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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

बड़से मुझे निद्रा आगई, सो निद्रित होनेके कारण कुछ मेरे मुखसे निकल गया, सो मुझे विदित नहीं, सो मुझ निद्रापरवशके ऊपर आप प्रसन्न हूजिये" यह सुनकर राजाने विचार किया कि, “मैने तो जन्मान्तरमें भी मलत्याग करते कभी चिर्भटी नहीं खाई, जिस कारण यह सम्बन्ध नहीं होनेवालाभी इस मूर्खने कहा इसी प्रकार दन्तिलकाभी (असत्य है) यह निश्चय है। सो मैने यह अच्छा नहीं किया जो वृथा उस बिचारेको सन्मानसे बहिष्कृत किया, इस सरीखे पुरुषोंकी कभी ऐसी चेष्टा नहीं होसकती है, उसके बिना सब राजकाज और पुरके कार्य शिथिल पड़े हैं" इस प्रकार अनेक विचार कर दन्तिलको बुलाय अपने अंगके वस्त्र आभरण आदिसे उसको सत्कृत कर निज अधिकारमें नियुक्त किया। इससे मै कहताहूं “जो गर्वसे नहीं पूजता है”-इत्यादि । सञ्जीवक आह-“भद्र ! एवमेवैतत् । यद्भवता अभिहितं तदेव मया कर्त्तव्यमिति” । एवमभिहिते दमनकस्तमादाय पिंगलकसकाशमगमत् । आह च-“देव ! एष मया आनीतः स सञ्जीवकः । अधुना देवः प्रमाणम्” । सञ्जीवकोऽपि तं सादरं प्रणम्य अग्रतः सविनयं स्थितः । पिंगलकोऽपि तस्य पीनायत ककुद्मतो नखकुलिशालंकृतं दक्षिणपाणिमुपरि दत्त्वा मानपुरःसरमुवाच ।"अपि शिवंभवतः? कुतस्त्वमस्मि- न्वने विजने समायातोऽसि?” तेनापि आत्मवृत्तान्तः कथितः। यथा वर्द्धमानेन सह वियोगः सञ्जातस्तथा सर्वं निवेदितम् । तच्छ्रुत्वा पिंगलकः सादरतरं तमुवाच-“ वयस्य ! न भेत- व्यम्, मद्भुजपञ्जरपरिरक्षितेन यथेच्छं त्वया अधुना वर्त्तितव्यम् अन्यच्च नित्यं मत्समीपवर्त्तिना भाव्यं यतः कारणाद्बह्वपायं रौद्रसत्त्वनिषेवितं वनं गुरूणामपि सत्त्वानामसेव्यं कुतः शष्पभोजिनाम्” । एवमुक्त्वा सकलमृगपरिवृतो यमुना कच्छ- मवतीर्य्य उदकग्रहणं कृत्वा स्वेच्छया तदेव वनं प्रविष्टः । ततश्च करटकदमनकनिक्षिप्तराज्यभारः सञ्जीवकेन सह सुभाषितगोष्ठीमनुभवन्नास्ते ।

भाषाटीकासमेतम् । ( ५५ ) संजीवक बोला—"यह ऐसाही है जैसा तुमने कहा है वही मैं करूंगा"। यह कहनेपर दमनक उसको ले पिंगलकके समीप गया और बोला—"देव ! यह मैं संजीवकको लायाहू, अब स्वामीही प्रमाण है"। संजीवकभी उसको सादर प्रणाम कर विनयपूर्वक आगे बैठगया और पिंगलकभी उसके पुष्ट और बडे कंधे- पर नखरूपी बज्रसे अलंकृत दहिना हाथ ऊपर रख आदरसे बोला—"आप कुशलहैं ? इस निर्जनवनमे कहासे आये ?" उसनेभी अपना वृत्तान्त कहा जैसे वर्द्धमानके संगवियोग हुआ वहभी सब कहा। यह सुन पिंगलक आदरपूर्वक उससे बोला—"मित्र मेरे भुजपंजरसे रक्षित होकर कहीं मत डरो, अब तुम यथेच्छ ( स्वच्छन्द ) रहो और नित्य हमारे समीपमें आओ जिस कारणसे कि, बहुतसे दुःखवाले भयकर जीवोसे सेवित यह वन बडे २ प्राणियोको भी असेव्यहै, फिर घास खानेवालोको तो क्या"। यह कह सब मृगोके सहित यमुनाके किनारेपर आय जलपान कर स्वेच्छासे उस वनमें प्रविष्ट हुआ। तब करटक दमनकपर राज्यभार सौंप संजीवकके साथ सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव करता रहने लगा । अथवा साध्विदमुच्यते— अथवा यह सत्य कहा है— यदृच्छयाप्युपनतं सकृत्सज्जनसङ्गतम् । भवत्यजरमत्यन्तं नाभ्यासक्रममीक्षते ॥ १६२ ॥ अकस्मात् महान् उपस्थित हुआ सज्जनका संग अक्षय फलवाला होता है, वह बारवार अभ्यासके क्रमकी अपेक्षा नहीं करता है ( एकही बारमें बहुत उपकार होता है ) ॥ १६२ ॥ सञ्जीवकेनापि अनेकशास्त्रावगाहनात् उत्पन्नबुद्धिप्राग- ल्भ्येन स्तोकैरेवाहोभिर्मूढमतिः पिंगलको धीमान् तथा कृतो यथारण्यधर्माद्वियोज्य ग्राम्यधर्मेषु नियोजितः । किं बहुना प्रत्यहं पिंगलकसञ्जीवकावेव केवलं रहसि मन्त्रयतः । शेषः सर्वोऽपि मृगजनो दूरीभूतस्तिष्ठति । करटकदमनका- वपि प्रवेशं न लभेते । अन्यच्च सिंहपराक्रमाभावात्सर्वोऽपि मृगजनस्तौ च शृगालौ क्षुधाव्याधिबाधिता एकां दिशमा- श्रित्य स्थिताः। उक्तञ्च—

