पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६१२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
•कोलाहल सुनकर भगवान् कपिल समाधिसे जाग उठे। उस समय उनके नेत्रोंसे आग प्रकट हुई, जिससे साठ हजार सगर-पुत्र जलकर भस्म हो गये। महायशस्वी राजाने समुद्रसे उस आश्वमेधिक अश्वको प्राप्त किया और उसके द्वारा सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण किया।
नारदजीने पूछा— विज्ञानेश्वर ! सगरके साठ हजार पुत्र बड़े बलवान् और पराक्रमी थे, उन वीरोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? यह बताइये।
महादेवजी बोले— नारद ! राजा सगरकी दो पत्नियाँ थीं, वे दोनों ही तपस्याके द्वारा अपने पाप दग्ध कर चुकी थीं। इससे प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ और्वने उन्हें वरदान दिया। उनमेंसे एक रानीने साठ हजार पुत्र माँगे और दूसरीने एक ही ऐसे पुत्रके लिये प्रार्थना की, जो वंश चलानेवाला हो। पहली रानीने तूँबीमें बहुत-से शूरवीर पुत्रोंको जन्म दिया; उन सबको धाइयोंने ही क्रमशः पाल-पोसकर बड़ा किया। घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखकर उन कुमारोंका पोषण किया गया। कपिला गायका दूध पीकर वे सब-के-सब बड़े हुए। दूसरी रानीके गर्भसे पञ्चजन नामक पुत्र हुआ, जो राजा बना। पञ्चजनके अंशुमान् नामक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुआ। अंशुमान्के दिलीप और दिलीपके भगीरथ हुए, जो उत्तम व्रत (तपस्या) का अनुष्ठान करके नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गाजीको पृथ्वीपर ले आये तथा जिन्होंने गङ्गाको समुद्रतक ले जाकर उन्हें अपनी कन्याके रूपमें अङ्गीकार किया।
नारदजीने पूछा— भगवन् ! राजा भगीरथ गङ्गाको किस प्रकार लाये थे ? उन्होंने कौन-सी तपस्या की थी, ये सब बातें मुझे बताइये।
महादेवजी बोले— नारद ! राजा भगीरथ अपने पूर्वजोंका हित करनेके लिये हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने दस हजार वर्षोंतक भारी तपस्या की। इससे आदिदेव भगवान् निरञ्जन श्रीविष्णु प्रसन्न हुए। उन्हींके आदेशसे गङ्गाजी आकाशसे चलीं और जहाँ विश्वेश्वर श्रीशिव नित्य विराजमान रहते हैं, उस कैलास पर्वतपर उपस्थित हुईं। मैंने गङ्गाजीको आया देख उन्हें अपने जटाजूटमें धारण कर लिया और दस हजार वर्षोंतक उसी रूपमें स्थित रहा। इधर राजा भगीरथ गङ्गाजीको न देखकर विचार करने लगे— गङ्गा कहाँ चली
१५०-गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति ..
उत्तरखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१३ *********************************************************************************
गयीं ? ध्यान करके जब उन्होंने यह निश्चितरूपसे जान लिया कि उन्हें महादेवजीने ग्रहण कर लिया है, तब वे कैलास पर्वतपर गये। मुनिश्रेष्ठ वहाँ पहुँचकर वे तीव्र तपस्या करने लगे। उनके आराधना करनेपर मैंने अपने मस्तकसे एक बाल उखाड़ा और उसीके साथ त्रिपथगा गङ्गाजीको उन्हें अर्पण कर दिया। गङ्गाको लेकर वे पातालमें, जहाँ उनके पूर्वज भस्म हुए थे, गये। उस समय भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई गङ्गा जब हरिद्वारमें आयीं, तब वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ श्रेष्ठ तीर्थ बन गया। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान तथा विशेषरूपसे श्रीहरिका दर्शन करके उनकी परिक्रमा करते हैं, वे दुःखके भागी नहीं होते। ब्रह्महत्या आदि पापोंकी अनेक राशियाँ ही क्यों न हों, वे सब सर्वदा श्रीहरिके दर्शनमात्रसे नष्ट हो जाती हैं। एक समय मैं भी हरिद्वारमें श्रीहरिके स्थानपर गया था, उस समय उस तीर्थके प्रभावसे मैं विष्णुस्वरूप हो गया। सभी मनुष्य वहाँ श्रीहरिका दर्शन करनेमात्रसे वैकुण्ठ-लोकको प्राप्त होते हैं। परम सुन्दर हरिद्वार-तीर्थ मेरी दृष्टिमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह समस्त तीर्थोंमें श्रेष्ठ और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चारों पुरुषार्थ प्रदान करनेवाला है।
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गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति
महादेवजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका यथावत् वर्णन करूँगा, जिसके श्रवणमात्रसे तत्काल पापोंका नाश हो जाता है। जो मनुष्य सैकड़ों योजन दूरसे भी 'गङ्गा-गङ्गा' का उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और अन्तमें विष्णुलोकको जाता है।* नारद ! श्रीहरिके चरणकमलोंसे प्रकट हुई 'गङ्गा' नामसे विख्यात नदी पापोंकी स्थूल राशियोंका भी नाश करनेवाली है। नर्मदा, सरयू, वेत्रवती (बेतवा), तापी, पयोष्णी (मन्दाकिनी), चन्द्रा, विपाशा (ब्यास), कर्मनाशिनी, पुष्पा, पूर्णा, दांपा, विदीपा तथा सूर्यतनया यमुना—इनमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सब पुण्य गङ्गा-स्नानसे मनुष्य प्राप्त कर लेते हैं। जो मनीषी पुरुष समुद्रसहित पृथ्वीका दान करते हैं, उनको मिलनेवाला फल भी गङ्गा-स्नानसे प्राप्त हो जाता है। सहस्र गोदान, सौ अश्वमेध यज्ञ तथा सहस्र वृषभ-दानसे जिस अक्षय फलकी प्राप्ति होती है, वह गङ्गाजीके दर्शनसे क्षणभरमें प्राप्त हो जाता है। वह गङ्गा नदी महान् पुण्यदायिनी है, विशेषतः ब्रह्महत्यारोंके लिये परम पावन है। वे नरकमें पड़नेवाले हों तो भी गङ्गाजी उनके पाप हर लेती हैं। तात ! जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार गङ्गाके प्रभावसे पातक नष्ट हो जाते हैं। ये माता गङ्गा संसारमें सदा पवित्र मानी गयी हैं। इनका स्वरूप परम कल्याणमय है। माता जाह्नवीका स्वरूप दिव्य है। जैसे देवताओंमें श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार नदियोंमें गङ्गा उत्तम हैं। जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती हैं, उन तीर्थमें स्नान और आचमन करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
[भिन्न-भिन्न तीर्थोंमें जानेपर भगवान् श्रीविष्णु तथा यमुना, गङ्गा आदि नदियोंका किस प्रकार स्तवन करना चाहिये, यह बताया जाता है—]
त्वद्वातं प्रयतो ब्रवीमि यदहं सास्तु स्तुतिस्ते प्रभो
यद् भुञ्जे तव सन्निवेदनमथो यद्यामि सा प्रेष्यता।
यच्छ्रान्तः स्वपिमि त्वदङ्घ्रियुगले दण्डप्रणामोऽस्तु मे
स्वामिन् यच्च करोमि तेन स भवान् विश्वेश्वरः प्रीयताम् ॥
प्रभो ! मैं शुद्धभावसे आपके सम्बन्धमें जो कुछ भी चर्चा करता हूँ, वही आपके लिये स्तुति हो। जो कुछ भोजन करता हूँ, वह आपके लिये नैवेद्यका काम दे। जो चलता-फिरता हूँ, वही आपकी सेवा-टहल समझी जाय। जो थककर सो जाता हूँ, वही आपके लिये
* गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ (२३।२)
६१४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
साष्टाङ्ग प्रणाम हो तथा स्वामिन् ! मैं जो कुछ करता हूँ, उससे आप जगदीश्वर श्रीविष्णु प्रसन्न हों। दृष्टेन वन्दितेनापि स्पृष्टेन च धृतेन च। नरा येन विमुच्यन्ते तदेतद् यामुनं जलम्॥ जिसके दर्शन, वन्दन, स्पर्श तथा धारण करनेसे मनुष्य भव-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वही यह यमुनाजीका जल है। तावद् भ्रमन्ति भुवने मनुजा भवोत्य- दारिद्र्यरोगमरणव्यसनाभिभूताः । यावज्जलं तव महानदि नीलनीलं पश्यन्ति नो दधति मूर्धसु सूर्यपुत्रि ॥ सूर्यपुत्री महानदी यमुनाजी ! मनुष्य इस जगत्में प्राप्त होनेवाले दरिद्रता, रोग और मृत्यु आदि दुःखोंसे पीड़ित होकर तभीतक संसारमें भटकते रहते हैं, जबतक वे नीलमणिके सदृश आपके नीले जलका दर्शन नहीं करते अथवा उसे अपने मस्तकपर नहीं चढ़ाते। यत्संस्मृतिः सपदि कृन्तति दुष्कृतौघं पापावलीं जयति योजनलक्षतोऽपि । यन्नाम नाम जगदुच्चरितं पुनाति दिष्ट्या हि सा पथि दृशोर्भविताद्य गङ्गा ॥ जिनकी स्मृति पापराशिका तत्काल नाश कर देती है, जो लाख योजन दूरसे भी पापोंके समूहको परास्त करती हैं, जिनका नाम उच्चारण किये जानेपर सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देता है, वे गङ्गाजी आज सौभाग्यवश मेरे दृष्टिपथमें आयेंगी। आलोकोत्कण्ठितेन प्रमुदितमनसा वर्त्म यस्याः प्रयातं सद् यस्मिन् कृत्यमेतामथ प्रथमकृती जज्ञिवान् स्वर्गसिन्धुम् । स्नानं सन्ध्या निवापः सुरयजनमपि श्राद्धविप्राशनाद्यं सर्वं सम्पूर्णमेतद् भवति भगवतः प्रीतिदं नात्र चित्रम् ॥ मनुष्य दर्शनके लिये उत्कण्ठित तथा प्रसन्नचित्त होकर जिसके पथका अनुसरण करता है, जिसके तटपर समस्त शास्त्रविहित कर्म उत्तमतापूर्वक सम्पन्न होते हैं, उन गङ्गाजीको आदि सृष्टिके रचयिता ब्रह्माजीने पहले स्वर्गङ्गाके रूपमें उत्पन्न किया था। उनके तटपर किया हुआ स्नान, सन्ध्या, तर्पण, देवपूजा, श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन आदि सब कुछ परिपूर्ण एवं भगवान्को प्रसन्नता प्रदान करनेवाला होता है-इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। द्रवीभूतं परं ब्रह्म परमानन्ददायिनि । अर्घ्यं गृहाण मे गङ्गे पापं हर नमोऽस्तु ते ॥ परमानन्द प्रदान करनेवाली गङ्गाजी ! आप जल-रूपमें अवतीर्ण साक्षात् परब्रह्म हैं। आपको नमस्कार है। आप मेरा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण कीजिये और मेरे पाप हर लीजिये। साक्षाद्धर्मद्रवौघं मुररिपुचरणाम्भोजपीयूषसारं दुःखस्वाब्धेस्तरित्रं सुरदनुजनुतं स्वर्गसोपानमार्गम्। सर्वांहोहारि वारि प्रवरगुणगणं भासि या संवहन्ती तस्यै भागीरथि श्रीमत्ति मुदितमना देवि कुर्वे नमस्ते ॥ श्रीमती भागीरथी देवी ! जो जलरूपमें परिणत साक्षात् धर्मकी राशि है, भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंसे प्रकट हुई सुधाका सार है, दुःखरूपी समुद्रसे पार होनेके लिये जहाज है तथा स्वर्गलोकमें जानेके लिये सीढ़ी है, जिसे देवता और दानव भी प्रणाम करते हैं, जो समस्त पापोंका संहार करनेवाला, उत्तम गुणसमूहसे युक्त और शोभा-सम्पन्न है, ऐसे जलको आप धारण करती हैं। मैं प्रसन्नचित्त होकर आपको नमस्कार करता हूँ। स्वःसिन्धो दुरिताब्धिमग्नजनतासंस्तारणि प्रोल्लसत्- कल्लोलामलकान्तिनाशिततस्तोमे जगत्पावनि । गङ्गे देवि पुनीहि दुष्कृतभयक्रान्तं कृपाभाजनं मातर्मां शरणागतं शरणदे रक्षाद्य भो भीषितम् ॥ स्वर्गलोककी नदी भगवती गङ्गे ! आप पापके समुद्रमें डूबी हुई जनताको तारनेवाली हैं, अपनी उठती हुई शोभायुक्त लहरोंकी निर्मल कान्तिसे पापरूपी अन्धकार-राशिका नाश करती हैं तथा जगत्को पवित्र करनेवाली हैं; मैं पापके भयसे ग्रस्त और आपका कृपा-भाजन हूँ। शरणदायिनी माता ! आपकी शरणमें आया हूँ; आज मुझ भयभीतकी रक्षा कीजिये। हं हो मानस कम्पसे किमु सखे त्रस्तो भयान्नारकात् किं ते भीतिरिति श्रुतिर्दुरितकृत् संजायते नारकी। मा भैषीः शृणु मे गतिं यदि मया पापाचलस्पर्धिनी प्राप्ता ते निरयः कथं किमपरं किं मे न धर्मो धनम् ॥
उत्तराखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१५
ऐ मेरे चित्त ! ओ मित्र ! तुम नरकके भयसे त्रस्त होकर काँप क्यों रहे हो ? क्या तुम्हें यह सोचकर भय हो रहा है कि पापी मनुष्य नरकमें पड़ता है—ऐसा श्रुतिका कथन है। सखे ! इसके लिये भय न करो; मेरी क्या गति होगी—यह बताता हूँ, सुनो; यदि मुझे पापोंके पहाड़से भी टक्कर लेनेवाली भगवती गङ्गा प्राप्त हो गयी हैं तो तुम्हें नरककी प्राप्ति कैसे हो सकती है अथवा दूसरी कोई दुर्गति भी क्यों होगी। क्या मेरे पास धर्मरूपी धन नहीं है ?
