रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
अष्टमोऽध्यायः । २३१
शुद्ध अभ्रक के छोटे २ टुकड़े ( चूर्ण ) बनाकर उसको धान के साथ ( भूषी युक्त चावल ) एक वस्त्र में रखकर पोटली बांध लेते हैं, फिर उस पोटली को काञ्जी में भिगोकर रख देते हैं । बाद में पोटली को कूटने से उसमें से जो अभ्रक का चूर्ण निकलता है उसको धान्याभ्रक कहते हैं ॥ ३५ ॥
अथ सत्त्वलक्षणम्—
क्षाराम्लद्रावकैर्युक्तं ध्मातमाकरकोष्ठके ।
यस्ततो निर्गतः सारः सत्त्वमित्यभिधीयते ॥ ३६ ॥
किसी धातु की भस्म को क्षार ( टंकण ) अम्ल ( काञ्जी ) और द्रावकवर्ग ( गुञ्जा, मधु, घृत, गुड़, ) के पदार्थों के साथ मिला कर कोष्ठिकायन्त्र में या मूषामें रखकर फूंक देने से जो उस भस्म का सार निकलता है उसको सत्त्व कहते हैं ॥ ३६ ॥
अथ एककोलिसकलक्षणम्—
कोष्ठिका शिखरापूर्णैः कोकिलैर्धमनियोगतः ।
मूषाकण्ठमनुप्राप्यैरेककोलीसको मतः ॥ ३७ ॥
एक कोष्ठिका को कोयलों से भरकर उन के बीच में द्रव्यों से भरी मूषा रखकर धौंकनी से फूंकना चाहिये । जब तक मूषा के भीतर का पदार्थ ( धातु ) उड़कर उसके कण्ठ में संलग्न न हो जाय तबतक यह क्रिया जारी रखनी चाहिए, इसी का नाम एककोलीसक है ॥ ३७ ॥
अथ द्रावणादिकर्मसाधने काष्ठनिर्देशः—
द्रावणे सत्त्वपाते च माधुकाः खादिराः शुभाः ।
दुर्द्भावे वंशजास्ते तु स्वेदने बादराः शुभाः ॥ ३८ ॥
किसी धातु के द्रावण या सत्त्वपातन करने के लिये महुए या खैरके काष्ठ या कोयले श्रेष्ठ हैं तथा जो वस्तु कठिनता से द्रव होती है उसके लिये बांस के काष्ठ या कोयले और स्वेदन कर्म में बैर के कोयलों अथवा लकड़ियों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३८ ॥
अथ हिङ्गुलाकृष्टरसः—
विद्याधराख्ययन्त्रस्थादार्द्रकद्रावमर्दितात् ।
समाकृष्टो रसो योऽसौ हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥ ३६ ॥
२३२ रसरत्नसमुच्चये—
हिङ्गुल को अदरक के स्वरस में घोटकर विद्याधरयन्त्र के द्वारा ( उसमें लेपकर ) उड़ाकर निकाले हुए पारद को हिङ्गुलाकृष्ट पारद कहते हैं ॥ ३९ ॥
अथ घोषाकृष्टताम्रलक्षणम्—
स्वल्पतालयुतं कांस्यं वङ्कनालेन ताडितम् ।
मुक्तवङ्गं हि तत्ताम्रं घोषाकृष्टमुदाहृतम् ॥ ४० ॥
कांस्य के अन्दर कुछ हरताल मिलाकर बङ्कनाल के द्वारा अग्नि में फूंकने से वङ्ग का भाग पृथक् हो जाता है और ताम्र पृथक् निकल जाता है इस ताम्र को घोषाकृष्ट ताम्र कहते हैं । कांस्य ताम्र और वंग के संयोग से बनता है उक्तविधि से ताम्र को पृथक् कर लेते हैं ॥ ४० ॥
अथ वरनागलक्षणम्—
तीक्ष्णनीलाञ्जनोपेतं ध्मातं हि बहुशो दृढम् ।
मृदु कृष्णं द्रुतद्रावं वरनागं तदुच्यते ॥ ४१ ॥
नाग को तीक्ष्ण लौह और नीलाञ्जन के साथ बहुत बार तेज आँच में फूंकने से जब वह अत्यन्त कोमल कृष्णवर्ण और अत्यन्त शीघ्र द्रुत होने लायक होजाय तब उसको वरनाग ( उत्तम सीस ) कहते हैं ॥ ४१ ॥
उत्थापनलक्षणम्—
मृतस्य पुनरुद्भूतिः सम्प्रोक्तोत्थापनाह्वया ॥ ४२ ॥
भस्म हुए लोह ( सप्तधातु ) को द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ फूंकने से वह अपने स्वरूप में आजाता है इसी को उत्थापन कहते हैं ॥ ४२ ॥
ढालनलक्षणम्—
द्रुतद्रवस्य निक्षेपो द्रवे तद् ढालनं मतम् ॥ ४३ ॥
किसी धातु को अग्नि में द्रवित कर के द्रव में बुझाने से वह ढल (घन हो) जाती है, इसी को ढालन कहते हैं ॥ ४३ ॥
अथ नागसम्भूतचपलः—
त्रिंशत्पलमितं नागं भानुदुग्धेन मर्दितम् ।
विमर्द्य पुटयेत्तावद्यावत्कर्षावशेषितम् ॥ ४४ ॥
न तत्पुटसहस्रेण क्षयमायाति सर्वथा ।
चपलोऽयं समादिष्टो वार्तिकैर्नागसम्भवः ॥ ४५ ॥
अष्टमोऽध्यायः। २३३
अष्टमोऽध्यायः। २३३
३० पल ( १२० तो० ) नाग का चूर्ण बनाकर मदार के दुग्ध से भावित करके घोटलें, फिर गजपुट में उसे फूंकदें, इसविधि से बार २ मदार के दुग्ध से घोट-कर पुट देते देते जब उसकी मात्रा एक कर्ष (एक तोला) शेष रह जाती है उसी को वार्तिककारों ( रसशास्त्रपरिभाषानिर्माताविद्वानों ) ने नाग से उत्पन्न चपल कहा है । इस एक तोले का फिर यदि हजारों पुट भी दिये जावें तो भी वह नष्ट नहीं होता है ॥ ४४-४५ ॥
अथ वङ्गसम्भूतचपलः— इत्थं हि चपलः कार्यो वङ्गस्यापि न संशयः ॥ ४६ ॥
उपर्युक्त विधि से वङ्ग धातु को भी अर्कदुग्ध से भावित कर अनेक पुट द्वारा उससे चपल का निर्माण किया जाता है ॥ ४६ ॥
चपलकार्यम्— तत्स्पृष्टहस्तसंस्पृष्टः केवलो बध्यते रसः ॥ ४७ ॥
इस चपल को हाथों में मलकर पारद का स्पर्श मात्र करने से उसका बन्धन ( गोली ) हो जाता है, यह चपल का प्रभाव है ॥ ४७ ॥
