पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
ब्राह्मणों तथा अतिथियोंको तृप्त करता है, उसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। महान् पाप करके भी जो याचकको—विशेषतः ब्राह्मणको अन्न-दान करता है, वह पापसे मुक्त हो जाता है। ब्राह्मणको दिया हुआ दान अक्षय होता है। शूद्रको भी किया हुआ अन्न-दान महान् फल देनेवाला है। अन्न-दान करते समय याचकसे यह न पूछे कि वह किस गोत्र और किस शाखाका है, तथा उसने कितना अध्ययन किया है ? अन्नका अभिलाषी कोई भी क्यों न हो, उसे दिया हुआ अन्न-दान महान् फल देनेवाला होता है। अतः मनुष्योंको इस पृथ्वीपर विशेष रूपसे अन्नका दान करना चाहिये।
जलका दान भी श्रेष्ठ है; वह सदा सब दानोंमें उत्तम है। इसलिये बावली, कुआँ और पोखरा बनवाना चाहिये। जिसके खोदे हुए जलाशयमें गौ, ब्राह्मण और साधु पुरुष सदा पानी पीते हैं, वह अपने कुलको तार देता है। नारद ! जिसके पोखरेमें गर्मीके समयतक पानी ठहरता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकटका सामना नहीं करता। पोखरा बनवानेवाला पुरुष तीनों लोकोंमें सर्वत्र सम्मानित होता है। मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ और कामका यही फल बतलाते हैं कि देशमें खेतके भीतर उत्तम पोखरा बनवाया जाय, जो प्राणियोंके लिये महान् आश्रय हो। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर प्राणी भी जलाशयका आश्रय लेते हैं। जिसके पोखरेमें केवल वर्षा ऋतुमें ही जल रहता है, उसे अग्निहोत्रका फल मिलता है। जिसके तालाबमें हेमन्त और शिशिर कालतक जल ठहरता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। यदि वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतुतक पानी रुकता हो तो मनीषी पुरुष अतिरात्र और अश्वमेध यज्ञोंका फल बतलाते हैं।
अब वृक्ष लगानेके जो लाभ हैं, उनका वर्णन सुनो। महामुने ! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने भूतकालीन पितरों तथा होनेवाले वंशजोंका भी उद्धार कर देता है। इसलिये वृक्षोंको अवश्य लगाना चाहिये। वह पुरुष परलोकमें जानेपर वहाँ अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है। वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, पत्तोंसे पितरोंका तथा छायासे समस्त अतिथियोंका पूजन करते हैं। किन्नर, यक्ष, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मानव तथा ऋषि भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं। वृक्ष फूल और फलोंसे युक्त होकर इस लोकमें मनुष्योंको तृप्त करते हैं। वे इस लोक और परलोकमें भी धर्मतः पुत्र माने गये हैं। जो पोखरेके किनारे वृक्ष लगाते, यज्ञानुष्ठान करते तथा जो सदा सत्य बोलते हैं, वे कभी स्वर्गसे भ्रष्ट नहीं होते।
सत्य ही परम मोक्ष है, सत्य ही उत्तम शास्त्र है, सत्य देवताओंमें जाग्रत् रहता है तथा सत्य परम पद है। तप, यज्ञ, पुण्यकर्म, देवर्षि-पूजन, आद्यविधि और विद्या—ये सभी सत्यमें प्रतिष्ठित हैं। सत्य ही यज्ञ, दान, मन्त्र और सरस्वती देवी हैं; सत्य ही व्रतचर्या है तथा सत्य ही ॐकार है। सत्यसे ही वायु चलती है, सत्यसे ही सूर्य तपता है, सत्यके प्रभावसे ही आग जलती है तथा सत्यसे ही स्वर्ग टिका हुआ है। लोकमें जो सत्य बोलता है, वह सब देवताओंके पूजन तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल निःसंदेह प्राप्त कर लेता है। एक हजार अश्वमेध यज्ञका पुण्य और सत्य—इन दोनोंको यदि तराजूपर रखकर तौला जाय तो सम्पूर्ण यज्ञोंकी अपेक्षा सत्यका ही पलड़ा भारी होगा। देवता, पितर और ऋषि सत्यमें ही विश्वास करते हैं। सत्यको ही परम धर्म और सत्यको ही परम पद कहते हैं। * सत्यको
* सत्यमेव परो मोक्षः सत्यमेव परं श्रुतम्। सत्यं देवेषु जागर्ति सत्यं च परमं पदम्॥
तपो यज्ञाश्च पुण्यं च तथा देवर्षिपूजनम्। आद्यो विधिश्च विद्या च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्यं यज्ञस्तथा दानं मन्त्रो देवी सरस्वती। व्रतचर्या तथा सत्यमोङ्कारः सत्यमेव च॥
सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः। सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्गः सत्येन तिष्ठति॥
पूजनं सर्वदेवानां सर्वतीर्थावगाहनम्। सत्यं च वदते लोके सर्वमाप्नोत्यसंशयः॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। सर्वेषां सर्वयज्ञानां सत्यमेव विशिष्यते॥
सत्ये देवाः प्रतीयन्ते पितरो ऋषयस्तथा। सत्यमाहुः परं धर्मं सत्यमाहुः परं पदम्॥ (२८। २०—२६)
उत्तरखण्ड ] * अन्नदान, जलदान, तडाग-निर्माण, वृक्षारोपण तथा सत्यभाषण आदिकी महिमा * ६२५ ****************************************************************************************
परब्रह्मका स्वरूप बताया गया है; इसलिये मैं तुम्हें सत्यका उपदेश करता हूँ। सत्यपरायण मुनि अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके सत्यधर्मका पालन करते हुए इस लोकसे स्वर्गको प्राप्त हुए हैं। सदा सत्य ही बोलना चाहिये, सत्यसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। सत्यरूपी तीर्थ अगाध, विस्तृत एवं पवित्र ह्रद (कुण्ड) से युक्त है; योगयुक्त पुरुषोंको उसमें मनसे स्नान करना चाहिये। यही स्नान उत्तम माना गया है। जो मनुष्य अपने, पराये अथवा पुत्रके लिये भी असत्य भाषण नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं। ब्राह्मणोंमें वेद, यज्ञ तथा मन्त्र नित्य निवास करते हैं; किन्तु जो ब्राह्मण सत्यका परित्याग कर देते हैं, उनमें वेद आदि शोभा नहीं देते; अतः सत्य-भाषण करना चाहिये।
नारदजीने कहा— भगवन् ! अब मुझे विशेषतः तपस्याका फल बताइये; क्योंकि प्रायः सभी वर्णोंका तथा मुख्यतः ब्राह्मणोंका तपस्या ही बल है।
महादेवजी बोले— नारद ! तपस्याको श्रेष्ठ बताया गया है। तपसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जो सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं, वे सदा देवताओंके साथ आनन्द भोगते हैं। तपसे मनुष्य मोक्ष पा लेता है, तपसे 'महत्' पदकी प्राप्ति होती है। मनुष्य अपने मनसे ज्ञान-विज्ञानका खजाना, सौभाग्य और रूप आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे तपस्यासे मिल जाती है। जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे कभी ब्रह्मलोकमें नहीं जाते। पुरुष जिस किसी कार्यका उद्देश्य लेकर तप करता है, वह सब इस लोक और परलोकमें उसे प्राप्त हो जाता है। शराबी, परस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी-जैसा पापी भी तपस्याके बलसे सबसे पार हो जाता है—सब पापोंसे छुटकारा पा लेता है।* तपस्याके प्रभावसे छियासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि स्वर्गमें रहकर देवताओंके साथ आनन्द भोग रहे हैं। तपस्यासे राज्य प्राप्त होता है। इन्द्र तथा सम्पूर्ण देवता और असुरोंने तपस्यासे ही सदा सबका पालन किया है। तपस्यासे ही वे वृत्तिदाता हुए हैं। सम्पूर्ण लोकोंके हितमें लगे रहनेवाले दोनों देवता सूर्य और चन्द्रमा तपसे ही प्रकाशित होते हैं। नक्षत्र और ग्रह भी तपस्यासे ही कान्तिमान् हुए हैं। तपस्यासे मनुष्य सब कुछ पा लेता है, सब सुखोंका अनुभव करता है।
मुने ! जो जंगलमें फल-मूल खाकर तपस्या करता है तथा जो पहले केवल वेदका अध्ययन ही करता है—वे दोनों समान हैं। वह अध्ययन तपस्याके ही तुल्य है। श्रेष्ठ द्विज वेद पढ़ानेसे जो पुण्य प्राप्त करता है, स्वाध्याय और जपसे इसकी अपेक्षा दूना फल पा जाता है। जो सदा तपस्या करते हुए शास्त्रके अभ्याससे ज्ञानोपार्जन करता है और लोकको उस ज्ञानका बोध कराता है, वह परम पूजनीय गुरु है। पुराणवेत्ता पुरुष दानका सबसे श्रेष्ठ पात्र है। वह पतनसे त्राण करता है, इसलिये पात्र कहलाता है। जो लोग सुपात्रको धन, धान्य, सुवर्ण तथा भाँति-भाँतिके वस्त्र-दान करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो श्रेष्ठ पात्रको गौ, भैंस, हाथी और सुन्दर-सुन्दर घोड़े दान करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें अश्वमेधके अक्षय फलको प्राप्त होता है। जो सुपात्रको जोती-बोयी एवं फलसे भरी हुई सुन्दर भूमि दान करता है, वह अपने दस पीढ़ी पहलेके पूर्वजों और दस पीढ़ी बादतककी संतानोंको तार देता है तथा दिव्य विमानसे विष्णुलोकको जाता है। देवगण पुस्तक बाँचनेसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें यज्ञोंसे, प्रोक्षण (अभिषेक) से तथा फूलोंद्वारा की हुई पूजाओंसे भी नहीं होता। जो भगवान् विष्णुके मन्दिरमें धर्म-ग्रन्थका पाठ कराता है तथा देवी, शिव, गणेश और सूर्यके
* तपो हि परमं प्रोक्तं तपसा विन्दते फलम्। तपोरता हि ये नित्यं मोदन्ते सह दैवतैः ॥
तपसा मोक्षमाप्नोति तपसा विन्दते महत्। ज्ञानविज्ञानसम्पत्तिः सौभाग्यं रूपमेव च ॥
तपसा लभ्यते सर्वं मनसा यद्यदिच्छति। नातप्ततपसो यान्ति ब्रह्मलोकं कदाचन ॥
यत्कार्यं किञ्चिदास्थाय पुरुषस्तप्यते तपः। तत्सर्वं समवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥
सुरापः परदारी च ब्रह्महा गुरुतल्पगः। तपसा तरते सर्वं सर्वतश्च विमुच्यते ॥ (२८।३५-३९)
