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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

२४२ राजयोग

सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त- ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२३॥

सूत्रार्थ—शीघ्र फल उत्पन्न करनेवाला और देर से फल देनेवाला—ऐसे दो प्रकार के कर्म होते हैं। इनमें संयम करने से, अथवा अरिष्ट-नामक मृत्युलक्षणों से भी, योगीगण देहत्याग का ठीक समय जान लेते हैं।

व्याख्या—जब योगी अपने कर्म मे—अर्थात् अपने मन के उन सस्कारो में, जिनका कार्य आरम्भ हो गया है तथा उनमें, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है—सयम का प्रयोग करते हैं, तब वे उन सस्कारो के द्वारा, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है, यह ठीक जान लेते हैं कि उनकी मृत्यु कब होगी। किस समय, किस दिन, कितने बजे, यहाँ तक कि कितने मिनट पर उनकी मृत्यु होगी—यह सब उन्हें ज्ञात हो जाता है। हिन्दू लोग मृत्यु की इस निकटता को जान लेना विशेष आवश्यक समझते हैं, क्योकि गीता मे यह उपदेश है कि मृत्यु-समय के विचार आनेवाले जीवन को नियमित करने के लिए विशेष प्रयोजनीय कारणस्वरूप है।

मैत्र्यादिषु बलानि ॥२४॥

सूत्रार्थ—मैत्री आदि गुणों (१।३३) में संयम करने से वे सब गुण अत्यन्त प्रबल भाव धारण करते हैं।

बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२५॥

सूत्रार्थ—हाथी आदि के बल में सयम का प्रयोग करने से योगी के शरीर में उस-उस प्राणी के सदृश बल आ जाता है।

व्याख्या—जब योगी यह सयम-शक्ति प्राप्त कर लेते हैं, तब यदि वे बल की इच्छा करे, तो हाथी के बल मे सयम का प्रयोग करके वे हाथी के समान बल प्राप्त कर लेते हैं।

पातंजल-योगसूत्र-३ २४३

पातंजल-योगसूत्र-३ २४३

प्रत्येक मनुष्य में अनन्त शक्ति निहित है। यदि वह उपाय जानता हो, तो वह उस शक्ति का इच्छानुसार व्यवहार कर सकता है। योगी ने उसे प्राप्त करने की विद्या खोज निकाली है।

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥२६॥

सूत्रार्थ— (पहले कही गई, १।३६,) महाज्योति में संयम करने से सूक्ष्म, व्यवधान-युक्त और दूरवर्ती वस्तुओ का ज्ञान हो जाता है।

व्याख्या— हृदय मे जो महाज्योति है, उसमें संयम करने से योगी अत्यन्त दूरवर्ती वस्तु को भी देख सकते हैं। यदि कोई वस्तु पहाड़ के अन्तराल में रहे, तो उसे भी वे देख लेते हैं, और अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुओ का. भी उन्हे ज्ञान हो जाता है।

भुवनज्ञानं सूर्ये सयमात्॥२७'।

सूत्रार्थ— सूर्य में संयम करने से सम्पूर्ण जगत् का ज्ञान (प्राप्त हो जाता है)।

चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥२८॥

सूत्रार्थ— चन्द्रमा में (सयम करने से) तारासमूह का ज्ञान (हो जाता है)।

ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥२९॥

सूत्रार्थ— ध्रुव तारे में (सयम करने से) ताराओं की गति का ज्ञान (हो जाता है)।

नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥३०॥

सूत्रार्थ— नाभिचक्र में (सयम करने से) शरीर की बनावट ज्ञात हो जाती है।

कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥३१॥

सूत्रार्थ— कण्ठकूप में (सयम करने से) भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती हैं।

२४४ | राजयोग

व्याख्या—अत्यन्त भूखा मनुष्य यदि कण्ठकूप में चित्त का संयम कर सके, तो उसकी भूख शान्त हो जाती है।

कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥३२॥

सूत्रार्थ—कूर्मनाडी में (संयम करने से) शरीर की स्थिरता होती है।

व्याख्या—जब वे साधना करते हैं, तब उनका शरीर चञ्चल नहीं होता।

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥३३॥

सूत्रार्थ—सिर की ज्योति में (संयम करने से) सिद्धपुरुषों के दर्शन होते हैं।

व्याख्या—यहाँ सिद्ध का तात्पर्य भूतयोनि की अपेक्षा थोड़ी उच्च योनि से है। जब योगी अपने सिर के ऊपरी भाग में मन संयम करते हैं, तब वे इन सिद्धों के दर्शन करते हैं। यहाँ पर 'सिद्ध' शब्द से मुक्त पुरुष नहीं समझना चाहिए।

प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥३४॥

सूत्रार्थ—अथवा प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होने से समस्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—प्रातिभ ज्ञान अर्थात् प्रतिभा की शक्ति अर्थात् पवित्रता के द्वारा लब्ध ज्ञानविशेष के प्राप्त हो जाने पर बिना किसी प्रकार के संयम के ही समस्त ज्ञान प्राप्त हो सकता है। जब मनुष्य उच्च प्रतिभाशक्ति प्राप्त कर लेता है, तब उसे इस महा आलोक की प्राप्ति हो जाती है। उसके ज्ञान से समस्त प्रकाशित हो जाता है। बिना किसी प्रकार का संयम किए ही उसे आप-से-आप समस्त ज्ञान प्राप्त होता जाता है।

