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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

२६२ | राजयोग

पूर्णता ही अभिव्यक्ति में आ जा रही है। हमारे अन्दर यह पूर्णतारूप अनन्त तरङ्गराशि आगे को प्रवाहित करने के लिए प्रयत्न कर रही है। ये सङ्घर्ष और होड़ केवल हमारे अज्ञान के फल हैं। ये इसलिए होते हैं कि हम यह नहीं जानते कि यह दरवाजा कैसे खोला जाय और पानी भीतर कैसे लाया जाय। हमारे पीछे जो अनन्त तरङ्गराशि है, वह अपने को प्रकाशित करेगी ही। वही समस्त अभिव्यक्ति का कारण है। केवल जीवन-धारण या इन्द्रियों को तृप्तार्थ करने की चेष्टा उस अभिव्यक्ति का कारण नहीं है। ये सब संघर्ष तो वास्तव में क्षणिक हैं, अनावश्यक हैं, बाह्य व्यापार मात्र हैं। ये सब अज्ञान से पैदा हुए हैं। सारी होड़ बन्द हो जाने पर भी, जब तक हममें से प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक हमारे भीतर निहित यह पूर्णस्वभाव हमें क्रमशः उन्नति की ओर अग्रसर कराता रहेगा। अतः यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि होड़ या प्रतियोगिता उन्नति के लिए आवश्यक है। पशु के भीतर मनुष्य गूढ़भाव से निहित है, ज्योंही किवाड़ खोल दिया जाता है, अर्थात् ज्योंही बाधा हट जाती है, त्योंही वह मनुष्य प्रकाशित हो जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य के भीतर भी देवता गूढ़भाव से विद्यमान है, केवल अज्ञान का आवरण उसे प्रकाशित नहीं होने देता। जब ज्ञान इस आवरण को चीर डालता है, तब भीतर का वह देवता प्रकाशित हो जाता है।

निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥

सूत्रार्थ—बनाए हुए चित्त केवल अस्मिता (अहं-तत्त्व) से होते हैं।

पातंजल-योगसूत्र-४ २६३

व्याख्या--कर्मवाद का तात्पर्य यह है कि हमें अपने भले-बुरे कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, और सारे दर्शनशास्त्रों का एकमात्र उद्देश्य यह है कि मनुष्य अपनी महिमा को जान ले। सभी शास्त्र मनुष्य की—आत्मा की—महिमा की घोषणा कर रहे हैं, फिर उसके साथ-साथ कर्मवाद का भी प्रचार कर रहे हैं। शुभकर्मों का शुभ फल और अशुभ कर्मों का अशुभ फल होता है। यदि शुभ और अशुभ कर्म आत्मा पर प्रभाव डाल सकते हों, तो फिर आत्मा तो कुछ भी नहीं रही। वास्तव में अशुभ कर्म तो पुरुष के अपने स्वरूप के प्रकाश में बाधा भर डालते हैं, और शुभ कर्म उन बाधाओं को दूर कर देते हैं, तभी पुरुष की महिमा प्रकाशित होती है। स्वयं पुरुष में कभी परिवर्तन नहीं होता। तुम चाहे जो करो, तुम्हारी महिमा को—तुम्हारे अपने स्वरूप को कुछ भी नष्ट नहीं कर सकता, क्योंकि कोई भी वस्तु आत्मा पर प्रभाव नहीं डाल सकती। उससे आत्मा पर मानो एक आवरण भर पड़ जाता है, जिससे आत्मा की पूर्णता ढक जाती है।

योगीगण जल्दी-जल्दी कर्म का क्षय कर डालने के लिए काय-व्यूह (शरीरसमूह) का सृजन करते हैं। फिर इन सब शरीरों के लिए वे अपनी अस्मिता या अहंतत्त्व से बहुतसे चित्तों की सृष्टि करते हैं। इन निर्मित चित्तों को, मूल चित्त से उनका भेद स्पष्ट करने के लिए, 'निर्माणचित्त' कहते हैं।

प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥५॥

सूत्रार्थ—यद्यपि इन विभिन्न बनाए हुए चित्तों के कार्य नाना प्रकार के हैं, तो भी वह एक आदि (मूल) चित्त ही उन सबों का नियन्ता है।

