक्षिण स्तम्भ ]
हरिनाममहावज्रं पापपर्वतदारणम्।
तस्य पादौ तु सफलौ तदर्थगतिशालिनौ ॥ २७ ॥
हरिनामरूपी महान् वज्र पापोंके पहाड़को विदीर्ण करनेवाला है। जो भगवान्की ओर आगे बढ़ते हों, मनुष्यके वे ही पैर सफल हैं।
तावेव धन्यावाख्यातौ यौ तु पूजाकरौ करौ।
उत्तमाङ्गमूत्तमाङ्गं तद्धरौ नम्रमेव यत् ॥ २८ ॥
वे ही हाथ धन्य कहे गये हैं, जो भगवान्की पूजामें संलग्न रहते हैं। जो मस्तक भगवान्के आगे झुकता हो, वही उत्तम अङ्ग है।
सा जिह्वा या हरिं स्तौति तन्मनस्तत्पदानुगम्।
तानि लोमानि चोच्यन्ते यानि तन्नाम्नि चोत्थितम् ॥ २९ ॥
कुर्वन्ति तद्य नेत्राम्बु यदच्युतप्रसङ्गतः।
जीभ वही श्रेष्ठ है, जो भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करती है। मन भी वही अच्छा है, जो उनके चरणोंका अनुगमन—चिन्तन करता है तथा रोएँ भी वे ही सार्थक कहलाते हैं, जो भगवान्का नाम लेनेपर खड़े हो जाते हैं। इसी प्रकार आँसू वे ही सार्थक हैं, जो भगवान्की चर्चाके अवसरपर निकलते हैं।
अहो लोका अतितरां दैवदोषेण वञ्चिताः ॥ ३० ॥
नामोच्चारणमात्रेण मुक्तिदं न भजन्ति वै।
अहो ! संसारके लोग भाग्यदोषसे अत्यन्त वञ्चित हो रहे हैं, क्योंकि वे नामोच्चारणमात्रसे मुक्ति देनेवाले भगवान्का भजन नहीं करते।
वञ्चितास्ते च कलुषाः स्त्रीणां सङ्गप्रसङ्गतः ॥ ३१ ॥
प्रतिष्ठन्ति च लोमानि येषां नो कृष्णशब्दने।
स्त्रियोंके स्पर्श एवं चर्चासे जिन्हें रोमाञ्च हो आता है, श्रीकृष्णका नाम लेनेपर नहीं, वे मलिन तथा कल्याणसे वञ्चित हैं।
ते मूर्खा ह्यकृतात्मानः पुत्रशोकादिविह्वलाः ॥ ३२ ॥
रुदन्ति बहुलालापैर्न कृष्णाक्षरकीर्तने।
जो अजितेन्द्रिय पुरुष पुत्रशोकादिसे व्याकुल होकर अत्यन्त विलाप करते हुए रोते हैं, किन्तु श्रीकृष्णनामके अक्षरोंका कीर्तन करते हुए नहीं रोते, वे मूर्ख हैं।
८८-ब्रह्मचारीके पालन करनेयोग्य नियम
३७८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
जिह्वां लब्ध्वापि लोकेऽस्मिन् कृष्णनाम जपेन्न हि ॥ ३३ ॥
लब्ध्वापि मुक्तिसोपानं हेलयैव च्यवन्ति ते।
जो इस लोकमें जीभ पाकर भी श्रीकृष्णनामका जप नहीं करते, वे मोक्षतक पहुँचनेके लिये सीढ़ी पाकर भी अवहेलनावश नीचे गिरते हैं।
तस्माद्यत्नेन वै विष्णुं कर्मयोगेन मानवः ॥ ३४ ॥
कर्मयोगार्चितो विष्णुः प्रसीदत्येव नान्यथा।
तीर्थादप्यधिकं तीर्थं विष्णोर्भजनमुच्यते ॥ ३५ ॥
इसलिये मनुष्यको उचित है कि वह कर्मयोगके द्वारा भगवान् विष्णुकी यत्नपूर्वक आराधना करे। कर्मयोगसे पूजित होनेपर ही भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं, अन्यथा नहीं। भगवान् विष्णुका भजन तीर्थोंसे भी अधिक पावन तीर्थ कहा गया है।
सर्वेषां खलु तीर्थानां स्नानपानावगाहनैः।
यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्फलं कृष्णसेवनात् ॥ ३६ ॥
सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने, उनका जल पीने और उनमें गोता लगानेसे मनुष्य जिस फलको पाता है, वह श्रीकृष्णके सेवनसे प्राप्त हो जाता है।
यजन्ते कर्मयोगेन धन्या एव नरा हरिम्।
तस्माद्यजध्वं मुनयः कृष्णं परममङ्गलम् ॥ ३७ ॥
भाग्यवान् मनुष्य ही कर्मयोगके द्वारा श्रीहरिका पूजन करते हैं। अतः मुनियो ! आपलोग परम मङ्गलमय श्रीकृष्णकी आराधना करें।
ब्रह्मचारीके पालन करनेयोग्य नियम
ऋषियोंने पूछा— सूतजी ! कर्मयोग कैसे किया जाता है, जिसके द्वारा आराधना करनेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ? महाभाग ! आप वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं; अतः हमें यह बात बताइये। जिसके द्वारा मुमुक्षु पुरुष सबके ईश्वर भगवान् श्रीहरिकी आराधना कर सकें, वह समस्त लोकोंकी रक्षा करनेवाला धर्म क्या वस्तु है ? उसका वर्णन कीजिये। उसके श्रवणकी इच्छासे ये ब्राह्मणलोग आपके सामने बैठे हैं।
सूतजी बोले— महर्षियो ! पूर्वकालमें अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंने सत्यवतीके पुत्र व्यासजीसे ऐसा ही प्रश्न किया था। उसके उत्तरमें उन्होंने जो कुछ कहा था, उसे आपलोग सुनिये।
व्यासजीने कहा— ऋषियो ! मैं सनातन कर्मयोगका वर्णन करूँगा, तुम सब लोग ध्यान देकर सुनो। कर्मयोग ब्राह्मणोंको अक्षय फल प्रदान करनेवाला है। पहलेकी बात है, प्रजापति मनुने श्रोता बनकर बैठे हुए ऋषियोंके समक्ष ब्राह्मणोंके लाभके लिये वेदप्रसिद्ध सम्पूर्ण विषयोंका उपदेश किया था। वह उपदेश सम्पूर्ण पापोंको हरनेवाला, पवित्र और मुनि-समुदायद्वारा सेवित है; मैं उसीका वर्णन करता हूँ, तुमलोग एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो। श्रेष्ठ ब्राह्मणको उचित है कि वह अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार गर्भ या जन्मसे आठवें वर्षमें उपनयन होनेके पश्चात् वेदोंका अध्ययन आरम्भ करे। दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत और हिंसारहित
स्वर्गखण्ड ] * ब्रह्मचारीके पालन करनेयोग्य नियम * ३७९
काला मृगचर्म धारण किये मुनिवेषमें रहे, भिक्षाका अन्न ग्रहण करे और गुरुका मुँह जोहते हुए सदा उनके हितमें संलग्न रहे। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें यज्ञोपवीत बनानेके लिये ही कपास उत्पन्न किया था। ब्राह्मणोंके लिये तीन आवृत्ति करके बनाया हुआ यज्ञोपवीत शुद्ध माना गया है। द्विजको सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहना चाहिये। अपनी शिखाको सदा बाँधे रखना चाहिये। इसके विपरीत बिना यज्ञोपवीत पहने और बिना शिखा बाँधे जो कर्म किया जाता है, वह विधिपूर्वक किया हुआ नहीं माना जाता। वस्त्र रूई-जैसा सफेद हो या गेरुआ। फटा न हो, तभी उसे ओढ़ना चाहिये तथा वही पहननेके योग्य माना गया है। इनमें भी श्वेत वस्त्र अत्यन्त उत्तम है। उससे भी उत्तम और शुभ आच्छादन काला मृगचर्म माना गया है। जनेऊ गलेमें डालकर दाहिना हाथ उसके ऊपर कर ले और बायीं बाँह [अथवा कंधे] पर उसे रखे तो वह ‘उपवीत’ कहलाता है। यज्ञोपवीतको सदा इसी तरह रखना चाहिये। कण्ठमें मालाकी भाँति पहना हुआ जनेऊ ‘निवीत’ कहा गया है। ब्राह्मणो! बायीं बाँह बाहर निकालकर दाहिनी बाँह या कंधेपर रखे हुए जनेऊको ‘प्राचीनावीत’ (अपसव्य) कहते हैं। इसका पितृ-कार्य (श्राद्ध-तर्पण आदि) में उपयोग करना चाहिये। हवन-गृहमें, गोशालामें, होम और जपके समय, स्वाध्यायमें, भोजनकालमें, ब्राह्मणोंके समीप रहनेपर, गुरुजनों तथा दोनों कालकी संध्याकी उपासनाके समय तथा साधु पुरुषोंसे मिलनेपर सदा उपवीतके ढंगसे ही जनेऊ पहनना चाहिये—यही सनातन विधि है। ब्राह्मणके लिये तीन आवृत्ति की हुई मूँजकी ही मेखला बनानी चाहिये। मूँज न मिलनेपर कुशसे भी मेखला बनानेका विधान है। मेखलामें गाँठ एक या तीन होनी चाहिये। द्विज बाँस अथवा पलाशका दण्ड धारण करे। दण्ड उसके पैरसे लेकर सिरके केशतक लंबा होना चाहिये। अथवा किसी भी यज्ञोपयोगी वृक्षका दण्ड, जो सुन्दर और छिद्र आदिसे रहित हो, वह धारण कर सकता है।
