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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक १३-१४ ]

  • साधक-संजीवनी *

३०७

भगवान् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र—इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं*। मनुष्यके सिवाय देव, पितर, तिर्यक् आदि दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान् गुणों और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसमें भगवान्की किंचिन्मात्र भी विषमता नहीं है।

चातुर्वर्ण्यम् ’ पद प्राणिमात्रका उपलक्षण है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य ही चार प्रकारके नहीं होते, अपितु पशु, पक्षी, वृक्ष आदि भी चार प्रकारके होते हैं; जैसे—पक्षियोंमें कबूतर आदि ब्राह्मण, बाज आदि क्षत्रिय, चील आदि वैश्य और कौआ आदि शुद्र पक्षी हैं। इसी प्रकार वृक्षोंमें पीपल आदि ब्राह्मण, नीम आदि क्षत्रिय, इमली आदि वैश्य और बबूल (कौकर) आदि शुद्र वृक्ष हैं। परन्तु यहाँ ‘चातुर्वर्ण्यम् ’ पदसे मनुष्योंको ही लेना चाहिये; क्योंकि वर्ण-विभागको मनुष्य ही समझ सकते हैं और उसके अनुसार कर्म कर सकते हैं। कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है।

चारों वर्णोंकी रचना मैंने ही की है—इससे भगवान्का यह भाव भी है कि एक तो ये मेरे ही अंश हैं; और दूसरे, मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ, इसलिये मैं सदा उनके हितको ही देखता हूँ। इसके विपरीत ये न तो देवताके अंश हैं और न देवता सबके सुहृद् ही हैं। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह अपने वर्णके अनुसार समस्त कर्तव्यकर्मोंसे मेरा ही पूजन करे (गीता—अठारहवें अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)।

तस्य कर्तारमपि मां विद्व्यकर्तारमव्ययम् ’—यहाँ ‘अकर्तारम् ’ पद कर्म करते हुए भी कर्तृत्वाभिमानका अभाव बतानेके लिये आया है। सृष्टिकी रचना, पालन, संहार आदि सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी भगवान् उन कर्मोंसे सर्वथा अतीत, निर्लिप्त ही रहते हैं।

सृष्टि-रचनामें भगवान् ही उपादान कारण हैं और वे ही निमित्त कारण हैं। मिट्टीसे बने पात्रमें मिट्टी उपादान कारण है और कुम्हार निमित्त कारण है। मिट्टीसे पात्र बननेमें मिट्टी व्यय (खर्च) हो जाती है और उसे बनानेमें कुम्हारकी शक्ति भी खर्च होती है; परन्तु सृष्टि-रचनामें भगवान्का कुछ भी व्यय नहीं होता। वे ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं। इसलिये उन्हें ‘अव्ययम् ’ कहा गया है।

जीव भी भगवान्का अंश होनेसे अव्यय ही है। विचार

करें कि शरीरादि सब वस्तुएँ संसारकी हैं और संसारसे ही मिली हैं। अतः उन्हें संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे अपना क्या व्यय हुआ? हम तो (स्वरूपतः) अव्यय ही रहे। इसलिये यदि साधक शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन, सम्पत्ति आदि मिले हुए सांसारिक पदार्थोंको अपना और अपने लिये न माने, तो फिर उसे अपनी अव्ययताका अनुभव हो जायगा।

यहाँ ‘विद्धि ’ पदसे भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको समझनेकी आज्ञा दी है। कर्म करते हुए भी कर्म, कर्म-सामग्री और कर्मफलसे अपना कोई सम्बन्ध न रहना ही कर्मोंकी दिव्यता है।

न मां कर्माणि लिम्यन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ’—विश्व-रचनादि समस्त कर्म करते हुए भी भगवान्का उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। उनके कर्मोंमें विषमता, पक्षपात आदि दोष लेशमात्र भी नहीं हैं। उनकी कर्म-फलमें किंचिन्मात्र भी आसक्ति, ममता या कामना नहीं है। इसलिये वे कर्म भगवान्को लिप्त नहीं करते।

उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुमात्र कर्मफल है। भगवान् कहते हैं कि जैसे मेरी कर्मफलमें स्पृहा नहीं है, ऐसे ही तुम्हारी भी कर्मफलमें स्पृहा नहीं होनी चाहिये। कर्मफलमें स्पृहा न रहनेसे सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी तुम कर्मोंसे बँधोगे नहीं।

पीछेके (तेरहवें) श्लोकमें भगवान्ने बताया कि सृष्टि-रचनादि समस्त कर्मोंका कर्ता होते हुए भी मैं अकर्ता हूँ अर्थात् मुझमें कर्तृत्वाभिमान नहीं है और इस श्लोकमें बताते हैं कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है अर्थात् मुझमें भोक्तृत्वाभिमान भी नहीं है। अतः साधकको भी इन दोनोंसे रहित होना चाहिये। फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्तृत्व और भोक्तृत्व—दोनों ही नहीं रहते। कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही संसार है। अतः इनके न रहनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध ही है।

इति मां योऽभिजानाति ’—मनुष्यमें जब कामनाएँ उत्पन्न होती हैं, तब उसकी दृष्टि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंपर रहती है। उत्पत्ति-विनाशशील (अनित्य) पदार्थोंपर दृष्टि रहनेसे वह नित्य भगवान्को तत्त्वसे नहीं जान सकता। पर कामनाओंके मिटनेसे जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब भगवान्की ओर स्वतः दृष्टि जाती है।

  • सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मणकी, रजोगुणकी प्रधानता तथा सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रियकी, रजोगुणकी प्रधानता तथा तमोगुणकी गौणतासे वैश्यकी और तमोगुणकी प्रधानतासे शुद्रकी रचना की गयी है।

३०८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

भगवान्की ओर दृष्टि जानेपर मनुष्य जान जाता है कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं, इसलिये उनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं। भगवान् तो जीवोंको कर्म-बन्धनसे रहित करनेके लिये ही उन्हें मनुष्य-शरीर देते हैं, पर इस बातको न समझनेके कारण जीव कर्मोंसे नये-नये सम्बन्ध मानकर और बन्धन उत्पन्न कर लेता है। इसलिये कर्तापन और फलेच्छा न होनेपर भी वे केवल कृपा करके जीवोंको कर्म-बन्धनसे रहित करके उनका उद्धार करनेके लिये ही सृष्टि-रचनाका कार्य करते हैं। भगवान्को इस तरह जान लेनेसे मनुष्य भगवान्की ओर खिंच जाता है—

उमा राम सुभाउ जेहि जाना।

ताहि भजनु तजि भाव न आना॥

(मानस ५। ३४। २)

‘कर्मभिर्न स बध्यते’—भगवान्के कर्म तो दिव्य हैं ही, सन्त-महात्माओंके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं। वास्तवमें सन्त-महात्मा ही नहीं, मनुष्यमात्र अपने कर्मोंको दिव्य बना सकता है। जब कर्मोंमें मलिनता (कामना, ममता, आसक्ति आदि) होती है, तब वे कर्म बाँधनेवाले हो जाते हैं। जब मलिनताके दूर हो जानेपर कर्म दिव्य हो जाते हैं, तब वे उसे नहीं बाँधते। इतना ही नहीं, वे कर्म उस कर्ताको और दूसरोंको भी (उसके अनुसार आचरण करनेसे) मुक्त करनेवाले हो जाते हैं।

अपने कर्मोंको दिव्य बनानेका सरल उपाय है—संसारसे मिली हुई वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर (संसारकी ओर संसारके लिये मानते हुए) संसारकी सेवामें लगा देना।

विचार करना चाहिये कि हमारे पास शरीर आदि जितनी भी बाह्य वस्तुएँ हैं, उन सबको हम साथ लाये नहीं

परिशिष्ट भाव—जैसे सृष्टि-रचना आदि करनेपर भी भगवान्का अकर्तापन सुरक्षित (ज्यों-का-त्यों) रहता है, ऐसी ही जीवका भी स्वरूपसे अकर्तापन स्वतः सुरक्षित रहता है—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३। ३१)। परन्तु वह मूढ़तापूर्वक अपनेमें कर्तापन स्वीकार कर लेता है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३। २७)।

कर्म, क्रिया और लीला—तीनों एक दीखते हुए भी वास्तवमें सर्वथा भिन्न हैं। जो क्रिया कर्तृत्वाभिमानपूर्वक की जाय तथा अनुकूल-प्रतिकूल फल देनेवाली हो, वह क्रिया ‘कर्म’ कहलाती है। जो कर्तृत्वाभिमानपूर्वक न की जाय तथा जो फल देनेवाली भी न हो, वह ‘क्रिया’ होती है; जैसे—शवासोंका आना-जाना, आँखका खुलना और बन्द होना, नाड़ियोंका चलना, हृदयका धड़कना आदि। जो क्रिया कर्तृत्वाभिमान तथा फलेच्छासे रहित तो होती ही है, साथ-साथ दिव्य तथा दुनियामात्रका हित करनेवाली भी होती है, वह ‘लीला’ होती है। सांसारिक लोगोंके द्वारा ‘कर्म’ होता है, मुक्त पुरुषोंके

और जार्यों तब साथ ले जा सकते नहीं, उनके रहते हुए उनमें इच्छानुसार परिवर्तन कर सकते नहीं, उन्हें इच्छानुसार रख सकते नहीं अर्थात् उनपर हमारा कोई आधिपत्य नहीं है। इसी प्रकार जन्म-जन्मान्तरोंसे साथ आये सूक्ष्म और कारण-शरीर भी परिवर्तनशील और प्रकृतिके कार्य हैं, इसलिये उनके साथ भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। वे वस्तुएँ अपने लिये भी नहीं हैं; क्योंकि उनके मिलनेपर भी ‘और मिले’ यह इच्छा रहती है। यदि वे वस्तुएँ अपने लिये होतीं तो और मिलनेकी इच्छा नहीं रहती। ऐसा होनेपर भी उन वस्तुओंको अपनी और अपने लिये मानना कितनी बड़ी भूल है? उन वस्तुओंमें जो अपनापन दीखता है, वह वास्तवमें केवल उनका सदुपयोग करनेके लिये है, उनपर अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं।

सेवा करनेके लिये तो सब अपने हैं, पर लेनेके लिये कोई अपना नहीं है। संसारकी तो बात ही क्या है, भगवान् भी लेनेके लिये अपने नहीं हैं अर्थात् भगवान्से भी कुछ नहीं लेना है, प्रत्युत अपने-आपको ही भगवान्के समर्पित करना है। कारण कि जो वस्तु हमें चाहिये और हमारे हितकी है, वह भगवान्ने हमें पहलेसे ही बिना माँग दे रखी है; और ज्यादा दे रखी है, कम नहीं। हमारी जरूरतको जितना भगवान् समझते हैं, उतना हम समझ भी नहीं सकते; क्योंकि भगवान्की उदारता अपार है। उनके सामने हमारी समझ तो बहुत ही अल्प है। इसलिये उनसे माँगना किस बातका? जो कुछ हमें मिला है, उसीका हमें सदुपयोग करना है। वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितमें लगा देना ही वस्तुओंका सदुपयोग है। इससे कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और महान् आनन्दस्वरूप परमात्माका अनुभव हो जाता है।

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

३०९

द्वारा 'क्रिया' होती है१ और भगवान् के द्वारा 'लीला' होती है—'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) अर्थात् जैसे संसार न होते हुए भी दीखता है, ऐसे ही भगवान् का सृष्टि-रचना आदि कार्य केवल लीला मात्र है। तात्पर्य है कि भगवान् कर्ता न होते हुए भी लीलासे कर्ता दीखते हैं।

'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः' पदोंसे सिद्ध होता है कि गीता जन्म (उत्पत्ति)-से ही जाति मानती है। जो मनुष्य जिस वर्णमें जिस जातिके माता-पितासे पैदा हुआ है, उसीसे उसकी जाति मानी जाती है। 'जाति' शब्द ही 'जनी प्रादुर्भावै' धातुसे बनता है जो जन्मसे जातिको सिद्ध करता है। कर्मसे तो 'कृति' शब्द होता है, जो 'दुकृज् करणे' धातुसे बनता है। हाँ, जातिकी पूर्ण रक्षा उसके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेसे ही होती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपना उदाहरण देकर अब आगेके श्लोकमें भगवान् मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हुए अर्जुनको निष्कामभावपूर्वक अपना कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।

कुरु कर्मैव तस्मान्तं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥

पूर्वैः= पूर्वकालकेकर्म= कर्मपूर्वतरम्= सदासे
मुमुक्षुभिः= मुमुक्षुओंनेकृतम्= किये हैं,कृतम्= किये जानेवाले
अपि= भीतस्मात्= इसलियेकर्म= कर्मोंको
एवम्= इस प्रकारत्वम्= तू (भी)एव= ही (उन्हींकी तरह)
ज्ञात्वा= जानकरपूर्वैः= पूर्वजोंके द्वाराकुरु= कर ।

व्याख्या—[नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताका जो प्रसंग आरम्भ किया था, उसका यहाँ उपसंहार करते हैं।]

'एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः'—अर्जुन मुमुक्षु थे अर्थात् अपना कल्याण चाहते थे। परन्तु युद्धरूपसे प्राप्त अपने कर्तव्य-कर्मको करनेमें उन्हें अपना कल्याण नहीं दीखता, प्रत्युत वे उसको घोर-कर्म समझकर उसका त्याग करना चाहते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका पहला श्लोक)। इसलिये भगवान् अर्जुनको पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हैं कि उन्होंने भी अपने-अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करके कल्याणकी प्राप्ति की है, इसलिये तुम्हें भी उनकी तरह अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।

तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें जनकादिका उदाहरण देकर तथा इसी (चौथे) अध्यायके पहले-दूसरे श्लोकोंमें विवस्वान्, मनु, इक्ष्वाकु आदिका उदाहरण देकर भगवान्ने जो बात कही थी, वही बात इस श्लोकमें भी कह रहे हैं।

शास्त्रोंमें ऐसी प्रसिद्धि है कि मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि मुमुक्षाके बाद मनुष्य कर्मका अधिकारी नहीं होता; प्रत्युत ज्ञानका अधिकारी हो जाता है१। परन्तु यहाँ भगवान् कहते हैं कि मुमुक्षुओंने भी कर्मयोगका तत्त्व जानकर कर्म किये हैं। इसलिये मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर भी अपने कर्तव्य-कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म करते रहना चाहिये।

कर्मयोगका तत्त्व है—कर्म करते हुए योगमें स्थित रहना और योगमें स्थित रहते हुए कर्म करना। कर्म संसारके लिये और योग अपने लिये होता है। कर्मोंको करना और न करना—दोनों अवस्थाएँ हैं। अतः प्रवृत्ति (कर्म करना) और निवृत्ति (कर्म न करना)—दोनों ही प्रवृत्ति (कर्म करना) हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंसे ऊँचा उठ जाना योग है, जो पूर्ण निवृत्ति है। पूर्ण निवृत्ति कोई अवस्था नहीं है।

१-इसको गीताने 'चेष्टा' भी कहा है—'सदृशं चेष्टते' (३।३३)।

२-तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादी वा श्रद्धा यावन जायते ॥

(श्रीमद्भा० ११।२०।१२)

'तभीतक कर्म करने चाहिये, जबतक वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी (भगवान्की) कथाके श्रवण आदिमें श्रद्धा उत्पन्न न हो जाय।'

३१०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते। जो मनुष्य कर्म करनेकी इस विद्या-(कर्मयोग-) को जानकर फलेच्छाका त्याग करके कर्म करता है, वह भी कर्मोसे नहीं बाँधता; कारण कि फलेच्छासे ही मनुष्य बाँधता है—‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)। अगर मनुष्य अपने सुखभोगके लिये अथवा धन, मान, बड़ाई, स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये कर्म करता है तो वे कर्म उसे बाँध देते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका नवौं श्लोक)। परन्तु यदि उसका लक्ष्य उत्पत्ति-विनाशशील संसार नहीं है, प्रत्युत वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये निःस्वार्थ सेवा-भावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, तो वे कर्म उसे बाँधते नहीं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। कारण कि दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्मोका प्रवाह संसारकी तरफ

परिशिष्ट भाव —तेरहवें-चौदहवें श्लोकोंमें भगवान्ने बताया कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छासे रहित होकर सृष्टि-रचना आदि कर्म करनेके कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते। यहाँ भगवान् कहते हैं कि मुमुक्षुओंने भी इसी तरह कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छाका त्याग करके कर्म किये हैं। कारण कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छा होनेपर ही कर्म बन्धनकारक होते हैं। इसलिये तू भी उसी प्रकारसे कर्म कर।

ज्ञानयोगमें पहले कर्तृत्वाभिमानका त्याग किया जाता है, फिर फलेच्छाका त्याग स्वतः होता है। कर्मयोगमें पहले फलेच्छाका त्याग किया जाता है, फिर कर्तृत्वाभिमानका त्याग सुगमतासे हो जाता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म’ पदोंसे कर्मोंको जाननेकी बात कही गयी थी। अब भगवान् आगेके श्लोकसे कर्मोंको ‘तत्त्व’ से जाननेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं।

किं कर्म किमकर्मिति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥

कर्म= कर्मअपि= भीकहूँगा,
किम्= क्या है (और)मोहिताः= मोहित हो जाते हैं।यत्
अकर्म= अकर्म(अतः)ज्ञात्वा
किम्= क्या है—तत्= वहअशुभात्
इति= इस प्रकारकर्म= कर्म-तत्त्व (मैं)
अत्र= इस विषयमेंते= तुझेमोक्ष्यसे
कवयः= विद्वान्प्रवक्ष्यामि= भलीभाँति

व्याख्या —‘किं कर्म’—साधारणतः मनुष्य-शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको ही कर्म मान लेते हैं तथा शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाएँ बंद होनेको अकर्म मान लेते हैं। परन्तु भगवान्ने शरीर, वाणी और मनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाओंको कर्म माना है—‘शरीरवाडमनोर्भिर्थकर्म पारभते नरः’ (गीता १८।१५)।

हो जाता है, जिससे कर्मोका सम्बन्ध (राग) मिट जाता है और फलेच्छा न रहनेसे नया सम्बन्ध पैदा नहीं होता।

‘कुरु कर्मैव तस्मान्चं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्’ —इन पदोंसे भगवान् अर्जुनको आज्ञा दे रहे हैं कि तू मुमुक्षु है, इसलिये जैसे पहले अन्य मुमुक्षुओंने लोकहितार्थ कर्म किये हैं, ऐसे ही तू भी संसारके हितके लिये कर्म कर।

शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि कर्मकी सब सामग्री अपनेसे भिन्न तथा संसारसे अभिन्न है। वह संसारकी है और संसारकी सेवाके लिये ही मिली है। उसे अपनी मानकर अपने लिये कर्म करनेसे कर्मोका सम्बन्ध अपने साथ हो जाता है। जब सम्पूर्ण कर्म केवल दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, तब कर्मोका सम्बन्ध हमारे साथ नहीं रहता। कर्मोसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘योग’ अर्थात् परमात्माके साथ हमारे नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव हो जाता है, जो कि पहलेसे ही है।

भावके अनुसार ही कर्मकी संज्ञा होती है। भाव बदलनेपर कर्मकी संज्ञा भी बदल जाती है। जैसे, कर्म स्वरूपसे सात्त्विक दीखता हुआ भी यदि कर्ताका भाव राजस या तामस होता है, तो वह कर्म भी राजस या तामस हो जाता है। जैसे, कोई देवीकी उपासनारूप कर्म कर रहा है, जो स्वरूपसे सात्त्विक है। परन्तु यदि कर्ता उसे किसी

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

३११

कामनाकी सिद्धिके लिये करता है, तो वह कर्म राजस हो जाता है और किसीका नाश करनेके लिये करता है, तो वही कर्म तामस हो जाता है। इसी प्रकार यदि कर्तामें फलेच्छा, ममता और आसक्ति नहीं है, तो उसके द्वारा किये गये कर्म 'अकर्म' हो जाते हैं अर्थात् फलमें बाँधनेवाले नहीं होते। तात्पर्य यह है कि केवल बाहरी क्रिया करने अथवा न करनेसे कर्मके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। इस विषयमें शास्त्रोंको जाननेवाले बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं अर्थात् कर्मके तत्त्वका यथार्थ निर्णय नहीं कर पाते। जिस क्रियाको वे कर्म मानते हैं वह कर्म भी हो सकता है, अकर्म भी हो सकता है और विकर्म भी हो सकता है। कारण कि कर्ताके भावके अनुसार कर्मका स्वरूप बदल जाता है। इसलिये भगवान् मानो यह कहते हैं कि वास्तविक कर्म क्या है? वह क्यों बाँधता है? कैसे बाँधता है? इससे किस तरह मुक्त हो सकते हैं?—इन सबका मैं विवेचन करूँगा, जिसको जानकर उस रीतिसे कर्म करनेपर वे बाँधनेवाले न हो सकेंगे।

यदि मनुष्यमें ममता, आसक्ति और फलेच्छा है, तो कर्म न करते हुए भी वास्तवमें कर्म ही हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे लिप्तता है। परन्तु यदि ममता, आसक्ति और फलेच्छा नहीं है, तो कर्म करते हुए भी कर्म नहीं हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे निलिप्तता है। तात्पर्य यह है कि यदि कर्ता निलिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना—दोनों ही अकर्म हैं और यदि कर्ता लिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना—दोनों ही कर्म हैं और बाँधनेवाले हैं।

'किमकर्मैति' —भगवान्ने कर्मके दो भेद बताये हैं—कर्म और अकर्म। कर्मसे जीव बाँधता है और अकर्मसे (दूसरोंके लिये कर्म करनेसे) मुक्त हो जाता है।

कर्मोंका त्याग करना अकर्म नहीं है। भगवान्ने मोहपूर्वक किये गये कर्मोंके त्यागको 'तामस' बताया है (गीता—अठारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। शारीरिक कष्टके भयसे किये गये कर्मोंके त्यागको 'राजस' बताया गया है (गीता—अठारहवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)। तामस और राजस त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग होनेपर भी कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता। कर्मोंमें फलेच्छा और आसक्तिका त्याग 'सात्त्विक' है (गीता—अठारहवें अध्यायका नवाँ श्लोक)। सात्त्विक त्यागमें स्वरूपसे कर्म करना भी वास्तवमें अकर्म है; क्योंकि सात्त्विक त्यागमें कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अतः कर्म करते हुए

भी उससे निलिप्त रहना वास्तवमें अकर्म है।

शास्त्रोंके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् भी अकर्म क्या है—इस विषयमें मोहित हो जाते हैं। अतः कर्म करने अथवा न करने—दोनों ही अवस्थाओंमें जिससे जीव बाँधे नहीं, उस तत्त्वको समझनेसे ही कर्म क्या है और अकर्म क्या है—यह बात समझमें आयेगी। अर्जुन युद्धरूप कर्म न करनेको कल्याणकारक समझते हैं। इसलिये भगवान् मानो यह कहते हैं कि युद्धरूप कर्मका त्याग करनेमात्रसे तेरी अकर्म-अवस्था (बन्धनसे मुक्ति) नहीं होगी (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक), प्रत्यतु युद्ध करते हुए भी तू अकर्म-अवस्थाको प्राप्त कर सकता है (गीता—दूसरे अध्यायका अङ्गीतीसवाँ श्लोक); अतः अकर्म क्या है—इस तत्त्वको तू समझ।

निलिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा कर्म करते हुए निलिप्त रहना—यही वास्तवमें अकर्म-अवस्था है।

'कवयोऽप्यत्र मोहिताः' —साधारण मनुष्योंमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि वे कर्म और अकर्मका तात्त्विक निर्णय कर सकें। शास्त्रोंके ज्ञाता बड़े-बड़े विद्वान् भी इस विषयमें भूल कर जाते हैं। कर्म और अकर्मका तत्त्व जाननेमें उनकी बुद्धि भी चकरा जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि इनका तत्त्व या तो कर्मयोगसे सिद्ध हुए अनुभवी तत्त्वज्ञ महापुरुष जानते हैं अथवा भगवान् जानते हैं।

'तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि' —जीव कर्मोंसे बाँध है तो कर्मोंसे ही मुक्त होगा। यहाँ भगवान् प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं वह कर्म-तत्त्व भलीभाँति कहूँगा, जिससे कर्म करते हुए भी वे बन्धनकारक न हों। तात्पर्य यह है कि कर्म करनेकी वह विद्या बताऊँगा, जिससे तू कर्म करते हुए भी जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जायगा।

कर्म करनेके दो मार्ग हैं—प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग। प्रवृत्तिमार्गको 'कर्म करना' कहते हैं और निवृत्तिमार्गको 'कर्म न करना' कहते हैं। ये दोनों ही मार्ग बाँधनेवाले नहीं हैं। बाँधनेवाली तो कामना, ममता, आसक्ति है, चाहे यह प्रवृत्तिमार्गमें हो, चाहे निवृत्तिमार्गमें हो। यदि कामना, ममता, आसक्ति न हो तो मनुष्य प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग—दोनोंमें स्वतः मुक्त है। इस बातको समझना ही कर्म-तत्त्वको समझना है।

दूसरे अध्यायके पचासवें श्लोकमें भगवान्ने 'योगः कर्मसु कौशलम्' 'कर्मोंमें योग ही कुशलता है'—ऐसा कहकर कर्म-तत्त्व बताया है। तात्पर्य है कि कर्म-बन्धनसे

३२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

छूटनेका वास्तविक उपाय ‘योग’ अर्थात् समता ही है। परन्तु अर्जुन इस तत्त्वको पकड़ नहीं सके, इसलिये भगवान् इस तत्त्वको पुनः समझानेकी प्रतिज्ञा कर रहे हैं।

विशेष बात

कर्मयोग कर्म नहीं है, प्रत्युत सेवा है। सेवामें त्यागकी मुख्यता होती है। सेवा और त्याग—ये दोनों ही कर्म नहीं हैं। इन दोनोंमें विवेककी ही प्रधानता है।

