पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
भाषाटीकासमेतम् । (३९१)
शस्त्रसे मारेहुए भी शत्रु नहीं मरते बुद्धिसे मारे हुए शत्रु अच्छीतरह मरते है, शस्त्र पुरुषके एकही शरीरको मारताहै, बुद्धि कुल, ऐश्वर्य और यशका नाश करती है ॥ २९६ ॥ तदेवं प्रज्ञापुरुषकाराभ्यां युक्तस्य अयत्नेन कार्य्यसिद्धयः सम्भवन्ति । सो बुद्धि और पराक्रमसे युक्त पुरुषकी बिनाही यत्नके कार्य्यसिद्धि होतीहै- प्रसरति मतिः कार्य्यारम्भे दृढीभवति स्मृतिः स्वयमुपनयन्नर्थान्मन्त्रो न गच्छति विप्लवम् । स्फुरति सफलस्तर्कश्चित्तं समुन्नतिमश्नुते भवति च रतिः श्लाघ्ये कृत्ये नरस्य भविष्यतः ॥२९७॥ शुभ होनेवाले मनुष्यके कार्य प्रारम्भ करनेको बुद्धि दृढ होती है और स्वयं कृत्य वस्तुओंको प्रगट करता हुआ मन्त्र विपरीतताको प्राप्त नहीं होता, विचार सफल होता स्फुरायमान होता है, चित्त उत्साहको प्राप्त होता है और प्रशंसनीयकार्यमें अनुराग होता है ॥ २९७ ॥ तथाच- और देखो- नयत्यागशौर्य्यसम्पन्ने पुरुषे राज्यमिति । उक्तञ्च- नय, त्याग और शूरता सम्पन्न पुरुषमेही राज्य होता है । कहा है- त्यागिनि शूरे विदुषि च संसर्गरुचिर्जनो गुणी भवति । गुणवति धनं धनाच्छ्रीः श्रीमत्याज्ञा ततो राज्यम्॥२९८॥ त्याग युक्त शूर और पंडितजनकी संगतिमें रुचि करनेवाला पुरुष गुणी होता है । गुणवालेमें धन, धनसे लक्ष्मी, लक्ष्मीवालेमें आज्ञा, आज्ञावाले जनमे राज्य स्थित रहता है (आर्या वृत्त ) ॥ २९८ ॥" मेघवर्ण आह,-"नूनं सद्यःफलानि नीतिशास्त्राणि यत् त्वया अनुकृत्येन अनुप्रविश्य अरिमर्दनः सपरिजनों निःशे- षितः" । स्थिरजीवी आह,- मेघवर्ण बोला,-"शत्रुको अवश्यही नीतिशास्त्र शीघ्रफलवाले हैं, जिनके मत- वर्त्ती तुमने उनके अन्तरमे प्रवेश कर परिवारसहित अरिमर्दनको निःशेष करदिया” स्थिरजीवी बोला-
( ३९२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३९२ ) पञ्चतन्त्रम् । “तीक्ष्णोपायप्राप्तिगम्योऽपि योऽर्थ- स्तस्याप्यादौ संश्रयः साधुयुक्तः । उत्तुङ्गाग्रः सारभूतो वनानां मान्याभ्यर्च्यश्छिद्यते पादपेन्द्रः ॥ २५९ ॥ “जो वस्तु तीक्ष्ण उपायसे प्राप्ति होनेके योग्य है उसके पहलेभी श्रेष्ठता युक्त संश्रय करना चाहिये, अति उन्नत अग्रभागवाला वनोंमें श्रेष्ठ वृक्ष सत्कारसे पूजित हुआ छेदित होताहै (वनस्पति छेदनमें पहले उसका सम्मान होताहै इसी प्रकार पहले शत्रुसे सान्त्वना पीछे उसमें प्रवेश करे यह भावहै) ॥ २५९ ॥ अथवा स्वामिन् ! किं तेन अभिहितेन यत् अनन्तरकाले क्रियारहितमसुखसाध्यं वा भवति । साधु चेदमुच्यते । अथवा स्वामिन् उस कथनसे क्या है जो समयके अनन्तर क्रियारहित वा असुख साध्य होजावे । यह अच्छा कहाहै- अनिश्चितैर्व्यवसायभीरुभिः पदे पदे दोषशतानुदर्शिभिः । फलैर्बिसंवादमुपागता गिरः प्रयान्ति लोके परिहासवस्तुताम् ॥ २६० ॥ अनिश्चित उद्योगसे डरे हुए तथा पदपदमें सैकडो दोषके दिखानेवाले फलोंसे विपरीतताको प्राप्त हुई वाणी लोकमें परिहासके स्थानको प्राप्त होतीहै (विफल वागाडम्बरसे केवल अपनी लघुता प्रकाश होती है वंशस्थ वृत्त) ॥ २६० ॥ न च लघुषु अपि कर्त्तव्येषु धीमद्भिः अनादरः कार्य्यः। यतः- लघुकर्त्तव्यमें भी बुद्धिमान्को अनादर करना न चाहिये । जिससे- शक्ष्यामि कर्तुमिदमल्पमयत्नसाध्य- मत्रादरः क इति कृत्यमुपेक्षमाणाः । केचित्प्रमत्तमनसः परितापदुःख- मापत्प्रसंगसुलभं पुरुषाः प्रयान्ति ॥ २६१ ॥ मैं इसके करनेको समर्थ हूं, यह अल्प और बिना यत्नके ही साध्य है, इस कार्यमें यत्न करना क्या इस प्रकार कार्यकी उपेक्षा करनेवाले प्रमत्तचित्त पुरुष आपत्तिके आगममें सुलभ परितापरूपी दुःखको प्राप्त होते हैं ॥ २६१ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (३९३) तदद्य जितारेः मद्विभोः यथापूर्व्वं निद्रालाभो भविष्यति। उच्यते चैतत्- सो आज शत्रुको जीतनेवाले मेरे प्रभुको पूर्वकी समान निद्राकी प्राप्ति होगी । कहा है कि- निःसर्पे बद्धसर्पे वा भवने सुप्यते सुखम् । सदा दृष्टभुजंगे तु निद्रा दुःखेन लभ्यते ॥ २६२ ॥ सर्पहीन वा सर्पके पकडे जानेपर घरमें निश्शंक सोया जाता है जहा सदा सर्प दीखे वहा दुःखसे निद्रा प्राप्त होती है ॥ २६२ ॥ तथाच- और देखो- विस्तीर्णव्यवसायसाध्यमहतां स्निग्धोपभुक्ताशिषां कार्याणां नयसाहसोन्नतिमर्तामिच्छापदारोहिणाम् । मानोत्सेकपराक्रमव्यसनिनां पारं न यावद्गताः सामर्षे हृदयेऽवकाशविषया तावत्कथं निर्वृतिः ॥ २६३ ॥ बडे मानसे उन्नत पराक्रममें आसक्त मनुष्य जबतक बडे उद्योगसे साध्य महान् स्निग्धोंके आशीर्वाद युक्त वधुओंसे चिन्तित नीति साहस उन्नतिवाले अभीष्ट पदपर आरोहण करनेवाले कार्योंको करनेवाले जबतक अभिलषित कार्यके पार नहीं गये हैं तबतक क्रोधवाले हृदयमें सुख किस प्रकार ठहर सक्ताहै २६३ तदवसितकार्य्यारम्भस्य विश्राम्यतीव मे हृदयम् । तदि- दमधुना निहतकण्टकं राज्यं प्रजापालनतत्परो भूत्वा पुत्रपौ- त्रादिक्रमेण अचलच्छत्रासनश्रीः चिरं भुङ्क्ष्व, अपि च,- सो आरभ किये कार्यको पूराकिया जिसने ऐसे मेरा हृदय विश्रामको प्राप्त होताहै सो यह अब निष्कंटक प्रजापालनमें तत्पर होकर पुत्र पौत्रादिके क्रमसे अचल छत्र आसन लक्ष्मी चिरकाल तक भोगो । ओरभी- प्रजा न रञ्जयेद्यस्तु राजा रक्षादिभिर्गुणैः । अजागलस्तनस्येव तस्य राज्यं निरर्थकम् ॥ २६४ ॥ जो राजा रक्षा आदि गुणोंसे प्रजाको प्रसन्न नहीं करता हे बकरीके गलेके स्तनकी समान उसका राज्य निरर्थक है ॥ २६४॥
( ३९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३९४ ) पञ्चतन्त्रम् । गुणेषु रागो व्यसनेष्वनादरो रतिः सुभृत्येषु च यस्य भूपतेः । चिरं स भुङ्क्ते चलचामरांशुकं सितातपत्राभरणां नृपश्रियम् ॥ २६५ ॥ गुणोंमें प्रीति व्यसनोंमें अनादर सुभृत्योंमें प्रीति जिस राजाकी होती है वह चलायमान चंवरही अंशुक ( वस्त्र ) जिसके श्वेत छत्रही जिसका आभरण ऐसी राज्यलक्ष्मीको चिरकालतक भोगता है ॥ २६५ ॥ न च त्वया प्राप्तराज्योऽहमिति मत्वा श्रीमदेन आत्मा व्यंसयितव्यः, यत् कारणं चला हि राज्ञो विभूतयः । वंशा- रोहणवत् राज्यलक्ष्मीः दुरारोहा, क्षणविनिपातरता, प्रय- त्नशतैरपि धार्य्यमाणा दुर्धरा, प्रशस्ताराधितापि अन्ते विप्रलम्भिनी, वानरजातिरिव विद्रुतानेकचित्ता, पद्मपत्रो- दकमिवाघटितसंश्लेषा, पवनगतिरिव अतिचपला, अना- र्य्यसङ्गतमिव अस्थिरा, आशीविष इव दुरुपचारा, सन्ध्या- भ्रलेखेव मुहूर्त्तरागा, जलबुद्बुदावलीव स्वभावभंगुरा, शीरप्रकृतिरिव कृतघ्ना, स्वप्नलब्धद्रव्यराशिरिव क्षणदृष्टन- ष्टा । अपिच- और तुम कहो कि मुझे राज्य मिलगया है ऐसा मानकर लक्ष्मीके मदसे आत्माको प्रतारण नहीं करना चाहिये । जिस कारणसे कि राजोंके ऐश्वर्य्य चलायमान होते हैं । बांसके चढ़नेकी समान राज्य लक्ष्मीकी प्राप्ति कठिन है । क्षणमात्रमें विनाश होनेवाली, सैकड़ों प्रयत्नोंसे धारण करनेपरभी दुर्धर, भली प्रकार आराधित होनेपरभी अन्तमें वंचना करनेवाली, बानर जातिकी समान चपल अनेक चित्तवाली, कमलपत्रमें जलकी समान अत्यन्त सम्बन्धसे रहित, पवन गतिकी समान अति चपल, असाधु संगतिकी समान अस्थिर, सर्प विषकी समान दुश्चिकित्स्य, संध्याके मेघकी समान मुहूर्त्तमात्रको अनुरागवाली, जलके बुलबुलोंके समूहकी समान स्वभावसे भंग होनेवाली, हलके अग्रभागकी समान कृतघ्न, स्वप्नमें प्राप्त हुए द्रव्यसमूहकी समान देखनेपर क्षणमात्रमें नष्ट होनेवा- ली ऐसी राजलक्ष्मी है । औरभी-
भाषाटीकासमेतम् । ( ३९५ ) यदैव राज्ये क्रियतेऽभिषेकस्तदैव बुद्धिव्यसनेषु योज्या । घटा हि राज्ञामभिषेककाले सहाम्भसेवापद्मुद्धिरन्ति २६६ जिस समय राज्यमें अभिषेक किया उसी समयसे राजाने विपत्तिके विषयमें बुद्धीको लगा देना चाहिये, राजोंके अभिषेकसमयमें घट जलोके साथही आप- त्तिक्रो निकालते हैं ॥ २६६ ॥ न च कश्चित् अनधिगमनीयो नाम अस्ति आपदा्रुक्तञ्च- आपत्तियोंको कोईभी अगम्य नहीं है, कहा है कि- रामस्य व्रजनं बलेर्नियमनं पाण्डोः सुतानां वनं वृष्णीनां निधनं नलस्य नृपते राज्यात्परिभ्रंशनम् । नाट्याचार्य्यकमर्जुनस्य पतनं सञ्चिन्त्य लङ्केश्वरे सर्वे कालवशाज्जनोऽत्र सहते कः कं परित्रायते ॥२६७॥ रामचन्द्रको वनगमन, बलिको वधन, पाण्डुपुत्रोंको वनवास, यदुवंशियोंका निधन, राजा नलका राज्यसे भ्रष्ट होना, अर्जुनका ( विराट भवनमें ) नाट्या- चार्य होना, ( त्रिभुवन विजयी ) रावणका नाश विचार कर यह जन कालवशसे सब कुछ सहते हैं, कौन किसकी रक्षा करता है ( अर्थात् कोई नहीं शार्दूल विक्रीडितवृत्त ) ॥ २६७ ॥ क्व स दशरथः स्वर्गे भूत्वा महेन्द्रसुहृद्गतः क्व स जलनिधेर्वेलां वध्वा नृपः सगरस्तथा । क्व स करतलाज्जातो वैन्यः क्व सूर्य्यतनुर्मनु- र्ननु बलवता कालेनैते प्रबोध्य निमीलिताः ॥ २६८ ॥ जो इन्द्रके सुहृद् होकर स्वर्गमे गये वह दशरथ कहा हैं, समुद्रकी वेलाके नियन्ता राजा सगर कहा हैं, वेनराजाके हाथके मथनसे उत्पन्न हुआ (देखो श्री मद्भागवत पर हमारा तिलक ) पृथुराजा कहा है, सूर्य्यका पुत्र मनु कहा है, भो ! कालने यह सब बली प्रगट कर नष्ट करादिये ॥ २६८ ॥ मान्धाता क्व गतस्त्रिलोकविजयी राजा क्व सत्यव्रतो देवानां नृपतिर्गतः क्व नहुषः सच्छास्त्रवान् केशवः । मन्यन्ते सरथाः सकुञ्जरवराः शक्रासनाध्यासिनः कालेनैव महात्मना त्वनुकृताः कालेन निर्वासिताः २६९