द्विज सबेरे और सायंकालमें एकाग्रचित्त होकर संध्योपासन करे। जो काम, लोभ, भय अथवा मोहवश संध्योपासन त्याग देता है, वह गिर जाता है। संध्या करनेके पश्चात् द्विज प्रसन्नचित्त होकर सायंकाल और प्रातःकालमें अग्निहोत्र करे। फिर दुबारा स्नान करके देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करे। इसके बाद पत्र, पुष्प, फल, जौ और जल आदिसे देवताओंकी पूजा करे। प्रतिदिन आयु और आरोग्यकी सिद्धिके लिये तन्द्रा और आलस्य आदिका परित्याग करके ‘मैं अमुक हूँ और आपको प्रणाम करता हूँ’ इस प्रकार अपने नाम, गोत्र आदिका परिचय देते हुए धर्मतः अपनेसे बड़े पुरुषोंको विधिपूर्वक प्रणाम करे और इस प्रकार गुरुजनोंको नमस्कार करनेका स्वभाव बना ले। नमस्कार करनेवाले ब्राह्मणको बदलेमें ‘आयुष्मान् भव सौम्य!’ कहना चाहिये तथा उसके नामके अन्तमें प्लुताकारका उच्चारण करना चाहिये। यदि नाम हलन्त हो, तो अन्तिम हल्के आदिका अक्षर प्लुत बोलना चाहिये।* जो
* पाणिनिने भी 'प्रत्यभिवादेऽशूद्रे' (८। २ । ८३)—इस सूत्रके द्वारा इस नियमका उल्लेख किया है। इसके अनुसार आशीर्वाद वाक्यके 'टि' को 'प्लुत' स्वरसे बोला जाता है। किन्तु उस वाक्यके अन्तमें प्रणाम करनेवालेका नाम या 'सौम्य' आदि पद ही प्रयुक्त होते हैं। यदि नाम स्वरान्त हो तो अन्तिम अक्षरको ही 'टि' संज्ञा प्राप्त होगी और यदि हलन्त हुआ तो अन्तिम अक्षरके पूर्ववर्ती स्वरको 'टि' माना जायगा; उसीका प्लुत-उच्चारण होगा। ह्रस्वका उच्चारण एक मात्राका, दीर्घका दो मात्राका और प्लुतका तीन मात्राका होता है। अतः ह्रस्वके उच्चारणमें जितना समय लगता है, उससे तिगुने समयमें प्लुतका ठीक उच्चारण होता है। यह नियम ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य—तीनों वर्णोंके पुरुषोंके लिये लागू होता है। यदि प्रणाम करनेवाला शूद्र या स्त्री हो तो उसे आशीर्वाद देते समय उसके नामका अन्तिम अक्षर प्लुत नहीं बोला जाता। प्रणाम-वाक्य इस प्रकार होना चाहिये—'अमुक, गोत्रः अमुकशर्माहं (वर्माहं गुप्तोऽहं वा) भवन्तमभिवादये।' आशीर्वाद-वाक्य ऐसा होना चाहिये—'आयुष्मान् भव सौम्य ३ आयुष्मानेधीन्द्रशर्म ३ न्, आयुष्मानेधीन्द्रवर्म ३ न् अथवा आयुष्मानेधीन्द्रगुप्त ३, इत्यादि। जो इस प्रकार आशीर्वाद देना जानता हो उसीको उक्त विधिसे नाम-गोत्रादिका उच्चारण करके प्रणाम करना चाहिये; जो न जाने, उससे 'अयमहं प्रणमामि' आदि साधारण वाक्य बोलना चाहिये।
३८० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
ब्राह्मण प्रणामके बदले उत्तररूपसे आशीर्वाद देनेकी विधि नहीं जानता, वह विद्वान् पुरुषके द्वारा प्रणाम करनेके योग्य नहीं है। जैसा शूद्र है, वैसा ही वह भी है। अपने दोनों हाथोंको विपरीत दिशामें करके गुरुके चरणोंका स्पर्श करना उचित है। अर्थात् अपने बायें हाथसे गुरुके बायें चरणका और दाहिने हाथसे दाहिने चरणका स्पर्श करना चाहिये। शिष्य जिनसे लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करता है, उन गुरुदेवको वह पहले प्रणाम करे।
जल, भिक्षा, फूल और समिधा—इन्हें दूसरे दिनके लिये संग्रह न करे—प्रतिदिन जाकर आवश्यकताके अनुसार ले आये। देवताके निमित्त किये जानेवाले कार्योंमें भी जो इस तरहके दूसरे-दूसरे आवश्यक सामान हैं, उनका भी अन्य समयके लिये संग्रह न करे। ब्राह्मणसे भेंट होनेपर कुशल पूछे, क्षत्रियसे अनामय, वैश्यसे क्षेम और शूद्रसे आरोग्यका प्रश्न करे। उपाध्याय (गुरु), पिता, बड़े भाई, राजा, मामा, श्वशुर, नाना, दादा, वर्णमें अपनेसे श्रेष्ठ व्यक्ति तथा पिताका भाई—ये पुरुषोंमें गुरु माने गये हैं। माता, नानी, गुरुपत्नी, बुआ, मौसी, सास, दादी, बड़ी बहिन और दूध पिलानेवाली धाय—इन्हें स्त्रियोंमें गुरु माना गया है। यह गुरुवर्ग माता और पिताके सम्बन्धसे है, ऐसा जानना चाहिये तथा मन, वाणी और शरीरकी क्रियाद्वारा इनके अनुकूल आचरण करना चाहिये। गुरुजनोंको देखते ही उठकर खड़ा हो जाय और हाथ जोड़कर प्रणाम करे। इनके साथ एक आसनपर न बैठे। इनसे विवाद न करे। अपने जीवनकी रक्षाके लिये भी गुरुजनोंके साथ द्वेषपूर्वक बातचीत न करे। अन्य गुणोंके द्वारा ऊँचा उठा हुआ पुरुष भी गुरुजनोंसे द्वेष करनेके कारण नीचे गिर जाता है। समस्त गुरुजनोंमें भी पाँच विशेष रूपसे पूज्य हैं। उन पाँचोंमें भी पहले पिता, माता और आचार्य—ये तीन सर्वश्रेष्ठ हैं। उनमें भी माता सबसे अधिक सम्मानके योग्य है। उत्पन्न करनेवाला पिता, जन्म देनेवाली माता, विद्याका उपदेश देनेवाला गुरु, बड़ा भाई और स्वामी—ये पाँच परमपूज्य गुरु माने गये हैं। कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि अपने पूर्ण प्रयत्नसे अथवा प्राण त्यागकर भी इन पाँचोंका विशेष रूपसे सम्मान करे। जबतक पिता और माता—ये दोनों जीवित हों, तबतक सब कुछ छोड़कर पुत्र उनकी सेवामें संलग्न रहे। पिता-माता यदि पुत्रके गुणोंसे भलीभाँति प्रसन्न हों, तो वह पुत्र उनकी सेवारूप कर्मसे ही सम्पूर्ण धर्मोंका फल प्राप्त कर लेता है। माताके समान देवता और पिताके समान गुरु दूसरा नहीं है। उनके किये हुए उपकारोंका बदला भी किसी तरह नहीं हो सकता। अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा उन दोनोंका प्रिय करना चाहिये; उनकी आज्ञाके बिना दूसरे किसी धर्मका आचरण न करे।* परन्तु यह निषेध मोक्षरूपी फल देनेवाले नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको छोड़कर ही लागू होता है। [मोक्षके साधनभूत नित्य-नैमित्तिक कर्म अनिवार्य हैं, उनका अनुष्ठान होना ही चाहिये; उनके लिये किसीकी अनुमति लेना आवश्यक नहीं है।] यह धर्मके सार-तत्त्वका उपदेश किया गया है। यह मृत्युके बाद भी अनन्त फलको देनेवाला है। उपदेशक गुरुकी विधिवत् आराधना करके उनकी आज्ञासे घर लौटनेवाला शिष्य इस लोकमें विद्याका फल भोगता है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गमें जाता है।
* गुरूणामपि सर्वेषां पञ्च पूज्या विशेषतः। तेषामाद्यास्त्रयः श्रेष्ठास्तेषां माता सुपूजिता ॥
यो भावयति या सूते येन विद्योपदिश्यते। ज्येष्ठो भ्राता च भर्ता च पञ्चैते गुरवः स्मृताः ॥
आत्मनः सर्वयत्नेन प्राणत्यागेन वा पुनः। पूजनीया विशेषेण पञ्चैते भूतिमिच्छता ॥
यावत् पिता च माता च द्वावेतौ निर्विकारिणौ। तावत्सर्वं परित्यज्य पुत्रः स्यात्तत्परायणः ॥
पिता माता च सुप्रीतौ स्यातां पुत्रगुणैर्यदि। स पुत्रः सकलं धर्मं प्राप्नुयात्तेन कर्मणा ॥
नास्ति मातृसमं दैवं नास्ति पितृसमो गुरुः। तयोः प्रत्युपकारोऽपि न कथंचन विद्यते ॥
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यात् कर्मणा मनसा गिरा। न ताभ्यामननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्॥ (५१। ३५—४१)
स्वर्गखण्ड ] * ब्रह्मचारीके पालन करनेयोग्य नियम * ३८१
