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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

३१० पद्मावत । आय नाभि पर सांग जो बैठी । नाभवेध निकसी नृपं पीठी ॥ चला मारि तब राजा मारा । टूट कंध धड़ भयो निरारां ॥ शीशँ काटिकेँ पैरीँ बाँधा । पावा दाउँ वैर जसै साँधा ॥ जियत फिरा आयो बल भरा । माँझवाट होय लोहेँ धरा ॥ कारी घाउ जाय नहिं डोला । रही जीभ यमँ गहेको बोला ॥ दो० सुधिबुधि तो सब बिसरी, बारपरी मँझू पाट । हस्तिँ घोर को काकर, घर आनी गइ खाट ॥ खण्ड बियालीसवाँ वैकुण्ठवासी राजा ॥ तौलहि श्वास पेट महँ अही । जौलहि दशा जीउकी रही ॥ काल आय देखलाई साँटी । उठ जियचला छांड़के माटी ॥ काकर लोग कुटुंब घर बारू । काकर अर्थ द्रव्यँ संसारू ॥ वही घड़ी सब भयो परावा । आपन सोइ जो परसा खावा ॥ रहि जे हितू साथके नेगी । सबैलानि काढन तेहिबेगी ॥ हाथझार जस चलै जुवारी । तजौं राज द्वै चला भिखारी ॥ जबलग जीउ रतन सब कहा । भा बिनजीव न कौड़ी लहा ॥ दो० गढ़सौंपा तेहि बादलँ, गये टेकँतँ वसुदेव । छोड़ी राम अयोध्या, जो भावै सो लेव ॥ पद्मावत पुनि पहिर पटोरोँ । चलीसाथ पियके द्वै जोरा ॥ सूरज छिपा रयँनि द्वै गई । पूनोशशि सो अमावस भई ॥ छोरे केशँ मोतिलर छूटी । जानो रयनि नखत सब टूटी ॥ राजा १ अलग २ शिर ३ शिकारबन्द ४ जैसा वैर किया ५ राह में ६ हथियारबन्द ७ मौतने पकड़ी ८ सुरदा की तरह तख्तपर ६ हाथी १० जुड़ी ११ दौलत १२ दोस्त १३ जल्द निकाला १४ छोड़ना १५ नाम मन्त्री १६ वैकुंठ गये १७ सारीरेशमी १८ रात १६ पूरनमासी का चांद २० बाल २१ ॥

पद्मावत । ३११ सेंदुरपरा जो शीशे उघारी । आग लाग चहि जगै अँधियारी ॥ यहादिवसै हौं चाहत नाहीं । चलो साथ पियदै गलबाहं ॥ सारसपंख नहिं जिये निरोरे । हौं तुम बिन का जियों पियारे ॥ न्योछावर कै तन छहाराँऊँ । छारँ होऊँ सँग बहुरें न आऊँ ॥ दो० दीपक प्रीति पतंगज्यों, जन्मनिबाह करेउँ । न्योछावर चहुँपास है, कण्ठलाग जियदेउँ ॥ खण्ड सैंतालीसवां सतीहोना पद्मावत और नागमतीका ॥ नागमती पद्मावत रानी । दोउ महासत सती बखानी ॥ दोउं सौत चढ़ खाट जो बैठी । औ शिवलोक परातहँदीठी ॥ बैठो कोइ राज औ पाटों । अन्तै सबै बैठे पुनि खाटा ॥ चन्दन अगर काढ़सरै साजा । औ गँतें देय चले लैराजा ॥ वाजन बाजहिं होय अगोतौं । दोउ कन्तलै चाहे सोता ॥ एक जो बाजा भयो विवाहू । अब दुसरे है और निबाहू ॥ जियतजलैं जो कन्तै कीआंसा । मुये रहस बैठे इकपासा ॥ दो० आज सूरै दिन अथयो, आजरैनि शशि बूड । आजनाच जियदीजिये, आज आगिन हमजूड़ ॥ सैं रच दान पुण्यबहु कीन्हा । सातबार फिरसांवर लीन्हा ॥ एक जो भांवर भयो बियाही । अब दूसर है गोहनैं जाही ॥ जियत कन्तै तुम हमगललाई । मुये कण्ठ नहिं छांडुहुसाई ॥ १ शिर २ दुनियां ३ दिन ३ खाविन्द ४ अलग ५ बिथराना ६ राख ७ लौट ८ पद्मावत-नागमती ९ नज़र १० तख़्त ११ आख़िर १२ चिता १३ दाह १४ लड़का १५ ख़ाविन्द १६ सूर्य १७ रात १८ चांद १६ चिता २० साथ २१ खाविन्द २२ ॥