( ३९६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३९६ ) पञ्चतन्त्रम् । त्रिलोकका जीतनेवाला मान्धाता कहां गया ?, सत्यव्रत राजा कहां है ?, देवताओंका राजा नहुष कहां गया ?, सत् शास्त्रवान् भगवान् केशव कहां है ?, यह महात्मा जो इन्द्रके सहित एक आसनमें बैठनेवाले माने जाते थे, कालने इनको उत्पन्न किया और विध्वंस भी कर दिया ॥ २६९ ॥ अपि च- औरभी- स च नृपतिस्ते सचिवास्ताः प्रमदास्तानि काननवनानि । स च ते च ताश्च तानि च कृन्तान्तदृष्टानि नष्टानि ॥२७०॥ वह राजा, वह मंत्री, वे स्त्री, वे उपवन, वे ( राजा ) वह ( मंत्री ) वे सब कालने देखकर खाय नष्ट कर दिये ॥ २७० ॥ एवं मत्तकरिकर्णचञ्चलां राज्यलक्ष्मीमवाप्य न्यायैक- निष्ठो भूत्वा उपभुङ्क्ष्व- इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रके काकोलूकीयं नाम तृतीयं तन्त्रं समाप्तम् । इस प्रकार मतवाले हाथीके कानकी समान चंचल राज्य लक्ष्मीको प्राप्त हो न्यायकी निष्ठावान होकर भोगकरो । इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतंत्रके पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां काकोलूकीयं नामतृतीयं तन्त्रं सम्पूर्णम् ।
अथ लब्धप्रणाशंनाम चतुर्थं तन्त्रम् ।
अथ लब्धप्रणाशंनाम चतुर्थं तन्त्रम् । अथ इदमारभ्यते लब्धप्रणाशं नाम चतुर्थं तन्त्रं यस्य अयमादिमः श्लोकः- अब यह लब्धप्रणाशनाम ( प्राप्त होकर नष्ट होजाना ) चौथे तन्त्रको आरभ किया जाता है जिसके आदिके यह श्लोकहै- समुत्पन्नेषु कार्येषु बुद्धिर्यस्य न हीयते । स एव दुर्गं तरति जलस्थो वानरो यथा ॥ १ ॥ कार्यके उत्पन्न होनेमे जिसकी बुद्धि क्षय नहीं होती है वह कठिन कार्यको इस प्रकार तरजाताहै जैसे जलमें स्थित वानर ॥ १ ॥ तद्यथा अनुश्रूयते- सो यह सुना गयाहै कि- कथा १. अस्ति कस्मिंश्चित् समुद्रोपकण्ठे महान् जम्बूपादपः सदाफलः, तत्र च रक्तमुखो नाम वानरः प्रतिवसति स्म । तत्र च तस्य तरोरधः कदाचित् करालमुखो नाम मकरः समुद्रसलिलात् निष्क्रम्य सुकोमलवालुकासनाथे तीरोपान्ते न्यविशत् । ततश्च रक्तमुखेन स प्रोक्तः-“भो ! भवान् सम- भ्यागतोऽतिथिः । तद्भक्षयतु मया दत्तानि अमृततुल्यानि जम्बूफलानि । उक्तञ्च- किसी सागरके किनारे जामुनका वृक्ष सदा फलवालाहै, वहा रक्तमुखनामवाला वानर रहताथा । सो उस वृक्षके नीचे एक समय करालमुखनामवाला नाका समुद्रके जलसे निकलकर सुकोमल रेतसे युक्त उसके तटमें प्राप्त हुआ । तब रक्तमुखने कहा-“भो ! आप आये हुए हमारे अतिथियो । सो खाओ हमारे दिये हुए अमृतकी समान जम्बूफल । कहा है- प्रियो वा यदि वा द्वेष्यो मूर्खो वा यदि पण्डितः । वैश्वदेवान्तमापन्नः सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ २ ॥
( ३९८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३९८ ) पञ्चतन्त्रम् । प्रिय वा द्वेषी मूर्ख वा पंडित जो वैश्वदेव वलिके समय प्राप्त हो वह स्वर्ग- गमनमें सेतुभूत अतिथि होताहै ॥ २ ॥ न पृच्छेच्चरणं गोत्रं न च विद्यां कुलं न च । अतिथिं वैश्वदेवान्ते श्राद्धे च मनुरब्रवीत् ॥ ३ ॥ वैश्वदेवके अन्तमें श्राद्धमें उपस्थित अतिथिका घर गोत्र विद्या कुल न पूछे, यह मनुने कहाहै ॥ ३ ॥ दूरमार्गश्रमश्रान्तं वैश्वदेवान्तमागतम् । अतिथिं पूजयेद्यस्तु स याति परमां गतिम् ॥ ४ ॥ दूर मार्गके श्रमसे प्राप्तहुए वैश्वदेवके अन्तमें आयेहुए अतिथिका जो पूजन करताहै, वह परम गतिको प्राप्त होताहै ४ ॥ अपूजितोऽतिथिर्यस्य गृहाद्याति विनिश्वसन् । गच्छन्ति विमुखास्तस्य पितृभिः सह देवताः ॥ ५ ॥ जिसके घरसे अपूजित अतिथि श्वास लेता हुआ जाताहै, उसके यहांसे देवता पितरों सहित विमुख होकर चल जाते हैं ॥ ५ ॥ एवमुक्त्वा तस्मै जम्बूफलानि ददौ । सोऽपि तानि भक्ष- यित्वा तेन सह चिरं गोष्ठीसुखमनुभूय भूयोऽपि स्वभवनम- गात् । एवं नित्यमेव तौ वानरमकरौ जम्बूच्छायास्थितौ विविधशास्त्रगोष्ठ्या कालं नयन्तौ सुखेन तिष्ठतः । सोऽपि मकरो भक्षितशेषाणि जम्बूफलानि गृहं गत्वा स्वपत्न्यैः प्रयच्छति । अथ अन्यतमे दिवसे तया स पृष्टः-“नाथ ! क्व एवंविधानि अमृतफलानि प्राप्नोषि?”। स आह-“भद्रे ! मम अस्ति परमसुहृद् रक्तमुखो नाम वानरः स प्रीतिपूर्वमिमानि फलानि प्रयच्छति” । अथ तया अभिहितम्-“यः सदा एव अमृतप्रायाणि ईदृशानि फलानि भक्षयति तस्य हृदय- ममृतमयं भविष्यति । तत् यदि मया भार्य्यया ते प्रयोजनं, ततः तस्य हृदयं मह्यं प्रयच्छ, येन तद्भक्षयित्वा जरामरणर- हिता त्वया सह भोगान् भुनज्मि” । स आह-“भद्रे ! मा मा एवं वद । यतः स प्रतिपन्नोऽस्माकं भ्राता, अपरं फल-