ज्येष्ठ भ्राता पिताके समान है; जो मूर्ख उसका अपमान करता है, वह उस पापके कारण मृत्युके बाद घोर नरकमें पड़ता है। सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाले पुरुषको स्वामीका सदा सम्मान करना चाहिये। इस संसारमें माताका अधिक उपकार है; इसलिये उसका अधिक गौरव माना गया है। मामा, चाचा, श्वशुर, ऋत्विज और गुरुजनोंसे 'मै अमुक हूँ' ऐसा कहकर बोले और खड़ा होकर उनका स्वागत करे। यज्ञमें दीक्षित पुरुष यदि अवस्थामें अपनेसे छोटा हो, तो भी उसे नाम लेकर नहीं बुलाना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको उचित है कि वह उससे 'भोः !' और 'भवत्' (आप) आदि कहकर बात करे। ब्राह्मण और क्षत्रिय आदिके द्वारा भी वह सदा सादर नमस्कारके योग्य और पूजनीय है। उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम करना चाहिये। क्षत्रिय आदि यदि ज्ञान, उत्तम कर्म एवं श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त होते हुए अनेक शास्त्रोंके विद्वान् हों, तो भी ब्राह्मणके द्वारा नमस्कारके योग्य कदापि नहीं हैं। ब्राह्मण अन्य सभी वर्णोंके लोगोंसे स्वस्ति कहकर बोले—यह श्रुतिकी आज्ञा है। एक वर्णके पुरुषको अपने समान वर्णवालोंको प्रणाम ही करना चाहिये। समस्त वर्णोंके गुरु ब्राह्मण हैं, ब्राह्मणोंके गुरु अग्नि, हैं, स्त्रीका एकमात्र गुरु पति है और अतिथि सबका गुरु है। विद्या, कर्म, वय, भाई-बन्धु और कुल—ये पाँच सम्मानके कारण बताये गये हैं। इनमें पिछलोंकी अपेक्षा पहले उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं।* ब्राह्मणादि तीन वर्णोंमें जहाँ इन पाँचोंमेंसे अधिक एवं प्रबल गुण होते हैं, वही सम्मानके योग्य समझा जाता है। दसवीं (९० वर्षसे ऊपरकी) अवस्थाको प्राप्त हुआ शूद्र भी सम्मानके योग्य होता है। ब्राह्मण, स्त्री, राजा, नेत्रहीन, वृद्ध, भारसे पीड़ित मनुष्य, रोगी तथा दुर्बलको जानेके लिये मार्ग देना चाहिये।†
ब्रह्मचारी प्रतिदिन मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए शिष्ट पुरुषोंके घरोंसे भिक्षा ले आये तथा गुरुको निवेदन कर दे। फिर गुरु उसमेंसे जितना भोजनके लिये दें, उनकी आज्ञाके अनुसार उतना ही लेकर मौनभावसे भोजन करे। उपनयन-संस्कारसे युक्त श्रेष्ठ ब्राह्मण 'भवत्' शब्दका पहले प्रयोग करके अर्थात् 'भवति भिक्षां मे देहि' कहकर भिक्षा माँगे। क्षत्रिय ब्रह्मचारी वाक्यके बीचमें और वैश्य अन्तमें 'भवत्' शब्दका प्रयोग करे, अर्थात् क्षत्रिय 'भिक्षां भवति मे देहि' और वैश्य 'भिक्षां मे देहि भवति' कहे। ब्रह्मचारी सबसे पहले अपनी माता, बहिन अथवा मौसीसे भिक्षा माँगे। अपने सजातीय लोगोंके घरोंमें ही भिक्षा माँगे अथवा सभी वर्णोंके घरसे भिक्षा ले आये। भिक्षाके सम्बन्धमें दोनों ही प्रकारका विधान मिलता है। किन्तु पतित आदिके घरसे भिक्षा लाना वर्जित है। जिनके यहाँ वेदाध्ययन और यज्ञोंकी परम्परा बंद नहीं है, जो अपने कर्मके लिये सर्वत्र प्रशंसित हैं, उन्हींके घरोंसे जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी प्रतिदिन भिक्षा ले आये। गुरुके कुलमें भिक्षा न माँगे। अपने कुटुम्ब, कुल और सम्बन्धियोंके यहाँ भी भिक्षाके लिये न जाय। यदि दूसरे घर न मिलें तो यथासम्भव ऊपर बताये हुए पूर्व-पूर्व गृहोंका परित्याग करके भिक्षा ले सकता है। यदि पूर्वकथनानुसार योग्य घर मिलना असम्भव हो जाय तो समूचे गाँवमें भिक्षाके लिये विचरण करे। उस समय मनको काबूमें रखकर मौन रहे और इधर-उधर दृष्टि न डाले।
इस प्रकार सरलभावसे आवश्यकतानुसार भिक्षाका संग्रह करके भोजन करे। सदा जितेन्द्रिय रहे। मौन रहकर एवं एकाग्रचित्त हो व्रतका पालन करनेवाला ब्रह्मचारी प्रतिदिन भिक्षाके अन्नसे ही जीवन-निर्वाह करे, एक स्थानका अन्न न खाय। भिक्षासे किया हुआ निर्वाह ब्रह्मचारीके लिये उपवासके समान माना गया है। ब्रह्मचारी भोजनको सदा सम्मानकी दृष्टिसे देखे। गर्वमें
* गुरुर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः॥
विद्या कर्म वयो बन्धुः कुलं भवति पञ्चमम्। मान्यस्थानानि पञ्चाहुः पूर्वं पूर्वं गुरूत्तरत्॥ (५१। ५१-५२)
† पन्था देयो ब्राह्मणाय स्त्रियै राज्ञे विचक्षुषे। वृद्धाय भारभग्नाय रोगिणे दुर्बलाय च॥ (५१। ५४)
३८२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [संक्षिप्त पद्मपुराण
आकर अन्नकी गर्हणा न करे। उसे देखकर हर्ष प्रकट करे। मनमें प्रसन्न हो और सब प्रकारसे उसका अभिनन्दन करे। अधिक भोजन आरोग्य, आयु और स्वर्गलोककी प्राप्तिमें हानि पहुँचानेवाला है; वह पुण्यका नाशक और लोक-निन्दित है। इसलिये उसका परित्याग कर देना चाहिये। पूर्वाभिमुख होकर अथवा सूर्यकी ओर मुँह करके अन्नका भोजन करना उचित है। उत्तराभिमुख होकर कदापि भोजन न करे। यह भोजनकी सनातन विधि है। भोजन करनेवाला पुरुष हाथ-पैर धो, शुद्ध स्थानमें बैठकर पहले जलसे आचमन करे; फिर भोजनके पश्चात् भी उसे दो बार आचमन करना चाहिये।
भोजन करके, जल पीकर, सोकर उठनेपर और स्नान करनेपर, गलियोंमें घूमनेपर, ओठ चाटने या स्पर्श करनेपर, वस्त्र पहननेपर, वीर्य, मूत्र और मलका त्याग करनेपर, अनुचित बात कहनेपर, थूकनेपर, अध्ययन आरम्भ करनेके समय, खाँसी तथा दम उठनेपर, चौराहे या श्मशानभूमिमें घूमकर लौटनेपर तथा दोनों संध्याओंके समय श्रेष्ठ द्विज आचमन किये होनेपर भी फिर आचमन करे। चाण्डालों और म्लेच्छोंके साथ बात करनेपर, स्त्रियों, शूद्रों तथा जूठे मुँहवाले पुरुषोंसे वार्तालाप होनेपर, जूठे मुँहवाले पुरुष अथवा जूठे भोजनको देख लेनेपर तथा आँसू या रक्त गिरनेपर भी आचमन करना चाहिये। अपने शरीरसे स्त्रियोंका स्पर्श हो जानेपर, अपने बालों तथा खिसककर गिरे हुए वस्त्रका स्पर्श कर लेनेपर धर्मकी दृष्टिसे आचमन करना उचित है। आचमनके लिये जल ऐसा होना चाहिये, जो गर्म न हो, जिसमें फेन न हो तथा जो खारा न हो। पवित्रताकी इच्छा रखनेवाला पुरुष सर्वदा पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठकर ही आचमन करे। उस समय सिर अथवा गलेको ढके रहे तथा बाल और चोटीको खुला रखे। कहींसे आया हुआ पुरुष दोनों पैरोंको धोये बिना पवित्र नहीं होता। विद्वान् पुरुष सीढ़ीपर या जलमें खड़ा होकर अथवा पगड़ी बाँधे आचमन न करे। बरसती हुई धाराके जलसे अथवा खड़ा होकर या हाथसे उलीचे हुए जलके द्वारा आचमन करना उचित नहीं है। एक हाथसे दिये हुए जलके द्वारा अथवा बिना यज्ञोपवीतके भी आचमन करना निषिद्ध है। खड़ाऊँ पहने हुए अथवा घुटनोंके बाहर हाथ करके भी आचमन नहीं करना चाहिये। बोलते, हँसते, किसीकी ओर देखते तथा बिछौनेपर लेटे हुए भी आचमन करना निषिद्ध है। जिस जलको अच्छी तरह देखा न गया हो, जिसमें फेन आदि हों, जो शूद्रके द्वारा अथवा अपवित्र हाथोंसे लाया गया हो तथा जो खारा हो, ऐसे जलसे भी आचमन करना अनुचित है। आचमनके समय अँगुलियोंसे शब्द न करे, मनमें दूसरी कोई बात न सोचे। हाथसे बिलोड़े हुए जलके द्वारा भी आचमन करना निषिद्ध है। ब्राह्मण उतने ही जलसे आचमन करनेपर पवित्र हो सकता है, जो हृदयतक पहुँच सके। क्षत्रिय कण्ठतक पहुँचनेवाले आचमनके जलसे शुद्ध होता है। वैश्य जिह्वासे जलका आस्वादन मात्र कर लेनेसे पवित्र होता है और स्त्री तथा शूद्र जलके स्पर्शमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं।