स्वर्वासाधिप्रशंसामुदमनुभवितुं मज्जनं यत्र चोक्तं
स्वर्नार्यो वीक्ष्य हृष्टा विबुधसुरपतिप्राप्तिसंभावनेन ।
नीरे श्रीजह्नुकन्ये यमनियमरताः स्नान्ति ये तावकीने
देवत्वं ते लभन्ते स्फुटमशुभकृतोऽप्यत्र वेदाः प्रमाणम् ॥
जिस गङ्गाजीके जलमें किया हुआ स्नान स्वर्गलोकके निवास तथा प्रशंसाके आनन्दकी अनुभूतिका कारण बताया गया है, वहाँ किसीको स्नान करते देख स्वर्गलोककी देवियाँ एक नूतन देवता अथवा इन्द्रके मिलनेकी संभावनासे बहुत प्रसन्न होती हैं। जह्नुपुत्री गङ्गे ! जो लोग यम-नियमोंका पालन करते हुए आपके जलमें स्नान करते हैं, वे पहलेके पापी होनेपर भी निश्चय ही देवत्व प्राप्त कर लेते हैं—इस विषयमें वेद प्रमाण हैं।
बुद्धे सद्बुद्धिरेवं भवतु तव सखे मानस स्वस्ति तेऽस्तु
आस्तां पादौ पदस्थौ सततमिह युवां साधुदृष्टी च दृष्टी ।
वाणि प्राणप्रियेऽधिप्रकटगुणवपुः प्राप्नुहि प्राणपुष्टिं
यस्मात् सर्वैर्भवद्भिः सुखमतुलमहं प्राप्नुयां तीर्थपुण्यम् ॥
बुद्धे ! सदा इसी प्रकार तुम्हारी सद्बुद्धि बनी रहे। सखे मन ! तुम्हारा भी कल्याण हो। चरणो ! तुम भी इसी प्रकार योग्य पद (स्थान) पर स्थित रहो। नेत्रो ! तुम दोनों भी उत्तम दृष्टिसे सम्पन्न रहो। वाणी ! तुम प्राणोंकी प्रिया हो तथा प्रकट हुए उत्तम गुणोंसे युक्त शरीर ! तुम्हारी प्राणशक्तिका पोषण हो; क्योंकि मैं तुम सब लोगोंके साथ आज अतुलित सुख प्रदान करनेवाले तीर्थजनित पुण्यको प्राप्त करूँगा।
श्रीजाह्नवीरविसुतापरमेष्ठिपुत्री-
सिन्धुत्रयाभरण तीर्थवर प्रयाग ।
सर्वेश मामनुगृहाण नयस्व चोर्ध्व-
मन्तस्तमोदशविधं दलय स्वधाम्ना ॥
गङ्गा, यमुना और सरस्वती—इन तीनों नदियोंको आभूषणरूपमें धारण करनेवाले तीर्थराज प्रयाग ! सर्वेश्वर ! मुझपर अनुग्रह करो, मुझे ऊँचे उठाओ तथा मेरे अन्तःकरणके दस प्रकारके अविद्यान्धकारको अपने तेजसे नष्ट करो।
वागीशविष्णुवीशपुरन्दराद्याः
पापप्रणाशाय विदां विदोऽपि ।
भजन्ति यत्तीरमनीलनीलं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा इन्द्र आदि देवता और विद्वानोंमें श्रेष्ठ विद्वान् (ऋषि-महर्षि) भी जिसके श्वेत-कृष्णजलसे शोभित तटका सेवन करते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
कलिन्दजासङ्गमवाप्य यत्र
प्रत्यागता स्वर्गधुनी धुनोति ।
अध्यात्मतापत्रितयं जनस्य
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥
जहाँ आयी हुई गङ्गा कलिन्दनन्दिनी यमुनाका सङ्गम पाकर मनुष्योंके आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक—इन तीनों तापोंका नाश करती हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
श्यामो वटोऽश्यामगुणं वृणोति
स्वच्छायया श्यामलया जनानाम् ।
श्यामः श्रमं कृन्तति यत्र दृष्टः
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥
जहाँ श्यामवट उज्ज्वल गुण धारण करता है तथा दर्शन करनेपर अपनी श्यामल छायासे मनुष्योंके जन्म-मरणरूप श्रमका नाश कर डालता है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
ब्रह्मादयोऽप्यात्मकृतिं विहाय
भजन्ति पुण्यात्मकभाग्यधेयम् ।
यत्रोज्झिता दण्डधरः स्वदण्डं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः ॥
६१६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
ब्रह्मा आदि देवता भी अपना काम छोड़कर जिस पुण्यमय सौभाग्यसे युक्त तीर्थका सेवन करते हैं तथा जहाँ दण्डधारी यमराज भी अपना दण्ड त्याग देते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
यत्सेवया देवनृदेवतादि-
देवर्षयः प्रत्यहमाममन्ति।
स्वर्गं च सर्वोत्तमभूमिराज्यं
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥
देवता, मनुष्य, ब्राह्मण तथा देवर्षि भी प्रतिदिन जिसके सेवनसे स्वर्ग एवं सर्वोत्तम भूमण्डलका राज्य प्राप्त करते हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
एनांसि हन्तीति प्रसिद्धवार्ता
नामप्रतापेन दिशो द्रवन्ती।
यस्य त्रिलोकी प्रतता यशोभिः
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥
प्रयाग अपने नामके प्रतापसे समस्त पापोंका नाश कर डालता है, यह प्रसिद्ध वार्ता सम्पूर्ण दिशाओंमें फैली हुई है। जिसके सुयशसे सारी त्रिलोकी आच्छादित है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
धत्तोऽभितश्चामरचारुकान्ती
सितासिते यत्र सरिद्वरेण्ये।
आद्यो वटश्छत्रमिवातिभाति
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥
जहाँ दोनों किनारे श्याम और श्वेत सलिलसे सुशोभित दो श्रेष्ठ सरिताएँ यमुना और गङ्गा चँवरकी मनोहर कान्ति धारण कर रही हैं और आदि वट (अक्षयवट) छत्रके समान सुशोभित होता है, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
ब्राह्मीनपुत्रीत्रिपथास्त्रिवेणी-
समागमेनाक्षतयागमात्रान्।
यत्राप्लुतान् ब्रह्मपदं नयन्ति
स तीर्थराजो जयति प्रयागः॥
सरस्वती, यमुना और गङ्गा—ये तीन नदियाँ जहाँ डुबकी लगानेवाले मनुष्योंको, जो त्रिवेणी-संगमके सम्पर्कसे अक्षत यागफलको प्राप्त हो चुके हैं, ब्रह्मलोकमें पहुँचा देती हैं, उस तीर्थराज प्रयागकी जय हो।
केषाञ्चिजन्मकोटिर्व्रजति सुवचसा यामि यामीति यस्मिन्
केषाञ्चित्प्रोषितानां नियतमतिपतेद् वर्षवृन्दं वरिष्ठम्।
यः प्राप्तो भाग्यलक्षैर्भवति भवति नो वा स वाचामवाच्यो
दिष्ट्या वेणीविशिष्टो भवति दृगतिथिः किं प्रयागः प्रयागः॥
‘मैं प्रयागमें जाऊँगा, जाऊँगा’ इन सुन्दर बातोंमें ही कितने ही लोगोंके करोड़ों जन्म बीत जाते हैं [और प्रयागकी यात्रा सुलभ नहीं होती]। कुछ लोग घरसे चल तो देते हैं, पर मार्गमें ही फँस जानेके कारण उनके अनेकों वर्ष समाप्त हो जाते हैं। लाखों बार भाग्यकी सहायता होनेपर भी जो कभी प्राप्त होता है और कभी नहीं भी होता, वह त्रिवेणी-संगम-विशिष्ट उत्तम यज्ञभूमि प्रयाग वाणीसे परे है। क्या मेरा ऐसा भाग्य है कि वह मेरे नेत्रोंका अतिथि हो सके ?
लोकानामक्षमाणां मखकृतिषु कलौ स्वर्गकामैर्जपस्तु-
त्यादिस्तोत्नैर्वचोभिः कथममरपदप्राप्तिचिन्तातूराणाम्।
अग्निष्टोमाश्वमेधप्रमुखमखफलं सम्यगालोच्य साङ्गं
ब्रह्माद्यैस्तीर्थराजोऽभिमतद उपदिष्टोऽयमेव प्रयागः॥
कलियुगमें मनुष्य स्वर्गकी इच्छा होते हुए भी यज्ञ-यगादि करनेमें असमर्थ होनेके कारण जप, स्तुति, स्तोत्र एवं पाठ आदिके द्वारा किस प्रकार अमरपदकी प्राप्ति हो—इस चिन्तासे आतुर होंगे; उनको अङ्गोंसहित अग्निष्टोम और अश्वमेध आदि यज्ञोंका फल कैसे मिले—इसकी भलीभाँति आलोचना करके ब्रह्मा आदि देवताओंने इस तीर्थराज प्रयागको ही सब प्रकारके अभीष्ट फलोंका दाता बताया है।
मया प्रमादात्तुरतादिदोषतः
संध्याविधिर्नो समुपासितोऽभूत्।
चेदत्र संध्यां चरतोऽप्रमादतः
संध्यास्तु पूर्णाखिलजन्मनोऽपि मे॥
यदि मैने प्रमाद और आतुरता आदि दोषोंके कारण भलीभाँति संध्योपासना नहीं की है तो यहाँ सावधानता-पूर्वक संध्या करनेसे मेरे सम्पूर्ण जन्मकी संध्योपासना पूर्ण हो जाय।
अन्यत्रापि प्रगर्जन्महिमनि तपसि प्रेमिभिर्विप्रकृष्टै-
र्ध्यातः संकीर्तितो योऽभिमतपदविधातानिशं निर्व्यपेक्षम्।
उत्तरखण्ड ] * गङ्गाकी महिमा, श्रीविष्णु, यमुना, गङ्गा, प्रयाग, काशी, गया एवं गदाधरकी स्तुति * ६१७ *****************************************************************************************************
श्रीमत्पांशुं त्रिवेणीपरिवृढमतुलं तीर्थराजं प्रयागं
गोऽलंकारप्रकाशं स्वयममरवरैश्चार्चितं तं नमामि ॥
जो माघमासमें अपनी महिमाके विषयमें अन्यत्र भी गर्जना करता है, प्रेमीजनोंके दूरसे भी अपना ध्यान और कीर्तन करनेपर जो बिना किसीकी सहायताके निरन्तर अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है, जिसकी धूलिराशि शोभासे सम्पन्न है, जो त्रिवेणीका स्वामी है, जिसकी संसारमें कहीं भी तुलना नहीं है तथा जिसका दिव्य स्वरूप अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशमान है, उस श्रेष्ठ देवताओं-द्वारा पूजित तीर्थराज प्रयागको मैं प्रणाम करता हूँ।
अस्माभिः सुतपोऽन्वतापि किमहोऽज्यन्त किं वाध्वराः
पात्रे दानमदायि किं बहुविधं किं वा सुराश्चार्चिताः ।
किं सत्तीर्थमसेवि किं द्विजकुलं पूजादिभिः सत्कृतं
येन प्राप्त सदाशिवस्य शिवदा सा राजधानी स्वयम् ॥
अहो ! हमलोगोंने क्या कोई उत्तम तपस्या की थी ? अथवा यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ? या किसी सुपात्रको नाना प्रकारकी वस्तुओंका दान दिया था ? अथवा देवताओंकी पूजा की थी ? या किसी उत्तम तीर्थका सेवन किया था ? अथवा ब्राह्मणवंशका पूजा आदिके द्वारा सत्कार किया था, जिससे भगवान् सदाशिवकी यह कल्याणदायिनी राजधानी काशी हमें स्वयं ही प्राप्त हो गयी !