बद्धरसोपयोगः— स रसो धातुवादेषु शस्यते न रसायने । अयं हि खर्वणाख्येन लोकनाथेन कीर्तितः ॥ ४८ ॥
चपल के द्वारा बद्ध हुए रस का उपयोग धातु वाद ( लोह से स्वर्ण बनाने ) में होता है । रसायन कर्म में इस पारे का उपयोग नहीं करना चाहिए । यह विधि खर्वण नामक लोकनाथ ने कही है ॥ ४८ ॥
अथ धौतम्— भूभुजङ्गशकृत्तोयैः प्रक्षाल्यापहृतं रजः । कृष्णवर्णं हि तत्प्रोक्तं धौताख्यं रसवादिभिः ॥ ४९ ॥
केञ्चुओं की विष्ठा को जल में घोल ( विलयन ) बना कर उस घोल में राख ( अर्थात् चपल बनाते समय जो नाग या वङ्ग का भाग राख में रह जाता है उसे ) को घुलाकर छानने से जो काले वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है उसको रसवादी धौत नाग और धौतवङ्ग कहते हैं । कुछ लोगों का यह अभिप्राय है कि केवल केञ्चुओं की विष्ठा को पानी में घोलकर छानने से जो कृष्ण वर्ण का चूर्ण प्राप्त होता है वह धौत कहा जाता है, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है ॥ ४९ ॥
२३४ : रसरत्नसमुच्चये—
अथ द्वन्द्धानम्— द्रव्ययोर्मर्दनाध्मानाद्द्वन्द्धानं परिकीर्तितम् ॥ ५० ॥ दो धातुओं को एक साथ मिलाकर फूंकने से या मर्दन करने से जो एकी करण किया जाता है उसको द्वन्द्धान् कहते हैं ॥ ५० ॥
अथ भजनी— भागाद्द्रव्याधिके क्षेपमनुवर्णंसुवर्णके द्रवैर्वा वह्निकाग्रासो भजनी वादिभिर्मता ॥ ५१ ॥ सुवर्ण आदि धातुओं को विद्रुत कर उनमें अन्य पदार्थों के मिलाने को अनुवर्ण या सुवर्णक कहते हैं और धातुओं को गर्म कर किसी द्रव पदार्थ ( स्वरस ) के द्वारा उनकी अग्नि हरण करने को भजनी कहते हैं ॥ ५१ ॥
अथ चुलका— पतङ्गीकल्कतो जाता लोहे तारे च हेमता । दिनानि कतिचित्स्थित्वा यात्यसौ चुलका मता ॥ ५२ ॥ लोह या चांदी में कुछ औषधियों के संसर्ग से जो सुवर्ण सदृश रङ्ग (हेमता) उत्पन्न हो जाता है उसको पतङ्गी कहते हैं और कुछ दिनों के पश्चात् वह हेमता नष्ट हो जाती है उस अवस्था को चुलका कहते हैं । कुछ लोगों का मत है कि पतङ्गी नामक औषधि के कल्क में तार या लोह को कुछ दिन रखने से उनमें एक तरह से सुवर्ण के समान वर्ण उत्पन्न हो जाता है इसको चुलका कहते हैं ॥ ५२ ॥
अथ पतङ्गीरागः— रञ्जिताद्धि चिराल्लोहाद्धमानाद्वा चिरकालतः । विनिर्यास स निर्दिष्टः पतङ्गीरागसंज्ञकः ॥ ५३ ॥ रञ्जित किये हुए लौह के कुछ दिन तक पड़े रहने से या उस को फूंक देने से जो सत्त्व निकलता है उसको पतङ्गीराग कहते हैं ॥ ५३ ॥
अथ आवापः— द्रुते द्रव्यान्तरक्षेपो लोहाद्ये क्रियते हि यः । स आवापः प्रतीवापस्तदेवाऽऽच्छादनं मतम् ॥ ५४ ॥ अग्नि में विद्रुत हुए लोह में जो अन्य द्रव्य का प्रक्षेप किया जाता है उसको आवाप, प्रतीवाप अथवा आच्छादन कहते हैं ॥ ५४ ॥
अष्टमोऽध्यायः ।
२३५
अथ अभिषेकः—
द्रुते वह्निस्थिते लोहे विरम्राष्टनिमेषकम् ।
सलिलस्य परिक्षेपः सोऽभिषेक इति स्मृतः ॥ ५५ ॥
वह्नि के संयोग से द्रुत हुए लोहादिक में आठ निमेष के पश्चात् जो जल का छिड़काव दिया जाता है या जल डाला जाता है उसको अभिषेक कहते हैं ॥ ५५ ॥
अथ निर्वापलक्षणम्—
तप्तस्याप्सु विनिक्षेपो निर्वापः स्नपनं च तत्॥ ५६॥
प्रतप्त लोह (सप्त या अष्ट धातु) को किसी औषधि के स्वरस में बुझाने को स्नपन या निर्वाप कहते हैं ॥ ५६ ॥
प्रतिवापसमयनिर्देशः—
प्रतीवापादिकं कार्यं द्रुते लोहे सुनिर्मले ॥ ५७ ॥
जब लोह अग्नि से द्रव होकर निर्मल हो जाय तभी उसका प्रतीवाप, स्नपन, और अभिषेक करना चाहिए ॥ ५७ ॥
अथ शुद्धावर्तः—
यदा हुताशो दीप्तार्चिः शुक्लोत्थानसमन्वितः ।
शुद्धावर्तस्तदा ज्ञेयः स कालः सत्त्वनिर्गमे ॥ ५८ ॥
जब अग्नि अच्छी तरह से प्रज्वलित हो जाय और उसमें से शुक्लता लिये हुए लालरंग की तीव्र लपटें निकलने लगें उस समय उसको शुद्धावर्त कहते हैं, धातुओं का सत्त्व इसी अवस्था में निकलता है, अर्थात् धातुओं के सत्त्व को उत्तम रीति से निकालने के लिये इतनी तेज आँच करनी आवश्यक है ॥ ५८ ॥
अथ बीजावर्तः—
द्राव्यद्रव्यनिभा ज्वाला दृश्यते धमने यदा ।
द्रावस्योन्मुखता सेयं बीजावर्तः स उच्यते ॥ ५९ ॥
किसी धातु का द्रावण करने के लिये उसको अग्नि में रख कर धौंकनी से धौंकते हैं, उस समय अग्नि में उस धातु के रंग के सदृश ज्वाला दिखाई देती है इसी समय में उस धातु का द्रव होना प्रारम्भ होता है इसको बीजावर्त कहते हैं ॥ ५९॥
अथ स्वाङ्गशीतलम्—
वह्निस्थमेव शीतं यत्तदुक्तं स्वाङ्गशीतलम् ॥ ६० ॥
२३६ रसत्नसमुच्चये—
किसी वस्तु को अग्नि पर पकाकर आंच देना बन्द कर देते हैं, जब वह वस्तु वायुमण्डल की शीतता से चूल्हे पर स्थित ही शीतल हो जाती है उसको स्वाङ्गशीतल कहते हैं ॥ ६० ॥