( ५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ५६ ) पञ्चतन्त्रम् । सञ्जीवकके साथ अनेक शास्त्रके अवगाहनसे बुद्धिकी प्रगल्भता अधिक होनेके कारण थोडेही दिनोंमें उसने मूढमति पिंगलक इस प्रकार बुद्धिमान् कर दिया कि, वनके धर्मोंसे पृथक् कर ग्राम्य धर्ममें लगादिया । बहुत कहनेसे क्या प्रतिदिन संजीवक और पिंगलकही केवल एकान्तमें सम्मति करते, शेष सम्पूर्ण मृगजन दूरस्थित रहते, करटक दमनकको भी प्रवेश न मिलता । और सिंहके पराक्रम न करनेके कारण सम्पूर्ण मृग और वे दोनों शृगाल क्षुधारूप रोगसे व्यथित हुए एक दिशामें आश्रित हो स्थितहुए । कहा है- फलहीनं नृपं भृत्याः कुलीनमपि चोन्नतम् । सन्त्यज्यान्यत्र गच्छन्ति शुष्कं वृक्षमिवान्डजाः ॥ १६३ ॥ भृत्यजन फलहीन कुलीन और उन्नत राजाकोभी छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, जैसे शुष्क वृक्षको पक्षी ॥ १६३ ॥ तथाच- तैसेही- अपि सम्मानसंयुक्ताः कुलीना भक्तितत्पराः । वृत्तिभंगान्महीपालं त्यजन्त्येव हि सेवकाः ॥ १६४ ॥ सन्मानसेभी संयुक्त कुलीन भक्तिमे तत्पर सेवकभी आजीविका न मिलनेसे स्वामीको त्याग देते हैं ॥ १६४ ॥ अन्यच्च- औरभी- कालातिक्रमणं वृत्तेर्यो न कुर्वीत भूपतिः । कदाचित्तं न मुञ्चन्ति भर्त्सिता अपि सेवकाः ॥ १६५ ॥ जो राजा मासिक देनेका कालातिक्रम नहीं करता है उसको धुड़कनेसेभी सेवक कभी नहीं त्यागते हैं ॥ १६५ ॥ तथा न केवलं सेवका इत्थम्भूता यावत् समस्तमपि एत- ज्जगत् परस्परं भक्षणार्थं सामादिभिरुपायैस्तिष्ठति । तद्यथा- इस प्रकारसे सेवक सम्पूर्ण जगत्को परस्पर भक्षणके निमित्त सामादि उप- योंसे स्थित रहते हैं । सो ऐसे कि-

भाषाटीकासमेतम् । ( ५७ ) देशानामुपरि क्ष्माभृदातुराणां चिकित्सकाः । वणिजो ग्राहकाणां च मूर्खाणामपि पण्डिताः ॥ १६६ ॥ देशोपर राजा, रोगियोंको वैद्य, ग्राहकोको वणिक्, मूर्खोंको पण्डित॥ १६६॥ प्रमादिनां तथा चौरा भिक्षुका गृहमेधिनाम् । गणिकाः कामिनाञ्चैव सर्वलोकस्य शिल्पिनः ॥ १६७ ॥ असावधानोको चोर, गृहस्थियोको फकीर, कामियोंको गणिका, और सब लोकको शिल्पी ॥ १६७ ॥ सामादिसजितैः पाशैः प्रतीक्षन्ते दिवानिशम् । उपजीवन्ति शक्त्या हि जलजा जलदानिव ॥ १६८ ॥ साम दानादि द्वारा लगाये पाशोंसे रात दिन देखते रहते हैं जैसे व्रीहि आदि मेघोंकी ( प्रतीक्षा करते हैं ) इस प्रकार सब उनकी शक्तिसे जीते हैं॥१६८ अथवा साध्विदमुच्यते- अथवा यह अच्छा कहा है- सर्पाणाञ्च खलानाञ्च परद्रव्यापहारिणाम् । अभिप्राया न सिध्यन्ति तेनेदं वर्त्तते जगत् ॥ १६९ ॥ सर्प और पराये द्रव्य हरनेवाले दुष्टोंके अभिप्राय नहीं सिद्ध होते इसी कार- णसे यह जगत् रक्षाको प्राप्त है ॥ १६९ ॥ अत्तुं वाञ्छति शाम्भवो गणपतेराखुं क्षुधार्त्तः फणी तं च क्रौञ्चरिपोः शिखी गिरिसुतासिंहोऽपि नागाशनम् । इत्थं यत्र परिग्रहस्य घटना शम्भोरपि स्याद्गृहे तत्रान्यस्य कथं न भावि जगतोयस्मात्स्वरूपं हितत् १७०॥ ( देखो ) शिवजीका सर्प क्षुधित होकर गणेशजीके मूषकको खानेकी इच्छा करता है, उसको कार्तिकेयका मोर और मोरको गिरिजाका वाहन सिंह खानेकी इच्छा करता है, इसप्रकार शिवके घरमेभी परस्पर आक्रमणकी घटना है, तो दूसरेके घरमे क्यो न होगी, कारण कि, परस्पर उपजीविकावाला जगत्का स्वरूप ही है ॥ १७० ॥ ततः स्वामिप्रसादरहितौ क्षुत्क्षामकण्ठौ परस्परं करटक- दमनकौ मन्त्रयेते । तत्र दमनको ब्रूते-"आर्य्य करटक !

आवां तावदप्रधानतां गतौ। एष पिंगलकः सञ्जीवकानुरक्तः स्वव्यापारपराङ्मुखः सञ्जातः । सर्वोऽपि परिजनो गतः। तत्किं क्रियते" । करटक आह--“यद्यपि त्वदीव्यवचनं न करोति तथापि स्वामी स्वदोषनाशाय वाच्यः । उक्तञ्च-- सो स्वामीके प्रसादसे रहित भूखसे दुर्बल करटक और दमनक सम्मति करने लगे । दमनक बोला--“आर्य्य करटक ! हम तो अब अप्रधानताको प्राप्तहुए और यह पिंगलक संजीवकमें अनुरक्त होकर अपने कार्यसे विमुख हुआ । सब परिजन चलेगये अब क्या करें” । करटक बोला--“यद्यपि आपके वचन नहीं मानता तथापि अपने दोष नाशके लिये स्वामीसे कहना उचितहै । कहाहै कि-- अशृण्वन्नपि बोद्धव्यो मंत्रिभिः पृथिवीपतिः । यथा स्वदोषनाशाय विदुरेणाम्बिकासुतः ॥ १७१ ॥ मंत्रियोंको राजा न सुनतेहुएभी समझाना चाहिये जैसे विदुरने धृतराष्ट्र- को अपने दोष नाश करनेके लिये समझाया था ॥ १७१ ॥ तथाच-- और देखो-- मदोन्मत्तस्य भूपस्य कुञ्जरस्य च गच्छतः । उन्मार्गं वाच्यतां यान्ति महामात्राः समीपगाः ॥ १७२ ॥ मदोन्मत्त राजा और हाथीके उन्मार्ग जानेमें उनके समीपी और महावत वाच्यता ( निन्दा )को प्राप्त होते ह ॥ १७२ ॥ तत् त्वया एष शष्पभोजी स्वामिनः सकाशमानीतस्त- त्स्वहस्तेन अङ्गाराः कर्षिताः”। दमनक आह--“सत्यमेतत । ममायं दोषो स्वामिनः । उक्तञ्च- सो तैने यह घास खानेवाला स्वामीके निकट प्राप्त किया सो अपने हाथसे ही तैने अंगारा खेंचा”दमनक बोला--“यह सत्य है इसमे मेरा दोषहै स्वामीका नहीं । कहाहै-- जम्बूको हुडुयुद्धेन वयं चाषाढभूतिना । दूतिका परकार्य्येण त्रयो दोषाः स्वयंकृताः ॥ १७३ ॥” हुडु ( जीवविशेष ) से जम्बूक और आषाढभूतिसे हम दूसरेके कार्यसे दूती यह तीनों अपने दोषसे (दूषित हुए ) ॥ १७३ ॥'