६२६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मन्दिरमें भी उसकी व्यवस्था करता है, वह मानव राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। इतिहासपुराणके ग्रन्थोंका बाँचना पुण्यदायक है। ऐसा करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा अन्तमें सूर्यलोकका भेदन करके ब्रह्मलोकको चला जाता है। वहाँ सौ कल्पोंतक रहनेके पश्चात् इस पृथ्वीपर जन्म ले राजा होता है। एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका जो फल बताया गया है, उसे वह मनुष्य भी प्राप्त कर लेता है, जो देवताके आगे महाभारतका पाठ करता है। अतः सब प्रकारका प्रयत्न करके भगवान् विष्णुके मन्दिरमें इतिहासपुराणके ग्रन्थोंका पाठ करना चाहिये। वह शुभकारक होता है। विष्णु तथा अन्य देवताओंके लिये दूसरा कोई साधन इतना प्रीतिकारक नहीं है।
मन्दिरमें पुराणकी कथा कराने और सुपात्रको दान देनेसे होनेवाली सद्गतिके विषयमें एक आख्यान तथा गोपीचन्दनके तिलककी महिमा
महादेवजी कहते हैं—नारद ! इस विषयमें विज्ञ पुरुष एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। यह इतिहास अत्यन्त पुरातन, पुण्यदायक सब पापोंको हरनेवाला तथा शुभकारक है। देवर्षे ! ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारने लोक-पितामह ब्रह्माजीको नमस्कार करके मुझे यह उपाख्यान सुनाया था।
सनत्कुमार बोले—एक दिन मैं धर्मराजसे मिलने गया था। वहाँ उन्होंने बड़ी प्रसन्नता और भक्तिके साथ नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा मेरा सत्कार किया। तत्पश्चात् मुझे सुखमय आसनपर बैठनेके लिये कहा। बैठनेपर मैंने वहाँ एक अद्भुत बात देखी। एक पुरुष सोनेके विमानपर बैठकर वहाँ आया। उसे देखकर धर्मराज बड़े वेगसे आसनसे उठ खड़े हुए और आगन्तुकका दाहिना हाथ पकड़कर उन्होंने अर्घ्य आदिके द्वारा उसका पूर्ण सत्कार किया। तत्पश्चात् वे उससे इस प्रकार बोले।
धर्मने कहा—धर्मके द्रष्टा महापुरुष ! तुम्हारा स्वागत है ! मैं तुम्हारे दर्शनसे बहुत प्रसन्न हूँ। मेरे पास बैठो और मुझे कुछ ज्ञानकी बातें सुनाओ। इसके बाद उस धाममें जाना, जहाँ श्रीब्रह्माजी विराजमान हैं।
सनत्कुमार कहते हैं—धर्मराजके इतना कहते ही एक दूसरा पुरुष उत्तम विमानपर बैठा हुआ वहाँ आ पहुँचा। धर्मराजने विनीत भावसे उसका भी विमानपर ही पूजन किया तथा जिस प्रकार पहले आये हुए मनुष्यसे सान्त्वनापूर्वक वार्तालाप किया था, उसी प्रकार इस नवागन्तुकके साथ भी किया। यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैंने धर्मसे पूछा—'इन्होंने कौन-सा ऐसा कर्म किया है, जिसके ऊपर आप अधिक संतुष्ट हुए हैं? इन दोनोंके द्वारा ऐसा कौन-सा कर्म बन गया है, जिसका इतना उत्तम पुण्य है ? आप सर्वज्ञ हैं, अतः बताइये किस कर्मके प्रभावसे इन्हें दिव्य फलकी प्राप्ति हुई है ?' मेरी बात सुनकर धर्मराजने कहा—'इन
उत्तरखण्ड ] * मन्दिरमें पुराणकी कथा कराने तथा गोपीचन्दनके तिलककी महिमा * ६२७ *********************************************************************************************************************
दोनोंका किया हुआ कर्म बताता हूँ, सुनो। पृथ्वीपर वैदिश नामका एक विख्यात नगर है। वहाँ धरापाल नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जिन्होंने भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाकर उसमें उनकी स्थापना की। उस नगरमें जितने लोग रहते थे, उन सबको उन्होंने भगवान्का दर्शन करनेके लिये आदेश दिया। गाँवके भीतर बना हुआ श्रीविष्णुका वह सुन्दर मन्दिर लोगोंसे ठसाठस भर गया। तब राजाने पहले ब्राह्मण आदिके समुदायका पूजन किया, फिर उन महाबुद्धिमान् नरेशने इतिहास-पुराणके ज्ञाता एक श्रेष्ठ द्विजको, जो विद्यामें भी श्रेष्ठ थे, वाचक बनाकर उनकी विशेष रूपसे पूजा की। फिर क्रमशः गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे पुस्तकका भी पूजन करके राजाने वाचक ब्राह्मणसे विनयपूर्वक कहा— 'द्विजश्रेष्ठ ! मैंने जो यह भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाया है, इसमें धर्म श्रवण करनेकी इच्छासे चारों वर्णोंका समुदाय एकत्रित हुआ है; अतः आप पुस्तक बाँचिये। इस समय ये सौ स्वर्णमुद्राएँ उत्तम जीविकावृत्तिके रूपमें ग्रहण कीजिये और एक वर्षतक प्रतिदिन कथा कहिये। वर्ष समाप्त होनेपर पुनः और धन दूँगा।'
मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार राजाके आदेशसे वहाँ पुण्यमय कथा-वार्ताका क्रम चालू हो गया। वर्ष बीतते-बीतते आयु क्षीण हो जानेके कारण राजाकी मृत्यु हो गयी। तब मैंने तथा भगवान् विष्णुने भी इनके लिये द्युलोकसे विमान भेजा था। ये जो दूसरे ब्राह्मण यहाँ आये थे, इन्होंने सत्सङ्गके द्वारा उत्तम धर्मका श्रवण किया था। श्रवण करनेसे श्रद्धावश इनके हृदयमें परमात्माकी भक्तिका उदय हुआ। मुनिश्रेष्ठ ! फिर इन्होंने उन महात्मा वाचककी परिक्रमा की और उन्हें एक माशा सुवर्ण दान दिया। सुपात्रको दान देनेसे इन्हें इस प्रकारके फलकी प्राप्ति हुई है। मुने ! इस प्रकार यह कर्म, जिसे इन दोनोंने किया था, मैंने कह सुनाया।
महादेवजी कहते हैं—जो मनीषी पुरुष इस पुण्य-प्रसङ्गका माहात्म्य श्रवण करते हैं, उनकी किसी जन्ममें कभी दुर्गति नहीं होती। देवर्षिप्रवर ! अब दूसरी बात सुनाता हूँ, सुनो। गोपीचन्दनका माहात्म्य जैसा मैंने देखा और सुना है, उसका वर्णन करता हूँ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र—कोई भी क्यों न हो, जो विष्णुका भक्त होकर उनके भजनमें तत्पर रहकर अपने अङ्गोंमें गोपीचन्दन लगाता है, वह गङ्गाजलसे नहाये हुएकी भाँति सब दोषोंसे मुक्त हो जाता है। कल्याणकी इच्छा रखनेवाले वैष्णव ब्राह्मणोंके लिये गोपीचन्दनका तिलक धारण करना विशेष रूपसे कर्तव्य है। ललाटमें दण्डके आकारका, वक्षःस्थलमें कमलके सदृश, बाहुओंके मूलभागमें बाँसके पत्तेके समान तथा अन्यत्र दीपकके तुल्य चन्दन लगाना चाहिये। अथवा जैसी रुचि हो, उसीके अनुसार भिन्न-भिन्न अङ्गोंमें चन्दन लगाये, इसके लिये कोई खास नियम नहीं है। गोपीचन्दनका तिलक धारण करनेमात्रसे ब्राह्मणसे लेकर चाण्डालतक सभी मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं। जो वैष्णव ब्राह्मण भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो, उसमें तथा विष्णुमें भेद नहीं मानना चाहिये; वह इस लोकमें श्रीविष्णुका ही स्वरूप होता है।
तुलसीके पत्र अथवा काष्ठकी बनी हुई माला
. सं०प०पु० २१—
६२८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
धारण करनेसे ब्राह्मण निश्चय ही मुक्तिका भागी होता है।* मृत्युके समय भी जिसके ललाटपर गोपीचन्दनका तिलक रहता है, वह विमानपर आरूढ हो विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। नारद ! कलियुगमें जो नरश्रेष्ठ गोपीचन्दनका तिलक धारण करते हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती। ब्रह्मन् ! इस पृथ्वीपर जो शराबी, स्त्री और बालकोंकी हत्या करनेवाले तथा अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले देखे जाते हैं, वे भगवद्भक्तोंके दर्शनमात्रसे पापमुक्त हो जाते हैं। मैं भी भगवान् विष्णुकी भक्तिके प्रसादसे वैष्णव हुआ हूँ।
संवत्सरदीप-व्रतकी विधि और महिमा
नारदजी बोले— भगवन् ! अब मुझे सब व्रतोंमें प्रधान 'संवत्सरदीप' नामक व्रतकी उत्तम विधि बताइये, जिसके करनेसे सब व्रतोंके अनुष्ठानका फल निस्संदेह प्राप्त हो जाय, सब कामनाओंकी सिद्धि हो तथा सब पापोंका नाश हो जाय।
महादेवजीने कहा— देवर्षे ! मैं तुम्हें एक पापनाशक रहस्य बताता हूँ, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा, गोघाती, मित्रहन्ता, गुरुस्त्रीगामी, विश्वासघाती तथा क्रूर हृदयवाला मनुष्य भी शाश्वत मोक्षको प्राप्त होता है तथा अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके विष्णुलोकको जाता है। वह रहस्य संवत्सरदीपव्रत है, जो बहुत ही श्रेयस्कर व्रत है। मैं उसकी विधि और महिमाका वर्णन करूँगा। हेमन्त ऋतुके प्रथम मास—अगहनमें शुभ एकादशी तिथि आनेपर ब्राह्ममुहूर्तमें उठे और काम-क्रोधसे रहित हो नदीके संगम, तीर्थ, पोखरे या नदीमें जाकर स्नान करे अथवा मनको वशमें रखते हुए घरपर ही स्नान करे। स्नान करनेका मन्त्र इस प्रकार है—
स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु गर्ते प्रस्रवणेषु च।
नदीषु सर्वतीर्थेषु तत्स्नानं देहि मे सदा॥
'मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, झरनों तथा नदियोंमें स्नान कर चुका। जल! तुम मुझे उन सबमें स्नान करनेका फल प्रदान करो।'
तदनन्तर देवताओं और पितरोंका तर्पण करके जप करनेके अनन्तर जितेन्द्रिय पुरुष देवदेव भगवान् लक्ष्मीनारायणका पूजन करे। पहले पञ्चामृतसे नहलाकर फिर चन्दनयुक्त जलसे स्नान कराये। तत्पश्चात् इस प्रकार कहे—
स्नातोऽसि लक्ष्म्या सहितो देवदेव जगत्पते।
मां समुद्धर देवेश घोरात् संसारबन्धनात्॥
'देवदेव ! जगत्पते ! देवेश्वर ! आप लक्ष्मीजीके साथ स्नान कर चुके हैं; इस घोर संसार-बन्धनसे मेरा उद्धार कीजिये।'
इसके बाद वैदिक तथा पौराणिक मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका पूजन करे। 'अतो देव' इस सूक्तसे अथवा पुरुषसूक्तसे पूजा करनी चाहिये। अथवा—
नमो मत्स्याय देवाय कूर्मदेवाय वै नमः।
नमो वाराहदेवाय नरसिंहाय वै नमः॥
वामनाय नमस्तुभ्यं परशुरामाय ते नमः।
नमोऽस्तु रामदेवाय विष्णुदेवाय ते नमः॥
नमोऽस्तु बुद्धदेवाय कल्किने च नमो नमः।
नमः सर्वात्मने तुभ्यं शिरसेत्यभिपूजयेत्॥
'मत्स्य, कच्छप, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्की—ये दस अवतार धारण करनेवाले आप सर्वात्माको मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।' यों कहकर पूजन करे।
अथवा भगवान्के जो 'केशव' आदि प्रसिद्ध नाम हैं, उनके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये।
धूपका मन्त्र
वनस्पतिरसो दिव्यः सुरभिर्गन्धवाञ्छुचिः।
