भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पटियालाराज्यान्तर्गतटकसालनिवासिपण्डितद्वारकादासा- त्मजाऽऽयुर्वेदोद्धारकवैद्यपञ्चाननवैद्यरत्नराजवैद्य- पण्डितरामप्रसादवैद्योपाध्यायः।

The Hindi Commentary of Rasendrasar Sangrah, prepared by Pandit Ram Parshad Vaid is very inter- esting and useful and I think it is sure to prove a valu- able contribution of the utmost importance to the Ayurvedic literature. It is not only an easy transla- tion of the Rasendrasar Sangrah by Shri Gopal Krishna Bhut, but the Vaid has added many practical suggestions regarding the preparations and uses of different sorts of compositions of merecury and of the compositions of good many herbs and drugs. The special feature of the work is the addition of lucid notes on the different ways of treatment of obstinate deseases. I wish every success for this valuable work on which the Vaid has spent so much time and labour. DIALIRAM. Director of Public Instructions, Patiala State. PATIALA, } 2nd January 14. } १

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प्रस्तावना । ॥ श्रीगुरवे नमः ॥ रसवैद्यो देववैद्यो मानुषो मूलकादिभिः । अधमः शस्त्रदाहाभ्यां सिद्धवैद्यस्तु मांत्रिकः ॥ संसारमें आयुर्वेद शास्त्रसे बढकर उभयलोककल्याणकारी दूसरा शास्त्र नहीं है। इसके द्वारा मनुष्य सहज ही धर्मादि चतुर्विध पुरुषार्थका साधन कर सकता है। और इस शास्त्रका जाननेवाला तो साधारण अवस्थामें रहते हुए भी एक चक्रवर्ती राजासे बढकर दान कर सकता है और किसी अधिक परिश्रमके बिनाही धर्म, मान और यशको प्राप्त कर लेता है । परंतु आयुर्वेद शास्त्रका जाननेवाला होना चाहिये । आयुर्वेद शास्त्रकी अवस्था यद्यपि इस समय कई कारणोंसे अच्छी नहीं है । इसका सम- याधीन वह आदरभी नहीं रहा । एवं इस विद्याके सर्वांगज्ञाता भी बहुत कम हैं परंतु फिर भी यह शास्त्र संसारका असीम उपकार कर रहा है, इसका पहला उपदेश सदाचार है, सदाचारके बिगडनेसे ही मनुष्यका आरोग्य बिगडता है । वर्तमान समयमें सदाचारकी अव्यवस्थासे ही मनुष्योंकी दुरवस्था है,सदाचारके बिगडनेसे ही आलसी, रोगी, बल- वीर्य-पराक्रमहीन और लक्ष्मीहीन हो रहे हैं । इस दुरवस्थासे बचानेके लिये आयुर्वेदका सबसे बडा अंग चिकित्सा है.उस चिकित्सा शास्त्रमें रस चिकित्सा, वनौषधि चिकित्सा, शस्त्रदाहादि चिकित्सा और मंत्र- चिकित्सा इन भेदोंसे चार प्रकारकी चिकित्सा है। इनमें मंत्रचिकित्सा तो अब लुप्तप्रायसी है इसके ज्ञाताओंको सिद्धवैद्य कहते थे । शस्त्र- द्वारा ( सर्जरी ) चिकिसा करना, तथा अग्निदाह, क्षारदाह, जलौका, तुंबी आदिसे जो चिकित्सा की जाती है इसको शल्यतंत्र और शालाक्य तंत्र कहते हैं इसके जाननेवालोंको कायचिकित्सावालोंने अधम माना है, जडी बूटियोंसे जो चिकित्सा की जाती है इसको मानुषी चिकित्सा कहते हैं और रसों द्वारा जो चिकित्सा की जाय उसे दैवी चिकित्सा कहते हैं ।

( ४ ) प्रस्तावना । “ अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसंगतः । क्षिप्रमारोग्यदायित्वाद्यौषधेभ्यो रसोऽधिकः ” ॥ रसकी मात्रा (खुराक) बहुत थोडी होती है,इसके सेवनमें अरुचि भी नहीं होती और शीघ्र ही आरोग्यता प्राप्त होजाती है इसलिये सब औषधियोंमें रस श्रेष्ठ माना जाता है। परंतु रसक्रियामें निपुणता होनेपर ही यह शास्त्र लाभदायक हो सकता है। यदि विधिपूर्वक रस धात्वादि शोधन मारण किये हुए हों तो एक तो वह जितने पुराने होते जायँ उतने ही गुणकारी होते जाते हैं और योगवाही होनेसे एक रससे ही संपूर्ण रोग दूर हो सकते हैं इसलिये यह शास्त्र परमहितकारी है। ऐसी कथा सुननेमें आती है कि,जब महादेवके गणों द्वारा काटा हुआ दक्षका शिर अश्विनीकुमारोंने जोड दिया तो आयुर्वेद शास्त्रकी विचि- त्रता देख अश्विनीकुमारोंकी बडी प्रशंसा होने लगी। इसे देख भैरव ब्रह्माके पास गये और उनसे आयुर्वेद शास्त्रके पढनेकी प्रार्थना की। ब्रह्माने कहा तुम तामसी स्वभावके जन हो इसलिये आयुर्वेदके अधि- कारी नहीं हो, तुमको आयुर्वेद नहीं सिखाया जायगा। यह सुन रोषमें आ भैरवने त्रिशूलसे ब्रह्माका मस्तक काट दिया, तदनन्तर अश्विनी- कुमारोंने वह भी जोड दिया यह देख भैरव दुःखित हो जंगलमें लक- डियें एकत्रित कर जलकर मरनेको तैयार हुए। तब महादेवजीने इन्हें सन्तोष देकर यह रसचिकित्सा सुनाई और कहा कि यह सबसे अधिक आदर पायेगी तबसे यह चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ उत्पन्न या प्रगट हुई। जैसे धन्वंतरि, आत्रेय, सुश्रुत, चरक आदि वनौषधि चिकित्साके विद्वान् हुए वैसे ही भैरव, नागार्जुन, सोमदेव, स्वच्छन्दभैरव, सिद्धनाथ आदि रसचिकित्साके विद्वान् हुए हैं। इनके बनाये “रसचिकित्सा” के अनेक ग्रंथ हैं।

