भारतकोश
रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

14 रत्नावली “सर्ब्बस्त्रीभिः पतिर्वाच्य आर्य्यपुत्रेति यौवने” इति नियमात् । नियोगः आदेशः । Beng. Trans. সুতরাং গৃহে যাইয়া গৃহিণীকে ডাকিয়া সঙ্গীতের অনুষ্ঠান করিব। ( ইতস্ততঃ পরিক্রমণ পূর্ব্বক নেপথ্যের দিকে লক্ষ্য করিয়া ) ইহাই আমার গৃহ। প্রবেশ করা যাউক। ( প্রবেশ করিয়া—উচ্চৈঃস্বরে ) আর্য্যে, এইদিকে এস। ( প্রবেশ করিয়া ) নটী—আৰ্য্যপুত্র, এই আসিয়াছি। কি আদেশ পালন করিতে হইবে?—আৰ্য্য আদেশ করুন। Eng Trans : So going home I shall call my wife and then make arrangements for musical performence. (Walking to and fro and then with his face towards the green-room) this is my house , let me enter. (entering—aloud) O my lady, come here. ( Entering ) Actress—O my husband, here I am ; please direct, my lord, what order is to be carried out. सूत्रधारः—आर्ये, रत्नावलीदर्शनसमुत्सुको¹ऽयं राजलोकः । तद् गृह्यतां² नेपथ्यम् । नटी—( सोद्बेगम्³ ) अज्जउत्त, णिञ्चिन्तो दाणिं सि तुमम् । ता कीस ण णच्चसि । मह मन्दभाआए उण एक्का ज्जेव्व दुहिदा। सावि तुए कहिंवि देसन्तरे दिन्ना। कहं एक्क' दूरदेसट्ठिदेण जामादुणा सह से पाणिग्गहणं भविस्सदित्ति इमाए चिन्ताए अप्पावि ण मे पडिभादि, किं उण णच्चिदव्वम् । (क) (क) आर्य्यपुत्र, निश्चिन्त इदानीमसि त्वम्। तत् किमिति न नृत्यसि ! मम मन्दभाग्यायाः पुनरेकैव दुहिता। सापि त्वया कस्मिंश्चिद्देशान्तरे दत्ता। कथमिव दूरदेश-

1 दर्शनीत्सुकः । 2 क्रियताम् । 3 निःश्वस्य सावेगम् ।