३१२ पद्मावत। लै सरै ऊपर खाट बिछाई। पौढ़ी दोउ कन्त गल लाई ॥ और जो गांठ कन्त तुम जोरी। आदि अन्त लहि जायन छोरी ॥ यह जग काह जो अर्थहि नयाथी। हमतुम नाहिं दोहूजग साथी॥ लागी कठ आग दै होरी। छार भई जरि अंग न मोरी ॥ दो० राँती पियके नेहकी, स्वर्ग भयो रतनार । जोरेउ वासो अथवा, रहा न कोइ संसार ॥ वै सहगवनैं भई जिय आई। बादशाह गढ़ छेंका आई ॥ तबलग सो औसर है बीता। भये अलोप राम औ सीता ॥ आय शाह जो सुना अखारों। है गइसत दिवसै उजियारा ॥ छोर उठाय लीन्ह इक मूठी। दीन्ह उड़ाय पिरेथैवी झूठी ॥ सगरे कटकै उठाई माटी। पुल बांधा जहँ जहँ गढ़घाटी ॥ जौलहि ऊपर छोर नहिं परै। तौलहि यह तृष्णा नहिं मरै ॥ भा दूर्हवाँ भा जूझ असूझा। बादलैं आय पँवरे पर जूझा ॥ दो० जूनहरे भईं सब स्त्री, पुरुष भये संग्राम। बादशाह गढ़ चूरौं, चितौर भा इसलाम ॥ मैं यह अर्थ पण्डितन बूझा। कहा कि हम कुछ और न सूझा ॥ चौदह भुवनैं जो छत उपराहीं। सो सब मानुष के घट माहीं ॥ तन चितौर मन राजा कीन्हा। हियँ सिंहल बुधि पद्मिनि चीन्हा ॥ गुरु सुवा जेहि पन्थ देखावा। बिन गुरु जगत सोनिरगुण पावा॥ . चिता १ अव्वल से आखिर तक २ आया था ३ खाविन्द ४ राख ५ बदन ६ लाल ७-६ आसमान ८ जब खाविन्द के साथ जल गई १० गायब ११ हाल १२ दिन १३ ख़ाक १४ दुनियां १५ फ़ौज १६ माटी १७ हवस १८ कोई बाकी न रहा उस भारी लड़ाई में १६ नाम मंत्री २० दरवाज़ा २१ मरना २२ तथा राजा २३ तोड़ा २४ सात परदा आसमान, सात परदा ज़मीन २५ भीतर २६ छाती २७ राह २८ दुनियां २६ ॥