करकट बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला-

भाषाटीकासमेतम् । ( ५९) करटक आह "कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्- करकट बोला- "यह कैसी कथा है ?" वह बोला- कथा ४. अस्ति कस्मिंश्चिद्विविक्तप्रदेशे मठायतनम् । तत्र देव- शर्मा नाम परिव्राजकः प्रतिवसति स्म । तस्य अनेक- साधुजनदत्तसूक्ष्मवस्त्रविक्रयवशात् कालेन महती वित्त- मात्रा सञ्जाता । ततः स न कस्यचिद्विश्वसिति । नक्त- न्दिनं कक्षान्तरात्तां मात्रां न मुञ्चति । अथवा साधु चे- दमुच्यते- एक किसी निर्जन स्थानमे मठस्थान है वहा देवशर्मा नामक सन्यासी रह- ताथा, उसके पास अनेक महात्मा पुरुषोके दिये सूक्ष्म वस्त्रोके बेचनेसे कुछ समयमें बहुतसा द्रव्य प्राप्त हुआ । तबसे वह किसीका विश्वास नहीं करता रातदिन बगलमेसे उस द्रव्यको नहीं छोडताथा । अथवा किसीने सत्य कहा है- अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानाञ्च रक्षणे । आये दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः ॥ १७४ ॥ अर्थोंके उत्पन्न करनेमें दुःख, अर्जन कियेकी रक्षा करनेमें दुःख, आनेमे दुःख, जानेमें दुःख कष्टके आश्रयवाले अर्थोंको धिक्कार है ॥ १७४ ॥ अथ आषाढभूतिर्नाम परवित्तापहारी धूर्त्तस्तामर्थमात्रां तस्य कक्षान्तरगतां लक्षयित्वा व्यचिन्तयत् । "कथं मया अस्य इयमर्थमात्रा हर्तव्येति । तदत्र मठे तावद्दृढशिला- सञ्चयवशात् भित्तिभेदो न भवति । उच्चैस्तरत्वाच्च द्वारे प्रवेशो न स्यात् । तदेनं मायावचनैर्विश्वास्य अहं छात्रतां व्रजामि येन स विश्वस्तः कदाचिद्विश्वासमेति । उक्तञ्च- उस समय आषाढभूतिनामक पराये धनका हरण करनेवाला धूर्त उस धनको उसकी बगलमें देखकर विचारने लगा- "किस प्रकार मैं यह इसकी धनमात्रा ग्रहण करू । और दृढ पत्थरके बने हुए इस मठमे कूमल नहीं लगसक्ता, ऊंचा अधिक होनेसे द्वारमें प्रवेशभी नहीं होसकता, सो इसको वचनोंसे विश्व-

(६०) पञ्चतन्त्रम् ।

(६०) पञ्चतन्त्रम् । देकर मैं इसका शिष्यबनूं, जिससे यह विश्वासको प्राप्तहुआ कदाचित् मेरे विश्वासमें आजाय । कहाहै- निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः । नाविदग्धः प्रियं ब्रूयात्स्फुटवक्ता न वञ्चकः ॥ १७५ ॥” निस्पृह अधिकारी नहीं होता, अकामी श्रृंगारप्रिय नहीं होता, मूर्ख कभी प्रिय नहीं बोलसकता, साफ कहनेवाला ठग नहीं होता ॥ १७५ ॥” एवं निश्चित्य तस्यान्तिकमुपगम्य “ॐनमः शिवायति” प्रोच्चार्य साष्टांगं प्रणम्य च सप्रश्रयमुवाच-“भगवन् ! अ- सारः संसारोऽयं, गिरिनदीवेगोपमं यौवनं, तृणाग्निसमं जी- वितम्, शरदभ्रच्छायासदृशा भोगाः, स्वप्नसदृशो मित्रपुत्र- कलत्रभृत्यवर्गसम्बन्धः । एवं मया सम्यक् परिज्ञातम् । तत् किं कुर्वतो मे संसारसमुद्रोत्तरणं भविष्यति”। तच्छ्रुत्वा देव- शर्मा सादरमाह- “वत्स ! धन्योऽसि यत्प्रथमे वयसि एवं विरक्तिभावः । उक्तञ्च- यह विचारकर उसके समीप जाय “ॐ नमः शिवाय” यह उच्चारणकर साष्टांग प्रणाम कर नम्रतासे बोला-“भगवन् ! यह असार संसार है, गिरिन- दीके वेगकी समान यौवन है, तृणकी अग्निकी समान जीवन है, शरदके मेघकी समान भोगहैं, स्वप्नकी समान मित्र, पुत्र, कलत्र (स्त्री) वर्गका सम्बन्धहै, यह मैंने भली प्रकार जान लिया सो क्या करनेसे मैं संसारसागरके पार हूंगा” यह सुन देवशर्मा आदरसे बोला-“हे पुत्र ! धन्य है जो पहली अवस्थामें ही तुझको यह विरक्तता उत्पन्न हुईहै । कहाहै- पूर्वे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः । धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ १७६ ॥ जो प्रथम अवस्थामें शान्तहै वही शान्त है ऐसा मैं मानताहूं और धातुओंके क्षीण होनेमें कौन शान्त नहीं होताहै ॥ १७६ ॥ आदौ चित्ते ततः काये सतां सम्पद्यते जरा । असतान्तु पुनः काये नैव चित्ते कदाचन ॥ १७७ ॥ जरा सत्पुरुषोंके पहले चित्तमें, पीछे कायामें प्रवृत्त होतीहै, जरा अशान्तोंके शरीरमें प्राप्तहोकरभी चित्तमें नहीं होती ॥ १७७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ॰ ( ६१) , यच्च मां संसारसागरोत्तरणोपायं पृच्छसि तच्छ्रूयताम् । और जो मुझसे संसारसागरसे पार होनेका उपाय पूछताहै, तो सुन— शूद्रो वा यदि वान्योऽपि चण्डालोऽपि जटाधरः । दीक्षितः शिवमन्त्रेण स भस्माङ्गी शिवो भवेत् ॥ १७८ ॥ शूद्र अथवा कोई अन्य चाण्डाल वा जटाधारी कोईहो शिवमन्त्रस दीक्षित हो शरीरमें भस्म लगानेसे शिव होजाताहै ॥ १७८ ॥ षडक्षरेण मन्त्रेण पुष्पमेकमपि स्वयम् । लिंगस्य मूर्ध्नि यो दद्यान्न स भूयोऽभिजायते ॥ १७९ ॥ जो षडक्षरमंत्रसे एकभी फूल शिवलिंगपर चढाताहै उसका फिर जन्म नहीं होताहै ॥ १७९ ॥ तच्छ्रुत्वा आषाढभूतिस्तत्पादौ गृहीत्वा सप्रश्रयमिदमाह- "भगवन् ! तर्हि दीक्षया मे अनुग्रहं कुरु" । देवशर्मा आह- "वत्स ! अनुग्रहं ते करिष्यामि परन्तु रात्रौ त्वया मठमध्ये न प्रवेष्टव्यं यत्कारणं निःसङ्गता यतीनां प्रशस्यते तव च ममापि, च । उक्तञ्च- यह सुन आषाढभूति उसके चरणोंको ग्रहणकर आदरसे यह बोला-“भग- वन् ! तो दीक्षा कर मेरे ऊपर अनुग्रहकरो"। देवशर्मा बोला-“वत्स ! तेरे ऊपर मैं अनुग्रह करूंगा, परन्तु रात्रिमें तू मठमे प्रवेश न करना कारण यह है कि, यतियोंकी निस्संगताही प्रशंसनीयहै सो तुम्हारी और मेरीभी । कहाहै- दुर्मन्त्रान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गात्सुतो लालनाद् विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् । मैत्री चाप्रणयात्समृद्धिरनयात्स्नेहः प्रवासाश्रयात् स्त्री गर्वादनवेक्षणादपि कृषिस्त्यागात्प्रमादाद्धनम् ॥१८०॥ दुर्मन्त्रसे राजा नष्ट होता है, संगसे यति, लाडसे पुत्र, न पढनेसे ब्राह्मण, कुपुत्रसे कुल, दुष्टोंके संगसे शील, अप्रणयसे मित्रता, अनयसे समृद्धि, परदेशमें रहनेसे स्नेह, गर्वसे स्त्री, न देखनेसे खेती, त्याग और प्रमादसे धन नष्ट- होताहै ॥ १८० ॥