अथ वहिःशीतलम्— अग्नेराकृष्य शीतं यत्तद्वहिः शीतमुच्यते ॥ ६१ ॥ किसी वस्तु का अग्नि मे पाक कर फिर उसको अग्नि से नीचे रख कर शीतल करते हैं इसको बहिःशीत कहते हैं ॥ ६१ ॥
अथ स्वेदनलक्षणम्— क्षाराम्लैरौषधैर्वाऽपि दोलायन्त्रे स्थितस्य हि । पचनं स्वेदनाख्यं स्यान्मलशैथिल्यकारकम् ॥ ६२ ॥ क्षार (जवाखार, सुहागा, इत्यादि) तथा अम्ळवर्ग की औषधियों का स्वरस दोलायन्त्र में भर कर उस में पारद, लोह, शंख, शुक्ति इत्यादि पदार्थों को उनके साथ पाचन करते हैं, इसको स्वेदन संस्कार कहते हैं। स्वेदन संस्कार करने से उस धातु का कुछ मल भाग पृथक् हो जाता है ॥ ६२ ॥
अथ मर्दनलक्षणम्— उदितै रौषधैः सार्धं सर्वाम्लः काञ्जिकैरपि । पेषणं मर्दनाख्यं स्याद्वहिर्मलविनाशनम् ॥ ६३ ॥ भिन्न २ वस्तु के मर्दन के लिये कही हुई औषधियों के साथ या सर्वप्रकार के अम्ल पदार्थों के स्वरस द्वारा (जिसके लिये जिसका शास्त्र में निर्देश हो) अथवा काञ्जी के साथ पारद या अन्य पदार्थ का खरल में पेषण करते हैं। इसको मर्दन संस्कार भी कहते हैं, इस संस्कार से भी पारद या अन्य पदार्थों के बहिर्मल का विनाश होता है ॥ ६३ ॥
अथ मूर्च्छनलक्षणम्— मर्दनाऽऽदिष्टभैषज्यैर्नष्टपिष्टत्वकारकम् । तन्मूर्च्छनं हि वङ्गाहि-भुजङ्गकञ्चुकनाशनम् ॥ ६४ ॥ मर्दनसंस्कार में कही हुई औषधियों के चूर्ण, स्वरस या क्वाथ के साथ पारद को घोटकर उसकी कज्जली या पिण्ड अथवा सूक्ष्म चूर्ण कर लेते हैं इसको
अष्टमोऽध्यायः।
अष्टमोऽध्यायः। २३७
मूर्च्छन संस्कार कहते हैं । यह संस्कार पारद के नाग, वङ्ग आदि महादोषों (१) को नष्ट करता है । पारद के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भी मूर्च्छन संस्कार करने से गुणोत्कर्ष होता है ॥ ६४ ॥
अथोत्थापनादिलक्षणम्—
स्वेदातपादियोगेन स्वरूपापादनं हि यत् ।
तदुत्थापनमित्युक्तं मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् ॥ ६५ ॥
मूर्च्छन संस्कार के कारण विरूपित हुए (नष्टपिष्ट हुए) पारद को फिर दोलायंत्र द्वारा स्वेदन करके या अग्नि और सूर्य के सन्ताप के द्वारा अपने पूर्व रूप में ले आते हैं, इसी को उत्थापन संस्कार कहते हैं । क्योंकि इस संस्कार से पारद पुनः स्वस्वरूप को ग्रहण कर लेता है ॥ ६५ ॥
बन्धलक्षणम्—
स्वरूपस्य विनाशेन पिष्टत्वादूध्वन्धनं हि तत् ।
विद्वद्भिर्निर्जितः सूतो नष्टपिष्टिः स उच्यते ॥ ६६ ॥
गन्धकादिक भिन्न २ पदार्थों के साथ पारद को घोटने से उसका श्वेत और चपलगुण नष्ट होकर चूर्ण या कज्जली बन जाती है और इस पेषण के कारण उसका बन्धन (मूर्तिबद्धरूप अथवा वह्निनाऽनुच्छिद्यमानत्व) हो जाता है । इस प्रकार से जीते हुए (स्वाधीन किये हुए) पारद का विद्वान् लोग नष्टपिष्टि कहते हैं ॥ ६६ ॥
अथ पातनलक्षणम् —
उक्तौषधैर्मर्दितपारदस्य यन्त्रास्थितस्योर्ध्वमधश्च तिर्यक् ।
निर्यातनं पातनसंज्ञमुक्तं वङ्गाहिसम्पर्कजकञ्चुकघ्नम् ॥ ६७ ॥
स्वेदन, मर्दनादिक संस्कार में बताई हुई तथा अन्य शास्त्रोक्त औषधियों के साथ पारद को खरल में घोट करके ऊर्ध्वपातन, अधः पातन और तिर्यक् पातन यन्त्रों में लेप कर के या चूर्ण रूप ही में रख कर क्रम से पारद को ऊपर, नीचे और तिर्यक् मार्ग से उड़ाते हैं, इस को पातन कहते हैं । इस पातन संस्कार से पारद के नाग और वङ्ग से उत्पन्न कंचुकादिक दोष नष्ट हो जाते हैं । वास्तव में खनिज पारद में नाग, वङ्ग हरताल आदि बहुत से पदार्थ मिले रहते हैं । उन
( १ ) नागो वङ्गो मलोवह्निश्वापल्यञ्च विषंगिरिः ।
असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥
२३८ रसरत्नसमुच्चये—
पदार्थों से पारद को मुक्त करने के लिये शास्त्रकारों ने तीन प्रकार के पातनों का निर्देश किया है । पारद के अन्दर यह गुण है कि वह अग्नि लगते ही जिधर भी उसे मार्ग मिले उधर ही उड़ जाता है, किन्तु अन्य पदार्थ इस शक्ति से रहित हैं । जब पारद का ऊर्ध्वपातन करते हैं तब वह ऊपर उड़ जाता है किन्तु उसके साथ २ हरताल (आर्सेनिक) भी ऊपर उड़ता है इसलिये पारद का तिर्यक् पातन करते हैं । हरताल का तिर्यक् पातन नहीं होता है, इस तरह पारद हरताल से मुक्त हो जाता है। ऊर्ध्व पातन से अन्य नागादिक दोष नीचेही रह जाते हैं । इस वास्ते अशुद्ध पारद (हिङ्गुलोत्थ पारद से भिन्न) का तीनों प्रकार से पातन करना आवश्यक है ॥ ६७ ॥
अथ रोधनलक्षणम्—
जलसैन्धवयुक्तस्य रसस्य दिवसत्रयम् ।
स्थितिरास्थापनी कुम्भे याऽसौ रोधनमुच्यते ॥ ६८ ॥
