प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
प्रस्तावना एवं ग्रन्थोद्देश्य
स्वर्गवासी साधुचरित श्रीमान् डालचन्दजी सिंघी
सिंघी जैन ग्रन्थमाला तृतीय (३) मणि SRI DALCANDJI SINGHI श्री डालचन्दजी सिंघी श्रीमेरुतुङ्गाचार्यरचित प्रबन्ध चिन्तामणि [ हिन्दी भाषान्तर ]
सिंघी जैन ग्रन्थमाला जैन आगमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, कथात्मक-इत्यादि विविधविषयगुम्फित प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, प्राचीनगूर्जर, राजस्थानी आदि नाना भाषानिबद्ध बहु उपयुक्त पुरातनवाङ्मय तथा नवीन संशोधनात्मक साहित्यप्रकाशिनी जैन ग्रन्थावलि । कलकत्तानिवासी स्वर्गस्थ श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी की पुण्यस्मृतिनिमित्त तत्सुपुत्र श्रीमान् बहादुरसिंहजी सिंघी कर्तृक संस्थापित तथा प्रकाशित संपादक तथा सञ्चालक जिन विजय मुनि [ सम्मान्य सभासद-भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर पूना, तथा गुजरात साहित्यसभा अहमदाबाद; भूतपूर्वाचार्य-गुजरात पुरातत्त्वमन्दिर अहमदाबाद; जैनवाङ्मयाध्यापक विश्वभारती, शान्तिनिकेतन; पुरातत्त्वादि-प्रधानाध्यापक भारतीय विद्या भवन बंबई, तथा, जैन साहित्यसंशोधक ग्रन्थावलि- पुरातत्त्वमन्दिर ग्रन्थावलि-भारतीय विद्या ग्रन्थावलि-अन्तर्गत संस्कृत-प्राकृत-पाली- अपभ्रंश-प्राचीनगूर्जर-हिन्दी-आदि भाषामय अनेकानेक ग्रन्थ संशोधक-सम्पादक । ] ग्रन्थांक ३ प्राप्तिस्थान व्यवस्थापक - सिंघी जैन ग्रन्थमाला अनेकान्त विहार, ९, शान्तिनगर; पो० साबरमती, अहमदाबाद } ☞ { सिंघी सदन, ४८, गरियाहाट रोड; पो० बालीगंज, कलकत्ता स्थापनाब्द ] सर्वाधिकार सुरक्षित [ वि० सं० १९८६
श्री मेरुतुङ्गाचार्यविरचित प्रबन्धचिन्तामणि संस्कृत ग्रन्थका हिन्दी भाषान्तर अनुवादक पं० हजारीप्रसादजी द्विवेदी [ आचार्य-हिन्दी शिक्षापीठ, विश्वभारती, शान्तिनिकेतन ] सम्पादक जिन विजय मुनि [ प्राकृत भाषादि प्रधानाध्यापक-भारतीय विद्या भवन, बम्बई; सम्पादक-भारतीय विद्या-त्रैमासिक पत्रिका-इत्यादि ] प्रकाशन-कर्ता संचालक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला अहमदाबाद-कलकत्ता विक्रमाब्द १९९७ ] प्रथमावृत्ति, पञ्चशत प्रति । [ १९४० ख्रिष्टाब्द
प्रबन्धचिन्तामणिकी संकलना । इस ग्रन्थका संकलन और प्रकाशन निम्न प्रकारसे, ५ भागोंमें, पूर्ण होगा। (१) प्रथम भाग- भिन्न भिन्न प्रतियोंके आधारपर संशोधित - विविध पाठान्तर समवेत - मूल ग्रन्थ; १ परिशिष्ट; मूलग्रन्थ और परिशिष्टमें आये हुये संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषामय पद्योंकी अकारादिक्रमानुसार सूचि; पाठ संशोधनके लिये काममें लाई गई पुरातन प्रतियोंका सचित्र वर्णन । ( छप गया ) (२) द्वितीय भाग- प्रबन्धचिन्तामणिगत प्रबन्धोंके साथ सम्बन्ध और समानता रखनेवाले अनेकानेक पुरातन प्रबन्धोंका संग्रह; पद्यानुक्रमसूचि; विशेषनामानुक्रम; विस्तृत प्रस्तावना और प्रबन्ध संग्रहोंकी मूल प्रतियोंका सचित्र परिचय । (छप गया ) (३) तृतीय भाग- प्रबन्ध चिन्तामणिके मूल संस्कृतका शुद्ध और सरल संपूर्ण हिन्दी भाषान्तर, विशिष्ट प्रास्ताविक वक्तव्यके साथ । ( प्रस्तुत ग्रन्थ ) (४) चतुर्थ भाग- पुरातन-प्रबन्ध-संग्रह नामक द्वितीय भागका संपूर्ण हिन्दी भाषान्तर । ( छप रहा है ) (५) पञ्चम भाग - दो विभागोंमें (१) पहले विभागमें - शिलालेख, ताम्रपत्र, पुस्तक प्रशस्ति आदि जितने समकालीन साधन और ऐतिह्य प्रमाण उपलब्ध होते हैं उनका एकत्र संग्रह और रूपरिचायक उपयुक्त विस्तृत विवेचन; प्राक्कालीन और पश्चात्कालीन अन्यान्य ग्रन्थोंमें उपलब्ध प्रमाणभूत प्रकरणों, उल्लेखों और अवतरणोंका संग्रह; कुछ शिलालेख, ताम्रपत्र और प्राचीन ताडपत्रोंके चित्र - इत्यादि । (२) दूसरे विभागमें - प्रबन्धचिन्तामणिग्रथित सब विषयोंका विवेचन करनेवाली विस्तृत प्रस्तावना - जिसमें तत्कालीन ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक और राजकीय परिस्थितिका सविशेष ऊहापोह और सिंहावलोकन किया जायगा । साथमें प्राचीन मन्दिर, मूर्तियां, पोथियां इत्यादिके अनेक चित्र भी दिये जायँगे ।
समर्पण * परमधामप्रस्थित पितृपादकी पुण्यप्रतिमाको प्रणति पूर्वक
प्रबन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम प्रास्ताविक वक्तव्य .... .... .... .... .... पृ. क-ठ
- प्रथम प्रकाश - प्रारम्भिक मंगलादि कथन .... .... .... ... १-२ १ विक्रमार्क राजाका प्रबन्ध .... .... .... .... ३-११ ( १ ) महाकवि कालिदासकी उत्पत्तिका प्रबन्ध .... .... ५ ( २ ) सुवर्णपुरुषकी सिद्धिका प्रबन्ध .... .... .... ७ ( ३ ) विक्रमादित्यके सत्त्वका प्रबन्ध .... .... .... ८ ( ४ ) सत्त्वपरीक्षाका प्रबन्ध .... .... .... .... " ( ५ ) विद्यासिद्धिका प्रबन्ध .... .... .... .... " ( ६ ) निर्गर्वताका प्रबन्ध .... .... .... .... १० २ सातवाहन राजाका प्रबन्ध .... .... .... १२-१३ ३ शीलव्रतके विषयमें भूपराजका प्रबन्ध .... .... .... १४ ४ वनराजादि प्रबन्ध .... .... .... १५-१८ चावडा वंशकी राज्यसंवत्सरावलि .... .... .... .... -
- चौलुक्य वंशका प्रारंभ - ५ मूलराजका प्रबन्ध .... .... .... १९-२४ लाखाकी उत्पत्ति और विपत्तिका प्र० .... .... २३-२४ मूलराजके वंशजोंकी राज्यसंवत्सरावलि .... .... .... २५ ६ मुंजराज प्रबन्ध .... .... .... २७-३२
- दूसरा प्रकाश - ७ भोज और भीमका प्रबन्ध .... .... .... ३३-६३ ( १ ) भोजका विद्याविलास .... .... ३३-३६ ( २ ) भोजकी गुजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्द्धा .... .... ३७ ( ३ ) राजा भोजकी गुजरातपर आक्रमण करनेकी इच्छा .... .... ३९ ( ४ ) दिगंबर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना .... .... .... ४१ ( ५ ) कुलचन्द्रकी गुजरातपर चढ़ाई .... .... .... " ( ६ ) महाकवि माघका प्रबन्ध .... .... .... ४३ ( ७ ) महाकवि धनपालका प्रबन्ध .... .... ४५-५३ ( ८ ) सर्वदर्शनोंसे सत्यमार्गकी पृच्छा .... .... .... " ( ९ ) शीता पण्डिताका प्रबन्ध .... .... .... .... "
प्रबन्धचिन्तामणि (१०) मयूर, बाण और मानतुङ्गाचार्यका प्र० .... .... .... ५४ (११) गूर्जर देशकी विदग्धताका प्र० .... .... .... ५६ (१२) अनित्यता संबंधी ४ श्लोकोंका प्र० .... .... .... ५७ (१३) भोजका भीमके पास ४ वस्तुयें माँगना .... .... .... ,, (१४) बिजौरे नींबूका प्र० .... .... .... ५८ (१५) 'एक अच्छा नहीं है' प्र० .... .... .... ५९ (१६) इक्षुरसका प्रबन्ध .... .... .... ,, (१७) घुड़सवारीका प्रबन्ध .... .... .... ,, (१८) गोपगृहिणीका प्रबन्ध .... .... .... ६० (१९) भोज और कर्णका संघर्ष .... .... .... ,, (२०) कर्णसे भीमका आधा भाग लेना .... .... .... ६३