( ६२ ) . पञ्चतन्त्रम् ।

( ६२ ) . पञ्चतन्त्रम् ।

तत् त्वया व्रतग्रहणानन्तरं मठद्वारे तृणकुटीरके शयि- तव्यमिति”। स आह-“भगवन् ! भवदादेशः प्रमाणम् । परत्र हि तेन मे प्रयोजनम्”। अथ कृतशयनसमयं देवशर्मा अनु- ग्रहं कृत्वा शास्त्रोक्तविधिना शिष्यतामनयत् । सोऽपि हस्त- पादावमर्दनादिपरिचर्यया तं परितोषमनयत् । पुनस्तथापि मुनिः कक्षान्तरान्मात्रां न मुञ्चति । अथ एवं गच्छति काले आषाढभूतिश्चिन्तयामास । “अहो ! न कथञ्चिदेष मे विश्वा- समागच्छति । तत् किं दिवापि शस्त्रेण मारयामि, किं वा विषं प्रयच्छामि, किंवा पशुधर्मेण व्यापादयामि” । इत्येवं चिन्तयतस्तस्य देवशर्मणोऽपि शिष्यपुत्रः कश्चिद्ग्रामादामन्त्र- णार्थं समायातः । प्राह च-“भगवन् ! पवित्रारोपणकृते मम गृहमागम्पतामिति”। तच्छ्रुत्वा देवशर्मा आषाढभूतिना सह प्रहृष्टमनाः प्रस्थितः । अथ एवं तस्य गच्छतोऽग्रे काचिन्नदी समायाता । तां दृष्ट्वा मात्रां कक्षान्तरादवतार्य कन्थामध्ये सुगुप्तां निधाय स्नात्वा देवार्चनं विधाय तदनन्तरमाषा- ढभूतिमिदमाह-“भो आषाढभूते ! यावदहं पुरीषोत्सर्गं कृत्वा समागच्छामि तावदेषा कन्था योगेश्वरस्य सावधान- तया रक्षणीया” इत्युक्त्वा गतः । आषाढभूतिरपि तस्मिन्न- दर्शनीभूते मात्रामादाय सत्वरं प्रस्थितः । देवशर्मापि छात्र- गुणानुरञ्जितमनाः सुविश्वस्तो यावदुपविष्टस्तिष्ठति ताव- त्सुवर्णरोमदेहयूथमध्ये हुडुयुद्धमपश्यत् । अथ रोषवशाद्धुडुयु- गलस्य दूरमपसरणं कृत्वा भूयोऽपि समुपैत्य ललाटपट्टाभ्यां प्रहरतो भूरि रुधिरं पतति । तच्च जम्बूको जिह्वालौल्याेन रंगभूमिं प्रविश्य आस्वादयति । देवशर्मापि तदालोक्य व्यचिन्तयत । “अहो ! मन्दमतिरयं जम्बूकः यदि कथमपि अनयोः संघट्टे पतिष्यति तन्नूनं मृत्युमवाप्स्यतीति वितर्क- यामि” । क्षणान्तरे च तथैव रक्तास्वादनलौल्यान्मध्ये प्रवि- शंस्तयोः शिरःसम्पाते पतितो मृतश्च शृगालः । देवशर्मापि

भाषाटीकासमेतम् । ( ६३ ) तं शोचमानो मात्रामुद्दिश्य शनैः शनैः प्रस्थितो यावदाषा- ढभूतिं न पश्यति ततश्च औत्सुक्येन शौचं विधाय यावत् कन्थामालोकयति तावत् मात्रां न पश्यति । ततश्च “हा ! हा ! मुषितोऽस्मीति” जल्पन् पृथिवीतले मूर्च्छया निप- पात । ततः क्षणात् चेतनां लब्ध्वा भूयोऽपि समुत्थाय फूत्कर्त्तुमारब्धः। “भो आषाढभूते ! क्व मां वञ्चयित्वा गतोऽसि । तद्देहि मे प्रतिवचनम्” । एवं बहु विलप्य तस्य पदपद्धतिम- न्वेषयञ्छनैः शनैः प्रस्थितः । अथ एवं गच्छन् सायन्तनसमये कञ्चिद्ग्राममाससाद । अथ तस्माद्ग्रामात्कश्चित्कौलिकः सभा- र्यो मद्यपानकृते समीपवर्त्तिनि नगरे प्रस्थितः । देवशर्मोपि तमालोक्य प्रोवाच--“भो भद्र ! वयं सूर्योढा अतिथयस्त- द्वान्तिकं प्राप्ता न कमपि अत्र ग्रामे जानीमः । तद्गृह्यताम- तिथिधर्मः । उक्तञ्च-- सो तुझ व्रतग्रहणके उपरान्त मठके द्वारे तृणके कुटीमे प्रवेश करना चाहिये”। वह बोला--“भगवन् ! आपकी आज्ञा प्रमाण है दूसरे लोकमे मग लहो यही मेरा प्रयोजन है” सो शयनकी प्रतिज्ञा कर देवशर्मा अनुग्रहकर शास्त्रोक्त विधिसे उसको शिष्य करता भया । वहभी हाथ पैर आदि दाबनेकी परिचर्यासे उसको संतुष्ट करता हुआ, इसपरभी वह मुनि बगलसे मात्राको न त्यागता । तब कुछ समय बीतनेपर आषाढ भूति विचार करनेलगा, “अहो किसीप्रकारसेभी यह मेरे विश्वासको प्राप्त नहीं होताहै। सो क्या दिनमें शस्त्रसे मारू या इसको विषदू या पशुकी समान मारडालू” । यह उसके विचारकरनेपर देवशर्माके शिष्यका पुत्र कोई ग्रामसे निमन्त्रण करनेको आया और बोला-- “भगवन् ! यज्ञोपवीत देनेके निमित्त मेरे घर आइये”। यह सुन देवशर्मा आषाढभूतिके साथ प्रसन्न मन हो चला । तब उनके जातेमें कोई नदी आगे आई । उसको देखकर मात्राको बगलमेंसे निकाल गुदडीमें छिपाय रख स्नान- कर देवार्चनविधिकर आषाढभूतिसे यह बोला--“हे आषाढभूति ! जबतक मैं पुरीष त्यागन करआऊ तबतक यह मुझ योगेश्वरकी गुदडी सावधानतासे रक्षा करना” यह कह गया । आषाढभूतिभी उसके अदर्शन होनेमें उस मात्राको