प्रस्तावना । ( ५ ) उन अनेक रसचिकित्साके ग्रंथोंमेंसे बडे परिश्रमसे श्रीगोपाल- कृष्ण भट्टने रसोंका संग्रह कर यह "रसेन्द्रसार संग्रह" नामक ग्रंथ बनाया । इसमें तीन खण्ड हैं-प्रथम खंडमें रस, उपरस, धातु, उपधातु, रत्न और विषादिकोंका शोधन मारण बहुत उत्तम रीतिसे लिखा है । दूसरे खण्डमें ज्वरादि संपूर्ण रोगोंकी चिकित्सा है और तीसरे खण्डमें आयु, बल और वीर्यवर्द्धक उत्तम २ योग हैं । इस प्रकार यह रसेन्द्र- सारसंग्रह नामक ग्रंथ तीन खण्डोंमें समाप्त हुआ है । ग्रंथके ऊपर श्रीहृदयनाथ कविरत्न कृत संस्कृत संदर्भ भी है। इतना सब होनेपर भी इस ग्रंथसे विद्वानोंको ही लाभ पहुँच सकता था । केवल भाषामात्र जाननेवालोंके लिये भाषानुवादके बिना कुछ उपाय ही न था ऐसा देख परमोदारचरित "श्रीवेंकटेश्वर" प्रेसके मालिक सेठ खेमराजजीने यह पुस्तक सरल हिन्दी अनुवादके लिये मेरे पास भेजा, मैंने अपनी मतिगतिके अनुसार इस ग्रंथकी भाषाटीका करनेके अतिरिक्त इसमें पुटविधान और मानविधि भी लगा दी है । यह जो कुछ और जैसा तैसा बना है श्रीमान् सेठ खेमराजजीके करकमलोंमें ही सर्वाधिकार सहित समर्पित करता हूं, इसके अनुवादमें यदि कहीं लेखका दोष रहा हो तो प्रेसके शास्त्री महाशय छपते समय शोधन करनेकी कृपा करेंगे । यदि विषयमें भ्रष्टता हुई हो तो भिषग्वर कृपापूर्वक शोधन कर मुझे भी सूचित करेंगे जिससे अग्रिमावृत्ति छपनेके समय वह दोष निकाल दिया जाय ॥ आपका विनीत सेवक- वैद्यरत्न रामप्रसाद, राजवैद्य पटियाला स्टेट.

॥ श्रीः ॥ समर्पणम् । संसारसंपातनिपातितानां मोहप्रमादेन विमोहितानाम् । दुःखार्णवप्लावितजीवितानां त्वमेव नस्तत्परमावलंबनम् ॥ प्रभो ! दयालो ! शरणागतवत्सल ! वह संसारमें कौनसा पदार्थ है जिसे अपना समझ आपके चरणकमलोंमें समर्पण करनेका साहस करूं ? नाथ ! समर्पण करना तो अलग रहा यहां तो अवस्था ही और है, संसारके संपातोंसे बार बार पातित होनेपर मोहरूपी उन्मादसे ज्ञानशून्य अवस्था इस जीवनको दुःख समुद्रकी डुबकियें खाते देख समर्पणकी किसे सूझ सकती है । जगदाधार ! अपने बचावकी इच्छासे या आपके चरणोंका आश्रय लेनेकी इच्छासे कोई महात्मा अपने मनको आपकी शरणमें भेजनेका प्रयत्न करे यह बात अलग है किन्तु समर्पणकी इच्छासे कौन महापुरुष है जो आपकी शरण जाय । ऐसा प्रायः सब लोग कहते हैं कि जिसे आपका यथार्थ ज्ञान है वह संसारके सब झंझट पर लात मार अनन्य प्रेमके मार्ग जाकर जिस वस्तुको वह अपना माना हुआ हो उसे आपके चरणोंमें समर्पण कर देता है ? परन्तु नाथ ! आपका ज्ञान और आपका प्रेम प्राप्त किसे हो सकता है यहां तो और प्रकारके ही प्रेम देखनेमें आते हैं । कोई अपने पुत्र कलत्रादिकमें मोहित रहनेको प्रेम कहते हैं, कोई किसीके स्वरूपपर मस्त हो जानेको ही प्रेम माने हुए हैं, कोई स्वार्थवश किसीकी सेवा करनेको प्रेम कहते हैं एवं कोई बडी लम्बी चौडी पूजापाठ या माला तिलकको प्रेम माने हुए हैं, अब नये ढंगकी व्याख्यानबाजी भी एक प्रेमका अंग मानी जाने लगी परंतु क्या प्रभो ! इन सम्पातोंका नाम प्रेम है ? दयालो ! आपका प्रेम किसको प्राप्त हो सकता है ? प्राप्त हो भी कैसे, उसका अधिकारी ही कौन है, नाथ ! वह ज्ञान और वह प्रेम तो उसे ही मिलता है जिसे आप स्वयंही अपने दयालु नामको सार्थक करनेके लिये अपना लें । अहो नाथ ! जिसे आप अपना लें वह धन्ध है, उसके चरणरजसे यह वसुंधरा भी धन्य है, प्रभो ! समर्पण भी वही कर सकता है