अँगूठेकी जड़के भीतरकी रेखामें ब्राह्मतीर्थ बताया जाता है। अँगूठे और तर्जनीके बीचके भागको पितृतीर्थ कहते हैं। कानी अँगुलीके मूलसे पीछेका भाग प्राजापत्यतीर्थ कहलाता है। अँगुलियोंका अग्रभाग देवतीर्थ माना गया है। उसीको आर्षतीर्थ भी कहते हैं। अथवा अँगुलियोंके मूलभागमें दैव और आर्षतीर्थ तथा मध्यमें आग्नेय तीर्थ है। उसीको सौमिक तीर्थ भी कहते हैं। यह जानकर मनुष्य मोहमें नहीं पड़ता। ब्राह्मण सदा ब्राह्मतीर्थसे ही आचमन करे अथवा देवतीर्थसे आचमनकी इच्छा रखे। किन्तु पितृ-तीर्थसे कदापि आचमन न करे। पहले मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मतीर्थसे तीन बार आचमन करे। फिर अँगूठेके मूलभागसे मुँहको पोंछते हुए उसका स्पर्श करे। तत्पश्चात् अँगूठे और अनामिका अँगुलियोंसे दोनों नेत्रोंका स्पर्श करे। फिर तर्जनी और अँगूठेके योगसे नाकके दोनों छिद्रोंका, कनिष्ठा और अँगूठेके संयोगसे दोनों कानोंका, सम्पूर्ण अँगुलियोंके योगसे हृदयका, करतलसे मस्तकका और अँगूठेसे दोनों कंधोंका स्पर्श करे।
८९-ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म
स्वर्गखण्ड ]
* ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म *
३८३
द्विज तीन बार जो जलका आचमन करता है, उससे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी तृप्त होते हैं—ऐसा हमारे सुननेमें आया है। मुखका परिमार्जन करनेसे गङ्गा और यमुनाको तृप्ति होती है। दोनों नेत्रोंके स्पर्शसे सूर्य और चन्द्रमा प्रसन्न होते हैं। नासिकाके दोनों छिद्रोंका स्पर्श करनेसे अश्विनीकुमारोंकी तथा कानोंके स्पर्शसे वायु और अग्निकी तृप्ति होती है। हृदयके स्पर्शसे सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं और मस्तकके स्पर्शसे वह अद्वितीय पुरुष (अन्तर्यामी) प्रसन्न होता है। मधुपर्क, सोमरस, पान, फल, मूल तथा गन्ना—इन सबके खाने-पीनेमें मनुजीने दोष नहीं बताया है—उससे मुँह जूठा नहीं होता। अन्न खाने या जल पीनेके लिये प्रवृत्त होनेवाले मनुष्यके हाथमें यदि कोई वस्तु हो तो उसे पृथ्वीपर रखकर आचमनके पश्चात् उसपर भी जल छिड़क देना चाहिये। जिस-जिस वस्तुको हाथमें लिये हुए मनुष्य अपना मुँह जूठा करता है, उसे यदि पृथ्वीपर न रखे तो वह स्वयं भी अशुद्ध ही रह जाता है। वस्त्र आदिके विषयमें विकल्प है—उसे पृथ्वीपर रखा भी जा सकता है और नहीं भी। उसका स्पर्श करके आचमन करना चाहिये। रातके समय जंगलमें चोर और व्याघ्रोंसे भरे हुए रास्तेपर चलनेवाला पुरुष द्रव्य हाथमें लिये हुए भी मल-मूत्रका त्याग करके दूषित नहीं होता। यदि दिनमें शौच जाना हो तो जनेऊको दाहिने कानपर चढ़ाकर उत्तराभिमुख हो मल-मूत्रका त्याग करे। यदि रात्रिमें जाना पड़े तो दक्खिनकी ओर मुँह करके बैठना चाहिये। पृथ्वीको लकड़ी, पत्ते, मिट्टी, ढेले अथवा घाससे ढककर तथा अपने मस्तकको भी वस्त्रसे आच्छादित करके मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। किसी पेड़की छायामें, कुएँके पास, नदीके किनारे, गोशाला, देवमन्दिर तथा जलमें, रास्तेपर, राखपर, अग्निमें तथा शमशान-भूमिमें भी मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। गोबरपर, काठपर, बहुत बड़े वृक्षपर तथा हरी-भरी घासमें भी मल-मूत्र करना निषिद्ध है। खड़े होकर तथा नग्न होकर भी मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। पर्वतमण्डलमें, पुराने देवालयमें, बाँबीपर तथा किसी भी गड्ढेमें मल-मूत्रका त्याग वर्जित है। चलते-चलते भी पाखाना और पेशाब नहीं करना चाहिये। भूसी, कोयले तथा ठीकरेपर, खेतमें, बिलमें, तीर्थमें, चौराहेपर अथवा सड़कपर, बगीचेमें, जलके निकट, ऊसर भूमिमें तथा नगरके भीतर—इन सभी स्थानोंमें मल-मूत्रका त्याग मना है।
खड़ाऊँ या जूता पहनकर, छाता लगाकर, अन्तरिक्षमें, स्त्री, गुरु, ब्राह्मण, गौ, देवता, देवालय तथा जलकी ओर मुँह करके, नक्षत्रों तथा ग्रहोंको देखते हुए अथवा उनकी ओर मुँह करके तथा सूर्य, चन्द्रमा और अग्निकी ओर दृष्टि करके भी कभी मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। शौच आदि होनेके पश्चात् कहीं किनारेसे लेप और दुर्गन्धको मिटानेवाली मिट्टी लेकर आलस्यरहित हो विशुद्ध एवं बाहर निकाले हुए जलसे हाथ आदिकी शुद्धि करे। ब्राह्मणको उचित है कि वह रेत मिली हुई अथवा कीचड़की मिट्टी न ले। रास्तेसे, ऊसर भूमिसे तथा दूसरोंके शौचसे बची हुई मिट्टीको भी काममें न ले। देवमन्दिरसे, कुएँसे, घरकी दीवारसे और जलसे भी मिट्टी न ले। तदनन्तर, हाथ-पैर धोकर प्रतिदिन पूर्वोक्त विधिसे आचमन करना चाहिये।
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ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म
व्यासजी कहते हैं— महर्षियो ! इस प्रकार दण्ड, मेखला, मृगचर्म आदिसे युक्त तथा शौचाचारसे सम्पन्न ब्रह्मचारी गुरुके मुँहकी ओर देखता रहे और जब वे बुलायें तभी उनके पास जाकर अध्ययन करे। सदा हाथ जोड़े रहे, सदाचारी और संयमी बने। जब गुरु बैठनेकी आज्ञा दें, तब उनके सामने बैठे। गुरुकी बातका श्रवण और गुरुके साथ वार्तालाप—ये दोनों कार्य लेटे-लेटे न करे और भोजन करते समय भी न करे। उस समय न तो खड़ा रहे और न दूसरी ओर मुख ही फेरे। गुरुके समीप शिष्यकी शय्या और आसन सदा नीचे रहने
३८४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
चाहिये। जहाँतक गुरुकी दृष्टि पड़ती हो, वहाँतक मनमाने आसनपर न बैठे। गुरुके परोक्षमें भी उनका नाम न ले। उनकी चाल, उनकी बोली तथा उनकी चेष्टाका अनुकरण न करे। जहाँ गुरुपर लाञ्छन लगाया जाता हो अथवा उनकी निन्दा हो रही हो, वहाँ कान मूँद लेने चाहिये अथवा वहाँसे अन्यत्र हट जाना चाहिये। दूर खड़ा होकर, क्रोधमें भरकर अथवा स्त्रीके समीप रहकर गुरुकी पूजा न करे। गुरुकी बातोंका प्रत्युत्तर न दे। यदि गुरु पास ही खड़े हों तो स्वयं भी बैठा न रहे। गुरुके लिये सदा पानीका घड़ा, कुश, फूल और समिधा लाया करे। प्रतिदिन उनके आँगनमें झाड़ू देकर उसे लीप-पोत दे। गुरुके उपभोगमें आयी हुई वस्तुओंपर, उनकी शय्या, खड़ाऊँ, जूते, आसन तथा छाता आदिपर कभी पैर न रखे। गुरुके लिये दाँतन आदि ला दिया करे। जो कुछ प्राप्त हो, उन्हें निवेदन कर दे। उनसे पूछे बिना कहीं न जाय और सदा उनके प्रिय एवं हितमें संलग्न रहे। गुरुके समीप कभी पैर न फैलाये। उनके सामने जँभाई लेना, हँसना, गला ढँकना और अँगड़ाई लेना सदाके लिये छोड़ दे। समयानुसार गुरुसे, जबतक कि वे पढ़ानेसे उदासीन न हो जायें, अध्ययन करे। गुरुके पास नीचे बैठे। एकाग्र चित्तसे उनकी सेवामें लगा रहे। गुरुके आसन, शय्या और सवारीपर कभी न बैठे। गुरु यदि दौड़ते हों तो उनके पीछे-पीछे स्वयं भी दौड़े। वे चलते हों तो स्वयं भी पीछे-पीछे जाय। बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, ऊँटगाड़ी, महलकी अटारी, कुशकी चटाई, शिलाखण्ड तथा नावपर गुरुके साथ शिष्य भी बैठ सकता है।
