रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
[ ४० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| सर्पविषेमूलविषस्य मात्रा | १०३९ | अतिसारे विसूच्याञ्च | १०५० |
| कीटविषे वृश्चिकविषे च मूलविषस्य मात्राः | ,, | अजीर्णे | १०५१ |
| लूताविषे विषकल्पः | ,, | प्रवाहिकायाम् | ,, |
| जयावटिकाख्यो विषकल्पः | ,, | मूत्रकृच्छ्रे | ,, |
| विषसेवनस्य फलम् | १०४० | मेहेषु | ,, |
| त्रिंशोऽध्यायः। | प्लीहादौ | १०५२ | |
| रसकल्पः | ,, | पक्तिशूले | ,, |
| वडवानलोविडः | ,, | आमशूले | ,, |
| रसमारणम् | १०४१ | उदरे | ,, |
| रसमारणे प्रकारान्तरम् | ,, | कामलायाम् | ,, |
| सप्तप्रकारेण प्रकारान्तरम् | १०४२-१०४३ | पाण्ड्वादौ | १०५३ |
| पारदजारणम् | १०४३ | शोथे | ,, |
| रसजारणे निषिद्धद्रव्याणि | १०४५ | कुष्ठे | ,, |
| क्षयादौ रसकल्पः | ,, | कुष्ठे रसकल्पः | १०५४ |
| वज्रपञ्जररसः | १०४६ | किलासे रसकल्पः | ,, |
| पञ्चामृतरसः | १०४७ | श्वित्रे रसकल्पः | ,, |
| मृतसञ्जीवनी वटी | ,, | कृमौ रसकल्पः | १०५५ |
| महानीलतैलम् | १०४८ | वातरोगे रसकल्पः | ,, |
| ज्वरे रसकल्पः | १०४९ | गृध्रस्यां रसकल्पः | ,, |
| त्रिदोषज्वरे | ,, | वातरक्ते रसकल्पः | ,, |
| रक्तपित्ते | ,, | स्थौल्ये रसकल्पः | ,, |
| कासे | ,, | कार्श्ये रसकल्पः | ,, |
| क्षये | १०५० | अपस्मारादौ रसकल्पः | १०५६ |
| हिक्कायाम् | ,, | अपस्मारादौ अन्ययोगः | ,, |
| छर्दिदाहयोः | ,, | पक्ष्मशाते रसकल्पः | ,, |
| अर्शसि | ,, | नेत्ररोगे रसकल्पः | ,, |
| तिमिरे | १०५७ |
[ ४१ ]
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| जाड्ये | ” | निषिद्धद्रव्यव्यवहारजदोषे प्रतीकार: | १०६४ |
| व्रणे | ” | नागवज्रयुक्तरससेवनेप्रतीकार: | ” |
| ग्रन्थौ मसूरिकायाञ्च | ” | ग्रन्थस्योपसंहार: | १०६५ |
| सिध्मादौ | ” | औषधीनां गुणदोषकरणे कारणम् | ” |
| अस्थिस्रावे | १०५८ | औषधसेवनविधि: | १०६६ |
| विषे | ” | आचाररसायनम् | ” |
| विषे प्रयोगान्तरम् | १०५९ | आयुर्वेदोपदेशस्यावश्यपालनीयोक्ति: | १०६७ |
| सर्पविषे | ” | कुवैद्यवर्जनोपदेश: | ” |
| सर्पविषे पिशाचाद्यञ्जनम् | ” | शास्त्रज्ञवैद्यस्य साफल्योक्ति: | १०६८ |
| उन्दुरुविषे | ” | चिकित्साया: सर्वत्रसाफल्यतोक्ति: | ” |
| वृश्चिकविषे | १०६० | चिकित्साकर्मणि प्रमादेदोषा: | ” |
| विषदिग्धव्रणे | ” | चिकित्साकर्तव्यावधि: | १०६९ |
| रसायने रसकल्प: | ” | वैद्यातुरयोरन्योन्यकर्तव्य: | ” |
| अन्योरसकल्प: | ” | वैद्यस्य सर्वत्रावश्यकता | ” |
| पञ्चप्रकारेणकल्पान्तरम् | १०६०-१०६२ | पुरावृत्तद्वारा वैद्यस्य सर्वत्र सर्वपूज्यत्वप्रतिपादनम् | ” |
| बाजीकरणे मदनवर्धनाख्यो रसकल्प: | ” | ग्रन्थकर्तुर्विज्ञप्ति: | १०७१ |
| वाजीकरणे | ” | ||
| रसप्रयोगे उपचारविधि: | १०६३ | ||
| रससेवनेऽपथ्यानि | ” | ||
| निषिद्धव्यवहारे दोष: | १०६४ |
॥ श्रीः ॥
विमर्शानुक्रमणिका-
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| जारणलक्षणम् | ६ | रसकर्पूरकीप्राचीननिर्माणविधि | २९ |
| ग्रसनप्रकार: | ७ | रसकर्पूरकीनव्यनिर्माणविधि | ३० |
| मूर्च्छनाप्रकार: | ८ | प्राकृतिकपारद | ३१ |