व्याख्या—ये अलग-अलग मन (चित्त), जो अलग-

२६४ | राजयोग

अलग देहो में कार्य करते है, 'निर्माणचित्त' कहलाते हैं और इन निर्मित शरीरो को 'निर्माणदेह' कहते है । भूत और मन मानो दो अनन्त भाण्डार के समान है । योगी होने पर ही तुम उन पर अधिकार प्राप्त करने का रहस्य जान सकोगे । तुम्हे तो वह सदैव विदित था, पर तुम उसे भूल भर गए थे । तुम जब योगी हो जाओगे, तो वह फिर से तुम्हारी स्मृति मे आ जायगा । तब तुम उसे लेकर जो इच्छा हो वही कर सकोगे । जिस उपादान से इस बृहत् ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है, यह निर्माणचित्त भी उसी उपादान से निर्मित होता है । मन और भूत आपस में एक दूसरे से बिलकुल भिन्न पदार्थ नही है, वे तो एक ही पदार्थ की दो विभिन्न अवस्थाएँ मात्र है । अस्मिता ही वह उपादान, वह सूक्ष्म वस्तु है, जिससे योगी के ये निर्माणचित्त और निर्माणदेह तैयार होते है । अतएव, योगी जब प्रकृति की इन शक्तियो का रहस्य जान लेते है, तब वे अस्मिता नामक पदार्थ से जितनी इच्छा हो, उतने मन और शरीर निर्माण कर सकते हैं ।

तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥६॥

सूत्रार्थ—उन विभिन्न चित्तो में से जो चित्त समाधि द्वारा उत्पन्न होता है, वह वासनाशून्य होता है ।

व्याख्या—विभिन्न व्यक्तियो मे हम जो विभिन्न प्रकार के मन देखते हैं, उनमे वही मन सबसे ऊँचा है, जिसे समाधि-अवस्था प्राप्त हुई है । जो व्यक्ति ओषधि, मन्त्र या तपस्या के बल से कुछ शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है, उसकी तब भी वासनाएँ बनी ही रहती हैं, पर जो व्यक्ति योग के द्वारा समाधि प्राप्त कर लेता है, केवल वही समस्त वासनाओ से मुक्त होता है ।

> कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥

पातंजल-योगसूत्र—४ २६५

कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥७॥

सूत्रार्थ—योगियों के कर्म शुक्ल भी नहीं और कृष्ण भी नहीं, (पर) दूसरों के कर्म तीन प्रकार के होते हैं--शुक्ल, कृष्ण और मिश्र ।

व्याख्या—जब योगी इस प्रकार की पूर्णता प्राप्त कर लेते हैं, तब उनके कार्य और उन कार्यों के फल उन्हें फिर बाँध नहीं सकते, क्योंकि उनमें वासना का संस्पर्श नहीं रह जाता । वे केवल कर्म किए जाते हैं । वे दूसरों के हित के लिए काम करते हैं, दूसरों का उपकार करते हैं, किन्तु वे उसके फल की चाह नहीं रखते । अत: वह उनके पास नहीं आता । पर साधारण मनुष्यों के लिए, जिन्हें यह सर्वोच्च अवस्था प्राप्त नहीं हुई है, कर्म त्रिविध होते हैं--कृष्ण (पापकर्म), शुक्ल (पुण्यकर्म) और मिश्र (पाप और पुण्य मिले हुए) ।

ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥८॥

सूत्रार्थ—इन त्रिविध कर्मों से प्रत्येक अवस्था में वे ही वासनाएँ प्रकाशित होती हैं, जो केवल उस अवस्था में प्रकाशित होने की योग्य हैं । (अन्य सब उस समय के लिए स्तम्भित रूप से रहती हैं ।)

व्याख्या—मान लो, मैंने पाप, पुण्य और मिश्रित, ये तीन प्रकार के कर्म किए । उसके बाद, मान लो, मेरी मृत्यु हो गई, और मैं स्वर्ग में देवता हो गया । मनुष्य-देह की वासना और देव-देह की वासना एक समान नहीं है । देव-शरीर खाना-पीना कुछ नहीं करता । यदि बात ऐसी हो, तो फिर आत्मा के जो पूर्व अभुक्त कर्म हैं, जो अपने फलस्वरूप खाने-पीने की वासना को जन्म देते हैं, वे सब भला कहाँ जाते हैं ? जब मैं देवता हो जाता हूँ, तब ये कर्म कहाँ रहते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वासना उपयुक्त अवस्था और क्षेत्र को पाने पर ही प्रकाशित

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होती है। जिन सब वासनाओ के प्रकाशित होने की उपयुक्त अवस्था आती है, उस समय केवल वे ही प्रकाशित होगी। शेष सब संचित रहेगी। इस जीवन मे हमारी बहुतसी देवोचित वासनाएँ है, बहुतसी मनुष्योचित और बहुतसी पाशविक। जब हम देव-देह धारण करते है, तो केवल शुभ वासनाएँ ही प्रकाशित होती हैं, क्योकि तब उनके प्रकाशित होने का उपयुक्त अवसर आता है। जब हम पशु-देह धारण करते है, तो केवल पाशविक वासनाएँ ही ऊपर आती है और शुभ वासनाएँ बाट देखती रहती हैं। इससे क्या पता चलता है ? यही कि बाहर मे उपयुक्त अवस्था होने पर इन वासनाओ का दमन किया जा सकता है। जो कर्म उस अवस्था के उपयुक्त और अनुकूल हैं, केवल वे ही प्रकाशित होगे। इससे यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि वातावरण की शक्ति कर्म का भी दमन कर सकती है।

जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेक-
रूपत्वात् ॥९॥

**सूत्रार्थ—**स्मृति और सस्कार एकरूप होने के कारण, जाति, देश और काल का व्यवधान रहने पर भी, वासनाओं (कर्म-सस्कारो) का आनन्तर्य रहता है अर्थात् उनमें व्यवधान नहीं होता।

**व्याख्या—**समस्त अनुभूतियाँ सूक्ष्म आकार धारण कर सस्कार के रूप मे परिणत हो जाती हैं। जब वे सस्कार फिर से जागृत होते है, तब उसी को स्मृति कहते हैं। ज्ञानपूर्वक किए गए वर्तमान कर्म के साथ, सस्कार के रूप मे परिणत पूर्व-अनुभूतियो का जो परस्पर अज्ञानयुक्त सम्बन्ध है, यहाँ पर उसका भी 'स्मृति' शब्द से बोध होता है। प्रत्येक देह में वही संस्कार-समष्टि कर्म का कारण होती है, जो उसी जाति की

पातंजल-योगसूत्र—४ २६७

पातंजल-योगसूत्र—४ २६७

देह से प्राप्त हुई है। भिन्न जाति की देह से लब्ध सस्कार-समष्टि उस समय स्तिमित रूप से रहती है। प्रत्येक शरीर इस प्रकार कार्य करता है, मानो वह उसी जाति की देह-परम्परा का एक वंशज हो। इस तरह हम देखते हैं कि वासनाओ का क्रम नष्ट नही होता।

तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥१०॥

**सूत्रार्थ—**सुख की तृष्णा नित्य होने के कारण वासनाएँ भी अनादि हैं।

**व्याख्या—**हम जो कुछ अनुभव या भोग करते हैं, वह सुखी होने की इच्छा से ही उत्पन्न होता है। इस भोग का कोई आदि नही है, क्योकि प्रत्येक नया भोग पहले किए हुए भोग से उत्पन्न प्रवृत्ति या सस्कार पर स्थापित रहता है। अतएव वासना अनादि है।

हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥११॥

**सूत्रार्थ—**हेतु, फल, आश्रय और (शब्दादि) विषय—इनसे वासनाओं का सग्रह होता है, इसलिए इन (चारों) का अभाव होने से उन (वासनाओ) का भी अभाव हो जाता है।

**व्याख्या—**वासनाएँ कार्य-कारणसूत्र से ग्रथित हैं, मन मे कोई वासना उदित होने पर वह अपना फल उत्पन्न किए बिना नष्ट नही होती। फिर, चित्त समस्त पूर्व वासनाओ (कर्म-सस्कारो) का आश्रय है—एक बडा भाण्डारस्वरूप है। ये वासनाएँ संस्कार के रूप मे सचित रहती हैं। जब तक उनका कार्य समाप्त नही हो जाता, तब तक वे नष्ट नही होतीं। फिर, जब तक इन्द्रियाँ बाहरी विषयो को ग्रहण करती रहेंगी, तब तक नई-नई, वासनाएँ भी उठती रहेगी। यदि वासना के

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हेतु, फल, आश्रय और विषय नष्ट कर दिए जा सके, तभी उसका समूल विनाश हो सकता है।

अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥१२॥

**सूत्रार्थ—**वस्तु के धर्म विभिन्न रूप धारण कर सब कुछ हुए है, इसलिए अतीत और अनागत (भविष्य) स्वरूपतः विद्यमान हैं।

**व्याख्या—**तात्पर्य यह है कि असत् से कभी सत् की उत्पत्ति नहीं होती। अतीत और अनागत यद्यपि व्यक्त रूप से नहीं रहते, फिर भी वे सूक्ष्म अवस्था मे रहते हैं।

ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥१३॥

**सूत्रार्थ—**वे (धर्म) कभी व्यक्त अवस्था में रहते हैं, फिर कभी सूक्ष्म अवस्था में चले जाते हैं, और गुण ही उनकी आत्मा अर्थात् स्वरूप हैं।

**व्याख्या—**गुण का तात्पर्य है सत्त्व, रज और तम—ये तीन पदार्थ। उनकी स्थूल अवस्था ही यह परिदृश्यमान जगत् है। भूत और भविष्य इन तीन गुणो के ही विभिन्न प्रकाश से उत्पन्न होते हैं।

परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥१४॥

**सूत्रार्थ—**परिणाम में एकत्व रहने के कारण वस्तु वास्तव में एक है।

**व्याख्या—**यद्यपि वस्तुएँ तीन हैं अर्थात् सत्त्व, रज और तम, फिर भी उनके परिणामो में एक पारस्परिक सम्बन्ध रहने के कारण सभी वस्तुओ मे एकत्व है, ऐसा समझना चाहिए।

वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥१५॥

**सूत्रार्थ—**वस्तु के एक होने पर भी, चित्त भिन्न-भिन्न होने के कारण, विभिन्न प्रकार की वासनाएँ और अनुभूतियां होती हैं।

**व्याख्या—**तात्पर्य यह कि मन से स्वतन्त्र, बाह्य जगत् का

पातंजल-योगसूत्र-४ २६९

अस्तित्व है। यहाँ पर बौद्धों के विज्ञानवाद का खंडन किया जा रहा है। चूंकि भिन्न-भिन्न लोग एक ही वस्तु को विभिन्न रूप से देखते हैं, इसलिए वह किसी व्यक्तिविशेष की कल्पना मात्र नहीं हो सकती।

( न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥१६॥

सूत्रार्थ—फिर, दृश्य वस्तु किसी एक चित्त के अधीन नहीं हैं, (क्योंकि) वैसा होने से जब वह (उस चित्त के) प्रत्यक्षादि प्रमाण का अविषय हो जायगी, उस समय उस वस्तु का क्या होगा ? )

तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ॥१७॥

सूत्रार्थ—चित्त में वस्तु के प्रतिबिम्ब पड़ने की अपेक्षा रहने के कारण वस्तु कभी ज्ञात और कभी अज्ञात होती है।

सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ॥१८॥

सूत्रार्थ—चित्तवृत्तियाँ सदा ज्ञात रहती हैं, क्योंकि उस (चित्त) का स्वामी पुरुष अपरिणामी है।

व्याख्या—अब तक जिस मत की बात कही गई है, उसका सारांश यह है कि जगत् मनोमय और भौतिक, इन दो प्रकार का है। ये मनोमय और भौतिक जगत् सतत परिवर्तनशील हैं। यह पुस्तक क्या है ? यह नित्य परिवर्तनशील कुछ परमाणुओं की समष्टि मात्र है। कुछ परमाणु बाहर जा रहे हैं और कुछ भीतर आ रहे हैं, यह बस एक भँवर के समान है। पर प्रश्न यह है कि ऐसा होने पर फिर एकत्व-बोध कैसे हो रहा है ? यह पुस्तक सर्वदा एक ही रूप में कैसे दिखती है ? कारण यह है कि ये सब परिणाम तालबद्ध (नियमित) रूप से हो रहे हैं, वे मेरे मन में तालबद्ध रूप से अनुभव-प्रवाह भेज रहे हैं। और यद्यपि उनके विभिन्न अंश सतत परिवर्तनशील

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है, तो भी वे ही एकत्र होकर एक अविच्छिन्न चित्र का ज्ञान उत्पन्न कर रहे हैं। मन स्वयं सतत परिवर्तनशील है। मन और शरीर मानो विभिन्न मात्रा में गतिशील एक ही पदार्थ के दो स्तर मात्र हैं। तुलना में एक धीमी और दूसरी द्रुततर होने के कारण हम उन दोनों गतियों को सहज ही पृथक् कर सकते हैं। जैसे एक रेलगाड़ी चल रही है, और एक गाड़ी उसके पास से जा रही है। कुछ परिमाण में इन दोनों की ही गतियाँ निर्णीत हो सकती हैं। किन्तु तो भी दूसरे एक पदार्थ की आवश्यकता है। एक निश्चल वस्तु रहने पर ही गति का अनुभव किया जा सकता है। पर जहाँ दो-तीन वस्तुएँ विभिन्न मात्रा में गतिशील हैं, वहाँ हमें पहले सबसे जोर से चलनेवाली वस्तु का अनुभव होता है, और फिर उससे धीरे चलनेवाली वस्तुओं का। अब प्रश्न यह है कि मन कैसे अनुभव करे ? वह तो हमेशा गतिशील है। अतः, दूसरी एक वस्तु का रहना आवश्यक है, जो अपेक्षाकृत धीमे रूप से गतिशील हो, उसके बाद उसकी अपेक्षा धीमी गतिशील वस्तु चाहिए, फिर उसकी भी अपेक्षा धीमी—इस प्रकार चलते-चलते तो इसका कहीं अन्त न होगा। अतएव, युक्ति हमें किसी एक स्थान में रुक जाने के लिए बाध्य करती है। किसी अपरिवर्तनशील वस्तु को जानकर हमें इस अनन्त श्रृंखला की समाप्ति करनी ही पड़ेगी। इस कभी समाप्त न होनेवाली गति-श्रृंखला के पीछे अपरिणामी, असंग, शुद्धस्वरूप पुरुष वर्तमान है। जिस प्रकार मैजिक लैन्टर्न से आलोक की किरणें आकर सफेद कपड़े पर प्रतिबिम्बित हो, उस पर सैकड़ों चित्र उत्पन्न करती हैं, पर किसी तरह उसे कलंकित नहीं कर पातीं, ठीक उसी प्रकार विषयानुभूति से उत्पन्न संस्कार पुरुष में प्रतिबिम्बित मात्र होते हैं।