समर्पणम् । (७) जिसे वह निर्दोष प्रेम प्राप्त हो। दयालो ! मै क्या समर्पण करूं मेरा तो किसी वस्तुपर अधिकार ही नहीं, यहां तो अपना मन भी अपने वश नहीं, वश तो तब हो जो अपना हो यह तो कुछ विचित्र चक्र है इसका पारा- वार आपही जानते होंगे अथवा कोई आपका ही जन जानता होगा । हूं तो मैं भी आपका परंतु मुझमें न तो यथार्थ आपका होजानेका ज्ञान ही है, न मुझसे वह परिश्रम ही हो सका । तो नाथ ! अब क्या करूं प्रयत्न तो आपसे विमुख होनेका कर रहा हूं, इच्छा है आपके प्रेमकी । यह तो बडा ही टेढा चक्र है अब कलम भी रुकती है ! प्रभो ! स्वयं अपनानेकी कृपा कीजिये यह तो जो है आपसे छिपाही नहीं, दिन रात्रिके २४ घण्टे होते हैं ३६ कामोंकी उलझन गलेमें डालनेमें सुख समझता हूं फिर आपके मार्ग जानेकी इच्छा करता हूं ऐसे चक्रमें बताइये सिवाय सच्ची अथवा झूठी रीतिसे आपके शरण जानेके और मेरा कौन आश्रय हो सकता है । तो क्या मैं इस अंटसंट अनुवाद ( टीका ) को समर्पण करनेके लिये आपका अवलंबन चाहता हूं । नहीं नाथ ! नहीं, समर्पण तो यह अपने इस चंचल चित्तको करने आया है इसका समर्पण विना आपकी कृपा नहीं हो सकती । यदि हो सकती है तो स्वीकार कीजिये, यह आपका जन प्रार्थना करता है इसके चित्तको संसारके झंझटोंसे हटा अपनी शरणमें लीजिये ॥ हृदय सदा यादवतः पापाटव्या दुरासदायादवतः । अरिसमुदायादवतस्त्रिजगन्मा गाः स्मरेण दायादवतः ॥ आपका- रामप्रसाद.

वर्तमान तोलसे आयुर्वेदिक तोलका मिलान । ३ राई का १ सरसों. ३ सरसों ,, १ यव. ३ यव ,, १ गुंजा. ( रत्ती ) ८ रत्ती ,, १ मासा. ३ मासे ,, १ टंक ( शाण ) २ शाण ,, १ कोल. ( ६ मासा ) २ कोल ,, १ कर्ष. ( तोला ) २ कर्ष ,, १ अर्धपल. ४ कर्ष ,, १ पल. ( ४ तोला ), बिल्व, मुष्टि. २ पल ,, १ प्रसृति. २ प्रसृति ,, १ अंजलि ( १६ तोले ), कुडव. २ अंजलि ,, १ मानिका. ( ३२ तोला ) २ मानिका ,, १ प्रस्थ. ( ६४ तोला ) ४ प्रस्थ ,, १ आढक. ( ४ सेर ) १ तुला ,, ८० तोलाके सेरसे ५ सेर ४ आढक ,, १ द्रोण. ( १६ सेर. ) २ द्रोण ,, १ शूर्प. ( ३२ सेर ) २ शूर्प ,, १ द्रोणी ( ६४ सेर ) ४ द्रोणी ,, १ खारी. ( २५६ सेर ) १ भार ,, २००० पल ( १२५ सेर ) कोई पांच तोलेका १ पल मानकर २० तोलेका कुडव ( १ पाव पक्का ) ४ कुडवोंका १ प्रस्थ ( ८० तोलेका सेर ) लेते हैं । इसी प्रकार ४ सेर पक्केका १ आढक १६ सेर पक्केका द्रोण मानते हैं । पुराने जमानेके कच्चे तोलसे पल ८ तोलेका लेते हैं ।