(६४) पञ्चतन्त्रम् ।

(६४) पञ्चतन्त्रम् । लेकर पलायन करगया। देवशर्माभी शिष्यके गुणोंसे अनुरंजितमन होकर विश्वा- सकर जबतक स्थितरहा तबतक सुवर्णरोम (जन्तु) के यूथमें हुडनामक जीवका युद्ध देखने लगा। तब रोषके कारण दोनो हुड पीछे हटकर फिरभी बडे वेगसे आकर मस्तकमें प्रहार करते जिससे बडा रुधिर निकलता था। वहां एक गीदड जिह्वाके लौल्यसे रंगभूमिमें प्रवेशकर रुधिर खाता था। देवशर्माभी इसको देख- कर विचार करने लगा।"अहो यह गीदड मन्दमति है,यदि किसी प्रकारसे इन दोनोंके संघट्टमें प्राप्त होगा तो अवश्य मृत्युको प्राप्त होगा ऐसी मैं तर्कना कर- ताहूं"। उसीक्षणमें रुधिर आस्वादानकी चंचलतासे बीचमें प्रवेश करताहुआ उनके शिरके झटकेसे शृगाल मृतक भया, देवशर्माभी उसको सोचकरता हुआ धनका स्मरण कर शनैः २ चलकर जबतक आषाढभूतिको नहीं देखताहै तब- तक उत्कंठासे शौच करके ज्योंही गुदडीको देखा कि, उसमें मात्राको न पाया तब "हाय ! हाय ! मै ठगा गया" यह कहकर पृथ्वीमे मूर्च्छित हो गिरा। फिर चेतनताको प्राप्त होकर उठ श्वास लेने लगा "भो आषाढभूति ! मुझे ठगकर कहां गया ? मुझे उत्तर तो दे"इसप्रकार बहुत विलाप कर उसके पैरोंके चिन्हके अनुसरण क्रमसे खोजता हुआ शनैः २ चला। यौं जाताहुआ संध्यासमय किसी गांवमें प्राप्त हुआ, उस गांवसे कोई कौलिक स्त्रीके सहित मद्यपान किये नगरके समीप चलाथा। देवशर्माभी उसको देखकर बोला- "भो भद्र! हम सूर्योढ (सन्ध्या समय गृहस्थियोंके घरजानेवाले) अतिथि तुम्हारे निकट प्राप्त हुए हैं किसीको इस गांवमें नहीं जानते सो अतिथिधर्म स्वीकार कीजिये। कहाहै- संप्राप्तो योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिनाम् । पूजया तस्य देवत्वं प्रयान्ति गृहमेधिनः ॥ १८१ ॥ जो अतिथि गृहस्थियोके यहां संध्यासमय (सूर्यछिपनेके समय) प्राप्तहो गृहस्थी उसकी पूजाकरे तो देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥ १८१ ॥ तथाच- तैसेही- तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । सतामेतानि हर्म्येषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १८२ ॥ तृण, भूमि, जल और चौथी सत्य मधुर वाणी यह सत्पुरुषोंके घरसे कदा- चित् भी नष्ट नहीं होतीहैं ॥ १८२ ॥

स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः । पादशौचेन पितर अर्घाच्छम्भुस्तथातिथिः ॥ १८३ ॥ आइये ऐसा कहनेसे अग्नि, आसनसे इन्द्र, चरणधोनेसे पितर और अति- थिके अर्घ देनेसे शिवजी प्रसन्न होजातेहै ॥ १८३ ॥ कौलिकोऽपि तच्छ्रुत्वा भार्यामाह-“प्रिये ! गच्छ त्वमतिथिमादाय गृहं प्रति । पादशौचभोजनशयना- दिभिः सत्कृत्य त्वं तत्रैव तिष्ठ । अहं तव कृते प्रभूतं मद्य- मानेष्यामि” । एवमुक्त्वा प्रस्थितः । सापि भार्या पुंश्चली तमादाय प्रहसितवदना देवदत्तं मनसि ध्यायन्ती गृहं प्रति प्रतस्थे । अथवा साधु चेदमुच्यते- कौलिकभी यह वचन सुन अपनी स्त्रीसे बोला-“हे प्रिये ! तू इस अति- थिको लेकर घर जा चरणधोना भोजन शयनादिसे सत्कार करके घरही रह, और मैं तेरे निमित्त बहुतसी मद्य लाताहू” । यह कह चला । यह उसकी भार्या व्यभिचारिणी उसको ले हँसतीहुई देवदत्तका मनमे ध्यान करतीहुई घरको चली । अथवा सत्य कहाहै- दुर्दिंवसे घनतिमिरे दुःसञ्चरासु घनवीथिषु । पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघनचपलायाः ॥ १८४ ॥ मेघसे आच्छादित दिनमें, घन अंधकारमे, जहा किसीका प्रवेश न हो ऐसी गलियोमे, पतिके विदेश जानेमें, चपलजंघा (रतिप्रिया) स्त्रियोंको परम सुख होताहै ॥ १८४ ॥ तथाच- तैसेही- पर्यङ्केष्वास्तरणं पतिम्रनुकूलं मनोहरं शयनम् । तृणमिव लघु मन्यन्ते कामिन्यश्चौर्यरतलुब्धाः ॥१८५॥ पलंगपर सोना, पतिकी अनुकूलता, तथा मनोहर शयनको भी चौर्रतिकी लालची स्त्रियें तृणकी समान लघु मानतीहैं ॥ १८५ ॥ ५