भाग्यैर्मेऽधिगता ह्यनेकजनुषां सर्वाघविध्वंसिनी
सर्वाश्चर्यमयी मया शिवपुरी संसारसिन्धोस्तरी ।
लब्धं तज्जनुषः फलं कुलमलंचक्रे पवित्रीकृतः
स्वात्मा चाप्यखिलं कृतं किमपरं सर्वोपरिष्टात् स्थितम् ॥
मेरे बड़े भाग्य थे, जो अनेक जन्मोंकी पापराशिका विध्वंस करनेवाली संसार-समुद्रके लिये नौकारूपा यह सर्वाश्चर्यमयी शिवपुरी मुझे प्राप्त हुई। इससे जन्म लेनेका फल मिल गया। मेरे कुलकी शोभा बढ़ गयी। मेरी अन्तरात्मा पवित्र हो गयी तथा मेरे सम्पूर्ण कर्तव्य पूर्ण हो गये। अधिक क्या कहूँ, अब मैं सर्वोपरि पदपर प्रतिष्ठित हो गया।
जीवन्नरः पश्यति भद्रलक्षमेवं वदन्तीति मृषा न यस्मात् ।
तस्मान्मया वै वपुषेदृशेन प्राप्तापि काशी क्षणभङ्गुरेन ॥
मनुष्य जीवित रहे तो वह लाखों कल्याणकी बातें देखता है—ऐसी जो किंवदन्ती है, वह झूठी नहीं है; इसीलिये मैंने इस क्षणभङ्गुर शरीरसे भी काशी-जैसी पुरीको प्राप्त कर लिया।
काश्यां विधातुममरैरपि दिव्यभूमौ
सत्तीर्थलिङ्गगणनाञ्चर्नतो न शक्या ।
यानीह गुप्तविवृतानि पुरातनानि
सिद्धानि योजितकरः प्रणमामि तेभ्यः ॥
काशीपुरीकी दिव्य भूमिमें कितने उत्तम तीर्थ और लिङ्ग हैं, उनकी पूजनपूर्वक गणना करना देवताओंके लिये भी असंभव है। यहाँ गुप्त और प्रकटरूपसे जो-जो पुरातन सिद्धपीठ हैं, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
किं भीत्या दुरितात्कृतात् किमु मुदा पुण्यैरगण्यैः कृतैः
किं विद्याभ्यसनानन्मदेन जडतादोषाद् विषादेन किम् ।
किं गर्वेण धनोदयादधनतातपेन किं भो जनाः
स्नात्वा श्रीमण्णिकर्णिकापयसि चेद् विश्वेश्वरो दृश्यते ॥
मनुष्यो ! यदि श्रीमणिकर्णिकाके जलमें स्नान करके भगवान् विश्वनाथजीका दर्शन किया जाता हो तो पूर्वकृत पापोंसे भयकी क्या आवश्यकता है। अथवा किये हुए अगणित पुण्योंद्वारा प्राप्त होनेवाले आनन्दसे भी क्या लेना है। विद्याभ्यासको लेकर घमंड या मूर्खताके लिये खेद करनेसे क्या लाभ है ? धनकी प्राप्तिसे होनेवाले गर्व तथा निर्धनताके कारण होनेवाले संतापसे भी क्या प्रयोजन है।
अल्पस्फीतिनिरामयापि तनुताप्रव्यक्तशक्त्यात्मता
प्रोत्साहाढ्यबलेन केवलमनोरागाद्द्वितीयेन यत् ।
अप्राप्यापि मनोरथैरविषया स्वप्नप्रवृत्तेरपि
प्राप्ता सापि गदाधरस्य नगरी सद्योऽपवर्गप्रदा ॥
जो स्वल्प समृद्धिसे युक्त होनेपर भी निरामय (नाशरहित) है, सूक्ष्मताके द्वारा ही जो अपनी शक्ति-शालिता सूचित कर रही है, अप्राप्य होनेपर भी जो उत्साहयुक्त बल तथा विशुद्ध मानसिक अनुरागसे प्राप्त होती है, मनोरथोंकी भी जहाँतक पहुँच नहीं है, जो स्वप्नमें भी सुलभ नहीं होती, वह तत्काल मोक्ष प्रदान करनेवाली भगवान् गदाधरकी नगरी गया आज मुझे प्राप्त हुई है।
१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मन्ये नात्मकृतिर्न पूर्वपुरुषप्राप्तेर्बलं चात्र त-
त्रापीदं स्वजनप्रमाणमचलं किं शापतापादिकम्।
या दुष्प्रापगयाप्रयागयमुनाकाशीषु पर्वागमात्
प्राप्तिस्तत्र महाफलो विजयते श्रीशारदानुग्रहः ॥
कोई पुण्यपर्व आनेपर जो गया, प्रयाग, यमुना और काशी आदि दुर्लभ तीर्थोंमें आनेका सौभाग्य प्राप्त होता है, उसमें महान् फलदायक भगवती शारदाका अनुग्रह ही एकमात्र कारण है; उसीकी विजय है। मैं इसे अपना पुरुषार्थ नहीं मानता। पूर्वजोंने जो यहाँ आकर पुण्योपार्जन किया है, उसका बल भी इसमें सहायक नहीं है तथा स्वजनवर्गकी अविचल शक्ति भी इसमें कारण नहीं है। इन तीर्थोंमें आनेपर शाप-ताप आदि क्या कर सकते हैं।
यः श्राद्धसमये दूरात्स्मृतोऽपि पितृमुक्तिदः।
तं गयायां स्थितं साक्षान्नमामि श्रीगदाधरम् ॥
जो श्राद्ध-कालमें दूरसे स्मरण करनेपर भी पितरोंको मोक्ष प्रदान करते हैं, गयामें स्थित उन साक्षात् भगवान् श्रीगदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ।
पन्थानं समतीत्य दुस्तरमिमं दूराद्दवीयस्तरं
क्षुद्रव्याघ्रतरक्षकण्टकफणिप्रत्यर्थिभिः संकुलम्।
आगत्य प्रथमं ह्ययं कृपणवाग् याचेज्जनः कं परं
श्रीमद्द्वारि गदाधर प्रतिदिनं त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते ॥
भगवान् गदाधर ! यह आपका दास मक्खी, मच्छर, बाघ, चीते, काँटे, सर्प तथा लुटेरोंसे भरे हुए इस दुस्तर मार्गको, जो दूरसे भी दूर पड़ता है, तै करके पहले-पहल यहाँ आया है और दीन वाणीमें आपसे याचना करता है। भला, आपके सिवा और किसके सामने यह हाथ फैलाये। भगवन् ! यह सेवक प्रतिदिन आपके शोभासम्पन्न द्वारपर आकर दर्शनके लिये उत्कण्ठित रहता है।
सर्वात्मन्निजदर्शनेन च गयाश्राद्धेन वै दैवतान्
प्रीणन् विश्वमनीहवत् कथमिहौदासीन्यमालम्बसे।
किं ते सर्वद निर्दयत्वमधुना किं वा प्रभुत्वं कलेः
किं वा सत्त्वनिरीक्षणं नृषु चिरं किं वास्य सेवारुचिः ॥
सर्वात्मन् ! आप अपने दर्शनसे तथा गयामें किये जानेवाले श्राद्धसे देवताओंसहित सम्पूर्ण विश्वको तृप्त करते हैं; फिर मेरे सामने क्यों निश्चेष्ट-से होकर उदासीन भाव धारण कर रहे हैं ? भक्तको सर्वस्व देनेवाले दयामय ! क्या इस समय आपने निर्दयता धारण कर ली है ? या यह कलियुगका प्रभाव है ? अथवा देर लगाकर आप मनुष्योंके सत्त्व (शुद्ध भाव एवं धैर्य) की परीक्षा ले रहे हैं या इस दासकी भगवत्सेवामें कितनी रुचि है, इसका निरीक्षण कर रहे हैं ?