- तीसरा प्रकाश - ८ सिद्धराजादि प्रबन्ध .... ... .... .... ६४-९१ (१) मूलराज कुमारकी प्रजावत्सलताका प्रबन्ध .... .... ६४ (२) कर्णराजा और मयणल्ला देवीका वृत्तान्त .... .... ६५ (३) सिद्धराज जयसिंहका जन्म .... .... .... ६६ (४) सिद्धराजका राज्य-वर्णन - लीला वैयका प्रबन्ध .... .... ६७ (५) उदयन मंत्रीका प्रबन्ध .... .... .... ,, (६) सान्तू मंत्रीका प्रबन्ध .... .... .... ६८ (७) मयणल्ला देवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना .... .... ,, (८) सिद्धराजका मालवाके साथ संघर्ष .... .... ६९ (९) सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मीलन .... .... ७१ (१०) सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना .... .... ७२ (११) ,, पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना .... .... ७३ (१२) ,, सौराष्ट्रके राजा खंगारको विजय करना .... ७६ (१३) ,, शत्रुंजयकी यात्रा करना .... .... .... ७७ (१४) वादी श्रीदेवसूरिका चरित्र वर्णन .... .... ७८-८२ (१५) पत्तनके वसाह आंबडका वृत्तान्त .... .... .... ८२ (१६) सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समान दृष्टि .... ८३ (१७) सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार .... .... ८४ (१८) लक्षाधिपतिको क्रोड़पति बना देना .... .... ,, (१९) सिद्धपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना .... .... ८५ (२०) वाराहीके पटेलोंको मूचाका विरुद देना .... .... ,, (२१) उंझाके ग्रामणींसे वार्तालाप .... .... ... ,,
प्रबन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम (२२) झालासामन्त भांगूकी शूरताका वर्णन .... .... .... ८६ (२३) सिद्धराजकी सभामें म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन .... .... ८७ (२४) सिद्धराजका कोल्हापुरके राजाको चमत्कारके भ्रममें डालना .... ” (२५) कौतुकी सीलणकी वाक्चातुरी .... .... .... ” (२६) काशीराज जयचन्द्रकी सभामें सिद्धराजके दूतकी वाक्पटुता .... ८८ (२७) मयणल्लदेवीके पिताकी मृत्युवार्त्ता .... .... .... ” (२८) पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना .... ८९ (२९) सान्तू मंत्रीकी बुद्धिमत्ताका एक प्रसंग .... .... .... ” (३०) सिद्धराजके एक सेवकके भाग्यका वृत्तान्त .... .... ” (३१) सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकल पद्य .... .... .... ९०
- चतुर्थ प्रकाश - ९ कुमारपालादि प्रबन्ध .... .... .... ९३-१२१ (१) कुमारपालके पूर्वजादि .... .... .... ९३ (२) सिद्धराजके भयसे कुमारपालका मारे मारे फिरना .... .... ९४ (३) कुमारपालका राजगद्दीपर बैठना .... .... .... ९५ (४) कुमारपालने राजद्रोहियोंका उच्छेद किया .... .... ” (५) कुमारपालका चाहमान राजा आनाकके साथ युद्ध १.... ... ” (६) कुमारपालका उपकारियोंको सत्कृत करना .... .... ९६ (७) गायक सोलाककी कलाप्रवीणता .... .... .... ९७ (८) कौंकणके राज! मल्लिकार्जुनका मंत्री आंबड द्वारा उच्छेद .... ” (९) कुमारपालके साथ हेमचन्द्राचार्यके समागमका प्रसंग .... ९८ (१०) हेमाचार्यके समागमसे कुमारपालके पुरोहितका विद्वेष .... ९९ (११) कुमारपालका सोमेश्वर तीर्थके जीर्णोद्धारका प्रारंभ करवाना .... १०० (१२) ” उदयनमंत्रीसे हेमाचार्यका जीवनवृत्तान्त पूछना .... १०१ (१३) ” सोमेश्वरके उद्धारकी समाप्तिके निमित्त नियम लेना १०२ (१४) हेमचन्द्राचार्यका सोमेश्वरकी यात्रानिमित्त कुमारपालके साथ जाना ” (१५) हेमाचार्यका शिवकी स्तुति-पूजा करना .... ” (१६) कुमारपालकी तत्त्वजिज्ञासा और हेमाचार्यका शिवको प्रत्यक्ष करना १०३ (१७) कुमारपालका परमार्हत श्रावक बनना .... .... १०४ (१८) मंत्री उदयनका सौराष्ट्रके युद्धमें मारा जाना .... .... ” (१९) मंत्री बाहडका शत्रुंजयतीर्थोद्धार करवाना .... ... १०५ (२०) मंत्री आग्भटका शकुनिकाविहारका उद्धार करवाना .... १०६ (२१) आग्भटका शाकिनीग्रस्त होना .... .... .... ”
प्रबन्धचिन्तामणि (२२) कुमारपालका विद्याध्ययन करना .... .... .... १०७ (२३) बनारसके विश्वेश्वर कविका पत्तनमें आना .... .... ,, (२४) हेमचन्द्रसूरिका समस्यापूरण करना .... .... ... १०८ (२५) आचार्य और मंत्रीके बीचमें 'हरडइ' का वाग्विास .... ,, (२६) उर्वशी शब्दकी व्युत्पत्ति .... .... ... .... १०९ (२७) सपादलक्षके राजाके नागका अर्थखंडन .... ... १०२ (२८) पं. उदयचन्द्रका प्रबन्ध .... .... .... १०९ (२९) कुमारपालका अभक्ष्य भक्षणके निमित्त प्रायश्चित्त करना .... ११० (३०) कुमारपालका अन्यान्य विहारोंका बनवाना .... .... ,, (३१) यूकाविहारका प्रबन्ध .... .... .... ,, (३२) साटिमवसतिके उद्धारका प्रबन्ध .... .... .... १११ (३३) मठपति बृहस्पतिका अभिनय ... .... .... ,, (३४) मंत्री आलिंगकी स्पष्टवादिता .... .... .... ,, (३५) पं० वामराशिको क्षमाप्रदान करना .... .... .... ,, (३६) सोरठके दो चारणोंकी कविताविषयक स्पर्धा .... .... ११२ (३७) कुमारपालका तीर्थयात्रा करना .... .... .... ११३ (३८) ,, स्वर्णसिद्धिकी इच्छा करना .... .... .... ,, (३९) मंत्री चाहडका दानीपना .... .... .... ११४ (४०) कुमारपाल द्वारा राणा लवणप्रसादका भविष्यकथन .... ११५ (४१) हेमचन्द्रसूरिको लूतारोग लगना .... .... .... ११६ (४२) हेमचन्द्रसूरि और कुमारपालका स्वर्गवास .... .... ,, (४३) अजयपालका राज्याभिषेक ... .... .... ११७ (४४) ,, जैन मन्दिरोंका नाश करवाना .... .... ,, (४५) ,, कपर्दी मंत्रीको मरवा डालना .... .... ११८ (४६) महाकवि रामचन्द्रकी हत्या .... .... .... ११९ (४७) मंत्री आम्रभटका लडते हुए मरना ... .... .... ,, (४८) अजयपालकी सन्तानोंका उल्लेख .... .... .... ,, (४९) वीरधवलका प्रादुर्भाव .... .... .... १२० १० मंत्री वस्तुपाल-तेजपालका प्रबन्ध .... .... १२१-१३० (१) वस्तुपाल-तेजपालकी जन्मवार्ता .... .... .... १२१ (२) वीरधवलका तेजपालको अपना मंत्री बनाना .... .... ,, (३) मंत्री तेजपालका धर्मभावसम्मुख होना .... .... .... ,, (४) वस्तुपालकी तीर्थयात्राका वर्णन .... .... .... १२३ (५) मंत्री तेजपालका आबू पर मन्दिर बनवाना ... .... १२५ (६) वस्तुपालका शंखराजके साथ युद्ध करना .... .... १२६