हमारे पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। मिली हुई वस्तुको अपनी माननेका हमें अधिकार नहीं है। संसारसे मिली वस्तुको संसारकी ही सेवामें लगानेका हमें अधिकार है। जो वस्तु वास्तवमें अपनी है, उस—(स्वरूप या परमात्मा—) का त्याग कभी हो ही नहीं सकता और जो वस्तु अपनी नहीं है, उस—(शरीर या संसार—) का त्याग स्वतःसिद्ध है। अतः त्याग उसीका होता है जो अपना नहीं है, पर जिसे भूलसे अपना मान लिया है अर्थात् अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग होता है। इस प्रकार जो वस्तु अपनी है ही नहीं, उसे अपना न मानना त्याग कैसे ? यह तो विवेक है।

कर्म-सामग्री (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि) अपनी और अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत दूसरोंकी और दूसरोंके लिये ही हैं। इसका सम्बन्ध संसारके साथ है। स्वयंके साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि स्वयं नित्य-निरन्तर निर्विकाररूपसे एकरस रहता है, पर कर्म-सामग्री पहले अपने पास नहीं थी, बादमें भी अपने पास नहीं रहेगी और अब भी निरन्तर बिछुड़ रही है। इसलिये इसके द्वारा जो भी कर्म किया जाय, वह दूसरोंके लिये ही होता है, अपने लिये नहीं। इसमें एक मार्मिक बात है कि कर्म-सामग्रीके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता; जैसे—कितना ही बड़ा लेखक क्यों न हो, स्याही, कलम और कागजके बिना वह कुछ भी नहीं लिख सकता। अतः जब कर्म-सामग्रीके बिना कुछ किया नहीं जा सकता, तब यह विधान मानना ही पड़ेगा कि अपने लिये कुछ करना नहीं है। कारण कि कर्म-सामग्रीका सम्बन्ध संसारके साथ है, अपने साथ नहीं। इसलिये कर्म-सामग्री और कर्म सदा दूसरोंके हितके लिये ही होते हैं, जिसे सेवा कहते हैं। दूसरोंकी ही वस्तु दूसरोंको मिल गयी तो यह सेवा कैसे ? यह तो विवेक है।

इस प्रकार त्याग और सेवा—ये दोनों ही कर्मसाध्य नहीं हैं, प्रत्युत विवेकसाध्य हैं। मिली हुई वस्तु अपनी नहीं है, दूसरोंकी और दूसरोंकी सेवामें लगानेके लिये ही है—यह विवेक है। इसलिये मूलतः कर्मयोग कर्म नहीं है, प्रत्युत विवेक है।

विवेक किसी कर्मका फल नहीं है, प्रत्युत प्राणिमात्रको अनादिकालसे स्वतः प्राप्त है। यदि विवेक किसी शुभ कर्मका फल होता तो विवेकके बिना उस शुभ कर्मको कौन करता ? क्योंकि विवेकके द्वारा ही मनुष्य शुभ और अशुभ कर्मके भेदको जानता है तथा अशुभ कर्मका त्याग करके शुभ कर्मका आचरण करता है। अतः विवेक शुभ कर्मोंका कारण है, कार्य नहीं। यह विवेक स्वतःसिद्ध है, इसलिये कर्मयोग भी स्वतःसिद्ध है अर्थात् कर्मयोगमें परिश्रम नहीं है। इसी प्रकार ज्ञानयोगमें अपना असंग स्वरूप स्वतःसिद्ध है और भक्ति-योगमें भगवान्के साथ अपना सम्बन्ध स्वतःसिद्ध है।

‘यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’—जीव स्वयं शुभ है और परिवर्तनशील संसार अशुभ है। जीव स्वयं परमात्माका नित्य अंश होते हुए भी परमात्मासे विमुख होकर अनित्य संसारमें फँस गया है। भगवान् कहते हैं कि मैं उस कर्म-तत्त्वका वर्णन करूँगा, जिसे जानकर कर्म करनेसे तू अशुभसे अर्थात् जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जायगा।

[ इस श्लोकमें कर्मोंको जाननेका जो प्रकरण आरम्भ हुआ है, उसका उपसंहार बत्तीसवें श्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे’ पदोंसे किया गया है। ]

मार्मिक बात

कर्मयोगका तात्पर्य है—‘कर्म’ संसारके लिये और ‘योग’ अपने लिये। कर्मके दो अर्थ होते हैं—करना और न करना। कर्म करना और न करना—ये दोनों प्राकृत अवस्थाएँ हैं। इन दोनों ही अवस्थाओंमें अहंता रहती है। कर्म करनेमें ‘कार्य’-रूपसे अहंता रहती है, और कर्म न करनेमें ‘कारण’ रूपसे। जबतक अहंता है तबतक संसारसे सम्बन्ध है और जबतक संसारसे सम्बन्ध है, तबतक अहंता है। परन्तु ‘योग’ दोनों अवस्थाओंसे अतीत है। उस योगका अनुभव करनेके लिये अहंतासे रहित होना आवश्यक है। अहंतासे रहित होनेका उपाय है—कर्म करते हुए अथवा न करते हुए योगमें स्थित रहना और योगमें स्थित रहते हुए

श्लोक १७]

  • साधक-संजीवनी *

३१३

कर्म करना अथवा न करना। तात्पर्य है कि कर्म करने

अथवा न करने-दोनों अवस्थाओंमें निर्लिप्त रहे-

'योगस्थ: कुरु कर्माणि' (गीता २। ४८)।

कर्म करनेसे संसारमें और कर्म न करनेसे परमात्मामें

प्रवृत्ति होती है-ऐसा मानते हुए संसारसे निवृत्त होकर

एकान्तमें ध्यान और समाधि लगाना भी कर्म करना ही है।

एकान्तमें ध्यान और समाधि लगानेसे तत्त्वका साक्षात्कार

होगा-इस प्रकार भविष्यमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके

भाव भी कर्मका सूक्ष्म रूप है। कारण कि करनेके

आधारपर ही भविष्यमें तत्त्वप्राप्तिकी आशा होती है। परन्तु

परमात्मतत्त्व करने और न करने-दोनोंसे अतीत है।

भगवान् कहते हैं कि मैं वह कर्म-तत्त्व कहूँगा जिसे

जाननेसे तत्काल परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। इसके

लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि परमात्मतत्त्व

सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, शरीर, इन्द्रियाँ, मन,

बुद्धि, प्राण आदिमें समानरूपसे परिपूर्ण है। मनुष्य

अपनेको जहाँ मानता है, परमात्मा वहीं हैं। कर्म करते समय

अथवा न करते समय-दोनों अवस्थाओंमें परमात्मतत्त्वका

हमारे साथ सम्बन्ध ज्यों-का-त्यों रहता है। केवल

प्रकृतिजन्य क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध माननेके कारण ही

उसकी अनुभूति नहीं हो रही है।

अहंतापूर्वक किया हुआ साधन और साधनका

अभिमान जबतक रहता है, तबतक अहंता मिटती नहीं,

प्रत्युत दृढ़ होती है, चाहे वह अहंता स्थूलरूपसे (कर्म

करनेके साथ) रहे अथवा सूक्ष्मरूपसे (कर्म न करनेके

साथ) रहे।

'मैं करता हूँ'-इसमें जैसी अहंता है, ऐसी ही अहंता

'मैं नहीं करता हूँ'-इसमें भी है। अपने लिये कुछ न

करने अर्थात् कर्ममात्र संसारके हितके लिये करनेसे

अहंता संसारमें विलीन हो जाती है।

सम्बन्ध-अब भगवान् कर्मोंके तत्त्वको जाननेकी प्रेरणा करते हैं।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ॥ १७ ॥

कर्मण: = कर्मोंका (तत्त्व) | बोद्धव्यम् = जानना चाहिये | कर्मण: = कर्मोंकी

अपि = भी | च = तथा | गति: = गति

बोद्धव्यम् = जानना चाहिये | विकर्मण: = विकर्मका (तत्त्व भी) | गहना = गहन है अर्थात्

च = और | बोद्धव्यम् = जानना चाहिये; | समझनेमें बड़ी

अकर्मण: = अकर्मका (तत्त्व भी) | हि = क्योंकि | कठिन है।

व्याख्या-'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्'-कर्म करते हुए

निर्लिप्त रहना ही कर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन

आगे अठारहवें श्लोकमें 'कर्मण्यकर्म य: पश्येत्' पदोंसे

किया गया है।

कर्म स्वरूपसे एक दीखनेपर भी अन्तःकरणके

भावके अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं-कर्म, अकर्म

और विकर्म। सकामभावसे की गयी शास्त्रविहित क्रिया

'कर्म' बन जाती है। फलेच्छा, ममता और आसक्तिसे

रहित होकर केवल दूसरोंके हितके लिये किया गया कर्म

'अकर्म' बन जाता है। विहित कर्म भी यदि दूसरेका अहित

करने अथवा उसे दुःख पहुँचानेके भावसे किया गया हो

तो वह भी 'विकर्म' बन जाता है। निषिद्ध कर्म तो

'विकर्म' है ही।

'अकर्मणश्च बोद्धव्यम्'-निर्लिप्त रहते हुए कर्म

करना ही अकर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन आगे

अठारहवें श्लोकमें 'अकर्मणि च कर्म य:' पदोंसे किया

गया है।

'बोद्धव्यं च विकर्मण:'-कामनासे कर्म होते हैं।

जब कामना अधिक बढ़ जाती है, तब विकर्म (पापकर्म)

होते हैं।

दूसरे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया

है कि अगर युद्ध-जैसा हिंसायुक्त घोर कर्म भी शास्त्रकी

आज्ञासे और समतापूर्वक (जय-पराजय, लाभ-हानि और

सुख-दु:खको समान समझकर) किया जाय, तो उससे

पाप नहीं लगता। तात्पर्य यह है कि समतापूर्वक कर्म

करनेसे दीखनेमें विकर्म होता हुआ भी वह 'अकर्म' हो

जाता है।

शास्त्रनिषिद्ध कर्मका नाम 'विकर्म' है। विकर्मके होनेमें

३१४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

कामना ही हेतु है (गीता—तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सौतीसवाँ श्लोक)*। अतः विकर्मका तत्त्व है—कामना; और विकर्मके तत्त्वको जानना है—विकर्मका स्वरूपसे त्याग करना तथा उसके कारण कामनाका त्याग करना।

‘गहना कर्मणो गतिः’ —कौन-सा कर्म मुक्त करने-वाला और कौन-सा कर्म बाँधनेवाला है—इसका निर्णय करना बड़ा कठिन है। कर्म क्या है, अकर्म क्या है और विकर्म क्या है—इसका यथार्थ तत्त्व जाननेमें बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ विद्वान् भी अपने-आपको असमर्थ पाते हैं। अर्जुन भी इस तत्त्वको न जाननेके कारण अपने युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको घोर कर्म मान रहे हैं। अतः कर्मकी गति (ज्ञान या तत्त्व) बहुत गहन है।

शंका —इस (सत्रहवें) श्लोकमें भगवान्ने ‘बोद्धव्यं च विकर्मणः’ पदोंसे यह कहा कि विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये। परन्तु उन्नीसवें-से-तेईसवें श्लोकतकके प्रकरणमें भगवान्ने ‘विकर्म’ के विषयमें कुछ कहा ही नहीं! फिर केवल इस श्लोकमें ही विकर्मकी बात क्यों कही? समाधान —उन्नीसवें श्लोकसे लेकर तेईसवें श्लोकतकके प्रकरणमें भगवान्ने मुख्यरूपसे ‘कर्ममें अकर्म’ की बात कही है, जिससे सब कर्म अकर्म हो जायें अर्थात् कर्म करते हुए भी बन्धन न हो। विकर्म कर्मके बहुत पास पड़ता

परिशिष्ट भाव —हमारे लिये और दूसरोंके लिये, अभी और परिणामोंमें किस कर्मका क्या फल होता है, यह समझना बड़ा कठिन है। किसी कर्मको करनेमें मनुष्य अपना हित समझता है, पर हो जाता है अहित! वह लाभके लिये करता है पर हो जाता है नुकसान! वह सुखके लिये करता है, पर मिलता है दुःख! कारण कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छा (सुखासक्ति) रहनेके कारण मनुष्य कर्मोंकी गतिको नहीं समझ सकता।

सम्बन्ध—अब भगवान् कर्मोंके तत्त्वको जाननेवाले मनुष्यकी प्रशंसा करते हैं।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥

यः= जो मनुष्यअकर्मणि= अकर्ममेंसः= वह
कर्मणि= कर्ममेंकर्म= कर्म (देखता है),युक्तः= योगी है (और)
अकर्म= अकर्मसः= वहकृत्स्नकर्मकृत्= सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला
पश्येत्= देखता हैमनुष्येषु= मनुष्योंमें(कृतकृत्य) है।
= औरबुद्धिमान्= बुद्धिमान् है,
यः= जो
  • सोलहवें अध्यायमें जहाँ आसुरी-सम्पत्तिका वर्णन हुआ है, वहाँ आठवें श्लोकसे तेईसवें श्लोकतक ‘काम’ शब्द कुल नौ बार आया है। इससे सिद्ध होता है कि ‘काम’ अर्थात् कामना ही सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्ति-(विकर्म-) का कारण है।