( ६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ६६ ) पञ्चतन्त्रम् । तथाच- आरभी- केलिं प्रदहति लज्जा शृङ्गारोऽस्थीनि चाटवः कटवः। बन्धक्याः परितोषो न किञ्चिदिष्टं भवेत्पत्यौ ॥ १८६ ॥ कुलटाओंको लज्जा पतिमें क्रीडा जलाती है, शृंगार अस्थी, मनोहर वचन कटु लगते हैं, बहुत क्या कोईभी पतिमें इष्ट और परितोषता नहीं होती ॥१८६॥ कुलपतनं जनगर्हा बन्धनमपि जीवितव्यसन्देहम् । अङ्गीकरोति कुलटा सततं परपुरुषसंसक्ता ॥ १८७ ॥ कुलकी हीनता, मनुष्यों में निन्दा, बन्धन, जीवनमें सन्देह यह सब परपुरुषमें मन लगानेवाली कुलटा स्वीकार करलेती हैं ॥ १८७॥ अथ कौलिकभार्या गृहं गत्वा देवशर्मणे गतास्तरणां भग्नाञ्च खट्वाँ समर्प्य इदमाह- "भो भगवन् ! यावदहं स्व- सखीं ग्रामादभ्यागतां सम्भाव्य द्रुतमागच्छामि तावत्त्वया मद्गृहेऽप्रमत्तेन भाव्यम्" एवमभिधाय शृंगारविधिं विधाय यावद्देवदत्तमुद्दिश्य व्रजति तावत् तद्भर्त्ता सन्मुखो मदविह्व- लांगो मुक्तकेशः पदे पदे प्रस्खलन् गृहीतमद्यभाण्डः समभ्येति । तञ्च दृष्ट्वा सा द्रुततरं व्याघुट्य स्वगृहं प्रविश्य मुक्तशृंगार- वेशा यथापूर्वमभवत् । कौलिकोऽपि तां पलायमानां कृता- द्रुतशृंगारां विलोक्य प्रागेव कर्णपरम्परया तस्याः श्रुता- पवादक्षुभितहृदयः स्वाकारं निगूहमानः सदैवास्ते । ततश्च तथाविधं चेष्टितमवलोक्य दृष्टप्रत्ययः क्रोधवशगो गृहं प्रवि- श्य तामुवाच- "आः पापे ! पुंश्चलि ! क्व प्रस्थिताऽसि ?" सा प्रोवाच- "अहं त्वत्सकाशादागता न कुत्राचिदपि निर्गता। तत् कथं मद्यपानवशात् अप्रस्तुतं वदसि" अथवा साधु चेदमुच्यते- तब कौलिककी स्त्री घर जाय देवशर्मा यतिको बिछोने रहित भग्न (टूटी) खाटको समर्पण कर बोली- "भगवन् ! जबतक ग्रामसे आई हुई अपनी सखीसे कुशल कहकर शीघ्र आऊं तबतक तुम हमारे घरमें सावधानतासे रहना" । यह

उतार पूर्ववत् स्थित हुई । कौलिकभी उसे भागती हुई अद्भुत शृंगार किये

भाषाटीकासमेतम् । ( ६७ ) कह शृंगारकर जबतक देवदत्तके निकट चली कि, तबतक उसका भर्ता साम- नेसे मदसे विह्वल शरीर वाल खोले पग पगपर गिरता हुवासा मद्यका बर्तन ग्रहणकरे हुए आया । उसको देख वह बहुत } शीघ्र लौटकर तत्काल शृंगार उतार पूर्ववत् स्थित हुई । कौलिकभी उसे भागती हुई अद्भुत शृंगार किये देखकर प्रथम ही कर्णपरम्परासे उसकी निन्दासे क्षुभित हृदय हुआ अपने आकारको छिपाये हुए सदा स्थित रहताथा । उसकी इस प्रकारकी चेष्टाको देख उसबातका विश्वासकर क्रोधसे घरमे प्रवेश कर उससे बोला- “आः पापे व्यभिचारिणी,! कहा जाती है ?” वह बोली- “मैं तुम्हारे पाससे आकर कहींभी नहीं निकली, सो किसप्रकार मद्यपान करके अप्रस्तुत वचन बोलते हो” । अथवा सत्य कहा है- वैकल्यं धरणीपातमयथोचितजल्पनम् । सन्निपातस्य चिह्नानि मद्यं सर्वाणि दर्शयेत् ॥ १८८ ॥ विकलता, धरणीपर गिरना, जो मनमे आवे सो वकना, यह सन्निपातके चिन्ह मद्यंम सब स्थित रहते हैं ॥ १८८ ॥ करस्पन्दोऽम्बरत्यागस्तेजोहानिः सरागता । वारुणीसंगजावस्था भानुनाप्यनुभूयते ॥ १८९ ॥ हाथमें कंपकपी, वस्त्रत्याग, तेजहानि, रागता, यह वारुणीपानकी अवस्था सूर्य्यसे भी अनुभव कीजाती है, अन्यकी कौन कहै पश्चिम दिशामें अस्त होते समय सूर्य्यकी यही दशा होतो है ॥ १८९ ॥ सोऽपि तच्छ्रुत्वा प्रतिकूलवचनं वेशविपर्य्ययं च अव- लोक्य तामाह- “पुंश्चलि ! चिरकालं श्रुतो मया तव अपवादः । तदद्य स्वयं सञ्जातप्रत्ययः तवं यथोचितं निग्रहं करोमि” इति अभिधाय लगुडप्रहारैः तां जर्जरितदेहां विधाय स्थू- णया सह दृढबन्धनेन बद्ध्वा सोऽपि मदविह्वलो निद्रावश- मगमत् । अत्रान्तरे तस्याः सखी नापिती कौलिकं निद्रा- वशगतं विज्ञाय तां गत्वा इदमाह- “सखि ! स देवदत्तः तस्मिन् स्थाने त्वां प्रतीक्षते तच्छीघ्रमागम्म्यताम् ॥” इति । सा च आह- “पश्य मम अवस्थाम् । तत्कथं गच्छामि ? तद्गत्वा

ब्रूहि तं कामिनं यदस्यां रात्रौ न त्वया सह समागमः” । नापिती प्राह- “सखि । मामैवं वद । न अयं कुलटाधर्मः । उक्तञ्च- वहभी यह वचन सुन प्रतिकूल वचन और बालोंका बिखरना देख उससे बोला- “पुंश्चलि ! बहुत दिनोंमें मैंने तेरा अपवाद सुनरखा है, सो आजदिन स्वयं देखकर विश्वास आगया है अब तेरा यथोचित दण्ड करता हूं,” वह कह लकड़ीके प्रहारसे उसकी जर्जरित देह ( चूर्ण ) करके स्तम्भमें दृढ बांधकर मदविह्वल हो निद्राके वशीभूत हुआ, इसी समय उसकी सखी नायन कौलिकको निद्राके वशीभूत हुआ जानकर जाकर उससे यों बोली--“सखी देवदत्त उस स्थानमे तेरी वाट देख रहा है सो शीघ्र जाओ” वह बोली-, “मेरी अवस्था तो देख भला मै कैसे जासक्ती हूं ? सो तूही जाकर उस कामीसे कह आजकीरात तुम्हारे सग समागम न होगा” नायन बोली--“सखी ऐसा मत कह, यह कुलटाओंका धर्म नहीं है । कहा है- विषमस्थस्वादुफलग्रहणव्यवसायनिश्चयो येषाम् । उष्ट्राणामिव तेषां मन्येऽहं शंसितं जन्म ॥ १९० ॥ कठिन स्थानमें स्थित स्वादु फलके ग्रहण करनेका जिनका निश्चय है उन्हीका जन्म मैं ऊंटोंकी समान प्रशंसित मानती हूं ॥ १९० ॥ तथाच- तैसेही- सन्दिग्धे परलोके जनापवादे च जगति बहुचित्रे । स्वाधीने पररमणे धन्यास्तारुण्यफलभाजः ॥ १९१ ॥ परलोकमें सन्देह है, जनापवाद चित्र विचित्र होता है, दूसरेसे रमण करना स्वाधीन है युवावस्थाके फल भोगनेवाली स्त्री धन्य हैं ॥ १९१ ॥ यदि भवति दैवयोगात्पुमान् विरूपोऽपि बन्धकीरहसि । न तु कृच्छ्रादपि भद्रं निजकान्तं सा भजत्येव ॥ १९२ ॥ औरभी यदि दैवयोगसे पुरुष कुरूपभी एकान्तमे प्राप्तहो तथापि वह कष्टको प्राप्त हुई सुन्दरभी अपने पतिका भजन नहीं करती है ॥ १९२ ॥