धूपोऽयं देवदेवेश नमस्ते प्रतिगृह्यताम्॥
* तुलसीपत्रमालां च तुलसीकाष्ठसंभवाम्। धृत्वा वै ब्राह्मणो भूयान्मुक्तिभागी न संशयः॥ (३०।१९)
उत्तरखण्ड ] * संवत्सरदीप-व्रतकी विधि और महिमा * ६२९
'देवदेवेश्वर ! मनोहर सुगन्धसे भरा यह परम पवित्र दिव्य वनस्पतिका रसरूप धूप आपकी सेवामें प्रस्तुत है; आपको नमस्कार है; आप इसे स्वीकार करें।'
दीपका मन्त्र
दीपस्तमो नाशयति दीपः कान्तिं प्रयच्छति ।
तस्माद्दीपप्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
'दीप अन्धकारका नाश करता है, दीप कान्ति प्रदान करता है; अतः दीपदानसे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों।'
नैवेद्य-मन्त्र
नैवेद्यमिदमन्नाद्यं देवदेव जगत्पते ।
लक्ष्मा सह गृहाण त्वं परमामृतमुत्तमम् ॥
'देवदेव ! यह अन्न आदिका बना हुआ नैवेद्य सेवामें प्रस्तुत है; जगदीश्वर ! आप लक्ष्मीजीके साथ इस परम अमृतरूप उत्तम नैवेद्यको ग्रहण कीजिये।'
तदनन्तर श्रीजनार्दनका ध्यान करके शङ्खमें जल और हाथमें फल लेकर भक्तिपूर्वक अर्घ्य निवेदन करे; अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
जन्मान्तरसहस्रेण यन्मया पातकं कृतम् ।
तत्सर्वं नाशमायातु प्रसादात्तव केशव ॥
'केशव ! हजारों जन्मोंमें मैंने जो पातक किये हैं, वे सब आपकी कृपासे नष्ट हो जायें।'
इसके बाद घी अथवा तेलसे भरा हुआ एक सुन्दर नवीन कलश ले आकर भगवान् लक्ष्मीनारायणके सामने स्थापित करे। कलशके ऊपर ताँबे या मिट्टीका पात्र रखे। उसमें नौ तन्तुओंके समान मोटी बत्ती डाल दे तथा कलशको स्थिरतापूर्वक स्थापित करके वहाँ वायुरहित गृहमें दीपक जलाये। देवर्षे ! फिर पवित्रतापूर्वक पुष्प और गन्ध आदिसे कलशकी पूजा करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे शुभ संकल्प करे—
कामो भूतस्य भव्यस्य सम्राडेको विराजते ।
दीपः संवत्सरं यावन्मयायं परिकल्पितः ।
अग्निहोत्रमविच्छिन्नं प्रीयतां मम केशवः ॥
'भूत और भविष्यके सम्राट् तथा सबकी कामनाके विषय एक—अद्वितीय परमात्मा सर्वत्र विराजमान हैं। मैंने एक वर्षतक प्रज्वलित रखनेके लिये इस दीपककी स्थापना की है; यह अखण्ड अग्निहोत्ररूप है। इससे भगवान् केशव मुझपर प्रसन्न हों।
तत्पश्चात् इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए वेदोंके स्वाध्याय तथा ज्ञानयोगमें तत्पर रहे। पतितों, पापियों और पाखण्डी मनुष्योंसे बातचीत न करे। रातको गीत, नृत्य, बाजे आदिसे, पुण्य ग्रन्थोंके पाठसे तथा भाँति-भाँतिके धार्मिक उपाख्यानोंसे मन बहलाते हुए उपवासपूर्वक जागरण करे। इसके बाद सबेरा होनेपर पूर्वाह्नके नित्य-कर्मोंका अनुष्ठान करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा अपनी शक्तिके अनुसार उनकी पूजा करे। फिर स्वयं भी पारण करके ब्राह्मणोंको प्रणाम कर विदा करे। इस प्रकार दृढ़ संकल्प करके एक वर्षतक दिन-रात उक्त नियमसे रहे। एक या आधे पल सोनेका दीपक बनाये; उसके लिये बत्ती चाँदीकी बतायी गयी है, जो दो या ढाई पलकी होनी चाहिये। घीसे भरा हुआ घड़ा हो तथा उसके ऊपर ताँबेका पात्र रखा रहे। मुक्तिकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको भक्तिपूर्वक भगवान् लक्ष्मीनारायणकी प्रतिमा भी यथाशक्ति सोनेकी बनवानी चाहिये। इसके बाद [वर्ष पूर्ण होनेपर] विद्वान् पुरुष साधु एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। बारह ब्राह्मण हों—यह उत्तम पक्ष है। छः ब्राह्मणोंका होना मध्यम पक्ष है। इतना भी न हो सके तो तीन ब्राह्मणोंको ही निमन्त्रित करे। इनमेंसे एक कर्मनिष्ठ एवं सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे। वह ब्राह्मण शान्त होनेके साथ ही विशेषतः क्रियावान् हो। इतिहास-पुराणोंका ज्ञाता, धर्मज्ञ, मृदुल स्वभावका, पितृभक्त, गुरुसेवापरायण तथा देवता-ब्राह्मणोंका पूजन करनेवाला हो। पाद्य-अर्घ्यदान आदिकी विधिसे वस्त्र, अलंकार तथा आभूषण अर्पण करते हुए पत्नीसहित ब्राह्मणदेवकी भक्तिपूर्वक पूजा करके भगवान् लक्ष्मीनारायणको तथा बत्तीसहित दीपकको भी ताम्रपात्रमें रखकर घीसे भरे हुए घड़ेके साथ ही उस ब्राह्मणको दान कर दे। देवर्षे ! उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रसे परम पुरुष नारायणदेवका ध्यान भी करता रहे—
अविद्यातमसा व्याप्ते संसारे पापनाशनः ।
ज्ञानप्रदो मोक्षदश्च तस्माद्दत्तो मयानघ ॥
६३० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
'पापरहित नारायण तथा ज्योतिर्मय दीप! अविद्यामय अन्धकारसे भरे हुए संसारमें तुम्हीं ज्ञान एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले हो; इसलिये मैंने आज तुम्हारा दान किया है।'
फिर पूजित ब्राह्मणको अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक दक्षिणा दे। अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी घृतयुक्त खीर तथा मिठाईका भोजन कराये। ब्राह्मणभोजनके अनन्तर सपत्नीक ब्राह्मणको वस्त्र पहनाये। सामग्रियों-सहित शय्या तथा बछड़ेसहित धेनु दान करे। अन्य ब्राह्मणोंको भी अपनी सामर्थ्यके अनुसार दक्षिणा दे। सुहृदों, स्वजनों तथा बन्धु-बान्धवोंको भी भोजन कराये और उनका सत्कार करे। इस प्रकार इस संवत्सरदीप-व्रतकी समाप्तिके अवसरपर महान् उत्सव करे। फिर सबको प्रणाम करके विदा करे और अपनी त्रुटियोंके लिये क्षमा माँगे।
दान, व्रत, यज्ञ तथा योगाभ्याससे मनुष्य जिस फलको प्राप्त करता है, वही फल उसे संवत्सरदीप-व्रतके पालनसे मिलता है। गौ, भूमि, सुवर्ण तथा विशेषतः गृह आदिके दानसे विद्वान् पुरुष जिस फलको पाता है, वही दीपव्रतसे भी प्राप्त होता है। दीपदान करनेवाला पुरुष कान्ति, अक्षय धन, ज्ञान तथा परम सुख पाता है। दीपदान करनेसे मनुष्यको सौभाग्य, अत्यन्त निर्मल विद्या, आरोग्य तथा परम उत्तम समृद्धिकी प्राप्ति होती है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। दीपदान करने-वाला मानव समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त सौभाग्यवती पत्नी, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र तथा अक्षय संतति प्राप्त करता है। दीपदानके प्रभावसे ब्राह्मणको परम ज्ञान, क्षत्रियको उत्तम राज्य, वैश्यको धन और समस्त पशु तथा शूद्रको सुखकी प्राप्ति होती है। कुमारी कन्याको सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त पति मिलता है। वह बहुत-से पुत्र-पौत्र तथा बड़ी आयु पाती है। युवती स्त्री इस व्रतके प्रभावसे कभी वैधव्यका दुःख नहीं देखती। उसका अपने स्वामीसे कभी वियोग नहीं होता। दीपदानसे मानसिक चिन्ता तथा रोग भी दूर होते हैं। भयभीत पुरुष भयसे तथा कैदी बन्धनसे छूट जाता है। दीपव्रतमें तत्पर रहनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे निःसन्देह मुक्त हो जाता है—ऐसा ब्रह्माजीका वचन है।
जिसने श्रीहरिके संमुख सांवत्सर-दीप जलाया है, उसने निश्चय ही चान्द्रायण तथा कृच्छ्र-व्रतोंका अनुष्ठान पूरा कर लिया। जिन्होंने भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी पूजा करके संवत्सरदीप-व्रतका पालन किया है, वे धन्य हैं तथा उन्होंने जन्म लेनेका फल पा लिया। जो सलाईसे दीपकी बत्तीको उकसा देते हैं, वे भी देवदुर्लभ परमपदको प्राप्त होते हैं। जो लोग सदा ही मन्दिरके दीपमें यथाशक्ति तेल और बत्ती डालते हैं, वे परम धामको जाते हैं। जो लोग बुझते या बुझे हुए दीपको स्वयं जलानेमें असमर्थ होनेपर दूसरे लोगोंसे उसकी सूचना दे देते हैं, वे भी उक्त फलके भागी होते हैं। जो दीपकके लिये थोड़े-थोड़े तेलकी भीख माँगकर श्रीविष्णुके सम्मुख दीप जलाता है, उसे भी पुण्यकी प्राप्ति होती है। दीपक जलाते समय यदि कोई नीच पुरुष भी उसकी ओर श्रद्धासे हाथ जोड़कर निहारता है, तो वह विष्णुधाममें जाता है। जो दूसरोंको भगवान्के सामने दीप जलानेकी सलाह देता है तथा स्वयं भी ऐसा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त होता है।
जो लोग पृथ्वीपर दीपव्रतके इस माहात्म्यको सुनते हैं, वे सब पापोंसे छुटकारा पाकर श्रीविष्णुधामको जाते हैं। विद्वन्! मैंने तुमसे यह दीपव्रतका वर्णन किया है। यह मोक्ष तथा सब प्रकारका सुख देनेवाला, प्रशस्त एवं महान् व्रत है। इसके अनुष्ठानसे पापके प्रभावसे होनेवाले नेत्ररोग नष्ट हो जाते हैं। मानसिक चिन्ताओं तथा व्याधियोंका क्षणभरमें नाश हो जाता है। नारद! इस व्रतके प्रभावसे दारिद्र्य और शोक नहीं होता। मोह और भ्रान्ति मिट जाती है।
उत्तरखण्ड ] * जयन्ती संज्ञावाली जन्माष्टमीके व्रत तथा विभिन्न प्रकारके दान आदिकी महिमा * ६३१
जयन्ती संज्ञावाली जन्माष्टमीके व्रत तथा विविध प्रकारके दान आदिकी महिमा
**नारदजी बोले—**देवदेव ! जगदीश्वर ! भक्तोंको अभयदान देनेवाले महादेव ! मुझपर कृपा करके कोई दूसरा व्रत बताइये।
**महादेवजीने कहा—**पूर्वकालमें हरिश्चन्द्र नामक एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। उनपर संतुष्ट होकर ब्रह्माजीने उन्हें एक सुन्दर पुरी प्रदान की, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली थी। उसमें रहकर राजा हरिश्चन्द्र सात द्वीपोंसे युक्त वसुन्धराका धर्मपूर्वक पालन करते थे। प्रजाको वे औरस पुत्रकी भाँति मानते थे। राजाके पास धन-धान्यकी अधिकता थी। उन्हें नाती-पोतोंकी भी कमी न थी। अपने उत्तम राज्यका पालन करते हुए राजाको एक दिन बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे—'आजके पहले कभी किसीको ऐसा राज्य नही मिला था। मेरे सिवा दूसरे मनुष्योंने ऐसे विमानपर सवारी नहीं की होगी। यह मेरे किस कर्मका फल है, जिससे मैं देवराज इन्द्रके समान सुखी हूँ?'
