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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पातंजल-योगसूत्र १११९

पातंजल-योगसूत्र १११९

मनुष्य की गति सदैव अनन्त उन्नति की ओर है—उसका कही भी अन्त नही, सर्वथा असगत है। प्रसग के थोडा बाहर होने पर भी में अब इस पूर्वोक्त मत के वारे में दो-एक बाते कहूँगा। नीतिशास्त्र कहते है, किसी के भी प्रति घृणा मत करो—सबको प्यार करो। नीतिशास्त्र के इस सत्य का स्पष्टीकरण पूर्वोक्त मत से हो जाता है। जैसे विद्युत्-शक्ति के वारे मे आधुनिक मत यह है कि वह विद्युदाधार (dynamo) से बाहर निकल, घूमकर फिर से उसी यन्त्र मे लौट आती है, यहाँ भी ठीक वैसा ही है। प्रकृति की समस्त शक्तियो के वारे मे यह नियम लागू होता है। सभी शक्तियां, घूम-फिरकर, जिस स्थान से निकली थी ठीक वही वापस आ जायँगी। अतएव किसी से घृणा करना उचित नही, क्योकि यह शक्ति—यह घृणा, जो तुममे से वहिर्गत होगी, घूमकर कालान्तर मे फिर तुम्हारे ही पास वापस आ जायगी। यदि तुम मनुष्यो को प्यार करो, तो वह प्यार घूम-फिरकर तुम्हारे पास ही लौट आयगा। यह सोलहो आने सत्य है कि मनुष्य के मन से घृणा की जो कुछ मात्रा बाहर निकलती है, वह अन्त में उसी के पास लौट आकर अपनी पूरी शक्ति से उस पर आक्रमण करती है। कोई भी इसकी गति रोक नही सकता। प्यार के वारे मे भी ऐसा ही है। हम और भी अन्यान्य प्रत्यक्ष बातो पर आधारित बहुतसी युक्तियों से यह प्रमाणित कर सकते है कि यह अनन्त उन्नति सम्बन्धी मत ठहर नही सकता। हम तो यह प्रत्यक्ष देखते हैं कि सारी भौतिक वस्तुओ की एक ही अन्तिम गति है, और वह है विनाश। अतएव अनन्त उन्नतिवाला मत किसी भी प्रकार टिक नही सकता। हमारे ये सारे सघर्ष, सारी आशाएँ, भय और सुख—

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इन सबका आखिर परिणाम क्या है ? मृत्यु ही हम सबकी चरम गति है। इससे अधिक ठहरी हुई बात और कुछ भी नही हो सकती। तब फिर यह सरल रेखा मे गति कहाँ रही ? यह अनन्त उन्नति कहाँ रही ? यह तो केवल थोडी दूर जाना है और फिर से उस केन्द्र मे लौट आना है, जहाँ से गति शुरु होती है। देखो, नीहारिका (nebulae) से किस प्रकार सूर्य्य, चन्द्रमा और तारे पैदा होते हैं, और फिर से उसी मे समा जाते हैं। ऐसा ही सर्वत्र हो रहा है। पेड-पौधे मिट्टी से ही सार ग्रहण करते हैं और सड-गलकर फिर से मिट्टी मे ही मिल जाते है। इस ससार में जितने भी रूपवान पदार्थ है, सब अपने चारो ओर वर्तमान परमाणुओ से पैदा होकर फिर से उन परमाणुओ मे ही मिल जाते हैं।

यह कभी हो नही सकता कि एक ही नियम अलग-अलग स्थानो में अलग-अलग रूप से कार्य करे। नियम सर्वत्र ही समान है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नही हो सकती। यदि यही प्रकृति का नियम हो, तो वह अन्तर्जगत् पर क्यो नही लागू होगा ? मन भी अपने उत्पत्ति-स्थान में जाकर लय को प्राप्त करेगा। हम चाहे या न चाहे, हमे अपने उस आदि कारण में लौट ही जाना पडेगा, जिसे ईश्वर या निरपेक्ष सत्ता कहते हैं। हम ईश्वर से आए हैं, और पुन ईश्वर में ही लौट जायेंगे। इस ईश्वर को फिर किसी भी नाम से क्यो न पुकारो—गॉड (God) कहो, निरपेक्ष सत्ता कहो, प्रकृति कहो अथवा अन्य किसी भी नाम से क्यो न सम्बोधित करो—सब एक ही बात है। 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभि-संविशन्ति'*—'जिनसे सब पैदा हुए हैं, जिनमें उत्पन्न हुए


* तैत्तिरीय उपनिषद् ३।१

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समस्त प्राणी स्थित है और जिनमे सब फिर से लौट जायेंगे।' इससे अधिक निश्चित बात और कुछ भी नही हो सकती। प्रकृति सर्वत्र एक ही नियम से कार्य करती है। एक लोक मे जो नियम कार्य करता है, दूसरे लाखो लोकों मे भी वह नियम कार्य करेगा। ग्रहो मे जो व्यापार देखने में आता है, इस पृथ्वी, मनुष्यमात्र और सब नक्षत्रों मे भी वही व्यापार चल रहा है। एक बडी लहर लाखो छोटी-छोटी लहरो से बनी होती है। उसी प्रकार सारे जगत् का जीवन लाखो छोटे-छोटे जीवनों की एक समष्टि मात्र है; और इन सब लाखो छोटे-छोटे जीवों की मृत्यु ही जगत् की मृत्यु है।