गदाधर मया श्राद्धं यच्चीर्णं त्वत्प्रसादतः।
अनुजानीहि मां देव गमनाय गृहं प्रति ॥*
गदाधर ! आपकी कृपासे मैंने यहाँ श्राद्धका अनुष्ठान किया है; [इसे स्वीकार कीजिये और] देव ! अब मुझे घर जानेकी आज्ञा दीजिये।
एवं हि देवतानां च स्तोत्रं स्वर्गार्थदायकम्।
श्राद्धकाले पठेन्नित्यं स्नानकाले तु यः पठेत् ॥
सर्वतीर्थसमं स्नानं श्रवणात्पठनाज्जपात् ॥
प्रयागस्य च गङ्गाया यमुनायाः स्तुतेर्द्विज।
श्रवणेन विनश्यन्ति दोषाश्चैव तु कर्मजाः ॥
(२३।५१, ५३, ५४)
इस प्रकार यह देवताओंका स्तोत्र स्वर्ग एवं अभीष्ट वस्तु प्रदान करनेवाला है। जो मनुष्य श्राद्धकालमें तथा प्रतिदिन स्नानके समय इसका पाठ करता है, उसे सब तीर्थोंमें स्नानके समान पुण्य होता है। इसके श्रवण, पाठ तथा जपसे उक्त फलकी सिद्धि होती है। ब्रह्मन् ! प्रयाग, गङ्गा तथा यमुनाकी स्तुतिका श्रवण करनेसे कर्मजन्य दोष नष्ट हो जाते हैं।
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* अध्याय २३ श्लोक १५से ५०तक।
१५१-तुलसी, शालग्राम तथा प्रयागतीर्थका माहात्म्य
उत्तरखण्ड ]
* तुलसी, शालग्राम तथा प्रयागतीर्थका माहात्म्य *
६१९
तुलसी, शालग्राम तथा प्रयागतीर्थका माहात्म्य
'शिवजी बोले— नारद! सुनो; अब मैं तुलसीका माहात्म्य बताता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त किये हुए पापसे छुटकारा पा जाता है। तुलसीका पत्ता, फूल, फल, मूल, शाखा, छाल, तना और मिट्टी आदि सभी पावन हैं।* जिनका मृत शरीर तुलसी-काष्ठकी आगसे जलाया जाता है, वे विष्णुलोकमें जाते हैं। मृत पुरुष यदि अगम्यागमन आदि महान् पापोंसे ग्रस्त हो, तो भी तुलसी-काष्ठकी अग्निसे देहका दाह-संस्कार होनेपर वह शुद्ध हो जाता है। जो मृत पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंमें तुलसीका काष्ठ देकर पश्चात् उसका दाह-संस्कार करता है, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है। जिसकी मृत्युके समय श्रीहरिका कीर्तन और स्मरण हो तथा तुलसीकी लकड़ीसे जिसके शरीरका दाह किया जाय, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यदि दाह-संस्कारके समय अन्य लकड़ियोंके भीतर एक भी तुलसीका काष्ठ हो तो करोड़ों पापोंसे युक्त होनेपर भी मनुष्यकी मुक्ति हो जाती है।† तुलसीकी लकड़ीसे मिश्रित होनेपर सभी काष्ठ पवित्र हो जाते हैं। तुलसी-काष्ठकी अग्निसे मृत मनुष्यका दाह होता देख विष्णुदूत ही आकर उसे वैकुण्ठमें ले जाते हैं; यमराजके दूत उसे नहीं ले जा सकते। वह करोड़ों जन्मोंके पापसे मुक्त हो भगवान् विष्णुको प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी-काष्ठकी अग्निमें जलाये जाते हैं, उन्हें विमानपर बैठकर वैकुण्ठमें जाते देख देवता उनके ऊपर पुष्पाञ्जलि चढ़ाते हैं। ऐसे पुरुषको देखकर भगवान् विष्णु और शिव संतुष्ट होते हैं तथा श्रीजनार्दन उसके सामने जा हाथ पकड़कर उसे अपने धाममें ले जाते हैं। जिस अग्निशाला अथवा श्मशानभूमिमें घीके साथ तुलसी-काष्ठकी अग्नि प्रज्वलित होती है, वहाँ जानेसे मनुष्योंका पातक भस्म हो जाता है।
जो ब्राह्मण तुलसी-काष्ठकी अग्निमें हवन करते हैं, उन्हें एक-एक सिक्थ (भातके दाने) अथवा एक-एक तिलमें अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। जो भगवान्को तुलसी-काष्ठका धूप देता है, वह उसके फलस्वरूप सौ यज्ञानुष्ठान तथा सौ गोदानका पुण्य प्राप्त करता है। जो तुलसीकी लकड़ीकी आँचसे भगवान्का नैवेद्य तैयार करता है, उसका वह अन्न यदि थोड़ा-सा भी भगवान् केशवको अर्पण किया जाय तो वह मेरुके समान अन्नदानका फल देनेवाला होता है। जो तुलसी-काष्ठकी आगसे भगवान्के लिये दीपक जलाता है, उसे दस करोड़ दीप-दानका पुण्य प्राप्त होता है। इस लोकमें पृथ्वीपर उसके समान वैष्णव दूसरा कोई नहीं दिखायी देता। जो भगवान् श्रीकृष्णको तुलसी-काष्ठका चन्दन अर्पण करता तथा उनके श्रीविग्रहमें उस चन्दनको भक्तिपूर्वक लगाता है। वह सदा श्रीहरिके समीप रमण करता है। जो मनुष्य अपने अङ्गमें तुलसीकी कीचड़ लगाकर श्रीविष्णुका पूजन करता है, उसे एक ही दिनमें सौ दिनोंके पूजनका पुण्य मिल जाता है। जो पितरोंके पिण्डमें तुलसीदल मिलाकर दान करता है, उसके दिये हुए एक दिनके पिण्डसे पितरोंको सौ वर्षोंतक तृप्ति बनी रहती है। तुलसीकी जड़की मिट्टीके द्वारा विशेषरूपसे स्नान करना चाहिये। इससे जबतक वह मिट्टी शरीरमें लगी रहती है, तबतक स्नान करनेवाले पुरुषको तीर्थ-स्नानका फल मिलता है। जो तुलसीकी नयी मञ्जरीसे भगवान्की पूजा करता है, उसे नाना प्रकारके पुष्पोंद्वारा किये हुए पूजनका फल प्राप्त होता है। जबतक सूर्य और चन्द्रमा हैं, तबतक वह उसका पुण्य भोगता है। जिस घरमें तुलसी-वृक्षका बगीचा है, उसके दर्शन और स्पर्शसे भी ब्रह्महत्या आदि सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
* पत्रं पुष्पं फलं मूलं शाखा त्वक् स्कन्धसंज्ञितम्। तुलसीसंभवं सर्वं पावनं मृत्तिकादिकम्॥ (२४।२)
† यद्येकं तुलसीकाष्ठं मध्ये काष्ठस्य तस्य हि। दाहकाले भवेन्मुक्तिः कोटिपापयुतस्य च॥ (२४।७)
६२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
जिस-जिस घर, गाँव अथवा वनमें तुलसीका वृक्ष हो, वहाँ-वहाँ जगदीश्वर श्रीविष्णु प्रसन्नचित्त होकर निवास करते हैं। उस घरमें दरिद्रता नहीं रहती और बन्धुओंसे वियोग नहीं होता। जहाँ तुलसी विराजमान होती हैं, वहाँ दुःख, भय और रोग नहीं ठहरते। यों तो तुलसी सर्वत्र ही पवित्र होती हैं, किन्तु पुण्यक्षेत्रमें वे अधिक पावन मानी गयी हैं। भगवान्के समीप पृथ्वी-तलपर तुलसीको लगानेसे सदा विष्णुपद (वैकुण्ठ-धाम) की प्राप्ति होती है। तुलसीद्वारा भक्तिपूर्वक पूजित होनेपर शान्तिकारक भगवान् श्रीहरि भयंकर उत्पातों, रोगों तथा अनेक दुर्निमित्तोंका भी नाश कर डालते हैं। जहाँ तुलसीकी सुगन्ध लेकर हवा चलती है, वहाँकी दसों दिशाएँ और चारों प्रकारके जीव पवित्र हो जाते हैं। मुनिश्रेष्ठ ! जिस गृहमें तुलसीके मूलकी मिट्टी मौजूद है, वहाँ सम्पूर्ण देवता तथा कल्याणमय भगवान् श्रीहरि सर्वदा स्थित रहते हैं। ब्रह्मन् ! तुलसी-वनकी छाया जहाँ-जहाँ जाती हो, वहाँ-वहाँ पितरोंकी तृप्तिके लिये तर्पण करना चाहिये।
नारद ! जहाँ तुलसीका समुदाय पड़ा हो, वहाँ किया हुआ पिण्डदान आदि पितरोंके लिये अक्षय होता है। तुलसीकी जड़में ब्रह्मा, मध्यभागमें भगवान् जनार्दन तथा मञ्जरीमें श्रीरुद्रदेवका निवास है; इसीसे वह पावन मानी गयी है। विशेषतः शिवमन्दिरमें यदि तुलसीका वृक्ष लगाया जाय तो उससे जितने बीज तैयार होते हैं, उतने ही युगोंतक मनुष्य स्वर्गलोकमें निवास करता है। जो पार्वण श्राद्धके अवसरपर, श्रावण मासमें तथा संक्रान्तिके दिन तुलसीका पौधा लगाता है, उसके लिये वह अत्यन्त पुण्यदायिनी होती है। जो प्रतिदिन तुलसीदलसे भगवान्की पूजा करता है, वह यदि दरिद्र हो तो धनवान् हो जाता है। तुलसीकी मूर्ति सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली होती है; वह श्रीकृष्णकी कीर्ति प्रदान करती है। जहाँ शालग्रामकी शिला होती है, वहाँ श्रीहरिका सांनिध्य बना रहता है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान काशीसे सौगुना अधिक महत्त्वशाली है। शालग्रामकी पूजासे कुरुक्षेत्र, प्रयाग तथा नैमिषारण्यकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जहाँ कहीं शालग्राममयी मुद्रा हो, वहाँ काशीका सारा पुण्य प्राप्त हो जाता है। मनुष्य ब्रह्महत्या आदि जो कुछ पाप करता है, वह सब शालग्रामशिलाकी पूजासे शीघ्र नष्ट हो जाता है।
महादेवजी कहते हैं—नारद ! अब मैं वेदोंमें कही हुई प्रयागतीर्थकी महिमाका वर्णन करूँगा। जो मनुष्य पुण्य-कर्म करनेवाले हैं, वे ही प्रयागमें निवास करते हैं। जहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती—तीनों नदियोंका संगम है, वही तीर्थप्रवर प्रयाग है; वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। इसके समान तीर्थ तीनों लोकोंमें न कोई हुआ है न होगा। जैसे ग्रहोंमें सूर्य और नक्षत्रोंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब तीर्थोंमें प्रयाग नामक तीर्थ उत्तम है। विद्वन् ! जो प्रातःकाल प्रयागमें स्नान करता है, वह महान् पापसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त होता है। जो दरिद्रताको दूर करना चाहता हो, उसे प्रयागमें जाकर कुछ दान करना चाहिये। जो मनुष्य प्रयागमें जाकर वहाँ स्नान करता है, वह धनवान् और दीर्घजीवी होता है। वहाँ जाकर मनुष्य अक्षयवटका दर्शन करता है, उसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्याका पाप नष्ट होता है। उसे आदिवट कहा गया है। कल्पान्तमें भी उसका दर्शन होता है। उसके पत्रपर भगवान् विष्णु शयन करते हैं; इसलिये वह अविनाशी माना गया है। विष्णुभक्त मनुष्य प्रयागमें अक्षयवटका पूजन करते हैं। उस वृक्षमें सूत लपेटकर उसकी पूजा करनी चाहिये।
वहाँ 'माधव' नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णु नित्य विराजमान रहते हैं; उनका दर्शन अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष महापापोंसे छुटकारा पा जाता है। देवता, ऋषि और मनुष्य—सभी वहाँ अपने-अपने योग्य स्थानका आश्रय लेकर नित्य निवास करते हैं। गोहत्यारा, चाण्डाल, दुष्ट, दूषितहृदय, बालघाती तथा अज्ञानी मनुष्य भी यदि वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है तो चतुर्भुजरूप धारण करके सदा ही वैकुण्ठ-धाममें निवास करता है। जो मानव प्रयागमें माघ-स्नान करता है, उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलकी कोई गणना नहीं है। भगवान् नारायण प्रयागमें स्नान करनेवाले पुरुषोंको भोग और
उत्तरखण्ड ] * त्रिरात्र तुलसीव्रतकी विधि और महिमा * ६२१
मोक्ष प्रदान करते हैं। जैसे ग्रहोंमें सूर्य और नक्षत्रोंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार महीनोंमें माघ मास श्रेष्ठ है। यह सभी कर्मोंके लिये उत्तम है। विद्वन् ! यह माघ-मकरका योग चराचर त्रिलोकीके लिये दुर्लभ है। जो इसमें यत्नपूर्वक सात, पाँच अथवा तीन दिन भी प्रयाग-स्नान कर लेता है, उसका अभ्युदय होता है। मनुष्य आदि चराचर जीव प्रयाग तीर्थका सेवन करके वैकुण्ठलोकको प्राप्त होते हैं। दिव्यलोकमें रहनेवाले जो वसिष्ठ और सनकादि ऋषि हैं, वे भी प्रयागतीर्थका बारंबार सेवन करते हैं। विष्णु, रुद्र और इन्द्र भी तीर्थप्रवर प्रयागमें निवास करते हैं। प्रयागमें दान और नियमोंके पालनकी प्रशंसा होती है। वहाँ स्नान और जलपान करनेसे पुनर्जन्म नहीं होता।