प्रबन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम ( ७ ) मंत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्रीका सम्बन्ध बान्धना .... १२७ ( ८ ) अनुपमाकी दानशीलता .... .... .... .... १२८ ( ९ ) वीरधवलकी रणशूरता .... .... .... .... ,, ( १० ) वीरधवलकी मृत्यु .... .... .... .... १२९ ( ११ ) अनुपमाकी मृत्यु .... .... .... .... ,, ( १२ ) वस्तुपालकी मृत्यु .... .... .... .... ,,
- पञ्चम प्रकाश - ११ प्रकीर्णक प्रबन्ध .... .... , .... .... १३१-१५२ ( १ ) विक्रमादित्यकी पात्र परीक्षा .... .... .... .... १३१ ( २ ) मरे हुए नन्दका पुनर्जीवन .... .... .... .... ,, ( ३ ) राजा शिलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रबन्ध .... .... १३२ ( ४ ) बौद्ध और जैनोंमें वाद-विवाद .... .... .... ,, ( ५ ) वलभी नगरीके विनाशकी कथा .... .... .... १३३ ( ६ ) श्री पुंजराजकी उत्पत्ति .... .... .... .... १३४ ( ७ ) श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन .... .... .... १३५ ( ८ ) चोड देशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण .... १३६ ( ९ ) पुण्यसार राजाका वृत्तान्त .... .... .... .... १३७ ( १० ) कर्मसार राजाका प्रबन्ध .... .... .... .... ,, ( ११ ) राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबन्ध .... .... १३८ ( १२ ) काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध .... .... .... १३९ ( १३ ) जगदेव क्षत्रियका प्रबन्ध .... .... .... १४१ ( १४ ) पृथ्वीराजके तुंग सुभटका प्रबन्ध .... .... .... १४३ ( १५ ) पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना .... .... १४४ ( १६ ) कौंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई .... .... .... १४५ ( १७ ) ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रबन्ध .... .... .... ,, ( १८ ) सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त .... .... .... १४७ ( १९ ) स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव .... .... .... १४८ ( २० ) कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन .... .... .... ,, ( २१ ) वाग्भट वैद्यका प्रबन्ध .... .... .... .... १४९ ( २२ ) गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बरमें लड़ाई .... .... १५० ( २३ ) सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना .... .... १५१ ( २४ ) पूर्वजन्मका किया भोगना .... .... .... ,, ( २५ ) जिन पूजाका माहात्म्य .... .... .... १५२
- ग्रन्थकारकी प्रशस्ति .... .... .... १५३ परिशिष्ट-कुमारपालका अहिंसाके साथ पाणिग्रहणका रूपकात्मक प्रबन्ध १५३-१५६
प्रा स्ता विक वक्तव्य । श्री मेरुतुङ्गाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि नामक प्रसिद्ध ऐतिहासिक-प्रबन्ध-संग्रहात्मक संस्कृत ग्रन्थका यह हिन्दी भाषान्तर, आज सहर्ष हम हिन्दी भाषाभाषियोंकी सेवामें उपस्थित करते हैं । १. प्रबन्धचिन्तामणिका महत्त्व और प्रामाण्य । गुजरातके प्राचीन इतिहासकी विशिष्ट श्रुति और स्मृतिके आधारभूत जितने भी प्रबन्धात्मक और चरित्रात्मक ग्रन्थ-निबन्ध इत्यादि प्राकृत, संस्कृत या प्राचीन देशी भाषामें रचे हुए उपलब्ध होते हैं, उन सबमें इस प्रबन्धचिन्तामणिका स्थान सबसे विशिष्ट और अधिक महत्त्वका है । उस प्राचीन समयसे ही — जबसे इसकी रचना हुई है तबसे ही — इस ग्रन्थकी प्रतिष्ठा विद्वानोंमें खूब अच्छी तरह हो गई थी और जिनको कुछ ऐतिहासिक वृत्तान्तोंके जाननेकी उत्कण्ठा होती थी वे प्रायः इसका वाचन और अध्ययन किया करते थे । पिछले कई ग्रन्थकारोंने इस ग्रन्थका अपनी रचनाओंमें अच्छा उपयोग भी किया है, और आदरपूर्वक इसका उल्लेख भी किया है। इन ग्रन्थकारोंमें, सबसे पहले शायद जिनप्रभ सूरि हैं जो प्राय. इनके समकालीन थे । यद्यपि उन्होंने इनका कहीं नामोल्लेख नहीं किया है तथापि अपने महत्त्वके ग्रन्थ, विविधतीर्थकल्पमें, जैसा कि हमने उसकी प्रस्तावनामें (पृ० ३, पंक्ति ४-५ पर ) सूचित किया है, इस ग्रन्थका सर्व प्रथम उपयोग किया है। इसके बाद, इन जिनप्रभ सूरिके उत्तरावस्थाके समकालीन और इन्हींके पास कुछ गहन शास्त्रोंका अध्ययन भी करनेवाले मल्लधारी राजशेखर सूरिने, अपने प्रबन्धकोषमें, इस ग्रन्थका जैसा उपयोग किया है, उसका परिचय हमने, प्रबन्धकोषकी प्रस्तावनामें, 'प्रबन्ध-चिन्तामणि और प्रबन्धकोष ' इन शीर्षकोंके नीचे (पृ० २, कण्डिका ४ में) कराया है। राजशेखर सूरिने तो प्रकट रूपसे इस ग्रन्थका नामोल्लेख भी किया है। हेमचन्द्र सूरिके वृत्तान्तमें उन्होंने कहा है कि- 'इन आचार्यके जीवनके सम्बन्धमें जो जो बातें प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थमें लिखी गई हैं, उनका वर्णन हम यहा पर नहीं करना चाहते । ऐसा करना चर्वित-चर्वण मात्र होगा।' —इत्यादि । (देखो, प्र० को० पृ० ४७, प्रकरण ५७, पक्ति १२-१६) । संवत् १४२२ में समाप्त होनेवाले जयसिंह-सूरि-रचित कुमारपालचरितमें, तथा संवत् १४६४ के पूर्वमें लिखे गये कुमारपालप्रबोधप्रबन्धमें (-यह ग्रन्थ शीघ्र ही प्रस्तुत ग्रन्थमालामें प्रकाशित होनेवाला है ), और संवत् १४९२ में सकलित, जिनमण्डनोपाध्यायके कुमारपालप्रबन्धमें, इस ग्रन्थका खूब उपयोग किया गया है । सं० १४९७ में परिपूर्ण होनेवाले जिनहर्षगणिकृत वस्तुपालचरित्रमें भी इसका यथेष्ट आधार लिया गया है । सं० १५०० के बाद, प्रायः १०-१५ वर्षके बीचमें जिसकी रचना हुई जान पड़ती है, उस उपदेशतरंगिणी नामक ग्रन्थमें तो इस ग्रन्थमेंसे प्रायः सैंकडों ही पद्य उद्धृत किये गये हैं और इसके अने- प्रबन्धोंका बहुत कुछ सार लिया गया है। एक जगह तो ग्रन्थकारने इसका प्रकट नामनिर्देश भी कर दिया है और लिख दिया है कि—' सर्वेऽपि प्रबन्धाः प्रबन्धचिन्तामणितो ज्ञेयाः ।' ( बनारस आवृत्ति, पृ० ५८) । इसके बादके श्राद्धविधि, उपदेशसप्ततिका आदि १६ वीं शताब्दीमें बने हुए ग्रन्थोंमें, उनके कर्ताओंने भी अपने अपने ग्रन्थोंमें इस ग्रन्थका जहा-तहा आधार लिया है और इसमें वर्णित ऐतिहासिक उल्लेखोंका सार उद्धृत किया है। १७ वीं सदीमें, अकबरके समयमें होनेवाले हीरविजय सूरिके प्रसिद्ध सहपाठी और अनुगामी विद्वान् महोपाध्याय धर्मसागर गणीने अपनी सुप्रचलित तपागच्छपट्टावलि और अन्य ग्रन्थोंमें भी