अब प्रश्न उठता है कि इस भगवान मे वापस जाना उच्चतर अवस्था है या निम्नतर ? योगमतावलम्बी दार्शनिक-गण इस बात के उत्तर मे दृढतापूर्वक कहते है, 'हाँ, वह उच्चतर अवस्था है।' वे कहते हैं कि मनुष्य की वर्तमान अवस्था एक अवनत अवस्था है। इस धरती पर ऐसा कोई धर्म नहीं, जो कहता हो कि मनुष्य पहले की अपेक्षा आज अधिक उन्नत अवस्था मे है। (इसका भाव यह है कि मनुष्य प्रारम्भ मे शुद्ध और पूर्ण रहता है, फिर उसकी अवनति होने लगती है और एक अवस्था ऐसी आ जाती है, जिसके नीचे वह और नही जा सकता। तब वह पुन. अपना वृत्त पूरा करने के लिए ऊपर उठने लगता है। उसे वृत्त की पूर्ति करनी ही पड़ती है। वह कितने भी नीचे क्यो न चला जाय, अन्त में उसे वृत्त का ऊपरी मोड लेना ही पडता है—अपने आदिकारण भगवान मे वापस आना ही पडता है। मनुष्य पहले भगवान से आता है, मध्य मे वह मनुष्य के रूप मे रहता है और अन्त मे पुन. भगवान के पास वापस

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चला जाता है।) यह हुई द्वैतवाद की भाषा। अद्वैतवाद की भाषा मे यह भाव व्यक्त करने पर कहना पडेगा कि मनुष्य भगवान है, और घूमकर फिर उन्ही मे लौट जाता है। यदि हमारी वर्तमान अवस्था ही उच्चतर अवस्था हो, तो ससार मे इतने दुःख-कष्ट, इतनी सब भयावह घटनाएँ क्यो भरी पडी हैं? यदि यही उच्चतर अवस्था हो, तो इसका अवसान क्यों होता है? जिसमे विकार और पतन होता हो, वह कभी भी सबसे ऊँची अवस्था नही हो सकती। यह जगत् इतने पैशाचिक भावो से क्यो भरा हो—वह इतना अतृप्तिकर क्यो हो? इसके पक्ष में बहुत हुआ तो इतना ही कहा जा सकता है कि इसमें से होकर हम एक उच्चतर रास्ते में जा रहे है, पुन उन्नत-स्वभाव होने के लिए हमें इसमे से होकर जाना ही पडता है। जमीन में बीज बो दो, वह गलकर—विश्लिष्ट होकर कुछ समय बाद मिट्टी के साथ बिलकुल मिल जायगा, फिर उसी विश्लिष्ट अवस्था से एक महाकाय वृक्ष उत्पन्न होगा। इस महाकाय वृक्ष के उत्पन्न होने के लिए प्रत्येक बीज को सडना पडेगा। उसी प्रकार ब्रह्मभावापन्न होने के लिए—ब्रह्मस्वरूप हो जाने के लिए प्रत्येक जीवात्मा को इस अवनति की अवस्था मे से होकर जाना पडेगा। अतएव यह स्पष्ट है कि हम जितनी जल्दी इस 'मानव'-सज्ञक अवस्थाविशेष का अतिक्रमण कर उसके ऊपर चले जायें, उतना ही हमारा कल्याण है। तो क्या आत्म-हत्या करके हमें इस अवस्था के बाहर होना होगा? नही, कभी नही। वरन् उससे तो उलटा ही फल होगा। शरीर को व्यर्थ में कष्ट देना अथवा ससार को वृथा कोसना इस ससार से तरने का उपाय नही है। उसके लिए तो हमे इस नैराश्य के पकिल सरोवर में

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से होकर जाना पडेगा, और जितनी जल्दी हम उसे पार कर जायँ, उतना ही मगल है । पर यह सदैव स्मरण रहे कि हमारी यह वर्तमान अवस्था ही सबसे ऊँची अवस्था नही है ।

यहाँ यह बात समझना सचमुच कठिन है कि जिस निर्विशेष अवस्था को सबसे ऊँची अवस्था कही जाती है, वह, जैसा कि बहुतसे लोग शका करते है, पत्थर या अर्धजन्तु-अर्धवृक्ष-वत् कोई जीवविशेष के समान नही है । जो लोग ऐसा सोचते हैं, उनके मत से संसार भर के सारे अस्तित्व केवल दो भागो मे विभक्त है—एक तो वह, जो पत्थर आदि के समान जड की अवस्था है, और दूसरा वह, जो विचार या चिन्तन की अवस्था है । किन्तु हम उनसे पूछते है कि सारे अस्तित्व को इन दो ही भागो मे सीमित कर देने का उन्हे क्या अधिकार है ? क्या विचार से अनन्तगुनी अधिक ऊँची और कोई अवस्था नही है ? आलोक का कम्पन अत्यन्त मृदु होने पर वह हमे दृष्टिगोचर नही होता । जब वह कम्पन अपेक्षाकृत कुछ तीव्र होता है, तब वह हमारी दृष्टि का विषय हो जाता है—तब हमारी आँखों के सामने वह आलोक के रूप मे दीख पडता है । पर जब वह और भी तीव्र हो जाता है, तब हम पुन उसे नही देख पाते । वह हमे अन्धकार के समान ही प्रतीत होता है । तो क्या यह बाद का अन्धकार उस पहले अन्धकार के समान है ? नही, कभी नही, उन दोनो मे तो दो ध्रुवो का—जमीन-आसमान का—अन्तर है । क्या पत्थर की विचारशून्यता और भगवान की विचारशून्यता दोनो एक है ? बिलकुल नही । भगवान सोचते नही—वे विचार करते नही । वे भला करेगे भी क्यो ? उनके लिए क्या कुछ अज्ञात है, जो वे विचार करेगे ? पत्थर विचार कर सकता नही,