हृदये चित्तसंवित् ॥३५॥

सूत्रार्थ—हृदय में (संयम करने से) मनोविषयक ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

पातंजल-योगसूत्र-३ २४५

पातंजल-योगसूत्र-३ २४५

सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम् ॥३६॥

सूत्रार्थ—पुरुष और बुद्धि, जो कि अत्यन्त पृथक् हैं—उनके विवेक के अभाव से ही भोग होता है। वह भोग परार्थ है अर्थात् किसी अन्य या पुरुष के लिए है। बुद्धि की एक दूसरी अवस्था का नाम है स्वार्थ; उसमें संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है।

व्याख्या—पुरुष और बुद्धि वास्तव में सर्वथा भिन्न हैं; ऐसा होने पर भी पुरुष बुद्धि में प्रतिबिम्बित होकर उसके साथ अपने को अभेद समझता है और उसी से अपने को सुखी या दुःखी अनुभव करता रहता है। बुद्धि की इस अवस्था को परार्थ कहते हैं, क्योंकि उसके सारे भोग अपने लिए नहीं, वरन् पुरुष के लिए हैं। इसके सिवा बुद्धि की और एक अवस्था है—उसका नाम है स्वार्थ। जब बुद्धि सत्त्वप्रधान होकर अत्यन्त निर्मल हो जाती है और उसमें पुरुष विशेष रूप से प्रतिबिम्बित होता है, तब वह बुद्धि अन्तर्मुखी होकर केवल पुरुष का अवलम्बन करती है। उस 'स्वार्थ' नामक बुद्धि में संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है। केवल पुरुष का अवलम्बन करनेवाली बुद्धि में संयम करने को कहने का तात्पर्य यह है कि शुद्ध पुरुष ज्ञाता होने के कारण कभी ज्ञान का विषय नहीं बन सकता।

ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३७॥

सूत्रार्थ—उससे प्रातिभ ज्ञान और (अलौकिक) श्रवण, स्पर्श, दर्शन, स्वाद एवं वार्ता (घ्राण)—ये (छ सिद्धियाँ) प्रकट होती हैं।

ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३८॥

सूत्रार्थ—ये (छहों) समाधि में उपसर्ग (विघ्न) हैं, पर व्युत्थान (संसार-अवस्था) में सिद्धिरूप हैं।

२४६ राजयोग

व्याख्या—योगी जानते हैं कि संसार के यावत् भोग पुरुष और मन के संयोग द्वारा होते हैं। यदि वे इस सत्य में कि 'आत्मा और प्रकृति एक दूसरे से पृथक् वस्तु है,' चित्त का संयम कर सके, तो उन्हें पुरुष का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। उससे विवेकज्ञान उदित होता है। जब वे इस विवेक को प्राप्त कर लेते हैं, तब उन्हें प्रातिभ नामक अत्यन्त उच्च कोटि का दैवज्ञान प्राप्त होता है। पर ये सब सिद्धियाँ उस उच्चतम लक्ष्य अर्थात् उस पवित्रस्वरूप आत्मा के ज्ञान और मुक्ति की प्रतिबन्धकस्वरूप हैं। ये सब तो मानो रास्ते में प्राप्त होनेवाली चीजें भर हैं। यदि योगी इन सिद्धियों का परित्याग कर दें, तभी वे उस उच्चतम ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं। यदि वे इनमें अटक जायें, तो फिर उनकी उन्नति रुक जाती है।

बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥३९॥

सूत्रार्थ—जब बन्धन का कारण शिथिल हो जाता है और योगी चित्त के प्रचारस्थानों को (अर्थात् शरीरस्थ नाड़ीसमूह को) जान लेते हैं, तब वे दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

व्याख्या—योगी एक देह में रहकर और उस देह में क्रियाशील रहते हुए भी अन्य किसी मृत देह में प्रवेश करके उसे गतिशील कर सकते हैं। इसी प्रकार, वे किसी जीवित शरीर में प्रवेश करके उस व्यक्ति के मन और इन्द्रियों को निरुद्ध कर सकते हैं, तथा उस समय तक के लिए उस शरीर के भीतर से काम कर सकते हैं। प्रकृति और पुरुष के विवेक को प्राप्त करने पर ही ऐसा करना उनके लिए सम्भव होता है। यदि वे दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की इच्छा करें, तो उस शरीर में संयम

पातंजल-योगसूत्र-३ २४७

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का प्रयोग करने से ही वह सिद्ध हो जायगा, क्योकि उनके मतानुसार, उनकी आत्मा ही सर्वव्यापी नही है, वरन् उनका मन भी सर्वव्यापी है। उनका मन उस सर्वव्यापी (समष्टि) मन का एक अंश मात्र है। पर अभी वह इस शरीर के स्नायुओ के भीतर से ही काम कर सकता है, किन्तु जब योगी इन स्नायविक प्रवाहो से अपने को मुक्त कर लेते है, तब वे दूसरे शरीर के द्वारा भी काम कर सकते हैं।