भाषाटीकासमेतम् । (३९९) दाता, ततो व्यापादयितुं न शक्यते । तत् त्यज एनं मिथ्याग्रहम् । उक्तञ्च- ऐसा कह उसके निमित्त जम्बूफल दिये । वह भी उनको भक्षणकर उसके साथ चिरकाल गोष्ठीसुखका अनुभवकर फिर अपने घरको गया । इस प्रकार नित्यही वह वानर और नाका जामनकी छायामें स्थित हुए विविध शास्त्रकी गोष्ठीसे समय बिताते सुखसे स्थित रहे । वह मकरभी खानेसे बचे हुए जामनके फलोंको घर जाकर अपनी स्त्रीको देता । तब एक दिन उसने उससे पूछा- “नाथ ! कहांसे यह अमृतमय फल लातेहो ?” वह बोला-“ भद्रे ! मेरा एक परम मित्र रक्तमुख वानर प्रीतिसे इन फलोंको देताहै । तब उसने कहा जो सदा ऐसे अमृतमय फल खाताहै उसका हृदयभी अमृतकी समान होगा । सो यदि मुझ भार्यासे तेरा कुछ प्रयोजन हो तो उसका हृदय लाकर मुझेदे । जिससे उसे भक्षणकर जरा मरणसे रहित हो तेरे साथ भोग भोगूं” । वह बोला- “भद्रे ! ऐसा मत कहो कारण कि वह बुद्धिमान् हमारा भ्राता तथा फल देनेवा- लाहै वह मारा नहीं जासक्ता सो इस मिथ्या आग्रहको त्यागदो कहा है कि- एकं प्रसूयते माता द्वितीयं वाक् प्रसूयते । वाग्जातमधिकं प्रोचुः सोदर्य्यादपि बन्धुवत् ॥ ६ ॥ ” माता एक सोदर उत्पन्न करती है, वाणी दूसरा उत्पन्न करती है, वाणीसे उत्पन्न हुआ सोदरसे भी अधिक मित्रकी समान श्रेष्ठ होता है ऐसा पंडितोंने कहा है ॥ ६ ॥” अथ मकरी आह -“ त्वया कदाचित् अपि मम वचनं अन्यथा कृतम् । तत् नूनं सा वानरी भविष्यति यतः तस्या अनुरागतः सकलमपि दिनं तत्र गमयसि । तत् त्वं ज्ञातो मया सम्यक् । यतः- तब मकरी बोली-“तैने कभी मेरा वचन अन्यथा न किया, सो अवश्यही वह वानरी होगी । इससे उसके अनुरागसे सम्पूर्ण दिन वहा बिताते हो सो यह मैंने अच्छी प्रकार जान लिया जिससे- साह्लादं वचनं प्रयच्छसि न मे नो वाञ्छितं किञ्चन प्रायः प्रोच्छ्वसिषि द्रुतं हुतवहज्वालासमं रात्रिषु ।
(४००) पञ्चतन्त्रम् ।
(४००) पञ्चतन्त्रम् । कण्ठाश्लेषपरिग्रहे शिथिलता यन्नादराच्चुम्बसे तत्ते धूर्त्त! हृदि स्थिता प्रियतमा काचिन्ममैवापरा ॥७॥” न अच्छी प्रकार मुझसे बोलते हो, न वांछित देते हो, जलती अग्निकी समान रात्रिमें प्रायः श्वास लेते हो, कंठके आलिंगन करनेमें शिथिलता करते हो, न आदरसे चुम्बन करते हो, इससे हे धूर्त ! मैने जाना कि तुम्हारे हृदयमें मेरेसमान कोई अन्यस्त्री है ॥ ७ ॥” सोऽपि पत्न्याः पादोपसंग्रहं कृत्वा अङ्कोपरि निधाय तस्याः कोपकोटिमापन्नायाः सुदीनमुवाच- वह भी स्त्रीके चरण पकड़ कर गोदीमें रख अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुई स्त्रीसे दीन हो बोला- ः "मयि ते पादपतिते किङ्करत्वमुपागते । त्वं प्राणवल्लभे कस्मात्कोपने कोपमेष्यसि ॥ ८ ॥” "मुझे तेरे चरणोंपर गिरने तथा दीनताको प्राप्त होनेमें भी हे प्राणप्यारी ! हे कोपने ! किस कारण तू क्रोध करती है ॥ ८ ॥” सा अपि तद्वचनमाकर्ण्य अश्रुप्लुतमुखी तमुवाच- यह इस वचनको सुनकर आंसुओंसे मुखको भिगोती उससे बोली- "सार्द्धं मनोरथशतैस्तव धूर्त्त कान्ता सैव स्थिता मनसि कृत्रिमभावरम्या । अस्माकमस्ति न कथञ्चिदिहावकाश- स्तस्मात्कृतं चरणपातविडम्बनाभिः ॥ ९ ॥ हे धूर्त ! सैकडो मनोरथोंकेसाथ कपटसे मन हरने वाली वह कान्ता तेरे मनमें स्थित है । इस हृदयमें हमारे निमित्त स्थान नहीं है सो अब चरणपातकी विडम्बनासे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ९ ॥ अपरं सा यदि तव वल्लभा न भवति तत् किं मया भणि- तेऽपि तां न व्यापादयसि ? । अथ यदि स वानरस्तत् कः तेन सह तव स्नेहः ? तत् किंबहुना यदि तस्य हृदयं न भक्ष- यामि, तत् मयाः प्रायोपवेशनं कृतं विद्धि” । एवं तस्याः तं निश्चयं ज्ञात्वा चिन्ताव्याकुलितहृदयः स प्रोवाच-अथवा साधु इदमुच्यते-
भाषाटीकासमेतम् । ( ४०१ ) सो यदि वह तुम्हारी प्यारी न होती तो क्यों मेरे निमित्त तुम उसको न मारते?। और जो वह वानर है तो उसके सहित तेरा स्नेह कैसा ? सो बहुत कहनेसे क्या है यदि उसका हृदय भक्षण न करूंगी तो मेरा मरणक निमित्त कृत सकल्प जानो” । इस प्रकार वह उसके निश्चयको जान चिन्तासे व्याकुल हृदय हो बोला । अथवा अच्छा कहा है- "वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च । एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोस्तथा ॥ १०॥ “वज्रलेप ( महा ) मूर्ख, नारी, केंकडा, मत्स्य, नीली और मद्यप इनका एकवारही दृढग्रह होता है ॥ १० ॥ तत् किं करोमि ? कथं स मे वध्यो भवति” इति विचि- न्त्य वानरपार्श्वमगमत् । वानरोऽपि चिरायान्तं तं सोद्वेग - मवलोक्य प्रोवाच "भो मित्र ! किमद्य चिरवेलायां समा- यातोऽसि ? कस्मात् साहादं न आलपसि ? न सुभाषितानि पठसि ?” स आह-“मित्र ! अहं तव भ्रातृजायया निष्ठुर- तरैर्वाक्यैरभिहितः-“ भोः कृतघ्न ! मा मे त्वं स्वमुखं दर्शय यतः त्वं प्रतिदिनं मित्रं उपजीवासि न च तस्य पुनः प्रत्युप- कारं गृहदर्शनमात्रेण अपि करोषि । तत् ते प्रायश्चित्तमपि नास्ति । उक्तञ्च- सो क्या करू किस प्रकार उसको मारू” । ऐसा विचार कर वानरके समीप आया, वानर भी उसे आता देख उद्वेगपूर्वक बोला,-“ भो मित्र ! क्या आज देरसे आये ? क्यों आनन्दपूर्वक नहीं बोलते हो ? क्यो नहीं अच्छे वचन पढते हो ?” वह बोला-“मित्र ! मैं तेरी भाभीसे आज निष्ठुर वचनसे ताडित हुआ हू । उसने कहा है-“भो कृतघ्न ! तू मुझे अपना मुख मत दिखला जो कि तू प्रतिदिन मित्रोंसे उपजीवित होताहै परन्तु घर दिखाने मात्रसे भी उसका प्रत्युपकार नहीं करता है, सो तेरा प्रायश्चित्त भी नहीं है। कहा है- ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते शठे । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ ११ ॥ २६
( ४०२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४०२ ) पञ्चतन्त्रम् । ब्रह्महत्यारा, सुरापी, चोर, व्रतभंगकरनेवाला सत्पुरुषोंने इनकी निष्कृति कही है परन्तु कृतघ्नकी निष्कृति नहीं है ॥ ११ ॥ तत् त्वं मम देवरं गृहीत्वा अद्य प्रत्युपकारार्थं गृहमानय। नो चेत् त्वया सह मे परलोके दर्शनम्" । तत् अहं तया एवं प्रोक्तः तव सकाशमागतः । तत् अद्य तया सह त्वदर्थे कलहायतो मम इयती वेला विलग्ना। तत् आगच्छ मे गृहम्। तव भ्रातृपत्नी रचितचतुष्का प्रगुणितवस्त्रमणिमाणिक्याद्यु- चिताभरणा द्वारदेशबद्धवन्दनमाला सोत्कण्ठा तिष्ठति" । मर्कट आह-"भो मित्र ! युक्तमभिहितं मद्भ्रातृपत्न्या । उक्तञ्च- सो तू मेरे देवरको ग्रहण कर उसका प्रत्युपकार करनेको घर लेआना । नहीं तो तेरे साथ मेरा परलोक दर्शन होगा"। सो मैं इस प्रकारसे कहा हुआ तुम्हारे पास आया हूं । सो आज तुम्हारे अर्थ स्त्रीके साथ क्लेश करते हुए मुझे इतनी देर लग गई । सो मेरे घरको आओ । तुम्हारी भाभी आंगन सजाये बडे मोलके वस्त्र मणि माणिक्यसे रचित गहनेवाले द्वारदेश बंधी वंदन माला किये उत्कं- ठित स्थित है" वानर बोला-"भो मित्र ! तुम्हारी जायाने सत्य कहा है । कहा है कि- वर्जयेत्कौलिकाकारं मित्रं प्राज्ञतरो नरः । आत्मनः सम्मुखं नित्यं य आकर्षति लोलुपः ॥ १२ ॥ अति बुद्धिमान् मनुष्य कपट आकारवाले मित्रको त्याग दे जो कपटी मित्र लोभके कारण नित्य अपने सम्मुख मित्रको खैंचता है ॥ १२ ॥ तथाच- और देखो- ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति । भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥ १३ ॥ जो देता, ग्रहण करता, गुप्त बात कहता और पूछता, भोजन करता, भोजन कराता है ये छः प्रकारका प्रीतिका लक्षण है ॥ १३ ॥ परं वयं वनचराः, युष्मदीयञ्च जलान्ते गृहं, तत् कथं
भाषाटीकासमेतम् । ( ४०३ ) शक्यते तत्र गन्तुम्,तस्मात् तामपि मे भ्रातृपत्नीमत्र आनय येन प्रणम्य तस्या आशीर्वादं गृह्णामि” । स आह,–“भो मित्र ! अस्ति समुद्रान्तरे सुरम्ये पुलिनप्रदेशेऽस्मद्गृहम् । तत् मम पृष्ठमारूढः सुखेन अकृतभयो गच्छ” । सोऽपि तच्छ्रुत्वा सानन्दमाह,–“भद्र ! यदि एवं तत् किं विलम्ब्यते त्वर्यताम् । एषोऽहं तव पृष्ठमारूढः । तथानुष्ठिते अगाधे जलधौ गच्छन्तं मकरमालोक्य भयत्रस्तमना वानरः प्रोवाच– “भ्रातः ! शनैः शनैः गम्यताम् । जलकल्लोलैः प्लाव्यते मे शरीरम्”। तत् आकर्ण्य मकरः चिन्तयामास । “असौ अगाधं जलं प्राप्तो मे वशः सञ्जातः, मत्पृष्ठगतः तिलमात्रमपि चलितुं न शक्नोति । तस्मात् कथयामि अस्य निजाभिप्रायं, येन अभीष्टदेवतास्मरणं करोति” । आह च,–“मित्र ! त्वं मया वधाय समानीतो भार्यावाक्येन विश्वास्य । तत् स्मर्यतामभीष्टदेवता” । स आह,–“भ्रातः ! किं मया तस्याः तवापि च अपकृतं ? येन मे वधोपायः चिन्तितः” । मकर आह,–“भोः ! तस्याः तावत् तव हृदयस्य अमृतमय- फलरसास्वादनमृष्टस्य भक्षणे दोहदः सञ्जातः तेन एतदनु- ष्ठितम्” । प्रत्युत्पन्नमतिः वानर आह,–“भद्र ! यदि एवं तत् किं त्वया मम तत्र एव न व्याहृतम् । येन स्वहृदयं जम्बूको- टरे सदा एव मया सुगुप्तं कृतम् । तद् भ्रातृपत्नया अर्पया- मि । त्वया अहं शून्यहृदयोऽत्र कस्मात् आनीतः ?” तदा- कर्ण्य मकरः सानन्दमाह,–“भद्र ! यदि एवं तदर्पय मे हृदयं येन सा दुष्टपत्नी तद्भक्षयित्वा अनशनादुत्तिष्ठति । अहं त्वां तमेव जम्बूपादपं प्रापयामि” । एवमुक्त्वा निवृत्य जम्बूतलमगात् । वानरोऽपि कथमपि जल्पितविविधदेवतो- पचारपूजः तीरमासादितवान्। ततश्च दीर्घतरचंक्रमणेन तमेव जम्बूपादपमारूढः चिन्तयामास । “अहो ! लब्धाः तावत् प्राणाः । अथवा साधु इदमुच्यते–