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और ईश्वर विचार करते नही—बस यही अन्तर है। ये पूर्वोक्त दार्शनिकगण सोचते है कि विचार से राज्य के बाहर जाना अत्यन्त भयानक बात है। वे विचार के अतीत कुछ भी नही पाते।

युक्ति के राज्य के उस पार बहुतसी उच्चतर अवस्थाएँ है। वास्तव में धर्म-जीवन की पहली अवस्था तो बुद्धि की सीमा लांघने पर शुरू होती है। जब तुम विचार, बुद्धि, युक्ति—इन सबके परे चले जाते हो, तभी तुमने भगवत्प्राप्ति के पथ में पहला कदम रखा है। वही जीवन का सच्चा प्रारम्भ है। जिसे हम साधारणत जीवन कहते है, वह तो असल जीवन की भ्रूण-अवस्था मात्र है।

अब प्रश्न हो सकता है कि विचार और युक्ति के अतीत की अवस्था ही सबसे ऊँची अवस्था है, इसका क्या प्रमाण? पहले तो, संसार के श्रेष्ठ महापुरुषगण—कोरी लम्बी-चौड़ी हाँकने-वालो की अपेक्षा कही श्रेष्ठ महापुरुषगण, जिन्होने अपनी शक्ति के बल से सम्पूर्ण जगत् को हिला दिया था, जिनके हृदय में स्वार्थ का लेश मात्र न था, जगत् के सामने घोषणा कर गए हैं कि हमारा यह जीवन उस सर्वातीत अनन्तस्वरूप मे पहुँचने के लिए रास्ते मे केवल एक सराय के समान है। दूसरे, उन्होंने केवल मुखसे ऐसा कहा हो, सो नही, वरन् उन्होंने सभी को वहाँ जाने का रास्ता बतला दिया है, अपनी साधन-प्रणाली सभी को समझा दी है, जिससे सब लोग उनका पदानुसरण कर आगे बढ सके। तीसरे, पहले जो व्याख्या दी गई है, उसके छोड जीवन-समस्या की और किसी प्रकार से सन्तोषजनक व्याख्या नही दी जा सकती। यदि मान लिया जाय कि इसकी अपेक्षा उच्चतर अवस्था और कोई नही है, तो भला हम लोग चिरकाल इस चक्र के भीतर से क्यो जा रहे है? किस युक्ति के आधार पर

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इस दृश्यमान जगत् की व्याख्या की जाय ? यदि हममे इससे अधिक दूर जाने की शक्ति न रहे, यदि हमारे लिए इसकी अपेक्षा कुछ अधिक चाहने को न रहे, तब तो यह पंचेन्द्रिय-ग्राह्य जगत् ही हमारे ज्ञान की चरम सीमा रह जायगा। इसी को अज्ञेयवाद कहते हैं। किन्तु प्रश्न यह है कि इन इन्द्रियो की गवाही मे विश्वास करने के लिए भला हमारे पास कौनसी युक्ति है ? मैं तो उन्ही को यथार्थ अज्ञेयवादी कहूँगा, जो रास्ते मे चुप खडे रहकर मर सकते है। यदि युक्ति ही हमारा सर्वस्व हो, तो वह तो - हमें इस शून्यवाद को लेकर संसार मे स्थिर होकर कही रहने न देगी। यदि कोई धन और नाम-यश की स्पृहा के छोड शेष सभी विषयो के सम्बन्ध मे आस्थाहीन हो, तो वह केवल पाखण्डी है। कॉन्ट (Kant) ने निःसन्दिग्ध रूप से प्रमाणित किया है कि हम युक्तिरूपी दुर्भेद्य दीवार का अतिक्रमण कर उसके उस पार नही जा सकते। किन्तु भारत मे तो समस्त विचारधाराओ की पहली बात है—युक्ति के उस पार चले जाना। योगीगण अत्यन्त साहस के साथ इस राज्य की खोज में प्रवृत्त होते है, और अन्त में ऐसी एक अवस्था को प्राप्त करने मे सफल होते हैं, जो समस्त युक्ति-विचार के परे है और केवल जिसमे ही हमारी वर्तमान परिदृश्यमान अवस्था का स्पष्टीकरण मिलता है। यही लाभ है उसके अध्ययन से, जो हमें जगत् के अतीत ले जाता है।

“तुम हमारे पिता हो, तुम हमे अज्ञान के उस पार ले जाओगे ॥”

“त्वं हि न. पिता, योऽस्माकमविद्याया. पर पार तारयसि ॥”*

यही धर्मविज्ञान है। इसके अतिरिक्त और कुछ भी यथार्थ धर्मविज्ञान नाम के योग्य नही हो सकता।


* प्रश्नोपनिषद्, ६।८

> अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥

पातंजल-योगसूत्र

प्रथम अध्याय

समाधिपाद

अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥

सूत्रार्थ—अब योग की व्याख्या करते हैं।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥

सूत्रार्थ—चित्त को विभिन्न वृत्तियों अर्थात् आकार में परिणत होने से रोकना ही योग है।