उदानजयाज्जलपंककण्टकादिष्वसंग उत्क्रान्तिश्च ॥४०॥

सूत्रार्थ— उदान नामक स्नायुप्रवाह पर जय प्राप्त कर लेने से योगी के शरीर से पानी या कीचड का सयोग नही होता, वे कांटों पर चल सकते हैं और इच्छामृत्यु होते हैं।

व्याख्या— उदान नामक जो स्नायविक शक्ति-प्रवाह फेफडे और शरीर के सारे ऊपरी भाग को चलाता है, उस पर जब योगी जय प्राप्त कर लेते हैं, तब वे अत्यन्त हल्के हो जाते हैं। वे फिर जल में नही डूबते, काँटो पर या तलवार की धार पर वे अनायास चल सकते हैं, आग मे खड़े रह सकते हैं और इच्छा मात्र से ही इस शरीर को छोड दे सकते हैं।

समानजयात्प्रज्वलनम् ॥४१॥

सूत्रार्थ— समान वायु को जीत लेने से (उनका शरीर) दीप्तिमान् हो जाता है।

व्याख्या— वे जब कभी इच्छा करते हैं, तभी उनके शरीर से ज्योति बाहर निकल आती है।

श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥४२॥

सूत्रार्थ— कान और आकाश का जो परस्पर सम्बन्ध है, उसमें सयम करने से दिव्य कर्ण प्राप्त होता है।

२४८ राजयोग

२४८ राजयोग

व्याख्या—यह है आकाशतत्त्व, और यह उसका अनुभव करने के लिए यन्त्रस्वरूप कान है। इनमें संयम करने से योगी दिव्य कर्ण प्राप्त करते है। तब वे सब कुछ सुन सकते हैं। अत्यन्त दूर कोई बातचीत या शब्द होने पर भी वे उसे सुन सकते हैं।

कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाश-
गमनम् ॥४३॥

सूत्रार्थ—शरीर और आकाश के सम्बन्ध में चित्तसंयम करने से और (रुई आदि) हल्की वस्तु में संयम करने से योगी आकाश में गमन कर सकते हैं।

व्याख्या—आकाश ही इस शरीर का उपादान है; आकाश ने ही एक प्रकार से विकृत होकर इस शरीर का रूप धारण किया है। यदि योगी शरीर के उपादानभूत उस आकाश-धातु में संयम का प्रयोग करे, तो वे आकाश के समान हल्के हो जाते हैं और जहाँ इच्छा हो, वायु मे से होकर जा सकते हैं। ऐसा ही दूसरे के सम्बन्ध में भी है।

बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥४४॥

सूत्रार्थ—बाहर में मन की जो यथार्थ वृत्ति अर्थात् मन की धारणा है, उसका नाम है महाविदेहा, उसमें संयम का प्रयोग करने से, प्रकाश का जो आवरण है, वह नष्ट हो जाता है।

व्याख्या—अज्ञानवश मन सोचता है कि वह इस देह में से कार्य कर रहा है। यदि मन सर्वव्यापी हो, तो हम केवल एक ही प्रकार के स्नायुओ द्वारा क्यो आबद्ध रहेगे, इस अह को एक ही शरीर मे सीमाबद्ध करके क्यो रखेगे ? ऐसा करने का तो कोई कारण नही दिखता। योगी अपने इस अह-भाव को, जहाँ कही इच्छा हो वही अनुभव करना चाहते है। अह-भाव के चले

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जाने पर इस देह में जो मानसिक वृत्तिप्रवाह जागरित होता है, उसे 'अकल्पिता वृत्ति' या 'महाविदेहा' कहते है। जब वे उसमे संयम करने में सफल होते है, तब प्रकाश के सारे आवरण नष्ट हो जाते हैं और समस्त अन्धकार एव अज्ञान नष्ट हो जाने के कारण सब कुछ उन्हे चैतन्यमय प्रतीत होता है।

स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूतजयः ॥४५॥

सूत्रार्थ—भूतों की स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व—इन पांच प्रकार की अवस्थाओ में संयम करने से पांचो भूतों पर विजय प्राप्त हो जाती है।*

व्याख्या—योगी समस्त भूतो मे संयम करते हैं, पहले, स्थूल भूत में और फिर उसके बाद उसकी अन्यान्य सूक्ष्म अवस्थाओ मे संयम करते हैं। बौद्धो के एक सम्प्रदाय मे यह संयम विशेष रूप से प्रचलित है। वे मिट्टी का एक लोदा लेकर उसमे संयम का प्रयोग करते हैं, फिर क्रमश, वह जिन सब सूक्ष्म भूतो से निर्मित हुआ है, उन्हे देखना शुरू करते हैं। जब वे उसकी समस्त सूक्ष्म अवस्थाओ के बारे मे जान लेते हैं, तब वे उस भूत पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा ही अन्य सब भूतो के बारे में भी समझना चाहिए। योगी सभी पर जय प्राप्त कर सकते हैं।

ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥४६॥

सूत्रार्थ—उससे अणिमा आदि सिद्धियों का आविर्भाव होता है, कायसम्पत् की प्राप्ति होती है और सारे शारीरिक धर्मों से बाधा नहीं होती।