( ४०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ४०४ ) पञ्चतन्त्रम् । परन्तु हम वनचर हैं और तुम्हारा जलके अन्तमें घर है सो मैं किस प्रकार वहां जासक्ता हूं । इस कारण उस हमारी भाभीको यहीं लाओ जिससे प्रणाम कर उसका आशीर्वाद ग्रहण करूं” । वह बोला,-“भो मित्र ! समुद्रके भीतर तटमें मनोहर बालुकामय स्थानमें हमारा घर है । सो मेरी पीठपर चढ़ सुखसे निर्भय हो चलो” । वहभी यह सुन आनन्दसे बोला,-“भद्र ! यदि ऐसा है तो देर करनेका क्या काम शीघ्रता करो यह मैं तुम्हारी पीठपर चढ़ा” । ऐसा कहकर जलमें जाते हुए मकरको देख कर भयसे व्याकुल मन हो वानर बोला- “भाई शनैः २ चलो । जलकी लहरोंसे मेरा शरीर ढका जाता है” । यह सुन- कर मकर विचारने लगा । “यह अगाध जलमें प्राप्तहो मेरे वशीभूत हुआ है, मेरी पीठको प्राप्त हुआ तिलमात्रभी नहीं चल सकता है । सो इससे अपना अभिप्राय कहूं जिससे यह अपने इष्ट देवताका स्मरण करे” । और बोला भी- “मित्र ! तुमको मैं भार्याके वाक्यसे विश्वास दिलाकर मारनेके निमित्त लाया हूं ! सो अपने इष्ट देवताका स्मरण करो” । वह बोला,-“भ्राता ! क्या मैंने उसका और तुम्हारा अपकार किया है? जो मेरे वधका उपाय विचार किया है”। मकर बोला,-“भो ! उसको अमृतमय फलके रसास्वादसे मीठे तुम्हारे हृदय खानेका गर्भावस्थाका मनोरथ है तिससे यह अनुष्ठान किया है” । तत्कालबुद्धि प्रगटवाला वानर बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो वहीं तुमने क्यों न मुझसे कहा । जो कि मैने अपना हृदय जम्बूकी कोटरमें सदाहीसे गुप्त कर रक्खा है । सो तुम्हारी पत्नीकोही अर्पण करूं । सो तुम मुझ शून्यहृदयको यहां क्यों लाये”। यह सुनकर मकर आनन्दसे बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो मुझको अपना हृदय दे जिससे वह दुष्टपत्नी भक्षण करके अनशन ( अभोजन ) से उठे । मैं तुझे उस जम्बूवृक्षको प्राप्त करता हूं” । ऐसा कह लौटकर जामन- वृक्षके नीचे गया । वानरभी किसी प्रकार विविध देवतोंकी सत्कार पूजाकी जल्पना कर तटपर आया । फिर बडी कुलांच मारकर उस जामनके पेड़पर चढ़कर विचारने लगा । “अहो ! अब प्राण बचे । अथवा अच्छा कहा है- न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ १४ ॥ अविश्वासीका विश्वास न करे और विश्वासीकाभी विश्वास न करे विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय जड़से नष्ट कर देता है ॥ १४ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (४०५) तन्मम एतदद्य पुनर्जन्मदिनमिव सञ्जातम्”। इति चिन्त- मानं मकर आह,–“भो मित्र ! अर्पय तत् हृदयं यथा ते भ्रातृपत्नी भक्षयित्वा अनशनादुत्तिष्ठति”। अथ विहस्य निर्भर्त्सयन् वानरः तमाह,–“धिक् धिक् मूर्ख ! विश्वास- घातक ! किं कस्यचित् हृदयद्वयं भवति ?। तदाशु गम्यतां जम्बूवृक्षस्य अधस्तात, न भूयोऽपि त्वया अत्र आगन्तव्य- म्। उक्तञ्च यतः– सो आज यह मेरे नये जन्मका दिन है”। ऐसा विचार करते मकर उससे बोला,-“भो ! मित्र उस हृदयको अर्पण करो जिसे तुम्हारी भाभी भक्षण कर अनशन व्रतसे उठे”। फिर हँसकर घुडकता हुआ वानर उससे बोला-“धिक् धिक् मूर्ख ! विश्वासघातक ! क्या किसीके दो हृदय होते हैं । सो शीघ्र जाओ जम्बूवृक्षके नीचे फिर कभी मत आना। कहा है- सकृद्दुष्टञ्च यो मित्रं पुनः सन्धातुमिच्छति । स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ १५ ॥” एक बार दुष्ट हुए मित्रसे जो फिर मिलनेकी इच्छा करता है वह मृत्यु- कोही ग्रहण करता है जैसे खिचड़ी गर्भको ग्रहण कर मृत्युको प्राप्त होती है ॥ १५ ॥” तत् श्रुत्वा मकरः सविलक्षं चिन्तितवान्,–“अहो ! मया अतिमूढेन किमस्य स्वचित्ताभिप्रायो निवेदितः तद्यदि असौ पुनरपि कथञ्चिद्विश्वासं गच्छति तद्भूयोऽपि विश्वास- यामि”। आह च–“मित्र ! हास्येन मया तेऽभिप्रायो लब्धः । तस्या न किञ्चित् तव हृदयेन प्रयोजनम् । तत् आगच्छ प्राघुणिकन्यायेन अस्मद्गृहम् । तव भ्रातृपत्नी सोत्कण्ठा वर्त्तते”। वानर आह–“भो दुष्ट ! गम्यताम् अधुना नाहमागमिष्यामि । उक्तञ्च– यह सुनकर नाका लजित हो विचारने लगा-“अहो ! मुझ अति मूर्खने क्यो इसके प्रति अपने चित्तका अभिप्राय कथन कर दिया । सो यदि यह फिर किसी प्रकार विश्वासको प्राप्त हो तो इसको फिर विश्वास प्राप्त करू”।