शिष्यको सदा जितेन्द्रिय, जितात्मा, क्रोधहीन और पवित्र रहना चाहिये। वह सदा मधुर और हितकारी वचन बोले। चन्दन, माला, स्वाद, शृङ्गार, सीपी, प्राणियोंकी हिंसा, तेलकी मालिश, सुरमा, शर्बत आदि पेय, छत्रधारण, काम, लोभ, भय, निद्रा, गाना-बजाना, दूसरोंको फटकारना, किसीपर लाञ्छन लगाना, स्त्रीकी ओर देखना, उसका स्पर्श करना, दूसरेका घात करना तथा चुगली खाना—इन दोषोंका यत्नपूर्वक परित्याग करे। जलसे भरा हुआ घड़ा, फूल, गोबर, मिट्टी और कुश—इन वस्तुओंका आवश्यकताके अनुसार संग्रह करे तथा अन्नकी भिक्षा लेनेके लिये प्रतिदिन जाय। घी, नमक और बासी अन्न ब्रह्मचारीके लिये वर्जित हैं। वह कभी नृत्य न देखे। सदा सङ्गीत आदिसे निःस्पृह रहे। न सूर्यकी ओर देखे न दाँतन करे। उसके लिये स्त्रियोंके साथ एकान्तमें रहना और शूद्र आदिके साथ वार्तालाप करना भी निषिद्ध है। वह गुरुके उच्छिष्ट औषध और अन्नका स्वेच्छासे उपयोग न करे।
ब्राह्मण गुरुके परित्यागका किसी तरह विचार भी मनमें न लाये। यदि मोह या लोभवश वह उन्हें त्याग दे तो पतित हो जाता है। जिनसे लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उन गुरुदेवसे कभी द्रोह न करे। गुरु यदि घमंडी, कर्तव्य-अकर्तव्यको न जाननेवाला और कुमार्गगामी हो तो मनुजीने उसका त्याग करनेका आदेश दिया है। गुरुके गुरु समीप आ जायें तो उनके प्रति भी गुरुकी ही भाँति बर्ताव करना चाहिये। नमस्कार करनेके पश्चात् जब वे गुरुजी आज्ञा दें, तब आकर अपने गुरुओंको प्रणाम करना चाहिये। जो विद्यागुरु हों, उनके प्रति भी यही बर्ताव करना चाहिये। जो योगी हों, जो अधर्मसे रोकने और हितका उपदेश करनेवाले हों, उनके प्रति भी सदा गुरुजनोचित बर्ताव करना चाहिये। गुरुके पुत्र, गुरुकी पत्नी तथा गुरुके बन्धु-बान्धवोंके साथ भी सदा अपने गुरुके समान ही बर्ताव करना उचित है। इससे कल्याण होता है। बालक अथवा शिष्य यज्ञकर्ममें माननीय पुरुषोंका आदर करे। यदि गुरुका पुत्र भी पढ़ाये तो गुरुके समान ही सम्मान पानेका अधिकारी है। किन्तु गुरुपुत्रके शरीर दबाने, नहलाने, उच्छिष्ट भोजन करने तथा चरण धोने आदिका कार्य न करे। गुरुकी स्त्रियोंमें जो उनके समान वर्णकी हों, उनका गुरुकी भाँति सम्मान करना चाहिये तथा जो समान वर्णकी न हों, उनका अभ्युत्थान और प्रणाम आदिके द्वारा ही सत्कार करना चाहिये। गुरुपत्नीके प्रति तेल लगाने, नहलाने, शरीर दबाने और केशोंका शृङ्गार करने आदिकी सेवा न करे। यदि गुरुकी स्त्री युवती हो तो उसका चरण-स्पर्श करके
स्वर्गखण्ड ] * ब्रह्मचारी शिष्यके धर्म * ३८५
प्रणाम नहीं करना चाहिये; अपितु 'मै अमुक हूँ', यह कहकर पृथ्वीपर ही मस्तक टेकना चाहिये। सत्पुरुषोंके धर्मका निरन्तर स्मरण करनेवाले शिष्यको उचित है कि वह बाहरसे आनेपर प्रतिदिन गुरुपत्नीका चरण-स्पर्श एवं प्रणाम करे। मौसी, मामी, सास, बुआ—ये सब गुरुपत्नीके समान हैं। अतः गुरुपत्नीकी भाँति इनका भी आदर करना चाहिये। अपने बड़े भाइयोंकी सवर्ण स्त्रियोंका प्रतिदिन चरण-स्पर्श करना उचित है। परदेशसे आनेपर अपने कुटुम्बी और सम्बन्धियोंकी सभी श्रेष्ठ स्त्रियोंके चरणोंमें मस्तक झुकाना चाहिये। बुआ, मौसी तथा बड़ी बहिनके साथ माताकी ही भाँति बर्ताव करना चाहिये, इन सबकी अपेक्षा माताका गौरव अधिक है।
जो इस प्रकार सदाचारसे सम्पन्न, अपने मनको वशमें रखनेवाला और दम्भहीन शिष्य हो, उसे प्रतिदिन वेद, धर्मशास्त्र और पुराणोंका अध्ययन कराना चाहिये। जब शिष्य सालभरतक गुरुकुलमें निवास कर ले और उस समयतक गुरु उसे ज्ञानका उपदेश न करे तो वह अपने पास रहनेवाले शिष्यके सारे पापोंको हर लेता है। आचार्यका पुत्र, सेवापरायण, ज्ञान देनेवाला, धर्मात्मा, पवित्र, शक्तिशाली, अन्न देनेवाला, पानी पिलानेवाला, साधु पुरुष और अपना शिष्य—ये दस प्रकारके पुरुष धर्मतः पढ़ानेके योग्य हैं।* कृतज्ञ, द्रोह न रखनेवाला, मेधावी, गुरु बनानेवाला, विश्वासपात्र और प्रिय—ये छः प्रकारके द्विज विधिपूर्वक अध्ययन करानेके योग्य हैं। शिष्य आचमन करके संयमशील हो उत्तराभिमुख बैठकर प्रतिदिन स्वाध्याय करे। गुरुके चरणोंमें प्रणाम करके उनका मुँह जोहता रहे। जब गुरु कहें—'सौम्य ! आओ, पढ़ो,' तब उनके पास जाकर पाठ पढ़े और जब वे कहें कि 'अब पाठ बंद करना चाहिये', तब पाठ बंद कर दे। अग्निके पूर्व आदि दिशाओंमें कुश बिछाकर उनकी उपासना करे। तीन प्राणायामोंसे पवित्र होकर ब्रह्मचारी ॐकारके जपका अधिकारी होता है।
ब्राह्मणो ! विप्रको अध्ययनके आदि और अन्तमें भी विधिपूर्वक प्रणवका जप करना चाहिये। प्रतिदिन पहले वेदको अञ्जलि देकर उसका अध्ययन कराना चाहिये। वेद सम्पूर्ण भूतोंके सनातन नेत्र हैं; अतः प्रतिदिन उनका अध्ययन करे अन्यथा वह ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है। जो नित्यप्रति ऋग्वेदका अध्ययन करता है, वह दूधकी आहुतिसे; जो यजुर्वेदका पाठ करता है, वह दहीसे; जो सामवेदका अध्ययन करता है, वह घीकी आहुतियोंसे तथा जो अथर्ववेदका पाठ करता है, वह सदा मधुसे देवताओंको तृप्त करता है। उन देवताओंके समीप नियमपूर्वक नित्यकर्मका आश्रय ले वनमें जा एकाग्र चित्त हो गायत्रीका जप करे। प्रतिदिन अधिक-से-अधिक एक हजार, मध्यम स्थितिमें एक सौ अथवा कम-से-कम दस बार गायत्री देवीका जप करना चाहिये; यह जपयज्ञ कहा गया है। भगवान्ने गायत्री और वेदोंको तराजूपर रखकर तोला था, एक ओर चारों वेद थे और एक ओर केवल गायत्री-मन्त्र। दोनोंका पलड़ा बराबर रहा।† द्विजको चाहिये कि वह श्रद्धालु एवं एकाग्र चित्त होकर पहले ओङ्कारका और फिर व्याहृतियोंका उच्चारण करके गायत्रीका उच्चारण करे। पूर्व कल्पमें 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः'—ये तीन सनातन महाव्याहृतियाँ उत्पन्न हुईं, जो सब प्रकारके अमङ्गलका नाश करनेवाली हैं। ये तीनों व्याहृतियाँ क्रमशः प्रधान, पुरुष और कालका, विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजीका तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका प्रतीक मानी गयी हैं। पहले 'ओं' उसके बाद 'ब्रह्म' तथा उसके पश्चात् गायत्रीमन्त्र—इन सबको मिलाकर यह महायोग नामक मन्त्र बनता है, जो सारसे भी सार बताया गया है। जो ब्रह्मचारी प्रतिदिन इस वेदमाता गायत्रीका अर्थ समझकर जप करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। गायत्री वेदोंकी जननी है, गायत्री सम्पूर्ण संसारको पवित्र करनेवाली है। गायत्रीसे बढ़कर दूसरा कोई जपने योग्य