मिट्टी के घड़े में पानी और सैन्धानमक भरकर पारद को किसी दृढ वस्त्र में बांधकर या ऐसे ही तीन दिन तक पड़ा रहने देते हैं । यह क्रिया स्वेदन मूर्च्छनादिक संस्कारों से षण्ढभावापन्न पारद के दोषों को नष्ट कर उत्कृष्टगुणों का उसमें आस्थापन (उत्पादन) करती है और इसको रोधनसंस्कार कहते हैं ॥ ६८ ॥
नियमनलक्षणम्—
रोधनाल्लब्धवीर्यस्य चपलत्वनिवृत्तये ।
क्रियते पारदे स्वेदः प्रोक्तं नियमनं हि तत् ॥ ६९ ॥
रोधन संस्कार से उत्कृष्ट शक्ति को प्राप्त हुए पारद के चपल दोष को नष्ट करने के लिये सर्पाक्षी इत्यादि नियामकगण(१) की औषधों के स्वरस में पारद का स्वेदन करते हैं, उसको नियमन संस्कार(२) कहते हैं ॥ ६९ ॥
( १ ) नियामकगण—
महाबला नागबला यमचित्रा पुनर्नवा ।
आखुकर्णी सहचरा वासिका काकमाचिका ॥ १ ॥
गोक्षुरः शरपुङ्खा च विष्णुक्रान्ता घनध्वनिः ।
मण्डूकपर्णी तुलसी बला च गिरिकर्णिका ॥ २ ॥
( २ ) यथा—
सर्पाक्षीचित्रिका कन्या भृङ्गारकनकाम्बुभिः ।
दिनं संस्वेदितः सूतो नियमात् स्थिरतां व्रजेत् ।
-अष्टमोऽध्यायः। २३९
— दीपनलक्षणम् — धातुपाषाणमूलाद्यैः संयुक्तो घटमध्यगः। ग्रासार्थं त्रिदिनं स्वेदो दीपनं तन्मतं बुधैः॥ ७० ॥ पारद का दोलायन्त्र के द्वारा धातु, उपधातु, पाषाण या अन्य दीपनद्रव्यों (औषध) के साथ स्वर्णादिक को ग्रास करने की शक्ति बढ़ाने के लिये तीन दिन तक स्वेदन किया जाता है, इसको विद्वान् दीपनसंस्कार कहते हैं ॥ ७० ॥
अथ ग्रासमानम्— इयन्मानस्य सूतस्य भोज्यद्रव्यात्मिका मितिः। इयतीत्युच्यते याऽसौ ग्रासमानं समीरितम् ॥ ७१ ॥ इतनी मात्रा में पारद इतनी मात्रा वाले स्वर्ण अभ्रक आदि पदार्थ को ग्रसित कर सकता है, इस प्रकार जो माननिर्देश किया जाता है उसको ग्रासमान कहते हैं ॥७१॥
अथ जरणाभेदनिर्देशः— ग्रासस्य चारणं गर्भे द्रावणं जारणं तथा। इति त्रिरूपा निर्दिष्टा जारणावरवार्तिकैः॥ ७२ ॥ ग्रासः पिण्डः परिणामस्तिस्रश्चाख्याः पराः पुनः॥ ७३ ॥ समुखा निर्मुखा चेति जारणा द्विविधा पुनः॥ ७४ ॥ पारद के अन्दर ग्रासयोग्य स्वर्ण आदि का विना अग्नि संयोग के मिलाने को चारण और अग्नि संयोग से ग्रास तथा योग्य पदार्थ को द्रव करके मिलाने को द्रावण तथा रस के अन्दर ग्रासयोग्य द्रवीभूत स्वर्णादिक को मिलाकर विड्यन्त्रादि योग से (किसी काष्ठ औषधि के साथ) पाक करने को जारण कहते हैं। इस तरह रस परिभाषा को बनाने वाले विद्वानों ने तीन प्रकार का जारणसंस्कार कहा है। इसी के अन्य नाम ग्रास (पारद अन्य वस्तु को कवलित कर ले), पिण्ड (पिण्ड स्वरूप का जारण) तथा परिणाम (अवस्थान्तरप्राप्तिरूपजारण) हैं फिर जारणा के संमुखजारणा और निर्मुखजारणा ये दो भेद होते हैं ॥ ७२-७४ ॥
शतावरी शङ्खपुष्पी श्वेतार्कः कनकाह्वयः। चक्रमर्दः करञ्जश्च ब्रह्मदण्डी शिखण्डिनी ॥ ३ ॥ गुडूची सैन्धवं पाठा मृगाक्षी सोमवल्लिका। नियामकगणो ह्येषः प्रोक्तो रसविशारदैः ॥ ४ ॥
२४० रसरत्नसमुच्चये—
निर्मुखजारणालक्षणम्—
निर्मुखा जारणा प्रोक्ता बीजाऽऽदानेन भागशः ॥ ७५ ॥
आगे कहे हुए मुख से रहित (अर्थात् पारद में चतुःषष्ठ्यंश भाग बीज न मिलाया जाय) भिन्न २ जारण में यथानिर्दिष्ट भाग से बीज का मिलाना या प्रक्षेप करना चाहिए, इसी को निर्मुखजारणा कहते हैं ॥ ७५ ॥
अथ बीजादिनिर्देशः—
शुद्धं स्वर्णं च रूप्यं च बीजमित्यभिधीयते ॥ ७६ ॥
शुद्ध स्वर्ण और शुद्ध रूपे को बीज कहते हैं ॥ ७६ ॥
मुखलक्षणम् —
चतुःषष्ठ्यंशतो बीजप्रक्षेपो मुखमुच्यते ॥ ७७ ॥
पारद के अन्दर शुद्ध स्वर्ण या शुद्ध रौप्य को पारद की अपेक्षा ६४ भाग की मात्रा में मिलाने को मुख कहते हैं ॥ ७७ ॥
सम्मुखजारणालक्षणम्—
एवं कृते रसो ग्रासलोलुपो मुखवान् भवेत् ।
कठिनान्यपि लोहानि क्षमो भवति भक्षितुम् ॥
इयं हि सम्मुखा प्रोक्ता जारणा मृगचारिणा ॥ ७८ ॥
इस तरह पारद के अन्दर ६४ वें भाग की मात्रा में बीज के मिला देने पर वह मुखवाला होकर अन्य लोह अभ्रक इत्यादि कठिन धातुओं को ग्रसित (भक्षण) करने के लिये समर्थ हो जाता है, इसी को मृगचारी नाम वाले किसी विद्वान् ने सम्मुखजारणा कही है ॥ ७८ ॥
अथ राक्षसवक्त्ररसलक्षणम्—
दिव्यौषधिसमायोगात्स्थितः प्रकटकोष्ठिषु ।
भुञ्जीताखिललोहाद्यं योऽसौ राक्षसवक्त्रवान् ॥ ७९ ॥
दिव्य औषधियों के साथ या मनःशिला के साथ मिलाकर खुले मुख वाली कोष्ठिका (यंत्र) में यदि पारा रखा जाय तो वह सम्पूर्ण लोहादि धातुओं को अपने अन्दर मिलाने में समर्थ हो जाता है, ऐसे पारद को राक्षसमुखी पारद कहते हैं अर्थात् जैसे राक्षस सबको खा जाता है उसी तरह पारद भी अत्यन्त बुभुक्षित हो जाता है ॥ ७९ ॥