ख ] प्रबन्धचिन्तामणि इस ग्रन्थके कई उल्लेखोंका आधार लिया है। इसी तरह १८ वीं शताब्दीमें बने हुए वस्तुपालरास, कुमारपाल- रास आदि भाषा ग्रन्थोंके रचयिताओने भी अपनी अपनी कृतियोंमें इस ग्रन्थका बहुत कुछ उपयोग किया है, जिनका विशेष वर्णन करना आवश्यक नहीं है। इस कथनसे ज्ञात होता है कि उस पुरातन समयसे ही मेरुतुङ्ग सूरिके इस महत्त्वके ग्रन्थकी अच्छी ख्याति और उपयोगिता स्थापित हो गई थी। २. प्रबन्धचिन्तामणिकी वर्तमान नवीन युगमें प्रसिद्धि और उपयोगिता । प्रवर्त्तमान नवीन कालके प्रारम्भमें, सबसे पहले अंग्रेज विद्वान् श्री एलेक्जेंडर किन्लॉक फोर्ब्स साहबको इसका परिचय हुआ और उन्होंने गुजरातके इतिहास विषयकी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'रासमाला' में इसका सर्वप्रथम उपयोग किया। अपने ग्रन्थमें लिखे गये गुजरातके प्राचीन इतिहासका मुख्य ढांचा उन्होंने इसी ग्रन्थ परसे तैयार किया। वे अपने ग्रन्थमे, इस ग्रन्थका पद पद पर उल्लेख करते हैं और इसमें लिखी गई बातोंका संपूर्ण उपयोग करते हैं। उनके पीछे, भारतीय पुरातत्त्वके प्रखर पण्डित, जर्मन विद्वान्, डॉ० ब्यूहलरने इस ग्रन्थका खूब बारीकीके साथ अध्ययन किया और इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंका सविशेष ऊहापोह किया। 'इन्डियन ऐन्टीक्वेरी' नामक भारतीय-विद्या विषयक सुप्रसिद्ध पत्रिकाके सन् १८७७ के जुलाई मासके अंकमें उन्होंने 'अनहिलवाडके चालुक्योंके ११ दानपत्र' (Eleven land grants of the Chalukyas of Anhilvad) इस शीर्षक नीचे, अणहिलपुरके राजकीय इतिहास पर प्रकाश डालनेवाला एक महत्त्वका लेख लिखा जिसमें इस प्रबन्धचिन्तामणि कथित बातोंका अच्छा अवलोकन किया। फिर उसके बादमें, डॉ० ब्यूहलरने, जर्मन भाषामें Uber das Leben des Jaina Monches Hemacandra इस नामसे, आचार्य हेमचन्द्रका सविस्तार जीवनचरित्र लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिका पूरा पूरा उपयोग किया*। इसके बाद, बंबई सरकारने, बॉम्बे गेजेटियरके लिये जब गुजरातका प्राचीन इतिहास तैयार करवाया, तो उसके संकलनकर्त्ता प्रसिद्ध गुजराती पुरातत्त्वज्ञ डॉ० भगवानलाल इन्द्रजीने, इस ग्रन्थका बहुत सूक्ष्मताके साथ सांगोपाग निरीक्षण किया और गुजरातके राजकीय इतिहासके साथ सबन्ध रखने वाली प्राय सारी ऐतिहास उक्तियों और श्रुतियोंका जो जो इसमें निर्देश मिलता है उन सबका ठीक ठीक पर्यालोचन कर, यथायोग्य उनका उपयोग किया। तदुपरान्त, गुजरातके इतिहास विषयक भिन्न भिन्न प्रकारके पुस्तकों और निबन्धोंके रचयिता एतद्देशीय और विदेशीय सैंकडों ही विद्वानोंने जहा-तहा इस ग्रन्थका अनेकशः आधार लिया है और उल्लेख किया है। इस ग्रन्थकी ऐसी सार्वजनिक उपयोगिताको लक्ष्य कर, रासमालाके कर्ता विद्वान् फोर्ब्स साहबकी, और तदनुसार डॉ० ब्यूहलरकी भी, यह खास इच्छा रही कि विस्तृत टीका-टिप्पणियोंके साथ इस ग्रन्थका संपूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया जाय । डॉ० ब्यूहलरकी इस इच्छाको, कथासरित्सागर आदि प्रसिद्ध संस्कृत कथामन्थोंके सिद्धहस्त अंग्रेजी अनुवादक, अंग्रेज विद्वान्, श्रीयुत सी. एच्. टॉनी, एम्. ए. ने पूरा किया। उन्होंने इस ग्रन्थका सुन्दर और संपूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया जिसको कलकत्ताकी एशियाटिक सोसाइटीने सन् १९०१ में छपा कर प्रकाशित किया। डॉ० ब्यूहलरकी उत्कण्ठा थी कि वे टॉनीके इस भाषान्तरके साथ, ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी परि- चायक ऐसी अपनी टीका-टिप्पणियाँ दे कर, इस ग्रन्थकी उपादेयताका महत्त्व बढ़ावेंगे; पर दुर्देवसे इस कार्यके पूर्ण होनेके पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया और उनकी वह इच्छा यों ही अपूर्ण रह गई। विद्वान् टॉनीने अपने अंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनाके प्रारम्भमें, जो इस बारेमें कुछ लिखा है, उसका भावार्थ यह है-
- डॉ० ब्यूहलरका यह बड़े महत्त्वका ग्रन्थ है। इसका अंग्रेजी अनुवाद The Life of Hemacandracarya इस नामसे, हमने अपने सहपाठी मित्र डॉ मणिलाल पटेल Ph. D ( मारबुर्ग-जर्मनी) द्वारा करवा कर, इसी सिंधी जैन ग्रन्थ- मालाके १२ वें नंबर में प्रकाशित किया है। अंग्रेजी ज्ञाता विद्वानोंके लिये यह ग्रन्थ अवश्य पठनीय है।
प्रास्ताविक वक्तव्य [ ग “ राजतरंगिणीके अकेले अपवादको याद किया जाय तो, संस्कृत साहित्यमें ऐतिहासिक कहलाने लायक एक भी कोई ग्रन्थ नहीं है-ऐसा जो आक्षेप बारंबार किया जाता है, वह इस प्रबन्धचिन्तामणि जैसे ग्रन्थके अस्तित्त्वसे, किसी अंशमें भोंटा पाडा जा सकता है। इस आक्षेपका निःसार सिद्ध करना यह स्वर्गगत हो प्राय प्रोफेसर ब्यूह्लरकी जीवन भरकी अभिलाषा थी। ग्रन्डरिस्स् डेर इन्डो-आरिशेन् फिलोलोजी (Grundriss der Indo-Arischen Philologie) नामक ग्रन्थ- मालाके लिये, डॉ० ब्यूह्लरकी रसप्रद जीवन कथाका आलेखन करनेवाले प्रो० जोलीने (Jolly), ई० स० १८७७ में श्रीयुत न्योल्डेके (Noldeke) नामक विद्वान् पर लिखे हुए ब्यूह्लरके एक पत्रमेंसे अवतरण दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा था कि- ‘भारतवासियोंके पास कुछ भी एतिहासिक साहित्य नहीं है इस प्रकारकी मान्यता रखनेमें आपलोग, वर्तमान समयसे कुछ थोड़ेसे पिछड़े हुए मालूम दे रहे हैं। पिछले बीस वर्षोंमें ठीक ठीक विस्तृत ऐसे पाँच ऐतिहासिक ग्रन्थ मिल आये हैं, जो उनमें वर्णित घटनाओंके समकालीन ग्रन्थकारोंके बनाये हुए हैं। इनमेंसे ४ तो, जिनके नाम विक्रमाकचरित, गउडवहो, पृथ्वीराज- दिग्विजय और कीर्तिकौमुदी हैं, खुद मैंने खोज निकाले हैं। और एक दर्जनसे भी अधिक अन्य और ग्रन्थ खोज निकालनेकी तलाशमें हूँ।' यह प्रोफेसर ब्यूह्लर ही-के श्रमका फल है कि जो इतने सारे ऐतिहासिक वृत्तांत, इतने ऐतिहासिक काव्य और इतनी ऐतिहासिक कथाएँ संपादित हो सकीं। इस ग्रन्थके इंग्रजी अनुवादके करनेका काम जो मैंने हाथमें लिया यह भी डॉ० ब्यूह्लर-ही-की सूचनाका परिणाम है, और जो कोई पाठक मेरी टिप्पणियोंके पढ़नेका कष्ट उठायेगा उसे स्पष्ट ज्ञात हो जायगा, कि उन्द्रींक उत्तेजन और साहाय्यके बिना मेरा यह काम अपने अन्तको न प्राप्त कर सकता। इस अनुवादके साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी पूर्ति करनेवालीं टिप्पणियाँ लिखनेका उनका खास इरादा था। अगर यह बन पाता तो इस ग्रन्थकी उपयोगितामें खूब महत्त्वकी वृद्धि हो पाती, पर इस विचारके, कार्यरूपमें परिणत होनेके पहले ही, दुर्देवसे उनका अवसान हो गया और अब यह बात ‘मनकी बात मनमें ही रही' जैसी कहावतके योग्य हो गई। भारतके