राजाओंमें श्रेष्ठ हरिश्चन्द्र इस प्रकार सोच-विचारकर अपने उत्तम विमानपर आरूढ हुए आकाशमार्गसे जाते समय पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुपर उनकी दृष्टि पड़ी। उस' श्रेष्ठ शैलपर ज्ञानयोग-परायण ब्रह्मर्षि सनत्कुमार दिखायी पड़े, जो सुवर्णमयी शिलाके ऊपर विराजमान थे। उन्हें देखकर राजा अपना विस्मय पूछनेके लिये उतर पड़े। उन्होंने पास जा हर्षमें भरकर मुनिके चरणोंमें मस्तक झुकाया। ब्रह्मर्षिने भी राजाका अभिनन्दन किया। फिर सुखपूर्वक बैठकर राजाने मुनिश्रेष्ठ सनत्कुमारजीसे पूछा—'भगवन् ! मुझे जो यह सम्पत्ति प्राप्त हुई है, मानवलोकमें प्रायः दुर्लभ है। ऐसी सम्पत्ति किस कर्मसे प्राप्त होती है ? मैं पूर्वजन्ममें कौन था ? ये सब बातें यथार्थरूपसे बतलाइये।'
**सनत्कुमारजी बोले—**राजन् ! सुनो—तुम पूर्वजन्ममें सत्यवादी, पवित्र एवं उत्तम वैश्य थे। तुमने अपना काम-धाम छोड़ दिया था, इसलिये बन्धु-बान्धवोंने तुम्हारा परित्याग कर दिया। तुम्हारे पास जीविकाका कोई साधन नहीं रह गया था; इसलिये तुम स्वजनोंको छोड़कर चल दिये। स्त्रीने ही तुम्हारा साथ दिया। एक समय तुम दोनों किसी घने जङ्गलमें जा पहुँचे। वहाँ एक पोखरेमें कमल खिले हुए थे। उन्हें देखकर तुम दोनोंके मनमें यह विचार उठा कि हम यहाँसे कमल ले लें। कमल लेकर तुम दोनों एक-एक पग भूमि लाँघते हुए शुभ एवं पुण्यमयी वाराणसी पुरीमें पहुँचे। वहाँ तुमलोग कमल बेचने लगे किन्तु कोई भी उन्हें खरीदता नहीं था। वहीं खड़े-खड़े तुम्हारे कानोंमें बाजेकी आवाज सुनायी पड़ी। फिर तुम उसी ओर चल दिये। वहाँ काशीके विख्यात राजा इन्द्रद्युम्नकी सती-साध्वी कन्या चन्द्रावतीने, जो बड़ी सौभाग्यशालिनी थी, जयन्ती नामक जन्माष्टमीका शुभकारक व्रत किया था। उस स्थानपर तुम बड़े हर्षके साथ गये। वहाँ पहुँचनेपर तुम्हारा चित्त संतुष्ट हो गया। तुमने वहाँ भगवान्के पूजनका विधान देखा। कलशके ऊपर श्रीहरिकी स्थापना करके उनकी पूजा हो रही थी। विशेष
६३२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
समारोहके साथ भगवान्का पूजन किया गया था, भिन्न-भिन्न पुष्पोंसे उनका शृङ्गार हुआ था। भगवान्की भक्तिके वशीभूत हो तुमने भी अपनी पत्नीके साथ कमलके फूलोंसे वहाँ श्रीहरिका पूजन किया तथा पूजासे बचे हुए फूलोंको उनके समीप ही बिखेर दिया। तुमने भगवान्को पुष्पमय कर दिया। इससे उस कन्याको बड़ा संतोष हुआ। वह स्वयं तुम्हें धन देने लगी, किन्तु तुमने नहीं लिया। तब राजकुमारीने तुम्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया; किन्तु उस समय तुमने न तो भोजन स्वीकार किया और न धन ही लिया। यही पुण्य तुमने पिछले जन्ममें उपार्जित किया था। फिर अपने कर्मके अनुसार तुम्हारी मृत्यु हो गयी। उसी महान् पुण्यके प्रभावसे तुम्हें विमान मिला है। राजन्! पूर्वजन्ममें जो तुम्हारे द्वारा वह पुण्य हुआ था, उसीका फल इस समय तुम भोग रहे हो।
हरिश्चन्द्र बोले— मुनिवर! किस महीनेमें वह तिथि आती है और किस विधिसे उसका व्रत करना चाहिये? यह मुझे बताइये।
सनत्कुमारजीने कहा— राजन्! मैं तुम्हें इस व्रतको बताता हूँ; सावधान होकर सुनो। श्रावणमासके<sup>१</sup> कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको यदि रोहिणी नक्षत्रका योग मिल जाय तो उस जन्माष्टमीका नाम 'जयन्ती' होता है। अब मैं इसकी विधिका वर्णन करता हूँ, जैसा कि ब्रह्माजीने मुझे बताया था। उस दिन उपवासका व्रत लेकर काले तिलोंसे मिश्रित जलसे स्नान करे। फिर नवीन कलशकी, जो फूटा-टूटा न हो, स्थापना करे। उसमें पञ्चरत्न डाल दे। हीरा, मोती, वैदूर्य, पुष्पराग (पुखराज) और इन्द्रनील—ये उत्तम पञ्चरत्न हैं—ऐसा कात्यायनका कथन है<sup>२</sup>। कलशके ऊपर सोनेका पात्र रखे और सोनेकी बनी हुई नन्दरानी यशोदाकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाका भाव यह होना चाहिये—'यशोदा अपने पुत्र श्रीकृष्णको स्तन पिलाती हुई मन्द-मन्द मुसकरा रही हैं, श्रीकृष्ण यशोदा मैयाका एक स्तन तो पी रहे हैं और दूसरा स्तन दूसरे हाथसे पकड़े हुए हैं। वे माताकी ओर प्रेमसे देखकर उन्हें सुख पहुँचा रहे हैं।' इस प्रकार जैसी अपनी शक्ति हो, उसीके अनुसार सुवर्णमय भगवत्प्रतिमाका निर्माण कराये। इसके सिवा सोनेकी रोहिणी और चाँदीके चन्द्रमाकी प्रतिमा बनवाये। अँगूठेके बराबर चन्द्रमा हों और चार अंगुलकी रोहिणी। भगवान्के कानोंमें कुण्डल और गलेमें कण्ठा पहनाये। इस प्रकार माताके साथ जगत्पति गोविन्दकी प्रतिमा बनवाकर दूध आदिसे स्नान कराये तथा चन्दनसे अनुलेप करे। दो श्वेत वस्त्रोंसे भगवान्को आच्छादित करके फूलोंकी मालासे उनका शृङ्गार करे। भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थोंका नैवेद्य लगाये, नाना प्रकारके फल अर्पण करे। दीप जलाकर रखे और फूलोंके मण्डपसे पूजास्थानको सुशोभित करे। विज्ञ
१-यहाँ श्रावणका अर्थ भाद्रपद समझना चाहिये। जहाँ शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ होता है; वहाँ भाद्रपदका कृष्णपक्ष श्रावणका कृष्णपक्ष समझा जाता है। इन प्रान्तोंमें कृष्णपक्षसे ही महीना आरम्भ होता है।
२-वज्रमौक्तिकवैदूर्यपुष्परागेन्द्रनीलकम् । पञ्चरत्नं प्रशस्तं तु इति कात्यायनोऽब्रवीत् ॥ (३२।३८)
उत्तराखण्ड ] * जयन्ती संज्ञावाली जन्माष्टमीके व्रत तथा विविध प्रकारके दान आदिकी महिमा * ६३३
पुरुषोंके द्वारा भक्तिपूर्वक नृत्य, गीत और वाद्य कराये। इस प्रकार अपने वैभवके अनुसार सब विधान पूर्ण करके गुरुका पूजन करे, तत्पश्चात् पूजाकी समाप्ति करे।
महादेवजी कहते हैं— जब इन्द्रके सौ यज्ञ पूर्ण हो गये और उत्तम दक्षिणा देकर यज्ञका कार्य समाप्त कर दिया गया, उस समय देवराजके मनमें कुछ पूछनेका संकल्प हुआ; अतएव उन्होंने अपने गुरु बृहस्पतिजीसे इस प्रकार प्रश्न किया।
इन्द्र बोले— भगवन् ! किस दानसे सब ओर सुखकी वृद्धि होती है? जो अक्षय तथा महान् अर्थका साधक हो, उसका वर्णन कीजिये।
बृहस्पतिजीने कहा— इन्द्र ! सोना, वस्त्र, गौ तथा भूमि— इनका दान करनेवाला पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो भूमिका दान करता है, उसके द्वारा सोने, चाँदी, वस्त्र, मणि एवं रत्नका भी दान हो जाता है। जो फालसे जोती हो, जिसमें बीज बो दिया गया हो तथा जहाँ खेती लहरा रही हो, ऐसी भूमिका दान करके मनुष्य तबतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है, जबतक सूर्यका प्रकाश बना रहता है। जीविकाके कष्टसे मनुष्य जो कुछ भी पाप करता है, वह गोचर्ममात्र भूमिके दानसे छूट जाता है। दस हाथका एक दण्ड होता है, तीस दण्डका एक वर्तन होता है और दस वर्तनका एक गोचर्म होता है; यही ब्रह्म-गोचर्मकी भी परिभाषा है। छोटे बछड़ोंको जन्म देनेवाली एक हजार गौएँ जहाँ साँड़ोंके साथ खड़ी हो सकें, उतनी भूमिको एक गोचर्म माना गया है। गुणवान्, तपस्वी तथा जितेन्द्रिय ब्राह्मणको दान देना चाहिये। उस दानका अक्षय फल तबतक मिलता रहता है, जबतक यह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी कायम रहती है। इन्द्र ! जैसे तेलकी बूँद कहीं गिरनेपर शीघ्र ही फैल जाती है, उसी प्रकार खेतीके साथ किया हुआ भूमिदान विशेष विस्तारको प्राप्त होता है। गौ, भूमि और विद्या— इन तीन वस्तुओंके दानको अतिदान बताया गया है; ये क्रमशः दुहने, बोने तथा अभ्यास करनेसे नरकसे उद्धार कर देती हैं।*
वस्त्रदान करनेवाले पुरुष परलोकके मार्गपर वस्त्रोंसे आच्छादित होकर यात्रा करते हैं और जिन्होंने वस्त्रदान नहीं किया है, उन्हें नंगे ही जाना पड़ता है। अन्नदान करनेवाले लोग तृप्त होकर जाते हैं; जो अन्नदान नहीं करते, उन्हें भूखे ही यात्रा करनी पड़ती है। नरकके भयसे डरे हुए सभी पितर इस बातकी अभिलाषा करते हैं कि हमारे पुत्रोंमेंसे जो कोई गया जायगा, वह हमें तारनेवाला होगा। बहुत-से पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे एक भी तो गया जायगा अथवा नील वृषका उत्सर्ग करेगा। जो रंगसे लाल हो, जिसकी पूँछके अग्रभागमें कुछ पीलापन लिये सफेदी हो और खुर तथा सींगोंका विशुद्ध श्वेत वर्ण हो, वह 'नील वृष' कहलाता है।† पाण्डु रंगकी पूँछवाला नील वृष जो जल उछालता है, उससे साठ हजार वर्षोंतक पितर तृप्त रहते हैं। जिसके सींगमें नदीके किनारेकी उखाड़ी हुई मिट्टी लगी होती है, उसके दानसे पितरगण परम प्रकाशमय चन्द्रलोकका सुख भोगते हैं।
यह पृथ्वी पूर्वकालमें राजा दिलीप, नृग, नहुष तथा अन्यअन्य नरेशोंके अधीन थी और पुनः अन्यअन्य राजाओंके अधिकारमें जाती रहेगी। सगर आदि बहुत-से राजा इस पृथ्वीका दान कर चुके हैं। यह जब जिसके अधिकारमें रहती है, तब उसीको इसके दानका फल मिलता है। जो अपनी या दूसरेकी दी हुई पृथ्वीको हर लेता है; वह विष्ठाका कीड़ा होकर पितरोंसहित नरकमें पकाया जाता है। भूमिदान करनेवालेसे बढ़कर पुण्यवान् तथा भूमि हर लेनेवालेसे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं है। जबतक महाप्रलय नहीं हो जाता, तबतक भूमिदाता ऊर्ध्वलोकमें और भूमिहर्ता नरकमें रहता है। सुवर्ण अग्निकी प्रथम संतान है, पृथ्वी विष्णुके अंशसे प्रकट हुई है तथा गौएँ सूर्यकी कन्याएँ हैं। इसलिये जो सुवर्ण, गौ
* त्रीण्याहुरतिदानानि गावः पृथ्वी सरस्वती। नरकादुद्धरन्त्येते जपवापनदोहनात् ॥ (३३।१८)
† लोहितो यस्तु वर्णेन पुच्छाग्रे यस्तु पाण्डुरः। श्वेतः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते ॥ (३२।२२-२३),
६३४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
तथा पृथ्वीका दान करता है, वह उनके दानका अक्षय फल भोगता है। जो भूमिको न्यायपूर्वक देता और जो न्यायपूर्वक ग्रहण करता है, वे दोनों ही पुण्यकर्मा हैं; उन्हें निश्चय ही स्वर्गकी प्राप्ति होती है। जिन लोगोंने अन्यायपूर्वक पृथ्वीका अपहरण किया अथवा कराया है, वे दोनों ही प्रकारके मनुष्य अपनी सात पीढ़ियोंका विनाश करते हैं—उन्हें सद्गतिसे वंचित कर देते हैं। ब्राह्मणका खेत हर लेनेपर कुलकी तीन पीढ़ियोंका नाश हो जाता है। एक हजार कूप और बावली बनवानेसे, सौ अश्वमेध करनेसे तथा करोड़ों गौएँ देनेसे भी भूमिहर्ताकी शुद्धि नहीं होती।