रसेन्द्रसारसंग्रह-विषयानुक्रमणिका । विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. पूर्वखण्ड । | रससिन्दूर १८ | रसकपूरकी विधि २१ मङ्गलाचरण १ | श्वेतभस्म सुधानिधि रस २२ रसकी प्रधानता २ | सर्वाङ्गसुन्दर रस ,, रसके पर्यायवाची शब्द ३ | कृष्णभस्म २३ उत्तम पारदकी परीक्षा ,, | चतुर्विध भस्मकी उत्तरोत्तर श्रेष्ठता २४ पारदमें स्वाभाविक दोष ४ | मूषाके बनानेकी श्रेष्ठ विधि ,, शोधनकी आवश्यकता ,, | नियामक गण २५ शुद्धाशुद्धके गुणदोष ,, | मारक गण २६ रसशोधनप्रकार ५ | अम्लवर्ग २७ तप्तखल्व विधान ६ | लवणवर्ग, मूत्रवर्ग द्राव वर्ग २८ रक्षामन्त्र या अघोरमन्त्र ७ | पित्तवर्ग, क्षारवर्ग, रससेवनविधि,, रसनिगड ,, | रससेवनका फल २९ पारदकी साधारणशुद्धि ,, | रससेवनमें पथ्य ,, विशेष शुद्धि ( दोषहरण ) ,, | रससेवनमें कुपथ्य ,, अन्य प्रकारसे शोधन ८ | उपरस, बंधकप्रकरण ३० ऊर्ध्वपातनसंस्कार ११ | अशुद्ध गंधकके दोष ३१ | गंधकके पर्यायवाची शब्द ,, अधःपातनसंस्कार १२ | गंधकशोधन विधि ,, तिर्यक्पातनसंस्कार ,, | शुद्ध गंधकके गुण ३२ बोधनसंस्कार १३ | हीरा शोधन प्रकरण । हिंगुलसे पारा निकालनेकी | अशुद्ध हीरेके दोष, वज्रशोधन ३३ विधि १४ | वज्रमारण ३४ पारदके अष्ट संस्कार ,, | वैक्रांतप्रकरण । ३५ सिंगरफसे पारा निकालनेमें | अभ्रक प्रकरण । अन्यमत १६ | वज्राभ्रकके लक्षण ३६ मूर्च्छनविधि १७ | पिनाकादि अभ्रकोंके अवगुण ३७ पारदमारण ,, | अन्यप्रकारसे पारदमारणविधि १८ |

( २ ) रसेन्द्रसारसंग्रह-


विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक.
वज्राभ्रकके लक्षण३७अशुद्ध सोनामक्खीके दोष५४
अशुद्ध अभ्रकके दोषसोनामक्खी शोधन५५
अभ्रकके शोधनकी विधि३८माक्षिकभस्मविधि
अभ्रकमारणविधि३९सोनामक्खीके गुण५६
मारकगण (३-४-५ मारण )४१काशीसशोधन काशीसके गुण
छठी विधि। १० पुटी भस्म४२कान्तपाषाणके पर्याय५७
सातवीं विधि। १०० पुटी भस्मकांतपाषाणका शोधन५९
अभ्रक भस्मके गुण४३कौडीके भेद
हरितालप्रकरण ।कौडियोंका शोधन५८
हरितालके पर्याय४३वराटिकाकी भस्मविधि
हरितालके भेदवराटिकाभस्मके गुण
अशुद्ध हरितालके दोषनीलांजन शोधन५९
हरितालशोधन १-२-३ विधि४४हिंगुलप्रकरण ।
१ हरितालमारण विधि४५सिगरफके पर्यायनाम५९
२-३ प्रकारान्तरसे मारण४६हिंगुलशोधनविधि
मरे हुए हरितालकी परीक्षा४७हिंगुलके लक्षण और गुण६०
हरितालके गुण, माणिकरसशिलाजीतके नाम
मनसिलके पर्याय४९शिलाजीतका शोधन६१
उत्तम मनसिलशीलाजीतके गुण
अशुद्ध मनसिलके दोषसौवीरादिकोंकी साधारण शुद्धि,,
मनशिलशोधनविधिटङ्कण ( सुहागे ) के नाम
मनसिलके गुण५०सुहागेका शोधन६२
खपरिया शोधनविधिसुहागेके गुण६३
खपरियामारण, खपरियेके गुण५१शंखका शोधन और मारण गुण
तुत्थप्रकरण ।स्वर्णादिधातुशोधनमारण ।
नीलाथोथेका नाम५२सोना आदि ८ धातुओंकी
तूतियाशोधनमारणसाधारण शुद्धि६४
विमलशोधन५३अशुद्धसुवर्णका दोष
सोनामक्खीके नाम५४सुवर्णशोधन, पञ्चमृत्तिका६५
उत्तम सुवर्णमक्खीसुवर्णभस्मकी विधि६६
सुवर्णके गुण६७