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

३१५

व्याख्या—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येत्’— कर्ममें अकर्म देखनेका तात्पर्य है—कर्म करते हुए अथवा न करते हुए उससे निर्लिप्त रहना अर्थात् अपने लिये कोई भी प्रवृत्ति या निवृत्ति न करना। अमुक कर्म मैं करता हूँ, इस कर्मका अमुक फल मुझे मिले—ऐसा भाव रखकर कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मसे बँधता है। प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है, इसलिये उसका फल भी आरम्भ और अन्त होनेवाला होता है। परन्तु जीव स्वयं नित्य-निरन्तर रहता है। इस प्रकार यद्यपि जीव स्वयं परिवर्तनशील कर्म और उसके फलसे सर्वथा सम्बन्धरहित है, फिर भी वह फलकी इच्छाके कारण उनसे बँध जाता है। इसीलिये चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मेरेको कर्म नहीं बाँधते; क्योंकि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है। फलकी स्पृहा या इच्छा ही बाँधनेवाली है—‘फले सत्को निबध्यते ’ (गीता ५।१२)।

फलकी इच्छा न रखनेसे नया राग उत्पन्न नहीं होता और दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे पुराना राग नष्ट हो जाता है। इस प्रकार रागरूप बन्धन न रहनेसे साधक सर्वथा वीतराग हो जाता है। वीतराग होनेसे सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।

जीवका जन्म कर्मके अनुबन्धसे होता है। जैसे, जिस परिवारमें जन्म लिया है, उस परिवारके लोगोंसे ऋणानुबन्ध है अर्थात् किसीका ऋण चुकाना है और किसीसे ऋण वसूल करना है। कारण कि अनेक जन्मोंमें अनेक लोगोंसे लिया है और अनेक लोगोंको दिया है। यह लेन-देनका व्यवहार अनेक जन्मोंसे चला आ रहा है। इसको बंद किये बिना जन्म-मरणसे छुटकारा नहीं मिल सकता। इसको बंद करकेका उपाय है—आगेसे लेना बंद कर दें अर्थात् अपने अधिकारका त्याग कर दें और हमारेपर जिनका अधिकार है, उनकी सेवा करनी आरम्भ कर दें। इस प्रकार नया ऋण लेँ नहीं और पुराना ऋण (दूसरोंके लिये कर्म करके) चुका दें, तो ऋणानुबन्ध (लेन-देनका व्यवहार) समाप्त हो जायगा अर्थात् जन्म-मरण बंद हो जायगा (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। जैसे, कोई दूकानदार अपनी दूकान उठाना चाहता है, तो वह दो काम करेगा—पहला, जिसको देना है, उसको दे देगा और दूसरा, जिससे लेना है, वह ले लेगा अथवा छोड़ देगा। ऐसा करनेसे उसकी दूकान उठ जायगी। अगर वह यह विचार रखेगा कि जो लेना है, वह सब-का-सब ले लूँ, तो दूकान उठेगी नहीं।

कारण कि जबतक वह लेनेकी इच्छासे वस्तुएँ देता रहेगा, तबतक दूकान चलती ही रहेगी, उठेगी नहीं।

अपने लिये कुछ भी न करने और न चाहनेसे असंगता स्वतः प्राप्त हो जाती है। कारण कि करण (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण) और उपकरण (कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री) संसारके हैं और संसारकी सेवामें लगानेके लिये ही मिले हैं, अपने लिये नहीं। इसलिये सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म (सेवा, भजन, जप, ध्यान, समाधि भी) केवल संसारके हितके लिये ही करनेसे कर्मका प्रवाह संसारकी ओर चला जाता है और साधक स्वयं असंग, निर्लिप्त रह जाता है। यही कर्ममें अकर्म देखना है।

जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है, तबतक कर्म करना अथवा न करना—दोनों ही ‘कर्म’ हैं। इसलिये कर्म करने अथवा न करने—दोनों ही अवस्थाओंमें कर्मयोगीको निर्लिप्त रहना चाहिये। कर्म करनेमें निर्लिप्त रहनेका तात्पर्य है—कर्म करनेसे हमें अच्छा फल मिलेगा, हमें लाभ होगा, हमारी सिद्धि होगी, लोग हमें अच्छा मानेंगे, इस लोकमें और परलोकमें भोग मिलेंगे—इस प्रकारकी किसी भी इच्छाका न होना। ऐसे ही कर्म न करनेमें निर्लिप्त रहनेका तात्पर्य है—कर्मका त्याग करनेसे हमें मान, आदर, भोग, शरीरका आराम आदि मिलेंगे—इस प्रकारकी किंचिन्मात्र भी इच्छाका न होना।

दुःख समझकर एवं शारीरिक क्लेशके भयसे कर्म न करना राजस त्याग है और मोह, आलस्य, प्रमादके कारण कर्म न करना तामस त्याग है। ये दोनों ही त्याग सर्वथा त्याज्य हैं। इसके सिवाय कर्म न करना यदि अपनी विलक्षण स्थितिके लिये है, समाधिका सुख भोगनेके लिये है, जीवनमुक्तिका आनन्द लेनेके लिये है तो इस त्यागसे भी प्रकृतिका सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता। कारण कि जबतक कर्म न करनेसे सम्बन्ध है, तबतक प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहता है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर कर्मयोगी कर्म करने और न करने—इन दोनों अवस्थाओंमें ज्यों-का-त्यों निर्लिप्त रहता है।

‘अकर्मणि च कर्म यः’— अकर्ममें कर्म देखनेका तात्पर्य है—निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा न करना। भाव है कि कर्म करते समय अथवा न करते समय भी नित्य-निरन्तर निर्लिप्त रहे।

संसारमें कोई कार्य करनेके लिये प्रवृत्त होता है तो उसके सामने प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना)—

३१६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

दोनों आती हैं। किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु कर्मयोगीकी प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों निलिप्ततापूर्वक और केवल संसारके हितके लिये होती हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति— दोनोंसे ही उसका कोई प्रयोजन नहीं होता—‘नैव तस्य कृतेनार्थां नाकृतेनेह कश्चन’ (गीता ३।१८)। यदि प्रयोजन होता है तो वह कर्मयोगी नहीं है, प्रत्युत कर्म है।

साधक जबतक प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह कर्म करनेसे अपनी सांसारिक उन्नति मानता है और कर्म न करनेसे अपनी पारमार्थिक उन्नति मानता है। परन्तु वास्तवमें प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों ही प्रवृत्ति हैं; क्योंकि दोनोंमें ही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है। जैसे चलना-फिरना, खाना-पीना आदि स्थूल-शरीरकी क्रियाएँ हैं, ऐसे ही एकात्ममें बैठे रहना, चिन्तन करना, ध्यान लगाना सूक्ष्म-शरीरकी क्रियाएँ और समाधि लगाना कारण-शरीरकी क्रियाएँ हैं। इसलिये निलिप्त रहते हुए ही लोकसंग्रहार्थ कर्तव्य-कर्म करना है। यही अकर्ममें कर्म है। इसीको दूसरे अध्यायके अङ्गतालीसवें श्लोकमें ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (योग अर्थात् समतामें स्थित होकर कर्म कर) पदोंसे कहा गया है।

सांसारिक प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों ‘कर्म’ हैं। प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करते हुए निलिप्त रहना और निलिप्त रहते हुए ही प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करना—इस प्रकार प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंमें सर्वथा निलिप्त रहना ‘योग’ है। इसीको कर्मयोग कहते हैं।

शंका—कर्म करते हुए अथवा न करते हुए निलिप्त रहना और निलिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा न करना—इन दोनोंमें ‘अकर्म’ अर्थात् एक निलिप्तता ही मुख्य हुई; फिर भगवान्ने कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—ये दो बातें क्यों कही हैं?

समाधान—कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—इन दोनोंमें एक निलिप्तता सार होते हुए भी पहले-(कर्ममें अकर्म-में) कर्म करते हुए अथवा न करते हुए—दोनों अवस्थाओंमें रहनेवाली निलिप्तताकी मुख्यता है और दूसरे-(अकर्ममें कर्म-में) निलिप्त रहते हुए कर्म करने अथवा न करनेकी मुख्यता है। तात्पर्य है कि निलिप्तता अपने लिये और कर्म संसारके लिये है; क्योंकि निलिप्तताका सम्बन्ध ‘स्व’-(स्वरूप-के) साथ और कर्म करने अथवा न करनेका सम्बन्ध ‘पर’-(शरीर, संसार-के) साथ है।

इसलिये निलिप्तता स्वधर्म और कर्म करना अथवा न करना परधर्म है। इन दोनोंका विभाग सर्वथा अलग-अलग बतानेके लिये ही भगवान्ने उपर्युक्त दो बातें कही हैं।

कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—ये दोनों बातें कर्मयोगकी हैं, जिनका तात्पर्य यह है कि प्रकृतिसे तो सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय अर्थात् करने अथवा न करनेसे अपना कोई प्रयोजन न रहे और लोकसंग्रहके लिये कर्मोंको करना अथवा न करना हो। कारण कि कर्म करते हुए निलिप्त रहना और निलिप्त रहते हुए भी दूसरोंके हितके लिये कर्म करना—ये दोनों ही गीताके सिद्धान्त हैं।

प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना)—दोनों प्रकृतिके राज्यमें ही हैं। प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है, इसलिये प्रवृत्तिका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा निवृत्तिका भी आरम्भ और अन्त होता है। परन्तु इनसे सर्वथा अतीत परमनिवृत्ततत्त्व—अपने स्वरूपका आदि और अन्त नहीं होता। वह प्रवृत्ति और निवृत्तिके आरम्भमें भी रहता है और उनके अन्तमें भी रहता है तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति-कालमें भी ज्यों-का-त्यों रहता है। वह प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनोंका प्रकाशक और आधार है। इसलिये उसमें न प्रवृत्ति है और न निवृत्ति है—इस तत्त्वको समझनेके लिये और उसमें स्थित होकर लोक-संग्रहार्थ-(यज्ञार्थ- ) कर्म करनेके लिये यहाँ कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म—ये दो बातें कही गयी हैं।

‘स बुद्धिमान्मनुष्येषु’—‘जो पुरुष कर्ममें अकर्म देखता है और अकर्ममें कर्म देखता है अर्थात् नित्य-निरन्तर निलिप्त रहता है, वही वास्तवमें कर्म-तत्त्वको जाननेवाला है। जबतक वह निलिप्त नहीं हुआ है अर्थात् कर्म और पदार्थको अपना और अपने लिये मानता है, तबतक उसने कर्म-तत्त्वको समझा ही नहीं है।

परमात्माको जाननेके लिये स्वयंको परमात्मासे अभिन्नताका अनुभव करना होता है और संसारको जाननेके लिये स्वयंको संसार-(क्रिया और पदार्थ- ) से सर्वथा भिन्नताका अनुभव करना होता है। कारण कि वास्तवमें हम (स्वरूपसे) परमात्मासे अभिन्न और संसारसे भिन्न हैं। इसलिये कर्मोंसे अलग होकर अर्थात् निलिप्त होकर ही कर्म-तत्त्वको जान सकते हैं। कर्म आदि-अन्तवाले हैं और मैं (स्वयं जीव) नित्य रहनेवाला हूँ; अतः मैं स्वरूपसे कर्मोंसे अलग (निलिप्त) हूँ—इस वास्तविकताका अनुभव करना ही ‘जानना’ है। वास्तविकताकी तहमें बैठे बिना

श्लोक ११]

  • साधक-संजीवनी *

३१७

जानना हो ही कैसे सकता है?