किया हुआ शुभ कर्म, दान, तप, स्वाध्याय तथा जो कुछ भी धर्मसम्बन्धी कार्य है, वह सब खेतकी आधी अंगुल सीमा हर लेनेसे भी नष्ट हो जाता है। गोतीर्थ (गौओंके चरने और पानी पीने आदिका स्थान), गाँवकी सड़क, मरघट तथा गाँवको दबाकर मनुष्य प्रलयकाल-तक नरकमें पड़ा रहता है।* यदि जीविकाके बिना प्राण कण्ठतक आ जायँ तो भी ब्राह्मणके धनका लोभ नहीं करना चाहिये। अग्निकी आँच और सूर्यके तापसे जले हुए वृक्ष आदि पुनः पनपते हैं, राजदण्डसे दण्डित मनुष्योंकी अवस्था भी पुनः सुधर जाती है; किन्तु जिनपर ब्राह्मणोंके शापका प्रहार होता है, वे तो नष्ट ही हो जाते हैं। ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाला मनुष्य रौरव नरकमें पड़ता है। केवल विषको ही विष नहीं कहते, ब्राह्मणका धन सबसे बड़ा विष कहा जाता है। साधारण विष तो एकको ही मारता है, किन्तु ब्राह्मणका धनरूपी विष बेटों और पोतोंका भी नाश कर डालता है ! मनुष्य लोहे और पत्थरके चूरेको तथा विषको भी पचा सकता है; परन्तु तीनों लोकोंमें कौन ऐसा पुरुष है, जो ब्राह्मणके धनको पचा सके। ब्राह्मणके धनसे जो सुख उठाया जाता है, देवताके धनके प्रति जो राग पैदा होता है; वह धन समूचे कुलके नाशका कारण होता है तथा अपना विनाश तो वह करता ही है। ब्राह्मणका धन, ब्रह्महत्या, दरिद्रका धन, गुरु और मित्रका सुवर्ण—ये सब स्वर्गमें जानेपर भी मनुष्यको पीड़ा पहुँचाते हैं।
देवश्रेष्ठ इन्द्र ! जो ब्राह्मण श्रोत्रिय, कुलीन, दरिद्र, सन्तुष्ट, विनयी, वेदाभ्यासी, तपस्वी, ज्ञानी और इन्द्रियसंयमी हो, उसे ही दिया हुआ दान अक्षय होता है। जैसे कच्चे बर्तनमें रखा हुआ दूध, दही, घी अथवा मधु दुर्बलताके कारण पात्रको ही छेद देता है, उसी प्रकार यदि अज्ञानी पुरुष गौ, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न, पृथ्वी और तिल आदिका दान ग्रहण करता है तो वह काष्ठकी भाँति भस्म हो जाता है।
जो नया पोखरा बनवाता है, अथवा पुरानेको ही खुदवाता है, वह समस्त कुलका उद्धार करके स्वर्ग-लोकमें प्रतिष्ठित होता है। बावली, कुआँ, तडाग और बगीचे पुनः संस्कार (जीर्णोद्धार) करनेपर मोक्षरूप फल प्रदान करते हैं। इन्द्र ! जिसके जलाशयमें गर्मीके मौसमतक पानी ठहरता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकटका सामना नहीं करता। देवश्रेष्ठ ! यदि एक दिन भी पानी ठहर जाय तो वह सात पहलेकी और सात पीछेकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। दीपका प्रकाश दान करनेसे मनुष्य रूपवान् होता है और दक्षिणा देनेसे स्मरणशक्ति तथा मेधा (धारणा-शक्ति) को प्राप्त करता है। यदि बलपूर्वक अपहरण की हुई भूमि, गौ तथा स्त्रीको मनुष्य पुनः लौटा न दे तो उसे ब्रह्महत्यारा कहा जाता है।
इन्द्र ! जो विवाह, यज्ञ तथा दानका अवसर उपस्थित होनेपर उसमें मोहवश विघ्न डालता है, वह मरनेपर कीड़ा होता है। दान करनेसे धन और जीव-रक्षा करनेसे जीवन सफल होता है। रूप, ऐश्वर्य तथा आरोग्य—ये अहिंसाके फल हैं, जो अनुभवमें आते हैं। फल-मूलके भोजनसे सम्मान तथा सत्यसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। मरणान्त उपवाससे राज्य और सर्वत्र सुख
* कृतं दत्तं तपोऽधीतं यत्किञ्चिद्धर्मसंस्थितम् । अर्धाङ्गुलस्य सीमाया हरणेन प्रणश्यति ॥
गोतीर्थं ग्रामरथ्यां च श्मशानं ग्राममेव च । संपीड़्य नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम् ॥ ( ३३ । ३८-३९ )
उत्तरखण्ड ] $\quad\quad$ * महाराज दशरथका शनिको संतुष्ट करके लोकका कल्याण करना * $\quad\quad$ ६३५
उपलब्ध होता है। तीनों काल स्नान करनेवाला मनुष्य रूपवान् होता है। वायु पीकर रहनेवाला यज्ञका फल पाता है। जो उपवास करता है, वह चिरकालतक स्वर्गमें निवास करता है। जो सदा भूमिपर शयन करता है, उसे अभीष्ट गतिकी प्राप्ति होती है, जो पवित्र धर्मका आचरण करता है, वह स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। जो द्विजश्रेष्ठ बृहस्पतिजीके इस पवित्र मतका स्वाध्याय करते हैं, उनकी आयु, विद्या, यश और बल—ये चार बातें बढ़ती हैं।
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महाराज दशरथका शनिको संतुष्ट करके लोकका कल्याण करना
नारदजीने पूछा— सुरश्रेष्ठ ! शनैश्चरकी दी हुई पीड़ा कैसे दूर होती है ? यह मुझे बताइये।
महादेवजी बोले— देवर्षे ! सुनो, ये शनैश्चर देवताओंमें प्रसिद्ध कालरूपी महान् ग्रह हैं। इनके मस्तकपर जटा है, शरीरमें बहुत-से रोएँ हैं तथा ये दानवोंको भय पहुँचानेवाले हैं। पूर्वकालकी बात है, रघुवंशमें दशरथ नामके एक बहुत प्रसिद्ध राजा हो गये हैं। वे चक्रवर्ती सम्राट्, महान् वीर तथा सातों द्वीपोंके स्वामी थे। उन दिनों ज्योतिषियोंने यह जानकर कि शनैश्चर कृत्तिकाके अन्तमें जा पहुँचे हैं, राजाको सूचित किया—'महाराज ! इस समय शनि रोहिणीका भेदन करके आगे बढ़ेंगे; यह अत्यन्त उग्र शाकटभेद नामक योग है, जो देवताओं तथा असुरोंके लिये भी भयंकर है। इससे बारह वर्षोंतक संसारमें अत्यन्त भयानक दुर्भिक्ष फैलेगा।' यह सुनकर राजाने मन्त्रियोंके साथ विचार किया और वसिष्ठ आदि ब्राह्मणोंसे पूछा—'द्विजवरो ! बताइये, इस संकटको रोकनेका यहाँ कौन-सा उपाय है ?'
वसिष्ठजी बोले— राजन् ! यह रोहिणी प्रजापति ब्रह्माजीका नक्षत्र है, इसका भेद हो जानेपर प्रजा कैसे रह सकती है। ब्रह्मा और इन्द्र आदिके लिये भी यह योग असाध्य है।
महादेवजी कहते हैं— नारद ! इस बातपर विचार करके राजा दशरथने मनमें महान् साहसका संग्रह किया और दिव्यास्त्रोंसहित दिव्य धनुष लेकर आरूढ़ हो बड़े वेगसे वे नक्षत्र-मण्डलमें गये। रोहिणीपृष्ठ सूर्यसे सवा लाख योजन ऊपर है; वहाँ पहुँचकर राजाने धनुषको कानतक खींचा और उसपर संहारास्त्रका संधान किया। वह अस्त्र देवता और असुरोंके लिये भयंकर था। उसे देखकर शनि कुछ भयभीत हो हँसते हुए बोले—'राजेन्द्र ! तुम्हारा महान् पुरुषार्थ शत्रुको भय पहुँचानेवाला है। मेरी दृष्टिमें आकर देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग—सब भस्म हो जाते हैं; किन्तु तुम बच गये। अतः महाराज ! तुम्हारे तेज और पौरुषसे मैं संतुष्ट हूँ। वर माँगो; तुम अपने मनसे जो कुछ चाहोगे, उसे अवश्य दूँगा।'
दशरथने कहा— शनिदेव ! जबतक नदियाँ और समुद्र हैं, जबतक सूर्य और चन्द्रमासहित पृथ्वी कायम है, तबतक आप रोहिणीका भेदन करके आगे न बढ़ें। साथ ही कभी बारह वर्षोंतक दुर्भिक्ष न करें।
शनि बोले— एवमस्तु।
६३६ $\qquad$ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * $\qquad$ [ संक्षिप्त पद्मपुराण
**महादेवजी कहते हैं—**ये दोनों वर पाकर राजा बड़े प्रसन्न हुए, उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे रथके ऊपर धनुष डाल हाथ जोड़ शनिदेवकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
**दशरथ बोले—**जिनके शरीरका वर्ण कृष्ण, नील तथा भगवान् शङ्करके समान है, उन शनिदेवको नमस्कार है। जो जगत्के लिये कालाग्नि एवं कृतान्तरूप हैं, उन शनैश्चरको बारम्बार नमस्कार है। जिनका शरीर कङ्काल है तथा जिनकी दाढ़ी-मूँछ और जटा बढ़ी हुई है, उन शनिदेवको प्रणाम है। जिनके बड़े-बड़े नेत्र, पीठमें सटा हुआ पेट और भयानक आकार है, उन शनैश्चरदेवको नमस्कार है। जिनके शरीरका ढाँचा फैला हुआ है, जिनके रोएँ बहुत मोटे हैं, जो लम्बे-चौड़े किन्तु सूखे शरीरवाले हैं तथा जिनकी दाढ़ें कालरूप हैं, उन शनिदेवको बारम्बार प्रणाम है। शने! आपके नेत्र खोखलेके समान गहरे हैं, आपकी ओर देखना कठिन है, आप घोर, रौद्र, भीषण और विकराल हैं। आपको नमस्कार है। बलीमुख! आप सब कुछ भक्षण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है। सूर्यनन्दन! भास्करपुत्र! अभय देनेवाले देवता! आपको प्रणाम है। नीचेकी ओर दृष्टि रखनेवाले शनिदेव! आपको नमस्कार है। संवर्तकं! आपको प्रणाम है। मन्दगतिसे चलनेवाले शनैश्चर! आपका प्रतीक तलवारके समान है, आपको पुनः-पुनः प्रणाम है। आपने तपस्यासे अपने देहको दग्ध कर दिया है; आप सदा योगाभ्यासमें तत्पर, भूखसे आतुर और अतृप्त रहते हैं। आपको सदा-सर्वदा नमस्कार है। ज्ञाननेत्र! आपको प्रणाम है। कश्यपनन्दन सूर्यके पुत्र शनिदेव! आपको नमस्कार है। आप संतुष्ट होनेपर राज्य दे देते हैं और रुष्ट होनेपर उसे तत्क्षण हर लेते हैं। देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग—ये सब आपकी दृष्टि पड़ने-पर समूल नष्ट हो जाते हैं। देव! मुझपर प्रसन्न होइये। मैं वर पानेके योग्य हूँ और आपकी शरणमें आया हूँ।*
**महादेवजी कहते हैं—**नारद! राजाके इस प्रकार स्तुति करनेपर ग्रहोंके राजा महाबलवान् सूर्यपुत्र शनैश्चर बोले—उत्तम व्रतके पालक राजेन्द्र! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं संतुष्ट हूँ। रघुनन्दन! तुम इच्छानुसार वर माँगो, मैं तुम्हें अवश्य दूँगा।
**दशरथ बोले—**सूर्यनन्दन! आजसे आप देवता, असुर, मनुष्य, पशु, पक्षी तथा नाग—किसी भी प्राणीको पीड़ा न दें।
**शनिने कहा—**राजन्! देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर तथा राक्षस—इनमेंसे किसीके भी मृत्यु-स्थान, जन्मस्थान अथवा चतुर्थ स्थानमें मैं रहूँ तो उसे मृत्युका कष्ट दे सकता हूँ। किन्तु जो श्रद्धासे युक्त, पवित्र और एकाग्रचित्त हो मेरी लोहमयी सुन्दर प्रतिमाका शमीपत्रोंसे पूजन करके तिलमिश्रित उड़द-भात, लोहा, काली गौ या काला वृषभ ब्राह्मणको दान करता है तथा विशेषतः मेरे दिनको इस स्तोत्रसे मेरी पूजा करता है, पूजनके पश्चात् भी हाथ जोड़कर मेरे स्तोत्रका जप करता है, उसे मैं कभी भी पीड़ा नहीं दूँगा। गोचरमें, जन्मलग्नमें,
* नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च। नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः॥
नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च। नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते॥
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुनः। नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते॥
नमस्ते कोटरक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः। नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने॥
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते। सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च॥
अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते। नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते॥
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च। नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः॥
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे। तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥
देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः। त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।
$\qquad\qquad$ प्रसादं कुरु मे देव वराहोऽहमुपागतः॥
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad(३४। २७—३५)$
उत्तरखण्ड ]
- त्रिस्पृशाव्रतकी विधि और महिमा *
६३७
दशाओं तथा अन्तर्दशाओंमें ग्रह-पीड़ाका निवारण करके
वे शनैश्चरको नमस्कार करके उनकी आज्ञा ले रथपर
मैं सदा उसकी रक्षा करूँगा। इसी विधानसे सारा संसार
सवार हो बड़े वेगसे अपने स्थानको चले गये। उन्होंने
पीड़ासे मुक्त हो सकता है। रघुनन्दन ! इस प्रकार मैंने
कल्याण प्राप्त कर लिया था। जो शनिवारको सबेरे
युक्तिसे तुम्हें वरदान दिया है।
उठकर इस स्तोत्रका पाठ करत है तथा पाठ होते समय
महादेवजी कहते हैं- नारद ! वे तीनों वरदान
जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह मनुष्य पापसे मुक्त हो
पाकर उस समय राजा दशरथने अपनेको कृतार्थ माना।
स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
त्रिस्पृशाव्रतकी विधि और महिमा
नारदजी बोले- सर्वेश्वर ! अब आप विशेष
त्रिस्पृशा एकादशी हो तो वह करोड़ों पापोंका नाश
रूपसे त्रिस्पृशा नामक व्रतका वर्णन कीजिये, जिसे
करनेवाली है। विप्रवर ! और पापोंकी तो बात ही क्या है,
सुनकर लोग तत्काल कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।
त्रिस्पृशाके व्रतसे ब्रह्महत्या आदि महापाप भी नष्ट हो जाते
महादेवजीने कहा- विद्वन् ! पूर्वकालमें सम्पूर्ण
हैं। प्रयागमें मृत्यु होनेसे तथा द्वारकामें श्रीकृष्णके निकट
लोकोंके हितकी इच्छासे सनत्कुमारजीने व्यासजीके प्रति
गोमतीमें स्नान करनेसे शाश्वत मोक्ष प्राप्त होता है, परन्तु
इस व्रतका वर्णन किया था। यह व्रत सम्पूर्ण पाप-
त्रिस्पृशाका उपवास करनेसे घरपर भी मुक्ति हो जाती है।
राशिका शमन करनेवाला और महान् दुःखोंका विनाशक
इसलिये विप्रवर नारद ! तुम मोक्षदायिनी त्रिस्पृशाके
है। विप्र ! त्रिस्पृशा नामक महान् व्रत सम्पूर्ण
व्रतका अवश्य अनुष्ठान करो। विप्र ! पूर्वकालमें
कामनाओंका दाता माना गया है। ब्राह्मणोंके लिये तो
भगवान् माधवने प्राची सरस्वतीके तटपर गङ्गाजीके प्रति
मोक्षदायक भी है। महामुने ! जो प्रतिदिन 'त्रिस्पृशा'का
कृपापूर्वक त्रिस्पृशा-व्रतका वर्णन किया था।
नामोच्चारण करता है, उसके समस्त पापोंका क्षय हो जाता
गङ्गाने पूछा- हृषीकेश ! ब्रह्महत्या आदि करोड़ों
है। देवाधिदेव भगवान्ने मोक्ष-प्राप्तिके लिये इस व्रतकी
पाप-राशियोंसे युक्त मनुष्य मेरे जलमें स्नान करते हैं,
सृष्टि की है, इसीलिये इसे 'वैष्णवी तिथि' कहते हैं।
उनके पापों और दोषोंसे मेरा. शरीर कलुषित हो गया है।
इन्द्रियोंका निग्रह न होनेसे मनमें स्थिरता नहीं आती
देव ! गरुडध्वज ! मेरा वह पातक कैसे दूर होगा ?
[मनकी यह अस्थिरता ही मोक्षमें बाधक है] । ब्रह्मन् !
प्राचीमाधव बोले- शुभे ! तुम त्रिस्पृशाका व्रत
जो ध्यान-धारणासे वर्जित, विषयपरायण तथा काम-
करो। यह सौ करोड़ तीर्थोंसे भी अधिक महत्त्वशालिनी
भोगमें आसक्त हैं, उनके लिये त्रिस्पृशा ही मोक्षदायिनी
है। करोड़ों यज्ञ, व्रत, दान, जप, होम और सांख्ययोगसे
है। मुनिश्रेष्ठ ! पूर्वकालमें जब चक्रधारी श्रीविष्णुके द्वारा
भी इसकी शक्ति बढ़ी हुई है। यह धर्म, अर्थ, काम और
क्षीरसागरका मन्थन हो रहा था, उस समय चरणोंमें पड़े
मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली है। नदियोंमें श्रेष्ठ
हुए देवताओंके मध्यमें ब्रह्माजीसे मैंने ही इस व्रतका
गङ्गा ! त्रिस्पृशा-व्रत जिस-किसी महीनेमें भी आये तथा
वर्णन किया था। जो लोग विषयोंमें आसक्त रहकर भी
वह शुक्लपक्षमें हो या कृष्णपक्षमें, उसका अनुष्ठान करना
त्रिस्पृशाका व्रत करेंगे, उनके लिये भी मैंने मोक्षका
ही चाहिये। उसे करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगी।
अधिकार दे रखा है। नारद ! तुम इस व्रतका अनुष्ठान
जब एक ही दिन एकादशी, द्वादशी तथा रात्रिके अन्तिम
करो, क्योंकि त्रिस्पृशा मोक्ष देनेवाली है। महामुने !
प्रहरमें त्रयोदशी भी हो तो उसे 'त्रिस्पृशा' समझना
बड़े-बड़े मुनियोंके समुदायने इस व्रतका पालन किया
चाहिये। उसमें दशमीका योग नहीं होता। देवनदी !
है। यदि कार्तिक शुक्लपक्षमें सोमवार या बुधवारसे युक्त
एकादशी-व्रतमें दशमी-वेधका दोष मैं नहीं क्षमा करता।
६३८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
ऐसा जानकर दशमीयुक्त एकादशीका व्रत नहीं करना चाहिये। उसे करनेसे करोड़ों जन्मोंके किये हुए पुण्य तथा संतानका नाश होता है। वह पुरुष अपने वंशको स्वर्गसे गिराता और रौरव आदि नरकोंमें पहुँचाता है। अपने शरीरको शुद्ध करके मेरे दिन—एकादशीका व्रत करना चाहिये। द्वादशी मुझे अत्यन्त प्रिय है, मेरी आज्ञासे इसका व्रत करना उचित है।
गङ्गा बोलीं— जगन्नाथ! आपके कहनेसे मैं त्रिस्पृशाका व्रत अवश्य करूँगी, आप मुझे इसकी विधि बताइये।
प्राचीमाधवने कहा— सरिताओंमें उत्तम गङ्गा देवी! सुनो, मैं त्रिस्पृशाका विधान बताता हूँ। इसका श्रवण मात्र करनेसे भी मनुष्य पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अपने वैभवके अनुसार एक या आधे पल सोनेकी मेरी प्रतिमा बनवानी चाहिये। इसके बाद एक ताँबेके पात्रको तिलसे भरकर रखे और जलसे भरे हुए सुन्दर कलशकी स्थापना करे, जिसमें पञ्चरत्न मिलाये गये हों। कलशको फूलोंकी मालाओंसे आवेष्टित करके कपूर आदिसे सुवासित करे। इसके बाद भगवान् दामोदरको स्थापित करके उन्हें स्नान कराये और चन्दन चढ़ाये। फिर भगवान्को वस्त्र धारण कराये। तदनन्तर पुराणोक्त सामयिक सुन्दर पुष्प तथा कोमल तुलसीदलसे भगवान्की पूजा करे। उन्हें छत्र और उपानह (जूतियाँ) अर्पण करे ! मनोहर नैवेद्य और बहुत-से सुन्दर-सुन्दर फलोंका भोग लगाये। यज्ञोपवीत तथा नूतन एवं सुदृढ़ उत्तरीय वस्त्र चढ़ाये। सुन्दर ऊँची बाँसकी छड़ी भी भेंट करे। 'दामोदराय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी, 'माधवाय नमः' से दोनों घुटनोंकी, 'कामप्रदाय नमः' से गुह्यभागकी तथा 'वामनमूर्तये नमः' कहकर कटिकी पूजा करे। 'पद्मनाभाय नमः' से नाभिकी, 'विश्वमूर्तये नमः' से पेटकी, 'ज्ञानगम्याय नमः' से हृदयकी, 'वैकुण्ठगामिने नमः' से कण्ठकी, 'सहस्रबाहवे नमः' से बाहुओंकी, 'योगरूपिणे नमः' से नेत्रोंकी, 'सहस्रशीर्ष्णे नमः' से सिरकी तथा 'माधवाय नमः' कहकर सम्पूर्ण अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये।
इस प्रकार विधिवत् पूजा करके विधिके अनुसार अर्घ्य देना चाहिये। जलयुक्त शङ्खके ऊपर सुन्दर नारियल रखकर उसमें रक्षासूत्र लपेट दे। फिर दोनों हाथोंमें वह शङ्ख आदि लेकर निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—
स्मृतो हरसि पापानि यदि नित्यं जनार्दन ॥
दुःस्वप्नं दुर्निमित्तानि मनसा दुर्विचिन्तितम्।
नारकं तु भयं देव भयं दुर्गतिसंभवम् ॥
यन्मम स्यान्महादेव ऐहिकं पारलौकिकम्।
तेन देवेश मां रक्ष गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥
सदा भक्तिर्ममैवास्तु दामोदर तवोपरि।
(३५।६९–७२)
'जनार्दन! यदि आप सदा स्मरण करनेपर मनुष्यके सब पाप हर लेते हैं तो देव! मेरे दुःस्वप्न, अपशकुन, मानसिक दुश्चिन्ता, नारकीय भय तथा दुर्गतिजन्य त्रास हर लीजिये। महादेव ! देवेश्वर ! मेरे लिये इहलोक तथा परलोकमें जो भय हैं, उनसे मेरी रक्षा कीजिये तथा यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है। दामोदर ! सदा आपमें ही मेरी भक्ति बनी रहे।'
तत्पश्चात् धूप, दीप और नैवेद्य अर्पण करके भगवान्की आरती उतारे। उनके मस्तकपर शङ्ख घुमाये। यह सब विधान पूरा करके सद्गुरुकी पूजा करे। उन्हें सुन्दर वस्त्र, पगड़ी तथा अंगा दे। साथ ही जूता, छत्र, अँगूठी, कमण्डलु, भोजन, पान, सप्तधान्य तथा दक्षिणा दे। गुरु और भगवान्की पूजाके पश्चात् श्रीहरिके समीप जागरण करे। जागरणमें गीत, नृत्य तथा अन्यान्य उपचारोंका भी समावेश रहना चाहिये। तदनन्तर रात्रिके अन्तमें विधिपूर्वक भगवान्को अर्घ्य दे स्नान आदि कार्य करके ब्राह्मणोंको भोजन करानेके पश्चात् स्वयं भोजन करे।
महादेवजी कहते हैं— ब्रह्मन् ! 'त्रिस्पृशा' व्रतका यह अद्भुत उपाख्यान सुनकर मनुष्य गङ्गातीर्थमें स्नान करनेका पुण्य-फल प्राप्त करता है। त्रिस्पृशाके उपवाससे हजार अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञोंका फल मिलता है। यह व्रत करनेवाला पुरुष पितृकुल, मातृकुल तथा पत्नीकुलके सहित विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। करोड़ों तीर्थोंमें जो पुण्य तथा करोड़ों क्षेत्रोंमें जो फल
उत्तरखण्ड ] * पक्षवर्धिनी एकादशी तथा जागरणका माहात्म्य * ६३९
मिलता है, वह त्रिस्पृशाके उपवाससे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। द्विजश्रेष्ठ ! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा अन्य जातिके लोग भगवान् श्रीकृष्णमें मन लगाकर इस व्रतको करते हैं, वे सब इस धराधामको छोड़नेपर मुक्त हो जाते हैं। इसमें द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये। यह मन्त्रोंमें मन्त्रराज माना गया है। इसी प्रकार त्रिस्पृशा सब व्रतोंमें उत्तम बतायी गयी है। जिसने इसका व्रत किया, उसने सम्पूर्ण व्रतोंका अनुष्ठान कर लिया। पूर्वकालमें स्वयं ब्रह्माजीने इस व्रतको किया था; तदनन्तर अनेकों ऋषियोंने भी इसका अनुष्ठान किया; फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। नारद ! यह त्रिस्पृशा मोक्ष देनेवाली है।
पक्षवर्धिनी एकादशी तथा जागरणका माहात्म्य
नारदजीने पूछा— महादेव ! 'पक्षवर्धिनी' नामवाली तिथि कैसी होती है, जिसका व्रत करनेसे मनुष्य महान् पापसे छुटकारा पा जाता है ?