अष्टमोऽध्यायः । २४१
अष्टमोऽध्यायः । २४१
चारणालक्षणम्— रसस्य जठरे ग्रासत्क्षपणं चारणा मता ॥ ८० ॥ पारद के अन्दर किसी ग्रास करने योग्य लोहादि धातु के मिलाने या रस के साथ उसको मिश्रित करने को चारणा कहते हैं ॥ ८० ॥
गर्भद्रुतिलक्षणम्— ग्रस्तस्य द्रावणं गभ गर्भद्रुतिरुदाहृता ॥८१ ॥ 'पारद के अन्दर ग्रसित हुआ लोहादिक पदार्थ अग्नि संयोग से द्रुत होकर उसमें मिल जाते हैं इस को गर्भद्रुति कहते हैं' ॥ ८१ ॥
बाह्यद्रुतिलक्षणम्— बहिरेवं द्रुतिं कृत्वा घनसत्त्वादिकं खलु । जारणाय रसेन्द्रस्य सा बाह्यद्रुतिरुच्यते ॥ ८२ ॥ अभ्रक का सत्त्व या अन्य लोहादिकों की भस्म को पृथक् द्रव कर के पारद के अन्दर जारण करने के लिये मिलाया जाता है, इस क्रियाको बाह्यद्रुति कहते हैं॥८२॥
द्रुतेर्भेदाः— निर्लेपत्वं द्रुतत्वं च तेजस्त्वं लघुता तथा । असंयोगश्च सूतेन पञ्चधा तिलक्षणम् ॥ ८३ ॥ १ द्रव पदार्थ के साथ अच्छी तरह मिल जाना या अन्य मलसंसर्ग से रहित होना, २ विशेष रूप से पतला हो जाना, ३ पूर्व स्वरूप की अपेक्षा उत्तम रूप हो जाना, ४ स्वाभाविक गुरुता से कुछ लघुता आजाना, ४ पारद के साथ पृथक होकर दिखाई देना, ये ५ द्रुति के लक्षण हैं ॥ ८३ ॥
द्रुतेः स्वरूपम्— औषधाध्मानयोगेन लोहधात्वादिकं तथा । सन्तिष्ठते द्रवाकारं सा द्रुतिः परिकीर्तिता ॥ ८४ ॥ द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ सप्त या अष्ट प्रकार के लोह, रत्न, उपरत्न इत्यादि पदार्थ अग्नि में द्रव होकर किसी के साथ लिप्त न होते हुए उसी रूप में स्थित रहते हैं इसी को द्रुति कहते हैं ॥ ८४ ॥
अथ जारणाभेद-जारणालक्षणम्— द्रुतग्रासपरीणामो विडयन्त्रादियोगतः । रस० १६
२४२ | रसरत्नसमुच्चये—
जारणेत्युच्यते तस्याः प्रकाराः सन्ति कोटिशः ॥ ८५ ॥
आगे कहे जाने वाले विड्यंत्र मूषायन्त्र इत्यादि के द्वारा द्रुत हुए स्वर्णादिक प्रसित पदार्थ का पारे के साथ जो पाक किया जाता है उसको जारणा कहते हैं, इसके करोड़ों भेद हैं ॥ ८५ ॥
अथ विडादिलक्षणम्—
क्षारैरम्लैश्च गन्धाद्यैर्मूत्रैश्च पटुभिस्तथा ।
रसग्रासस्य जीर्णार्थं तद्विडं परिकीर्तितम् ॥ ८६ ॥
क्षार ( यवक्षारादिक ) अम्लपदार्थ ( काञ्जी ) गन्धक आदि धातु, गोमूत्र, और पांचो प्रकार के लवण इनके सहयोग से पारद में मिलि हुई स्वर्णादिक धातु का जारण करते हैं, इसको विडयन्त्र कहते हैं ॥ ८६ ॥
रञ्जनलक्षणम्—
सुसिद्धबीजधात्वादि-जारणेन रसस्य हि ।
पीतादिरागजननं रञ्जनं परिकीर्तितम् ॥ ८७ ॥
उत्तम प्रकार से सिद्ध किये हुए बीज ( स्वर्ण और रौप्य ) तथा धातुओं के साथ पारद का जारण करके उसमें जो पीत रक्त इत्यादि रंग उत्पन्न करते हैं इसको रञ्जन कहते हैं ॥ ८७ ॥
सारणालक्षणम्—
सूते सतैलयन्त्रस्थे स्वर्णादिक्षेपणं हि यत् ।
वेधाधिक्यकरं लोहे सारणा सा प्रकीर्तिता ॥ ८८ ॥
तैल से भरी हुई अन्धमूषा में पारद डाल कर उसमें स्वर्ण रौप्य आदि धातुओं को डाल कर उनमें वेध करते हैं अर्थात् अद्भुत गुणों का उद्भावन करते हैं इसी को सारणा कहते हैं ॥ ८८ ॥
वेधलक्षणं भेदाश्च—
व्यवायिभेषजोपेतो द्रव्ये क्षिप्तो रसः खलु ।
वेध इत्युच्यते तज्ज्ञैः स चानेकविधः स्मृतः ॥ ८९ ॥
लेपः क्षेपश्च कुन्तश्च धूमाख्यः शब्दसंज्ञकः ॥ ९० ॥
अफीम, भङ्गा, नागवल्ली, कुमारी, धस्तूर इत्यादि व्यवायशक्तिवर्धक पदार्थों के साथ पारद को स्वर्णादि के समान गुण उत्पन्न करने के लिये लोहादिक धातु
अष्टमोऽध्यायः। २४३
में डालते हैं इसको वेध कहते हैं, और यह वेध अनेक प्रकार का है। लेपवेध, क्षेपवेध,कुन्तवेध धूमवेध, शब्दवेध इस तरह से वेध पाँच प्रकार का होता है॥८९-९०॥
लेपवेधलक्षणम्—
लेपनं कुरुते लोहं स्वर्णं वा रजतं तथा ।
लेपवेधः स विज्ञेयः पुटमत्र च सौरकम् ॥ ९१ ॥
लोह आदि धातुओं पर वेधसामर्थ्य उत्पन्न करने वाली विशेष क्रिया से सिद्ध हुए पारद का लेप करके उस लोहादि धातु को स्वर्ण या रोप्य के रूप में परिवर्तित कर देते हैं इसी को लेपवेध कहते हैं। इस क्रिया में उस धातु पर पारद का लेप कर सौरक पुट ( सूर्य.पुट ) से उसे पकाते हैं ॥ ९१ ॥
क्षेपवेधलक्षणम्—
प्रक्षेपणं द्रते लोहे वेधः स्यात्क्षेपसंज्ञितः ॥ ९२ ॥
किसी रजत या ताम्र इत्यादि को द्रव कर के उस में पारद ( विशेषौषध मिश्रित ) को डालते हैं । इसको क्षेपवेध कहते हैं ॥ ९२ ॥
कुन्तवेधलक्षणम्—
सन्दंशधृतसूतेन द्रुतद्रव्याहतिश्च या ।
सुवर्णत्वादिकरणं कुन्तवेधः स उच्यते ॥ ९३ ॥