पातंजल-योगसूत्र-४ [२७१]

पातंजल-योगसूत्र-४ [२७१]

न तत् स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥१९॥

सूत्रार्थ— चित्त दृश्य होने के कारण स्वप्रकाश नहीं है।

व्याख्या— प्रकृति में सर्वत्र महाशक्ति की अभिव्यक्ति देखी जाती है, किन्तु वह स्वप्रकाश नहीं है, स्वभाव से चैतन्य-स्वरूप नहीं है। केवल पुरुष ही स्वप्रकाश है, उसके प्रकाश से ही प्रत्येक वस्तु उद्भासित हो रही है। उसी की शक्ति समस्त जड़ पदार्थ और शक्ति के भीतर से प्रकाशित हो रही है।

एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥

सूत्रार्थ— एक समय में दो वस्तुओं को समझ न सकने के कारण चित्त स्वप्रकाश नहीं है।

व्याख्या— यदि चित्त स्वप्रकाश होता, तो वह एक साथ ही सब कुछ अनुभव कर सकता। पर वह तो ऐसा नहीं कर सकता। यदि एक वस्तु में गम्भीर मनोनिवेश करो, तो साथ ही दूसरी वस्तु में मनोनिवेश न कर सकोगे। यदि मन स्वप्रकाश होता, तो वह कितनी अनुभूतियाँ एक साथ कर सकता, इसकी कोई सीमा नहीं। पुरुष क्षणभर में समस्त अनुभव कर सकता है, इसलिए पुरुष स्वप्रकाश है। *

चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसंगः स्मृतिसंकरश्च ॥२१॥

सूत्रार्थ— एक चित्त को दूसरे चित्त का दृश्य मान लेने पर वह दूसरा चित्त फिर तीसरे चित्त का दृश्य होगा—इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृति का भी मिश्रण हो जायगा।

व्याख्या— मान लो, एक दूसरा चित्त है, जो इस पहले


* इस सूत्र का टीकासम्मत अर्थ यह है कि चित्त एक ही समय में अपना और अपने विषयों का अनुभव न कर सकने के कारण स्वप्रकाश नहीं है, पुरुष ही स्वप्रकाश है।

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चित्त का अनुभव करता है। तब तो एक ऐसे तीसरे चित्त की आवश्यकता होगी, जो उस दूसरे चित्त का अनुभव करे। अतएव, इस प्रकार इसका कहीं अन्त न होगा। इससे स्मृति की भी गड़बड़ी उपस्थित हो जायेगी, क्योंकि तब स्मृति का कोई निर्दिष्ट भंडार नहीं रह जायगा।

चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥२२॥

सूत्रार्थ—चित् (पुरुष) अपरिणामी है, चित्त जब उसका आकार धारण करता है, तब वह ज्ञानमय हो जाता है।

व्याख्या—ज्ञान पुरुष का गुण नहीं है, यह हमें स्पष्ट रूप से समझा देने के लिए पतंजलि ने यह बात कही है। चित्त जब पुरुष के पास आता है, तब पुरुष मानो उसमें प्रतिबिम्बित होता है और उस समय के लिए चित्त ज्ञानवान् हो जाता है। तब ऐसा प्रतीत होता है मानो वही पुरुष है।

द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥२३॥

सूत्रार्थ—चित्त जब द्रष्टा और दृश्य इन दोनों से रंग जाता है, तब वह सब प्रकार के अर्थ को प्रकाशित करता है।

व्याख्या—एक ओर दृश्य अर्थात् बाह्य जगत् चित्त में प्रतिबिम्बित हो रहा है, और दूसरी ओर द्रष्टा अर्थात् पुरुष उसमें प्रतिबिम्बित हो रहा है, इसी से उसमें सब प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करने की शक्ति आती है।

तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥२४॥

सूत्रार्थ—वह (चित्त) असंख्य वासनाओं से चित्रित होने पर भी दूसरे (अर्थात् पुरुष) के लिए है, क्योंकि यह संहत्यकारी (संयुक्त होकर कार्य करनेवाला) है।

व्याख्या—यह चित्त नाना प्रकार के पदार्थों की समष्टि-

पातंजल-योगसूत्र-४ [२७३]

पातंजल-योगसूत्र-४ [२७३]

स्वरूप है; अतः वह अपने लिए काम नहीं कर सकता। इस संसार में जितने मिश्र पदार्थ हैं, सभी का प्रयोजन किसी दूसरी वस्तु से है—ऐसी किसी तीसरी वस्तु से, जिसके लिए वे पदार्थ इस तरह से मिश्रित हुए हैं। अतएव, यह चित्तरूपी मिश्रण केवल पुरुष के लिए है।

विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ २५ ॥

**सूत्रार्थ—**विशेषदर्शी अर्थात् विवेकी पुरुष का चित्त में आत्मभाव नहीं रह जाता।

**व्याख्या—**विवेक-बल से योगी जान लेते हैं कि पुरुष चित्त नहीं है।

तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भावं * चित्तम् ॥ २६ ॥

**सूत्रार्थ—**उस समय चित्त विवेकप्रवण होकर कैवल्य के पूर्वलक्षण को प्राप्त करता है।

**व्याख्या—**इस प्रकार योगाभ्यास से विवेकशक्तिरूप दृष्टि की शुद्धता प्राप्त होती है। हमारी आँखों के सामने से आवरण हट जाता है, और तब हम वस्तु के यथार्थ स्वरूप की उपलब्धि करते हैं। हम तब जान लेते हैं कि प्रकृति एक मिश्र पदार्थ है और उसके ये सारे दृश्य केवल साक्षीस्वरूप पुरुष के लिए हैं। तब हम जान लेते हैं कि प्रकृति ईश्वर नहीं है। इस प्रकृति की सारी संहति, सारे संयोग केवल हमारे हृदय-सिंहासन में विराजमान राजा पुरुष को यह सब दृश्य दिखाने के लिए हैं। जब दीर्घकाल तक अभ्यास के फलस्वरूप विवेक का उदय होता है, तब भय चला जाता है और कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है।


* पाठान्तर—कैवल्यप्राग्भारं।

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तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥

**सूत्रार्थ—**उसके विघ्नस्वरूप बीच-बीच में जो अन्यान्य ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे सस्कारो से आते हैं।

व्याख्या—'हमें सुखी करने के लिए कोई बाहरी वस्तु आवश्यक हैं', ऐसा विश्वास पैदा करनेवाले जो सब भाव हममे उठते हैं, वे सिद्धिलाभ मे बाधक हैं। पुरुष स्वभाव से सुखस्वरूप और आनन्दस्वरूप है। पर यह ज्ञान पूर्व सस्कारों से ढका हुआ है। इन सब सस्कारो का क्षय होना आवश्यक है।

हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ २८ ॥

**सूत्रार्थ—**जिन उपायो से क्लेशो के नाश की बात (योग०२।१०) कही गई है, इन (सस्कारो) को भी ठीक उन्हीं उपायो से नष्ट करना होगा।

प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघ. समाधिः ॥ २९ ॥

**सूत्रार्थ—**तत्त्वो के विवेकज्ञान से उत्पन्न ऐश्वर्य में भी जिनका वैराग्य हो जाता है, उनका विवेकज्ञान सर्वथा प्रकाशमान रहने के कारण उन्हें धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है।

**व्याख्या—**जब योगी इस विवेकज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, तब उनके पास पूर्व अध्याय में बतलाई गई सिद्धियाँ आती हैं, पर सच्चे योगी इन सबका परित्याग कर देते हैं। उनके पास धर्ममेघ नामक एक विशेष प्रकार का ज्ञान, एक विशेष प्रकार का आलोक आता है। इतिहास ने ससार के जिन सब महान् धर्माचार्यों का वर्णन किया है, उन सभी को यह धर्ममेघ समाधि हुई थी। उन्होने ज्ञान का मूल स्रोत अपने भीतर ही पाया था। सत्य उनके निकट अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रकाशित हुआ था। पूर्वोक्त सिद्धियो का अभिमान छोड़ देने के कारण

पातंजल-योगसूत्र—४

पातंजल-योगसूत्र—४

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शान्ति, विनय और पूर्ण पवित्रता उनका स्वभाव ही बन गई थी।

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ३० ॥

सूत्रार्थ— उस (धर्ममेघ समाधि) से क्लेश और कर्मों का सर्वथा नाश हो जाता है।

व्याख्या— जब यह धर्ममेध समाधि होती है, तब पतन की आशंका फिर नहीं रह जाती, तब योगी को कुछ भी नीचे नहीं खींच सकता। तब उनके लिए न कोई बुराई रह जाती है, न कोई कष्ट।

तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥ ३१ ॥

सूत्रार्थ— उस समय ज्ञान, सब प्रकार के आवरण और अशुद्धि से रहित होने के कारण, अनन्त हो जाता है, अतः ज्ञेय अल्प हो जाता है।