* आचार्यपुत्रः शुश्रूषुज्ञानदो धार्मिकः शुचिः । शक्तोऽन्नदोऽम्बुदः साधुः स्वोऽध्याप्या दश धर्मतः ॥ (५३ । ४०)
† गायत्रीं चैव वेदांश्च तुलयातोलयत्प्रभुः । एकतश्चतुरो वेदा गायत्री च तथैकतः ॥ (५३ । ५२)
३८६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मन्त्र नहीं है। यह जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है।*
द्विजवरो ! आषाढ़, श्रावण अथवा भादोंकी पूर्णिमाको वेदोंका उपाकर्म बताया गया है अर्थात् उक्त तिथिसे वेदोंका स्वाध्याय प्रारम्भ किया जाता है। जबतक सूर्य दक्षिणायनके मार्गपर चलते हैं, तबतक अर्थात् साढ़े चार महीने प्रतिदिन पवित्र स्थानमें बैठकर ब्रह्मचारी एकाग्रतापूर्वक वेदोंका स्वाध्याय करे। तत्पश्चात् द्विज पुष्यनक्षत्रमें घरके बाहर जाकर वेदोंका उत्सर्ग—स्वाध्यायकी समाप्ति करे। शुक्लपक्षमें प्रातःकाल और कृष्णपक्षमें संध्याके समय वेदोंका स्वाध्याय करना चाहिये।
वेदोंका अध्ययन, अध्यापन प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाले पुरुषको नीचे लिखे अनध्यायोंके समय सदा ही अध्ययन बंद रखना चाहिये। यदि रातमें ऐसी तेज हवा चले, जिसकी सनसनाहट कानोंमें गूँज उठे तथा दिनमें धूल उड़ानेवाली आँधी चलने लगे तो अनध्याय होता है। यदि बिजलीकी चमक, मेघोंकी गर्जना, वृष्टि तथा महान् उल्कापात हो तो प्रजापति मनुने अकालिक अनध्याय बताया है—ऐसे अवसरोंपर उस समयसे लेकर दूसरे दिन उसी समयतक अध्ययन रोक देना उचित है। यदि अग्निहोत्रके लिये अग्नि प्रज्वलित करनेपर इन उत्पातोंका उदय जान पड़े तो वर्षाकालमें अनध्याय समझना चाहिये तथा वर्षासे भिन्न ऋतुमें यदि बादल दीख भी जाय तो अध्ययन रोक देना चाहिये। वर्षाऋतुमें और उससे भिन्न कालमें भी यदि उत्पात-सूचक शब्द, भूकम्प, चन्द्र-सूर्यादि ज्योतिर्मय ग्रहोंके उपद्रव हों तो अकालिक (उस समयसे लेकर दूसरे दिन उसी समयतक) अनध्याय समझना चाहिये। यदि प्रातःकालमें होमाग्नि प्रज्वलित होनेपर बिजलीकी गड़गड़ाहट और मेघकी गर्जना सुनायी दे तो सज्योति अनध्याय होता है अर्थात् ज्योति—सूर्यके रहनेतक ही अध्ययन बंद रहता है। इसी प्रकार रातमें भी अग्नि प्रज्वलित होनेके पश्चात् यदि उक्त उत्पात हो तो दिनकी ही भाँति सज्योति—ताराओंके दीखनेतक अनध्याय माना जाता है। धर्मकी निपुणता चाहनेवाले पुरुषोंके लिये गाँवों, नगरों तथा दुर्गन्धपूर्ण स्थानोंमें सदा ही अनध्याय रहता है। गाँवके भीतर मुर्दा रहनेपर, शूद्रकी समीपता होनेपर, रोनेका शब्द कानमें पड़नेपर तथा मनुष्योंकी भारी भीड़ रहनेपर भी सदा ही अनध्याय होता है। जलमें, आधी रातके समय, मल-मूत्रका त्याग करते समय, जूठा मुँह रहनेपर तथा श्राद्धका भोजन कर लेनेपर मनसे भी वेदका चिन्तन नहीं करना चाहिये। विद्वान् ब्राह्मण एकोद्दिष्ट श्राद्धका निमन्त्रण लेकर तीन दिनोंतक वेदोंका अध्ययन बंद रखे। राजाके यहाँ सूतक (जननाशौच) हो या ग्रहणका सूतक लगा हो, तो भी तीन दिनोंतक वेद-मन्त्रोंका उच्चारण न करे। एकोद्दिष्टमें सम्मिलित होनेवाले विद्वान् ब्राह्मणके शरीरमें जबतक श्राद्धके चन्दनकी सुगन्ध और लेप रहे, तबतक वह वेद-मन्त्रका उच्चारण न करे। लेटकर, पैर फैलाकर, घुटने मोड़कर तथा शूद्रका श्राद्धान्न भोजन करके वेदाध्ययन न करे। कुहरा पड़नेपर, बाणका शब्द होनेपर, दोनों संध्याओंके समय, अमावास्या, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा अष्टमीको भी वेदाध्ययन निषिद्ध है। वेदोंके उपाकर्मके पहले और उत्सर्गके बाद तीन राततक अनध्याय माना गया है। अष्टका तिथियोंको एक दिन-रात तथा ऋतुके अन्तकी रात्रियोंको रातभर अध्ययन निषिद्ध है। मार्गशीर्ष, पौष और माघ मासके कृष्णपक्षमें जो अष्टमी तिथियाँ आती हैं, उन्हें विद्वान् पुरुषोंने तीन अष्टकाओंके नामसे कहा है। बहेड़ा, सेमल, महुआ, कचनार और कैथ—इन वृक्षोंकी छायामें कभी वेदाध्ययन नहीं करना चाहिये। अपने सहपाठी अथवा साथ रहनेवाले ब्रह्मचारी या आचार्यकी
* ओङ्कारस्तत्परं ब्रह्म सावित्री स्यात्तदुत्तरम्। एष मन्त्रो महायोगः सारात् सार उदाहृतः ॥
योऽधीतेऽहन्यहन्येतां गायत्रीं वेदमातरम्। विज्ञायार्थं ब्रह्मचारी स याति परमां गतिम् ॥
गायत्री वेदजननी गायत्री लोकपावनी। गायत्र्या न परं जप्यमेतद्विज्ञाय मुच्यते ॥ (५३। ५६—५८)
९०-स्नातक और गृहस्थके धर्मोंका वर्णन
स्वर्गखण्ड ]
* स्नातक और गृहस्थके धर्मोंका वर्णन *
३८७
मृत्यु हो जानेपर तीन राततक अनध्याय माना गया है। ये अवसर वेदपाठी ब्राह्मणोंके लिये छिद्ररूप हैं, अतः अनध्याय कहे गये हैं। इनमें अध्ययन करनेसे राक्षस हिंसा करते हैं; अतः इन अनध्यायोंका त्याग कर देना चाहिये। नित्य कर्ममें अनध्याय नहीं होता। संध्योपासन भी बराबर चलता रहता है। उपाकर्ममें, उत्सर्गमें, होमके अन्तमें तथा अष्टकाकी आदि तिथियोंको वायुके चलते रहनेपर भी स्वाध्याय करना चाहिये। वेदाङ्गों, इतिहास-पुराणों तथा अन्य धर्मशास्त्रोंके लिये भी अनध्याय नहीं है। इन सबको अनध्यायकी कोटिसे पृथक् समझना चाहिये।
यह मैंने ब्रह्मचारीके धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने शुद्ध अन्तःकरणवाले ऋषियोंके सामने इस धर्मका प्रतिपादन किया था। जो द्विज वेदका अध्ययन न करके दूसरे शास्त्रोंमें परिश्रम करता है, वह मूढ़ और वेदबाह्य माना गया है। द्विजातियोंको उससे बात नहीं करनी चाहिये। द्विजको केवल वेदोंके होष्ठ मात्रसे ही संतोष नहीं कर लेना चाहिये। जो केवल पाठ मात्रमें लगा रह जाता है, वह कीचड़में फँसी हुई गौकी भाँति कष्ट उठाता है। जो विधिपूर्वक वेदका अध्ययन करके उसके अर्थका विचार नहीं करता, वह मूढ़ एवं शूद्रके समान है। वह सुपात्र नहीं होता*। यदि कोई सदाके लिये गुरुकुलमें वास करना चाहे तो सदा उद्यत रहकर शरीर छूटनेतक गुरुकी सेवा करता रहे। वनमें जाकर विधिवत् अग्निमें होम करे तथा ब्रह्मनिष्ठ एवं एकाग्रचित्त होकर सदा स्वाध्याय करता रहे। वह भिक्षाके अन्नपर निर्भर रहकर योगयुक्त हो सदा गायत्रीका जप और शतरुद्रिय तथा विशेषतः उपनिषदोंका अभ्यास करता रहे। वेदाध्ययनके विषयमें जो यह परम प्राचीन विधि है, इसका भलीभाँति मैंने आपलोगोंसे वर्णन किया है। पूर्वकालमें श्रेष्ठ महर्षियोंके पूछनेपर दिव्यशक्तिसम्पन्न स्वायम्भुव मनुने इसका प्रतिपादन किया था।
स्नातक और गृहस्थके धर्मोंका वर्णन