जैसे काजलकी कोठरीमें प्रवेश करके भी काजलसे सर्वथा निलिप्त रहना साधारण बुद्धिमान्का काम नहीं है, ऐसे ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निलिप्त रहना साधारण बुद्धिमान्के वशका काम नहीं है। इसलिये भगवान् ऐसे कर्मयोगीको मनुष्योंमें बुद्धिमान् कहते हैं। अठारहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी भगवान्ने उसे 'मेधावी' (बुद्धिमान्) कहा है।

अभी सत्रहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्म, अकर्म और विकर्म—तीनोंका तत्त्व समझनेके लिये कहा था। यहाँ 'मनुष्येषु बुद्धिमान्' पद देकर भगवान् मानो यह बताते हैं कि जिसने कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मके तत्त्वको जान लिया है, उसने सब कुछ जान लिया है अर्थात् वह ज्ञात-ज्ञातव्य हो गया है।

'स युक्तः'—कर्मयोगी सिद्धि-असिद्धिमें सम रहता है। कर्मका फल मिले या न मिले, उसमें कभी विषमता नहीं आती; क्योंकि उसने फलेच्छाका सर्वथा त्याग कर दिया है। समताका नाम योग है। वह नित्य-निरन्तर समतामें स्थित है, इसलिये वह योगी है।

प्राणिमात्रका परमात्मासे स्वतःसिद्ध नित्ययोग है। परन्तु मनुष्यने संसारसे अपना सम्बन्ध मान लिया, इसीसे वह उस नित्ययोगको भूल गया। तात्पर्य यह कि जड़के साथ अपना सम्बन्ध मानना ही परमात्माके साथ अपने नित्य सम्बन्धको

परिशिष्ट भाव —एक विभाग कर्मका है और एक इसलिये जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है अर्थात् कर्म करते हुए निलिप्त रहता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है अर्थात् निलिप्त रहते हुए कर्म करता है, उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता। जैसे किसी कर्मके आरम्भमें तो गणेशजीका पूजन करते हैं, पर कर्म करते समय हरदम उनका पूजन नहीं करते, ऐसे ही कोई यह न समझ ले कि कर्मके आरम्भमें एक बार निलिप्त हो गये तो अब उस निलिप्तताको हरदम नहीं रखना है, इसलिये भगवान्ने यहाँ उपर्युक्त दो बातें कही हैं। तात्पर्य है कि अपनेमें कभी भी लिप्तता (फलेच्छा और कर्तृत्वाभिमान) नहीं आनी चाहिये अर्थात् हरदम निलिप्त रहना चाहिये।

तीसरे अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है—'कर्म ज्ञायो ह्यकर्मणः' और यहाँ बताते हैं कि कर्म करनेकी अपेक्षा भी अकर्म (अकर्तृत्व)-को देखना श्रेष्ठ है और ऐसा देखनेवाले मनुष्यके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्यमें फलेच्छा और कर्तृत्वाभिमान नहीं रहने चाहिये; क्योंकि इन दोनोंसे ही मनुष्य बँधता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाले अर्थात् कर्मोंका तत्त्व जाननेवाले सिद्ध कर्मयोगी महापुरुषका वर्णन करते हैं।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणां तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ ११ ॥

भूलना है। कर्मयोगी फलेच्छा, ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल दूसरोंके लिये ही कर्तव्य-कर्म करता है, जिससे उसका जड़से माना हुआ सम्बन्ध टूट जाता है और उसे परमात्मासे स्वतःसिद्ध नित्ययोगकी अनुभूति हो जाती है। इसलिये उसे योगी कहा गया है।

'युक्तः' पदमें यह भाव है कि उसने प्राप्त करनेयोग्य तत्त्वको प्राप्त कर लिया है अर्थात् वह प्राप्त-प्राप्तव्य हो गया है।

'कृतनकर्मकृत'—जबतक कुछ 'पाना' शेष रहता है, तबतक 'करना' शेष रहता ही है अर्थात् जबतक कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छा रहती है, तबतक करनेका राग नहीं मिटता।

नाशवान् कर्मोंसे मिलनेवाला फल भी नाशवान् ही होता है। जबतक नाशवान् फलकी इच्छा है, तबतक (कर्म) करना समाप्त नहीं होता। परन्तु जब नाशवान्से सर्वथा सम्बन्ध छूटकर परमात्मप्राप्तिरूप अविनाशी फलकी प्राप्ति हो जाती है, तब (कर्म) करना सदाके लिये समाप्त हो जाता है और कर्मयोगीका कर्म करने तथा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता। ऐसा कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला है अर्थात् उसके लिये अब कुछ करना शेष नहीं है, वह कृतकृत्य हो गया है।

करना, जानना और पाना शेष नहीं रहनेसे वह कर्मयोगी अशुभ संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है (गीता—चौथे अध्यायका सोलहवाँ और बत्तीसवाँ श्लोक)।

विभाग अकर्मका है। इन दोनोंमें अकर्म ही सार तत्त्व है।

३१८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

यस्य= जिसकेहै (तथा)गये हैं,
सर्वे= सम्पूर्णज्ञानाग्निदग्ध-= जिसके
समारम्भाः= कर्मके आरम्भकर्माण्म्सम्पूर्ण कर्म
कामसङ्कल्प-= संकल्प औरज्ञानरूपी
वर्जिताःकामनासे रहितअग्निसे जल
तम्
= उसको
बुधाः
= ज्ञानिजन (भी)
पण्डितम्
= पण्डित (बुद्धिमान्)
आहुः
= कहते हैं।

व्याख्या— ‘यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्प-वर्जिताः’—विषयोंका बार-बार चिन्तन होनेसे, उनकी बार-बार याद आनेसे उन विषयोंमें ‘ये विषय अच्छे हैं, काममें आनेवाले हैं, जीवनमें उपयोगी हैं और सुख देनेवाले हैं’—ऐसी सम्यग्बुद्धिका होना ‘संकल्प’ है और ‘ये विषय-पदार्थ हमारे लिये अच्छे नहीं हैं, हानिकारक हैं’—ऐसी बुद्धिका होना ‘विकल्प’ है। ऐसे संकल्प और विकल्प बुद्धिमें होते रहते हैं। जब विकल्प मिटकर केवल एक संकल्प रह जाता है, तब ‘ये विषय-पदार्थ हमें मिलने चाहिये, ये हमारे होने चाहिये’—इस तरह अन्तःकरणमें उनको प्राप्त करनेकी जो इच्छा पैदा हो जाती है, उसका नाम ‘काम’ (कामना) है। कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें संकल्प और कामना—दोनों ही नहीं रहते अर्थात् उसमें न तो कामनाओंका कारण संकल्प रहता है और न संकल्पोंका कार्य कामना ही रहती है। अतः उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं, वे सब संकल्प और कामनासे रहित होते हैं।

संकल्प और कामना—ये दोनों कर्मके बीज हैं। संकल्प और कामना न रहनेपर कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् कर्म बाँधनेवाले नहीं होते। सिद्ध महापुरुषमें भी संकल्प और कामना न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते। उसके द्वारा लोकसंग्रहार्थ, कर्तव्यपरम्परासुरक्षार्थ सम्पूर्ण कर्म होते हुए भी वह उन कर्मोंसे स्वतः सर्वथा निरलिप्त रहता है।

भगवान्ने कहींपर संकल्पोंका (छठे अध्यायका चौथा श्लोक), कहींपर कामनाओंका (दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक) और कहींपर संकल्प तथा कामना—दोनोंका

१—जहाँ दोनों पदोंका अर्थ प्रधान होता है, वहाँ ‘द्वन्द्वसमास’ होता है। यहाँ ‘संकल्प’ और ‘काम’ दोनों शब्द अपने-अपने अर्थमें प्रधान हैं। अतः यहाँ ‘संकल्प्याश्च कामाश्च’—ऐसा द्वन्द्वसमास होनेसे ‘संकल्पकामाः’—ऐसा रूप बना। परन्तु द्वन्द्वसमासके जिस पदमें कम स्वर होते हैं, उसका पूर्वप्रयोग होता है। यहाँ भी ‘काम’ शब्दमें कम स्वर होनेसे उसका पूर्वप्रयोग हुआ है; अतः ‘कामसंकल्पाः’—ऐसा रूप बना। अब ‘कामसंकल्पैर्वर्जिताः’—ऐसा तृतीया समास करनेपर पूरा पद ‘कामसंकल्पवर्जिताः’ बना।

२—यहाँ ‘समारम्भाः’ पद सिद्ध कर्मयोगीकी राग-द्वेषरहित सांगोपांग प्रवृत्तिका वाचक है, चौदहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें आये हुए ‘आरम्भ’ पदका वाचक नहीं है। कारण कि वहाँ ‘प्रवृत्ति’ और ‘आरम्भ’—ये दो शब्द आये हैं; अतः वहाँ कर्तव्य-कर्मको करना ‘प्रवृत्ति’ है तथा भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंको शुरु करना ‘आरम्भ’ है।

(छठे अध्यायका चौबीसवाँ-पचीसवाँ श्लोक) त्याग बताया है। अतः जहाँ केवल संकल्पोंका त्याग बताया गया है, वहाँ कामनाओंका और जहाँ केवल कामनाओंका त्याग बताया गया है, वहाँ संकल्पोंका त्याग भी समझ लेना चाहिये; क्योंकि संकल्प कामनाओंका कारण है और कामना संकल्पोंका कार्य है। तात्पर्य है कि साधकको सम्पूर्ण संकल्पों और कामनाओंका त्याग कर देना चाहिये।

मोटरकी चार अवस्थाएँ होती हैं—

१—मोटर गैरजमें खड़ी रहनेपर न ईंजन चलता है और न पहिये चलते हैं। २—मोटर चालू करनेपर ईंजन तो चलने लगता है, पर पहिये नहीं चलते। ३—मोटरको वहाँसे रवाना करनेपर ईंजन भी चलता है और पहिये भी चलते हैं। ४—निरापद ढलवाँ मार्ग आनेपर ईंजनको बंद कर देते हैं और पहिये चलते रहते हैं। इसी प्रकार मनुष्यकी भी चार अवस्थाएँ होती हैं—

१—न कामना होती है और न कर्म होता है। २—कामना होती है, पर कर्म नहीं होता। ३—कामना भी होती है और कर्म भी होता है। ४—कामना नहीं होती और कर्म होता है।

मोटरकी सबसे उत्तम (चौथी) अवस्था यह है कि ईंजन न चले और पहिये चलते रहें अर्थात् तेल भी खर्च न हो और रास्ता भी तय हो जाय। इसी तरह मनुष्यकी सबसे उत्तम अवस्था यह है कि कामना न हो और कर्म होते रहें। ऐसी अवस्थावाले मनुष्यको ज्ञानिजन भी पण्डित कहते हैं।

‘समारम्भाः’ —पदका यह भाव है कि कर्मयोगसे सिद्ध

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

३१९

महापुरुषके द्वारा हरेक कर्म सुचारुरूपसे, सांगोपांग और तत्परतापूर्वक होता है। दूसरा एक भाव यह भी है कि उसके कर्म शास्त्रसम्मत होते हैं। उसके द्वारा करनेयोग्य कर्म ही होते हैं। जिससे किसीका अहित होता हो, वह कर्म उससे कभी नहीं होता।

‘सर्वे’ पदका यह भाव है कि उसके द्वारा होनेवाले सब-के-सब कर्म संकल्प और कामनासे रहित होते हैं। कोई-सा भी कर्म संकल्पसहित नहीं होता। प्रातः उठनेसे लेकर रातमें सोनेतक शौच-स्नान, खाना-पीना, पाठ-पूजा, जप-चिन्तन, ध्यान-समाधि आदि शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी सम्पूर्ण कर्म संकल्प और कामनासे रहित ही होते हैं।

‘ज्ञानानिन्द्रधर्करमाणम्’ —कर्मोंका सम्बन्ध ‘पर’- (शरीर-संसार-) के साथ है, ‘स्व’- (स्वरूप-) के साथ नहीं; क्योंकि कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है, पर स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है—इस तत्त्वको ठीक-ठीक जानना ही ‘ज्ञान’ है। इस ज्ञानरूप अगिन्से सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं अर्थात् कर्मोंमें फल देनेकी (बीधनेकी) शक्ति नहीं रहती (गीता—चौथे अध्यायका सोलहवाँ और बत्तीसवाँ श्लोक)।

वास्तवमें शरीर और क्रिया—दोनों संसारसे अभिन्न हैं; पर स्वयं सर्वथा भिन्न होता हुआ भी भूलसे इनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। जब महापुरुषका अपने कहलानेवाले शरीरके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं रहता, तब जैसे संसार-मात्रसे सब कर्म होते हैं, ऐसे ही उसके कहलानेवाले शरीरसे सब कर्म होते हैं। इस प्रकार कर्मोंसे निर्लिप्तताका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके वर्तमान कर्म ही नष्ट नहीं होते, प्रत्युत संचित कर्म भी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। प्रारब्ध-कर्म

भी केवल अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें उसके सामने आकर नष्ट हो जाते हैं; परन्तु फलसे असंग होनेके कारण वह उनका भीष्ता नहीं बनता अर्थात् किञ्चिन्मात्र भी सुखी या दुःखी नहीं होता। इसलिये प्रारब्ध-कर्म भी अस्थायी परिस्थितिमात्र उत्पन्न करके नष्ट हो जाते हैं।

‘तमाहुः पण्डितं बुधाः’ —जो कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके परमात्मामें लगा हुआ है, उस मनुष्यको समझना तो सुगम है, पर जो कर्मोंसे किञ्चिन्मात्र भी लिप्त हुए बिना तत्परतापूर्वक कर्म कर रहा है, उसे समझना कठिन है। सन्तोंकी वाणीमें आया है—

त्यागी शोभा जगतमें करता है सब कोय।

हरिया गृहस्थी संतका भेदी बिरला होय॥

तात्पर्य यह है कि संसारमें (बाहरसे त्याग करनेवाले) त्यागी पुरुषकी महिमा तो सब गाते हैं, पर गृहस्थमें रहकर सब कर्तव्य-कर्म करते हुए भी जो निर्लिप्त रहता है, उस (भीतरका त्याग करनेवाले) पुरुषको समझनेवाला कोई बिरला ही होता है।

जैसे कमलका पत्ता जलमें ही उत्पन्न होकर और जलमें रहते हुए भी जलसे लिप्त नहीं होता, ऐसे ही कर्मयोगी कर्मयोगिन्- (मनुष्यशरीर-) में ही उत्पन्न होकर और कर्ममय जगत्में रहकर कर्म करते हुए भी कर्मोंसे लिप्त नहीं होता१। कर्मोंसे लिप्त न होना कोई साधारण बुद्धिमानीका काम नहीं है। पीछेके अठारहवाँ श्लोकमें भगवान्ने ऐसे कर्मयोगीको ‘मनुष्योंमें बुद्धिमान्’ कहा है और यहाँ कहा है कि उसे ज्ञानजन भी पण्डित अर्थात् बुद्धिमान् कहते हैं। भाव यह है कि ऐसा कर्मयोगी पण्डितोंका भी पण्डित, ज्ञानियोंका भी ज्ञानी है२।