व्याख्या—यहाँ बहुतसी बातें समझाने की आवश्यकता है। पहले हमें यह समझ लेना होगा कि यह चित्त और ये वृत्तियाँ क्या हैं। मेरी ये आँखें हैं। आँखें वास्तव में नहीं देखतीं। यदि मस्तिष्क में स्थित दर्शनेन्द्रिय या दर्शनशक्ति को नष्ट कर दो, तो भले ही तुम्हारी आँखें रहें, आँखों की पुतलियाँ भी साबूत रहें और आँख के ऊपर जिस छवि के पड़ने से दर्शन होता है, वह भी रहे, पर फिर भी आँखें देख न सकेंगी। अतः आँख दर्शन का गौण यन्त्र मात्र हुईं। वह वास्तव में दर्शनेन्द्रिय नहीं है। दर्शनेन्द्रिय तो मस्तिष्क के अन्तर्गत स्नायु-केन्द्र में अवस्थित है। अतएव हमने देखा कि दर्शन-क्रिया के लिए केवल दो आँखें ही पर्याप्त नहीं हैं। कभी-कभी मनुष्य आँखें खुली रखकर सो जाता है। वस्तु का चित्र आँखों पर बना हुआ है, दर्शनेन्द्रिय भी है, पर और एक तीसरी वस्तु की आवश्यकता है—और वह है मन। मन को इन्द्रिय के साथ संयुक्त रहना चाहिए। अतः दर्शन-क्रिया के लिए चक्षुरूप बहिर्यन्त्र, मस्तिष्क में स्थित स्नायु-केन्द्र और मन—ये तीन

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चीजे चाहिए। कभी-कभी ऐसा होता है कि रास्ते से गाड़ियाँ दौड़ती हुई निकल जाती हैं, पर तुम उन्हे सुन नही पाते। क्यो ? इसलिए कि तुम्हारा मन श्रवणेन्द्रिय के साथ सयुक्त नही रहता। अतएव, प्रत्येक अनुभव-क्रिया के लिए पहले तो बाहर का यन्त्र, उसके बाद इन्द्रिय, और तृतीयत, इन दोनो के साथ मन का योग चाहिए। मन, विषय के अभिघात से उत्पन्न हुई सवेदना को और भी अन्दर ले जाकर निश्चयात्मिका बुद्धि के सामने पेश करता है। तब बुद्धि से प्रतिक्रिया होती है। इस प्रतिक्रिया के साथ अह-भाव जाग उठता है। फिर क्रिया और प्रतिक्रिया का यह मिश्रण पुरुष अर्थात् प्रकृत आत्मा के सामने लाया जाता है। तब वे पुरुष इस मिश्रण को एक (ससीम) वस्तु के रूप में अनुभव करते हैं। पाँचो इन्द्रिय, मन, निश्चयात्मिका बुद्धि और अहकार को मिलाकर अन्त करण कहते हैं। ये सब मन के उपादान स्वरूप चित्त के भीतर होनेवाली भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएँ हैं। चित्त में उठनेवाली विचार-तरंगों को वृत्ति (भँवर) कहते हैं। अब प्रश्न यह है कि यह विचार है क्या चीज ? गुरुत्वाकर्षण या विकर्षण शक्ति के समान विचार भी एक शक्ति है। प्रकृति के अक्षय शक्ति-भंडार से चित्त नामक करण कुछ शक्ति को ग्रहण कर लेता है, अपने में भिदा लेता है और उसे विचार के रूप में बाहर भेजता है। यह शक्ति हमे खाद्यान्न के जरिये प्राप्त होती है और इस खाद्यान्न से शरीर गति आदि की शक्ति प्राप्त करता है। दूसरी अर्थात् सूक्ष्मतर शक्तियो को वह विचार के रूप में बाहर भेजता है। अतएव मन चेतन नही है, फिर भी वह चेतन-सा प्रतीत होता है। क्यों ? इसलिए कि चेतन आत्मा उसके पीछे है। तुम ही एकमात्र चेतन पुरुष

१२८ राजयोग

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हो—मन तो केवल एक करण अर्थात् यन्त्र मात्र है, जिसके द्वारा तुम बाह्य जगत् की उपलब्धि करते हो। इस पुस्तक की ही बात लो, बाहर मे इसका पुस्तकरूपी अस्तित्व नही है। बाहर मे वस्तुत जो है, वह तो अज्ञात और अज्ञेय है। वह केवल स्फूर्ति (सकेत) देनेवाला कारण मात्र है। जैसे पानी में एक पत्थर फेंकने पर पानी प्रवाहाकार में बँटकर उस पत्थर पर प्रतिघात करता है, ठीक वैसे ही वह अज्ञात वस्तु जाकर मन मे आघात प्रदान करती है, और मन से पुस्तक के रूप में एक प्रतिक्रिया होती है। यथार्थ वहिर्जगत् तो स्फूर्ति देनेवाला कारण मात्र है, जिससे मानसिक प्रतिक्रिया होती है। एक पुस्तक का रूप, हाथी का रूप या मनुष्य का रूप बाहर में कोई अस्तित्व नही रखता, हम जो कुछ जानते हैं, वह बाहर की स्फूर्ति से होनेवाली हमारी मानसिक प्रतिक्रिया मात्र है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा है— “अनुभव की नित्य सम्भाव्यता का नाम जड पदार्थ है।” बाहर मे जो है, वह है केवल इस प्रतिक्रिया को उत्पन्न करनेवाली स्फूर्ति मात्र। उदाहरणार्थ, मोती की एक सीप को लो। तुम लोग जानते हो, मोती किस तरह पैदा होता है। बालुका का एक कण * या अन्य कोई चीज़ सीप मे घुस जाती है और उसमें क्षोभ उत्पन्न करने लगती है। इससे वह सीप उस बालुका-कण के चारो ओर 'एनामेल' के समान एक प्रकार का लेप-सा डालने लगती है। बस उसी से मोती तैयार होता है। यह सारा अनुभवात्मक जगत् मानो हमारे अपने उस लेप के समान है,