★ त्रिरात्र तुलसीव्रतकी विधि और महिमा
नारदजी बोले— भगवन् ! आपकी कृपासे मैंने तुलसीके माहात्म्यका श्रवण किया। अब त्रिरात्र तुलसी-व्रतका वर्णन कीजिये।
महादेवजीने कहा— विद्वन् ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो, सुनो; यह व्रत बहुत पुराना है। इसका श्रवण करके मनुष्य निश्चय ही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। नारद ! व्रत करनेवाला पुरुष कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको नियम ग्रहण करे। पृथ्वीपर सोये और इन्द्रियोंको काबूमें रखे। त्रिरात्रव्रत करनेके उद्देश्यसे वह शौच-स्नानसे शुद्ध हो मनको संयममें रखते हुए प्रतिदिन रातको नियमपूर्वक तुलसीवनके समीप शयन करे। मध्याह्न-कालमें नदी आदिके निर्मल जलमें स्नान करके विधि-पूर्वक देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। इस व्रतमें पूजाके लिये लक्ष्मी और श्रीविष्णुकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये तथा उनके लिये दो वस्त्र भी तैयार करा लेने चाहिये। वस्त्र पीत और श्वेत वर्णके हों। व्रतके आरम्भमें विधिपूर्वक नवग्रह-शान्ति कराये, उसके बाद चरु पकाकर उसके द्वारा श्रीविष्णु देवताकी प्रीतिके लिये हवन करे। द्वादशीके दिन देवदेवेश्वर भगवान्की यत्नपूर्वक पूजा करके विधिके अनुसार कलश-स्थापन करे। कलश शुद्ध हो और फूटा-टूटा न हो। उसमें पञ्चरत्न, पञ्चपल्लव तथा ओषधियाँ पड़ी हों। कलशके ऊपर एक पात्र रखे और उसके भीतर लक्ष्मीजीके साथ भगवान् विष्णुकी प्रतिमाको विराजमान करे। फिर वैदिक और पौराणिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए तुलसी-वृक्षके मूलमें भगवत्प्रतिमाकी स्थापना करे। तुलसीकी वाटिकाको केवल जलसे सींचे। फिर देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान्को पञ्चामृतसे स्नान कराकर इस प्रकार प्रार्थना करे—
प्रार्थना-मन्त्र
योजनन्तरूपोऽखिलविश्वरूपो
गर्भोदके लोकविधिं बिभर्ति।
प्रसीदतामेष स देवदेवो
यो मायया विश्वकृदेव रूपी ॥
'जिनके रूपका कहीं अन्त नहीं है, सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो गर्भरूप (आधारभूत) जलमें स्थित होकर लोकसृष्टिका भरण-पोषण करते हैं और मायासे ही रूपवान् होकर समस्त संसारकी सृष्टि करते हैं, वे देवदेव परमेश्वर मुझपर प्रसन्न हों।'
आवाहन-मन्त्र
आगच्छाच्युत देवेश तेजोरराशे जगत्पते।
सदैव तिमिरध्वंसिंस्त्राहि मां भवसागरात् ॥
'हे अच्युत ! हे देवेश्वर ! हे तेजःपुञ्ज जगदीश्वर ! यहाँ पधारिये; आप सदा ही अज्ञानान्धकारका नाश करनेवाले हैं, इस भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये।'
स्नान-मन्त्र
पञ्चामृतेन सुस्नातस्तथा गन्धोदकेन च।
गङ्गादीनां च तोयेन स्नातोऽनन्तः प्रसीदतु ॥
'पञ्चामृत और चन्दनयुक्त जलसे भलीभाँति नहाकर गङ्गा आदि नदियोंके जलसे स्नान किये हुए भगवान् अनन्त मुझपर प्रसन्न हों।'
६२२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ****************************************************************************************
विलेपन-मन्त्र
श्रीखण्डागुरुकर्पूरकुङ्कुमादिविलेपनम् ।
भक्त्या दत्तंमयाऽऽघ्रेयं लक्ष्म्या सह गृहाण वै ॥
'भगवन् ! मैंने चन्दन, अरगजा, कपूर और केसर आदिका सुगन्धित अङ्गराग भक्तिपूर्वक अर्पण किया है; आप श्रीलक्ष्मीजीके साथ इसे स्वीकार करें।'
वस्त्र-मन्त्र
नारायण नमस्तेऽस्तु नरकार्णवतारण ।
त्रैलोक्याधिपते तुभ्यं ददामि वसनं शुचि ॥
'नरकके समुद्रसे तारनेवाले नारायण ! आपको नमस्कार है। त्रिलोकीनाथ ! मैं आपको पवित्र वस्त्र अर्पण करता हूँ।'
यज्ञोपवीत-मन्त्र
दामोदर नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात् ।
ब्रह्मसूत्रं मया दत्तं गृहाण पुरुषोत्तम ॥
'दामोदर ! आपको नमस्कार है, भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये। पुरुषोत्तम ! मैंने ब्रह्मसूत्र (यज्ञोपवीत) अर्पण किया है, आप इसे ग्रहण करें।'
पुष्प-मन्त्र
पुष्पाणि च सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो ।
मया दत्तानि देवेश प्रीतितः प्रतिगृह्यताम् ॥
'प्रभो ! मैंने मालती आदिके सुगन्धित पुष्प सेवामें प्रस्तुत किये हैं, देवेश्वर ! आप इन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें।'
नैवेद्य-मन्त्र
नैवेद्यं गृह्यतां नाथ भक्ष्यभोज्यैः समन्वितम् ।
सर्वै रसैः सुसम्पन्नं गृहाण परमेश्वर ॥
'नाथ ! भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे युक्त नैवेद्य स्वीकार कीजिये; परमेश्वर ! यह सब रसोंसे सम्पन्न है, इसे ग्रहण करें।'
ताम्बूल-मन्त्र
पूगानि नागपत्राणि कर्पूरसहितानि च ।
मया दत्तानि देवेश ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
'देवेश्वर ! मैंने सुपारी, पानके पत्ते और कपूर आपकी सेवामें भेंट किये हैं; आप यह बीड़ा स्वीकार करें।'
तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक धूप, अगर तथा घी मिलाया हुआ गुग्गुल—इनकी आहुति देकर भगवान्को सुँघाये। इस प्रकार पूजा करनी चाहिये। घीका दीपक जलाना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ ! एकाग्रचित्त हो भगवान् श्रीलक्ष्मी-नारायणके सामने तथा तुलसीवनके समीप नाना प्रकारका दीपक सजाना चाहिये। चक्रधारी देवाधिदेव विष्णुको प्रतिदिन अर्घ्य भी देना चाहिये। पुत्र-प्राप्तिके लिये नवमीको नारियलका अर्घ्य देना उत्तम है। धर्म, काम तथा अर्थ—तीनोंकी सिद्धिके लिये दशमीको बिजौरेका अर्घ्य अर्पण करना उचित है तथा एकादशीको अनारसे अर्घ्य देना चाहिये; इससे सदा दरिद्रताका नाश होता है। नारद ! बाँसके पात्रमें सप्तधान्य रखकर उसमें सात फल रखे; फिर तुलसीदल, फूल एवं सुपारी डालकर उस पात्रको वस्त्रसे ढक दे। तत्पश्चात् उसे भगवान्के सम्मुख निवेदन करे। विप्रेन्द्र ! अर्घ्य निम्नाङ्कित मन्त्रसे देना चाहिये; इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो—
अर्घ्य-मन्त्र
तुलसीसहितो देव सदा शङ्खेन संयुतम् ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं देवदेव नमोऽस्तु ते ॥
'देव ! आप तुलसीजीके साथ मेरे दिये हुए इस शङ्खयुक्त अर्घ्यको ग्रहण करें। देवदेव ! आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार लक्ष्मीसहित देवेश्वर भगवान् विष्णुकी पूजा करके व्रतकी पूर्तिके निमित्त उन देवदेवेश्वरसे प्रार्थना करे—
उपोषितोऽहं देवेश कामक्रोधविवर्जितः ।
व्रतेनानेन देवेश त्वमेव शरणं मम ॥
गृहीतेऽस्मिन् व्रते देव यदपूर्णं कृतं मया ।
सर्वं तदस्तु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥
नमः कमलपत्राक्ष नमस्ते जलशायिने ।
इदं व्रतं मया चीर्णं प्रसादात्तव केशव ॥
उत्तरखण्ड ] * अन्नदान, जलदान, तड़ाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा * ६२३
अज्ञानतिमिरध्वंसिन् व्रतेनानेन केशव ।
प्रसादसुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥*
'देवेश्वर ! मैंने काम-क्रोधसे रहित होकर इस व्रतके द्वारा उपवास किया है। देवेश ! आप ही मेरे शरणदाता हैं। देव ! जनार्दन ! इस व्रतको ग्रहण करके मैंने इसके जिस अङ्गकी पूर्ति न की हो, वह सब आपके प्रसादसे पूर्ण हो जाय। कमलनयन ! आपको नमस्कार है। जलशायी नारायण ! आपको प्रणाम है। केशव ! आपके ही प्रसादसे मैंने इस व्रतका अनुष्ठान किया है। अज्ञानान्धकारका विनाश करनेवाले केशव ! आप इस व्रतसे प्रसन्न होकर मुझे ज्ञान-दृष्टि प्रदान करें।'
तदनन्तर रातमें जागरण, गान तथा पुस्तकका स्वाध्याय करे। गानविद्या तथा नृत्यकलामें प्रवीण पुरुषोंद्वारा संगीत और नृत्यकी व्यवस्था करे। अत्यन्त सुन्दर एवं पवित्र उपाख्यानोंके द्वारा रात्रिका समय व्यतीत करे। निशाके अन्तमें प्रभात होनेपर जब सूर्यदेवका उदय हो जाय, तब ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके भक्तिपूर्वक वैष्णव श्राद्ध करे। यज्ञोपवीत, वस्त्र, माला तथा चन्दन देकर वस्त्राभूषण एवं केसरके द्वारा पूजनपूर्वक तीन ब्राह्मण-दम्पतीको भोजन कराये। घृत-मिश्रित खीरके द्वारा यथेष्ट भोजन करानेके पश्चात् दक्षिणासहित पान, फूल और गन्ध आदि दान करे। अपनी शक्तिके अनुसार बाँसके अनेक पात्र बनवाकर उन्हें पके हुए नारियल, पकवान, वस्त्र तथा भाँति-भाँतिके फलोंसे भरे। सपत्नीक आचार्यको वस्त्र पहनाये। दिव्य आभूषण देकर चन्दन और मालासे उनका पूजन करे। फिर उन्हें सब सामग्रियोंसे युक्त दूध देनेवाली गौ दान करे। गौके साथ दक्षिणा, वस्त्र, आभूषण, दोहनपात्र तथा अन्यान्य सामग्री भी दे। श्रीलक्ष्मीनारायणकी प्रतिमा भी सब सामग्रियोंसहित आचार्यको दे। सब तीर्थोंमें स्नान करनेवाले मनुष्योंको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सब इस व्रतके द्वारा देव-देव विष्णुके प्रसादसे प्राप्त हो जाता है। व्रत करनेवाला पुरुष इस लोकमें मनको प्रिय लगनेवाला सम्पूर्ण पदार्थों और प्रचुर भोगोंका उपभोग करके अन्तमें श्रीविष्णुकी कृपासे भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होता है।
अन्नदान, जलदान, तड़ाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा
नारदजीने पूछा— भगवन्! गुणोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देनेकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य इस लोकमें किन-किन वस्तुओंका दान करे ? यह सब बताइये।
महादेवजी बोले— देवर्षिप्रवर ! सुनो—लोकमें तत्त्वको जानकर सज्जन पुरुष अन्नदानकी ही प्रशंसा करते हैं; क्योंकि सब कुछ अन्नमें ही प्रतिष्ठित है। अतएव साधु महात्मा विशेषरूपसे अन्नका ही दान करना चाहते हैं। अन्नके समान कोई दान न हुआ है न होगा। यह चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। लोकमें अन्न ही बलवर्धक है। अन्नमें ही प्राणोंकी स्थिति है। कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको उचित है कि वह अपने कुटुम्बको कष्ट देकर भी अन्नकी भिक्षा माँगनेवाले महात्मा ब्राह्मणको अवश्य दान दे। नारद ! जो याचना करनेवाले पीड़ित ब्राह्मणको अन्न दे, वही विद्वानोंमें श्रेष्ठ है। यह दान आत्माके पारलौकिक सुखका साधन है। रास्तेका थका-माँदा गृहस्थ ब्राह्मण यदि भोजनके समय घरपर आकर उपस्थित हो जाय तो कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अवश्य उसे अन्न देना चाहिये। अन्नदाता इहलोक और परलोकमें भी सुख उठाता है। थके-माँदे अपरिचित राहगीरको जो बिना क्लेशके अन्न देता है, वह सब धर्मोंका फल प्राप्त करता है। अतिथिकी न तो निन्दा करे और न उससे द्रोह ही रखे। उसे अन्न अर्पण करे। उस दानकी विशेष प्रशंसा है।