किसी धातु को अग्नि में द्रव करके उस द्रवित धातु में मूर्त्तिबद्ध पारद को संदशयंत्र से पकड़ कर डुबाते हैं इससे वह द्रुत धातु ( जिसमें पारद डुबाया जाता है ) सुवर्ण के समान रूप और गुणों को करने लायक हो जाती है इसी को कुन्तवेध कहते हैं ॥ ९३ ॥
धूमवेधलक्षणम्—
वह्नौ धूमायमानेऽन्तः प्रक्षिप्त रसधूमतः ।
स्वर्णाद्यापादनं लोहे धूमवेधः स उच्यते ॥ ९४ ॥
धूप से युक्त वह्नि की भट्टी पर एक कड़ाही रख देनी चाहिए, फिर इसमें पारद डाल देना चाहिए । जब कड़ाही के अन्दर रखे हुए पारद में धूआं निकलने लगे तब उस में अन्य भट्टी पर गले हुए लोह को डाल देते हैं इससे उस धातु में स्वर्ण के गुण धर्म उत्पन्न हो जाते हैं इसको धूमवेध कहते हैं ॥ ९४ ॥
२४४ | रसरत्नसमुच्चये—
शब्दवेधलक्षणम्—
मुखस्थितरसेनाल्पलोहस्य धमनात्खलु ।
स्वर्णरूप्यत्वजननं शब्दवेधः स कीर्त्तितः ॥ ९५ ॥
किसी लौह आदि धातु के कुछ भाग को अग्नि पर विद्रुत कर उसको मुख में रखे हुए पारद ( वेधसमर्थपारद गोली ) से एकनली के द्वारा फूंक के जोर से धमने से वह धातु स्वर्ण या रौप्य के रूप में परिवर्तित हो जाती है इसको शब्दवेध कहते हैं ॥ ९५ ॥
उद्घाटनलक्षणम्—
सिद्धद्रव्यस्य सूतेन कालुष्यादिनिवारणम् ।
प्रकाशनं च वर्णस्य तदुद्घाटनमीरितम् ॥ ९६ ॥
मृत किये हुए ( भस्म किये हुए ) लोहादिक द्रव्यों की कलुषता (मालिन्य) विशेष रूप से सिद्ध पारद के द्वारा दूर की जाती है और उस मृत लोहादिक के रङ्ग को भी पारद उत्कृष्ट करता है इस को उद्घाटन कहते हैं ॥ ९६ ॥
स्वेदनलक्षणम्—
क्षाराम्लैरौषधैः सार्द्धं भाण्डं रुद्ध्वाऽतियत्नतः ।
भूमौ निखन्यते यत्नात्स्वेदनं सम्प्रकीर्त्तितम् ॥ ९७ ॥
क्षार, अम्ल, ( काञ्जी ) तथा और भी अन्य औषधियों को भाण्ड में भरकर उसमें पारद या अन्य लोह इत्यादि धातु को रख करके भाण्ड का मुख सकोरे से ढक कर कपड़ मिट्टि करके बन्द करदेते हैं फिर उस भाण्ड को पृथ्विी में गाड़ देते हैं, इस को भी स्वेदन यन्त्र कहते हैं । क्योंकि भूमि की आन्तरिक उष्णता से स्वेदन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है ॥ ९७ ॥
संन्यासलक्षणम् ।
रसस्यौषधयुक्तस्य भाण्डरुद्धस्य यत्नतः ।
मन्दाग्नियुतचुल्ल्यन्तः क्षेपः संन्यास उच्यते ॥ ९८ ॥
किसी भाण्ड में क्षार तथा अम्ल भरकर उसमें पारद रख देते हैं । फिर उस भाण्ड के मुख को कपड़मिट्टी से बन्द कर के मन्द २ आंच वाले चूल्हे के उपर रख देते हैं उसको सन्यास कहते हैं ॥ ९८ ॥
अष्टमोऽध्यायः । २४५
रसस्वेदसंन्यासगुणाः ।
द्वावेतौ स्वेदसंन्यासौ रसराजस्य निश्चितम् ।
गुणप्रभावजनकौ शीघ्रव्याप्तिकरौ तथा ॥ ९९ ॥
स्वेद और सन्यास इन दोनों विधियों से पारद के अन्दर गुण और देह-सिद्धिजनक प्रभाव उत्पन्न होते हैं तथा ये दोनों संस्कार पारद को शरीर में शीघ्र ही व्याप्त होने योग्य बना देते हैं ॥ ९९ ॥
अथ परिभाषाऽऽवश्यकता—
रसनिगममहाब्धेः सोमदेवः समन्तात्
स्फुटतरपरिभाषानामरत्नानि हृत्वा ।
व्यरचयदतियत्नात्तैरिमां कण्ठमालां
कलयतु भिषगग्र्यो मण्डनार्थे सभायाम् ॥ १०० ॥
सोमदेव नामक रसशास्त्र के विशेषज्ञ ने रसशास्त्र रूपी समुद्र से प्रयत्न पूर्वक समग्ररूप से अत्यन्त स्पष्टार्थ बोधक परिभाषाओं की संज्ञा रूपी रत्नों को निकालकर उनकी कण्ठमाला (अर्थात् कण्ठस्थ करने योग्य परिभाषाएं) बनाई है। इस माला को रस शास्त्र के पण्डित सभा में स्वविषय का प्रतिपादन करने के लिये धारण करें ॥ १०० ॥
अध्यायपठनफलम्—
भवेत्पठितवारोऽयमध्यायो रसवादिनाम् ।
रसकर्माणि कुर्वाणो न स मुह्यति कुत्रचित् ॥ १०१ ॥
इति श्री वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये
रसपरिभाषाकथनं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
रस शास्त्र के आचार्यों के मत से परिपूर्ण इस अध्याय का जो विद्वान् बार-म्बार अभ्यास (आवृत्ति) करेगा, वह रस कर्म को करता हुआ किसी विषय में व्यामोहित (किंकर्त्तव्यमूढ) नहीं होगा। अर्थात् वह किसी प्रकार से रसप्रक्रिया में भ्रमित नहीं होता है ॥ १०१ ॥
इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां रसपरिभाषा-
कथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
१४६ रसरत्नसमुच्चये—
नवमोऽध्यायः ।
अथ यन्त्राणि—
अथ यन्त्राणि वक्ष्यन्ते रसतन्त्राण्यशेषतः ।
समालोच्य समासेन सोमदेवेन साम्प्रतम् ॥ १ ॥
श्री सोमदेव ने सम्पूर्ण रसशास्त्र के भिन्न २ तन्त्रों का अवलोकन करके जो यन्त्र बनाने की विधि कही है, उस विधि से प्रयुक्त होने वाले यन्त्रों का इस स्थान पर संक्षेप से वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥
यन्त्रशब्दनिरुक्तिः—