श्रीमहादेवजी बोले— यदि अमावास्या अथवा पूर्णिमा साठ दण्डकी होकर दिन-रात अविकल रूपसे रहे और दूसरे दिन प्रतिपदमें भी उसका कुछ अंश चला गया हो तो वह 'पक्षवर्धिनी' मानी जाती है। उस पक्षकी एकादशीका भी यही नाम है, वह दस हजार अश्वमेध यज्ञोंके समान फल देनेवाली होती है। अब उस दिन की जानेवाली पूजाविधिका वर्णन करता हूँ, जिससे भगवान् लक्ष्मीपतिको संतोष प्राप्त होता है। सबसे पहले जलसे भरे हुए कलशकी स्थापना करनी चाहिये। कलश नवीन हो—फूटा-टूटा न हो और चन्दनसे चर्चित किया गया हो। उसके भीतर पञ्चरत्न डाले गये हों तथा वह कलश फूलकी मालाओंसे आवृत हो। उसके ऊपर एक ताँबेका पात्र रखकर उसमें गेहूँ भर देना चाहिये। उस पात्रमें भगवान्के सुवर्णमय विग्रहकी स्थापना करे। जिस मासमें पक्षवर्धिनी तिथि पड़ी हो, उसीका नाम भगवद्विग्रहका भी नाम समझना चाहिये। जगत्के स्वामी देवेश्वर जगन्नाथका स्वरूप अत्यन्त मनोहर बनवाना चाहिये। फिर विधिपूर्वक पञ्चामृतसे भगवान्को नहलाना तथा कुङ्कुम, अरगजा और चन्दनसे अनुलेप करना चाहिये। फिर दो वस्त्र अर्पण करने चाहिये; उनके साथ छत्र और जूते भी हों। इसके बाद कलशपर विराजमान देवेश्वर श्रीहरिकी पूजा आरम्भ करे। 'पद्मनाभाय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी, 'विश्वमूर्तये नमः' बोलकर दोनों घुटनोंकी, 'ज्ञानगम्याय नमः' से दोनों जाँघोंकी, 'ज्ञानप्रदाय नमः' से कटिभागकी, 'विश्वनाथाय नमः' से उदरकी, 'श्रीधराय नमः' से हृदयकी, 'कौस्तुभकण्ठाय नमः' से कण्ठकी, 'क्षत्रान्तकारिणे नमः' से दोनों बाँहोंकी, 'व्योममूर्ते नमः' से ललाटकी तथा 'सर्वरूपिणे नमः' से सिरकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न अस्त्रोंका भी उनके नाममन्त्रद्वारा पूजन करना उचित है। अन्तमें 'दिव्यरूपिणे नमः' कहकर भगवान्के सम्पूर्ण अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये।
इस तरह विधिवत् पूजन करके विद्वान् पुरुष सुन्दर नारियलके द्वारा चक्रधारी देवदेव श्रीहरिको अर्घ्य प्रदान करे। इस अर्घ्यदानसे ही व्रत पूर्ण होता है। अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है—
संसारार्णवमग्नं भो मामुद्धर जगत्पते ।
त्वमीशः सर्वलोकानां त्वं साक्षाच्च जगत्पतिः ॥
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं पद्मनाभ नमोऽस्तु ते ।
(३८ । १४-१५)
'जगदीश्वर ! मैं संसारसागरमें डूब रहा हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। आप सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वर तथा साक्षात् जगत्पति परमेश्वर हैं। पद्मनाभ ! आपको नमस्कार है। मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार कीजिये।'
तत्पश्चात् भगवान् केशवको भक्तिपूर्वक भाँति-भाँतिके नैवेद्य अर्पण करे, जो मनको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले और मधुर आदि छहों रसोंसे युक्त हों। इसके बाद भगवान्को भक्तिके साथ कर्पूरयुक्त ताम्बूल निवेदन करे। घी अथवा तिलके तेलसे दीपक जलाकर रखे।
६४० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
यह सब करनेके पश्चात् गुरुकी पूजा करे। उन्हें वस्त्र, पगड़ी तथा जामा दे। अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा भी दे। फिर भोजन और ताम्बूल निवेदन करके आचार्यको संतुष्ट करे। निर्धन पुरुषोंको भी यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक पक्षवर्धिनी एकादशीका व्रत करना चाहिये। तदनन्तर गीत, नृत्य, पुराण-पाठ तथा हर्षके साथ रात्रिमें जागरण करे।
जो मनीषी पुरुष पक्षवर्धिनी एकादशीका माहात्म्य श्रवण करते हैं, उनके द्वारा सम्पूर्ण व्रतका अनुष्ठान हो जाता है। पञ्चाग्निसेवन तथा तीर्थोंमें साधना करनेसे जो पुण्य होता है, वह श्रीविष्णुके समीप जागरण करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। पक्षवर्धिनी एकादशी परम पुण्यमयी तथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। ब्रह्मन् ! यह उपवास करनेवाले मनुष्योंकी करोड़ों हत्याओंका भी विनाश कर डालती है। मुने ! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, ध्रुव तथा राजा अम्बरीषने भी इसका व्रत किया था। यह तिथि श्रीविष्णुको अत्यन्त प्रिय है। यह काशी तथा द्वारकापुरीके समान पवित्र है। भक्त पुरुषके उपवास करनेपर यह उसे मनोवाञ्छित फल प्रदान करती है। जैसे सूर्योदय होनेपर तत्काल अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार पक्षवर्धिनीका व्रत करनेसे पापराशि नष्ट हो जाती है।
नारद ! अब मैं एकादशीकी रातमें जागरण करनेका माहात्म्य बतलाऊँगा, ध्यान देकर सुनो। भक्त पुरुषको चाहिये कि एकादशी तिथिको रात्रिके समय भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन करके वैष्णवोंके साथ उनके सामने जागरण करे। जो गीत, वाद्य, नृत्य, पुराण-पाठ, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चन्दनानुलेप, फल, अर्घ्य, श्रद्धा, दान, इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण तथा शुभकर्मके अनुष्ठानपूर्वक प्रसन्नताके साथ श्रीहरिके समक्ष जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान्का प्रिय होता है। जो विद्वान् मनुष्य भगवान् विष्णुके समीप जागरण करते, श्रीकृष्णकी भावना करते हुए कभी नींद नहीं लेते तथा मन-ही-मन बारम्बार श्रीकृष्णका नामोच्चारण करते हैं, उन्हें परम धन्य समझना चाहिये। विशेषतः एकादशीकी रातमें जागनेपर तो वे और भी धन्यवादके पात्र हैं। जागरणके समय एक क्षण गोविन्दका नाम लेनेसे व्रतका चौगुना फल होता है, एक पहरतक नामोच्चारणसे कोटिगुना फल मिलता है और चार पहरतक नामकीर्तन करनेसे असीम फलकी प्राप्ति होती है। श्रीविष्णुके आगे आधे निमेष भी जागनेपर कोटिगुना फल होता है, उसकी संख्या नहीं है। जो नरश्रेष्ठ भगवान् केशवके आगे नृत्य करता है, उसके पुण्यका फल जन्मसे लेकर मृत्युकालतक कभी क्षीण नहीं होता। महाभाग ! प्रत्येक प्रहरमें विस्मय और उत्साहसे युक्त हो पाप तथा आलस्य आदि छोड़कर निर्वेदशून्य हृदयसे श्रीहरिके समक्ष नमस्कार और नीराजनासे युक्त आरती उतारनी चाहिये। जो मनुष्य एकादशीको भक्तिपूर्वक अनेक गुणोंसे युक्त जागरण करता है, वह फिर इस पृथ्वीपर जन्म नहीं लेता। जो धनकी कंजूसी छोड़कर पूर्वोक्त प्रकारसे एकादशीको भक्तिसहित जागरण करता है, वह परमात्मामें लीन होता है।
जो भगवान् विष्णुके लिये जागरणका अवसर प्राप्त होनेपर उसका उपहास करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। प्रतिदिन वेद-शास्त्रमें परायण तथा यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला ही क्यों न हो, यदि एकादशीकी रातमें जागरणका समय आनेपर उसकी निन्दा करता है तो उसका अधःपतन होता है। जो मेरी (शिवकी) पूजा करते हुए विष्णुकी निन्दामें तत्पर रहता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ नरकमें पड़ता है। विष्णु ही शिव हैं और शिव ही विष्णु हैं। दोनों एक ही मूर्तिकी दो झांकियोंके समान स्थित हैं, अतः किसी प्रकार भी इनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। यदि जागरणके समय पुराणकी कथा बाँचनेवाला कोई न हो तो नाच-गान कराना चाहिये। यदि कथावाचक मौजूद हों तो पहले पुराणका ही पाठ होना चाहिये। वत्स ! श्रीविष्णुके लिये जागरण करनेपर एक हजार अश्वमेध तथा दस हजार वाजपेय यज्ञोंसे भी करोड़गुना पुण्य प्राप्त होता है। श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये जागरण करके मनुष्य पिता, माता तथा पत्नी—तीनोंके कुलोंका उद्धार कर देता है।
यदि एकादशीके व्रतका दिन दशमीसे विद्ध हो तो
उत्तराखण्ड ] * पक्षवर्धिनी एकादशी तथा जागरणका माहात्म्य * ६४१
श्रीहरिका पूजन, जागरण और दान आदि सब व्यर्थ होता है—ठीक उसी तरह, जैसे कृतघ्न मनुष्योंके साथ किया हुआ नेकीका बर्ताव व्यर्थ हो जाता है। जो वेधरहित एकादशीको जागरण करते हैं, उनके बीचमें साक्षात् श्रीहरि संतुष्ट होकर नृत्य करते हैं। जो श्रीहरिके लिये नृत्य, गीत और जागरण करता है, उसके लिये ब्रह्माजीका लोक, मेरा कैलास-धाम तथा भगवान् श्रीविष्णुका वैकुण्ठधाम—सब-के-सब निश्चय ही सुलभ हैं। जो स्वयं श्रीहरिके लिये जागरण करते हुए और लोगोंको भी जगाये रखता है, वह विष्णुभक्त पुरुष अपने पितरोंके साथ वैकुण्ठलोकमें निवास करता है। जो श्रीहरिके लिये जागरण करनेकी लोगोंको सलाह देता है, वह मनुष्य साठ हजार वर्षोंतक श्वेतद्वीपमें निवास करता है। नारद ! मनुष्य करोड़ों जन्मोंमें जो पाप सञ्चित करता है, वह सब श्रीहरिके लिये एक रात जागरण करनेपर नष्ट हो जाता है। जो शालग्राम-शिलाके समक्ष जागरण करते हैं, उन्हें एक-एक पहरमें कोटि-कोटि तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त होता है। जागरणके लिये भगवान्के मन्दिरमें जाते समय मनुष्य जितने पग चलता है, वे सभी अश्वमेध यज्ञके समान फल देनेवाले होते हैं। पृथ्वीपर चलते समय दोनों चरणोंपर जितने धूलिकण गिरते हैं, उतने हजार वर्षोंतक जागरण करनेवाला पुरुष दिव्यलोकमें निवास करता है।