* स्वरूप—पृथ्वी की ठोसता, जल की तरलता आदि। अन्वय—सत्त्व, रज और तम प्रत्येक भूत में व्याप्त है, यह जानना। अर्थवत्त्व—विशेष-विशेष भोग-प्रदान की सामर्थ्य।

२५० राजयोग

२५० राजयोग

व्याख्या—इसका तात्पर्य यह है कि योगी अष्टसिद्धियों की प्राप्ति कर लेते हैं। वे अपने को इच्छानुसार परमाणु के समान छोटा या पर्वत के समान बड़ा कर सकते हैं, वे अपने को पृथ्वी के समान भारी और वायु के समान हल्का कर सकते हैं, वे जहाँ चाहें जा सकते हैं, जिस पर चाहे प्रभुत्व कर सकते हैं, जिस पर चाहे विजय प्राप्त कर सकते हैं। सिंह उनके पैरो के पास मेमने के समान शान्तभाव से बैठा रहेगा, और वे जो भी चाहे, उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होगी।

रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ॥४७॥

सूत्रार्थ—रूप, लावण्य, बल और वज्र के समान दृढता—ये कायसम्पत् हैं।

व्याख्या—तब शरीर अविनाशी हो जाता है, कोई भी वस्तु उसे किसी प्रकार का नुकसान नही पहुँचा सकती। यदि योगी स्वयं इच्छा न करे, तो दुनिया की कोई भी ताकत उनके शरीर का नाश नही कर सकती। "कालदण्ड को भग्न कर वे इस जगत् में शरीर लेकर वास करते हैं।" वेदो मे कहा है कि ऐसे व्यक्ति को बीमारी, मृत्यु या अन्य कोई क्लेश नही होता।

ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ॥४८॥

सूत्रार्थ—इन्द्रियो की बाह्य पदार्थ की ओर गति, उससे उत्पन्न ज्ञान, इस ज्ञान से विकसित अह-प्रत्यय, इन्द्रियो के त्रिगुणमयत्व और उनके भोगदातृत्व—इन पाँचो में संयम करने से इन्द्रियो पर विजय प्राप्त हो जाती है।

व्याख्या—बाह्य वस्तु की अनुभूति के समय इन्द्रियाँ मन से बाहर जाकर विषय की ओर दौडती है, उसी से उपलब्धि

पातंजल-योगसूत्र-३ २५१

पातंजल-योगसूत्र-३ २५१

और अस्मिता की उत्पत्ति होती है। जब योगी उनमें तथा अन्य दोनों में भी क्रमशः संयम का प्रयोग करते हैं, तब वे इन्द्रियों पर जय प्राप्त कर लेते हैं। जो कोई वस्तु तुम देखते या अनुभव करते हो—जैसे एक पुस्तक—उसे लेकर उसमें संयम का प्रयोग करो। उसके बाद पुस्तक के रूप में जो ज्ञान है, उसमें, फिर जिस अहंभाव के द्वारा उस पुस्तक का दर्शन होता है, उसमें संयम करो। इस अभ्यास से समस्त इन्द्रियाँ विजित हो जाती हैं।

ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥४९॥

सूत्रार्थ—उस (इन्द्रियजय) से शरीर को मन के सदृश गति, शरीर के बिना भी विषयों का अनुभव करने की शक्ति और प्रकृति पर विजय—ये तीनो सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

व्याख्या—जैसे भूत-जय से कायसम्पत् की प्राप्ति होती है, वैसे ही इन्द्रिय-जय से उपर्युक्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥५०॥

सूत्रार्थ—पुरुष और बुद्धि के परस्पर पार्थक्य-ज्ञान में संयम करने से सब वस्तुओं पर अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—जब हम प्रकृति पर जय प्राप्त कर लेते हैं तथा पुरुष और प्रकृति का भेद अनुभव कर लेते हैं अर्थात् जान लेते हैं कि पुरुष अविनाशी, पवित्र और पूर्णस्वरूप है, तब सर्व-शक्तिमत्ता और सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है।

तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५१॥

सूत्रार्थ—इन सब (सिद्धियों) को भी त्याग देने से दोष का बीज नष्ट हो जाता है, और उससे कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है।

व्याख्या—तब वे कैवल्य की प्राप्ति कर लेते हैं, वे मुक्त

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हो जाते है। जब वे सर्वशक्तिमत्ता और सर्वज्ञता इन दोनो को भी त्याग देते हैं, तब वे सारे प्रलोभन, यहाँ तक कि, देवताओं द्वारा दिए गए प्रलोभनो का भी अतिक्रमण कर सकते है। जब योगी इन सब अद्भुत शक्तियो को प्राप्त करके भी उन्हे त्याग देते है, तब वे चरम लक्ष्य पर पहुँच जाते है। वास्तव मे ये शक्तियाँ हैं क्या?—केवल अभिव्यक्तियाँ। स्वप्न की अपेक्षा उनमे भला कौनसी श्रेष्ठता है? सर्वशक्तिमत्ता भी तो एक स्वप्न है। वह केवल मन पर निर्भर रहती है। जब तक मन का अस्तित्व है, तभी तक सर्वशक्तिमत्ता सम्भव हो सकती है, पर हमारा लक्ष्य तो मन के भी अतीत है।