भाषाटीकासमेतम् ! ( ६९ ) सा अब्रवीत्- "यदि एवं तर्हि कथय कथं दृढबन्धनबद्धा सती तत्र गच्छामि ?। सन्निहितश्चार्य पापात्मा मत्पतिः" । नापिंती आह- "सखि ! मद्विह्वलोऽयं सूर्य्यकरस्पृष्टः प्रबोधं यास्यति । तदहं त्वामुन्मोचयामि । मामात्मस्थाने बद्ध्वा द्रुततरं देवदत्तं सम्भाव्य आगच्छ" । सा अब्रवीत्- "एव- मस्तु" इति । तदनु सा नापिती तां स्वसखीं बन्धनाद्वि- मोच्य तस्याः स्थाने यथापूर्वमात्मानं बद्ध्वा तां देवदत्तसकाशे सङ्केतस्थानं प्रेषितवती । तथाऽनुष्ठिते कौलिकः कस्मिंश्चि- त्क्षणे समुत्थाय किञ्चिद्गतकोपो विमदस्तामाह,- "हे परु- षवादिनि ! यदि अद्यप्रभृति गृहान्निष्क्रमणं न करोषि न च परुषं वदसि ततः त्वामुन्मोचयामि" । नापिती अपि स्वरभेदभयात् यावन्न किञ्चित् ऊचे तावत् सोऽपि भूयोभूयस्तां तदेव आह । अथ सा यावत् प्रत्युत्तरं किमपि न ददौ तावत् स प्रकुपितस्तीक्ष्णशस्त्रमादाय नासिकामच्छिनत् आह च-"रे पुंश्चलि ! तिष्ठ इदानीं न त्वां भूयस्तोषयिष्यामि"इति जल्पन् पुनरपि निद्रावशमग- मत् । देवशर्मा अपि वित्तनाशात् क्षुत्क्षामकण्ठो नष्टनिद्र- स्तत्सर्वं स्त्रीचरित्रमपश्यत् । सापि कौलिकभार्य्या यथेच्छया देवदत्तेन सह सुरतसुखमनुभूय कस्मिंश्चित् क्षणे स्वगृहमा- गत्य तां नापितीमिदमाह- "अयि ! शिवं भवत्याः । नायं पापात्मा मम गताया उत्थितः?" । नापिती आह- "शिवं नासिकया विना शेषस्य शरीरस्य । तद् द्रुतं मां मोचय बन्धनात्, यावन्नायं मां पश्यति येन स्वगृहं गच्छामि" । तथा अनुष्ठिते भूयोऽपि कौलिक उत्थाय तामाह-"पुंश्चलि ! किमद्यापि न वदसि । किं भूयोऽप्यतो दुष्टतरं निग्रहं कर्ण- च्छेदेन करोमि" । अथ सा सकोपं साक्षेपमिदमाह- "धिक् धिक् महामूढ ! को मां महासतीं धर्षयितुं व्यंग- यितुं वा समर्थः । तत् शृण्वन्तु सर्वेऽपि लोकपालाः ।

( ७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

वह बोली-"यदि ऐसा है बता किसप्रकारसे मै दृढ बंधनमें बँधी हुई वहां जाऊं ? और यह पापात्मा मेरा पति समीपमें है"। नायन बोली-"सखी ! मदसे विह्वल हुआ यह सूर्य निकलनेपर जागेगा। सो मैं तुझे खोले देतीहूं, मुझे अपने स्थानमें बाँधकर बहुत शीघ्र देवदत्तका मन मनाकर आ" वह बोली-"ऐसाही हो" तब यह नायन उस अपनी सखीको बन्धनसे खोल उसके स्थानमें यथापूर्व अपनी आत्माको बांधकर उसको देवदत्तके निकट संकेत स्थानमें भेजती हुई। ऐसा होनेपर कौलिक कुछ काल उपरान्त उठकर कुछगतकोप और मद उतरनेसे बोला-"हे कठोरवादिनि ! यदि आजसे लेकर तू घरसे न निकले तो तुझे खोलदूं" नायनभी स्वरभेदके भयसे जबतक कुछ नहीं बोलती तबतक वहभी वारंवार उससे यही कहने लगा और जब उसने कुछभी उत्तर नदिया तब वह क्रोधकर तीक्ष्ण छुरी लेकर उसकी नाककाटता हुआ और बोला-"कुलटा ! ठहर फिर नै तुझको संतुष्ट करूंगा" यह कहकर सोगया। देवशर्माभी धनके नाशसे क्षुधासे शुष्ककंठ हुआ निद्रा रहित होकर यह सब स्त्रीचरित्र देखता रहा था, और वह कौलिकभार्या यथेच्छ देवदत्तके संग सुरतका सुख अनुभव कर कुछ काल उपरान्त घर आकर उस नायनसे बोली-"कहो तुम्हारे कुशल है ? अयि ! तुम्हारी कुशल है ? मेरे जानेपर यह पापात्मा उठा तो नहीं" नायन बोली- "नासिकाके बिना और सब शरीरमें कुशल है, सो शीघ्र मुझे बन्धनसे खोल जबतक यह मुझे न देखे जिससे मैं अपने घर चली जाऊं" ऐसा करनेपर फिरभी कौलिक उठकर बोला-"पुंश्चलि ! क्या अबभी नहीं, बोलती क्या अब फिर कठिन दण्ड कर्णछेदनका तुझको करूं"। तब वह क्रोध और आक्षेपके सहित यह बोली,-"धिक् धिक् महामूढ ! कौन मुझ महासतीको धर्षण करनेका अथवा व्यंग ( शरीरछेदन ) करनेको समर्थ है। सो सब लोकपाल सुनें- आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ १९३ ॥ सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात, दोनों संध्या और धर्म मनुष्यका वृत्त जानते हैं ॥ १९३ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ७१ )