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( ४०६ ) पञ्चतन्त्रम् । और बोला- "मित्र ! हास्यसे मैंने आपका अभिप्राय जाना । उसको कुछभी तुम्हारे हृदयसे प्रयोजन नहीं है । सो आओ अतिथिरूपसे हमारे घर चलो । तेरी भाभी उत्कंठित है" । वानर बोला- "भो दुष्ट ! अब जाओ । मैं नहीं आऊंगा । कहा है- बुभुक्षितः किं न करोति पापं क्षीणा जना निष्करुणा भवन्ति । आख्याहि भद्रे प्रियदर्शनस्य न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम् ॥ १६ ॥" भूखा क्या पाप नहीं करता ? क्षीण मनुष्य करुणाहीन हो जाते है, हे भद्रे ! प्रियदर्शनसे कहना गंगदत्त फिर कूपमें नहीं आवेगा ॥ १६ ॥” मकर आह- "कथमेतत् ?" स आह- मकर बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला- कथा २. कस्मिंश्चित् कूपे गङ्गदत्तो नाम मण्डूकराजः प्रतिवसति स्म । स कदाचित दायादैः उद्वेजितोऽरघट्टघटीमारुह्य निष्क्रान्तः। अथ तेन चिन्तितम् । "यत् कथं तेषां दायादानां मया प्रत्यपकारः कर्त्तव्यः । उक्तञ्च- किसी कूपमें गंगदत्त नामक मेडकराजा रहता था, वह कभी हिस्सेदारोंसे उद्वेजित हुआ कुएकी ढेकलीको आलम्बन कर बाहर निकला । और उसने विचारा "इन गोतियोंका अपकार किस प्रकार करूं। कहा है- आपदि येनापकृतं येन च हसितं दशासु विषमासु । अपकृत्य तयोरुभयोः पुनरपि जातं नरं मन्ये ॥ १७ ॥” जिसने आपत्तिमें अपकार किया और विषम दशामें हँसा उन दोनोंके प्रति फिर अपकार करकेही मनुष्यको उत्पन्न हुआ ऐसा मैं मानता हूं ॥ १७ ॥" एवं चिन्तयन् बिले प्रविशन्तं कृष्णसर्पमपश्यत् । तं दृष्ट्वा भूयोऽपि अचिन्तयत् । "यत् एनं तत्र कूपे नीत्वा सकलदा- यादानां उच्छेदं करोमि । उक्तञ्च- ऐसा विचार कर बिलमें प्रवेश करते काले सांपको देखा । उसको देखकर
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फिरभी विचारने लगा कि "इसको उस कूपमें लेजाकर सम्पूर्ण दायादोका नाश करूं। कहा है-- शत्रुभिर्योजयेच्छत्रुं बलिना बलवत्तरम्। स्वकार्याय यतो न स्यात्काचित्पीडात्र तत्क्षये ॥ १८ ॥ शत्रुओंके साथ शत्रुओंको भिड़ावै, बलवान्के साथ बलवान्को अपने कार्यके निमित्त लगावै कारण कि, उसके क्षयमें फिर कुछ पीडा नहीं होती १८ तथाच- और देखो- शत्रुमुन्मूलयेत्प्राज्ञस्तीक्ष्णं तीक्ष्णेन शत्रुना। व्यथाकरं सुखार्थाय कण्टकेनेव कण्टकम् ॥ १९ ॥ " बुद्धिमान् तीक्ष्ण शत्रुको तीक्ष्ण शत्रुसे नष्ट करावै व्यथा करनेवाला काटा सुखके निमित्त कांटेसेही निकाला जाता है ॥ १९ ॥" एवं स विभाव्य बिलद्वारं गत्वा तमाहूतवान्-"एहि ! एहि !! प्रियदर्शन ! एहि !" तत् श्रुत्वा सर्पश्चिन्तयामास । "य एष मां आह्वयति, स स्वजातीयो न भवति यतो नैषा सर्पवाणी । अन्येन केनापि सह मम मर्त्यलोके सन्धानं नास्ति । तदत्र एव दुर्गे स्थितः तावत् वेद्मि कोऽयं भवि- ष्यति । उक्तञ्च-- ऐसा विचार बिलके द्वारे जाकर उसे बुलाता हुआ--"आओ ! आओ !! प्रियदर्शन ! आओ ।" तब सुनकर साप विचारने लगा। "यह मुझे बुलाता है सो अवश्यही मेरी जातीका न होगा। कारण कि यह सर्पकी वाणी नहीं है। और किसीके साथ मर्त्यलोकमें मेरी मित्रता नहीं है। सो इसी दुर्गमें स्थित हुआ पहले जानू कि यह कौन होगा। कहा है कि-- यस्य न ज्ञायते शीलं न कुलं न च संश्रयः। न तेन सङ्गतिं कुर्यादित्यवाच बृहस्पतिः ॥ २० ॥ जिसका कुल शील और आश्रय न जाना हो उसकी संगति न करे ऐसा बृहस्पतिजीने कहा है ॥ २० ॥ कदाचित् कोऽपि मन्त्रवादी औषधचतुरो वा मामाहूय
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( ४०८ ) पञ्चतन्त्रम् । बन्धने क्षिपति । अथवा कश्चित पुरुषो वैरमाश्रित्य कस्य- चिद्भक्षणार्थे मामाह्वयति”। आह च-“भोः ! को भवान् ?” स आह-“अहं गङ्गदत्तो नाम मण्डूकाधिपतिः त्वत्सकाशे मैत्र्यर्थमभ्यागतः”। तच्छ्रुत्वा सर्प आह,-“भो ! अश्रद्धेयमे- तत् यत्तृणानां वह्निना सह सङ्गमः । उक्तञ्च- कभी कोई सर्पमंत्रमें कुशल भौषधीमें चतुर मुझे बुलाकर बंधनमें डालना चाहता है । अथवा कोई पुरुष वैरको आश्रित कर किसीके भक्षणके निमित्त मुझे बुलाता है” । बोला भी-“भो ! आप कौन हैं ?” । वह बोला-“मैं गंगदत्तनामक मण्डूकराजा तुम्हारे पास मित्रता करनेको आयाहूं” । यह सुनकर सर्प बोला-“भो ! यह श्रद्धाके अयोग्य वचन हैं जो तृण और अग्निका समागम होना, कहा है- यो यस्य जायते वध्यः स स्वप्नेऽपि कथञ्चन । न तत्समीपमभ्येति तत्किमेवं प्रजल्पसि ॥ २१ ॥” जो जिसका वध्य हो वह स्वप्नमेंभी कभी उसके समीप न जाय, सो तू ऐसी जल्पना क्यों करता है ॥ २१ ॥” गङ्गदत्त आह-“भोः सत्यमेतत् । स्वभाववैरी त्वम् अस्माकम् । परं परपरिभवात् प्राप्तोऽहं ते सकाशम् । उक्तञ्च- गंगदत्त बोला-“भो ! यह सत्य है तुम हमारे स्वभाविक वैरी हो परन्तु शत्रुओंसे तिरस्कृत होकर मैं तुम्हारे पास आया हूं । कहा है- सर्वनाशे च सञ्जाते प्राणानामपि संशये । अपि शत्रुं प्रणम्यापि रक्षेत्प्राणधनानि च ॥ २२ ॥” सर्वनाश और प्राणसंशयके उत्पन्न होनेमें शत्रुकोभी प्रणाम कर अपने प्राण और धनकी रक्षा करे ॥ २२ ॥” सर्प आह-“कथय कस्मात् ते परिभवः ?” स आह- “दायादेभ्यः”। सोऽपि आह-“क्व ते आश्रयो वाप्यां कूपे तडागे ह्रदे वा ? तत्कथय स्वाश्रयम् ।” तेनोक्तम्-“पाषा- णचयनिवद्धे कूपे”। सर्प आह-“अहो ! अपदा वयं तन्ना- स्ति तत्र मे प्रवेशः । प्रविष्टस्य च स्थानं नास्ति । यत्र स्थितः तव दायादान् व्यापदयामि । तद्गम्यताम् । उक्तञ्च-
भाषाटीकासमेतम् । (४०९) सर्प बोला- "कहो किससे तुम्हारा परिभव हुआ है?" वह बोला-"गोत्रियों- से"। वह बोला- "कहा तेरा आश्रय है । वावडी, कुए, तडाग वा हृदमे २ सो अपना आश्रय कहो" वह बोला-"पत्थरसमूहसे बनेहुए कूपमें"। सर्प बोला- "भो ! हमारे चरण नहीं हैं सो हमारा वहा प्रवेश नहीं हो सकता न रहनेका स्थान है जहा स्थित होकर तुम्हारे दायादोंको भक्षण करू सो जाऊँ । कहा है- यच्छक्यं ग्रसितुं शस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् । हितञ्च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥ २३ ॥" जो वस्तु भक्षण करनेको सामर्थ्य हो वह प्रशस्त है और जो खाकर पाक होजाय और पाकमे हितकारक हो कल्याणकी इच्छावालेको वह वस्तु खानी चाहिये ॥ २२ ॥ गंगदत्त आह-"भोः ! समागच्छ त्वं अहं सुखोपायेन तत्र तव प्रवेशं कारयिष्यामि । तथा तस्य मध्ये जलोपान्ते रम्य- तरं कोटरं अस्ति । तत्र स्थितः त्वं लीलया दायादान् व्या- पादयिष्यसि"। तच्छ्रुत्वा सर्पो व्यचिन्तयत् । "अहं तावत् परिणतवयाः, कदाचित् कथञ्चित् मूषकमेकं प्राप्नोमि । तत्सुखावहो जीवनोपायोऽयमनेन कुलाँगारेण मे दर्शितः । तद्गत्वा तान् मण्डूकान् भक्षयामि" इति । अथवा साधु इदमुच्यते- गंगदत्त बोला- "भो ! आप आइये मैं सुख उपायसे वहा तुम्हारा प्रवेश कराऊगा । उसके मध्य जलके समीप मनोहर खखोडल है । वहा स्थित होकर तू लीलासे ही दायादोंको भक्षण करना " । यह सुन सर्प विचा- रने लगा । "मेरी अवस्था वृद्ध होगई है कभी एक चूहा प्राप्त होता है । सो सुखदायक जीवनोपाय इस कुलाङ्गारने वर्णन किया है। सो जाकर उन मण्डूकों- को भक्षण करूंगा । अथवा अच्छा कहा है- यो हि प्राणपरिक्षीणः सहायपरिवर्जितः । स हि सर्वसुखोपायां वृत्तिमाराचयेद्बुधः ॥ २४ ॥" जो प्राणोंसे परिक्षीण सहायसे रहित हो वह पंडित सर्व सुखके उपायवाली वृत्तिको आचरण करे ॥ २४ ॥"
(४१०) पञ्चतन्त्रम् ।
(४१०) पञ्चतन्त्रम् ।
एवं विचिन्त्य तमाह-“भो गंगदत्त ! यदि एवं तदग्रे भव येन तत्र गच्छावः”। गंगदत्त आह-“भोः प्रियदर्शन ! अहं त्वां सुखोपायेन तत्र नेष्यामि स्थानञ्च दर्शयिष्यामि। परं त्वया अस्मत्परिजने रक्षणीयः। केवलं यानहं तव दर्शयि- ष्यामि ते एव भक्षणीयाः” इति । सर्प आह-“साम्प्रतं त्वं मे मित्रं जातं तन्न भेतव्यम्, तव वचनेन भक्षणीयाः ते दाया- दाः” एवमुक्त्वा बिलात् निष्क्रम्य तमालिङ्ग्य च तेनैव सह प्रस्थितः। अथ कूपमासाद्य अरघट्टघटिकामार्गेण सर्पः तेन आत्मना स्वालयं नीतः। ततश्च गङ्गदत्तेन कृष्णसर्प कोटरे धृत्वा दर्शिताः ते दायादाः। ते च तेन शनैः शनैः भक्षिताः। अथ मण्डूकाभावे सर्पेण अभिहितम्-“भद्र ! निःशेषिताः ते रिपवः तत् प्रयच्छ अन्यत् मे किञ्चित् भोजनं, यतोऽहं त्वया अत्र आनीतः”। गङ्गदत्त आह-“भद्र ! कृतं त्वया मित्रकृत्यम्, तत् साम्प्रतम् अनेन एव घटिकायन्त्रमार्गेण गम्यताम्” इति। सर्प आह-“भो गङ्गदत्त ! न सम्यगभिहितं त्वया । कथमहं तत्र गच्छामि । मदीयबिलदुर्गमन्येन रुद्धं भविष्यति । तस्मात् अत्रस्थस्य मे मण्डूकमेकैकं स्ववर्गीयं प्रयच्छ नो चेत् सर्वानपि भक्षयिष्यामि” इति । तच्छ्रुत्वा गङ्गदत्तो व्याकुलमना व्यचिन्तयत् । “अहो ! किमेतन्मया कृतं सर्पमानयता तद्यदि निषेधयिष्यामि तत्स- र्वानपि भक्षयिष्यति । अथवा युक्तमुच्यते- ऐसा विचार कर उससे बोला-“भो ! गंगदत्त यदि ऐसा हो तो आगे हो जिससे वहां चले”। गंगदत्त बोला-“भो ! प्रियदर्शन ! मैं तुमको सुखके उपा- यसे वहां ले जाऊंगा और स्थान भी दिखाऊंगा । परन्तु हमारे परिजनोंकी तुमने रक्षा करना । केवल जिनको मै दिखाऊं उन्हींको खाना”। सर्प बोला-“अब तू हमारा मित्र होगया । सो मतडरो तुम्हारे वचनसे मै तुम्हारे गोतियोंको भक्षण करूंगा”। ऐसा कह बिलसे निकल उसको आलिंगन कर उसके संग चला । तब कूपको प्राप्त हो ढेंकलीके मार्गसे सर्पको वह स्वयं अपने स्थानमें लाया । तब