स्थान्युपनिमन्त्रणे संगस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसंगात् ॥५२॥

सूत्रार्थ—देवताओ द्वारा प्रलोभित किए जाने पर भी उसमें आसक्त होना या आनन्द का अनुभव करना उचित नहीं है, क्योकि उससे पुनः अनिष्ट होना सम्भव है।

व्याख्या—और भी बहुत से विघ्न है। देवता आदि योगी को प्रलोभित करने आते हैं। वे नही चाहते कि कोई पूर्ण रूप से मुक्त हो। हम लोग जैसे ईर्ष्यापरायण है, वे भी वैसे ही हैं, वरन् कभी-कभी तो वे इस बात मे हम लोगो से भी आगे बढ जाते हैं। वे डरते हैं कि कही वे अपने पद को न खो बैठें। जो योगी पूर्ण सिद्ध नही होते, वे शरीर त्यागने के बाद देवता बन जाते हैं। वे सीधे रास्ते को छोडकर मानो बगल के एक रास्ते से चले जाते हैं और इन सब शक्तियो को प्राप्त करते है। उनको फिर से जन्म लेना पडता है। पर जो इतने शक्तिसम्पन्न है कि इन प्रलोभनो का उन पर कोई प्रभाव नही पडता, वे सीधे उस लक्ष्य-स्थल पर पहुँच जाते है और मुक्त हो जाते हैं।

पातंजल-योगसूत्र-३

पातंजल-योगसूत्र-३

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क्षणतत्क्रमयो संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५३॥

सूत्रार्थ— क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।

व्याख्या— देवता, स्वर्ग और शक्तियो से बचने का फिर उपाय क्या है? उपाय है विवेक—सदसत् विचार। इस विवेक-ज्ञान को दृढ करने के उद्देश्य से ही इस सयम का उपदेश दिया गया है। 'क्षण' का अर्थ है काल का सूक्ष्मतम अग्र। एक क्षण के पहले जो क्षण बीत चुका है, और उसके बाद जो क्षण प्रकट होगा—इस लगातार सिलसिले को 'क्रम' कहते हैं। अतः उपर्युक्त विवेकजनित ज्ञान को दृढ करने के लिए क्षण और उसके क्रम में सयम करना होगा।

जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्ति ॥५४॥

सूत्रार्थ— जाति, लक्षण और देशभेद से जिन वस्तुओ का भेद न किए जा सकने के कारण जो तुल्य प्रतीत होती हैं, उनको भी इस उपर्युक्त संयम द्वारा अलग करके जाना जा सकता है।

व्याख्या— हम जो दुख भोगते हैं, वह अज्ञान से, सत्य और असत्य के अविवेक से उत्पन्न होता है। हम सभी बुरे को भला समझते हैं और स्वप्न को वास्तविक। एकमात्र आत्मा ही सत्य है, पर हम यह भूल गए है। शरीर एक मिथ्या स्वप्न मात्र है, पर हम सोचते है कि हम शरीर है। यह अविवेक ही दुःख का कारण है। और यह अविवेक अविद्या से उत्पन्न होता है। विवेक के उदय के साथ ही बल भी आता है, और तभी हम इस शरीर, स्वर्ग तथा देवता आदि की कल्पनाओ को त्यागने मे समर्थ होते हैं। जाति, चिह्न और स्थान के द्वारा हम वस्तुओं को अलग करते हैं। उदाहरणार्थ, एक गाय की बात ले लो। गाय का कुत्ते से जो

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भेद है, वह जातिगत है। और दो गायों में परस्पर भेद हम कैसे करते हैं? चिह्न के द्वारा। फिर दो वस्तुएँ सर्वथा समान होने पर हम स्थानगत भेद के द्वारा उन्हें अलग कर सकते हैं। किन्तु जब वस्तुएँ ऐसी मिली हुई रहती हैं कि अलग करने के ये सब विभिन्न उपाय बिल्कुल काम में नहीं आते, तब उपर्युक्त साधन-प्रणाली के अभ्यास से लब्ध विवेक के बल से हम उन्हें पृथक् कर सकते हैं। योगियों का उच्चतम दर्शन इस सत्य पर आधारित है कि पुरुष शुद्धस्वभाव एवं नित्य पूर्णस्वरूप है और संसार में वही एकमात्र अमिश्र वस्तु है। शरीर और मन तो मिश्र पदार्थ हैं, फिर भी हम सदैव अपने आपको उनके साथ मिला दे रहे हैं। सबसे बड़ी गलती यही है कि यह पार्थक्य-ज्ञान नष्ट हो गया है। जब यह विवेक-शक्ति प्राप्त होती है, तब मनुष्य देख पाता है कि जगत् की सारी वस्तुएँ, वे फिर वहिजंगत् की हों, या अन्तर्जगत् की, मिश्र पदार्थ हैं, अतएव वे पुरुष नहीं हो सकतीं।

तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥५५॥

सूत्रार्थ—जो विवेकज्ञान समस्त वस्तुओं को तथा वस्तुओं की सब प्रकार की अवस्थाओं को एक साथ ग्रहण कर सकता है, उसे तारकज्ञान कहते हैं।