स्वेदादिकर्मनिर्मातुं वार्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः ।
यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम् ॥ २ ॥
पारद का स्वेदन, मूर्च्छन, मर्दन आदि अनेक संस्कार करने के लिये जिस उपाय से रस को नियन्त्रित किया जाता है उसको रसपरिभाषाकारक आचार्यों ने यन्त्र कहा है ॥ २ ॥
अथ दोलायन्त्रम्—
द्रवद्रव्येण भाण्डस्य पूरितार्धोदकस्य च ।
मुखस्योभयतो द्वारद्वयं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ ३ ॥
तयोस्तु निक्षिपेद्दण्डं तन्मध्ये रसपोटलीम् ।
बद्ध्वा तु स्वेदयेदेतद्दोलायन्त्रमिति स्मृतम् ॥ ४ ॥
काञ्जी, निम्बूस्वरस, क्षार, या जयन्ती आदि स्वेदन करने में उपयुक्त ओषधियों के क्वाथ या स्वरस से एक मिट्टी की हण्डिका को आधी भर करके उस हण्डिका के किनारों पर एक दूसरे के सामने दो छिद्र युक्ति से बनाकर उन में एक लकड़ी लगा देना चाहिये फिर उस लकड़ी के बीच में पारद की पोटली या अन्य स्वेदनीय धातु उपधातु तथा रत्नों की पोटली बांध कर उस द्रव में लटका देते हैं, फिर अग्नि जलाकर चूल्हे पर हण्डिका को रखकर उस पोटली के अन्दर स्थित पदार्थ को स्वेदित करते हैं, इस को दोलायन्त्र कहते हैं । अर्थात् रसादिक की पोटली डोले (झूले) के समान दण्ड में बांधकर लटका दी जाती है, अतः दोलायन्त्र कहा गया है ॥ ३-४ ॥
नवमोऽध्यायः । २४७
स्वेदनीयन्त्रम्—
साम्बुस्थालीमुखे बद्धवस्त्रे पाक्यं निवेशयेत् ।
पिधाय पच्यते यत्र स्वेदनीयन्त्रमुच्यते ॥ ५ ॥
जल अथवा अन्य ओषधियों के स्वरस से हण्डिका को भरकर उसके मुख पर एक वस्त्र बांध देते हैं, फिर उस वस्त्र के अवकाशयुक्त भाग में किसी धातु रत्न या पारद को रखकर ऊपर से सकोरे द्वारा बन्द करके अग्नि द्वारा पाक किया जाता है उसको स्वेदनी यन्त्र कहते हैं ॥ ५ ॥
अथ पातनायन्त्रम्—
अष्टाङ्गुलपरीणाहमोनाहेन दशाङ्गुलम् ।
चतुरङ्गुलकोत्सेधं तोयाधारं गलादधः ॥ ६ ॥
अधोभाण्डेमुखं तस्य भाण्डस्योपरि वर्त्तिनः ।
षोड़शाङ्गुलविस्तीर्णपृष्ठस्यास्ये प्रवेशयेत् ॥ ७ ॥
पार्श्वयोर्माहिषीक्षीरचूर्णमण्डूरफाणितैः ।
लिप्त्वा विशोषयेत्सन्धि जलधारे जलं क्षिपेत् ।
चुल्ल्यामारोपयेदेतत्पातनायन्त्रमुच्यते ॥ ८ ॥
आठ अङ्गुल चौड़ा ( विस्तृत ), दस अङ्गुल ऊंचा ( लम्बाई में ) और चार अङ्गुल मोटा ( स्थूल ) एक मिट्टी का भाण्ड लेकर उसको जल से भर दें, फिर इस जल से भरे नीचे के भाण्ड के मुख को गर्दन ( किनारे ) तक एक दूसरे १६ अङ्गुल चौड़ो पीठ ( पृष्ठभाग ) वाले ( जिसके भीतर की तली में निम्बू के रस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप सन्धिबन्धन करने के पहिले किया जा चुका हो ) ऊपर के मिट्टी के भाण्ड के मुख में प्रविष्ट कर देना चाहिए । फिर ( उन दोनों भाण्डों के मुखों को परस्पर मिलादेने से डमरू के समान रचना हो जाती है ) उन दोनों की मुखसन्धि को अगल बगल चारों तरफ भैंस के दुग्ध में चूने की बुकनी, मण्डूर की बुकनी और फाणित ( गुड़ की विकृति राब ) को घोट कर उससे लेप कर के सुखा देवे । फिर इस को चूल्हे पर चढ़ाकर अग्नि जला देनी चाहिए । ऊपर के भाण्ड की पीठपर एक जलाधार ( आलवाल ) या थाला ( उड़दी के ओर से ) बनाकर ठण्डाजल भरना चाहिए । ५ मिनिट बाद प्रथम गर्म हुए जलको निकाल कर दूसरा ठण्डा जल भरना चाहिए । यदि आलवाल न बना सके तो एक बा-
२४८ रसरत्नसमुच्चये—
ल्टी में जलभर कर कपड़े को चारवार मोड़ कर लत्ते बनाकर जल में भिगो कर ऊपरी भाण्ड के पृष्ठ पर रखो कुछ देर बाद इनको बदलते रहना चाहिए । इसी को पातना यन्त्र कहते हैं ॥ ६-८ ॥
अथ अधःपातनयन्त्रम्— अथोर्ध्वभाजने लिप्तस्थापितस्य जले सुधीः । दीप्तैर्वनोत्पलैः कुर्यादधःपातं प्रयत्नतः ॥ ९ ॥
उपर्युक्त विधि से बने हुए पातन यन्त्र के ऊपर वाले भाण्ड में सन्धि बन्धन करने के पहिले निम्बूरस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप कर सुखा लेना चाहिए फिर सन्धिवन्धन करके ऊपर के भाण्ड में एक थाला या पाली बनाकर जङ्गली उपलों को उस पाली में रखकर जला देने चाहिए । इस तरह अग्निके कारण पारद निकल कर नीचे के जल से भरे भाण्ड में गिर जाता है इसको अधः पातन यन्त्र कहते हैं ॥९॥
अथ कच्छपयन्त्रम्— जलपूर्णपात्रमध्ये दत्त्वा घटखर्परं सुविस्तीर्णम् । तदुपरि बिडमध्यगतः स्थाप्यः सूतः कृतः कोष्ठ्याम् ॥ १० ॥ लघुलोहकटोरिकया कृतषण्मृत्सन्धिलेपयाऽऽच्छाद्य । पूर्वोक्तघटखर्परमध्येऽङ्गारैः खदिरकोद्भवैः ॥ ११ ॥ स्वेदनतो मर्दनतः कच्छपयन्त्रस्थितो रसो जरति । अग्निबलेनैव ततो गर्भे द्रवन्ति सर्वसत्त्वानि ॥ १२ ॥