व्याख्या— ज्ञान तो भीतर में ही है, केवल उसका आवरण चला जाता है। किसी बौद्ध शास्त्र ने 'बुद्ध' (यह एक अवस्था का सूचक है) शब्द की परिभाषा दी है—अनन्त आकाश के समान अनन्त ज्ञान। ईसा इस अवस्था की प्राप्ति कर ख्रीष्ट हो गए थे। तुम सभी उस अवस्था की प्राप्ति करोगे। तब ज्ञान अनन्त हो जायगा, अतः ज्ञेय अल्प हो जायगा। तब यह सारा जगत्, अपनी सब प्रकार की ज्ञेय वस्तुओं के साथ, पुरुष के समक्ष शून्य रूप से प्रतिभासित होगा। साधारण मनुष्य अपने को अत्यन्त क्षुद्र समझता है, क्योंकि उसको ज्ञेय वस्तु अनन्त प्रतीत होती है।

ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥ ३२ ॥

सूत्रार्थ— जब गुणों का काम समाप्त हो जाता है, तब गुणों के जो विभिन्न परिणाम हैं, वे भी समाप्त हो जाते हैं।

२७६ राजयोग

२७६ राजयोग

**व्याख्या—**तब गुणों के ये सब विभिन्न परिणाम (एक जाति से उनकी दूसरी जाति में परिणति) बिलकुल समाप्त हो जाते हैं।

क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥ ३३ ॥

**सूत्रार्थ—**जो सब परिणाम प्रत्येक क्षण से सम्बन्धित हैं, और जो दूसरे छोर में (अर्थात् एक परिणाम-परम्परा के अन्त में) समझ में आते हैं, वे क्रम हैं।

**व्याख्या—**पतंजलि ने यहां 'क्रम' शब्द की परिभाषा दी है। क्रम शब्द से उन सब परिणामो का बोध होता है, जो प्रत्येक क्षण से सम्बन्धित हैं। मैं सोच रहा हूँ, इसमे कितने क्षण चले गए ! इस प्रत्येक क्षण के साथ भाव का परिवर्तन होता है, पर मैं उन सब परिणामो को एक श्रेणी के अन्त मे ही अर्थात् एक परिणाम-परम्परा के बाद ही पकड सकता हूँ। इसे क्रम कहते हैं। किन्तु जो मन सर्वव्यापी हो गया है, उसके लिए फिर क्रम नही रह जाता। उसके लिए सब कुछ वर्तमान हो गया है; उसके लिए केवल वर्तमान ही रहता है, भूत और भविष्य उसके ज्ञान से बिलकुल चले जाते हैं। तब वह मन काल पर विजय प्राप्त कर लेता है और उसके पास समस्त ज्ञान एक क्षण में आकर उपस्थित हो जाता है। उसके पास सब कुछ विद्युत् के समान झट से प्रकाशित हो जाता है।

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति ॥ ३४ ॥

**सूत्रार्थ—**गुणों से जब पुरुष का कोई प्रयोजन नहीं रहता, तब प्रतिलोम-क्रम से गुणों के लय को कैवल्य कहते हैं, अथवा यों कहिए कि द्रष्टा (चित्शक्ति) का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना कैवल्य है।

पातंजल-योगसूत्र—४ २७७

**व्याख्या—**प्रकृति का काम समाप्त हो गया। हमारी परम कल्याणमयी धात्री प्रकृति ने इच्छापूर्वक जिस नि स्वार्थ कार्य का भार अपने कन्धो पर लिया था, वह समाप्त हो गया। उसने मानो आत्मविस्मृत जीवात्मा का हाथ पकडकर उसे धीरे-धीरे ससार के समस्त भोगो का अनुभव कराया, अपनी समस्त अभिव्यक्ति दिखाई, सारे विकार दिखाए, और इस प्रकार वह उसे विभिन्न शरीरो मे से ले जाते हुए क्रमश उच्च से उच्चतर अवस्था मे उठाती गई। अन्त मे आत्मा ने अपनी खोई हुई महिमा फिर से प्राप्त कर ली, अपना स्वरूप फिर से उसके मानस मे उदित हो गया। तब वह करुणामयी जननी जिस रास्ते से आई थी, उसी रास्ते से वापस चली गई और उन लोगो को रास्ता दिखाने मे प्रवृत्त हो गई, जो इस जीवन के पथचिह्नविहीन मरुभूमि में अपना पथ खो बैठे है। वह अनादि, अनन्त काल से इस प्रकार काम करती चली आ रही है। बस इसी प्रकार सुख और दुख, भले और बुरे के बीच मे से होते हुए अनन्त नदीस्वरूप जीवात्मागण सिद्धि और आत्मसाक्षात्काररूप समुद्र की ओर चले जा रहे है।

जिन्होंने अपने स्वरूप का अनुभव कर लिया है, उनकी जय हो। वे हम सबको आशीर्वाद दें।

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परिशिष्ट

योग के बारे मे अन्यान्य शास्त्रों के मत

श्वेताश्वतर उपनिषद्

द्वितीय अध्याय

अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते ।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥६॥