इसलिये प्रत्येक द्वादशीको जागरणके लिये अपने घरसे भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाना चाहिये। इससे कलिमलका विनाश होता है। दूसरोंकी निन्दामें संलग्न होना, मनका प्रसन्न न रहना, शास्त्रचर्चाका न होना, संगीतका अभाव, दीपक न जलाना, शक्तिके अनुसार पूजाके उपचारोंका न होना, उदासीनता, निन्दा तथा कलह—इन दोषोंसे युक्त नौ प्रकारका जागरण अधम माना गया है।* जिस जागरणमें शास्त्रकी चर्चा, सात्त्विक नृत्य, संगीत, वाद्य, ताल, तैलयुक्त दीपक, कीर्तन, भक्तिभावना, प्रसन्नता, संतोषजनकता, समुदायकी उपस्थिति तथा लोगोंके मनोरञ्जनका सात्त्विक साधन हो, वह उक्त बारह गुणोंसे युक्त जागरण भगवान्को बहुत प्रिय है। शुक्ल और कृष्ण दोनों ही पक्षोंकी एकादशीको प्रयत्नपूर्वक जागरण करना चाहिये।† नारद ! परदेशमें जानेपर मार्गका थका-माँदा होनेपर भी जो द्वादशीको भगवान् वासुदेवके निमित्त किये जानेवाले जागरणका नियम नही छोड़ता, वह मुझे विशेष प्रिय है। जो एकादशीके दिन भोजन कर लेता है, उसे पशुसे भी गया-बीता समझना चाहिये; वह न तो शिवका उपासक है न सूर्यका, न देवीका भक्त है और न गणेशजीका। जो एकादशीको जागरण करते हैं, उनका बाहर-भीतर यदि करोड़ों पापोंसे घिरा हो तो भी वे मुक्त हो जाते हैं। वेधरहित द्वादशीका व्रत और श्रीविष्णुके लिये किया जानेवाला जागरण यमदूतोंका मानमर्दन करनेवाला है। मुनिश्रेष्ठ ! एकादशीको जागरण करनेवाले मनुष्य अवश्य मुक्त हो जाते हैं।
जो रातको भगवान् वासुदेवके समक्ष जागरणमें प्रवृत्त होनेपर प्रसन्नचित्त हो ताली बजाते हुए नृत्य करता, नाना प्रकारके कौतुक दिखाते हुए मुखसे गीत गाता, वैष्णवजनोंका मनोरञ्जन करते हुए श्रीकृष्ण-चरितका पाठ करता, रोमाञ्चित होकर मुखसे बाजा बजाता तथा स्वेच्छानुसार धार्मिक आलाप करते हुए भाँति-भाँतिके नृत्यका प्रदर्शन करता है, वह भगवान्का प्रिय है। इन भावोंके साथ जो श्रीहरिके लिये जागरण करता है, उसे नैमिष तथा कोटितीर्थका फल प्राप्त होता है। जो शान्तचित्तसे श्रीहरिको धूप-आरती दिखाते हुए रातमें जागरण करता है, वह सात द्वीपोंका अधिपति होता है।
* परापवादसंयुक्तं मनःप्रसादवर्जितम्। शास्त्रहीनमगानञ्च तथा दीपविवर्जितम्॥
शक्त्योपचाररहितमुदासीनं सनिन्दनम्। कलियुक्तं विशेषेण जागरं नवधाऽधमम्॥ (३९। ५३-५४)
† सशास्त्रं जागरं यच्च नृत्यगन्धर्वसंयुतम्। सवाद्यं तालसंयुक्तं सदीपं मधुभिर्युतम्॥
उच्चैरास्तु समायुक्तं यथोक्तैर्भक्तिभावितैः। प्रसन्नं तुष्टिजननं समूढं लोकरञ्जनम्॥
गुणैर्द्वादशभिर्युक्तं जागरं माधवप्रियम्। कर्तव्यं तत् प्रयत्नेन पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः॥ (३९। ५५—५७)
६४२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ****************************************************************************************************
ब्रह्महत्याके समान भी जो कोई पाप हों, वे सब श्रीकृष्णकी प्रीतिका लिये जागरण करनेपर नष्ट हो जाते हैं। एक ओर उत्तम दक्षिणाके साथ समाप्त होनेवाले सम्पूर्ण यज्ञ और दूसरी ओर देवाधिदेव श्रीकृष्णको प्रिय लगनेवाला एकादशीका जागरण—दोनों समान हैं।
जहाँ भगवान्के लिये जागरण किया जाता है वहाँ काशी, पुष्कर, प्रयाग, नैमिषारण्य, शालग्राम नामक महाक्षेत्र, अर्बुदारण्य (आबू), शूकरक्षेत्र (सोरोँ), मथुरा तथा सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। समस्त यज्ञ और चारों वेद भी श्रीहरिके निमित्त किये जानेवाले जागरणके स्थानपर उपस्थित होते हैं। गङ्गा, सरस्वती, तापी, यमुना, शतद्रू (सतलज), चन्द्रभागा तथा वितस्ता आदि सम्पूर्ण नदियाँ भी वहाँ जाती हैं। द्विजश्रेष्ठ ! सरोवर, कुण्ड और समस्त समुद्र भी एकादशीको जागरणस्थानपर जाते हैं। जो मनुष्य श्रीकृष्णप्रीतिके लिये होनेवाले जागरणके समय वीणा आदि बाजोंसे हर्षमें भरकर नृत्य करते और पद गाते हैं, वे देवताओंके लिये भी आदरणीय होते हैं। इस प्रकार जागरण करके श्रीमहाविष्णुकी पूजा करे और द्वादशीको अपनी शक्तिके अनुसार कुछ वैष्णव पुरुषोंको निमन्त्रित करके उनके साथ बैठकर पारण करे।
द्वादशीको सदा पवित्र और मोक्षदायिनी समझना चाहिये। उस दिन प्रातःस्नान करके श्रीहरिकी पूजा करे और उन्हें निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर अपना व्रत समर्पण करे—
अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव ।
प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥
(३९।८१-८२)
'केशव ! मैं अज्ञानरूपी रतौंधीसे अंधा हो रहा हूँ, आप इस व्रतसे प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।'
इसके बाद यथासम्भव पारण करना चाहिये। पारण समाप्त होनेपर इच्छानुसार विहित कर्मोंका अनुष्ठान करे। नारद ! यदि दिनमें पारणके समय थोड़ी भी द्वादशी न हो तो मुक्तिकामी पुरुषको रातको ही [पिछले पहरमें] पारण कर लेना चाहिये। ऐसे समयमें रात्रिको भोजन करनेका दोष नहीं लगता। रात्रिके पहले और पिछले पहरमें दिनकी भाँति कर्म करने चाहिये। यदि पारणके दिन बहुत थोड़ी द्वादशी हो तो उषाःकालमें ही प्रातःकाल तथा मध्याह्नकालकी भी संध्या कर लेनी चाहिये। इस पृथ्वीपर जिस मनुष्यने द्वादशी-व्रतको सिद्ध कर लिया है, उसका पुण्य-फल बतलानेमें मैं भी समर्थ नहीं हूँ। एकादशी देवी सब पुण्योंसे अधिक है तथा यह सर्वदा मोक्ष देनेवाली है। यह द्वादशी नामक व्रत महान् पुण्यदायक है। जो इसका साधन कर लेते हैं, वे महापुरुष समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं। अम्बरीष आदि सभी भक्त, जो इस भूमण्डलमें विख्यात हैं, द्वादशी-व्रतका साधन करके ही विष्णुधामको प्राप्त हुए हैं। यह माहात्म्य, जो मैंने तुम्हें बताया है, सत्य है ! सत्य है !! सत्य है !!! श्रीविष्णुके समान कोई देवता नहीं है और द्वादशीके समान कोई तिथि नहीं है। इस तिथिको जो कुछ दान किया जाता, भोगा जाता तथा पूजन आदि किया जाता है, वह सब भगवान् माधवके पूजित होनेपर पूर्णताको प्राप्त होता है। अधिक क्या कहा जाय, भक्तवल्लभ श्रीहरि द्वादशी-व्रत करनेवाले पुरुषोंकी कामना कल्पान्ततक पूर्ण करते रहते हैं। द्वादशीको किया हुआ सारा दान सफल होता है।
<div align="center">═══ ★ ═══</div>उत्तराखण्ड ] * एकादशीके जया आदि भेद, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन * ६४३
एकादशीके जया आदि भेद, नक्तव्रतका स्वरूप, एकादशीकी विधि, उत्पत्ति-कथा और महिमाका वर्णन
नारदजीने पूछा— महादेव ! महाद्वादशीका उत्तम व्रत कैसा होता है। सर्वेश्वर प्रभो ! उसके व्रतसे जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।
महादेवजीने कहा— ब्रह्मन् ! यह एकादशी महान् पुण्यफलको देनेवाली है। श्रेष्ठ मुनियोंको भी इसका अनुष्ठान करना चाहिये। विशेष-विशेष नक्षत्रोंका योग होनेपर यह तिथि जया, विजया, जयन्ती तथा पापनाशिनी—इन चार नामोंसे विख्यात होती है। ये सभी पापोंका नाश करनेवाली हैं। इनका व्रत अवश्य करना चाहिये। जब शुक्लपक्षकी एकादशीको 'पुनर्वसु' नक्षत्र हो तो वह उत्तम तिथि 'जया' कहलाती है। उसका व्रत करके मनुष्य निश्चय ही पापसे मुक्त हो जाता है। जब शुक्लपक्षकी द्वादशीको 'श्रवण' नक्षत्र हो तो वह उत्तम तिथि 'विजया' के नामसे विख्यात होती है; इसमें किया हुआ दान और ब्राह्मण-भोजन सहस्रगुना फल देनेवाला है तथा होम और उपवास तो सहस्रगुनेसे भी अधिक फल देता है। जब शुक्लपक्षकी द्वादशीको 'रोहिणी' नक्षत्र हो तो वह तिथि 'जयन्ती' कहलाती है; वह सब पापोंको हरनेवाली है। उस तिथिको पूजित होनेपर भगवान् गोविन्द निश्चय ही मनुष्यके सब पापोंको धो डालते हैं। जब कभी शुक्ल-पक्षकी द्वादशीको 'पुष्य' नक्षत्र हो तो वह महापुण्यमयी 'पापनाशिनी' तिथि कहलाती है। जो एक वर्षतक प्रति-दिन एक प्रस्थ तिल दान करता है तथा जो केवल 'पापनाशिनी' एकादशीको उपवास करता है, उन दोनोंका पुण्य समान होता है। उस तिथिको पूजित होनेपर संसारके स्वामी सर्वेश्वर श्रीहरि संतुष्ट होते हैं तथा प्रत्यक्ष दर्शन भी देते हैं। उस दिन प्रत्येक पुण्यकर्मका अनन्त फल माना गया है। सगरनन्दन ककुत्स्थ, नहुष तथा राजा गाधिने उस तिथिको भगवान्की आराधना की थी, जिससे भगवान्ने इस पृथ्वीपर उन्हें सब कुछ दिया था। इस तिथिके सेवनसे मनुष्य सात जन्मोंके कायिक, वाचिक और मानसिक पापसे मुक्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। पुष्य नक्षत्रसे युक्त एकमात्र पापनाशिनी एकादशीका व्रत करके मनुष्य एक हजार एकादशियोंके व्रतका फल प्राप्त कर लेता है। उस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजा आदि जो कुछ भी किया जाता है, उसका अक्षय फल माना गया है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक इसका व्रत करना चाहिये। जिस समय धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर पञ्चम अश्वमेध यज्ञका स्नान कर चुके, उस समय उन्होंने यदुवंशावतंस भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रश्न किया।
युधिष्ठिर बोले— प्रभो ! नक्तव्रत तथा एकभुक्त व्रतका पुण्य एवं फल क्या है ? जनार्दन ! यह सब मुझे बताइये।
श्रीभगवान्ने कहा— कुन्तीनन्दन ! हेमन्त ऋतुमें जब परम कल्याणमय मार्गशीर्ष मास आये, तब उसके कृष्णपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास (व्रत) करना चाहिये। उसकी विधि इस प्रकार है—दृढ़तापूर्वक उत्तम