| बन्धनप्रकार: | ” | पारदरजतमिश्रक | ” |
| भस्मकरणप्रकार: | ” | टेट्राहाईड्राइट | ” |
| रसायनलक्षणम् | ९ | परीक्षा | ” |
| गौतमोक्तअष्टगुण | ११ | पारदप्राप्ति के कुछ गौण खनिज | ” |
| ब्रह्मज्ञानोपाय | १२ | लिविङ्ग्स्टोनाईट | ” |
| सदाचारनिर्देश | ” | बासैनाईट | ३२ |
| दोषगणना | १६ | ग्वाडलकाजाराईट | ” |
| रसायनलक्षणम् | ” | टर्लिंग्ग्वाईट | ३३ |
| अष्टादशसंस्कारा: | ” | इग्लेस्टोनाईट | ” |
| नागादिअष्टदोष | १८ | क्लेनाइट | ” |
| पर्पटादि सप्तकञ्चुकदोष | ” | मोजेसाइट | ” |
| रसरक्षामन्त्र: | ” | मोन्ट्रोयडाईट | ” |
| ध्यानप्रकार: | ” | रिमेनाइट | ” |
| पारदीयविमर्श: | २० | ओनोफ्राइट | ” |
| पारदकी उपस्थिति | २१ | कोलोरेडोआईट | ” |
| पारदकोसर्वप्रथमप्राप्ति | २३ | लेहरबेकाइट | ३४ |
| पारदनिकालनेयोग्य खनिज | २७ | आयौडीराइट | ” |
| हिङ्गुल: | ” | पारदीयखनिजप्राप्तिकेस्थान | ३५ |
| चर्मार: | २८ | वृटिशबोर्नियों | ” |
| हीरकद्युति: | ” | भारतवर्ष | ” |
[ ४३ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| अफ्रीका | ३५ | ट्युनिस | ४१ |
| उत्तरीय अमेरिका | ,, | नार्थअमेरिका | ,, |
| आस्ट्रेलिया | ,, | होण्डुरास | ,, |
| पापुआ | ३६ | मेक्सको | ,, |
| न्यूजीलेण्ड | ,, | यूनाईटेडस्टेट्स | ,, |
| अल्वेनिया | ,, | अलस्का | ४२ |
| जेकोस्लोविया | ,, | एटिजाना | ,, |
| फ्रान्स और कार्सिका | ,, | केलिफोर्निया | ४३ |
| जर्मनी | ,, | कार्नकोष्टी | ,, |
| हङ्गरी | ३७ | सेण्टाक्लेरा कौण्टि | ४५ |
| इटली | ,, | सोलेनो | ४६ |
| स्टील | ,, | सोनोमा | ४७ |
| लीवर ओर | ,, | सोक्रेट की खान | ,, |
| कोरेलाइन | ,, | ट्रिनिटी | ,, |
| पोर्तुगाल | ३८ | वेली | ,, |
| रस्सीया | ,, | इडाहो | ,, |
| स्केण्डिनेविया | ,, | निवाडा | ,, |
| स्पेन | ,, | ओरेगन | ,, |
| युगोस्लेविया | ३९ | लेन | ४८ |
| एशिया माइनर | ,, | टेक्सास | ,, |
| चीन | ,, | उटाह | ४९ |
| जापान | ४० | वाशिङ्गटन | ,, |
| न्यूकेलिडोनिया | ,, | दक्षिण अमेरिका | ५० |
| पर्सिया | ,, | चिली | ,, |
| अफ्रीका | ,, | कोलम्बिया | ,, |
| एलजीरिया | ,, | डवगायना | ,, |
| इटालियन सोमेलिलेण्ड | ,, | यूकोडर | ,, |
[ ४४ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पेरू | ५० | यौगिकगन्धक | १०२ |
| जुनिन | ५१ | गन्धकनिम्नरूप में मिलता है | १०५ |
| हुवानुको | ” | गन्धक और गन्धकीय खनिज | |
| वीनेजुए | ” | प्राप्ति के स्थान | ” |
| पारद के दोष | ५२ | अफगानिस्तान | ” |
| पारद के सप्तकञ्चुक | ५३ | आसाम | ” |
| पारद के भेद | ५५ | बलुचिस्तान | ” |
| शुद्ध पारद के लक्षण | ५६ | कच्छी | ” |
| अशुद्ध पारद के लक्षण | ५७ | लास बेला | १०६ |
| अभ्रकीयविमर्शः | ५९ | मेकरन तट | ” |
| उत्पत्ति | ” | सिबि | ” |
| वैक्रान्तीयविमर्शः | ६९ | बिहार और उड़ीसा | ” |
| उपलब्धिः | ७० | बम्बई | १०७ |
| मामाक्षिकीयविमर्शः | ७४ | बर्मा | ” |
| स्वर्णमाक्षिक | ” | दक्षिण हैदराबाद | ” |
| रौप्यमाक्षिक | ” | काश्मीर | ” |
| कांस्यमाक्षिक | ” | गोदावरी | १०८ |
| विमलः | ७७ | ट्रावनकोर | ” |
| उपलब्धिः | ” | शिरानी | ” |