तद्यदि मम सतीत्वमस्ति मनसापि परपुरुषो नाभिल- षितः ततो देवा भूयोऽपि मे नासिकां तादृग्रूपामक्षतां कुर्वन्तु । अथवा यदि मम चित्ते परपुरुषस्य भ्रान्तिरपि भवति मां भस्मसान्नयन्तु” । एवमुक्त्वा भूयोऽपि तमाह— “भो दुरात्मन् ! पश्य मे सतीत्वप्रभावेण तादृशी एव नासिका संवृत्ता” । अथ असा उल्मुकमादाय यावत्पश्यति तावत् तद्रूपां नासिकाञ्च भूतले रक्तप्रवाहञ्च महान्तमप- श्यत् । अथ स विस्मितमनास्तां बन्धनाद्विमुच्य शय्यायामा- रोप्य च चाटुशतैः पर्य्यतोषयत् । देवशर्मा अपि तं सर्ववृत्ता- न्तमालोक्य विस्मितमना इदमाह— सो यदि मेरा सतीत्व है और मनसेभी परपुरुषका अभिलाष नहीं कियाहै तो देवता फिरभी मेरी नासिकाको उसी प्रकारकी अक्षत करदें । अथवा यदि मेरे चित्तमें परपुरुषकी भ्रान्तिभी हो तो मुझको भस्म करदें”। यह कह फिर उससे बोली,—“भो दुरात्मन् ! देख मेरे सतीत्वके प्रभावसे फिर वैसीही नासिका होगई” तब यह दीपक लेकर देखनेलगा तो उसी प्रकारकी उसकी नासिका और पृथ्वीमें रक्तप्रवाह बहुत देखता भया। तब यह विस्मितमन होकर उस बन्ध- नसे खोल शय्यामें आरोपणकर सैकडों मनोहर वचनोंसे उसको सन्तुष्ट करता- हुआ । देवशर्माभी इस सब वृत्तान्तको देखकर विस्मयको प्राप्त होकर यह बोला- “शम्बरस्य च या माया या माघा नमुचेरपि । बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥ १९४ ॥ “जो शम्बरकी मायाहै, जो नमुचिकी मायाहै, बलि और कुम्भीनसकी जो मायाहै वे सब माया स्त्रियें जानतीहैं ॥ १९४ ॥ हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्त्यपि । अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णन्ति कालयोगतः ॥ १९५ ॥ यह हँसते हुएके साथ हँसती, रोते हुएके साथ रोती, समय योगसे अनुरक्त जनको प्रियवचनोंसे ग्रहण करती हैं ॥ १९५ ॥ उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः । स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तस्माद्रक्ष्याः कथं हि ताः ॥ १९६॥

(७२) पञ्चतन्त्रम् ।

(७२) पञ्चतन्त्रम् । जो शास्त्र शुक्र जानताहै और जो शास्त्र बृहस्पति जानता है वह स्त्रीकी बुद्धिमें कुछ विशेष नहीं है इस कारण उन स्त्रियोंकी कैसे रक्षा हो ॥ १९६ ॥ अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् । इति यास्ताः कथं धीरैः संरक्ष्याः पुरुषैरिह ॥ १९७ ॥ जो असत्यको सत्य और सत्यको असत्य कहती हैं धीर पुरुष इस संसारमें उनकी किस प्रकार रक्षा कर सकते हैं ॥ १९७ ॥ अन्यत्रापि उक्तम्- और स्थानमे भी कहाहै- नातिप्रसंगः प्रमदासु कार्यो नेच्छेद्वलं स्त्रीषु विवर्द्धमानम् । अतिप्रसक्तैः पुरुषैर्युतास्ताः क्रीडन्ति काकैरिव लूनपक्षैः १९८ स्त्रियोंमे अतिप्रसंग न करे और उनका बल बढने नदे कारण अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंखतुचे कौवोंकी समान क्रीडा करती हैं ॥ १९८ ॥ सुमुखेन वदन्ति वल्गुना प्रहरन्त्येव शितेन चेतसा । मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदये हालहलं महद्विषम् १९९ सुन्दर मुखसे मनोहर बोलतीहैं, तीक्ष्ण चित्तसे प्रहार करती हैं स्त्रियोंके वच- नमें मधु और हृदयमें हलाहल विष रहताहै ॥ १९९ ॥ अतएव निपीयतेऽधरो हृदयं मुष्टिभिरेव ताड्यते । पुरुषैः सुखलेशवञ्चितैर्मधुलुब्धैः कमलं यथालिभिः २००॥ इसी कारण उनके अधर पिये जाते हैं और हृदय मुष्टियोंसे ताडन किया जाता है, सुखलेशसे वञ्चित हुए पुरुषोंसे, मधुसे लुब्ध हुए भौरों द्वारा कमलकी समान ( भोग किया जाता है ) ॥ २०० ॥ अपिच- और भी कहतेहैं- आवर्त्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्ग्राह्यं यन्महद्भिर्नरवरवृषभैः सर्वमायाकरण्डं स्त्रीयन्त्रं केन लोके विषममृतयुतं धर्मनाशाय सृष्टम् २०१॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ७३ ) संदेहोंका आवर्त ( भौर ), अविनयका घर, साहसका पत्तन ( नगर ), दोषोंका स्थान, कपटका शतगृह, अविश्वासका क्षेत्र, बडे नरपुरुषोंसे ग्रहण करनेको असमर्थ, सब मायाकी पोटली स्त्रीरूपी यन्त्र जो विष और अमृतसे युक्त है सो धर्म नाशके लिये किसने निर्माण की है ? ॥ २०१ ॥ कार्कश्यं स्तनयोर्हशोस्तरलतालीकं मुखे दृश्यते कौटिल्यं कचसञ्चये प्रवचने मान्द्यान्त्रिके स्थूलता । भीरुत्वं हृदये सदैव कथितं मायाप्रयोगः प्रिये यासां दोषगणो गुणा मृगदृशां ताः किं नराणां प्रियाः२०२ स्तनोंमें कठिनता, नेत्रोंमें चंचलता, मुखमें असत्य, बालसमूहमें कुटिलता, वचनमें मधुरता, नितम्बोंमें स्थूलता, हृदयमें भय, स्वामीमें मायापूर्वक वचनोंका कहना, इस प्रकारके जिनके दोष गुणनामसे ग्रहण किये जाते हैं, क्या वह मनुष्योंकी प्रिया हैं ? अर्थात् नहीं हैं ॥ २०२ ॥ एता हसन्ति च रुदन्ति च कार्यहेतो- र्विश्वासयन्ति च परं न च विश्वसन्ति । तस्मान्नरेण कुलशीलवता सदैव नार्य्यः श्मशानवटिका इव वर्जनीयाः ॥ २०३ ॥ यह कार्यके निमित्त हँसती और रोती हैं, विश्वास करकेभी यह विश्वासको प्राप्त नहीं होती हैं इसकारण कुलशीलवाले मनुष्यको श्मशानके वटवृक्षकी समान सदा स्त्रियें वर्जनीय हैं ॥ २०३ ॥ व्याकीर्णकेशरकरालमुखा मृगेन्द्रा नागाश्च भूरिमदराजिविराजमानाः । मेधाविनश्च पुरुषाः समरेषु शूराः स्त्रीसन्निधौ परमकापुरुषा भवन्ति ॥ २०४ ॥ बिखरे हुए गरदनके बालोंसे करालमुखसिंह, अत्यन्त मदसमूहसे विराज- मानहाथी तथा बुद्धिमान् समरशूर, पुरुष भी स्त्रीके निकट परम कायर होजाते हैं ॥ २०४ ॥ कुर्वन्ति तावत्प्रथमं प्रियाणि यावन्न जानन्ति नरं प्रसक्तम् ।