विषयानुक्रमणिका। ( ३ ) विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. चांदीका शोधन-मारण । | पुटपाकविधान ८६ उत्तम चांदीके लक्षण ६८ | पुटमें दोष ८७ अशुद्ध चान्दीके दोष, शोधन ,, | अन्य प्रकारसे लोहमारण ,, चान्दीके मारनेकी विधि ,, | निरुत्थ भस्मकी परीक्षा ८९ चांदीके गुण ७० | मित्रपञ्चक ,, अशुद्ध तांबेके दोष ,, | अन्य प्रकारसे परीक्षा ,, ताम्रके शोधनकी विधि ,, | लोहभस्मके गुण ९० तांबाके मारणकी विधि ७१ | लोहसेवनमें कुपथ्य ,, तांबेके गुण ७३ | जातिभेदसे लोहके गुणोंमें पित्तल और कांसिका मारण | न्यूनाधिकता ,, व शोधन ,, | मण्डूर शोधन, मण्डूरके गुण ९१ सिक्का-कली शोधन ७४ | मण्डूरमारण, गुणाधिक्य ९२ सिक्का मारण ,, | सुवर्णादि धातुओंके साधारण मारकद्रव्य ,, नागभस्मके गुण ७५ | मणिमुक्तादिरत्नशोधन मारण ९३ वंगभस्मविधि ,, | मोतियोंका मारण ,, वंगभस्मके गुण ७७ | अन्य प्रकारसे रत्नमारण ,, लोहशोधनविधि ७८ | प्रवालमारण ९४ लोहमारणविधि, भानुपाकविधि,, | सब रत्न और मणियोंका शोधन,, स्थालीपाकविधि ७९ | विषका शोधन मारण ,, स्थालीपाकके डालनेके द्रव्य ८० | अन्यप्रकारसे विषशोधन ९५ पुटपाकविधि, पुटोंकी संख्या ८१ | सात उपविष, उपविष शोधन ९६ सामान्य पुटोंका नियम ८२ | जमालगोटेका शोधन ,, पुटपाकमें औषधियोंका प्रयोग ,, | अन्य मतसे जैपालादि बीजोंका शोधन ९७ त्रिफलादिगण ८३ | थोहरके दूधका शोधन ,, वातनाशक एरंडादिगण ,, | जोंकशोधन विधि ९८ किरातादि गण ८४ | त्याज्य जलौका ,, शृंगवेरादि गण, गोक्षुरादि गण ,, | विधारेके बीजोंका शोधन ,, पटोलादि गण, किंशुकादि गण ८५ | अन्य बीजोंके शोधन ९९ शतावरी आदि गण ,, | गुग्गुलुशोधन १०० विदारीकंदादि गण ८६ |

( ४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह- विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. अथोत्तरखण्ड । शीतारि रस १२३ चिन्तामणि रस १२४ इच्छाभेदी रस १०१ सन्निपातज्वर पर चि ० । गदमुरारि इच्छाभेदी १०२ कुलवधू १२५ रुक्मेश रस १०३ जयमंगल रस, नस्य भैरव १२६ इच्छाभेदी गुटिका १०४ अंजनभैरव, अंजनरस १२७ दूसरा इच्छाभेदी रस ,, त्रैलोक्यसुन्दर रस १२८ पुष्परेचनी गुटिका १०५ स्वच्छन्दभैरव रस १२९ सर्वाङ्गसुन्दर रस ,, शीतांग सन्निपातके लक्षण ,, अविरेचनीय रोगी १०६ आनन्दभैरव, आनंदभैरवी १३० प्राणेश्वर रस १३२ ज्वरचिकित्सा । सन्निपातभैरव, शीतभञ्जी रस १३४ नवज्वरांकुश रस १०७ उन्मत्त रस, मृतसञ्जीवन रस १३५ हिंगुलेश्वररस, ज्वरधूमकेतु ,, स्वल्पवडवानल रस १३६ मृत्युञ्जय रस १०८ बृहद्वडवानल, सूचिकाभरण रस १३७ जया वटी, जयन्ती वटी ११० पञ्चानन रस १३८ जयाजयंती वटीके पथ्य और त्रिदोषनीहाररवि रस ,, अनुपान ,, रसराजेन्द्र रस १३९ भस्मेश्वर चूर्ण, स्वच्छन्दभैरव रस ११३ मृतसंजीवन रस १४० ज्वरमुरारि रस, नवज्वरेभांकुश ११४ गन्धककज्जली १४१ त्रैलोक्यडुम्बर रस ,, वेताल रस १४२ प्रतापमार्तण्ड रस ११५ चन्द्रशेखर रस १४३ तरुणज्वरारि रस ,, कस्तूरीभैरव १४४ गदमुरारि रस, विद्याधर रस ११६ बृहत्कस्तूरीभैरव ,, अमृतमञ्जरीरस, महाज्वरांकुश ११७ सौभाग्यवटी १४६ ज्वरकेशरिका ११८ सन्निपातहर रस १४७ नवज्वरेभसिंह ११९ सन्निपातवडवानल रस ,, उदकमञ्जरीरस(निरामज्वरपर) ,, सिंहनाद रस ,, चन्द्रशेखर रस, पञ्चवक्त्र रस १२० सन्निपातसूर्य १४८ पर्पटीरस १२१ वातपित्तान्तक रस, विश्वेश्वर रस १२२