| शिलाजतुविमर्शः | ८० | पञ्जाब | ” |
| चपलविमर्शः | ८७ | संयुक्तप्रान्त | १०९ |
| उपस्थिति | ” | कुमायूँ | ” |
| गुण | ८८ | गैरिकविमर्शः | ११० |
| विस्मथ का उपयोग | ” | कासीसविमर्शः | ” |
| रसकविमर्शः | ८९ | हरतालविमर्शः | ११५ |
| गन्धकीयविमर्शः | १०१ | अञ्जनविमर्शः | १२१ |
| उपलब्धि | १०२ | सौवीराञ्जन | ” |
[ ४५ ]
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| रसाञ्जन | १२१ | कृत्रिमकांस्यनिर्माणविधि: | २८२ |
| स्रोतोऽञ्जन | १२२ | शृङ्गिकविषलक्षणम् | २८५ |
| पुष्पाञ्जन | ,, | कालकूटविषपरिचय: | ,, |
| नीलाञ्जन | ,, | वत्सनाभलक्षणम् | ,, |
| कङ्कुष्ठविमर्श: | १२४ | विषवर्गीकरणम् | २८६ |
| गौरीपाषाणविमर्श: | १२७ | उपविषाणि | ,, |
| आर्सेनिक की उपलब्धि | १२८ | रक्तवर्गविमर्श: | २८७ |
| आर्सेनिक की पहचान | ,, | पारदग्रहणपरिमाण | २९५ |
| आर्सेनिक के आक्साइड | ,, | स्वेदनप्रकार: | २९६ |
| आर्सेनिक के सल्फाइड | ,, | मर्दनलक्षणम् | २९७ |
| नवसारविमर्श: | १२९ | मूर्च्छन लक्षणम् | ,, |
| नियामकगण | २३८ | मतान्तरेण पारदस्य मूर्च्छनम् | २९८ |
| नियमनसंस्कार: | ,, | उत्थापनस्वरूपम् | २९९ |
| कपोतलक्षणम् | २५० | बोधनस्य प्रथमप्रकार: | ३०४ |
| पञ्चक्षार | २५१ | द्वितीयप्रकार: | ,, |
| अष्टमूत्र | ,, | तृतीय: प्रकार: | ,, |
| मूषोपयोगिमृत्तिकास्वरूपम् | २७४ | नियामनलक्षणम् | ,, |
| वङ्कनाललक्षणम् | ,, | क्षारद्वयं क्षारत्रयञ्च | ३०५ |
| अपुनर्भवलक्षणम् | २७५ | दीपनसंस्कार: | ,, |
| वारितरस्यलक्षणम् | २७६ | रसतरङ्गिण्युक्तप्रकार: | ३०६ |
| रेखापूर्णतायाः स्वरूपम् | ,, | नियामकगण: | ,, |
| गोष्ठस्वरूपम् | २७९ | दीपनसंस्कारकरणविधि: | ,, |
| गर्वरपुटलक्षणम् | ,, | दीपनस्वरूपम् | ३०७ |
| भाण्डपुटलक्षणम् | ,, | दीपनस्य प्रथमप्रकार: | ,, |
| लावकपुटविमर्श: | २८० | द्वितीय: प्रकार: | ,, |
| लावकपुटलक्षणम् | २८१ | तृतीय: प्रकार: | ,, |
| कृत्रिमपित्तलनिर्माणविधि: | २८२ | चतुर्थ: प्रकार: | ,, |
[ ४६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| क्षेत्रीकरणस्वरूपम् | ३११ | विषतिन्दुकबीजशोधनविधिः | ३४३ |
| क्षेत्रीकरणप्रक्रिया | ,, | प्रकारान्तरम् | ,, |
| खोटबन्धस्य लक्षणम् | ३१३ | प्रकारान्तरम् | ,, |
| कज्जलीस्वरूपम् | ३१४ | विषमज्वरलक्षणम् | ३४६ |
| बाह्यद्रुतिलक्षणम् | ३१७ | चूर्णकूष्माण्डस्वरसयोर्हरताल शोधनविधिः | ३४९ |
| उपद्रवलक्षणम् | ,, | चूर्णोदकनिर्माणविधिः | ,, |
| अरिष्टलक्षणम् | ,, | तिलक्षारोदके तालशोधनविधिः | ,, |
| रसायनलक्षणम् | ,, | धुस्तूरबीजशोधनविधिः | ३५० |
| भूधरयन्त्रस्वरूपम् | ३३० | प्रकारान्तरम् | ३५१ |
| रसायनोचितरसः | ३३१ | व्योषपरिभाषा | ,, |
| रसभक्षणकालः | ,, | विषनिषेधविमर्शः | ३५४ |
| मात्राभेदः: | ,, | लवणपञ्चकम् | ,, |
| पञ्चकर्मयोग्यव्यक्तिः | ,, | कवचीयन्त्रनिर्माणविधिः | ३५५ |
| हंसोदकः | ३३२ | अग्निजारपरिचयः | ३६१ |
| सुरा | ३३३ | शृङ्गीविषलक्षणम् | ३६३ |
| आसवः | ,, | शृङ्गीविषशोधनम् | ,, |
| पित्तज्वरलक्षणम् | ३३८ | सूचिकाभरणरसनिर्माणविधिः | ,, |
| श्लेष्मज्वरलक्षणम् | ,, | कृष्णसर्पविषस्याहरणविधिः | ३६४ |