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥

कर्मफलासङ्गम् = (जो) कर्म और फलकी आसक्तिनित्यतृप्तः = सदा तृप्त है,अपि = भी (वास्तवमें)
त्यक्त्वा = त्याग करकेसः = वहकिञ्चित् = कुछ
निराश्रयः = आश्रयसे रहित (और)कर्मणि = कर्मोंमेंएव = भी
अभिप्रवृत्तः = अच्छी तरह = नहीं
लगा हुआकरोति = करता।

१-निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते। प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलदायिनी ॥ (अष्टावक्रगीता १८।६१)

‘मूढ पुरुषकी निवृत्ति भी प्रवृत्तिको उत्पन्न करनेवाली होती है और ज्ञानी पुरुषकी प्रवृत्ति भी निवृत्ति-रूप फलको देनेवाली होती है।’

२-गृहेषु पण्डिताः केचित्केचिन्मूर्खेषु पण्डिताः। सभायां पण्डिताः केचित्केचित्यण्डितपण्डिताः ॥

३२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

व्याख्या —‘त्यक्त्वा कर्मफलसङ्गम्’—जब कर्म करते समय कर्ताका यह भाव रहता है कि शरीरादि कर्म-सामग्री मेरी है, मैं कर्म करता हूँ, कर्म मेरा और मेरे लिये है तथा इसका मेरेको अमुक फल मिलेगा, तब वह कर्मफलका हेतु बन जाता है। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषको प्राकृत पदार्थसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदका अनुभव हो जाता है, इसलिये कर्म करनेकी सामग्रीमें, कर्ममें तथा कर्मफलमें किंचिन्मात्र भी आसक्ति न रहनेके कारण वह कर्मफलका हेतु नहीं बनता।

सेना विजयकी इच्छासे युद्ध करती है। विजय होनेपर विजय सेनाकी नहीं, प्रत्युत राजाकी मानी जाती है; क्योंकि राजाने ही सेनाके जीवन-निर्वाहका प्रबन्ध किया है; उसे युद्ध करनेकी सामग्री दी है और उसे युद्ध करनेकी प्रेरणा की है और सेना भी राजाके लिये ही युद्ध करती है। इसी प्रकार शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कर्म-सामग्रीके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही जीव उनके द्वारा किये गये कर्मके फलका भागी होता है।

कर्म-सामग्रीके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न होनेके कारण महापुरुषका कर्मफलके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। वास्तवमें कर्मफलके साथ स्वरूपका सम्बन्ध है ही नहीं। कारण कि स्वरूप चेतन, अविनाशी और निर्विकार है; परन्तु कर्म और कर्मफल—दोनों जड़ तथा विकारी हैं और उनका आरम्भ तथा अन्त होता है। सदा स्वरूपके साथ न तो कोई कर्म रहता है तथा न कोई फल ही रहता है। इस तरह यद्यपि कर्म और फलसे स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है, तथापि जीवने भूलसे उनके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनका कारण है। अगर यह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाय, तो कर्म और फलसे उसकी स्वतःसिद्ध निलिप्तताका बोध हो जाता है।

‘निराश्रयः’ —‘देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिका किंचिन्मात्र भी आश्रय न लेना ही ‘निराश्रय’ अर्थात् आश्रयसे रहित होना है। कितना ही बड़ा धनी, राजा-महाराजा क्यों न हो, उसको देश, काल आदिका आश्रय लेना ही पड़ता है। परन्तु कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुष देश, काल आदिका कोई आश्रय नहीं मानता। आश्रय मिले या न मिले—इसकी उसे किंचिन्मात्र भी परवाह नहीं होती। इसलिये वह निराश्रय होता है।

‘नित्यतृप्तः’ —‘जीव (आत्मा) परमात्माका सनातन अंश होनेसे सत्-स्वरूप है। सत्का कभी अभाव नहीं

होता—‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। परन्तु जब वह असत्के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब उसे अपनेमें अभाव अर्थात् कमीका अनुभव होने लगता है। उस कमीकी पूर्ति करनेके लिये वह सांसारिक वस्तुओंकी कामना करने लगता है। इच्छित वस्तुओंके मिलनेसे एक तृप्ति होती है; परन्तु वह तृप्ति ठहरती नहीं, वह क्षणिक होती है। कारण कि संसारकी प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदि प्रतिक्षण अभावकी ओर जा रही है; अतः उनके आश्रित रहनेवाली तृप्ति स्थायी कैसे रह सकती है? सत्-वस्तुकी तृप्ति असत् वस्तुसे हो ही कैसे सकती है? अतः जीव जबतक उत्पत्ति-विनाशशील क्रियाओं और पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मानता है तथा उनके आश्रित रहता है, तबतक उसे स्वतःसिद्ध नित्यतृप्तिका अनुभव नहीं होता।

कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुष निराश्रय अर्थात् संसारके आश्रयसे सर्वथा रहित होता है, इसलिये उसे स्वतःसिद्ध नित्यतृप्तिका अनुभव हो जाता है। तीसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें ‘आत्मतृप्तः’ पदसे भी इसी नित्यतृप्तिकी बात आयी है।

‘कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः’ —‘अभिप्रवृत्तः’ पदका तात्पर्य है कि कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषके द्वारा होनेवाले सब कर्म सांगोपांग रीतिसे होते हैं; क्योंकि कर्मफलमें उसकी किंचिन्मात्र भी आसक्ति नहीं होती। उसके सम्पूर्ण कर्म केवल संसारके हितके लिये होते हैं।

जिसकी कर्मफलमें आसक्ति होती है, वह सांगोपांग रीतिसे कर्म नहीं कर सकता, क्योंकि फलके साथ सम्बन्ध होनेसे कर्म करते हुए बीच-बीचमें फलका चिन्तन होनेसे उसकी शक्ति व्यर्थ खर्च हो जाती है, जिससे उसकी शक्ति पूरी तरह कर्म करनेमें नहीं लगती।

‘अपि’ पदका तात्पर्य है कि सांगोपांग रीतिसे सब कर्म करते हुए भी वह वास्तवमें किंचिन्मात्र भी कोई कर्म नहीं करता; क्योंकि सर्वथा निलिप्त होनेके कारण कर्मका स्पर्श ही नहीं होता। उसके सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।

जब वह कुछ भी नहीं करता, तब वह कर्मफलसे बँध ही कैसे सकता है? इसीलिये अठारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्मफलका त्याग करनेवाले कर्मयोगीको कर्मोंका फल कहीं भी नहीं मिलता—‘न तु सन्यासिनां क्वचित्।’

प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है। अतः जबतक प्रकृतिके

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

३२१

गुणों- (क्रिया और पदार्थ-) से सम्बन्ध है, तबतक कर्म न करते हुए भी मनुष्यका कर्मके साथ सम्बन्ध हो जाता है। प्रकृतिके गुणोंसे सम्बन्ध न रहनेपर मनुष्य कर्म करते हुए परिशिष्ट भाव —जबतक मनुष्यमें कर्तृत्व है, तबतक वह करता है तो करता है, नहीं करता है तो करता है। परन्तु कर्तृत्व मिटनेपर वह कभी कुछ नहीं करता।

भी कुछ नहीं करता। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषका प्रकृतिजन्म गुणोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिये वह लोकहितार्थ सब कर्म करते हुए भी वास्तवमें कुछ नहीं करता।

सम्बन्ध—उन्नीसवें-बीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषकी कर्मोंसे निर्लिप्तताका वर्णन करके अब भगवान् इक्कीसवें श्लोकमें निवृत्तिपरायण और बाईसवें श्लोकमें प्रवृत्तिपरायण कर्मयोगके साधककी कर्मोंसे निर्लिप्तताका वर्णन करते हैं।

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।

शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥ २१ ॥

यतचित्तात्मा = जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, त्यक्तसर्वपरिग्रहः = जिसने सब

प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, (ऐसा) निराशीः = इच्छारहित (कर्मयोगी) केवलम् = केवल

शारीरम् = शरीर-सम्बन्धी कर्म = कर्म कुर्वन् = करता हुआ (भी) किल्विषम् = पापको न, आप्नोति = प्राप्त नहीं होता।

व्याख्या—'यतचित्तात्मा' —संसारमें आशा या इच्छा रहनेके कारण ही शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि वशमें नहीं होते। इसी श्लोकमें 'निराशीः ' पदसे बताया है कि कर्मयोगीमें आशा या इच्छा नहीं रहती। अतः उसके शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण स्वतः वशमें रहते हैं। इनके वशमें रहनेसे उसके द्वारा व्यर्थकी कोई क्रिया नहीं होती।

'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' —कर्मयोगी अगर संन्यासी है, तो वह सब प्रकारकी भोग-सामग्रीके संग्रहका स्वरूपसे त्याग कर देता है। अगर वह गृहस्थ है, तो वह भोग-बुद्धिसे (अपने सुखके लिये) किसी भी सामग्रीका संग्रह नहीं करता। उसके पास जो भी सामग्री है उसको वह अपनी और अपने लिये न मानकर संसारकी और संसारके लिये ही मानता है तथा संसारके सुखमें ही उस सामग्रीको लगाता है। भोगबुद्धिसे संग्रहका त्याग करना तो साधकमात्रके लिये आवश्यक है।

[ऐसा निवृत्तिपरक श्लोक गीतामें और कहीं नहीं आया है। छठे अध्यायके दसवें श्लोकमें ध्यानयोगीके लिये और अठारहवें अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें ज्ञानयोगीके लिये परिग्रहका त्याग करनेकी बात आयी है। परन्तु उनसे भी ऊँची श्रेणीके परिग्रह-त्यागकी बात 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः ' पदसे यहाँ आयी है; क्योंकि 'परिग्रह' के साथ 'सर्व' शब्द केवल यहाँ आया है। बारहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें

भक्तियोगीके लिये 'अनिकेतः ' पद आया है, पर वहाँ इसका अर्थ निवास-स्थानमें ममता-आसक्तिसे रहित होना है।]

'निराशीः' —कर्मयोगीमें आशा, कामना, स्पृहा, वासना आदि नहीं रहते। वह बाहरसे ही भोग-सामग्रीके संग्रहका त्याग करता हो—इतनी ही बात नहीं है, प्रत्युत वह भीतरसे भी भोग-सामग्रीकी आशा या इच्छाका त्याग कर देता है। आशा या इच्छाका सर्वथा त्याग न होनेपर भी उसका उद्देश्य इनके त्यागका ही रहता है।

'शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्' —'शारीरम् कर्म ' (शरीर-सम्बन्धी कर्म)—के दो अर्थ होते हैं—एक तो शरीरसे होनेवाला कर्म और दूसरा शरीर-निर्वाहके लिये किया जानेवाला कर्म। शरीरसे होनेवाले कर्मकी बात पाँचवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी आयी है, जिसका तात्पर्य है कि सभी कर्म केवल शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके द्वारा ही हो रहे हैं, मेरा उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, ऐसा मानकर कर्मयोगी अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। परन्तु यहाँ आया श्लोक निवृत्तिपरक है, इसलिये यहाँ उपर्युक्त पदोंका अर्थ शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले आवश्यक कर्म (खान-पान, शौच-स्नान आदि) मानना ही उपयुक्त प्रतीत होता है। निवृत्ति-परायण कर्मयोगी केवल उतने ही कर्म करता है, जितनेसे केवल शरीर-निर्वाह हो जाय।

३२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

‘नाप्नोति किल्विषम्’—जो कर्म करने अथवा न करनेसे अपना किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध रखता है, वह पापको अर्थात् जन्म-मरणरूप बन्धनको प्राप्त होता है। परन्तु आशारहित कर्मयोगी कर्म करने अथवा न करनेसे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता, इसलिये वह पापको प्राप्त नहीं होता अर्थात् उसके सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।

निवृत्तिपरायण होनेपर भी कर्मयोगी कभी आलस्य-प्रमाद नहीं करता। आलस्य-प्रमादका भी भोग होता है। एकात्मनं यों ही पड़े रहनेसे आलस्यका भोग होता है और शास्त्रविरुद्ध तथा निरर्थक कर्म करनेसे प्रमादका भोग होता है। इस प्रकार निवृत्तिमें आलस्यके सुखका और प्रवृत्तिमें प्रमादके सुखका भोग हो सकता है। अतः आलस्य-प्रमादसे मनुष्य पापको प्राप्त होता है। परन्तु बहुत कम कर्म करनेपर भी निवृत्ति-परायण कर्मयोगीमें किञ्चिन्मात्र भी आलस्य-प्रमाद नहीं आते। यदि उसमें किञ्चिन्मात्र भी आलस्य-प्रमाद आते, तो ‘किल्विषम् न आप्नोति’ कहना बनता ही नहीं। वह ‘यत्तचित्तात्मा’ है अर्थात् उसके शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण संयत हैं, इसलिये उसमें आलस्य-प्रमाद आ ही नहीं सकते। शरीर, इन्द्रियाँ तथा अन्तःकरणके वशमें होनेसे, भोग-सामग्रीका त्याग करनेसे तथा आशा, कामना, ममता आदिसे रहित होनेसे उसके द्वारा निषिद्ध क्रिया हो सकती ही नहीं।