विषयानुक्रमणिका। ( ५ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. अभिन्यासे-स्वच्छंदनायकरस १४९ भानुचूडामणि रस १७८ सन्निपातान्तक रस १५० बृहच्चूडामणि रस १७९ बृहज्ज्वरचूडामणि रस १८० जीर्णज्वर विषमज्वर चि०। ज्वरातिसारचिकित्सा । विषमज्वरलक्षण १५१ मृतसञ्जीवनी वटी १८१ जीर्णज्वरके लक्षण, ज्वरांकुश रस,, आनन्दभैरव रस ,, ज्वरारि-अभ्रक, ज्वराशनि रस १५२ अमृतार्णव १८२ अर्द्धनारीश्वर रस १५३ सिद्धप्राणेश्वर रस, अभ्रवटिका १८३ चन्दनादिलोह, ज्वरारि रस १५४ कनकसुन्दर रस, कनकप्रभा १८४ सर्वज्वर रस लोह १५६ कारुण्यसागर रस १८६ बृहत्सर्वज्वरहर लोह १५७ बृहत्कनकसुन्दर रस, मृतस- महाराजवटी १५९ ञ्जीवन १८७ चिन्तामणि रस १६० नागरादि चूर्ण, प्राणेश्वर रस १८९ त्रैलोक्यचिन्तामणि रस १६१ अतिसारचिकित्सा । बृहच्चिन्तामणि रस ,, अतिसारवारण रस १९० विषमज्वरान्तक लोह १६२ पूर्णचन्द्रोदय रस ,, कणाद्यलोह १९१ बृहद्विषमज्वरान्तक लोह १६३ बृहद्गगनसुन्दर रस ,, शीतभञ्जी रस १६४ लोकनाथ रस १९२ चिन्तामणि रस १६५ चिन्तामणि रस १९३ ज्वरांकुश रस, मेघनाद रस १६६ अहिफेनवटिका १९४ शीतज्वरहर रस,शीतभञ्जी रस १६७ महागन्धक ,, पञ्चानन रस १६८ सर्वाङ्गसुन्दर रस १९५ वमनयोग, विश्वेश्वर रस १६९ ग्रहणीरोगचिकित्सा । त्र्याहिकारि रस, चातुर्थिकारि० १७० जातीफलादि, ग्रहणीकपाट रस १९६ चिन्तामणि रस,बृहच्चिन्तामणि १७१ ग्रहणीकपाट रस ,, महाज्वरांकुश १७२ जातीफलाद्या वटिका १९७ तन्त्रान्तरोक्त महाज्वरांकुश १७३ पूर्णकला वटी १९९ सर्वतोभद्र रस १७४ वज्रकपाट रस, जातीफल रस २०० बृहज्ज्वरान्तक १७५ ग्रहणीगजेन्द्रवटिका २०१ चूडामणिरस १७७ पीयूषवल्लीरस २०२

( ६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह- विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. ग्रहणीशार्दूल रस २०३ | जातीफलादि वटी, पञ्चानन वटी २३४ वैद्यनाथ वटी २०४ | अष्टांग रस २३५ रसपर्पटिका २०५ | अजीर्णाधिकार । विजयपर्पटी, पर्णपर्पटी २०७ | महोदधि वटी २३५ पञ्चामृतपर्पटी २०८ | अग्नितुण्डी रस, वडवानल रस २३६ अग्निकुमार रस २०९ | हुताशन रस, बृहत हुताशन रस २३७ वडवामुखरस, ग्रहणीकपाट रस २१० | अमृतकल्प वटी २३८ बृहद्ग्रहणीकपाट रस २११ | अग्निकुमार रस " प्रकारान्तरसे ग्रहणीकपाट रस २१२ | बृहदग्निकुमार रस २३९ विजयावटिका २१३ | बृहन्महोदधि वटी २४१ ग्रहणीकपर्दपोट्टली " | रामबाण रस " हंसपोट्टली रस, ग्रहणीकपाट | अजीर्णकण्टक रस, पाशुपत रस २४२ रस २१४ | बृहच्छंखवटी २४४ ग्रहणी वज्रकपाट रस २१५ | भक्तविपाक वटी २४५ पानीयभक्तवटी २१७ | पञ्चामृत वटी, क्रव्याद रस २४७ शम्बूकादिवटी २१८ | ज्वालानल रस, अमृतावटी २४९ हिरण्यगर्भपोट्टली रस " | बृहद्भक्तपाक वटी " रसाभ्रवटी २२० | लवङ्गादि वटी २५० अग्निकुमार नृपतिवल्लभ २२१ | बृहल्लवंगादि वटी २५१ राजवल्लभ रस २२२ | जातीफलादि वटी, शंखवटी २५२ बृहन्नृपवल्लभ २२३ | चिन्तामणि रस; प्रदीपन रस २५३ संग्रहग्रहणीकपाट २२४ | विजय रस, महाभक्तपाकवटी २५४ महाराजनृपतिवल्लभ रस २२५ | रसराक्षस, त्रिफला लोह २५६ अर्शोऽधिकार । | विसूच्यघ्न " चक्रेश्वर रस २२८ | अग्निकुमार रस, शंखवटी २५७ तीक्ष्णमुख रस २२९ | कृमिरोगचिकित्सा । अर्शःकुठार रस " | कृमिकालानल रस २५८ चक्राख्य रस, नित्योदित रस २३० | कृमिविनाश रस २५९ चन्द्रप्रभा वटिका २३१ | कृमिरोगारि रस " माणाय लोह २३२ | कीटमर्द रस, कृमिघ्न रस २६० चंचुकुठार रस २३३ | कृमिमुद्गर रस २६१ शिलागन्धक वटक " |