| द्वन्द्वजसन्निपातजज्वराणां लक्षणम् | ३३९ | कृष्णसर्पविषशोधनविधिः | ,, |
| वातपित्तज्वरलक्षणम् | ,, | अशुद्धलाङ्गलीसेवनेदोषाः | ३६७ |
| वातश्लेष्मज्वरलक्षणम् | ,, | लाङ्गलीशोधनविधिः | ,, |
| पित्तश्लेष्मज्वरलक्षणम् | ,, | अभिन्यासज्वरलक्षणम् | ,, |
| सन्निपातज्वरलक्षणम् | ,, | ससारादिश्लोकव्याख्या | ३६८ |
| जयपालशोधनविधिः | ३४२ | कुक्कुटपुटलक्षणम् | ३६९ |
| प्रकारान्तरम् | ,, | पञ्चपित्तम् | ३७३ |
| प्रकारान्तरम् | ,, | ज्वरेपथ्यापथ्यव्यवस्था | ३८३ |
| स्नुहीदुग्धशोधनविधिः | ३४३ |
[ ४७ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| पथ्यस्य प्रयोजनम् | ३८२ | त्रिकत्रयस्वरूपम् | ४०३ |
| सर्वविधज्वरेषु पथ्यानि | ” | श्वासेपथ्यापथ्यम् | ४०५ |
| मध्यमज्वरेहितानि | ३८३ | अपथ्यम् | ” |
| पुराणज्वरे हितानि | ” | अतिव्यायामनिषेधः | ४०६ |
| आगन्तुकज्वरे हितानि | ” | व्यायामानर्हाः | ” |
| विषमज्वरे हितानि | ३८४ | व्यायामार्हा | ” |
| अतिलङ्घनं वर्ज्यम् | ” | व्यायामसमयः | ” |
| सम्यग्लङ्घितलक्षणानि | ” | बलाबललक्षणम् | ” |
| उष्णजललक्षणम् | ” | अधारणीया वेगाः | ” |
| रक्तपित्तविमर्शः | ३८५ | हिक्कास्वरूपं निरुक्तिश्च | ४०७ |
| रक्तपित्तव्याख्या | ” | तासां पूर्वरूपम् | ” |
| रक्तपित्तनिदान और गति | ” | तासां नामानि | ” |
| द्राक्षादिगणौषधियां | ” | धान्याम्लस्वरूपम् | ४०८ |
| लौहारिवर्गः | ३८९ | विश्वादिश्लोकव्याख्या | ४१० |
| रक्तरोधकौषधयः | ” | क्षीरपाकविधिः | ४११ |
| रक्तपित्ते साधारणपथ्यः | ३९० | हिक्कायां पथ्यापथ्यम् | ४१२ |
| कासनिदानम् | ३९१ | त्रिकटुस्वरूपम् | ४१६ |
| पैत्तिककासनिदानम् | ३९४ | त्रिफलास्वरूपम् | ” |
| क्षयकासनिदानलक्षणादिकम् | ” | आरनालस्वरूपम् | ” |
| कफजकासलक्षणम् | ३९५ | दशमूलस्वरूपम् | ” |
| कासघ्नधूमविमर्शः | ३९७ | उभयपञ्चमूलम् | ” |
| धूमसेवनविधिः | ” | स्वरभेदे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ४१७ |
| धूमकालाः | ” | अथापथ्यम् | ” |
| धूमपानवर्ज्यावस्था | ” | राजयक्ष्मनिदानम् | ४१८ |
| वातकासे पथ्यानि | ३९८ | राजयक्ष्मलक्षणम् | ” |
| कासेसाधारणपथ्यनिर्देशः | ” | राजयक्ष्मणि साधारणपथ्यम् | ४३४ |
| ऊर्ध्वश्वासलक्षणादिकम् | ३९९ | यक्ष्मीशोधनव्यवस्था | ” |
[ ४८ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| वमनविधिः | ४३५ | वैद्यनाथवटीनिर्माणम् | ४७९ |
| विरेचनम् | ” | लौहप्रयोगः | ” |
| अरोचके पथ्यापथ्यव्यवस्था | ४३६ | उदावर्त्तेऽपथ्यानि | ” |
| अपथ्यानि | ” | अतीसारनिदानम् | ४८० |
| छर्द्याम्पथ्यानि | ४३८ | नवीन तथा पुराने धान्यों के ग्रहण करने का निर्देश | ” |
| अपथ्यानि | ” | अध्यशनलक्षणम् | ” |
| हृदयरोगलक्षणसम्प्राप्ती | ४३९ | अतीसारे पथ्यानि | ४८८ |
| अध्यशनलक्षणम् | ” | अतीसारेऽपथ्यानि | ” |
| हृद्रोगे पथ्यापथ्यम् | ४४१ | अतीसारे पानीयम् | ४८९ |
| तृष्णारोगेऽपथ्यम् | ४४२ | ग्रहणीरोगसम्प्राप्त्यादिवर्णनम् | ” |
| पालिकायन्त्रस्वरूपः | ४४८ | पञ्चकोलस्वरूपः | ४९९ |
| मदात्ययपथ्यापथ्यव्यवस्था | ४५० | रुदन्तीपरिचयः | ५०२ |
| अम्लवर्गः | ” | क्षारत्रयस्वरूपम् | ” |