इतिहास विषयक साहित्यके बारेमें और उसमें भी खास करके गुजरातके इतिहासके साथ सबद्ध साहित्यके सम्बन्धमें, हरएक इंग्रेंज विद्यार्थीको एक और नामका स्मरण हो आना चाहिए और वह नाम है रासमालाके कर्ता श्री एलेक्सेंडर किन्लौक फोर्बस्का। मि. ए. जे. नैर्ने, बी. सी. एस. (Mr. A. J. Nairne, B. C. S) ने फोर्बस् साहबका जीवनचरित लिखा है, जो कर्नल वॉटसन् द्वारा संपादित और सन् १८७८ में प्रकाशित, रासमालाकी आवृत्तिके प्रारम्भमें मुद्रित है। श्री फोर्बस् साहब एक ऐसे इण्डियन सिविलियन थे, जिनको अपन भाग्यका पासा जिन लोगोंके साथ डाल गया हो उन लोगोंक इतिहास, वाङ्मय और पुरातत्त्वके विषयमें पूरा रस रहता हो। इस विषयकी उनकी, उत्कण्ठा और सत्यनिष्ठापूर्ण अध्ययनशीलताकी प्रतीति, रासमालाके प्रत्येक पृष्ठ पर होती रहती है। जिन अनेक मूलभूत आधारोंके ऊपरसे उन्होंने अपना ग्रन्थ तैयार किया, उनमेंका यह एक प्रबन्धचिन्तामणि है। इस ऐतिहासिक ग्रन्थका उन्होंने इतना तो सपूर्ण उपयोग किया है कि जिसे देख कर मेरे मनमें, अपने इस अनुवादके करते समय, बारबार यह उठ आता था कि मैं निरर्थक ही यह श्रम कर रहा हूँ। किन्तु प्रो० न्यूह्लरने मुझसे कहा था कि इस ग्रन्थका सपूर्ण इंग्रजी अनुवाद हो ऐसी इच्छा स्वय फोर्बस्ने अनेक बार प्रदर्शित की थी*। और यही मेरे इस परिश्रमकी उपयोगिताका आधार है। लेकिन, मैं अपने मनको इस तरह भी प्रोत्साहित रखना चाहता हूँ कि-मध्यकालीन इस जैन यतिने लिख रखी हुई इन श्रुतपरपराओंमें, जिनका विवरण या स्पष्टीकरण करनेसे इनके मूलमें रही हुई आधी मोहमता नष्ट हो जाती है, न केवल भारतके इतिहासके अभ्यासियों- ही को, किन्तु तदुपरान्त लोककथाओंके शताओको और मानव-नीति-शास्त्रके विद्वानोंको भी, रस प्राप्त होगा। ग्रन्थकार स्वयं भी कहता है कि-इस रचनाके करनेमें मेरा उद्देश जनमन रञ्जन करनेका है।” इत्यादि। * ३. प्रबन्धचिन्तामणिके मूल संस्कृत ग्रन्थका प्रथम प्रकाशन और गुजराती भाषान्तर। जैसा कि हमने, अपनी मूल आवृत्तिके प्रारम्भमें दिये हुए 'किंचित् प्रास्ताविक' शीर्षक वक्तव्यमे लिखा है, इस ग्रन्थके संस्कृत मूलका प्रथम प्रकाशन, गुजरातके शास्त्री रामचन्द्र दीनानाथ नामक विद्वान्ने, सवत्
- फोर्बस् साहबकी ऐसी इच्छा ही नहीं थी, बल्कि उन्होंने तो इसका पूरा इंग्रजी अनुवाद खुद ही सबसे पहले कर लिया था और फिर उसका उपयोग रासमालामें किया था, ऐसा बम्बईकी फोर्बस् सभा में जो उनका ग्रन्थसग्रह विद्यमान है उससे मालूम होता है। बम्बईके इस सग्रहमें फोर्बस् साहबकी हाथकी लिखी हुई एक नोटबुक है जिसमें इस ग्रन्थक २,४ और ५ वें प्रकाशका इंग्रजी भाषान्तर लिखा हुआ है। पहले दो प्रकाशोंका भाषान्तर, शायद किसी दूसरी नोटबुकमें लिखा हुआ होगा जो अब उपलब्ध नहीं है। श्री टॉनीको इसकी खबर न होनेसे, शायद उन्होंने वैसा लिखा होगा। अथवा यह भाषान्तर वैसा पूर्ण और शुद्ध न होगा जिससे फोर्बस्को सन्तोष रहा हो, और इसीलिये उन्होंने इसका एक उत्तम भाषान्तर, योग्य सस्कृतज्ञ पण्डितके हाथसे हो, ऐसी इच्छा डॉ० ब्यूह्लरके आगे प्रदर्शित की हो।
घ ] प्रबन्धचिन्तामणि १९१४ में, बम्बईसे किया था । उसीके साथ उन्होंने, इसका गुजराती भाषामें अनुवाद भी छपवा कर प्रकाशित किया था। शास्त्रीजीका यह अनुवाद – जिसे अनुवाद नहीं लेकिन एक तरहका विवरण कहना चाहिए – पुराने ढंगसे और पुरानी शैलीकी भाषामें किया गया था और इसमें उन्होंने अपनी तरफसे भी बहुतसे वाक्य और विचार, जो मूलमें सर्वथा नहीं थे, खूब फैला फैला कर लिख दिये थे। परन्तु साथमें कोई ऐतिहासिक पर्यालोचनकी दृष्टिसे उपयुक्त ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया था। अनुवादमें – खास करके प्राकृत गाथाओं और सुभाषित रूपसे उद्धृत पद्योंके भाषान्तरमें – तो अनेकानेक बड़ी बड़ी भद्दी भूलें भी की गई हैं, जिनका यहाँ पर दिग्दर्शन कराना निरर्थक है। यहाँ पर इतना यह अवश्य कहना चाहिये कि इस उपयोगी ग्रन्थको सर्वसाधारणके लिये सुलभ बनानेका श्रेयस्कर कार्य, सबसे प्रथम उन्हीं शास्त्रीजीने किया और तदर्थ उनकी स्मृति सदैव आदरकी दृष्टिसे की जानी चाहिए। जैसा कि, प्रथम भागरूप मूल ग्रन्थकी प्रस्तावनामें सूचित किया है, गुजरातके इतिहासकी दृष्टिसे इस ग्रन्थका महत्त्व लक्ष्यमें रख कर, हमने अहमदाबादके गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी ओरसे – जिसके कि हम सर्व प्रधान संचालक और नियामक थे – इसकी एक सर्वांगपूर्ण सुविस्तृत आवृत्ति, विशुद्ध मूल और उत्तम गुजराती भाषान्तर आदिके साथ, प्रकट करनेका प्रयत्न करना शुरू किया था। यथानुक्रम, मूलका कुछ भाग संशोधित और संपादित कर, बम्बईके सुप्रसिद्ध कर्णाटक प्रेसमें छपनेको भी भेज दिया था और उसमें प्राय प्रथमके दो प्रकाश जितना भाग छप भी चुका था। उसी बीचमें हमारा युरोप जाना हुआ और वह कार्य कुछ समयके लिये स्थगित रहा। करीब दो वर्षके बाद, वहाँसे हम जब वापस आये तो, देशमें राष्ट्रीय आन्दोलन बड़े जोरोंसे शुरू हुआ और हम भी उसमें संलग्न हो गये। सन् १९३० के अप्रेलमें, धारासणाके विख्यात नमक-सत्याग्रहमें सम्मीलित होनेके लिये, अहमदाबादसे ६०–७० जितने सत्याग्रहियोंकी एक जबर्दस्त टोली ले कर हमने प्रस्थान किया। पर अहमदाबादसे दूसरे ही स्टेशन पर, सरकारने हमको गिरफ्तार कर लिया और वहीं जगह ही-में मैजिस्ट्रेटने हमको छ महीनेकी सजा दे कर, पहले बम्बई और फिर वहाँसे नासिक जेलमें भेज दिया। इधर पीछेसे, गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरको भी – गुजरात विद्यापीठके साथ – सरकारने कब्जे कर, उसके विशाल ग्रन्थसमूहको जब्त कर लिया और उसकी वह सब स्थिति छिन्न-भिन्न हो गई। इस तरह प्रबन्धचिन्तामणिके विस्तृत प्रकाशनका जो आयोजन हमने गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी ओरसे किया था, वह एक प्रकारसे उन्मूलित हो गया। इस परिस्थितिको जान कर, बम्बईकी 'फोर्बस गुजराती साहित्य सभा'ने, जिसका भी प्रधान ध्येय गुजरातकी प्राचीन संस्कृतिके विविध साधनोंको प्रकाशमें लानेका है, इस ग्रन्थके प्रकाशनका कार्य हाथमें लिया और हमारे विद्वान् मित्र एवं गुजरातके इतिहासके एक विशिष्ट अभ्यासी, साक्षर श्रीदुर्गाशंकर केवलराम शास्त्रीको वह कार्य सौंपा गया। यह जान कर हमने शास्त्रीजीको हमारे मूलके छपे हुए उक्त उन दो प्रकाशोंके एडवान्स फार्म भी उनके उपयोगके लिये भेज दिये। शास्त्रीजीने यथाशक्ति परिश्रम कर, पहले ग्रन्थका मूलभाग तैयार कर उसे प्रकट करवाया और फिर उसका शुद्ध गुजराती भाषान्तर, कितनीक ऐतिहासिक टीका-टिप्पणियोंके साथ संपादित कर, उक्त सभाकी ही ओरसे प्रकाशित कराया। ४. प्रबन्धचिन्तामणिका हमारा प्रकाशन । जेलनिवाससे मुक्त होने पर कैसे दानवीर बाबू श्री बहादुरसिंहजीकी प्रियकर प्रेरणासे हमारा जाना शान्ति- निकेतन – विश्वभारतीमें हुआ और वहाँ पर रहते हुए कैसे इस 'सिंघी जैन ग्रन्थमाला' के प्रकाशनका कार्य प्रारम्भ किया गया – इत्यादि बातें हमने, संक्षेपमें, इसके पहले भागमें उल्लिखित कर दीं हैं जिनको यहाँ पर दुहरानेकी आवश्यकता नहीं है।