महामुने ! जो मनुष्य अन्नसे देवताओं, पितरों,
* उत्तरखण्डके २६वें अध्यायसे उद्धृत।
६२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
ब्राह्मणों तथा अतिथियोंको तृप्त करता है, उसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। महान् पाप करके भी जो याचकको—विशेषतः ब्राह्मणको अन्न-दान करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। ब्राह्मणको दिया हुआ दान अक्षय होता है। शूद्रको भी किया हुआ अन्न-दान महान् फल देनेवाला है। अन्न-दान करते समय याचकसे यह न पूछे कि वह किस गोत्र और किस शाखाका है, तथा उसने कितना अध्ययन किया है ? अन्नका अभिलाषी कोई भी क्यों न हो, उसे दिया हुआ अन्न-दान महान् फल देनेवाला होता है। अतः मनुष्योंको इस पृथ्वीपर विशेष रूपसे अन्नका दान करना चाहिये।
जलका दान भी श्रेष्ठ है; वह सदा सब दानोंमें उत्तम है। इसलिये बावली, कुआँ और पोखरा बनवाना चाहिये। जिसके खोदे हुए जलाशयमें गौ, ब्राह्मण और साधु पुरुष सदा पानी पीते हैं, वह अपने कुलको तार देता है। नारद ! जिसके पोखरेमें गर्मीके समयतक पानी ठहरता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकटका सामना नहीं करता। पोखरा बनवानेवाला पुरुष तीनों लोकोंमें सर्वत्र सम्मानित होता है। मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ और कामका यही फल बतलाते हैं कि देशमें खेतके भीतर उत्तम पोखरा बनवाया जाय, जो प्राणियोंके लिये महान् आश्रय हो। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर प्राणी भी जलाशयका आश्रय लेते हैं। जिसके पोखरेमें केवल वर्षा ऋतुमें ही जल रहता है, उसे अग्निहोत्रका फल मिलता है। जिसके तालाबमें हेमन्त और शिशिर कालतक जल ठहरता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। यदि वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतुतक पानी रुकता हो तो मनीषी पुरुष अतिरात्र और अश्वमेध यज्ञोंका फल बतलाते हैं।
अब वृक्ष लगानेके जो लाभ हैं, उनका वर्णन सुनो। महामुने ! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने भूतकालीन पितरों तथा होनेवाले वंशजोंका भी उद्धार कर देता है। इसलिये वृक्षोंको अवश्य लगाना चाहिये। वह पुरुष परलोकमें जानेपर वहाँ अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है। वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, पत्तोंसे पितरोंका तथा छायासे समस्त अतिथियोंका पूजन करते हैं। किन्नर, यक्ष, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मानव तथा ऋषि भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं। वृक्ष फूल और फलोंसे युक्त होकर इस लोकमें मनुष्योंको तृप्त करते हैं। वे इस लोक और परलोकमें भी धर्मतः पुत्र माने गये हैं। जो पोखरेके किनारे वृक्ष लगाते, यज्ञानुष्ठान करते तथा जो सदा सत्य बोलते हैं, वे कभी स्वर्गसे भ्रष्ट नहीं होते।
सत्य ही परम मोक्ष है, सत्य ही उत्तम शास्त्र है, सत्य देवताओंमें जाग्रत् रहता है तथा सत्य परम पद है। तप, यज्ञ, पुण्यकर्म, देवर्षि-पूजन, आद्यविधि और विद्या—ये सभी सत्यमें प्रतिष्ठित हैं। सत्य ही यज्ञ, दान, मन्त्र और सरस्वती देवी हैं; सत्य ही व्रतचर्या है तथा सत्य ही ॐकार है। सत्यसे ही वायु चलती है, सत्यसे ही सूर्य तपता है, सत्यके प्रभावसे ही आग जलती है तथा सत्यसे ही स्वर्ग टिका हुआ है। लोकमें जो सत्य बोलता है, वह सब देवताओंके पूजन तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। एक हजार अश्वमेध यज्ञका पुण्य और सत्य—इन दोनोंको यदि तराजूपर रखकर तौला जाय तो सम्पूर्ण यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका ही पलड़ा भारी होगा। देवता, पितर और ऋषि सत्यमें ही विश्वास करते हैं। सत्यको ही परम धर्म और सत्यको ही परम पद कहते हैं। * सत्यको
* सत्यमेव परो मोक्षः सत्यमेव परं श्रुतम्। सत्यं देवेषु जागर्ति सत्यं च परमं पदम्॥
तपो यज्ञाश्च पुण्यं च तथा देवर्षिपूजनम्। आद्यो विधिश्च विद्या च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्यं यज्ञस्तथा दानं मन्त्रो देवी सरस्वती। व्रतचर्या तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च॥
सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः। सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्येन तिष्ठति॥
पूजनं सर्वदेवानां सर्वतीर्थावगाहनम्। सत्यं च वदते लोके सर्वमाप्नोत्यसंशयः॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। सर्वेषां सर्वयज्ञानां सत्यमेव विशिष्यते॥
सत्ये देवाः प्रतीयन्ते पितरो ऋषयस्तथा। सत्यमाहुः परं धर्मं सत्यमाहुः परं पदम्॥ (२८। २०—२६)
उत्तरखण्ड ] * अन्नदान, जलदान, तडाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा * ६२५ ****************************************************************************************
परब्रह्मका स्वरूप बताया गया है; इसलिये मैं तुम्हें सत्यका उपदेश करता हूँ। सत्यपरायण मुनि अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके सत्यधर्मका पालन करते हुए इस लोकसे स्वर्गको प्राप्त हुए हैं। सदा सत्य ही बोलना चाहिये, सत्यसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। सत्यरूपी तीर्थ अगाध, विस्तृत एवं पवित्र ह्रद (कुण्ड) से युक्त है; योगयुक्त पुरुषोंको उसमें मनसे स्नान करना चाहिये। यही स्नान उत्तम माना गया है। जो मनुष्य अपने, पराये अथवा पुत्रके लिये भी असत्य भाषण नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं। ब्राह्मणोंमें वेद, यज्ञ तथा मन्त्र नित्य निवास करते हैं; किन्तु जो ब्राह्मण सत्यका परित्याग कर देते हैं, उनमें वेद आदि शोभा नहीं देते; अतः सत्य-भाषण करना चाहिये।
नारदजीने कहा— भगवन् ! अब मुझे विशेषतः तपस्याका फल बताइये; क्योंकि प्रायः सभी वर्णोंका तथा मुख्यतः ब्राह्मणोंका तपस्या ही बल है।
महादेवजी बोले— नारद ! तपस्याको श्रेष्ठ बताया गया है। तपसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं, वे सदा देवताओंके साथ आनन्द भोगते हैं। तपसे मनुष्य मोक्ष पा लेता है, तपसे 'महत्' पदकी प्राप्ति होती है। मनुष्य अपने मनसे ज्ञान-विज्ञानका खजाना, सौभाग्य और रूप आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे तपस्यासे मिल जाती है। जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे कभी ब्रह्मलोकमें नहीं जाते। पुरुष जिस किसी कार्यका उद्देश्य लेकर तप करता है, वह सब इस लोक और परलोकमें उसे प्राप्त हो जाता है। शराबी, परस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी-जैसा पापी भी तपस्याके बलसे सबसे पार हो जाता है—सब पापोंसे छुटकारा पा लेता है।* तपस्याके प्रभावसे छियासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि स्वर्गमें रहकर देवताओंके साथ आनन्द भोग रहे हैं। तपस्यासे राज्य प्राप्त होता है। इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवता और असुरोंने तपस्यासे ही सदा सबका पालन किया है। तपस्यासे ही वे वृत्तिदाता हुए हैं। सम्पूर्ण लोकोंके हितमें लगे रहनेवाले दोनों देवता सूर्य और चन्द्रमा तपसे ही प्रकाशित होते हैं। नक्षत्र और ग्रह भी तपस्यासे ही कान्तिमान् हुए हैं। तपस्यासे मनुष्य सब कुछ पा लेता है, सब सुखोंका अनुभव करता है।
मुने ! जो जंगलमें फल-मूल खाकर तपस्या करता है तथा जो पहले केवल वेदका अध्ययन ही करता है—वे दोनों समान हैं। वह अध्ययन तपस्याके ही तुल्य है। श्रेष्ठ द्विज वेद पढ़ानेसे जो पुण्य प्राप्त करता है, स्वाध्याय और जपसे इसकी अपेक्षा दूना फल पा जाता है। जो सदा तपस्या करते हुए शास्त्रके अभ्याससे ज्ञानोपार्जन करता है और लोकको उस ज्ञानका बोध कराता है, वह परम पूजनीय गुरु है। पुराणवेत्ता पुरुष दानका सबसे श्रेष्ठ पात्र है। वह पतनसे त्राण करता है, इसलिये पात्र कहलाता है। जो लोग सुपात्रको धन, धान्य, सुवर्ण तथा भाँति-भाँतिके वस्त्र-दान करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो श्रेष्ठ पात्रको गौ, भैंस, हाथी और सुन्दर-सुन्दर घोड़े दान करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें अश्वमेधके अक्षय फलको प्राप्त होता है। जो सुपात्रको जोती-बोयी एवं फलसे भरी हुई सुन्दर भूमि दान करता है, वह अपने दस पीढ़ी पहलेके पूर्वजों और दस पीढ़ी बादतककी संतानोंको तार देता है तथा दिव्य विमानसे विष्णुलोकको जाता है। देवगण पुस्तक बाँचनेसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें यज्ञोंसे, प्रोक्षण (अभिषेक) से तथा फूलोंद्वारा की हुई पूजाओंसे भी नहीं होता। जो भगवान् विष्णुके मन्दिरमें धर्म-ग्रन्थका पाठ कराता है तथा देवी, शिव, गणेश और सूर्यके
* तपो हि परमं प्रोक्तं तपसा विन्दते फलम्। तपोरता हि ये नित्यं मोदन्ते सह दैवतैः ॥
तपसा मोक्षमाप्नोति तपसा विन्दते महत्। ज्ञानविज्ञानसम्पत्तिः सौभाग्यं रूपमेव च ॥
तपसा लभ्यते सर्वं मनसा यद्यदिच्छति। नातप्ततपसो यान्ति ब्रह्मलोकं कदाचन ॥
यत्कार्यं किञ्चिदास्थाय पुरुषस्तप्यते तपः। तत्सर्वं समवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥
सुरापः परदारी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः। तपसा तरते सर्वं सर्वतश्च विमुच्यते ॥ (२८।३५-३९)
६२६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मन्दिरमें भी उसकी व्यवस्था करता है, वह मानव राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। इतिहासपुराणके ग्रन्थोंका बाँचना पुण्यदायक है। ऐसा करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा अन्तमें सूर्यलोकका भेदन करके ब्रह्मलोकको चला जाता है। वहाँ सौ कल्पोंतक रहनेके पश्चात् इस पृथ्वीपर जन्म ले राजा होता है। एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका जो फल बताया गया है, उसे वह मनुष्य भी प्राप्त कर लेता है, जो देवताके आगे महाभारतका पाठ करता है। अतः सब प्रकारका प्रयत्न करके भगवान् विष्णुके मन्दिरमें इतिहासपुराणके ग्रन्थोंका पाठ करना चाहिये। वह शुभकारक होता है। विष्णु तथा अन्य देवताओंके लिये दूसरा कोई साधन इतना प्रीतिकारक नहीं है।