˙पद्मावत˙ 14653 ३१३ नागमती यह दुनियां धन्धा । बांचा सोई न यह चित बन्धा ॥ राघव दूत सोई शैतानू । माया अलाउदीं सुलतानू ॥ प्रेम कंथा यह भांति विचारू । बूझलेहु जो बूझेंहि पारू ॥ दो० तुरकी अरबी हिन्दवी, भाषाँ जेती आहि । जामें मारग प्रेमका, सबै सराहें ताहि ॥ मुहम्मद कवि यह जोर सुनावा । सुना सो प्रेम पीर का पावा ॥ जोरे लायै रक्त लेगये । प्रेमप्रीति नयनहिं जल भये ॥ औ मैं जान गीत अस कीन्हा । कीय हरीति जगत मँह चीन्हा ॥ कहां सो रतनसेन अब राजा । कहां सुवा अस बुधै उपराजा ॥ कहां अलाउदीन सुलतानू । कहँ राघव जेहि कीन्ह बखानू ॥ कहँ स्वरूप पद्मावत रानी । कुछ न रही जग रही कहानी ॥ धनसोई यशँ कीरति तासू । फूल मरै पै मरै न बासू ॥ दो० कैन जगत यशँ बेचा, कैन लीन यशँ मोल । जो यह पढ़ै कहानी, हम सँवरै दोइ बोलें ॥ मुहम्मद वृद्धैं बैश जो भई । यौवनैं हत सो अवस्थौ गई ॥ बल जो गयो कैक्षीऐं शरीरू । दृष्टि १६ गई नयनहिं दै नीरू ॥ दर्शनै गये कै बचा कपोलौँ । बैनैं गये अनरुच दैबोला ॥ बुधि २१ जोगई दै हियैँ बौराई । गर्व २२ गयो तरिहत शिरनाई ॥ श्रवणैं गये ऊँच जो सुना । स्याही गये शीशँ भा धुना ॥ भँवर गये केशँहि दे भुवा । यौवनैं गयो जीत लै जुवा ॥ बूझसको १ बोली २ खून जिगर पीकर ३ दुनियां में निशानी ४ अक्ल बताई ५ तारीफ ६ नेकनामी ७-६-१० करनी ८ दुआयखैर ११ बूढ़ी उमर १२ जवानी १३-२७ उमर १४ दुबला बदन १५ निगाह १६ पानी १७ दांत १८ गाल १६ आवाज़ २० अक्ल २१ दिल २२ ग़रूर २३ कान २४ शिर २५ बाल २६ ॥

३१४ पद्मावत । जोलहि जीवन यौवन साथा । पुनि सो मीचें पराये हाथा ॥ दो० वृद्धि२ जो शीशँ डुलावै, शीशधुनहि तेहि रीसैं । बूढ़ी आयू होहु तुम; कै यह दीन अशीस ॥ मौत १ बूढ़ा २ शिर ३ गुस्सा ४ उमर ५ ॥ इति श्रीपद्मावतभाषा मलिकमुहम्मदजायसीकृत समाप्त ॥

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निम्नलिखित नवलकिशोर प्रेस की पुस्तकें अवश्य देखियेः—


नाम किताब की० | नाम किताब की०

अचम्भे का बच्चा .... -) | बैतालपचीसी .... I)॥ अलीबाबा और चा- | बैतालपचीसी पद्य .... I)I लीस चोर .... =) | मनोहर कहानी .... =)॥ कथा सरित्सागर भाषा ३) | मर्द औरत का किस्सा =) किस्सा सारंगा सदाबृक्ष -)॥ | मसनवी मीर हसन =)॥ घराज घटना .... I) | राजाभोज का स्वप्न -) चहार दरवेश .... II) | लतीफ़ा बीरबल .... )III दास्तान अमीरहमज़ा २॥I) | विचित्र चरित्र .... २॥I) दिल्लगी का ख़ज़ाना -) | शकुन्तला उपाख्यान -)॥ तोता मैना आठोंभाग I॥-) | शाहनामा .... II)॥ दिल्लगी का पिटारा.... -)III | शुकबहत्तरी .... .... =) फ़साना अजायब .... I)॥ | सहस्ररजनीचरित्र .... ३॥I) बकावलीसुमन .... =) | साढ़ेतीन यार का बचनतरंगिणी .... =) | अपूर्व किस्सा .... I) विक्रमविलास .... -)॥ | सिंहासन बत्तीसी .... I)॥ विरहवारीश माधवा- | सूरजपुर की कहानी =) नल कामकंदला | हंसजवाहिर भाषा .... II)॥ चरित्र .... .... I=) | हातिमताई का किस्सा II)

मिलने का पताः — मुंशी विष्णुनारायण भार्गव, मालिक नवलकिशोर प्रेस, लखनऊ.

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