उक्त रीतिसे फोर्बस् सभाकी ओरसे इस ग्रन्थका, गुजराती भाषान्तर समेत, प्रकाशन होना चालू था, तब भी हमारे मनमें इसके प्रकाशनकी वह जो पूर्व कल्पना थी और इसके लिये जो साधन-सामग्री हमने बीसों वर्षोसे इकट्ठी करनी शुरू की थी, उसका ख्याल कर, हमने अपने उसी ढंगसे, इस ग्रन्थका पुनः संपादन करना प्रारम्भ किया । और चूंकि इसका गुजराती भाषान्तर, हमारे साक्षरमित्र श्री दुर्गाशंकर शास्त्री कर चुके हैं, इसलिये हमने इसका हिन्दी भाषान्तर प्रकट करनेका मनोरथ किया। हिन्दी भाषा, यों भी सबसे अधिक व्यापक भाषा है और फिर अब तो यह राष्ट्रकी सर्व प्रधान भाषा बन रही है, इसलिये सिंधी जैन ग्रन्थमालाके कार्यका लक्ष्य हिन्दीकी ओर ही अधिक रखा गया है । अंग्रेजी और गुजरातीमें एकसे अधिक भाषान्तर होने पर भी हिन्दीमें इसका कोई भाषान्तर आज तक नहीं हुआ था; और इसकी कमी कई हिन्दी भाषाभाषी विज्ञजनोंको बहुत अर्सेसे खटक भी रही थी। हिन्दीके स्वर्गवासी प्रसिद्ध पण्डित और पुरातत्त्वज्ञ विद्वान्, चन्द्रधर शर्मा गुलेरीने बहुत वर्ष पहले हमसे अनुरोध किया था, और शायद नागरीप्रचारिणी पत्रिकाके एक लेखमें उन्होंने लिखा भी था, कि इस ग्रन्थका हिन्दी अनुवाद होना आवश्यक है । आशा है गुलेरीजीकी स्वर्गस्थित आत्मा आज इसे देख कर प्रसन्न होगी । * ५. प्रस्तुत हिन्दी भाषान्तर । पाठकोंके हाथमें जो हिन्दी भाषन्तर उपस्थित किया जा रहा है, इसका प्राथमिक कच्चा खर्दा, जब हम शान्तिनिकेतनमें थे तब (सन् १९३२ में), वहाँके हिन्दी शिक्षापीठके विद्वान् आचार्य और हमारे सहृदय मित्र पं० श्रीहजारी प्रसादजी द्विवेदीने किया था, जिसको हमने अपने ढंगसे यथेष्ट रूपमें संशोधित-परिवर्तित कर वर्तमान रूप दिया है। इससे संभव है कि विज्ञ पाठकोंको इसमें कहीं कहीं भाषाविषयक शैलीका कुछ सूक्ष्म भिन्नत्व मालूम दे । हमारा प्रयत्न इस बातकी ओर रहा है कि भाषा जहाँ तक हो, सरल और सबको सुबोध हो; और जिनकी मातृभाषा खास हिन्दी न हो उनको भी इसके समझनेमें कोई कठिनाई न हो। इसलिये हमने इसमें ऐसे शब्दोंका बहुत ही कम प्रयोग किया है कि जो खास हिंदीका विशेष परिचय न रखनेवाले- राजस्थानी या गुजराती भाषाभाषी-जनोंको विल्कुल अपरिचित मालूम दे । इस ग्रन्थके संस्कृत मूलकी लेखशैली कुछ संकीर्ण और समास-बहुल है । वाक्य बड़े लंबे लंबे और कुछ जटिलसे हैं। क्रियापदोंका व्यवहार इसमें बहुत कम किया गया है। रचना कहीं तो शिथिलसी और कहीं निविड़ बन्धवाली है। इसलिये भाषान्तरमें भी हमें कही कहीं, मूलके अनुसार, कुछ लंबे वाक्य रखने पड़े हैं । भाषान्तरको हमने प्रायः संपूर्ण मूलानुसारी बनानेका लक्ष्य रखा है । मूलका कोई एक शब्द भी प्रायः छोड़ा नहीं गया है और ना-ही विशेष स्पष्टीकरणकी दृष्टिसे कोई अधिक शब्द या वाक्यांश बढाया गया है। जहाँ कहीं मूलके संक्षिप्त सूचन या अध्याहृत कथनमें, पाठकोंके स्पष्टावबोधके लिये, किसी अधिक शब्द या वाक्यांशके पूर्तिकी विशेष आवश्यकता मालूम दी, वहाँ उसे [ ] ऐसे पूरक ब्रैकेटमें समाविष्ट किया गया है। किसी खास शब्दका पर्याय वाचक दूसरा विशेष परिचित शब्द या उसका अर्थ बतलानेकी कहीं जरूरत दिखाई दी उसे ( ) ऐसे गोल ब्रैकेटमें दिया गया है। प्रकरणोंकी कण्डिकाओंके प्रारंभमें जो ‘१) २) ३)’ ऐसे इकेरे गोल ब्रैकेटके साथ क्रमांक दिये गये हैं वे, हमारी मूल ग्रन्थकी आवृत्तिमें, इस ग्रन्थका अर्थानुसन्धान बतलानेवाली कण्डिकाओंके जो क्रमांक हमने दिये हैं, उसीके बोधक हैं । मूलमें जो संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाके अनेकानेक प्राचीन पद्य उद्धत किये गये हैं उनको हमने दो भागोंमें विभक्त किया है । एक थे जो प्रायः सब प्रतियोंमें समान संख्यामें मिलते हैं और दूसरे थे जो खास कोई एकाध ही प्रतिमें
च ] प्रबन्धचिन्तामणि मिलते हैं। इस पिछले प्रकारके पद्योंको हमने पीछेसे लिखे गये अर्थात् प्रक्षिप्त माना है; और बाकीको मौलिक। इन दोनों तरहके पद्योंके लिये हमने दो प्रकारके क्रमांक दिये हैं। जो मौलिक हैं वे ‘१. २. ३.’ इस प्रकारके चालू अंकोंसे सूचित किये गये हैं और जो प्रक्षिप्त हैं वे ‘[१]-[२]-[३]’ इस प्रकार चौकोनी डबल ब्रेकेटवाले अंकोंसे बताये गये हैं। पद्योंकी तरह, मूल ग्रन्थमें, कुछ गद्य प्रकरण कण्डिकायें भी प्रक्षिप्त हैं, जिनको हमने अपनी उस मूलावृत्तिमें तो जुदा तरहके टाईपोंमें और { } ऐसे अथवा [ ] ऐसे ब्रैकेटोंके बीचमें मुद्रित कीं हैं। यहाँ, इस भाषान्तरमें वे कण्डिकायें जुदा टाईपोंमें न छाप कर, सिर्फ उनके ऊपर, ब्लैक टाईपमें ( ) ऐसे गोल ब्रैकेटमें, अथवा चालू टाईपमें [ ] ऐसे चौकोनी ब्रैकेटमें, उसकी ज्ञापक पंक्तियाँ लिख कर, उल्लिखित कर दी हैं। (—देखो, पृष्ठ १६, २०, ४८, ४९ इत्यादि ।) । इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ, जो प्रसङ्गोचित पद्य उद्धृत किये गये हैं उनमेंसे कुछ तो ऐतिहासिक घटना बताने- वाले हैं और कुछ सुभाषित स्वरूप हैं। इनमेंके कुछ पद्य द्विअर्थी अर्थात् श्लेषार्थक हैं जिनका स्वारस्य संस्कृत या प्राकृत भाषा-ही में ठीक आस्वादित हो सकता है। हिन्दीमें उसका अर्थ ठीक अनूदित नहीं हो पाता। ऐसे पद्योंके अर्थके विषयमें जहाँ तक हो सका, तदन्तर्गत मुख्य भावार्थ बतलानेका ही प्रयत्न किया गया है। कोई कोई पद्य ऐसे भी दुरवबोध मालूम देते हैं जिनका तात्पर्य ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे स्थानोंमें जो अर्थ दिये गये हैं वे शङ्कित ही समझे जायें—जैसा कि पृ. ७७ आदि पर सूचित किया गया है। कहीं कहीं गद्य कथनमें भी ऐसी दुरवबोधता और अस्पष्टार्थता प्रतीत होती है और उसका ठीक ठीक तात्पर्य नहीं जाना जा सकता—जैसा कि पृ. ९४ परकी टिप्पणीमें सूचित किया गया है। ग्रन्थकारने कहीं कहीं ऐसे अपरिचित शब्दोंका प्रयोग किया है जो शुद्ध संस्कृतके न होकर देश्य भाषाके हैं और जिनका अर्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे शब्दोंके दिये गये अर्थ भी सर्वथा निर्भ्रान्त नहीं कहे जा सकते। इन सब शङ्कित स्थानों और अर्थोंके विषयमें पाठक हमें कोई दोष न दें ऐसी विज्ञप्ति है। जब यह भाषांतर छपाना शुरू किया गया तब हमारी इच्छा थी, कि हम इसके साथ, इस ग्रन्थमें वर्णित विशेष विशेष ऐतिहासिक और भौगोलिक नामोंके बारेमें, अन्यान्य साधनोंद्वारा उपलब्ध या ज्ञात बातोंका परिचय करानेवाली विस्तृत टिप्पणियाँ दें, और इसमें जो कुछ पारिभाषिक शब्दसमूह और लोकोक्तिरूप वाक्य-विन्यास उपलब्ध होते हैं उनको स्फुट करनेवाली व्याख्यात्मक पंक्तियाँ भी लिखें। किन्तु, जब हमने कुछ ऐसी टिप्प- णियाँ और पंक्तियाँ लिखनीं प्रारंभ कीं तो उनका कलेवर इतना बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा जो मूल ग्रन्थसे भी कहीं अधिक बढ़ जानेकी आशङ्का कराने लगा। और ये सब टिप्पणियाँ लिखनेका तो हमारा उत्कट लोभ है। क्यों कि इन्हीं टिप्पणियों द्वारा तो इस ग्रन्थका सारा महत्त्व प्रकट होनेवाला है। इसलिये फिर हमने यह विचार किया कि इन टिप्पणियों आदिका सङ्कलनवाला एक पर्यालोचनात्मक पूरा भाग ही अलग निकाला जाय, जिससे भाषान्तरवाला यह भाग अनपेक्षित रूपसे विस्तृत न हो, और जिनको केवल प्रबन्धचिन्तामणिका मूलगत ग्रन्थसार मात्र ही पढ़ना-समझना अपेक्षित हो उनको इसके पढ़नेमें कोई कठिनता प्रतीत न हो। इसीलिये हमने पृष्ठ २, ११, १८ आदि पर जो टिप्पणियाँ दी हैं उनमें यह सूचित कर दिया है कि इन बातोंका विशेष विवेचन या ऊहापोह इसके अगले भागमें किया जायगा—इत्यादि। यह अगला भाग, पुरातनप्रबन्धसंग्रह नामक, मूल ग्रन्थके पूरकात्मक द्वितीय भागके, इसी तरहके
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हिन्दी भाषान्तरके प्रकट होनेके बाद, (जो अब शीघ्र ही प्रेसमें जानेवाला है) प्रकट होगा-अर्थात् हमारी सङ्कल्पित योजनाके अनुसार, वह इस प्रबन्धचिन्तामणिका ५ वाँ भाग होगा। * ६. प्रबन्धचिन्तामणि वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंके विषयमें कुछ स्वाभिप्राय ज्ञापन । इस ग्रन्थके पढ़नेवाले पाठकोंको यह बात लक्ष्यमें रखनी चाहिये कि- यद्यपि ग्रन्थ प्रधानतया ऐतिहासिक प्रबन्धोंका सङ्ग्रहात्मक है, तथापि इसके सब-के-सब प्रबन्ध ऐतिहासिक नहीं हैं। खास करके अन्तिम प्रकाशमें जो पुण्यसार, कर्मसार, वासना, कृपाणिका इत्यादि शीर्षक ५-७ प्रबन्ध हैं वे पौराणिक ढंगके कथात्मक रूप हैं। उनमें ऐतिहासिकता खोज निकालना निरर्थक है। बाकीके अन्य बहुतसे-प्राय सब ही-ऐतिहासिक माने जा सकते हैं, पर इनमेंसे भी कुछ प्रबन्धोंमें वर्णित व्यक्तियोंके विषयमें, अभी तक इतिहासविदोंमें थोड़ा बहुत मतभेद अवश्य है। दृष्टान्तके तौरपर, प्रथम प्रकाशमें प्रारम्भ-ही-में दिये गये विक्रमार्क राजाके व्यक्तित्वके विषयमें विद्वानोंमें अभी तक कोई एक निर्णयात्मक विचार स्थिर नहीं हो पाया। वह राजा कौन था और कब हो गया इसके विषयमें अभी तक अनेक तर्क-वितर्क किये जा रहे हैं। नामके अतिरिक्त प्रबन्ध कथित और सब बातें तो एक कहानीकी अपेक्षा अन्य कोई अधिक महत्त्व नहीं रखतीं। यही बात सातवाहनवाले प्रबन्धके विषयमें कही जा सकती है। सातवाहन राजाका नाम यद्यपि शिलालेखों वगैरहमें उपलब्ध होता है, पर इस नामके कई राजा हो जानेसे और प्रबन्धमें वर्णित घटनाका कोई ऐतिहासिकत्व प्रतीत न होनेसे उसके विषयमें भी नामके अतिरिक्त प्रबन्धकथित समूचा वर्णन कल्पनात्मक ही मानना चाहिए। सातवाहनके बाद भूयराजका जो प्रबन्ध है, उसके अस्तित्वके विषयका अभीतक अन्य कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है, पर उसके ऐतिहासिक पुरुष होनेका सम्भव माना जा सकता है। इस तरह इन कुछ दो चार नामोंकी व्यक्तियोंको छोड़ कर, बाकी जितने भी नाम इस ग्रन्थमें आये हुए हैं वे सब प्राय ऐतिहासिक पुरुष हैं। हाँ उनमेंसे कुछ कुछ व्यक्तियोंका सम्बन्ध, परस्पर एक दूसरेके साथ, इस तरह जोड दिया गया है जो भ्रमात्मक है। उदाहरणके तौरपर, भोज-भीमके वर्णनवाले दूसरे प्रकाशमें, धाराके परमार राजा भोजदेवके साथ खास करके महाकवि बाण, मयूर, मानतुङ्ग और माघ आदिका जो परस्पर सम्बन्ध और समकालीनत्व वर्णन किया गया है वह सर्वथा भ्रान्त और निराधार है। ग्रन्थकारके पूर्ववर्ती और प्रसिद्ध विद्वान् प्रभाचन्द्र सूरिने, अपने प्रभावकचरित्रमें, इन व्यक्तियोंका वर्णन और ही राजाओंके समयमें दिया है और वह कुछ प्रमाणभूत भी सिद्ध होता है। तब फिर न मालूम मेरुतुङ्ग सूरिने किस आधार पर, ऐसा भ्रान्तिपूर्ण यह वर्णन अपने इस महत्त्वके ग्रन्थमें ग्रथित कर डाला है, सो समझमें नहीं आता। भोजप्रबन्धकी ये बहुतसी बातें कल्पनाप्रसूत और लोककथायें जैसी प्रतीत होतीं हैं। ग्रन्थकारने ये बातें किसी पुरातन प्रबन्ध आदिके आधार पर लिखीं हैं या किसीके मुखसे सुन कर लिखीं हैं इसके जाननेका कोई साधन अभीतक ज्ञात नहीं हुआ। सिद्धराज और कुमारपालके समयके जितने वर्णन इसमें ग्रथित हैं वे प्राय सब-के-सब ऐतिहासिक और आधारभूत हैं। उनके घटनाक्रममें कुछ आगे-पीछे पनका सम्भव हो सकता है पर उनमेंका कोई वर्णन सर्वथा निर्मूल हो ऐसा नहीं माना जा सकता। मेरुतुङ्ग सूरिके इस ग्रन्थमें, ऐतिहासिक दृष्टिसे, जो सबसे अधिक विशेष महत्त्वका उल्लेख पाया गया है
ञ ] प्रबन्धचिन्तामणि वह है अणहिलपुरके राजाओंके समयका कालक्रम-ज्ञापक निश्चित निर्देश। अणहिलपुरके राज्यसिंहासन पर, कौन राजा कब गद्दीपर बैठा और उसने कितने वर्ष राज्य किया इसका जो उल्लेख इस ग्रन्थमें किया गया है वैसा उल्लेख, पूर्वके अन्य किसी ग्रन्थमें नहीं मिलता। यद्यपि इस उल्लेखमें चावडा (चापोट्कट) वंशके जो संवत्सर निर्दिष्ट किये गये हैं उनकी निश्चितिके निर्णायक और समर्थक अन्य कोई वैसे प्रमाण अभीतक उपलब्ध नहीं हो पाये, तथापि उनके बाधक भी वैसे कोई प्रमाण अभीतक उपस्थित नहीं हुए। और चौलुक्य वंशके राजाओंके राज्यकालकी जो संवत्सरावलि इसमें दी गई है वह तो शिलालेख आदि अन्यान्य अनेक प्रमाणोंसे प्रायः सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्ध हो चुकी है। इसलिये इसमें दी गई यह राजसंवत्सरावलि बडे ही महत्त्वकी और एक अद्वितीय ऐतिह्य वस्तु साबित हुई है। ७. प्रबन्धचिन्तामणिकी रचना कब और क्यों की गई। मेरुतुङ्ग सूरिने यह ग्रन्थ कब और कहा बनाया इसका उल्लेख उन्होंने ग्रन्थके अन्तमें स्पष्ट कर ही दिया है। इस उल्लेखसे ज्ञात होता है, कि वि० सं० १३६१ में, काठियावाडके वर्तमान वढवान शहरमें उन्होंने इस ग्रन्थको पूर्ण किया। यह वह