व्याख्या—तारक का अर्थ है—जो संसार से तारण करता है। सारी प्रकृति की सूक्ष्म और स्थूल सर्वविध अवस्थाएँ इस ज्ञान की ग्राह्य हैं। इस ज्ञान में किसी प्रकार का क्रम नहीं है। यह सारी वस्तुओं को क्षणभर में एक साथ ग्रहण कर लेता है।

सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥५६॥

सूत्रार्थ—जब सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष—इन दोनों की समानभाव से शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य की प्राप्ति होती है।

पातंजल-योगसूत्र-३ २५५

व्याख्या— कैवल्य ही हमारा लक्ष्य है, इस लक्ष्य-स्थल पर पहुँचने पर आत्मा जान लेती है कि वह सर्वदा ही अकेली थी, उसे सुखी करने के किए अन्य किसी की भी आवश्यकता न थी। जब तक अपने को सुखी करने के लिए हमें अन्य किसी की आवश्यकता होती है, तब तक हम गुलाम हैं। जब पुरुष जान लेता है कि वह मुक्तस्वभाव है और उसको पूर्ण करने के लिए अन्य किसी की भी जरूरत नहीं, जब वह यह जान लेता है कि यह प्रकृति क्षणिक है, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, तभी मुक्ति की प्राप्ति होती है, तभी यह कैवल्य प्राप्त होता है। जब आत्मा जान लेती है कि जगत् के छोटे-से-छोटे परमाणु से लेकर देवता तक किसी पर उसके निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है, तब आत्मा की उस अवस्था को कैवल्य और पूर्णता कहते हैं। जब शुद्धि और अशुद्धि दोनो से मिला हुआ सत्त्व अर्थात् बुद्धि, पुरुष के समान शुद्ध हो जाती है, तब यह कैवल्य प्राप्त हो जाता है, तब वह बुद्धि केवल निर्गुण, पवित्रस्वरूप पुरुष को प्रतिबिम्बित करती है।

चतुर्थ अध्याय

कैवल्यपाद

जन्मोषधिमन्त्रतपः समाधिजा सिद्धयः ॥१॥

सूत्रार्थ—सिद्धियां जन्म, औषधि, मन्त्र, तपस्या और समाधि से उत्पन्न होती हैं।

व्याख्या—कभी-कभी मनुष्य पूर्वजन्म में प्राप्त सिद्धि को लेकर जन्म ग्रहण करता है। इस बार वह मानो उनके फल का भोग करने के लिए ही जन्म लेता है। सांख्यदर्शन के पितृ-स्वरूप कपिल के बारे में कहा है कि वे जन्म से ही सिद्ध थे। 'सिद्ध' शब्द का अर्थ है—जो कृतकार्य हो चुके हैं।

योगीजन कहते हैं कि रसायनविद्या अर्थात् औषधि आदि के द्वारा ये सब शक्तियां प्राप्त हो सकती हैं। तुम सभी जानते हो कि रसायनविद्या का प्रारम्भ आलकेमि* से हुआ। मनुष्य पारस-पत्थर (philosopher's stone), सजीवनी अमृत (elixir of life)† आदि का अन्वेषण करते थे। भारतवर्ष में 'रसायन' नामक एक सम्प्रदाय था। उनका यह मत था कि सूक्ष्मतरत्व-प्रियता, ज्ञान, आध्यात्मिकता, धर्म—ये सब सत्य (अच्छे) अवश्य हैं, पर उन्हें प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है यह शरीर। यदि बीच-बीच में शरीर भग्न अर्थात् मृत्युग्रस्त होता


* आलकेमि—तांबा आदि कम कीमतवाली धातुओं से सोना-चांदी आदि बनाने की विद्या। पुराने यूरोप में गुप्त रूप से इस विद्या का बहुत प्रचार था।