| पित्तार्शसां लक्षणम् | ४५१ | ग्रहण्यां पथ्यापथ्यविमर्शः | ५०५ |
| वातार्शसां लक्षणम् | ४५२ | ग्रहण्यामपथ्यानि | ” |
| श्लेष्मसन्निपातार्शसां लक्षणम् | ” | अग्निमान्द्यादिषु पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५२२ |
| श्लेष्मार्शसन्निदोषजस्य च लक्षणम् | ” | अपथ्यानि | ” |
| सहजार्शसांलक्षणम् | ” | मूत्रकृच्छ्रविमर्शः | ५२३ |
| अन्धमूषापरिभाषा | ४६७ | मूत्रदोषाङ्कुरोरसः | ” |
| अर्शोरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ४७५ | अश्मरीनाशकोपायाः | ५२४ |
| अन्नेषु | ४७६ | अश्मरी की उत्पत्ति | ५२५ |
| मांसेषु | ” | अश्मरी के भेद | ” |
| शाकेषु | ” | अश्मरी का पूर्वरूप तथा लक्षण | ५२६ |
| अर्शोरोगेऽपथ्यानि | ” | मूत्रकृच्छ्रकारणानि | ५३१ |
| स्नेहपाकविधिः | ४७८ | अश्मरीरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५३४ |
| स्नेहपाकपरीक्षा | ” |
[ ४६ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| अपथ्यानि | ५३४ | द्वितीयः | ६१६ |
| प्रमेहविमर्शः | ” | स्थौल्ये पथ्यापथ्यम् | ६२३ |
| स्वास्थ्यलक्षणम् | ” | अम्लपित्तरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ६२९ |
| प्रमेह की उत्पत्ति में कारण | ” | उदरवृद्धि के कारण | ६३२ |
| प्रमेह की सम्प्राप्ति | ” | अष्टपुष्पाणि | ६४१ |
| प्रमेहों का पूर्वरूप | ” | उदररोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ६४३ |
| प्रमेहों के सामान्य लक्षण तथा भेद | ५३५ | पाण्डुरोगे पथ्यापथ्यनिर्देशः | ६६० |
| तन्द्रालक्षणम् | ” | लङ्केश्वररसः | ६६९ |
| कफप्रमेहाः | ५३६ | लूतारोगेतिहासः | ६८९ |
| पित्तप्रमेहाः | ” | मधुरत्रयम् | ६९४ |
| वातप्रमेहाः | ” | मूर्च्छितपारद का स्वरूप | ६९५ |
| प्रमेहों का समन्वय | ” | त्रैलोक्यविजयरसः | ६९६ |
| वरनागलक्षणम् | ५५२ | शुद्धगन्धकप्रयोगविमर्शः | ७०७ |
| मल्लमूषास्वरूपः | ५५६ | गन्धकसेवने वर्जनीयानि | ” |
| कवचीयन्त्रलक्षणम् | ५६५ | वलिवसापरिचयः | ७०८ |
| प्रमेहे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५७१ | सिद्धस्नेह के लक्षण | ७१२ |
| अपथ्यानि | ” | विपादिका | ७१८ |
| विद्रधिरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५७८ | कुष्ठे पथ्यापथ्यविवेकः | ७२० |
| अपथ्यानि | ” | कृमिरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ७२४ |
| वर्ध्मवृद्धिरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ५८१ | तालकेश्वरः | ७२९ |
| पञ्चकोलस्वरूपम् | ५८३ | पद्मार्कंतैलम् | ७३१ |
| गुल्मे पथ्यानि | ५९३ | आमवाते पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७३७ |
| क्षारनिर्माणविधिः | ५९४ | अपस्मारे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७३९ |
| प्लीहविमर्शः | ५९६ | उन्मादरोगे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७४१ |
| प्लीहरोगे पथ्यापथ्यनिर्देशः | ” | वरुणादिगणः | ७४९ |
| नागवल्लभदसः | ६१६ | वातरक्ते पथ्यापथ्यव्यवस्था | ७७२ |
| लक्ष्मणास्वरूपः | ७७५ |
५
[ ५० ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| नागोदरलक्षणम् | ७७९ | पनसिकायाश्चिकित्सा | ८८८ |