विषयानुक्रमणिका। ( ७ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. कृमिधूलिजलप्लव रस २६१ | रत्नगर्भपोट्टली रस २८३ कृमिकाष्ठानल रस २६२ | लोकेश्वरपोट्टली रस २८५ लाक्षादि वटी ,, | कनकसुन्दर रस २८६ कृमिहर रस, विडंगलोह २६३ | हेमगर्भपोट्टली रस २८७ पाण्डुरोगचिकित्सा । | सर्वांगसुंदर रस २८८ निशालोह, धात्रीलोह २६४ | लोकेश्वर रस २८९ पञ्चाननवटी, प्राणवल्लभ रस २६५ | स्वल्पमृगांक, काञ्चनाभ्रक २९२ कामेश्वर रस २६६ | बृहत्काञ्चनाभ्र रस २९३ त्रिकत्रयाद्य लोह २६७ | शिलाजत्वादि लोह २९४ विडङ्गादि लोह २६८ | कुमुदेश्वर रस ,, त्रैलोक्यसुन्दर रस २६९ | यक्ष्मकेशरी रस २९५ दाव्यादि लोह ,, | बृहच्चन्द्रामृत रस ,, पांडुरोग पर पथ्यापथ्य २७० | महामृगांक २९६ कामलाचिकित्सा । | क्षयकेशरी २९८ चन्द्रसूर्यात्मक रस २७० | यक्ष्मारोगपर योगत्रय ३०० पाण्डुसूदन रस २७१ | रजतादि लोह ,, मण्डूरवज्र वटक ,, | कासरोगचिकित्सा । लध्वानन्द रस २७२ | बृहद्रसेन्द्र गुटिका ३०१ सम्मोह लोह ,, | अमृतार्णव रस ३०२ त्र्यूषणादि मण्डूर २७५ | पित्तकासान्तक रस ,, रक्तपित्तचिकित्सा । | काससंहारभैरव ,, अर्केश्वर रस, सुधानिधि रस २७५ | लक्ष्मीविलास रस ३०४ आमलक्यादि लोह २७६ | सर्वेश्वर रस, शृङ्गाराभ्र ३०५ शतमूल्यादि लोह ,, | सार्वभौम रस ३०७ रक्तपित्तान्तक रस, रसामृत रस २७७ | तरुणानन्द रस ३०८ खण्डकूष्माण्ड २७८ | महोदधि रस ३१० शर्कराद्य लोह, समशर्कर लोह २७९ | जया गुटिका ३११ कपर्दक रस २८० | विजया गुटिका ३१२ यक्ष्माधिकार । | स्वच्छन्दभैरव रस ,, रास्नादि लोह २८१ | रसगुटिका ३१३ राजमृगांक रस, मृगांक रस २८२ | रसेन्द्रगुटिका, पुरन्दरवटी ३१४

( ८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह- विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. कासांतक रस, कासकुठार रस ३१५ | भूतांकुश रस ३३५ श्रीचन्द्रामृत रस ३१६ | उन्मादभञ्जिनी रस ३३६ श्रीचन्द्रामृत रस ३१७ | त्रिकत्रयाद्य लोह ३३७ अमृतमञ्जरी• ३१८ | उन्मादभञ्जन रस ” कासान्तक रस, बृहच्छृङ्गाराभ्र ३१९ | चतुर्भुज रस, ३३८ नित्योदय रस ३२० | उन्मादपर्पटी रस ३३९ हिक्काश्वासाधिकार । | अपस्माररोगचिकित्सा । सूर्यावर्त्त रस, विजयवटी ३२२ | भूतभैरव रस, सूतभस्म प्रयोग ३४० लोहपर्पटी रस ३२३ | इन्द्रब्रह्मवटी ” ताम्रपर्पटी ३२४ | वातकुलांतक रस ३४१ पिपल्यादि लोह ३२५ | पाषाणवज्र रस ३४२ श्वासकुठार रस ” | वातव्याधिचिकित्सा । श्वासकासचिंतामणि रस ३२६ | द्विगुणाख्य रस ३४३ श्वासकुठार रस ” | वातगजांकुश ३४४ अन्य श्वासकुठार रस ” | बृहद्वातगजांकुश रस ३४५ स्वरभेदचिकित्सा । | महावातगजांकुश रस ३४६ भैरवरस ३२७ | वातनाशन रस ” चव्यादि चूर्ण ३२८ | वातारि रस ३४७ सुधानिधि रस, सुलोचनाभ्र ३२९ | अनिलारि रस, वातकंटक रस, ३४८ अरुचिघ्न रस ३३० | लघ्वानन्द रस, चिंतामणि रस ३५० छर्दिरोगचिकित्सा ३३१ | चतुर्मुख रस ५५१ तृष्णारोगचिकित्सा । | लक्ष्मीविलास रस ३५२ महोदधि रस ” | रोगेभसिंह, श्रीखण्डवटी ३५३ कुमुदेश्वर रस ३३२ | पिण्डी रस, कुब्जविनोद रस ३५४ मूर्च्छारोगचिकित्सा । | शीतवातलक्षण, शीतारि रस ३५५ सुधानिधि रस ३३२ | वातविध्वंसन रस ३५६ मदात्ययरोगचिकित्सा । | पलाशादि वटी, दशसार वटी ३५७ अष्टाङ्गलवण ३३३ | गगनादि वटी ३५८ दाहचिकित्सा ३३४ | सर्वाङ्गसुन्दर रस,तालेकश्वर रस ३५९ उन्मादरोगचिकित्सा । | महाराजेश्वर रस,वातकेसरी रस ३६० उन्मादगजांकुश रस ३३४ | त्रैलोक्यचिन्तामणि रस ३६१