एक जल से भरे हुए पात्र ( नाद ) के मध्य भाग में बड़ा कूंड़ा या घट का गहरा कपाल रख कर उसमें मूषायंत्र को पारे से भर कर रख देना चाहिए। फिर मूषा के ऊपर एक छोटी लोहे की कटोरी ढक कर उसके चारों ओर ६ वार कपड़मिट्टी कर देनी चाहिये । फिर उस घटखर्पर ( कूण्ड या कपाल के खाली भाग में ) में खदिर या बैर ( बदरी काष्ठ ) की लकड़ी के कोयले भर कर अग्नि जला दें, इस तरह स्वेदन और मर्दन दोनों संस्कार होकर इस यन्त्र में रखे हुए पारद का जारण हो जाता है, इसी यन्त्र से अन्य धातुओं का सत्त्वपातन भी करते हैं । इसको कच्छपयन्त्र कहते हैं ॥ १०-१२ ॥
अथ दीपिकायन्त्रम्— कच्छपयन्त्रान्तर्गतमृण्मयपीठस्थदीपिकासंस्थः ।
नवमोऽध्यायः ।
नवमोऽध्यायः । २४९
यस्मिन्निपतति सूतः प्रोक्तं तद्दीपिकायन्त्रम् ॥ १३ ॥
उपर्युक्त विधि से कच्छप यंत्र बनाकर उसमें एक मिट्टी का खर्पर रख कर उसमें एक दीपिका या मूषा अथवा सकोरा रख देना चाहिए, इस सकोरे में पारद भर दें, फिर अग्नि के प्रभाव से पारद उस दीपिका से कच्छप यंत्र में उड़ कर गिर जाता है, इसको दीपिकायंत्र कहते हैं ॥ १३ ॥
अथ ढेकीयन्त्रम्—
भाण्डकण्ठादधश्छिद्रे वेणुनालं विनिक्षिपेत् ।
कांस्यपात्रद्वयं कृत्वा सम्पुटं जलगर्भितम् ॥ १४ ॥
नलिकास्यं तत्र योग्यं दृढं तच्चापि कारयेत् ।
युक्तद्रव्यैर्विनिक्षिप्तः पूर्वं तत्र घटे रसः ॥ १५ ॥
अग्निना तापितो नालात्तोये तस्मिन् पतत्यधः ।
यावदुष्णं भवेत्सर्वं भाजनं तावदेव हि ।
जायते रससन्धानं ढेकीयन्त्रमितीरितम् ॥ १६ ॥
एक मिट्टी के बड़े भाण्ड में या घड़े में कुछ (स्वेदनोपयोगी) औषधियों (क्षार, अम्ल इत्यादि) के साथ घोटे हुए पारद का लेप करके उस भाण्ड को सुखा लेना चाहिए । पश्चात् उस भाण्ड की ग्रीवा से कुछ नीचे (पास ही) एक छिद्र बनाकर उसमें बांस की नली का एक भाग प्रविष्ट कर भाण्ड का मुख तथा छिद्र के आस पास कपड़मिट्टी कर देना चाहिए । फिर दो कांस्य के पात्रों (कटोरों) का परस्पर सन्धिबन्धन करके ऊपर के पात्र में एक छिद्र बनाकर इसमें उस बांस की नली का दूसरा भाग प्रविष्ट करके मजबूती से सन्धिबन्धन कर देना चाहिए, फिर इस भाण्ड को आसानी से चूल्हे पर चढाकर नीचे आग जलादे, अग्नि के ताप से भाण्ड के अन्दर औषधियों के साथ घोटकर लिप्त किया हुआ पारद उड़कर उस बांस की नलिका में होता हुआ कांसे के पात्र के जल में गिर जायगा । सम्पूर्ण भाण्ड के प्रतप्त हो जाने पर प्रायः सब पारा उड़ जाता है, इसको ढेकी यन्त्र कहते हैं ॥ १४-१६ ॥
अथ जारणायन्त्रम्—
लोहमूषाद्वयं कृत्वा द्वादशाङ्गुलमानतः ।
ईषच्छिद्रान्वितामेकां तत्र गन्धकसंयुताम् ॥ १७ ॥
२५० रसरत्नसमुच्चये—
मूषायां रसयुक्तायामन्यस्यां तां प्रवेशयेत् । तोयं स्यात्सूतकस्याध ऊर्ध्वाधो वह्निदीपनम् ॥ १८ ॥
१२ अङ्गुल लम्बी दो लोहे की मूषा बना कर एक मूषा में कुछ छिद्र बनवा कर उस में गन्धक भर दें, फिर इस गन्धक युक्त मूषा को पारद से भरी हुई द्वितीय मूषा के अन्दर रख देवे ( पारद जिसमें भरना हो उसको कुछ बड़ी बनवाना चाहिए ) पश्चात् इन दोनों मूषा को एक जल से भरे हुए भाण्ड में रख कर उस भाण्ड को चूल्हे पर चढाकर अग्नि जला देना चाहिए । इसको जारणा यंत्र कहते हैं ॥ १७-१८ ॥
अथ जारणायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—
रसोनकरसं भद्रे यत्नतो वस्त्रगालितम् । दापयेत्प्रचुरं यत्नादाप्लाव्य रसगन्धकौ ॥ १९ ॥ स्थालीकायां पिधायोर्ध्वं स्थालीमन्यां दृढां कुरु । सन्धिं विलेपयेद्यत्नान्मृदा वस्त्रेण चैव हि ॥ २० ॥ स्थाल्यन्तरे कपोताख्यं पुटं कर्षाग्निना सदा । यन्त्रस्याधः करीषाग्निं दद्यात्तीव्राग्निमेव वा ॥ २१ ॥ एवं तु त्रिदिनं कुर्यात्ततो यन्त्रं विमोचयेत् । तप्तोदके तप्तचुल्ल्यां न कुर्याच्छीतलां क्रियाम् ॥ २२ ॥ न तत्र क्षीयते सूतो न च गच्छति कुत्रचित् । अनेन च क्रमेणैव कुर्याद्गन्धकजारणम् ॥ २३ ॥
हे पार्वति ! एक स्थाली के अन्दर पारद और गन्धक दोनों भर कर वस्त्र से छाने हुए लहसुन के पानी (स्वरस) से उन दोनों को खूब भिगोना ( आप्लावित करना) चाहिए । फिर एक शराव से रस तथा गन्धक को बन्द करके ऊपर एक और स्थाली ढककर दोनों स्थालियों की वस्त्र तथा कपड़मिट्टि से सन्धि अच्छी तरह बन्दकर के यंत्र के नीचे तेज आंच दें तथा यंत्र के ऊपर की स्थाली के ऊपर भी उपलों की आंच से कपोत (१)पुट देना चाहिए, इस तरह तीन दिन
( १ ) कपोतपुटलक्षणम्—
यत्पुटं दीयते खाते अष्टसङ्ख्यैर्वनोपलैः ।
कपोतपुटमेतत्तु कथितं पुटपण्डितैः ॥ १ ॥