यहाँ शंका हो सकती है कि जब उसके द्वारा पाप-क्रिया हो सकती ही नहीं, तब यह क्यों कहा गया कि वह पापको प्राप्त नहीं होता? इसका समाधान यह है कि क्रियामात्रके आरम्भमें अनिवार्य दोष (पाप) पाये जाते हैं—‘सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनानिरिवावृताः’ (गीता १८। ४८)। परन्तु मूलमें असत्के संग—कामना, ममता और आसक्तिसे ही पाप लगते हैं। कर्मयोगीमें कामना, ममता और आसक्ति होती ही नहीं अथवा उसका कामना, ममता और आसक्तिका उद्देश्य ही नहीं होता; इसलिये उसका कर्म करनेसे अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं होता। इसी कारण न तो उसे कर्मोंमें रहनेवाला आनुषंगिक पाप लगता है और न उसे शास्त्रविहित कर्मोंके त्यागका ही पाप लगता है।

दूसरी एक शंका यह हो सकती है कि तीसरे अध्यायमें भगवान्ने सिद्ध महापुरुषको भी (अपने लिये कोई कर्तव्य शेष न रहनेपर भी) लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेकी प्रेरणा की है (तीसरे अध्यायका पचीसवाँ-

छब्बीसवाँ श्लोक)। अपने लिये भी भगवान्ने कहा है कि त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य और प्राप्त्य न होनेपर भी मैं सावधानीपूर्वक कर्म करता हूँ (तीसरे अध्यायके बाईसवेंसे चौबीसवें श्लोकतक)। अतः शरीर-निर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाले कर्मयोगीको क्या लोकसंग्रहके त्यागका दोष नहीं लगेगा? इसका समाधान यह है कि कामना, ममता आदि न रहनेके कारण उसे कोई दोष नहीं लगता। यद्यपि सिद्ध महापुरुषमें और भगवान्में कामना, ममता आदिका सर्वथा अभाव होता है, तथापि वे जो लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हैं, यह उनकी दया, कृपा ही है। वास्तवमें वे लोकसंग्रह करें अथवा न करें, इसमें वे स्वतन्त्र हैं, इसकी उनपर कोई जिम्मेवारी नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। वास्तवमें यह भी निवृत्तिपरायण साधकोंके लिये एक लोकसंग्रह ही है। लोकसंग्रह किया नहीं जाता, प्रत्युत होता है।

तीसरी एक शंका यह भी हो सकती है कि तीसरे अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने केवल अपने शरीरका पोषण करनेवाले मनुष्यको पापी कहा है और यहाँ कहते हैं कि शरीर-निर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाला पापको नहीं प्राप्त होता। दोनोंका सामंजस्य कैसे हो? इसका समाधान यह है कि जबतक भोगबुद्धि है और कर्मा तथा पदार्थोंमें आसक्ति बनी हुई है, तबतक कर्म करने अथवा न करनेसे पाप लगता ही है, इसीलिये वहाँ ‘पचन्ति आत्मकारणात्’ पद आये हैं। परन्तु उस कर्मयोगीमें भोगबुद्धि नहीं है और कर्मा तथा पदार्थोंमें आसक्ति भी नहीं है; अतः सर्वथा निलिप्त होनेसे उसे कर्म करने अथवा न करनेसे किञ्चिन्मात्र भी पाप नहीं लगता।

प्रश्न —इस श्लोकको अगर सांख्ययोगीका मान लें तो क्या आपत्ति है; क्योंकि इसमें आये सब लक्षण सांख्य-योगीमें घटते हैं?

उत्तर —पहली बात तो यह है कि यहाँ कर्मयोगका प्रसंग है, इसलिये यह श्लोक मुख्यरूपसे कर्मयोगीका ही है। दूसरी बात, सांख्ययोगी अपनेको कर्ता मानता ही नहीं। उसमें ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’ (गीता—पाँचवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)—ऐसा स्पष्ट विवेक रहता है; फिर उसके लिये ‘कर्म करता हुआ भी पापको नहीं प्राप्त होता’—ऐसा कहना कैसे बन सकता है?

कर्मयोगके साधकमें वैसा स्पष्ट विवेक जाग्रत् न होनेपर भी उसका यह निश्चय रहता है कि ‘मेरा कुछ नहीं है; मेरे लिये कुछ नहीं चाहिये और मेरे लिये कुछ नहीं करना है’।

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

३२३

इन तीन बातोंका दृढ़ निश्चय रहनेके कारण वह कर्म करते

हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है।

लोगोंमें प्राय: ऐसी मान्यता है कि कर्मयोगी गृहस्थ-

आश्रममें और ज्ञानयोगी (सांख्ययोगी) संन्यास-आश्रममें

रहता है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। जिसे शरीरसे

अपनी अलग सत्ताका स्पष्ट विवेक है, वह ज्ञानयोगी ही

है; चाहे वह गृहस्थ-आश्रममें हो अथवा संन्यास-आश्रममें।

जिसमें इतना विवेक नहीं है, पर उपर्युक्त तीन बातोंका

निश्चय पक्का है, वह कर्मयोगी ही है; चाहे वह गृहस्थ-

आश्रममें हो अथवा संन्यास-आश्रममें।

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: ।

सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥

जो कर्मयोगी फलकी इच्छाके बिना-

यदृच्छालाभसन्तुष्ट: = अपने-आप

जो कुछ मिल

जाय, उसमें सन्तुष्ट

रहता है (और)

विमत्सर: = (जो) ईर्ष्यासे रहित,

द्वन्द्वातीतः = द्वन्द्वोंसे रहित

(तथा)

सिद्धौ = सिद्धि

च = और

असिद्धौ = असिद्धिमें

सम: = सम है, (वह)

कृत्वा = (कर्म) करते हुए

अपि = भी (उससे)

न = नहीं

निबध्यते = बँधता।

व्याख्या—'यदृच्छालाभसन्तुष्ट:'—कर्मयोगी निष्काम-

भावपूर्वक सांगोपांग रीतिसे सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है।

फल-प्राप्तिका उद्देश्य न रखकर कर्म करनेपर फलके

रूपमें उसे अनुकूलता या प्रतिकूलता, लाभ या हानि, मान

या अपमान, स्तुति या निन्दा आदि जो कुछ मिलता है,

उससे उसके अन्तःकरणमें कोई असन्तोष पैदा नहीं होता।

जैसे, वह व्यापार करता है तो उसे व्यापारमें लाभ हो

अथवा हानि, उसके अन्तःकरणपर उसका कोई असर नहीं

पड़ता। वह हरेक परिस्थितिमें समानरूपसे सन्तुष्ट रहता है;

क्योंकि उसके मनमें फलकी इच्छा नहीं होती। तात्पर्य यह

है कि व्यापारमें उसे लाभ-हानिका ज्ञान तो होता है तथा

वह उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी करता है, पर

परिणाममें वह सुखी-दु:खी नहीं होता। यदि साधकके

अन्तःकरणपर अनुकूलता-प्रतिकूलताका थोड़ा असर पड़

भी जाय, तो भी उसे घबराना नहीं चाहिये; क्योंकि

साधकके अन्तःकरणमें वह प्रभाव स्थायी नहीं रहता, शीघ्र

मिट जाता है।

उपर्युक्त पदोंमें आया 'लाभ' शब्द प्राप्तिके अर्थमें है,

जिसके अनुसार केवल लाभ या अनुकूलता मिलना ही

'लाभ' नहीं है, प्रत्युत लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता

आदि जो कुछ प्राप्त हो जाय, वह सब 'लाभ' ही है।

'विमत्सर:'—कर्मयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी

एकता मानता है—'सर्वभूतभूतत्मा' (गीता ५।७)।

इसलिये उसका किसी भी प्राणीसे किंचिन्मात्र भी ईर्ष्याका

भाव नहीं रहता।

'विमत्सर:' पद अलगसे देनेका भाव यह है कि

अपनेमें किसी प्राणीके प्रति किंचिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव

न आ जाय, इस विषयमें कर्मयोगी बहुत सावधान रहता

है। कारण कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्रके

हितके लिये ही होती हैं; अतः यदि उसमें किंचिन्मात्र भी

ईर्ष्याका भाव होगा, तो उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ दूसरोंके

हितके लिये नहीं हो सकेंगी।

ईर्ष्या-दोष बहुत सूक्ष्म है। दो दुकानदार हैं और

आपसमें मित्रता रखते हैं। उनमें एककी दूकान दूसरेकी

अपेक्षा ज्यादा चल जाय, तो दूसरेमें थोड़ी ईर्ष्या पैदा हो

जायगी कि उसकी दूकान ज्यादा चल गयी, मेरी कम

चली। इस प्रकार ईर्ष्या-दोषके कारण मित्रसे भी मित्रकी

उन्नति नहीं सही जाती। जहाँ आपसमें प्रेम है, एकता है,

मित्रता है, वहाँ भी ईर्ष्या-दोष आ जाता है; फिर जहाँ वैर,

भिन्नता आदि हो, वहाँका तो कहना ही क्या है? इसलिये

साधकको इस दोषसे बचनेके लिये विशेष सावधान रहना

चाहिये।

'द्वन्द्वातीतः'—कर्मयोगी लाभ-हानि, मान-अपमान,

स्तुति-निन्दा, अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दु:ख आदि

द्वन्द्वोंसे अतीत होता है, इसलिये उसके अन्तःकरणमें

उन द्वन्द्वोंसे होनेवाले राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार

नहीं होते।

द्वन्द्व अनेक प्रकारके होते हैं; जैसे—भगवान्‌का सगुण-

३२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

साकाररूप ठीक है या निर्गुण-निराकाररूप ठीक है, अद्वैत सिद्धान्त ठीक है या द्वैत सिद्धान्त ठीक है, भगवान्में मन लगा या नहीं लगा, एकान्त मिला या नहीं मिला, शान्ति मिली या नहीं मिली, सिद्धि मिली या नहीं मिली, इत्यादि। इन सब द्रष्टव्योंके साथ सम्बन्ध न होनेसे ही साधक निर्दृष्ट होता है। जैसे तराजू किसी भी तरफ झुक जाय तो वह बराबर नहीं कहलाता, ऐसे ही साधकके अन्तःकरणमें किसी भी तरफ झुकाव हो जाय तो वह द्रष्टातीत नहीं कहलाता।

कर्मयोगी सब प्रकारके द्रष्ट्योंसे अतीत होता है, इसलिये वह सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक)।

‘समः सिद्धावसिद्धौ च’ —किसी भी कर्तव्य-कर्मका निर्विघ्नरूपसे पूरा हो जाना सिद्धि है और किसी प्रकारके विघ्न, बाधाके कारण उसका पूरा न होना असिद्धि है। कर्मका फल मिल जाना सिद्धि है और न मिलना असिद्धि है। सिद्धि और असिद्धिमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंका न होना ही सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना है। दूसरे अध्यायके अङ्गतीतसे श्लोकमें ‘सिद्धावसिद्धौः समो भूत्वा’ पदोंमें भी यही भाव आया है।

अपना कुछ भी नहीं है, अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ भी नहीं करना है—ये तीनों बातें ठीक-ठीक अनुभवमें आ जायँ, तभी सिद्धि और असिद्धिमें पूर्णतः समता आयेगी।

‘कृत्वापि न निबध्यते’ —यहाँ ‘कृत्वा अपि’ पदोंका तात्पर्य है कि कर्मयोगी कर्म करते हुए भी नहीं बँधता, फिर कर्म न करते हुए बँधनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। वह दोनों अवस्थाओंमें निलिप्त रहता है।

जैसे शरीर-निर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाला कर्मयोगी

कर्मोंसे नहीं बँधता, वैसे ही शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला कर्मयोगी भी कर्मोंसे नहीं बँधता।

वास्तवमें देखा जाय तो कर्मयोगमें कर्म करना, अधिक करना, कम करना अथवा न करना बन्धन या मुक्तिका कारण नहीं है। इनके साथ जो लिप्तता (लगाव) है, वही बन्धनका कारण है और जो निलिप्तता है, वही मुक्तिका कारण है। जैसे नाटकमें एक व्यक्ति लक्ष्मणका और दूसरा व्यक्ति मेघनादका स्वर्ग धारण करता है और दोनों व्यक्ति अपने-अपने स्वर्गोंको ठीक-ठीक निभाते हुए भी उससे निलिप्त रहते हैं अर्थात् अपनेको वास्तवमें लक्ष्मण या मेघनाद नहीं मानते। ऐसे ही कर्मयोगी अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्यका पालन करते हुए भी उनसे निलिप्त रहता है अर्थात् उनसे अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता। उसका सम्बन्ध नित्य-निरन्तर रहनेवाले स्वरूपके साथ रहता है, प्रतिक्षण परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ नहीं। इसलिये उसकी स्थिति स्वाभाविक ही समतामें रहती है। समतामें स्थिति रहनेसे वह कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधता।