| उपविष्टकलक्षणम् | ७८० | पाषाणगर्दभलक्षणम् | ” |
| जलकूर्मकलक्षणम् | ” | चिकित्सा | ” |
| अभ्रकद्रुतिप्रकारवर्णनम् | ” | जालगर्दभलक्षणम् | ” |
| गर्भिण्याः पथ्यापथ्यविवेकः | ७९९ | चिकित्सा | ” |
| बालरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८१८ | इरिवेलिकालक्षणम् | ” |
| त्रिलौहस्वरूपम् | ८२२ | कक्षालक्षणम् | ” |
| नेत्ररोगविमर्शः | ८२७ | चिकित्सा | ” |
| नेत्ररोगे पथ्यापथ्यानि | ८४४ | विस्फोटकलक्षणम् | ” |
| अन्ययोगाः | ८४९ | अग्निरोहिणीलक्षणम् | ” |
| कर्णरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८५० | चिकित्सा | ” |
| नासारोगे पथ्यापथ्यम् | ८५२ | चिप्यकुनखयोर्लक्षणं चिकित्सा च | ८८९ |
| मुखरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८६० | अनुशयीलक्षणम् | ” |
| तन्तुरोगे वर्जनीयम् | ८६४ | चिकित्सा | ” |
| शिरोरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८६९ | विदारिकाया लक्षणं चिकित्सा च | ” |
| भगन्दरे पथ्यापथ्यविवेकः | ८७७ | शर्कराऽर्बुदलक्षणम् | ” |
| अर्बुदरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ८८२ | चिकित्सा | ” |
| अपथ्यानि | ” | पाददारिकाया लक्षणं चिकित्सा च | ” |
| अजगल्लिकाया लक्षणं चिकित्सा च | ८८६ | उपोदिकाद्यं तैलम् | ८९० |
| यवप्रख्यायालक्षणं चिकित्सा च | ” | कदरस्य लक्षणं | ” |
| अन्धालज्या लक्षणं चिकित्सा च | ” | कदरचिकित्सा | ” |
| विवृताया लक्षणं चिकित्सा च | ८८७ | अलसस्यलक्षणं चिकित्सा च | ” |
| कच्छप्या लक्षणं चिकित्सा च | ” | इन्द्रलुप्तस्यलक्षणम् | ” |
| वल्मीकस्य लक्षणं चिकित्सा च | ” | चिकित्सा | ८९१ |
| इन्द्रवृद्धालक्षणम् | ” | दारुणकस्यलक्षणम् | ” |
| इन्द्रवृद्धायाश्चिकित्सा | ८८८ | चिकित्सा | ” |
| पनसिकालक्षणम् | ” | अरुंषिकाया लक्षणम् | ” |
[ ५१ ]
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| हरिद्राद्यं तैलम् | ८९२ | चिकित्सा | ८९४ |
| पलितस्य लक्षणम् | :’ | वृषणकच्छूलक्षणम् | ’ |
| चिकित्सा | ” | चिकित्सा | ” |
| मसूरिकायालक्षणं चिकित्सा च | ” | गुदभ्रंशस्य लक्षणम् | ’ |
| यौवनपिडकाया लक्षणम् | ” | चिकित्सा | ” |
| पद्मिनीकण्टकलक्षणम् | ’’ | मूषकतैलम् | ” |
| चिकित्सा | ’’ | क्षुद्ररोगेषु पथ्यापथ्यविधिः | ” |
| जतुमणिलक्षणम् | ” | स्वरभेदे पथ्यापथ्यव्यवस्था | ९०५ |
| चिकित्सा | ’’ | श्लोपदरोगे पथ्यापथ्यविवेकः | ९०८ |
| मशकलक्षणम् | ’ | स्थौल्ये पथ्यापथ्यम् | ९१० |
| चिकित्सा | ’’ | त्रिफलारसायनस्य विमर्शः | ९३३ |
| तिलकालकलक्षणम् | ’ | कामकलाख्यरसनिर्माणप्रकारान्तरम् | ९४७ |
| चिकित्सा | ’’ | पूर्णेन्दुरसः | ९५० |
| न्यच्छस्य लक्षणम् | ” | मण्डकपरिभाषा | ९६३ |
| व्यङ्गस्यलक्षणम् | ’ | कान्तलौलक्षणम् | ९८० |
| तयोश्चिकित्सा | ’’ | लौहशोधनार्थे काथविधिः | ९८१ |
| परिवर्त्तितकालक्षणम् | ’’ | वङ्गभस्मविधिः | ९८२ |
| चिकित्सा | ’’ | अथवा | ” |
| अथवा | ’’ | नागभस्मविधिः | ” |
| अवपाटिकालक्षणम् | ८९३ | अथवा | ” |
| चिकित्सा | ” | लौहमारणविधिः | ९८३ |
| निरुद्धप्रकषस्यलक्षणम् | ’ | निरुत्थभस्मपरीक्षाप्रकारः | ९८४ |