* वैज्ञानिको के मतानुसार, लोगो में प्रचलित बालुका-कण से मोती की उत्पत्ति सम्बन्धी विश्वास की कोई दृढ भित्ति नही है, सम्भवत क्षुद्र कीटाणुविशेष (Parasites) से मोती की उत्पत्ति होती है।

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'और यथार्थ जगत् मानो वह बालुका-कण है। सामान्य मनुष्य उसे कभी समझ न सकेगा, क्योकि जब कभी वह उसे समझने की कोशिश करता है, त्योही वह बाहर मे मानो अपना लेप डालने लगता है, और बस अपने उस लेप को ही देखता है। अब हम समझे कि वृत्ति का सच्चा अर्थ क्या है। मनुष्य का जो असल स्वरूप है, वह मन के अतीत है। मन तो उसके हाथो एक यन्त्रस्वरूप है। उसी का चैतन्य इस मन के भीतर मे से होकर आ रहा है। जब तुम इस मन के पीछे द्रष्टा-रूप से अवस्थित रहते हो, तभी वह चैतन्यमय होता है। जब मनुष्य इस मन को बिल्कुल त्याग देता है, तो उस मन का सम्पूर्ण नाश हो जाता है, उसका अस्तित्व ही नही रह जाता। अब समझ मे आया कि चित्त का क्या तात्पर्य है। वह मन का उपादान-स्वरूप है, और वृत्तियां उस पर उठनेवाली लहरे और तरगे है। जब बाहर के कुछ कारण उस पर कार्य करने लगते है, त्योही वह तरग-रूप धारण कर लेता है। हम जिसे जगत् कहते हैं, वह तो इन वृत्तियो की समष्टि मात्र है।

हम लोग सरोवर की तली को नही देख सकते, क्योकि उसकी सतह छोटी-छोटी लहरो से व्याप्त रहती है। उस तली की झलक मिलना तभी सम्भव है, जब ये सारी लहरे शान्त हो जायें और पानी स्थिर हो जाय। यदि पानी गँदला हो, या सारे समय उसमे हलचल होती रहे, तो वह तली कभी दिखाई न देगी। पर यदि पानी निर्मल हो और उसमें एक भी लहर न रहे, तब हम उस तली को अवश्य देख सकेंगे। यह चित्त मानो उस सरोवर के समान है और हमारा असल स्वरूप मानो उसकी तली है, वृत्तियां उस पर उठनेवाली लहरे है। फिर यह भी

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देखा जाता है कि यह मन तीन प्रकार की अवस्थाओ में रहता है। एक है तम की अर्थात् अन्धकारमय अवस्था, जैसा कि हम पशुओ और अत्यन्त मूर्खों में पाते हैं। ऐसे मन की प्रवृत्ति केवल औरो को अनिष्ट पहुँचाने में ही होती है; मन की इस अवस्था में और दूसरा कोई विचार ही नही सूझता। दूसरा है—रज अर्थात् मन की क्रियाशील अवस्था, जिसमे केवल प्रभुत्व और भोग की इच्छा रहती है। उस समय यही भाव रहता है कि मैं शक्तिमान होऊँगा और दूसरो पर प्रभुत्व करूँगा। तीसरा है—सत्त्व अर्थात् मन की गम्भीर और शान्त अवस्था, जिसमें समस्त तरंगे शान्त हो जाती हैं और मानस-सरोवर का जल निर्मल हो जाता है। यह कोई जडावस्था नही है, प्रत्युत यह तो तीव्र क्रियाशील अवस्था है। शान्त होना शक्ति की महत्तम अभिव्यक्ति है। क्रियाशील होना तो सहज है। बस लगाम ढीली कर दो, तो घोडे स्वय तुम्हे भगा ले जायेंगे। यह तो कोई भी कर सकता है, पर शक्तिमान पुरुष तो वह है, जो इन तेज घोडो को थाम सके। किसमें अधिक शक्ति लगती है—लगाम ढीली कर देने में अथवा उसे थामे रखने मे ? शान्त मनुष्य और आलसी मनुष्य एक समान नही हैं। सत्त्व को कहीं आलस्य न समझ बैठना। शान्त मनुष्य वह है, जो मन की इन लहरो को अपने वश में लाने मे समर्थ हुआ है। क्रियाशीलता निम्नतर शक्ति का प्रकाश है और शान्तभाव उच्चतर शक्ति का।

यह चित्त अपनी स्वाभाविक पवित्र अवस्था को फिर से प्राप्त करने के लिए सतत चेष्टा कर रहा है, किन्तु इन्द्रियाँ उसे बाहर खीचे रखती है। उसका दमन करना, उसकी इस बाहर जाने की प्रवृत्ति को रोकना और उसे लौटाकर उस चैतन्यघन पुरुष के

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पास ले जानेवाले रास्ते पर लाना—यही योग का पहला सोपान है; क्योकि केवल इसी उपाय से चित्त अपने यथार्थ रास्ते पर आ सकता है।

यद्यपि उच्चतम से लेकर निम्नतम तक सभी प्राणियो में यह चित्त विद्यमान है, तथापि केवल मनुष्य-शरीर मे ही हम उसे बुद्धि-रूप मे विकसित देख पाते है। जब तक यह चित्त बुद्धि का रूप धारण नही कर लेता, तब तक उसके लिए इन सब विभिन्न सोपानो में से होते हुए लौटकर आत्मा को मुक्त करना सम्भव नही। यद्यपि गाय या कुत्ते के भी मन है पर उनके लिए सद्योमुक्ति असम्भव है, क्योकि उनका चित्त अभी बुद्धि का रूप धारण नही कर सकता।