व्यासजी कहते हैं— ब्राह्मणो! श्रेष्ठ ब्रह्मचारी अपनी शक्तिके अनुसार एक, दो, तीन अथवा चारों वेदों तथा वेदाङ्गोंका अध्ययन करके उनके अर्थको भलीभाँति हृदयङ्गम करके ब्रह्मचर्य-व्रतकी समाप्तिका स्नान करे †। गुरुको दक्षिणारूपमें धन देकर उनकी आज्ञा ले स्नान करना चाहिये। व्रतको पूरा करके मनको काबूमें रखनेवाला समर्थ पुरुष स्नातक होनेके योग्य है। वह बाँसकी छड़ी, अधोवस्त्र तथा उत्तरीय (चादर) धारण करे। एक जोड़ा यज्ञोपवीत और जलसे भरा हुआ कमण्डलु धारण करे। बाल और नख कटाकर स्नान आदिसे शुद्ध हो उसे छाता, साफ पगड़ी, खड़ाऊँ या जूता तथा सोनेके कुण्डल धारण करने चाहिये। ब्राह्मण सोनेकी मालाके सिवा दूसरी कोई लाल रङ्गकी माला न धारण करे। वह सदा श्वेत वस्त्र पहने, उत्तम गन्धका सेवन करे और वेष-भूषा ऐसी रखे, जो देखनेमें प्रिय जान पड़े। धन रहते हुए फटे और मैले वस्त्र न पहने। अधिक लाल और दूसरेके पहने हुए वस्त्र, कुण्डल, माला, जूता और खड़ाऊँको अपने काममें न लाये। यज्ञोपवीत, आभूषण, कुश और काला मृगचर्म—इन्हें अपसव्य भावसे न धारण करे। अपने योग्य स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे। स्त्री शुभ गुणोंसे युक्त, रूपवती, सुलक्षण और योनिगत दोषोंसे रहित होनी चाहिये।
* योऽन्यत्र कुरुते यत्नमनधीत्य श्रुतिं द्विजः। स सम्मूढो न सम्भाष्यो वेदबाह्यो द्विजातिभिः ॥
न वेदपाठमात्रेण संतुष्टो वै भवेत् द्विजः। पाठमात्रावसन्नस्तु पङ्के गौरिव सीदति ॥
योऽधीत्य विधिवद्वेदं वेदार्थं न विचारयेत्। स सम्मूढः शूद्रकल्पः पात्रतां न प्रपद्यते ॥ (५३। ८४—८६)
† वेदं वेदौ तथा वेदान् वेदाङ्गानि तथा द्विजाः। अधीत्य चाधिगम्यार्थं ततः स्नायाद् द्विजोत्तमः ॥ (५४। १)
३८८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
माताके गोत्रमें जिसका जन्म न हुआ हो, जो अपने गोत्रमें उत्पन्न न हुई हो तथा उत्तम शील और पवित्रतासे युक्त हो, ऐसी भार्यासे ब्राह्मण विवाह करे। जबतक पुत्रका जन्म न हो, तबतक केवल ऋतुकालमें स्त्रीके साथ समागम करे। इसके लिये शास्त्रोंमें जो निषिद्ध दिन हैं, उनका यत्नपूर्वक त्याग करे। षष्ठी, अष्टमी, पूर्णिमा, द्वादशी तथा चतुर्दशी—ये तिथियाँ स्त्री-समागमके लिये निषिद्ध हैं। उक्त नियमोंका पालन करनेसे गृहस्थ भी सदा ब्रह्मचारी ही माना जाता है। विवाह-कालकी अग्निको सदा स्थापित रखे और उसमें अग्निदेवताके निमित्त प्रतिदिन हवन करे। स्नातक पुरुष इन पावन नियमोंका सदा ही पालन करे।
अपने [वर्ण और आश्रमके लिये विहित] वेदोक्त कर्मका सदा आलस्य छोड़कर पालन करना चाहिये। जो नहीं करता, वह अत्यन्त भयंकर नरकोंमें पड़ता है। सदा संयमशील रहकर वेदोंका अभ्यास करे, पञ्च महायज्ञोंका त्याग न करे, गृहस्थोचित समस्त शुभ कार्य और संध्योपासन करता रहे। अपने समान तथा अपनेसे बड़े पुरुषोंके साथ मित्रता करे, सदा ही भगवान्की शरणमें रहे। देवताओंके दर्शनके लिये यात्रा करे तथा पत्नीका पालन-पोषण करता रहे। विद्वान् पुरुष लोगोंमें अपने किये हुए धर्मकी प्रसिद्धि न करे तथा पापको भी न छिपाये। सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करते हुए सदा अपने हितका साधन करे। अपनी वय, कर्म, धन, विद्या, उत्तम कुल, देश, वाणी और बुद्धिके अनुरूप आचरण करते हुए सदा विचरण करता रहे। श्रुतियों और स्मृतियोंमें जिसका विधान हो तथा साधु पुरुषोंने जिसका भलीभाँति सेवन किया हो, उसी आचारका पालन करे; अन्य कार्योंके लिये कदापि चेष्टा न करे। जिसका उसके पिताने अनुसरण किया हो तथा जिसका पितामहोंने किया हो, उसी वृत्तिसे वह भी सत्पुरुषोंके मार्गपर चले; उसका अनुसरण करनेवाला पुरुष दोषका भागी नहीं होता। प्रतिदिन स्वाध्याय करे, सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहे तथा सर्वदा सत्य बोले। क्रोधको जीते और लोभ-मोहका परित्याग कर दे। गायत्रीका जप तथा पितरोंका श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ मुक्त हो जाता है। माता-पिताके हितमें संलग्न, ब्राह्मणोंके कल्याणमें तत्पर, दाता, याज्ञिक और वेदभक्त गृहस्थ ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। सदा ही धर्म, अर्थ एवं कामका सेवन करते हुए प्रतिदिन देवताओंका पूजन करे और शुद्धभावसे उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। बलिवैश्वदेवके द्वारा सबको अन्नका भाग दे। निरन्तर क्षमाभाव रखे और सबपर दयाभाव बनाये रहे। ऐसे पुरुषको ही गृहस्थ कहा गया है; केवल घरमें रहनेसे कोई गृहस्थ नहीं हो सकता।
क्षमा, दया, विज्ञान, सत्य, दम, शम, सदा अध्यात्मचिन्तन तथा ज्ञान—ये ब्राह्मणके लक्षण हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणको उचित है कि वह विशेषतः इन गुणोंसे कभी च्युत न हो। अपनी शक्तिके अनुसार धर्मका अनुष्ठान करते हुए निन्दित कर्मोंको त्याग दे। मोहरूपी कीचड़को धोकर परम उत्तम ज्ञानयोगको प्राप्त करके गृहस्थ पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है—इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।
निन्दा, पराजय, आक्षेप, हिंसा, बन्धन और वधको तथा दूसरोंके क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले दोषोंको सह लेना क्षमा है। अपने दुःखमें करुणा तथा दूसरोंके दुःखमें सौहार्द—स्नेहपूर्ण सहानुभूतिके होनेको मुनियोंने दया कहा है, जो धर्मका साक्षात् साधन है। छहों अङ्ग, चारों वेद, मीमांसा, विस्तृत न्याय-शास्त्र, पुराण और धर्मशास्त्र—ये चौदह विद्याएँ हैं। इन चौदह विद्याओंको यथार्थरूपसे धारण करना—इसीको विज्ञान समझना चाहिये। जिससे धर्मकी वृद्धि होती है। विधिपूर्वक विद्याका अध्ययन करके तथा धनका उपार्जन कर धर्म-कार्यका अनुष्ठान करे—इसे भी विज्ञान कहते हैं। सत्यसे मनुष्यलोकपर विजय पाता है, वह सत्य ही परम पद है। जो बात जैसे हुई हो उसे उसी रूपमें कहनेको मनीषी पुरुषोंने सत्य कहा है। शरीरकी उपरामताका नाम दम है। बुद्धिकी निर्मलतासे शम सिद्ध होता है। अक्षर (अविनाशी) पदको अध्यात्म समझना चाहिये; जहाँ जाकर मनुष्य शोकमें नहीं पड़ता। जिस विद्यासे षड्विध
स्वर्गखण्ड ] *** स्नातक और गृहस्थके धर्मोंका वर्णन *** ३८९
ऐश्वर्ययुक्त परम देवता साक्षात् भगवान् हृषीकेशका ज्ञान होता है, उसे ज्ञान कहा गया है। जो विद्वान् ब्राह्मण उस ज्ञानमें स्थित, भगवत्परायण, सदा ही क्रोधसे दूर रहनेवाला, पवित्र तथा महायज्ञके अनुष्ठानमें तत्पर रहनेवाला है, वह उस उत्तम पदको प्राप्त कर लेता है। यह मनुष्य-शरीर धर्मका आश्रय है, इसका यत्नपूर्वक पालन करना चाहिये; क्योंकि देहके बिना कोई भी पुरुष परमात्मा श्रीविष्णुका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता। द्विजको चाहिये कि वह सदा नियमपूर्वक रहकर धर्म, अर्थ और कामके साधनमें लगा रहे। धर्महीन काम या अर्थका कभी मनसे चिन्तन भी न करे। धर्मपर चलनेसे कष्ट हो, तो भी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये; क्योंकि धर्म-देवता साक्षात् भगवान्के स्वरूप हैं; वे ही सब प्राणियोंकी गति हैं। द्विज सब भूतोंका प्रिय करनेवाला बने; दूसरोंके प्रति द्रोहभावसे किये जानेवाले कर्ममें मन न लगाये; वेदों और देवताओंकी निन्दा न करे तथा निन्दा करनेवालोंके साथ निवास भी न करे। जो ब्राह्मण प्रतिदिन नियमपूर्वक रहकर पवित्रताके साथ इस धर्माध्यायको पढ़ता, पढ़ाता अथवा सुनाता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है।*