| चिकित्सा | ’’ | कुटीनिर्माणप्रकारः | ९८६ |
| सन्निरुद्धगुदलक्षणम् | ’’ | चरकोक्ताचाररसायनम् | १०६६ |
| चिकित्सा | ’ | ||
| अहिपूतनलक्षणम् | ८९४ |
१ दोलायन्त्रम्—
द्रवद्रव्येण भाण्डस्य पूरितार्धोदकस्य च ।
मुखस्योभयतो द्वारद्वयं कृत्वा प्रयत्नतः ॥
तयोस्तु निक्षिपेद्दण्डं तन्मध्ये रसपोटलीम् ।
बध्वा तु स्वेदयेदेतद्दोलायन्त्रमिति स्मृतम् ॥ १ ॥
इति रसरत्नसमुच्चयः ।
अन्यच्च—विबध्य सौषधं सूतं सभूर्जे त्रिगुणाम्बरे ।
रसपोट्टलिकां काष्ठे दृढं बध्वा गुणेन हि ॥ २ ॥
सन्धानपूर्णकुम्भान्तः प्रलम्बनगतिस्थिताम् ।
अधस्ताद् ज्वालयेदग्निं तत्तदुक्तक्रमेणहि ॥ ३ ॥
दोलायन्त्रमिदं प्रोक्तम्
इति रसेन्द्रचूडामणिः ।
एक मिट्टी की हण्डिका में काञ्जी, निम्बू का रस, क्षारोदक या जयन्ती, निर्गुण्डी आदि स्वेदनार्ह औषधियों का स्वरस या क्वाथ भर कर उस हण्डिका के दोनों किनारों में युक्ति से दो छिद्र बना कर उन छिद्रों में एक काष्ठ की मजबूत पतली लकड़ी डाल दें। फिर उस लकड़ी के बीच में पारद की पोट्टली या अन्य लोह ताम्रादिक या रत्न आदि की पोट्टली बांध कर भाण्डस्थ द्रव में लटका दें। फिर इस हण्डिका को चूल्हे पर चढ़ा कर यथोदित समय तक अग्नि प्रदीप्त कर के पोट्टलीस्थ पदार्थ का स्वेदन करते हैं। इसी को दोलायन्त्र कहते हैं। अर्थात् पारदादिक की पोट्टली काष्ठ के साथ बांधने से दोले ( झूले ) की तरह द्रव में लटकती है अतः दोला यन्त्र कहा गया है।
[ २ ]
२ बालुकायन्त्रं लवणयन्त्रञ्च
रसगर्भां गूढवक्त्रां मृद्वस्त्राङ्गुलघनावृताम् ।
शोषितां काचकलसीं त्रिषु भागेषु पूरयेत् ॥ १ ॥
भाण्डे वितस्तिगम्भीरे बालुकासु प्रतिष्ठितम् ।
तद्भाण्डं पूरयेत् त्रिभिरन्याभिरवगुण्ठयेत् ॥ २ ॥
भाण्डवक्त्रं मणिकया सन्धि लिम्पेन्मृदा पचेत् ।
चुल्ल्यां तृणस्य चादाऽऽहान्मणिकापृष्ठवर्त्तिनः ॥ ३ ॥
एतद्धि बालुकायन्त्रं तद्यन्त्रं लवणाश्रयम् ।
पञ्चाढबालुकापूर्ण-भाण्डे निक्षिप्य यत्नतः ॥ ४ ॥
पच्यते रसगोलाद्यं बालुकायन्त्रमीरितम् ।
एवं लवणनिक्षेपात् प्रोक्तं लवणयन्त्रकम् ॥ ५ ॥
अथवा—
अन्तःकृतरसालेपताम्रपात्रमुखस्य च ।
लिप्त्वा मृल्लवणेनैव सन्धि भाण्डतलस्य च ॥ १ ॥
तद्भाण्डं पटुनाऽऽपूर्य्य क्षारैरर्धा पूर्व्ववत् पचेत् ।
एवं लवणयन्त्रं स्याद् रसकर्म्मणि शस्यते ॥ २ ॥— रसरत्नसमुच्चयः ।
एक आतसी शीशी जिसका नीचे का भाग (पेंदी) चौड़ा हो तथा लम्बी और सङ्कुचित नलिका हो, लेकर उस की नलिका में एक पतली लकड़ी डाल कर शीशी को उल्टी करदें। फिर इस लकड़ी को किसी टेबुल के सहारे दृढ़ बांध दें। फिर हण्डिका में २४ घण्टे तक गली हुई मुल्तानी (चिकनी) मिट्टी का आतसी शीशी के पृष्ठ (पीठ) भाग पर पतला एक लेप कर के उसी मिट्टी के घोल में भींगी हुई वस्त्र की पट्टी का प्रलेप कर के सुखा लेवें। फिर सूख जाने पर दूसरी पट्टी का लेप करदें। इस तरह सात बार लेप कर के सुखा लेवें। फिर उस आतसी शीशी के चार भागों में से तीन भागों को कज्जली से भर दें। फिर एक लोहे या मिट्टी की नांद (टब) को बालुका (रेत) से भर कर उस बालुका के मध्य में आतसी शीशी को गले तक गाड दें। फिर उस नांद के मुख पर शराव ढक कर के सन्धि बन्धन कर दें। फिर इस यन्त्र को भट्टी पर चढ़ा कर अग्नि प्रज्वलित कर दें तथा हण्डिका (यन्त्र) के मुख पर स्थित शराव के अन्दर तृण भर दें। स्थान को बालुका, रेत अथवा क्षार या लवण से भर कर यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ा कर पाक करना चाहिए। इस को बालुका यन्त्र या लवण यन्त्र कहते हैं।