विषयानुक्रमणिका । ( ९ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. कफरोगाधिकार । विद्याधराभ्ररस ३८७ श्लेष्मकालानल रस ३६३ बृहद्विद्याधराभ्र ३८८ श्लेष्मशैलेन्द्र रस ३६४ सर्वांगसुन्दररस ३८९ महाश्लेष्मकालानल रस ३६५ शूलवज्रिणीवटिका ३९० महालक्ष्मीविलास रस ३६६ त्रिपुरभैरव रस ३९१ कफकेतुरस ३६८ अग्निसुख, श्रीशूलगजकेसरी रस ३९२ कफचिन्तामणि रस " त्रिगुणाख्यरस ३९३ पित्तरोगचिकित्सा । शूलहरणयोग, शर्करालोह ३९४ गुडूच्यादिलोह, धात्रीलोह ३६९ शंखादि चूर्ण ३९५ पित्तान्तक रस ३७० उदावर्त्तानाहरोगधिकार । महापित्तान्तक ३७१ वैद्यनाथवटी ३९५ वातरोगचिकित्सा । बृहदिच्छाभेदी रस ३९६ लाङ्गल्याद्य लोह ३७१ गुल्मरोगचिकित्सा । वातरक्तान्तक रस ३७२ महानाराच रस ३९७ तालभस्म ३७३ पञ्चानन रस, गुल्मवज्रिणी रस ३९८ महातालेश्वर रस ३७४ गुल्मकालानल रस ३९९ विश्वेश्वर रस " वडवानल रस " ऊरुस्तम्भरोगचिकित्सा । महानाराच रस, विद्याधर रस ४०० गुञ्जाभद्र रस ३७६ महागुल्मकालानल रस ४०१ आमवाताधिकार । अभया वटी " आमवातारी वटिका ३७७ गोपीजल ४०२ अपर आमवातारी वटिका ३७८ काङ्कायन गुटिका ४०३ आमवातेश्वर रस " गुल्मशार्दूल रस ४०४ वृद्धदाराद्य लोह ३७९ प्राणवल्लभ रस " शिवागुग्गुलु ३८० सर्वेश्वररस ४०५ आमवातगजसिंह मोदक ३८१ हृद्रोगाधिकार । शूलरोगचिकित्सा । हृदयार्णव रस ४०६ क्षमामृत लोह, त्रिफला लोह ३८२ नागार्जुनाभ्रक " चतुःसम लोह ३८३ पञ्चानन रस ४०७ पञ्चात्मक रस ३८४ मूत्रकृच्छ्राधिकार । धात्री लोह ३८५ शूलराजलोह ३८६ त्रिनेत्राख्य रस ४०७

( १० ) रसेन्द्रसारसंग्रह- विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. वरुणाद्य लोह ४०८ स्थौल्याधिकार । मूत्रकृच्छ्रान्तक रस ४०९ त्र्यूषणाद्यलोह ४३० मूत्राघाताधिकार । वडवाग्निलोह ” तारकेश्वर रस ४१० वडवाग्निरस ४३१ लघुलोकेश्वर रस ४११ उदररोगाधिकार । अन्ययोग ” गोखरूआदि योग ४१२ त्रैलोक्यसुन्दर रस ४३१ अश्मरीरोगचिकित्सा । वैश्वानरी वटी ४३२ पाषाणवज्र रस ४१२ जलोदरारि रस ४३३ त्रिविक्रमरस ४१३ वह्निरस, त्रैलोक्यडुम्बर रस ४३४ लोह प्रयोग ४१४ महावह्नि रस ४३५ अन्य योग, गंधकादियोग ” इच्छाभेदी रस ४३६ प्रमेहाधिकार । पिप्पलीमूलाद्य लोह ” हरिशंकर रस ४१४ उदरारि रस, वङ्गेश्वर रस ४३७ इन्द्रवटी, वङ्गावलेह ४१५ प्लीहरोगचिकित्सा । प्रमेहसेतु ” लोकनाथ रस ४३८ विडंगाद्य लोह ४१६ बृहल्लोकनाथ रस ४३९ बृहत् हरिशंकर रस ” क्षात्रेश्वरवटी, अग्निकुमारलोह ४४१ आनन्दभैरव रस ४१७ प्राणवल्लभ रस ४४२ विद्यावागीश रस ” यकृदरि लोह ४४३ मेहमुद्गर रस, मेघनादरस ४१८ मृत्युञ्जय रस ४४४ चन्द्रप्रभा वटी ४१९ प्लीहार्णव रस ४४५ इक्षुमेहपर वंगेश्वर रस ४२० प्लीहशार्दूल रस ४४६ बृहद्वङ्गेश्वर रस ” प्लीहारि रस, अपर प्लीहारिरस ४४७ कस्तूरीमोदक ४२२ लोहमृत्युञ्जय रस ४४८ मेहवज्र ४२३ महामृत्युञ्जय रस ” मेहकेशरी, योगेश्वर रस ४२४ बृहद् गुडपिप्पली ४४९ सोमचिकित्सा । ताम्रकल्प ४५० तालकेश्वर रस ४२५ दारुभस्म, वज्रक्षार ४५२ गगनादि लोह, सोमनाथ रस ४२६ उदरामयकुम्भिकेसरी रस ४५३ बृहत्सोमनाथ रस ४२७ वारिशोषण रस ४५४ सोमेश्वर रस ४२८ सर्वतोभद्र रस ४५६