मन्दिरमें पुराणकी कथा कराने और सुपात्रको दान देनेसे होनेवाली सद्गतिके विषयमें एक आख्यान तथा गोपीचन्दनके तिलककी महिमा
महादेवजी कहते हैं—नारद ! इस विषयमें विज्ञ पुरुष एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। यह इतिहास अत्यन्त पुरातन, पुण्यदायक सब पापोंको हरनेवाला तथा शुभकारक है। देवर्षे ! ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारने लोक-पितामह ब्रह्माजीको नमस्कार करके मुझे यह उपाख्यान सुनाया था।
सनत्कुमार बोले—एक दिन मैं धर्मराजसे मिलने गया था। वहाँ उन्होंने बड़ी प्रसन्नता और भक्तिके साथ नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा मेरा सत्कार किया। तत्पश्चात् मुझे सुखमय आसनपर बैठनेके लिये कहा। बैठनेपर मैंने वहाँ एक अद्भुत बात देखी। एक पुरुष सोनेके विमानपर बैठकर वहाँ आया। उसे देखकर धर्मराज बड़े वेगसे आसनसे उठ खड़े हुए और आगन्तुकका दाहिना हाथ पकड़कर उन्होंने अर्घ्य आदिके द्वारा उसका पूर्ण सत्कार किया। तत्पश्चात् वे उससे इस प्रकार बोले।
धर्मने कहा—धर्मके द्रष्टा महापुरुष ! तुम्हारा स्वागत है ! मैं तुम्हारे दर्शनसे बहुत प्रसन्न हूँ। मेरे पास बैठो और मुझे कुछ ज्ञानकी बातें सुनाओ। इसके बाद उस धाममें जाना, जहाँ श्रीब्रह्माजी विराजमान हैं।
सनत्कुमार कहते हैं—धर्मराजके इतना कहते ही एक दूसरा पुरुष उत्तम विमानपर बैठा हुआ वहाँ आ पहुँचा। धर्मराजने विनीत भावसे उसका भी विमानपर ही पूजन किया तथा जिस प्रकार पहले आये हुए मनुष्यसे सान्त्वनापूर्वक वार्तालाप किया था, उसी प्रकार इस नवागन्तुकके साथ भी किया। यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैंने धर्मसे पूछा—'इन्होंने कौन-सा ऐसा कर्म किया है, जिसके ऊपर आप अधिक संतुष्ट हुए हैं? इन दोनोंके द्वारा ऐसा कौन-सा कर्म बन गया है, जिसका इतना उत्तम पुण्य है ? आप सर्वज्ञ हैं, अतः बताइये किस कर्मके प्रभावसे इन्हें दिव्य फलकी प्राप्ति हुई है ?' मेरी बात सुनकर धर्मराजने कहा—'इन
उत्तरखण्ड ] * मन्दिरमें पुराणकी कथा कराने तथा गोपीचन्दनके तिलककी महिमा * ६२७ *********************************************************************************************************************
दोनोंका किया हुआ कर्म बताता हूँ, सुनो। पृथ्वीपर वैदिश नामका एक विख्यात नगर है। वहाँ धरापाल नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जिन्होंने भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाकर उसमें उनकी स्थापना की। उस नगरमें जितने लोग रहते थे, उन सबको उन्होंने भगवान्का दर्शन करनेके लिये आदेश दिया। गाँवके भीतर बना हुआ श्रीविष्णुका वह सुन्दर मन्दिर लोगोंसे ठसाठस भर गया। तब राजाने पहले ब्राह्मण आदिके समुदायका पूजन किया, फिर उन महाबुद्धिमान् नरेशने इतिहास-पुराणके ज्ञाता एक श्रेष्ठ द्विजको, जो विद्यामें भी श्रेष्ठ थे, वाचक बनाकर उनकी विशेष रूपसे पूजा की। फिर क्रमशः गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे पुस्तकका भी पूजन करके राजाने वाचक ब्राह्मणसे विनयपूर्वक कहा— 'द्विजश्रेष्ठ ! मैंने जो यह भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाया है, इसमें धर्म श्रवण करनेकी इच्छासे चारों वर्णोंका समुदाय एकत्रित हुआ है; अतः आप पुस्तक बाँचिये। इस समय ये सौ स्वर्णमुद्राएँ उत्तम जीविकावृत्तिके रूपमें ग्रहण कीजिये और एक वर्षतक प्रतिदिन कथा कहिये। वर्ष समाप्त होनेपर पुनः और धन दूँगा।'
मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार राजाके आदेशसे वहाँ पुण्यमय कथा-वार्ताका क्रम चालू हो गया। वर्ष बीतते-बीतते आयु क्षीण हो जानेके कारण राजाकी मृत्यु हो गयी। तब मैंने तथा भगवान् विष्णुने भी इनके लिये द्युलोकसे विमान भेजा था। ये जो दूसरे ब्राह्मण यहाँ आये थे, इन्होंने सत्सङ्गके द्वारा उत्तम धर्मका श्रवण किया था। श्रवण करनेसे श्रद्धावश इनके हृदयमें परमात्माकी भक्तिका उदय हुआ। मुनिश्रेष्ठ ! फिर इन्होंने उन महात्मा वाचककी परिक्रमा की और उन्हें एक माशा सुवर्ण दान दिया। सुपात्रको दान देनेसे इन्हें इस प्रकारके फलकी प्राप्ति हुई है। मुने ! इस प्रकार यह कर्म, जिसे इन दोनोंने किया था, मैंने कह सुनाया।
महादेवजी कहते हैं—जो मनीषी पुरुष इस पुण्य-प्रसङ्गका माहात्म्य श्रवण करते हैं, उनकी किसी जन्ममें कभी दुर्गति नहीं होती। देवर्षिप्रवर ! अब दूसरी बात सुनाता हूँ, सुनो। गोपीचन्दनका माहात्म्य जैसा मैंने देखा और सुना है, उसका वर्णन करता हूँ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र—कोई भी क्यों न हो, जो विष्णुका भक्त होकर उनके भजनमें तत्पर रहकर अपने अङ्गोंमें गोपीचन्दन लगाता है, वह गङ्गाजलसे नहाये हुएकी भाँति सब दोषोंसे मुक्त हो जाता है। कल्याणकी इच्छा रखनेवाले वैष्णव ब्राह्मणोंके लिये गोपीचन्दनका तिलक धारण करना विशेष रूपसे कर्तव्य है। ललाटमें दण्डके आकारका, वक्षःस्थलमें कमलके सदृश, बाहुओंके मूलभागमें बाँसके पत्तेके समान तथा अन्यत्र दीपकके तुल्य चन्दन लगाना चाहिये। अथवा जैसी रुचि हो, उसीके अनुसार भिन्न-भिन्न अङ्गोंमें चन्दन लगाये, इसके लिये कोई खास नियम नहीं है। गोपीचन्दनका तिलक धारण करनेमात्रसे ब्राह्मणसे लेकर चाण्डालतक सभी मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। जो वैष्णव ब्राह्मण भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो, उसमें तथा विष्णुमें भेद नहीं मानना चाहिये; वह इस लोकमें श्रीविष्णुका ही स्वरूप होता है।
तुलसीके पत्र अथवा काष्ठकी बनी हुई माला
. सं०प०पु० २१—
६२८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
धारण करनेसे ब्राह्मण निश्चय ही मुक्तिका भागी होता है।* मृत्युके समय भी जिसके ललाटपर गोपीचन्दनका तिलक रहता है, वह विमानपर आरूढ हो विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। नारद ! कलियुगमें जो नरश्रेष्ठ गोपीचन्दनका तिलक धारण करते हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती। ब्रह्मन् ! इस पृथ्वीपर जो शराबी, स्त्री और बालकोंकी हत्या करनेवाले तथा अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले देखे जाते हैं, वे भगवद्भक्तोंके दर्शनमात्रसे पापमुक्त हो जाते हैं। मैं भी भगवान् विष्णुकी भक्तिके प्रसादसे वैष्णव हुआ हूँ।
संवत्सरदीप-व्रतकी विधि और महिमा
नारदजी बोले— भगवन् ! अब मुझे सब व्रतोंमें प्रधान 'संवत्सरदीप' नामक व्रतकी उत्तम विधि बताइये, जिसके करनेसे सब व्रतोंके अनुष्ठानका फल निस्संदेह प्राप्त हो जाय, सब कामनाओंकी सिद्धि हो तथा सब पापोंका नाश हो जाय।
महादेवजीने कहा— देवर्षे ! मैं तुम्हें एक पापनाशक रहस्य बताता हूँ, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा, गोघाती, मित्रहन्ता, गुरुस्त्रीगामी, विश्वासघाती तथा क्रूर हृदयवाला मनुष्य भी शाश्वत मोक्षको प्राप्त होता है तथा अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके विष्णुलोकको जाता है। वह रहस्य संवत्सरदीपव्रत है, जो बहुत ही श्रेयस्कर व्रत है। मैं उसकी विधि और महिमाका वर्णन करूँगा। हेमन्त ऋतुके प्रथम मास—अगहनमें शुभ एकादशी तिथि आनेपर ब्राह्ममुहूर्तमें उठे और काम-क्रोधसे रहित हो नदीके संगम, तीर्थ, पोखरे या नदीमें जाकर स्नान करे अथवा मनको वशमें रखते हुए घरपर ही स्नान करे। स्नान करनेका मन्त्र इस प्रकार है—
स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु गर्ते प्रस्रवणेषु च।
नदीषु सर्वतीर्थेषु तत्स्नानं देहि मे सदा॥
'मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों तथा नदियोंमें स्नान कर चुका। जल! तुम मुझे उन सबमें स्नान करनेका फल प्रदान करो।'
तदनन्तर देवताओं और पितरोंका तर्पण करके जप करनेके अनन्तर जितेन्द्रिय पुरुष देवदेव भगवान् लक्ष्मीनारायणका पूजन करे। पहले पञ्चामृतसे नहलाकर फिर चन्दनयुक्त जलसे स्नान कराये। तत्पश्चात् इस प्रकार कहे—
स्नातोऽसि लक्ष्म्या सहितो देवदेव जगत्पते।
मां समुद्धर देवेश घोरात् संसारबन्धनात्॥
'देवदेव ! जगत्पते ! देवेश्वर ! आप लक्ष्मीजीके साथ स्नान कर चुके हैं; इस घोर संसार-बन्धनसे मेरा उद्धार कीजिये।'
इसके बाद वैदिक तथा पौराणिक मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका पूजन करे। 'अतो देव' इस सूक्तसे अथवा पुरुषसूक्तसे पूजा करनी चाहिये। अथवा—
नमो मत्स्याय देवाय कूर्मदेवाय वै नमः।
नमो वाराहदेवाय नरसिंहाय वै नमः॥
वामनाय नमस्तुभ्यं परशुरामाय ते नमः।
नमोऽस्तु रामदेवाय विष्णुदेवाय ते नमः॥
नमोऽस्तु बुद्धदेवाय कल्किने च नमो नमः।
नमः सर्वात्मने तुभ्यं शिरसेत्यभिपूजयेत्॥
'मत्स्य, कच्छप, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्की—ये दस अवतार धारण करनेवाले आप सर्वात्माको मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।' यों कहकर पूजन करे।
अथवा भगवान्के जो 'केशव' आदि प्रसिद्ध नाम हैं, उनके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये।
धूपका मन्त्र
वनस्पतिरसो दिव्यः सुरभिर्गन्धवाञ्छुचिः।
धूपोऽयं देवदेवेश नमस्ते प्रतिगृह्यताम्॥
* तुलसीपत्रमालां च तुलसीकाष्ठसंभवाम्। धृत्वा वै ब्राह्मणो भूयान्मुक्तिभागी न संशयः॥ (३०।१९)
उत्तरखण्ड ] * संवत्सरदीप-व्रतकी विधि और महिमा * ६२९
'देवदेवेश्वर ! मनोहर सुगन्धसे भरा यह परम पवित्र दिव्य वनस्पतिका रसरूप धूप आपकी सेवामें प्रस्तुत है; आपको नमस्कार है; आप इसे स्वीकार करें।'
दीपका मन्त्र
दीपस्तमो नाशयति दीपः कान्तिं प्रयच्छति ।
तस्माद्दीपप्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
'दीप अन्धकारका नाश करता है, दीप कान्ति प्रदान करता है; अतः दीपदानसे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों।'
नैवेद्य-मन्त्र
नैवेद्यमिदमन्नाद्यं देवदेव जगत्पते ।
लक्ष्मा सह गृहाण त्वं परमामृतमुत्तमम् ॥
'देवदेव ! यह अन्न आदिका बना हुआ नैवेद्य सेवामें प्रस्तुत है; जगदीश्वर ! आप लक्ष्मीजीके साथ इस परम अमृतरूप उत्तम नैवेद्यको ग्रहण कीजिये।'
तदनन्तर श्रीजनार्दनका ध्यान करके शङ्खमें जल और हाथमें फल लेकर भक्तिपूर्वक अर्घ्य निवेदन करे; अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
जन्मान्तरसहस्रेण यन्मया पातकं कृतम् ।