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* श्रुतिस्मृत्युदितः सम्यक्साधुभिर्यश्च सेवितः। तमाचारं निषेवेत नेहेतान्यत्र कर्हिचित्॥
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः। तेन यायात् सतां मार्गं तेन गच्छन्न दुष्यति॥
नित्यं स्वाध्यायशीलः स्यान्नित्यं यज्ञोपवीतवान्। सत्यवादी जितक्रोधो लोभगेहविवर्जितः॥
सावित्रीजापनिरतः श्राद्धकृन्मुच्यते गृही। मातापित्रोर्हिते युक्तो ब्राह्मणस्य हिते रतः॥
दाता यज्वा वेदमक्तो ब्रह्मलोके महीयते। त्रिवर्गसेवी सततं देवानां च समर्चनम्॥
कुर्यादहरहर्नित्यं नमस्येत्प्रयतः सुरान्। विभागशीलः सततं क्षमायुक्तो दयालुकः॥
गृहस्थस्तु समाख्यातो न गृहेण गृही भवेत्॥
क्षमा दया च विज्ञानं सत्यं चैव दमः शमः। अध्यात्मनित्यता ज्ञानमेतद् ब्राह्मणलक्षणम्॥
एतस्मान्न प्रमाद्येत विशेषेण द्विजोत्तमः। यथाशक्ति चरन् धर्मं निन्दितानि विवर्जयेत्॥
विधूय मोहकलिलं लब्ध्वा योगमनुत्तमम्। गृहस्थो मुच्यते बन्धात्तत्र कार्या विचारणा॥
विगर्हातिजयाक्षेपहिंसाबन्धवधात्मनाम् । अन्यमन्युसमुत्थानां दोषाणां मर्षणं क्षमा॥
स्वदुःखेषु च कारुण्यं परदुःखेषु सौहृदम्। दयेति मुनयः प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य साधनम्॥
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः। पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्या एताश्चतुर्दश॥
चतुर्दशानां विद्यानां धारणा हि यथार्थतः। विज्ञानमिति तद्विद्याद्येन धर्मो विवर्धते॥
अधीत्य विधिवद्विद्यामर्थं चैवोपलभ्य तु। धर्मकर्माणि कुर्वीत ह्येतद्विज्ञानमुच्यते॥
सत्येन लोकं जयति सत्यं तत् परमं पदम्। यथाभूतप्रमादं तु सत्यमाहुर्मनीषिणः॥
दमः शरीरोपरतिः शमः प्रज्ञाप्रसादतः। अध्यात्ममक्षरं विद्यात्तत्र गत्वा न शोचति॥
यया स देवो भगवान् विद्यया विद्यते परः। साक्षादेव हृषीकेशस्तज्ज्ञानमिति कीर्तितम्॥
तन्निष्ठस्तत्परो विद्वान् नित्यमक्रोधनः शुचिः। महायज्ञपरो विप्रो लभते तदनुत्तमम्॥
धर्मस्यायतनं यत्नाच्छरीरं परिपालयेत्। न हि देहं विना विष्णुः पुरुषैर्विद्यते परः॥
नित्यं धर्मार्थकामेषु युज्येत नियतो द्विजः। न धर्मवर्जितं काममर्थं वा मनसा स्मरेत्॥
सीदन्नपि हि धर्मेण न त्वधर्मं समाचरेत्। धर्मो हि भगवान् देवो गतिः सर्वेषु जन्तुषु॥
भूतानां प्रियकारी स्यान्न परद्रोहकर्मधीः। न वेददेवतानिन्दां कुर्यात्तैश्च न संवसेत्॥
यस्त्विमं नियतो विप्रो धर्माध्यायं पठेच्छुचिः। अध्यापयेच्छ्रावयेद् वा ब्रह्मलोके महीयते॥
(५४।१८—४१)
९१-व्यावहारिक शिष्टाचारका वर्णन
३९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण 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स्वर्गखण्ड ] * व्यावहारिक शिष्टाचारका वर्णन * ३९१
निवास न करे। चाण्डालोंके गाँवके समीप नहीं रहना चाहिये। पतित, चाण्डाल, पुल्कस (निषादसे शूद्रामें उत्पन्न), मूर्ख, अभिमानी, अन्त्यज तथा अन्त्यावसायी (निषादकी स्त्रीमें चाण्डालसे उत्पन्न) पुरुषोंके साथ कभी निवास न करे। एक शय्यापर सोना, एक आसनपर स्थित होना, एक पंक्तिमें बैठना, एक बर्तनमें खाना, दूसरोंके पके हुए अन्नको अपने अन्नमें मिलाकर भोजन करना, यज्ञ करना, पढ़ाना, विवाह-सम्बन्ध स्थापित करना, साथ बैठकर भोजन करना, साथ-साथ पढ़ना और एक साथ यज्ञ कराना ये संकरताका प्रसार करनेवाले ग्यारह सांकर्यदोष बताये गये हैं। समीप रहनेसे भी मनुष्योंके पाप एक-दूसरेमें फैल जाते हैं। इसलिये पूरा प्रयत्न करके सांकर्यदोषसे बचना चाहिये। जो राख आदिसे सीमा बनाकर एक पंक्तिमें बैठते और एक-दूसरेका स्पर्श नहीं करते, उनमें संकरताका दोष नहीं आता। अग्नि, भस्म, जल, विशेषतः द्वार, खंभा तथा मार्ग—इन छःसे पंक्तिका भेद (पृथक्करण) होता है।
अकारण वैर न करे, विवादसे दूर रहे, किसीकी चुगली न करे, दूसरेके खेतमें चरती हुई गौका समाचार कदापि न कहे। चुगलखोरके साथ न रहे, किसीको चुभनेवाली बात न कहे। सूर्यमण्डलका घेरा, इन्द्रधनुष-बाणसे प्रकट हुई आग, चन्द्रमा तथा सोना—इन सबकी ओर विद्वान् पुरुष दूसरेका ध्यान आकृष्ट न करे। बहुत-से मनुष्यों तथा भाई-बन्धुओंके साथ विरोध न करे। जो बर्ताव अपने लिये प्रतिकूल जान पड़े, उसे दूसरोंके लिये भी न करे। द्विजवरो ! रजस्वला स्त्री अथवा अपवित्र मनुष्यके साथ बातचीत न करे। देवता, गुरु और ब्राह्मणके लिये किये जानेवाले दानमें रुकावट न डाले। अपनी प्रशंसा न करे तथा दूसरेकी निन्दाका त्याग कर दे। वेदनिन्दा और देवनिन्दाका यत्नपूर्वक त्याग करे।* मुनीश्वरो ! जो द्विज देवताओं, ऋषियों अथवा वेदोंकी निन्दा करता है, शास्त्रोंमें उसके उद्धारका कोई उपाय नहीं देखा गया है। जो गुरु, देवता, वेद अथवा उसका विस्तार करनेवाले इतिहास-पुराणकी निन्दा करता है, वह मनुष्य सौ करोड़ कल्पसे अधिक कालतक रौरव नरकमें पकाया जाता है। जहाँ इनकी निन्दा होती हो, वहाँ चुप रहे; कुछ भी उत्तर न दे। कान बंद करके वहाँसे चला जाय। निन्दा करनेवालेकी ओर दृष्टिपात न करे।† विद्वान् पुरुष दूसरोंकी निन्दा न करे। अच्छे पुरुषोंके साथ कभी विवाद न करे, पापियोंके पापकी चर्चा न करे। जिनपर झूठा कलङ्क लगाया जाता है; उन मनुष्योंके रोनेसे जो आँसू गिरते हैं, वे मिथ्या कलङ्क लगानेवालोंके पुत्रों और पशुओंका विनाश कर डालते हैं। ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन आदि पापोंसे शुद्ध होनेका उपाय वृद्ध पुरुषोंने देखा है; किन्तु मिथ्या कलङ्क लगानेवाले मनुष्यकी शुद्धिका कोई उपाय नहीं देखा गया है।‡
बिना किसी निमित्तके सूर्य और चन्द्रमाको उदयकालमें न देखे; उसी प्रकार अस्त होते हुए, जलमें प्रतिबिम्बित, मेघसे ढके हुए, आकाशके मध्यमें स्थित, छिपे हुए तथा दर्पण आदिमें छायाके रूपमें दृष्टिगोचर होते हुए सूर्य-चन्द्रमाको भी न देखे। नंगी स्त्री और नंगे पुरुषकी ओर भी कभी दृष्टिपात न करे। मल-मूत्रको न देखे; मैथुनमें प्रवृत्त पुरुषकी ओर दृष्टि न डाले। विद्वान् पुरुष अपवित्र अवस्थामें सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रहोंकी
* न चात्मानं प्रशंसोद्वा परनिन्दां च वर्जयेत्। वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ (५५। ३५)
† निन्दयेद्वा गुरुं देवं वेदं वा सोपबृंहणम्। कल्पकोटिशतं साग्रं रौरवे पच्यते नरः॥
तूष्णीमासीत निन्दायां न ब्रूयात् किञ्चिदुत्तरम्। कर्णौ पिधाय गन्तव्यं न चैनमवलोकयेत्॥ (५५। ३७-३८)
‡ नृणां मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि रोदनात्। तानि पुत्रान् पशून् घ्नन्ति तेषां मिथ्याभिशंसिनाम्॥
ब्रह्महत्यासुरापाने स्तेये गुर्वङ्गनागमे। दृष्टं वै शोधनं वृद्धैर्नास्ति मिथ्याभिशंसिनि॥ (५५। ४१-४२)