यह चित्त अवस्था-भेद से बहुत से रूप धारण करता है जैसे—क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त और एकाग्र (विवेकख्याति या प्रसंख्यान) *। मन इन चार प्रकार की अवस्थाओ मे चार प्रकार के रूप धारण करता है। पहला है क्षिप्त, जिसमें मन चारो ओर बिखर जाता है और कर्मवासना प्रबल रहती है। इस अवस्था मे मन की प्रवृत्ति केवल सुख और दुःख इन दो भावो मे ही प्रकाशित होने की होती है। उसके बाद है मूढ अवस्था। यह अवस्था तमोगुणात्मक है और इसमे मन की प्रवृत्ति केवल औरो का अनिष्ट करने में होती है। विक्षिप्त अवस्था वह है, जब मन अपने केन्द्र की ओर जाने का प्रयत्न करता है। यहाँ पर टीकाकार कहते हैं कि विक्षिप्त अवस्था देवताओ के लिए स्वाभाविक है और मूढावस्था असुरों के लिए। एकाग्र चित्त ही हमे समाधि मे ले जाता है।


* यहाँ निरुद्ध (धर्ममेघ या परप्रसंख्यान) अवस्था की बात नही कही गई, क्योकि वास्तव में निरुद्धावस्था को चित्तवृत्ति नही कही जा सकती।

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तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥

सूत्रार्थ—उस समय (अर्थात् इस निरोध की अवस्था में) द्रष्टा (पुरुष) अपने (अपरिवर्तनशील) स्वरूप में अवस्थित रहते हैं।

व्याख्या—ज्योंही लहरे शान्त हो जाती हैं और पानी स्थिर हो जाता है, त्योंही हम सरोवर की तली को देख पाते हैं। मन के बारे में भी ठीक ऐसा ही समझो। जब यह शान्त हो जाता है, तब हम देख पाते हैं कि अपना असल स्वरूप क्या है, फिर हम उन तरंगों के साथ अपने आपको एकरूप नहीं कर लेते, वरन् अपने स्वरूप में अवस्थित रहते हैं।

वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥

सूत्रार्थ—(इस निरोध की अवस्था को छोड़कर) दूसरे समय में द्रष्टा वृत्ति के साथ एकरूप होकर रहते हैं।

व्याख्या—उदाहरणार्थ, मान लो किसी ने मेरी निन्दा की। बस वह मेरे मन में एक वृत्ति उठा देता है और मैं उसके साथ अपने आपको एकरूप कर देता हूँ। इसका परिणाम होता है—दुख।

वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टा अक्लिष्टाः ॥५॥

सूत्रार्थ—वृत्तियां पांच प्रकार की हैं—(कुछ) क्लेशयुक्त और (कुछ) क्लेशशून्य।

प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृतयः ॥६॥

सूत्रार्थ—(ये हैं) प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—अर्थात् सत्यज्ञान, भ्रमज्ञान, शब्द-भ्रम, निद्रा और स्मृति।

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥७॥

सूत्रार्थ—प्रत्यक्ष अर्थात् साक्षात् अनुभव, अनुमान और आगम अर्थात् विश्वस्त लोगों के वाक्य—(ये तीन) प्रमाण हैं।

पातंजल-योगसूत्र १३३

पातंजल-योगसूत्र १३३

व्याख्या—जब हमारी दो अनुभूतियाँ आपस में विरोधी नही होती, तब उसे हम प्रमाण कहते है। मान लो, मैंने कुछ सुना, यदि वह पहले अनुभव की हुई किसी बात का खण्डन करे, तो मेरे भीतर उसके विरुद्ध तर्क-वितर्क होने लगते है और मैं उस पर विश्वास नही करता। प्रमाण के फिर तीन प्रकार हैं। साक्षात् अनुभव या प्रत्यक्ष—यह एक प्रकार का प्रमाण है। यदि हम किसी प्रकार आँख और कान के भ्रम मे न पड़े हो, तो हम जो कुछ देखते या अनुभव करते हैं, उसे प्रत्यक्ष कहा जायगा। मैं इस दुनिया को देखता हूँ, बस यह उसके अस्तित्व का पर्याप्त प्रमाण है। दूसरा है अनुमान—लक्षण से लक्ष्य वस्तु पर आना। तुमने कोई संकेत देखा और उससे तुम उस वस्तु पर आ गए, जिसका कि वह संकेत है। तीसरा है आप्तवाक्य—योगियों अर्थात् सत्यद्रष्टा ऋषियों की प्रत्यक्ष अनुभूति। हम सभी ज्ञान की प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्न कर रहे हैं, पर तुम्हें और मुझे उसके लिए कड़ी चेष्टा करनी पड़ती है, दीर्घकाल तक विचाररूप अरुचिकर रास्ते से होकर अग्रसर होना पड़ता है; किन्तु विशुद्धसत्त्व योगी इन सबके पार चले गए हैं। उनके मनश्चक्षु के सामने भूत, भविष्य और वर्तमान सब एक हो गए हैं, उनके लिए वे सब मानो एक पाठ्य पुस्तक के समान हैं। हम लोगों को ज्ञान-लाभ के लिए जिस अरुचिकर प्रणाली में से होकर जाना पड़ता है, उनके लिए उसकी फिर और आवश्यकता नही रह जाती। उनका वाक्य ही प्रमाण है, क्योंकि वे अपने भीतर ही सारे ज्ञान की उपलब्धि करते हैं। वे सर्वज्ञ पुरुष हैं। ऐसे व्यक्ति ही पवित्र शास्त्रग्रन्थों के प्रणेता हैं, और इसीलिए शास्त्र प्रमाण-रूप से ग्राह्य हैं। यदि वर्तमान समय में