अर्थ—जहाँ अग्नि का मथन किया जाता है, जहाँ वायु को रुद्ध किया जाता है और जहाँ सोमरस की अधिकता होती है, वही (सिद्ध) मन की उत्पत्ति होती है।

त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥८॥

अर्थ—वक्ष, ग्रीवा और शिर को उन्नत रखते हुए शरीर को सीधा रख, मन के द्वारा इन्द्रियो को हृदय मे संनिविष्ट कर ज्ञानी व्यक्ति ब्रह्मरूप नौका के द्वारा सारे भयावह जल-प्रवाहो के पार हो जाते हैं।

प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत ।
दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥९॥

अर्थ—संयुक्तचेष्ट मनुष्य प्राण को सयत करते हैं। जब वह शान्त हो जाता है, तब नाक के द्वारा प्रश्वास का परित्याग करते हैं। जिस प्रकार सारथि चंचल अश्वों को धारण करता है, उसी प्रकार अध्यवसायशील योगी भी मन को धारण करे।

समे शुचौ शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।
मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥

अर्थ—जो समतल और शुचि हो, पत्थर, आग और वालू

२८० राजयोग

२८० राजयोग

से रहित हो, मनुष्य द्वारा किए गए या किसी जलप्रपात से उत्पन्न मन को चंचल कर देने वाले शब्दो से वर्जित हो, तथा मन के अनुकूल और आँखो को सुखकर हो, ऐसे पर्वतगुहा आदि निर्जन स्थान में बैठकर योग का अभ्यास करना चाहिए।

नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुर सराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥

अर्थ— नीहार, धूम, सूरज, वायु, आग, जुगनू, विद्युत्, स्फटिक, चन्द्रमा—ये सब रूप सामने आकर क्रमश योग में ब्रह्म को अभिव्यक्त करते हैं।

पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पंचात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥

अर्थ— जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पंचभूतो से योग की अनुभूतियां होने लगती हैं, तब समझना चाहिए कि योग आरम्भ हो गया है। जिन्हें इस प्रकार का योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो गया है, उनके लिए फिर बीमारी, जरा या मृत्यु नहीं रहती।

लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसाद स्वरसौष्ठवं च ।
गन्ध शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्ति प्रथमां वदन्ति ॥१३॥

अर्थ— शरीर की लघुता, स्वास्थ्य, लोभशून्यता, सुन्दर रंग, स्वर-सौन्दर्य, मल-मूत्र की अल्पता तथा शरीर की एक सुन्दर सुगन्ध—इन सबको योग की पहली सिद्धि कहते हैं।

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत् सुधान्तम् ।
तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एक. कृतार्थो भवते वीतशोक ॥१४॥

अर्थ— जिस प्रकार मिट्टी से सना हुआ सोने या चाँदी

परिशिष्ट २८१

का टुकड़ा शोधन किए जाने पर तेजोमय होकर चमकने लगता है, उसी प्रकार देही आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर अद्वितीय, कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता है।

शंकर-उद्धृत याज्ञवल्क्य

आसनानि समभ्यस्य वाञ्छितानि यथाविधि ।
प्राणायामं ततो गार्गि जितासनगतोऽभ्यसेत् ॥
मृद्वासने कुशान् सम्यगास्तीर्याजिनमेव च ।
लम्बोदरं च संपूज्य फलमोदकभञ्जनैः ॥
तदासने सुखासीनः सव्ये न्यस्येतरं करम् ।
समग्रीवशिरः सम्यक् संवृतास्यः सुनिश्चितः ॥
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि नासाग्रन्यस्तलोचनः ।
अतिभुक्तमभुक्तं च वर्जयित्वा प्रयत्नतः ॥
नाडीसंशोधनं कुर्यादुक्तमार्गेण यत्नतः ।
वृथा क्लेशो भवेत्तस्य तच्छोधनमकुर्वतः ॥
नासाग्रे शशभृद्बीजं चन्द्रातपवितानितम् ।
सप्तमस्य तु वर्गस्य चतुर्थं बिंदुसंयुक्तम् ॥
विश्वमध्यस्थमालोक्य नासाग्रे चक्षुषी उभे ।
इडया पूरयेद्वायुं बाह्यं द्वादशमात्रकैः ॥
ततोऽग्निं पूर्ववद्ध्यायेत् स्फुरज्जज्वालावलीयुतम् ।
रेफं च बिन्दुसंयुक्तं शिखिमण्डलसंस्थितम् ॥
ध्यायेद्विरेचयेद्वायुं मन्दं पिंगलया पुनः ।
पुनः पिंगलयापूर्य घ्राणं दक्षिणतः सुधीः ॥
तद्वद्विरेचयेद्वायुमिडया तु शनैः शनैः ।
त्रिचतुर्वत्सरं चापि त्रिचतुर्मासमेव वा ॥