† 'सजीवनी अमृत' का अर्थ है एक प्रकार का काल्पनिक रस जिससे मनुष्य अमर हो सकता है।

पातंजल-योगसूत्र—४ २५७

पातंजल-योगसूत्र—४ २५७

रहे, तो उससे उस चरम लक्ष्य पर पहुँचने मे काफी अधिक समय लग जायगा। मान लो, कोई मनुष्य योगाभ्यास करने का या आध्यात्मिक भावसम्पन्न होने का इच्छुक है। अधिक दूर उन्नति करने के पहले ही, मान लो, उसकी मृत्यु हो गई। तब उसने और एक देह लेकर फिर से साधना करना शुरू किया। कुछ समय बाद फिर उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार वारम्बार मरने और जन्म लेने से तो उसका काफी समय नष्ट हो गया। अब यदि शरीर को इतना सबल और निर्दोष बनाया जा सके कि उसके जन्म और मृत्यु बिलकुल बन्द हो जायें, तो आध्यात्मिक उन्नति के लिए उतना ही अधिक समय मिल सकेगा। इसीलिए ये 'रसायन'-सम्प्रदायवाले कहते हैं कि पहले शरीर को सबल बनाओ। उनका दावा है कि शरीर को अमर बनाया जा सकता है। उनका अभिप्राय यह है कि यदि मन ही शरीर का गठन करनेवाला हो, और यह यदि सत्य हो कि प्रत्येक व्यक्ति का मन उस अनन्त शक्ति के प्रकाश की एक-एक विशेष प्रणाली मात्र हो, तो ऐसी प्रत्येक प्रणाली के लिए बाहर से इच्छानुसार शक्ति सग्रह करने की कोई निर्दिष्ट सीमा नही हो सकती। अतः हम सदा के लिए इस शरीर को क्यो न रख सकेंगे ? हम जितने शरीर धारण करते है, उन सबका गठन हमें ही करना पडता है। ज्योही इस शरीर का पतन होगा, त्योही फिर से हमे एक और शरीर गढना पड़ेगा। जब हममे यह शक्ति है, तो इस शरीर से बाहर न जाकर, हम यही और अभी वह गठन-कार्य क्यो न कर सकेंगे ? यह मत पूर्ण रूप से सत्य है। यदि यह सम्भव हो कि हम मृत्यु के पश्चात् भी जीवित रहकर अपना शरीर पुन. गढ़ ले, तो फिर शरीर को पूरा ध्वंस किए

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२५८ राजयोग

विना, उसे केवल क्रमशः परिवर्तित करते हुए, इसी जन्म में शरीर तैयार करना हमारे लिए क्यो असम्भव होगा ? उनका यह भी विश्वास था कि पारा और गन्धक मे वडी अद्भुत शक्ति निहित है। इन द्रव्यो से एक विशेष तौर से वनी हुई चीजो द्वारा मनुष्य जितने दिन इच्छा हो शरीर को अक्षुण्ण वनाए रख सकता है। दूसरे कुछ लोगो का विश्वास था कि कुछ विशिष्ट औषधियो के सेवन से आकाश-गमन आदि सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती है। आजकल की आश्चर्यजनक औषधियो का अधिकांश, विशेषत औषधि मे धातु का व्यवहार, हमने 'रसायन'-सम्प्रदायवालो के पास से पाया है। कोई-कोई योगी-सम्प्रदाय कहते है कि हमारे बहुतेरे प्रधान गुरुगण अभी भी अपनी पुरानी देहो में विद्यमान हैं। योग के वारे मे जिनका प्रामाण्य अकाट्य है, वे पतंजलि इसे अस्वीकार नही करते।

मन्त्रशक्ति—'मन्त्र' का अर्थ है कुछ पवित्र शब्द, जिनका निर्दिष्ट नियम से उच्चारण करने पर उनसे ये अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त होती है। हम दिन-रात ऐसी अद्भुत घटनाओ के बीच रह रहे है कि हमे उनका कोई महत्त्व नही मालूम पडता, हम उन्हे साधारण समझते हैं। मनुष्य की शक्ति की, शब्द की शक्ति की और मन की शक्ति की कोई निर्दिष्ट सीमा नही है।

तपस्या—तुम देखोगे कि यह तप प्रत्येक धर्म मे है। धर्म के इन सब अगो के साधन मे हिन्दू सबसे वढे चढे है। तुम ऐसे अनेक लोग पाओगे, जो सारे जीवनभर अपना हाथ ऊपर उठाए रखते हैं, यहाँ तक कि अन्त में उनके हाथ सूखकर नष्ट हो जाते हैं। बहुत से लोग दिन-रात खडे ही रहते है, और अन्त में उनके पैर फूल जाते है। वे इतने कड़े हो जाते हैं

पातंजल-योगसूत्र—४ २५१

पातंजल-योगसूत्र—४ २५१

कि वे फिर मोड़े नही जा सकते। सारे जीवनभर उन्हें खडा ही रहना पड़ता है। मैने एक समय ऊपर हाथ उठाए हुए एक व्यक्ति को देखा था। मैने उससे पूछा, "जब तुम पहले-पहल इसका अभ्यास करते थे, तब तुम्हे कैसा लगता था?" उसने कहा, "पहले-पहल भयानक पीड़ा मालूम होती थी, इतनी कि मुझे नदी मे जाकर पानी में डूबे रहना पड़ता था, उससे कुछ समय के लिए पीड़ा थोडी कम मालूम होती थी। एक महीने बाद फिर कोई विशेष कष्ट नही हुआ।" इस प्रकार के अभ्यास से विभूतियां प्राप्त होती है।

समाधि—यही यथार्थ योग है, इस शास्त्र का यही मुख्य विषय है—और यही सिद्धि का प्रधान साधन है। पहले जिन सबके वारे में कहा गया है, वे गौण साधन मात्र है। उनके द्वारा वह परमपद प्राप्त नही होता। समाधि के द्वारा हम मानसिक, नैतिक या आध्यात्मिक, जो कुछ चाहे सब प्राप्त कर सकते हैं।

जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥२॥

सूत्रार्थ—(यह) एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना रूप जात्यन्तरपरिणाम प्रकृति के पूर्ण होने से होता है।