तत्सर्वं नाशमायातु प्रसादात्तव केशव ॥
'केशव ! हजारों जन्मोंमें मैंने जो पातक किये हैं, वे सब आपकी कृपासे नष्ट हो जायें।'
इसके बाद घी अथवा तेलसे भरा हुआ एक सुन्दर नवीन कलश ले आकर भगवान् लक्ष्मीनारायणके सामने स्थापित करे। कलशके ऊपर ताँबे या मिट्टीका पात्र रखे। उसमें नौ तन्तुओंके समान मोटी बत्ती डाल दे तथा कलशको स्थिरतापूर्वक स्थापित करके वहाँ वायुरहित गृहमें दीपक जलाये। देवर्षे ! फिर पवित्रतापूर्वक पुष्प और गन्ध आदिसे कलशकी पूजा करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे शुभ संकल्प करे—
कामो भूतस्य भव्यस्य सम्राडेको विराजते ।
दीपः संवत्सरं यावन्मयायं परिकल्पितः ।
अग्निहोत्रमविच्छिन्नं प्रीयतां मम केशवः ॥
'भूत और भविष्यके सम्राट् तथा सबकी कामनाके विषय एक—अद्वितीय परमात्मा सर्वत्र विराजमान हैं। मैंने एक वर्षतक प्रज्वलित रखनेके लिये इस दीपककी स्थापना की है; यह अखण्ड अग्निहोत्ररूप है। इससे भगवान् केशव मुझपर प्रसन्न हों।
तत्पश्चात् इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए वेदोंके स्वाध्याय तथा ज्ञानयोगमें तत्पर रहे। पतितों, पापियों और पाखण्डी मनुष्योंसे बातचीत न करे। रातको गीत, नृत्य, बाजे आदिसे, पुण्य ग्रन्थोंके पाठसे तथा भाँति-भाँतिके धार्मिक उपाख्यानोंसे मन बहलाते हुए उपवासपूर्वक जागरण करे। इसके बाद सबेरा होनेपर पूर्वाह्नके नित्य-कर्मोंका अनुष्ठान करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा अपनी शक्तिके अनुसार उनकी पूजा करे। फिर स्वयं भी पारण करके ब्राह्मणोंको प्रणाम कर विदा करे। इस प्रकार दृढ़ संकल्प करके एक वर्षतक दिन-रात उक्त नियमसे रहे। एक या आधे पल सोनेका दीपक बनाये; उसके लिये बत्ती चाँदीकी बतायी गयी है, जो दो या ढाई पलकी होनी चाहिये। घीसे भरा हुआ घड़ा हो तथा उसके ऊपर ताँबेका पात्र रखा रहे। मुक्तिकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको भक्तिपूर्वक भगवान् लक्ष्मीनारायणकी प्रतिमा भी यथाशक्ति सोनेकी बनवानी चाहिये। इसके बाद [वर्ष पूर्ण होनेपर] विद्वान् पुरुष साधु एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। बारह ब्राह्मण हों—यह उत्तम पक्ष है। छः ब्राह्मणोंका होना मध्यम पक्ष है। इतना भी न हो सके तो तीन ब्राह्मणोंको ही निमन्त्रित करे। इनमेंसे एक कर्मनिष्ठ एवं सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे। वह ब्राह्मण शान्त होनेके साथ ही विशेषतः क्रियावान् हो। इतिहास-पुराणोंका ज्ञाता, धर्मज्ञ, मृदुल स्वभावका, पितृभक्त, गुरुसेवापरायण तथा देवता-ब्राह्मणोंका पूजन करनेवाला हो। पाद्य-अर्घ्यदान आदिकी विधिसे वस्त्र, अलंकार तथा आभूषण अर्पण करते हुए पत्नीसहित ब्राह्मणदेवकी भक्तिपूर्वक पूजा करके भगवान् लक्ष्मीनारायणको तथा बत्तीसहित दीपकको भी ताम्रपात्रमें रखकर घीसे भरे हुए घड़ेके साथ ही उस ब्राह्मणको दान कर दे। देवर्षे ! उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रसे परम पुरुष नारायणदेवका ध्यान भी करता रहे—
अविद्यातमसा व्याप्ते संसारे पापनाशनः ।
ज्ञानप्रदो मोक्षदश्च तस्माद्दत्तो मयानघ ॥
६३० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
'पापरहित नारायण तथा ज्योतिर्मय दीप! अविद्यामय अन्धकारसे भरे हुए संसारमें तुम्हीं ज्ञान एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले हो; इसलिये मैंने आज तुम्हारा दान किया है।'
फिर पूजित ब्राह्मणको अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक दक्षिणा दे। अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी घृतयुक्त खीर तथा मिठाईका भोजन कराये। ब्राह्मणभोजनके अनन्तर सपत्नीक ब्राह्मणको वस्त्र पहनाये। सामग्रियों-सहित शय्या तथा बछड़ेसहित धेनु दान करे। अन्य ब्राह्मणोंको भी अपनी सामर्थ्यके अनुसार दक्षिणा दे। सुहृदों, स्वजनों तथा बन्धु-बान्धवोंको भी भोजन कराये और उनका सत्कार करे। इस प्रकार इस संवत्सरदीप-व्रतकी समाप्तिके अवसरपर महान् उत्सव करे। फिर सबको प्रणाम करके विदा करे और अपनी त्रुटियोंके लिये क्षमा माँगे।
दान, व्रत, यज्ञ तथा योगाभ्याससे मनुष्य जिस फलको प्राप्त करता है, वही फल उसे संवत्सरदीप-व्रतके पालनसे मिलता है। गौ, भूमि, सुवर्ण तथा विशेषतः गृह आदिके दानसे विद्वान् पुरुष जिस फलको पाता है, वही दीपव्रतसे भी प्राप्त होता है। दीपदान करनेवाला पुरुष कान्ति, अक्षय धन, ज्ञान तथा परम सुख पाता है। दीपदान करनेसे मनुष्यको सौभाग्य, अत्यन्त निर्मल विद्या, आरोग्य तथा परम उत्तम समृद्धिकी प्राप्ति होती है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। दीपदान करने-वाला मानव समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त सौभाग्यवती पत्नी, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र तथा अक्षय संतति प्राप्त करता है। दीपदानके प्रभावसे ब्राह्मणको परम ज्ञान, क्षत्रियको उत्तम राज्य, वैश्यको धन और समस्त पशु तथा शूद्रको सुखकी प्राप्ति होती है। कुमारी कन्याको सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त पति मिलता है। वह बहुत-से पुत्र-पौत्र तथा बड़ी आयु पाती है। युवती स्त्री इस व्रतके प्रभावसे कभी वैधव्यका दुःख नहीं देखती। उसका अपने स्वामीसे कभी वियोग नहीं होता। दीपदानसे मानसिक चिन्ता तथा रोग भी दूर होते हैं। भयभीत पुरुष भयसे तथा कैदी बन्धनसे छूट जाता है। दीपव्रतमें तत्पर रहनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे निःसन्देह मुक्त हो जाता है—ऐसा ब्रह्माजीका वचन है।
जिसने श्रीहरिके संमुख सांवत्सर-दीप जलाया है, उसने निश्चय ही चान्द्रायण तथा कृच्छ्र-व्रतोंका अनुष्ठान पूरा कर लिया। जिन्होंने भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी पूजा करके संवत्सरदीप-व्रतका पालन किया है, वे धन्य हैं तथा उन्होंने जन्म लेनेका फल पा लिया। जो सलाईसे दीपकी बत्तीको उकसा देते हैं, वे भी देवदुर्लभ परमपदको प्राप्त होते हैं। जो लोग सदा ही मन्दिरके दीपमें यथाशक्ति तेल और बत्ती डालते हैं, वे परम धामको जाते हैं। जो लोग बुझते या बुझे हुए दीपको स्वयं जलानेमें असमर्थ होनेपर दूसरे लोगोंसे उसकी सूचना दे देते हैं, वे भी उक्त फलके भागी होते हैं। जो दीपकके लिये थोड़े-थोड़े तेलकी भीख माँगकर श्रीविष्णुके सम्मुख दीप जलाता है, उसे भी पुण्यकी प्राप्ति होती है। दीपक जलाते समय यदि कोई नीच पुरुष भी उसकी ओर श्रद्धासे हाथ जोड़कर निहारता है, तो वह विष्णुधाममें जाता है। जो दूसरोंको भगवान्के सामने दीप जलानेकी सलाह देता है तथा स्वयं भी ऐसा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त होता है।
जो लोग पृथ्वीपर दीपव्रतके इस माहात्म्यको सुनते हैं, वे सब पापोंसे छुटकारा पाकर श्रीविष्णुधामको जाते हैं। विद्वन्! मैंने तुमसे यह दीपव्रतका वर्णन किया है। यह मोक्ष तथा सब प्रकारका सुख देनेवाला, प्रशस्त एवं महान् व्रत है। इसके अनुष्ठानसे पापके प्रभावसे होनेवाले नेत्ररोग नष्ट हो जाते हैं। मानसिक चिन्ताओं तथा व्याधियोंका क्षणभरमें नाश हो जाता है। नारद! इस व्रतके प्रभावसे दारिद्र्य और शोक नहीं होता। मोह और भ्रान्ति मिट जाती है।
उत्तरखण्ड ] * जयन्ती संज्ञावाली जन्माष्टमीके व्रत तथा विभिन्न प्रकारके दान आदिकी महिमा * ६३१
जयन्ती संज्ञावाली जन्माष्टमीके व्रत तथा विविध प्रकारके दान आदिकी महिमा
**नारदजी बोले—**देवदेव ! जगदीश्वर ! भक्तोंको अभयदान देनेवाले महादेव ! मुझपर कृपा करके कोई दूसरा व्रत बताइये।
**महादेवजीने कहा—**पूर्वकालमें हरिश्चन्द्र नामक एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। उनपर संतुष्ट होकर ब्रह्माजीने उन्हें एक सुन्दर पुरी प्रदान की, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली थी। उसमें रहकर राजा हरिश्चन्द्र सात द्वीपोंसे युक्त वसुन्धराका धर्मपूर्वक पालन करते थे। प्रजाको वे औरस पुत्रकी भाँति मानते थे। राजाके पास धन-धान्यकी अधिकता थी। उन्हें नाती-पोतोंकी भी कमी न थी। अपने उत्तम राज्यका पालन करते हुए राजाको एक दिन बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे—'आजके पहले कभी किसीको ऐसा राज्य नही मिला था। मेरे सिवा दूसरे मनुष्योंने ऐसे विमानपर सवारी नहीं की होगी। यह मेरे किस कर्मका फल है, जिससे मैं देवराज इन्द्रके समान सुखी हूँ?'
राजाओंमें श्रेष्ठ हरिश्चन्द्र इस प्रकार सोच-विचारकर अपने उत्तम विमानपर आरूढ हुए आकाशमार्गसे जाते समय पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुपर उनकी दृष्टि पड़ी। उस' श्रेष्ठ शैलपर ज्ञानयोग-परायण ब्रह्मर्षि सनत्कुमार दिखायी पड़े, जो सुवर्णमयी शिलाके ऊपर विराजमान थे। उन्हें देखकर राजा अपना विस्मय पूछनेके लिये उतर पड़े। उन्होंने पास जा हर्षमें भरकर मुनिके चरणोंमें मस्तक झुकाया। ब्रह्मर्षिने भी राजाका अभिनन्दन किया। फिर सुखपूर्वक बैठकर राजाने मुनिश्रेष्ठ सनत्कुमारजीसे पूछा—'भगवन् ! मुझे जो यह सम्पत्ति प्राप्त हुई है, मानवलोकमें प्रायः दुर्लभ है। ऐसी सम्पत्ति किस कर्मसे प्राप्त होती है ? मैं पूर्वजन्ममें कौन था ? ये सब बातें यथार्थरूपसे बतलाइये।'
**सनत्कुमारजी बोले—**राजन् ! सुनो—तुम पूर्वजन्ममें सत्यवादी, पवित्र एवं उत्तम वैश्य थे। तुमने अपना काम-धाम छोड़ दिया था, इसलिये बन्धु-बान्धवोंने तुम्हारा परित्याग कर दिया। तुम्हारे पास जीविकाका कोई साधन नहीं रह गया था; इसलिये तुम स्वजनोंको छोड़कर चल दिये। स्त्रीने ही तुम्हारा साथ दिया। एक समय तुम दोनों किसी घने जङ्गलमें जा पहुँचे। वहाँ एक पोखरेमें कमल खिले हुए थे। उन्हें देखकर तुम दोनोंके मनमें यह विचार उठा कि हम यहाँसे कमल ले लें। कमल लेकर तुम दोनों एक-एक पग भूमि लाँघते हुए शुभ एवं पुण्यमयी वाराणसी पुरीमें पहुँचे। वहाँ तुमलोग कमल बेचने लगे किन्तु कोई भी उन्हें खरीदता नहीं था। वहीं खड़े-खड़े तुम्हारे कानोंमें बाजेकी आवाज सुनायी पड़ी। फिर तुम उसी ओर चल दिये। वहाँ काशीके विख्यात राजा इन्द्रद्युम्नकी सती-साध्वी कन्या चन्द्रावतीने, जो बड़ी सौभाग्यशालिनी थी, जयन्ती नामक जन्माष्टमीका शुभकारक व्रत किया था। उस स्थानपर तुम बड़े हर्षके साथ गये। वहाँ पहुँचनेपर तुम्हारा चित्त संतुष्ट हो गया। तुमने वहाँ भगवान्के पूजनका विधान देखा। कलशके ऊपर श्रीहरिकी स्थापना करके उनकी पूजा हो रही थी। विशेष