[ ३ ]
३ भूधरयन्त्रम् ।
बालुकागूढसर्वाङ्गां गर्ते मूषां रसान्विताम् ।
दीप्तोत्पलैः संवृणुयाद् यन्त्रं तद् भूधराह्वयम् ॥ १ ॥
पृथ्वी में एक हस्त गहरा गढा (गर्त) बना कर उसके अर्धभाग को बालुका से भर दें, फिर उस बालुका पर औषध से पूर्ण मूपा को रख दें तथा मूषा का मुख बन्द कर देना चाहिए । पश्चात् शेष गर्त को रेत से भर कर अर्थात् सारी मूषा को रेत से ढक कर उस पर जंगली उपलों की आंच जला देनी चाहिए । इस को भूधर यन्त्र कहते हैं । यह वर्णन चित्र के अनुसार नहीं है । अत्रि संहिता का वर्णन चित्रानुसार है । यथा—
यन्त्रं डमरुवद्वाथ वाऽधःपातनयन्त्रवत् ।
भूगर्ते तत् समाधाय चोर्ध्वमाकीर्य वह्निना ॥ १ ॥
अधः स्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा सूतकं तत्र पातयेत् ।
एतद् भूधरयन्त्रं स्यात् सूतसंस्कारकर्मणि ॥ २ ॥
इत्यत्रिसंहिता
अर्थात् चपटे आकार की दो हण्डिकाएं लेकर एक हण्डिका के भीतरी प्रदेश में पारद के निम्बवादिरस पिष्टकल्क का प्रलेप करके सुखा दें तथा दूसरी हण्डिका में जल भर कर पारद लिप्त हण्डिका को जल पूर्ण हण्डिका के मुख के साथ औंधी कर के मिलाकर दोनों की सन्धियों को बन्द करके डमरू के समानाकार का यन्त्र बनालें । फिर इस यन्त्र को पृथ्वी के अन्दर खोदे हुए गर्त में रखकर सूतलिप्त हण्डिका के पृष्ठ पर अग्नि जला दें । इसको भूधरयन्त्र कहते हैं ।
भाव प्रकाश में इसका वर्णन निम्न प्रकार से किया गया है। यथा—
त्रिफलाशिश्रुशिखिभिर्लवणासुरिसंयुतैः ।
नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाजनम् ॥ १ ॥
ततो दीप्तैरधःपातमुपलैस्तस्य कारयेत् ।
यन्त्रे भूधरसंज्ञे तु ततः सूतोविशुद्ध्यति ॥ २ ॥
[ .४ ]
४ तिर्यक्पातनयन्त्रम्—
क्षिपेद्रसं घटे दीर्घनताधोनालसंयुते ।
तन्नालं निक्षिपेदन्यघटकुक्ष्यन्तरे खलु ॥
तत्र रुद्ध्वा मृदा सम्यग्वदने घटयोरथ ।
अधस्ताद्रसकुम्भस्य ज्वालयेत्तीव्रपावकम् ॥
इतरस्मिन् घटे तोयं प्रक्षिपेत् स्वादुशीतलम् ।
तिर्यक्पातनमेतद्धि वार्तिकैरभिधीयते ॥
इति रसरत्नसमुच्चयः ।
एक मिट्टी के घट में पारद भर कर घट की ग्रीवा के कुछ नीचे के भाग में एक छिद्र बना कर उस छिद्र में एक लम्बी तथा टेढी नली लगा देनी चाहिए। फिर उस नली के दूसरे भाग को एक दूसरे घट के मध्य भाग में छिद्र बना कर उस में प्रविष्ट कर दें। फिर पारदातिरिक्त घट में शीतल जल भर कर दोनों
के मुख को ढक्कन से तथा नालीप्रवेशजन्य छिद्रों को कपडमिट्टि द्वारा बन्द कर के सुखा कर युक्ति से चूल्हे पर पारद वाले घट को स्थापित कर के अग्नि जला देवें। अग्नि जलते समय चूल्हे के नीचे स्थित घट पर एक लोटे या पात्र के द्वारा शीतल जल डालते रहना चाहिए। इस तरह चूल्हे पर स्थित घट के अन्दर से पारद अग्नि के ताप के कारण उड कर नीचे वाले घट के जल में नलिका मार्ग से हो कर एकत्रित होता रहता है। वार्त्तिककारों ने इस को तिर्यक्पातन यन्त्र कहा है।