समय है, जब गुजरातके स्वाधीनता और स्वराज्यका सर्वनाश हुआ और विधर्मी यवनराज्य और पारवश्यका प्रादुर्भाव हुआ। मेरुतुङ्गके सामने ही अणहिलपुरका वह चौलुक्य वंश नामशेष हुआ, जिसके स्थापक पुरुषसे ले कर अन्तिम पुरुषके समय तककी गुजरातके राजकीय, सामाजिक और धार्मिक जीवनकी कुछ विशिष्ट स्मृतियां लिपिबद्ध करनेका उन्होंने इस ग्रन्थमें मौलिक प्रयत्न किया है। मेरुतुङ्ग सूरिके विचारसे, गुजरातमें - अणहिलपुर पाटनमें - वीरप्रकृति राजा वीरधवल और उसके विचक्षण मंत्री वस्तुपाल-तेजपालके बाद और कोई वैसा स्मरणीय पुरुष पैदा नहीं हुआ जिसका नामनिर्देश वे अपने इस ग्रन्थमें करते। यद्यपि वीरधवलके बाद उसके वंशजोंने प्रायः ५०-५५ वर्षतक अणहिलपुरमें राज्यसिंहासनका उपभोग किया, पर उनका शासन प्रायः निष्प्राण और निस्तेजसा ही रहा। मेरुतुङ्ग सूरिको उस शासनकालमें कोई महत्त्व नहीं मालूम दिया और इसलिये उन्होंने उस समयकी किसी भी घटनाका उल्लेख अपने ग्रन्थमें नहीं आने दिया। उनके अभिप्रायमें, वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके साथ गुजरातके ज्योर्तिमय जीवनकी समाप्ति हो गई। चाहे मेरुतुङ्ग सूरिको, इतिहासके आत्माका दिव्य दर्शन हुआ हो या न हुआ हो, पर इसमें कोई शक नहीं कि उनका यह ग्रन्थलेखन, सचमुच, इतिहासदर्शनकी एक अस्पष्ट पर सूक्ष्म कलाके आभासका उत्तम सूचन करता है। जब हम गुजरातके भूतकालीन राष्ट्रीय जीवन पर एक गहरी दृष्टि डालते हैं, तब हमें यह बहुत स्पष्टताके साथ दिखाई देता है, कि यथार्थ ही, गुजरातके भाग्याकाशमें वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके बाद, अब तक, वैसा कोई ज्योतिर्धर तेजस्वी तारक उदित नहीं हुआ। और जब तक गुजरातमें पुन वैसा पूर्ण स्वराज्य स्थापित नहीं हो पाता तब तक हम इस अन्तर्दाहक अनुभूतिका मिटा नहीं सकते। * मेरुतुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी रचना किस लिये की-यह भी उन्होंने ग्रन्थके प्रारम्भमें और अन्तमें, सक्षिप्त रूपमे सूचित किया है। वे कहते हैं कि-“ बारवार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं। इसलिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुषोंके वृत्तान्तोसे [ सज्जित ऐसे ] इस प्रबन्ध- चिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर रहा हूं।” (-देखो पृ० २, पत्र ६ का अनुवाद) । इस कथनके भावको स्पष्ट करनेके लिये, इसके नीचे एक टिप्पणी दे कर हमने उसमें कहा है कि-" पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और कथाकार प्राय. सदा उन्ही कथा-वार्ताओंको सुनाया करते थे जो महाभारत और रामायण आदि पुराण ग्रन्थोंमें
प्रास्ताविक वक्तव्य [ क्ष प्रसिद्ध हैं। एक-की-एक ही कथा बारंबार सुननेमें विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता यह सर्वानुभव सिद्ध बात है। मेरुतुङ्ग सूरिने इस बातका विचार कर, लोगोंका मनोरंजन करनेके लिये, कथाकारोंको, कुछ नई सामग्री प्राप्त हो इस उद्देशसे, कितनेएक इतिहास-वृत्तान्तोंसे अलंकृत ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की।" ग्रन्थके अन्तमें वे, इस रचनाके करनेमें एक दूसरा भी कारण बतलाते हुए लिखते हैं कि- "बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्धजनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं। इस कारणसे तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबन्धोंका संघटन रूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है।" मेरुतुङ्ग सूरिका यह कथन बहुत अनुभवपूर्ण और भावि परिस्थितिका द्योतक है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि मेरुतुङ्ग सूरि इस ग्रन्थकी रचना द्वारा, इन पुरातन ऐतिह्य श्रुतियोंका, यह विशिष्ट संग्रह न कर जाते तो, आज हमें, उस जमानेकी इन इनीगिनी बातोंके जाननेका भी और कोई साधन उपलब्ध नहीं होता। यह सब-किसीको मंजूर करना पड़ेगा कि जैन धर्मके उस मध्यकालीन इतिहासकी जो अनेकानेक विश्वसनीय और प्रमाणभूत बातें, इस ग्रन्थमें उपलब्ध होती हैं और उसके साथ ही गुजरातके समूचे राष्ट्रीय इतिहासकी भी बहुत आधारभूत जो कथायें इसमें दृष्टिगोचर होती हैं, वैसी और किसी ग्रन्थमें विद्यमान नहीं हैं। ८. प्रबन्धचिन्तामणिके उल्लेखों पर कुछ विद्वानोंके मिथ्या आक्षेप । कुछ कुछ विद्वानोंका खयाल है कि- ग्रन्थकार जैनधर्मी होनेसे, उसने इस ग्रन्थमें अपने धर्मका प्रभाव बतलानेकी दृष्टिसे, बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कथन किया है; और उसके साथ अन्य धर्मकी-खास करके शैवधर्म और ब्राह्मण संप्रदायकी-लघुता बतानेका भी प्रयत्न किया है। इस ग्रन्थके उक्त अंग्रेजी अनुवादक मि. टॉर्नीने अपनी प्रस्तावनामें, इस बारेमें लिखा है कि- 'जिस तरह, एक्झीटर स्ट्रीटके एक छप्परके नीचेके कोनेमें बैठ कर, पार्लियामेंटके संभाषणोंको लेखबद्ध करते समय, डॉ० ज्योनसन् इस बातकी पूरी सावचेती रखता था कि 'व्हीगके प्रतिपक्षी उसमेंसे किसी तरहका कोई लाभ न उठा पावें'-इसी तरह सभी शकास्पद स्थानोंमें, यह अमर्षशील जैन ग्रन्थकार, स्पष्ट रूपसे महावीरके धर्मके दृढ़ श्रद्धालु अनुयायियों (अर्थात् जैनों) के पक्षकी ओर झुकता है; और जैन लोक, शैवोंकी तुलनामें कहीं नीचे न दिखाई दें इसकी सावधानी रखता है।' इत्यादि। इसमें कोई शक नहीं कि-ग्रन्थकार जैन धर्मका एक विद्वान् धर्माचार्य है और इस ग्रन्थकी रचनामें उसका प्रधान उद्देश जैन धर्मकी पुरातन महत्ता और गौरव गाथाको, कालके कुटिल और प्रबल प्रवाहके कारण नष्ट होनेसे बचा रखनेका है। अतएव वह इसमें अपने धर्मका उत्कर्ष बतानेवाली श्रुतियों और उक्तियोंका यथेष्ट उपयोग करे, यह स्वाभाविक ही है। उस पुराने जमानेमें, जब धार्मिक वाद-विवादकी बड़ी प्रतिष्ठा थी और उसका खूब जोरदार प्रचार था; एवं सभी धर्मोंके और संप्रदायोंके अग्रणी विद्वान् गण अपनी अपनी विद्याका प्रभाव और पराक्रम बतलानेके लिये, राजसभाओंमें, नामी पहलवानोंके मुष्टि-प्रहारोंकी नाईं, वाक्प्र- हारोंकी बड़ी सख्त कुश्ती किया करते थे, तब उन विद्वान् ग्रन्थकारोंकी तद्विषयक रचनाओंमें, ऐसी अमर्षशील भावना और लेखन-शैलीका दृष्टिगोचर होना नितान्त स्वाभाविक ही है। केवल जैन ग्रन्थकार ही इसमें अधिक उल्लेखनीय हैं सो बात नहीं है। संसारके सभी धर्मों, संप्रदायों, मतों और मन्तव्योंके लेखक इससे मुक्त नहीं हैं। मेरुतुङ्ग सूरि भी उन्हींमेंका एक धर्मप्रिय लेखक है, अतः उसके लेखमें, अपने धर्मको नीचा दिखाने-