**व्याख्या—**पतंजलि ने कहा है कि ये शक्तियाँ जन्म से प्राप्त होती हैं, कभी-कभी वे औषधिविशेष से भी प्राप्त होती है, फिर तपस्या से भी उन्हे पाया जा सकता है। उन्होने यह भी स्वीकार किया है कि इस शरीर को जब तक इच्छा हो, रखा जा सकता है। अभी वे यह बता रहे है कि यह शरीर एक जाति से दूसरी जाति मे परिणत क्यो होता है। वे कहते हैं कि यह प्रकृति के पूर्ण होने से होता है। अगले सूत्र मे वे इसकी व्याख्या करेगे।

२६० | राजयोग

निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥३॥

सूत्रार्थ—सत् और असत् कर्म प्रकृति के परिणाम (परिवर्त्तन) के प्रत्यक्ष कारण नहीं हैं, वरन् ये उसकी बाधाओ को दूर कर देनेवाले निमित्त मात्र हैं—जैसे, किसान जब पानी के बहने में रुकावट डालनेवाली मेंड को तोड़ देता है, तो पानी अपने स्वभाव से ही बह जाता है।

व्याख्या—जब कोई किसान खेत मे पानी सींचने की इच्छा करता है, तब उसे अन्य किसी जगह से पानी लाने की आवश्यकता नही होती; खेत के समीपवर्ती जलाशय मे पानी संचित है, बीच में बाँध रहने के कारण पानी खेत मे नही आ पा रहा है। किसान उस बाँध को खोल भर देता है, और बस पानी गुरुत्वाकर्षण के नियमानुसार, अपने आप खेत में बह आता है। इसी प्रकार, सभी व्यक्तियो मे सब प्रकार की उन्नति और शक्ति पहले से ही निहित हैं। पूर्णता ही मनुष्य का स्वभाव है, केवल उसके किवाड़ बन्द हैं, वह अपना यथार्थ रास्ता नही पा रही है। यदि कोई इस बाधा को दूर कर सके, तो उसकी वह स्वाभाविक पूर्णता अपनी शक्ति के बल से अभिव्यक्त होगी ही। और तब मनुष्य अपने भीतर पहले से ही विद्यमान शक्तियो को प्राप्त कर लेता है। जब यह बाधा दूर हो जाती है और प्रकृति को अपनी अप्रतिहत गति प्राप्त हो जाती है, तब हम जिन्हे पापी कहते है, वे भी साधु के रूप में परिणत हो जाते हैं। स्वभाव ही हमे पूर्णता की ओर ले जा रहा है, कालान्तर में वह सभी को वहाँ ले जायगा। धार्मिक होने के लिए जो कुछ साधनाएँ और प्रयत्न हैं, वे सब केवल निषेधात्मक कार्य हैं—वे केवल बाधा को दूर कर देते हैं और इस प्रकार उस पूर्णता के किवाड़ खोल देते हैं, जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, जो हमारा स्वभाव है।

पातजल-योगसूत्र—४ २६१

पातजल-योगसूत्र—४ २६१

प्राचीन योगियो का परिणामवाद (विकासवाद) आज आधुनिक विज्ञान के प्रकाश में अपेक्षाकृत अच्छी तरह समझ में आ सकेगा। फिर भी योगियो की व्याख्या आधुनिक व्याख्या से कही श्रेष्ठ है। आधुनिक मत कहता है, विकास (परिणाम) के दो कारण हैं—'यौन-निर्वाचन' (sexual selection) और 'योग्यतम की अवस्थिति' (survival of the fittest)*। पर ये दो कारण पर्याप्त नही मालूम होते। मान लो, मानवी ज्ञान उतना उन्नत हो गया कि शरीर-धारण तथा पति या पत्नी की प्राप्ति सम्बन्धी प्रतियोगिता उठ गई। तब तो आधुनिक विज्ञानवेत्ताओ के मतानुसार, मानवी उन्नति-प्रवाह रुद्ध हो जायगा और जाति की मृत्यु हो जायगी। फिर, इस मत के फलस्वरूप तो प्रत्येक अत्याचारी व्यक्ति अपने विवेक से छुटकारा पाने की एक युक्ति पा लेता है। ऐसे मनुष्यो की कमी नही, जो दार्शनिक नामधारी बनकर, जितने भी दुष्ट और अनुपयुक्त मनुष्य है (मानो ये ही उपयुक्तता-अनुपयुक्तता के एकमात्र विचारक हैं), उन सबको मार डालकर मनुष्य-जाति की रक्षा करना चाहते हैं! किन्तु प्राचीन परिणामवादी महा-पुरुष पतञ्जलि कहते हैं कि परिणाम या विकास का वास्तविक रहस्य है--प्रत्येक व्यक्ति मे जो पूर्णता पहले से ही निहित है, उसी की अभिव्यक्ति या विकास मात्र। वे कहते हैं कि इस


* डारविन का मत है कि जगत् का क्रमविकास कुछ निर्दिष्ट नियमो के अनुसार होता है, उनमें 'यौन-निर्वाचन' और 'योग्यतम की अवस्थिति' ही प्रधान हैं। प्रत्येक जीव अपना उपयुक्त पति या पत्नी निर्वाचित कर लेता है, और जो सबसे योग्य है, वही अन्त तक बचा रहता है, यही इन दोनो बातो का अर्थ है।