यदि विशेष विचारपूर्वक देखा जाय तो समता स्वतः-सिद्ध है। यह प्रत्येक मनुष्यका अनुभव है कि अनुकूल परिस्थितिमें हम जो रहते हैं, प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी हम वही रहते हैं। यदि हम वही (एक ही) न रहते, तो दो अलग-अलग (अनुकूल और प्रतिकूल) परिस्थितियोंका ज्ञान कैसे होता? इससे सिद्ध हुआ कि परिवर्तन परिस्थितियोंमें होता है अपने स्वरूपमें नहीं। इसलिये परिस्थितियोंके बदलनेपर भी स्वरूपसे हम सम (ज्यों-के-त्यों) ही रहते हैं। भूल यह होती है कि हम परिस्थितियोंकी ओर तो देखते हैं, पर स्वरूपकी ओर नहीं देखते। अपने सम स्वरूपकी ओर न देखनेके कारण ही हम आने-जाने-वाली परिस्थितियोंसे मिलकर सुखी-दुःखी होते हैं।

सम्बन्ध—तीसरे अध्यायके नवें श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने ‘व्यतिरेक रीति’ से कहा था कि यज्ञसे अतिरिक्त कर्म मनुष्यको बँधते हैं। अब तेईसवें श्लोकके उत्तरार्धमें उसी बातको ‘अन्य रीति’ से कहते हैं।

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥

गतसङ्गस्य= जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है,ज्ञानावस्थित-चेतसः= जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है, (ऐसे केवल)आचरतः= कर्म करनेवाले मनुष्यके
मुक्तस्य= जो मुक्त हो गया है,यज्ञाय= यज्ञके लियेसमग्रम्= सम्पूर्ण
कर्म= कर्म
प्रविलीयते= नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक २३ ]

  • साधक-संजीवनी *

३२५

व्याख्या —[कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्मके विलीन होनेकी बात गीताभरमें केवल इसी श्लोकमें आयी है, इसलिये यह कर्मयोगका मुख्य श्लोक है। इसी प्रकार चौथे अध्यायका छतीसवाँ श्लोक ज्ञानयोगका और अठारहवाँ अध्यायका छाछठवाँ श्लोक भक्तियोगका मुख्य श्लोक है।]

'गतसङ्कस्य' —क्रियाओंका, पदार्थोंका, घटनाओंका, परिस्थितियोंका, व्यक्तियोंका जो संग है, इनके साथ जो हृदयसे लगाव है, वही वास्तवमें बाँधनेवाला अर्थात् जन्म-मरण देनेवाला है (गीता—तेरहवाँ अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। स्वार्थभावको छोड़कर केवल लोगोंके हितके लिये, लोकसंग्रहार्थ कर्म करते रहनेसे कर्मयोगी क्रियाओं, पदार्थों आदिसे असंग हो जाता है अर्थात् उसकी आसक्ति सर्वथा मिट जाती है।

वास्तवमें मनुष्य स्वरूपसे असंग ही है—'असंगो ह्ययं पुरुषः' (बृहदारण्यक० ४।३।१५)। किंतु असंग होते हुए भी यह शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, परिस्थिति, व्यक्ति आदिसे सम्बन्ध मानकर सुखकी इच्छासे उनमें आबद्ध हो जाता है। मेरी मनचाही हो अर्थात् जो मैं चाहता हूँ, वही हो और जो मैं नहीं चाहता, वह नहीं हो—ऐसा भाव जबतक रहता है, तबतक यह संग बढ़ता ही रहता है। वास्तवमें होता वही है, जो होनेवाला है। जो होनेवाला है उसे चाहें या न चाहें, वह होगा ही; और जो नहीं होनेवाला है, उसे चाहें या न चाहें, वह नहीं होगा। अतः अपनी मनचाही करके मनुष्य व्यर्थमें (बिना कारण) फैसता है और दुःख पाता है।

कर्मयोगी संसारसे मिली हुई शरीरादि वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर उन्हें संसारकी ही मानकर संसारकी सेवामें अर्पण कर देता है। इससे वस्तुओं और क्रियाओंका प्रवाह संसारकी ओर ही हो जाता है और अपना असंग स्वरूप ज्यों-का-त्यों रह जाता है।

कर्मयोगीका 'अहम्' भी सेवामें लग जाता है। तात्पर्य यह है कि उसके भीतर 'मैं सेवक हूँ' यह भाव भी नहीं रहता। यह भाव तो मनुष्यको सेवकपनेके अभिमानसे बाँध देता है। सेवकपनेका अभिमान तभी होता है, जब सेवा-सामग्रीके साथ अपनापन होता है। सेवाकी वस्तु उसीकी थी, उसीको दे दी तो सेवा क्या हुई? हम तो उससे उग्रहण हुए। इसलिये सेवक न रहे, केवल सेवा रह जाय। यह भाव रहे कि सेवाके बदलेमें धन, मान, बड़ाई, पद, अधिकार आदि कुछ भी लेना नहीं है; क्योंकि उसपर

हमारा हक ही नहीं लगता। उसे स्वीकार करना तो अनधिकार चेष्टा है। लोग मेरेको सेवक कहें—ऐसा भाव भी न रहे और यदि वे कहें तो उसमें राजी भी न हो। इस प्रकार संसारकी वस्तुओंको संसारकी सेवामें सर्वथा लगा देनेसे अन्तःकरणमें एक प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नताका भी भोग न किया जाय तो स्वतःसिद्ध असंगताका अनुभव हो जाता है।

'मुक्तस्य' —जो अपने स्वरूपसे सर्वथा अलग है, उन क्रियाओं और शरीरादि पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध न होते हुए भी कामना, ममता और आसक्तिपूर्वक उनसे अपना सम्बन्ध मान लेनेसे मनुष्य बँध जाता है अर्थात् पराधीन हो जाता है। कर्मयोगका अनुष्ठान करनेसे जब माना हुआ (अवास्तविक) सम्बन्ध मिट जाता है, तब कर्मयोगी सर्वथा असंग हो जाता है। असंग होते ही वह सर्वथा मुक्त हो जाता है अर्थात् स्वाधीन हो जाता है।

'ज्ञानावस्थितचेतसः' —जिसकी बुद्धिमें स्वरूपका ज्ञान नित्य-निरन्तर जाग्रत् रहता है, वह 'ज्ञानावस्थित-चेतसः' है। स्वरूप-ज्ञान होते ही उसकी स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, जो वास्तवमें पहलेसे ही थी।

वास्तवमें ज्ञान संसारका ही होता है। स्वरूपका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि स्वरूप स्वतःज्ञानस्वरूप है। क्रिया और पदार्थ ही संसार है। क्रिया और पदार्थका विभाग अलग है तथा स्वरूपका विभाग अलग है अर्थात् क्रिया और पदार्थका स्वरूपके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। क्रिया और पदार्थ जड़ हैं तथा स्वरूप चेतन है। क्रिया और पदार्थ प्रकाश्य हैं तथा स्वरूप प्रकाशक है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थकी स्वरूपसे भिन्नताका ठीक-ठीक ज्ञान होते ही क्रिया और पदार्थरूप संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर स्वतःसिद्ध असंग स्वरूपमें स्थितिका अनुभव हो जाता है।

'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' —'कर्ममें अकर्म' देखनेका ही एक प्रकार है—'यज्ञार्थ कर्म' अर्थात् यज्ञके लिये कर्म करना। निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना 'यज्ञ' है। जो यज्ञके लिये ही सम्पूर्ण कर्म करता है, वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और जो यज्ञके लिये कर्म नहीं करता अर्थात् अपने लिये कर्म करता है, वह कर्मोंसे बँध जाता है—'यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' ' (गीता ३।९)।

प्रकृतिका कार्य है—क्रिया और पदार्थ। इन दोनोंमें क्रियाका भी आदि और अन्त होता है तथा पदार्थका भी

३२६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

आदि और अन्त होता है। क्रिया आरम्भ होनेसे पहले भी नहीं थी और समाप्त होनेके बाद भी नहीं रहेगी, इसलिये बीचमें भी वह नहीं है—ऐसा सिद्ध हुआ। इसी प्रकार पदार्थ उत्पन्न होनेसे पहले भी नहीं था और नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहेगा, इसलिये बीचमें भी वह नहीं है—यह सिद्ध हुआ; क्योंकि यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु आदि और अन्तमें नहीं होती, वह मध्य (वर्तमान)-में भी नहीं होती। परन्तु चेतन स्वरूपका आदि और अन्त नहीं होता, वह सदा अक्रियरूपसे ज्यों-का-त्यों रहता है। वह चेतन-तत्त्व क्रिया और पदार्थ—दोनोंका प्रकाशक है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न होते हुए भी जब वह इनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बंध जाता है। इस बन्धनसे छूटनेका उपाय है—फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना।

संसारमें अनेक प्रकारकी क्रियाएँ हो रही हैं और अनेक प्रकारके पदार्थ विद्यमान हैं। परन्तु मनुष्य जिन क्रियाओं और पदार्थोंसे आसक्ति, ममता और कामनापूर्वक अपना सम्बन्ध मानता है, उन्हीं क्रियाओं और पदार्थोंसे वह बँधता है। जब मनुष्य कामना, ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्म करता है और मिले हुए पदार्थोंको दूसरोंका ही मानकर उनकी सेवामें लगाता है, तब कर्मयोगीके सम्पूर्ण (क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध) कर्म विलीन हो जाते हैं अर्थात् उसे कर्मोंके साथ अपनी स्वतःसिद्ध असंगताका अनुभव हो जाता है।

विशेष बात

(१) कर्ता, करण और कर्म—इन तीनोंके मिलनेसे कर्मोंका संचय होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। यदि कर्तापन न रहे तो कर्मोंका संग्रह नहीं होता; क्योंकि करण और कर्म—दोनों कर्ताके ही अधीन हैं। अतः कर्मसंचयका मुख्य हेतु कर्तापन ही है।

विचारपूर्वक देखा जाय तो कुछ-न-कुछ पानेकी इच्छासे ही करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है, जिससे कर्तापन उत्पन्न होता है। कर्तापनसे बन्धन होता है। जब मनुष्य पानेकी इच्छासे अपने लिये कर्म करता है, तब उसका

कर्तापन दूढ़ हो जाता है। जब कर्मयोगी पानेकी इच्छाका त्याग करके केवल यज्ञके लिये अर्थात् दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, तब उसका कर्तापन दूसरोंके लिये होता है; इससे उसे अपनी असंगताका अनुभव हो जाता है। इसलिये उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंका संचय नहीं होता। कारण कि जब आधार (कर्तापन) ही नहीं रहा, तब कर्म टिकेंगे ही कहीं?

कर्मयोगमें 'ममता'-(मेरा-पन-) का त्याग और ज्ञानयोगमें 'अहंता' (मैं-पन-) का त्याग मुख्य है। ममताका त्याग होनेसे अहंताका और अहंताका त्याग होनेसे ममताका त्याग स्वतः हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें पहले 'ममता' मिटती है, फिर 'अहंता' स्वतः मिट जाती है, और ज्ञानयोगमें पहले 'अहंता' मिटती है, फिर 'ममता' स्वतः मिट जाती है। अहंता और ममताके मिटनेपर कर्तापन और भोक्तापन भी मिट जाते हैं।

कर्मयोगी अपने लिये कोई कर्म करता ही नहीं और कुछ चाहता ही नहीं; अतः वह कर्मोंके फलका भोक्ता नहीं बनता। जैसे, एक व्यक्तिको यहाँ कई दण्ड भोगने हैं। परन्तु वह मर जाय तो यहाँ उसके सभी दण्ड समाप्त हो जाते हैं; क्योंकि जब भोगनेवाला व्यक्ति ही नहीं रहा, तब दण्ड भोगेगा ही कौन? ऐसे ही जब कर्मयोगीका भोक्तापन मिट जाता है, तब उसके सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं; क्योंकि जब भोक्ता ही नहीं रहा, तब कर्मोंका फल भोगेगा ही कौन?

(२) इसी अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं—इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह मेरेको प्राप्त होता है। जन्म तो केवल भगवान्के ही दिव्य होते हैं, पर कर्म मनुष्यमात्रके भी (यदि वे करना चाहें तो) दिव्य हो सकते हैं। अतः इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका कारण बताते हैं कि कर्मोंके फलमें मेरी स्मृता नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते अर्थात् मेरे कर्म अकर्म हो जाते हैं। इस प्रकार कर्मोंका तत्त्व जानकर जो कर्म करता है, उसके भी कर्म अकर्म हो जाते हैं। फिर पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मुमुक्षुओंने भी इसी प्रकार जानकर कर्म किये हैं। इसके बाद सोलहवें श्लोकमें भगवान् कर्मोंका तत्त्व कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं, और

१-आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। (माण्डूक्यकारिका ४। ३१)

२-अहंताके साथ भी ममता रहती है; जैसे—मेरा अहंकार। इसलिये कर्मयोगमें ममताका सर्वथा त्याग होनेपर अहंताके साथ भी ममता नहीं रहती। फिर अहंता (कथनमात्रके लिये) केवल संसारकी सेवाके लिये रह जाती है।