१३४ राजयोग

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ऐसे मनुष्य कोई हो, तो उनकी बात भी अवश्य प्रमाण-रूप से ग्राह्य होगी। दूसरे दार्शनिकों ने इस आप्त के बारे मे बहुत से तर्क-वितर्क किए हैं। उनका प्रश्न है कि आप्तवाक्य को सत्य क्यो माना जाय ? इसका उत्तर यह है कि वह उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति है। मान लो, तुमने या मैने कोई बात देखी। यदि वह पहले किए हुए अनुभव की विरोधी न हो, तो वह प्रमाण-रूप से ग्राह्य होती है। ठीक इसी तरह उसका भी प्रामाण्य समझना चाहिए। इन्द्रियों के भी अतीत एक ज्ञान है, और जब कभी यह ज्ञान युक्ति और मनुष्य की पूर्व-अनुभूति का खण्डन नही करता, तब उसे प्रमाण कहते हैं। यदि कोई पागल इस कमरे में घुस आए और कहने लगे, 'मै सब ओर देवता देख रहा हूँ,' तो वह प्रमाण न कहा जायगा। पहले तो, वह ज्ञान सत्य होना चाहिए। दूसरे, वह पहले के किसी ज्ञान का खण्डन न करे। और तीसरे, वह उस मनुष्य के चरित्र-बल पर आधारित हो। मैंने बहुतो को यह कहते सुना है कि मनुष्य का चरित्र उतने महत्त्व का नही है, जितना कि उसके शब्द, वह क्या कहता है, बस उसी को पहले सुनो। अन्य विषयों के सम्बन्ध मे यह बात भले ही सत्य हो, पर धर्म के सम्बन्ध में तो यह सम्भव नही। एक व्यक्ति दुष्ट स्वभाववाला होता हुआ भी ज्योतिष के बारे में कुछ आविष्कार कर सकता है, पर धर्म के बारे मे बात अलग है, क्योकि कोई भी अपवित्र मनुष्य धर्म के यथार्थ सत्य को किसी काल में प्राप्त नही कर सकता। अतएव, सबसे पहले हमे देखना होगा कि जो व्यक्ति अपने आपको आप्त कहकर ढिंढोरा पीटता है, वह पूर्णतया नि स्वार्थ और पवित्र है अथवा नही। दूसरे, उसने अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति की है या नही। तीसरे, वह जो

पातंजल-योगसूत्र १३५

पातंजल-योगसूत्र १३५

कुछ कहता है, वह मनुष्य-जाति के किसी पूर्व-ज्ञान या पूर्व-अनुभव का खण्डन तो नही करता। आविष्कृत कोई भी नया सत्य पूर्व-कालीन किसी सत्य का खण्डन नही करता, वरन् वह तो पूर्व सत्य के साथ पूरी तरह मेल खाता है। और चौथे, दूसरो के लिए उस सत्य की प्राप्ति करना सम्भव होना चाहिये। यदि कोई मनुष्य कहे कि मुझे एक दर्शन हुआ है और साथ ही यह भी बोले कि उसे मै ही देख सकता हूँ—और किसी के वश की वह बात नही, तो मै उसकी बात पर विश्वास नही करता। प्रत्येक मनुष्य स्वयं प्रत्यक्ष उपलब्धि करके यह देख सके कि वह सत्य है या नही। फिर, जो व्यक्ति अपना ज्ञान बेचता फिरता है, वह आप्त नहीं है। ये सब शर्तें अवश्य पूरी होनी चाहिए। तुम्हे पहले देखना होगा कि वह व्यक्ति पवित्र और नि स्वार्थ है, उसमे रुपया-कौडी या नाम-यश की तृष्णा नहीं। दूसरे, उसके जीवन से यह प्रकट होना चाहिए कि वह ज्ञानातीत भूमि पर पहुँच गया है। तीसरे, उसे हम लोगो को ऐसा कुछ देना चाहिए, जो हम इन्द्रियो से न पा सकते हो और जो ससार के कल्याण के लिए हो। साथ ही, वह किसी दूसरे सत्य का खण्डन न करे; यदि वह दूसरे वैज्ञानिक सत्यो का खण्डन करता हो, तो उसे तुरन्त त्याग दो। और चौथे, वह व्यक्ति किसी सत्य की ठेकेदारी न करे, अर्थात् वह ऐसा न कहे कि इस सत्य में मेरा ही अधिकार है, किसी दूसरे का नहीं। वह अपने जीवन मे उसी को कार्यरूप मे परिणत करके दिखाए, जो दूसरो के लिए भी प्राप्त करना सम्भव हो। अतएव, प्रमाण तीन प्रकार के हुए—प्रत्यक्ष अर्थात् इन्द्रियो द्वारा विषयो की अनुभूति, अनुमान और आप्तवाक्य। मै इस 'आप्त' शब्द का अँगरेजी में अनुवाद नही

१३६ राजयोग

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कर सकता। इसे 'अनुप्राणित' (inspired) शब्द द्वारा व्यक्त नही किया जा सकता, क्योकि यह अनुप्राणन बाहर से आता है, और यहाँ जिस भाव की बात हो रही है, वह भीतर से आता है। इसका शाब्दिक अर्थ है—"जिन्होने पाया है"।

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥

सूत्रार्थ—विपर्यय का अर्थ है मिथ्याज्ञान, जो उस वस्तु के यथार्थ स्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं है। (इसके तीन प्रकार हैं—संशय, विपर्यय और तर्क।)

व्याख्या—दूसरे प्रकार की वृत्ति है—एक वस्तु में किसी दूसरे वस्तु की भ्रान्ति, जैसे शुक्ति मे रजत का भ्रम। इसे विपर्यय कहते हैं।

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥

सूत्रार्थ—यदि किसी शब्द से सूचित वस्तु का अस्तित्व न रहे, तो उस शब्द से जो एक प्रकार का ज्ञान उठता है, उसे विकल्प अर्थात् शब्द-जात भ्रम कहते हैं। (इसके तीन प्रकार हैं—वस्तु, क्रिया व अभाव।)

व्याख्या—विकल्प नामक और एक प्रकार की वृत्ति है। कोई बात हम सुनते हैं, और उसके अर्थ पर शान्तिभाव से विचार न कर झट से एक सिद्धान्त कर बैठते हैं। यह चित्त की कमजोरी का लक्षण है। अब संयमवाद अच्छी तरह समझ मे आ सकेगा। मनुष्य जितना कमजोर होता है, उसकी संयम की शक्ति उतनी ही कम रहती है। तुम अपने आपको सदा इस संयम की कसौटी पर कसो। जब तुममे क्रोध या दुखित होने का भाव आए, तो उस समय विचार करके देखना कि यह कैसे हो रहा है, यह कैसे है कि कोई खबर तुम्हारे पास आते ही तुम्हारे मन को वृत्तियो मे परिणत किए दे रही है।

पातंजल-योगसूत्र १३७

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१०॥

सूत्रार्थ—जो वृत्ति शून्यभाव का अवलम्बन करके रहती है, उसे निद्रा कहते हैं।

व्याख्या—और एक प्रकार की वृत्ति का नाम है निद्रा (स्वप्न और सुषुप्ति)। हम जब जाग उठते हैं, तब हम जान पाते हैं कि हम सो रहे थे। केवल अनुभूत विषय की ही स्मृति हो सकती है। हम जिसका अनुभव नहीं करते, उस विषय की हमें कोई स्मृति नहीं आ सकती। हर एक प्रतिक्रिया मानो चित्तरूपी सरोवर की एक तरंग है। अब, यदि निद्रा में मन की किसी प्रकार की वृत्ति न रहती, तो उस अवस्था में हमें भावात्मक या अभावात्मक कोई भी अनुभूति न होती। अतः हम उसका स्मरण भी नहीं कर पाते। हम जो निद्रावस्था का स्मरण कर सकते हैं, उसी से यह प्रमाणित हो जाता है कि निद्रावस्था में मन में एक प्रकार की तरंग थी। स्मृति भी एक प्रकार की वृत्ति है।

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥११॥

सूत्रार्थ—अनुभव किए हुए विषयों का मन से लोप न होना (और संस्कारवश उनका ज्ञान के स्तर पर आ उठना) स्मृति कहलाता है। (इसके दो प्रकार हैं—भावित और अनुद्भावित।)

व्याख्या—ऊपर में जिन चार प्रकार की वृत्तियों के बारे में कहा गया है, उनमें से प्रत्येक से स्मृति आ सकती है। मान लो, तुमने एक शब्द सुना। यह शब्द चित्तरूपी सरोवर में फेंके गए एक पत्थर के समान है, उससे एक छोटीसी लहर पैदा हो जाती है और यह लहर फिर बहुतसी छोटी-छोटी लहरों को उत्पन्न करती है। यही स्मृति है। निद्रा में भी यही घटना होती रहती.

१३८ राजयोग

१३८ राजयोग

हैं। जब निद्रा नामक लहरविशेष चित्त के अन्दर स्मृतिरूप अनेक लहरें उत्पन्न कर देती है, तब उसे स्वप्न कहते हैं। जाग्रत् अवस्था मे जिसे स्मृति कहते है, निद्राकाल मे उसी प्रकार की वृत्ति को स्वप्न कहते हैं।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥१२॥

सूत्रार्थ—अभ्यास और वैराग्य से उन (वृत्तियो) का निरोध होता है।

व्याख्या—इस वैराग्य को प्राप्त करने के लिए यह विशेष रूप से आवश्यक है कि मन निर्मल, सत् और विचारपूर्ण हो। अभ्यास करने की क्या आवश्यकता है? प्रत्येक कार्य सरोवर के वक्षस्थल पर काँपते हुए प्रवाह के समान है। प्रत्येक कार्य से मानो चित्तरूपी सरोवर के ऊपर एक तरग खेल जाती है। यह कम्पन कुछ समय बाद नष्ट हो जाता है। फिर क्या शेष रहता है?—केवल सस्कारसमूह। मन मे ऐसे बहुतसे सस्कार पडने पर वे इकट्ठे होकर अभ्यास के रूप में परिणत हो जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि "अभ्यास ही द्वितीय स्वभाव है।" केवल द्वितीय स्वभाव नही, वरन् वह 'प्रथम' स्वभाव भी है—मनुष्य का समस्त स्वभाव इस अभ्यास पर निर्भर रहता है। हमारा अभी जो स्वभाव है, वह पूर्व अभ्यास का फल है। यह जान सकने से कि सब कुछ अभ्यास का ही फल है, मन में शान्ति आती है, क्योकि यदि हमारा वर्तमान स्वभाव केवल अभ्यासवश हुआ हो, तो हम चाहे तो किसी भी समय उस अभ्यास को नष्ट भी कर सकते हैं। हमारे मन मे जो विचार-धाराएँ बह जाती हैं, उनमें से प्रत्येक अपना एक एक चिह्न छोड़ जाती है। उन्ही की समष्टि को सस्कार कहते हैं।